श्री भगवत चर्चा
02 January 2026
स्वरूप विस्मृति से स्वरूप जागरण तक
अहंकार का त्याग, चिद-अभिमान का उदय और भाव-भक्ति की प्राप्ति
Sri Sri 108 Sri Vinod Baba ji Maharaj
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विस्तार
हमारे प्रिय सद्गुरुदेव बताते हैं:
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एक भूल, महाभूल! भगवान से हमारा नित्य संबंध है, तुम भूल गए हो, वह भूल को मिटाना है।
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चिद-अभिमान (10)जड़-अभिमान (8)स्वरूप विस्मृति (7)भाव भक्ति (12)आसक्ति (9)रुचि (8)साधु संग (6)मंजरी स्वरूप (5)मानशून्यता (4)
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जीव का भ्रम: स्वरूप विस्मृति का संकट
इस खंड में सद्गुरुदेव जीव के दुःखों के मूल कारण का निदान करते हैं। वे समझाते हैं कि भगवान का आनंदमय अंश होते हुए भी जीव 'स्वरूप विस्मृति' के कारण स्वयं को शरीर मानकर संसार रूपी स्वप्न में कष्ट भोग रहा है।
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सद्गुरुदेव सत्संग का आरंभ इस गहन प्रश्न से करते हैं कि जीव भगवान का सत-चित्-आनंदमय अंश होते हुए भी इस दुःखमय संसार चक्र में क्यों फँसा हुआ है। वे बताते हैं कि जीव का भगवान से नित्य, अविच्छेद्य और अखंड संबंध है। इसके बावजूद वह 84 लाख योनियों में बार-बार क्यों भटक रहा है।
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि जीव का वास्तविक स्वरूप सत-आनंदमय है क्योंकि वह पूर्णानंद भगवान का ही अंश है। आत्मा और आनंद दो अलग वस्तुएँ नहीं हैं, वे एक ही हैं। फिर भी, इस आनंदमय स्वरूप के होते हुए भी जीव को ऐसा प्रतीत होता है जैसे वह दुःख के सागर में गोते लगा रहा है। इसका मूल कारण है 'स्वरूप विस्मृति', अर्थात् अपने वास्तविक दिव्य, चेतन और आनंदमय स्वरूप को भूल जाना।
🔗 यह जीव के अस्तित्व के मूल विरोधाभास को स्थापित करता है, जो सत्संग के आगे के विश्लेषण की नींव है।
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स्वरूप विस्मृति: दुःख का मूल कारण
माया द्वारा स्वरूप का आवरण: विस्मृति का खेल
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सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि हमारे सारे दुःखों का एकमात्र कारण अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाना है। माया ने हमें यह भुला दिया है कि हम चेतन, दिव्य, मायातीत, गुणातीत और भगवान के नित्य संबंधी हैं। इस विस्मृति के कारण हम जड़ शरीर से तादात्म्य कर लेते हैं और उसके विकारों से स्वयं को विकृत अनुभव करते हैं।
सद्गुरुदेव बताते हैं कि माया की शक्ति जीव के वास्तविक स्वरूप को ढँक देती है। हम भूल जाते हैं कि हमारा भगवान से संबंध कोई बनावटी या अस्थायी नहीं, बल्कि नित्य और अखंड है, जो किसी भी अवस्था में टूट नहीं सकता। इस विस्मृति के कारण हम जड़ शरीर और उसके विकारों से तादात्म्य स्थापित कर लेते हैं। यही भूल हमें दुःखमय सागर में डुबो देती है और हम स्वयं को असहाय महसूस करते हैं।
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दृष्टांत: संसार एक स्वप्न है
दृष्टांत: स्वप्न का विकार और जाग्रति की आवश्यकता
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सद्गुरुदेव समझाते हैं कि यह संसार और इसके दुःख एक स्वप्न की भाँति मिथ्या हैं। जैसे स्वप्न में न शरीर होता है, न संसार, फिर भी हम एक काल्पनिक शरीर से काल्पनिक संसार को भोगकर भय और दुःख का अनुभव करते हैं। यह विकार तब तक सत्य प्रतीत होता है, जब तक निद्रा भंग नहीं होती।
सद्गुरुदेव एक शक्तिशाली दृष्टांत देते हैं कि जैसे कोई व्यक्ति सोते हुए स्वप्न में भयभीत होकर चिल्लाता है, जबकि वास्तव में वहाँ कोई भय का कारण नहीं होता। वह स्वप्न के काल्पनिक शरीर और संसार में सत्य का आरोप कर लेता है, जिससे उसे वास्तविक विकार और दुःख की अनुभूति होती है। यह मिथ्या दुःख तब तक दूर नहीं होता जब तक कोई उसे जगा न दे। ठीक इसी प्रकार, यह सांसारिक दुःख भी 'अज्ञान-निद्रा' के कारण है और 'स्वरूप-जागरण' से ही मिटेगा।
🔗 यह दृष्टांत संसार की मिथ्या प्रकृति और ज्ञान की आवश्यकता को उजागर करता है।
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सद्गुरुदेव बताते हैं कि दुःखों का मूल कारण 'अहंकार' है। जब चेतन सत्ता का जड़ प्रकृति से तादात्म्य होता है, तो अहंकार तत्व पैदा होता है। यह अहंकार ही कर्ता बनकर इस शरीर को 'मैं' मान लेता है और इसके सुख-दुःख को भोगता है, जबकि आत्मा इसमें सोई रहती है।
सद्गुरुदेव अहंकार की उत्पत्ति को समझाते हैं। वे कहते हैं कि जब माया से चेतन सत्ता का तादात्म्य होता है, तो इन दोनों के मिश्रण से 'अहंकार' तत्व का जन्म होता है। यह अहंकार ही भोक्ता बनकर शरीर पर कर्तृत्व का अभिमान कर लेता है और कहता है, 'यह शरीर मैं हूँ'। इसी मिथ्या पहचान के कारण जीव संसार चक्र में फँस जाता है। यह अहंकार ही आत्मा को आवृत करके उसे संसार में भटकाता है।
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सद्गुरुदेव अहंकार के स्वरूप को अग्नि और लकड़ी के संयोग से उत्पन्न धुएँ के दृष्टांत से समझाते हैं। जैसे धुआँ न तो शुद्ध अग्नि है और न ही शुद्ध लकड़ी, बल्कि दोनों का मिश्रण है, उसी प्रकार अहंकार न तो शुद्ध चेतन है और न ही शुद्ध जड़, बल्कि दोनों का उभयात्मक मिश्रण है।
सद्गुरुदेव एक सटीक दृष्टांत देते हुए कहते हैं कि जैसे अग्नि और लकड़ी के संयोग से एक नया तत्व 'धुआँ' उत्पन्न होता है, जो न पूरी तरह अग्नि है और न ही लकड़ी। ठीक इसी प्रकार, चेतन आत्मा और जड़ प्रकृति के संयोग से 'अहंकार' रूपी धुआँ उत्पन्न होता है। यह उभयात्मक है - इसमें जड़ता भी है और चेतना का आभास भी। यही अहंकार आत्मा को ढँककर सारे भ्रम और दुःख का कारण बनता है।
🔗 यह दृष्टांत अहंकार की जटिल और मिश्रित प्रकृति को स्पष्ट करता है।
उपाय का उदय: जड़-अभिमान बनाम चिद-अभिमान
इस खंड में, समस्या के निदान के बाद सद्गुरुदेव समाधान प्रस्तुत करते हैं। वे अहंकार के दो प्रकारों—'जड़-अभिमान' (बंधन) और 'चिद-अभिमान' (मुक्ति)—में भेद करते हैं और गुरु कृपा से चिद-अभिमान को जाग्रत करने की प्रक्रिया का वर्णन करते हैं, जो सभी साधनाओं का आधार है।
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सद्गुरुदेव अहंकार के दो रूपों का भेद बताते हैं। 'जड़-अभिमान' है 'मैं शरीर हूँ और शरीर से संबंधित वस्तुएँ मेरी हैं'। यह आत्मा को संसार में बाँधता है। इसके विपरीत, 'चिद-अभिमान' है 'मैं शरीर नहीं, मैं चेतन आत्मा, भगवान का नित्य दास हूँ'। यह मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि अहंकार के दो पक्ष हैं। पहला है 'जड़-अभिमान', जो हमें यह विश्वास दिलाता है कि 'मैं यह शरीर हूँ' और 'शरीर से जुड़ी वस्तुएँ मेरी हैं'। यह जड़ वृत्ति आत्मा को ढँककर उसे संसार चक्र में धकेलती है और आत्मा का शत्रु बन जाती है। दूसरा है 'चिद-अभिमान', जो गुरु कृपा से जाग्रत होता है और हमें बोध कराता है कि 'मैं शरीर नहीं, बल्कि दिव्य, चिन्मय आत्मा हूँ और भगवान का नित्य सेवक हूँ'। यही चिद-अभिमान आत्मा का सच्चा मित्र है।
🔗 यह साधक के सामने मौजूद चुनाव को स्पष्ट करता है - बंधन का मार्ग या मुक्ति का मार्ग।
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सद्गुरुदेव बताते हैं कि जड़-अभिमान से चिद-अभिमान की ओर यात्रा गुरु कृपा के बिना असंभव है। गुरु केवल उपदेश नहीं देते, बल्कि अपनी शक्ति से शिष्य के भीतर सोई हुई चेतन सत्ता को, उसके चिद-अभिमान को, जगाते हैं। यही गुरु-करण का वास्तविक अर्थ है।
सद्गुरुदेव गुरु की भूमिका पर बल देते हुए कहते हैं कि आत्मा पर विजय प्राप्त करने के लिए गुरु कृपा अनिवार्य है। जब गुरु कृपा करते हैं, तो वे शिष्य की सोई हुई चेतन सत्ता को जगाते हैं। गुरु-करण का अर्थ केवल दीक्षा लेना नहीं, बल्कि गुरु द्वारा शिष्य के भीतर 'चिद-अभिमान' को स्थापित करना है। गुरु ही हमें हमारा वास्तविक स्वरूप बताते हैं - 'तुम यह शरीर नहीं, तुम भगवान के नित्य सहचारी हो'।
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सद्गुरुदेव गौड़ीय वैष्णव उपासना की विशिष्टता बताते हैं, जिसका प्राण केंद्र 'राधा-दास्य' है। इसमें गुरु शिष्य को उसका 'मंजरी स्वरूप' प्रदान करते हैं - 'तुम शरीर नहीं, तुम श्री राधा रानी की नित्य सहचारी, एक मंजरी हो'। यह चिद-अभिमान साधना का सर्वोच्च रूप है।
सद्गुरुदेव गौड़ीय वैष्णव आराधना की सुंदरता का वर्णन करते हैं, जिसके प्राण केंद्र में माधुर्य उपासना और 'राधा-दास्य' है। इस मार्ग में गुरु शिष्य को उसका दिव्य स्वरूप प्रदान करते हैं, जो कि श्री राधा रानी की एक सहचारी या 'मंजरी' का है। गुरु बताते हैं, 'तुम यह मायातीत, गुणातीत, दिव्य शरीर हो, जो नित्य ही राधा रानी की सेवा में संलग्न है'। यह स्वरूप चिंतन ही जड़-अभिमान को मिटाने का सबसे मधुर और शक्तिशाली उपाय है।
🔗 यह भक्ति के एक विशिष्ट और मधुर रूप का परिचय देता है जो सत्संग का केंद्रीय विषय है।
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ज्ञान मार्ग (सोऽहम्) बनाम भक्ति मार्ग (दासोऽहम्)
उपासना के दो पथ: सोऽहम् और दासोऽहम्
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सद्गुरुदेव ज्ञान मार्ग और भक्ति मार्ग के चिद-अभिमान की तुलना करते हैं। ज्ञान मार्ग में 'सोऽहम्' (मैं वही ब्रह्म हूँ) का चिंतन होता है, जो निर्गुण-निराकार है। इसके विपरीत, भक्ति मार्ग में, विशेषकर गौड़ीय मत में, 'दासोऽहम्' (मैं श्री राधा जी का दास हूँ) का चिंतन होता है, जो नाम, रूप, गुण, लीला से युक्त है।
सद्गुरुदेव विभिन्न उपासना पद्धतियों की चर्चा करते हुए बताते हैं कि सभी मार्गों में चिद-अभिमान को जगाना आवश्यक है। ब्रह्म उपासना (ज्ञान मार्ग) में 'नेति-नेति' विचार द्वारा 'सोऽहम्' (मैं वही ब्रह्म हूँ) के अभिमान तक पहुँचा जाता है, जहाँ नाम, रूप, गुण, लीला नहीं हैं। वहीं, सगुण-सविशेष उपासना (भक्ति मार्ग) में हमारा चिद-अभिमान 'दासोऽहम्' (मैं दास हूँ) है। हमारे लिए नाम, रूप, वर्ण, अलंकार, सेवा सब कुछ है, जो हमें भगवान की लीला से जोड़ता है।
🔗 यह विभिन्न आध्यात्मिक मार्गों के लक्ष्य और प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण अंतर को स्पष्ट करता है।
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साधना का आधार: 'मैं शरीर नहीं हूँ'
सभी साधनाओं की नींव: देहात्म-बुद्धि का त्याग
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सद्गुरुदेव दृढ़ता से कहते हैं कि कोई भी साधना—चाहे वह योग, ज्ञान, कर्म या भक्ति हो—इस आधारशिला के बिना सफल नहीं हो सकती कि 'मैं यह शरीर नहीं हूँ'। जब तक शरीर में 'मैं' बुद्धि है, तब तक की गई कोई भी साधना साधक को शरीर में ही फँसाए रखेगी। साधना का प्राण ही चिद-अभिमान है।
सद्गुरुदेव एक मौलिक सिद्धांत स्थापित करते हैं कि किसी भी आध्यात्मिक मार्ग की सफलता देहात्म-बुद्धि के त्याग पर निर्भर करती है। चाहे कोई योग करे, ज्ञान का अभ्यास करे, या भक्ति करे, यदि वह स्वयं को शरीर मानता है, तो उसकी सारी साधना व्यर्थ है और वह शरीर के स्तर पर ही फँसा रहेगा। साधना का प्राण केंद्र और आधार यही चिंतन है: 'मैं शरीर नहीं, शरीर संबंधी वस्तु मेरी नहीं, मैं चिन्मय आत्मा हूँ'।
साधना की प्रक्रिया: भक्ति के सोपान
इस खंड में सद्गुरुदेव भक्ति-मार्ग पर आगे बढ़ने की व्यावहारिक प्रक्रिया का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि चिद-अभिमान का चिंतन कैसे धीरे-धीरे जड़-अभिमान को कम करता है और साधक श्रद्धा से लेकर आसक्ति तक की अवस्थाओं को कैसे पार करता है।
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साधन का प्राण: स्वरूप चिंतन
चिद-अभिमान और जड़-अभिमान का प्रतिशत युद्ध
▶ देखें (18:07)
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सद्गुरुदेव बताते हैं कि साधना का प्राण अपने दिव्य स्वरूप का निरंतर चिंतन है। जैसे-जैसे साधक 'मैं राधा रानी की सहचारी हूँ' इस चिद-अभिमान का चिंतन बढ़ाता है, वैसे-वैसे 'मैं शरीर हूँ' यह जड़-अभिमान प्रतिशत में घटता जाता है। यह एक क्रमिक प्रक्रिया है।
सद्गुरुदेव साधना की आंतरिक प्रक्रिया को समझाते हैं। वे कहते हैं कि जब साधक अपने गुरु-प्रदत्त स्वरूप का चिंतन करता है, तो उसके भीतर चिद-अभिमान का प्रतिशत बढ़ने लगता है। इसके साथ ही, देह और दैहिक वस्तुओं में जो अभिनिवेश या जड़-अभिमान है, उसका प्रतिशत धीरे-धीरे कम होने लगता है। यह एक आंतरिक संघर्ष है जिसमें चिंतन के द्वारा चिद-अभिमान को प्रबल बनाना होता है।
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सद्गुरुदेव समझाते हैं कि भक्ति आरंभ करने पर भी सांसारिक आसक्ति तुरंत नहीं जाती। जैसे हींग को डिब्बे से निकालने और उसे धोने के बाद भी उसकी गंध बनी रहती है, वैसे ही संसार छोड़ने के बाद भी उसके संस्कार और वासनाएँ चित्त में बनी रहती हैं और अवसर पाकर मन को खींच लेती हैं।
सद्गुरुदेव एक बहुत ही व्यावहारिक दृष्टांत देते हैं। एक सुंदर डिब्बे में बहुत समय तक हींग रखी थी। हींग निकालने के बाद डिब्बे को साबुन से अच्छी तरह धो भी दिया गया, लेकिन हींग की गंध फिर भी नहीं गई। इसी प्रकार, जब साधक भजन में लगता है और संसार का त्याग करता है, तब भी अनादि काल के जो सांसारिक संस्कार और वासनाएँ हैं, वे चित्त से इतनी आसानी से नहीं जातीं। थोड़ा सा भी विषय का संसर्ग होने पर वे पुरानी गंध की तरह फिर से उभर आती हैं।
🔗 यह दृष्टांत साधक को धैर्य रखने और संस्कारों की गहराई को समझने की प्रेरणा देता है।
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सद्गुरुदेव चेतावनी देते हैं कि मन पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए, क्योंकि पुराने संस्कार उसे कभी भी विषयों की ओर खींच सकते हैं। इससे बचने का एकमात्र उपाय निरंतर सत्संग और महापुरुषों के सानिध्य में रहना है। उनके संपर्क से भीतर की वासनाएँ धीरे-धीरे शांत हो जाती हैं।
सद्गुरुदेव अर्जुन के प्रश्न का उल्लेख करते हुए बताते हैं कि इच्छा न होते हुए भी कोई अदृश्य शक्ति हमें पाप में प्रवृत्त करती है - वह शक्ति हमारे अनादि कालीन संस्कार हैं। वे कहते हैं कि मन पर कभी भरोसा नहीं करना चाहिए। जब भी मन विषयों में प्रबल रूप से आसक्त हो, तो उससे लड़ने का सबसे अच्छा उपाय साधु-संग में जाना है। महापुरुषों के सानिध्य और सत्संग के प्रभाव से मन की मलिन वासनाएँ स्वतः ही नष्ट हो जाती हैं।
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सद्गुरुदेव भक्ति के प्रथम चरण 'श्रद्धा' की व्याख्या करते हैं। यह तब उत्पन्न होती है जब पूर्व जन्मों के संस्कारों से व्यक्ति यह समझ जाता है कि संसार अनित्य है और भजन ही एकमात्र सार है। यह श्रद्धा ही उसे साधु-संग और भजन-क्रिया की ओर ले जाती है।
सद्गुरुदेव भक्ति की यात्रा के आरंभिक बिंदु 'श्रद्धा' को परिभाषित करते हैं। यह केवल एक विश्वास नहीं, बल्कि एक दृढ़ निश्चय है जो पूर्व जन्मों के सुकृत्यों से उत्पन्न होता है। साधक को यह बोध होता है कि संसार अनित्य है और मानव जीवन का एकमात्र उद्देश्य भगवत्-प्रेम प्राप्त करना है। यही श्रद्धा उसे गुरु और साधुओं की शरण में ले जाती है, जहाँ से भजन-क्रिया का आरंभ होता है।
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सद्गुरुदेव 'रुचि' की अवस्था का वर्णन करते हैं। इस स्तर पर साधक को भजन, कीर्तन, सत्संग और भगवत्-चर्चा में स्वाभाविक रूप से अच्छा लगने लगता है। यदि सत्संग न मिले तो उसे व्याकुलता होती है। यह भव-रोग के ठीक होने का लक्षण है।
सद्गुरुदेव 'रुचि' के स्तर को आध्यात्मिक स्वास्थ्य के एक महत्वपूर्ण संकेतक के रूप में प्रस्तुत करते हैं। जैसे बीमार व्यक्ति को भोजन में रुचि नहीं होती, वैसे ही भव-रोग से ग्रस्त जीव को हरि-कथा में रुचि नहीं होती। जब साधक को नाम-जप, कीर्तन, और सत्संग में स्वाभाविक आनंद आने लगे और इनके बिना बेचैनी महसूस हो, तो समझना चाहिए कि उसका भव-रोग अब नष्ट हो रहा है और वह सही मार्ग पर है।
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सद्गुरुदेव 'आसक्ति' की अवस्था को समझाते हैं, जहाँ मन स्वाभाविक रूप से और पूर्णतः भगवान में लग जाता है। इस स्थिति में, भजन के लिए मन को लगाना नहीं पड़ता, बल्कि सांसारिक कार्यों के लिए मन को भगवान से खींचकर लाना पड़ता है। साधक खाते-पीते, चलते-फिरते भी भगवान के चिंतन में खोया रहता है।
सद्गुरुदेव 'आसक्ति' की उन्नत अवस्था का सुंदर वर्णन करते हैं। यह वह स्थिति है जब मन का प्रवाह उलट जाता है। जहाँ पहले भजन में मन को ज़बरदस्ती लगाना पड़ता था और वह बार-बार संसार में भागता था, अब मन स्वाभाविक रूप से भगवान में लगा रहता है। संसार के किसी कार्य के लिए मन को भगवान के चिंतन से खींचकर लाना पड़ता है। साधक चलते-चलते, बात करते-करते अपनी ही धुन में खो जाता है और उसे लीलाओं की स्फूर्ति होने लगती है।
🔗 यह साधना की एक बहुत ही उन्नत और वांछनीय अवस्था को दर्शाता है।
भाव का प्राकट्य: दिव्योन्माद के लक्षण
यह खंड भक्ति की एक बहुत ही उन्नत अवस्था 'भाव-भक्ति' पर केंद्रित है। सद्गुरुदेव बताते हैं कि जब आसक्ति परिपक्व होती है, तो साधक भाव-दशा में प्रवेश करता है, जहाँ वह बाहरी दुनिया के प्रति उदासीन होकर एक दिव्य पागलपन का अनुभव करता है और उसमें विशेष लक्षण प्रकट होते हैं।
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सद्गुरुदेव बताते हैं कि जब आसक्ति परिपक्व हो जाती है, तो साधक 'भाव भक्ति' की अवस्था में प्रवेश करता है। इस स्थिति में शरीर के प्रति आसक्ति लगभग समाप्त (गंध मात्र) हो जाती है और भगवत्-प्रीति अत्यंत प्रबल हो जाती है। साधक का स्वरूप चिंतन और लीला चिंतन स्वतः और निरंतर चलता रहता है।
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि आसक्ति की परिपक्व दशा ही 'भाव भक्ति' है। यह साधन भक्ति और प्रेम भक्ति के बीच की अवस्था है। इस दशा में साधक का चिंतन स्वतः स्फूर्त हो जाता है; उसे प्रयास नहीं करना पड़ता। शरीर और संसार के प्रति प्रीति केवल गंध मात्र रह जाती है, जबकि भगवान के प्रति प्रीति पल भर के लिए भी मन से नहीं हटती। इस अवस्था में साधक के लिए विधि-निषेध का पालन करना असंभव हो जाता है क्योंकि उसे देह का भान ही नहीं रहता।
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सद्गुरुदेव बताते हैं कि भाव दशा में साधक में एक प्रकार का पागलपन आ जाता है। वह कभी हँसता है, कभी रोता है, कभी गाता है, तो कभी पागलों की तरह नाचता है। बाहरी नियम-कानून, जैसे तिलक लगाना या पूजा-पाठ करना, छूट जाते हैं क्योंकि उसे शरीर का ध्यान ही नहीं रहता।
सद्गुरुदेव भाव दशा के बाहरी लक्षणों का वर्णन करते हैं, जो सामान्य लोगों को पागलपन लग सकते हैं। इस अवस्था में भक्त का चित्त भगवद्-प्रेम में इतना डूबा रहता है कि वह बाहरी दुनिया के प्रति बेसुध हो जाता है। वह कभी लीला-स्मरण में हँसता है, कभी विरह में रोता है, और कभी उन्मत्त होकर नाचने-गाने लगता है। लोग उसे पागल, धतूरा खाया हुआ या अपराधी समझकर उसकी निंदा कर सकते हैं, लेकिन वह अपनी ही धुन में मग्न रहता है।
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सद्गुरुदेव एक सत्य घटना सुनाते हैं। एक वृद्ध बाबा जो भाव-दशा में थे, शौच के लिए गए और वहीं बैठकर घंटों तक 'जागो वृषभानु नंदिनी' गाते रहे। वे भूल गए कि वे कहाँ हैं और समय क्या है। उनका शरीर शौचालय में था, पर चित्त वृंदावन में श्रीजी को जगा रहा था।
सद्गुरुदेव एक भाव-विभोर करने वाली सत्य घटना का वर्णन करते हैं। एक सिद्ध बाबा अपने शिष्य के घर गए। वे सुबह शौचालय गए और दोपहर तक वापस नहीं आए। जब चिंतित शिष्यों ने खोजा, तो देखा कि बाबा शौचालय में ही बैठे हैं, दरवाजा खुला है, और अश्रु बहाते हुए गा रहे हैं, 'जागो वृषभानु नंदिनी...' उन्हें इस बात का कोई भान नहीं था कि वे कहाँ हैं या कितना समय बीत गया है। उनका चित्त पूरी तरह से लीला में निमग्न था, भले ही शरीर अशुद्ध स्थान पर था।
🔗 यह कथा भाव-दशा में देह-बुद्धि के पूर्ण अभाव का एक चरम और शक्तिशाली उदाहरण है।
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भाव का लक्षण: क्षान्ति (सहिष्णुता)
क्षान्ति: विक्षेप के बीच अविचल चित्त
▶ देखें (43:40)
▶ Watch (43:40)
सद्गुरुदेव भाव दशा के पहले लक्षण 'क्षान्ति' का वर्णन करते हैं। इसका अर्थ है कि चित्त में विक्षेप के अनेकों कारण (जैसे घर में आग लगना या किसी प्रियजन की मृत्यु) उपस्थित होने पर भी भक्त का चित्त विचलित नहीं होता। वह जानता है कि यह जगत आगंतुक और अनित्य है।
सद्गुरुदेव भाव-भक्त के पहले गुण 'क्षान्ति' की व्याख्या करते हैं। यह साधारण सहनशीलता नहीं है, बल्कि चित्त की एक ऐसी अविचल अवस्था है जहाँ बड़े से बड़ा विक्षेप भी उसे प्रभावित नहीं कर पाता। यदि उसके घर में आग लग जाए या कोई प्रियजन मर जाए, तब भी उसका मन शांत रहता है। इसका कारण यह है कि वह जगत की अनित्यता और आत्मा की नित्यता के सत्य में पूरी तरह से स्थित हो चुका होता है।
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सद्गुरुदेव 'मानशून्यता' को समझाते हैं, जिसका अर्थ है मान-अपमान से परे हो जाना। इस अवस्था में कोई गाली दे या माला पहनाए, भक्त के चित्त पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। 'मैं वैष्णव हूँ', 'मैं त्यागी हूँ' - यह सब अभिमान भी नष्ट हो जाता है।
सद्गुरुदेव बताते हैं कि भाव-भक्त 'मानशून्यता' की स्थिति को प्राप्त कर लेता है। उसे न तो सम्मान से हर्ष होता है और न ही अपमान से कष्ट। कोई उसे लात मारे या उसकी स्तुति-वंदना करे, वह समभाव में रहता है। सद्गुरुदेव चेतावनी देते हैं कि 'मैं पंडित हूँ', 'मैं त्यागी हूँ', या 'मैं बड़ा भजनानंदी हूँ' - यह सब सूक्ष्म अहंकार है। जब तक सम्मान में आनंद और अपमान में दुःख होता है, तब तक समझना चाहिए कि जड़-अभिमान अभी भी प्रबल है।
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सद्गुरुदेव मान-अपमान के प्रसंग में द्रौपदी का उदाहरण देते हैं। भगवान ने अपनी परम भक्त द्रौपदी को भरी सभा में अपमानित होने दिया। वे कहते हैं कि भगवान कभी-कभी अपने भक्त के सम्मान-बोध की परीक्षा लेने के लिए उसे कठोर परिस्थितियों में डालते हैं, यह देखने के लिए कि वह कितना सम है।
सद्गुरुदेव अपने व्यक्तिगत अनुभव को द्रौपदी के प्रसंग से जोड़ते हैं। वे कहते हैं कि भगवान बड़े रसिक हैं और कभी-कभी भक्त के मान-अपमान के बोध को तोड़ने के लिए उसे कठिन परीक्षाओं में डालते हैं। जैसे उन्होंने अपनी प्रिय सखी और भक्त द्रौपदी को भरी सभा में विवस्त्र होने दिया, वैसे ही वे छोटे-मोटे अपमान की घटनाओं से देखते हैं कि भक्त सम्मान और अपमान में कितना सम है। यह भी उनकी कृपा ही है।
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सद्गुरुदेव मानशून्यता का एक और उदाहरण देते हैं। जब श्री कबीर दास जी की बहुत प्रसिद्धि हो गई, तो उन्होंने जानबूझकर एक पतिता स्त्री को अपने साथ रिक्शे में बिठाकर और हाथ में शराब जैसी बोतल लेकर पूरे शहर में घूमे, ताकि लोग उनकी निंदा करें और भीड़ कम हो जाए। वे स्वेच्छा से अपमान को स्वीकार करते थे।
सद्गुरुदेव मानशून्यता का एक अद्भुत उदाहरण श्री कबीर दास जी के जीवन से देते हैं। जब उनका सम्मान बहुत बढ़ गया और भीड़ उन्हें घेरने लगी, तो उन्होंने इस झमेले से बचने के लिए एक उपाय किया। उन्होंने एक पतिता स्त्री को पैसे देकर अपने साथ रिक्शे पर बिठाया और हाथ में लाल पानी की बोतल लेकर पूरे शहर का चक्कर लगाया। यह देखकर सबने उनकी निंदा की और उन्हें ढोंगी मानकर उनके पास आना बंद कर दिया। इस प्रकार उन्होंने जानबूझकर अपने सम्मान का त्याग किया।
🔗 यह कथा दिखाती है कि सच्चे संत मान-सम्मान को एक बंधन के रूप में देखते हैं और उससे मुक्त होने का प्रयास करते हैं।
प्रेम की परिणति: फल की प्राप्ति
सत्संग के इस अंतिम खंड में सद्गुरुदेव भक्ति की सर्वोच्च अवस्था 'प्रेम' का संकेत देते हैं। वे भाव-दशा के अन्य लक्षणों का संक्षिप्त वर्णन करते हुए बताते हैं कि कैसे यह अवस्था परिपक्व होकर अंततः प्रेम-फल में परिणत होती है, जो जीव का परम लक्ष्य है।
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सद्गुरुदेव भाव दशा के अन्य लक्षणों का उल्लेख करते हैं, जैसे 'आशा-बन्ध' (भगवान अवश्य कृपा करेंगे), 'समुत्कंठा' (मिलन की तीव्र लालसा), 'नाम-गाने सदा रुचि', 'भगवान के गुणों में आसक्ति' और 'भगवान के लीला-स्थलों में प्रीति'।
सद्गुरुदेव भाव-भक्त के हृदय की स्थिति का वर्णन करते हैं। उसमें 'आशा-बन्ध' होता है - यह दृढ़ विश्वास कि प्रभु आज नहीं तो कल अवश्य मिलेंगे। उसमें 'समुत्कण्ठा' होती है - मिलने की ऐसी तीव्र बेचैनी कि वह पागलों की तरह उन्हें ढूँढ़ता फिरता है। उसे निरंतर नाम-गान में रुचि होती है, भगवान के गुणों के वर्णन में आसक्ति होती है, और भगवान के निवास स्थलों (जैसे वृंदावन, भक्त-हृदय और हरि-कथा का स्थान) से गहरा प्रेम होता है।
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सद्गुरुदेव भक्ति की अवस्थाओं की तुलना एक फल के पकने की प्रक्रिया से करते हैं। 'रुचि' फूल है, 'आसक्ति' छोटा कच्चा फल है, 'भाव' पकने की प्रक्रिया में पीला होता फल है, और 'प्रेम' वह पूर्ण पका हुआ फल है जो पककर डाल से स्वतः ही अलग हो जाता है और संसार-चक्र से मुक्त कर देता है।
सद्गुरुदेव भक्ति की क्रमिक प्रगति को एक सुंदर दृष्टांत से समाप्त करते हैं। वे कहते हैं कि 'रुचि' की अवस्था पेड़ पर लगे फूल की तरह है। 'आसक्ति' की अवस्था में वह फूल एक छोटे से फल में बदल जाता है। 'भाव' की अवस्था में वह फल बड़ा होकर पकने लगता है, पीला होने लगता है। अंत में, 'प्रेम' की अवस्था वह है जब फल पूरी तरह से पक जाता है और डाली से टूटकर गिर जाता है। इसी प्रकार, प्रेम की अवस्था में भक्त संसार रूपी वृक्ष से सदा के लिए अलग होकर भगवान के नित्य सानिध्य को प्राप्त कर लेता है।
🔗 यह दृष्टांत भक्ति की पूरी यात्रा को एक सरल और सुंदर रूप में सारांशित करता है।
✨ विशेष उल्लेख
📋 भक्ति की प्रगति के चरण (Stages of Bhakti)
▶ 19:38
▶ देखें (19:38)
- श्रद्धा (Faith)
- साधु-संग (Association with Saints)
- भजन-क्रिया (Practice of Devotion)
- अनर्थ-निवृत्ति (Clearing of Obstacles)
- निष्ठा (Steadiness)
- रुचि (Taste)
- आसक्ति (Attachment)
- भाव (Spiritual Emotion)
- प्रेम (Pure Love of God)
📋 भाव-भक्ति दशा के नौ लक्षण
▶ 43:10
▶ देखें (43:10)
- क्षान्ति (सहिष्णुता)
- अव्यर्थकालत्वम् (समय का सदुपयोग)
- विरक्ति (विषयों से अनासक्ति)
- मानशून्यता (अभिमान रहित होना)
- आशाबन्ध (भगवत्कृपा की दृढ़ आशा)
- समुत्कण्ठा (तीव्र लालसा)
- नाम-गाने सदा रुचि (नाम-गान में रुचि)
- आसक्तिस्तद्गुणाख्याने (भगवान के गुणों में आसक्ति)
- प्रीतिस्तद्वसतिस्थले (भगवान के धाम में प्रीति)
✨ अहंकार के दो प्रकार
▶ 9:37
▶ देखें (9:37)
"सद्गुरुदेव ने अहंकार के दो रूपों का विश्लेषण किया: 'जड़-अभिमान' (मैं यह पंचभौतिक शरीर हूँ) जो बंधन का कारण है, और 'चिद-अभिमान' (मैं चिन्मय आत्मा, भगवान का दास हूँ) जो मुक्ति का साधन है।"
⛓️ जड़-अभिमान
यह 'मैं शरीर हूँ' की भावना है। यह बंधनकारी है, आत्मा को संसार चक्र में फँसाता है और आत्मा का शत्रु है।
बनाम
🕊️ चिद-अभिमान
यह 'मैं चिन्मय आत्मा, भगवान का दास हूँ' की भावना है। यह मुक्तिकारी है, आत्मा को भगवत्-सेवा में स्थापित करता है और आत्मा का मित्र है।
💡 सोऽहम् (ज्ञान मार्ग)
इसका अर्थ है 'मैं वही (ब्रह्म) हूँ'। यह निर्गुण, निराकार, नाम-रूप-लीला रहित सत्ता में विलीन होने का लक्ष्य रखता है।
बनाम
🌺 दासोऽहम् (भक्ति मार्ग)
इसका अर्थ है 'मैं (भगवान का) दास हूँ'। यह सगुण, साकार भगवान के नाम, रूप, गुण और लीला की सेवा प्राप्त करने का लक्ष्य रखता है।
जिज्ञासा (Q&A)
प्रश्न: जीव भगवान का अंश होते हुए भी संसार में दुःख क्यों भोग रहा है?
▶ देखें (1:00)
▶ देखें (1:00)
उत्तर: सद्गुरुदेव के अनुसार, इसका एकमात्र कारण 'स्वरूप विस्मृति' है। जीव यह भूल गया है कि वह सत-चित्-आनंदमय आत्मा है और उसने स्वयं को गलती से यह नश्वर शरीर मान लिया है।
उत्तर: सद्गुरुदेव विस्तार से बताते हैं कि जीव का भगवान से नित्य और अखंड संबंध है, फिर भी वह दुःखी है क्योंकि माया ने उसके वास्तविक स्वरूप को ढँक दिया है। इस विस्मृति के कारण वह स्वयं को जड़ शरीर मान लेता है और शरीर के धर्मों (जन्म, मृत्यु, दुःख) को अपना मानकर कष्ट पाता है। यह स्थिति एक स्वप्न की तरह है, जहाँ सब कुछ मिथ्या होते हुए भी जागने तक सत्य प्रतीत होता है।
प्रश्न: इस संसार चक्र से मुक्ति का उपाय क्या है?
▶ देखें (3:00)
▶ देखें (3:00)
उत्तर: सद्गुरुदेव के अनुसार, मुक्ति का उपाय 'जड़-अभिमान' (मैं शरीर हूँ) को त्यागकर गुरु कृपा से 'चिद-अभिमान' (मैं भगवान का नित्य दास हूँ) को जाग्रत करना है।
उत्तर: सद्गुरुदेव बताते हैं कि जैसे स्वप्न से जागने पर ही स्वप्न का दुःख मिटता है, वैसे ही अज्ञान-निद्रा से जागकर अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित होने पर ही संसार का दुःख मिटता है। इसका साधन है गुरु कृपा से अपने चिन्मय स्वरूप का बोध प्राप्त करना और निरंतर उसका चिंतन करना। गौड़ीय वैष्णव मत में यह चिंतन 'मैं श्री राधा रानी की सहचारी हूँ' के रूप में किया जाता है, जो जड़-अभिमान को समूल नष्ट कर देता है।
प्रश्न: अर्जुन ने भगवान से क्या प्रश्न किया था कि इच्छा न होते हुए भी मनुष्य पाप क्यों करता है?
▶ देखें (21:50)
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उत्तर: अर्जुन ने पूछा, 'हे कृष्ण! इच्छा न होते हुए भी, ऐसा लगता है जैसे कोई बलपूर्वक मनुष्य को पाप कर्म में लगा रहा है, वह शक्ति क्या है?'सद्गुरुदेव इस प्रश्न का उल्लेख करते हुए बताते हैं कि यह बलपूर्वक खींचने वाली शक्ति हमारे अनादि काल के संचित 'संस्कार' और 'काम' (वासना) ही हैं। ये रजोगुण से उत्पन्न होते हैं और हमारे भीतर शत्रु बनकर बैठे हैं। यही कारण है कि मन पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए और इनसे बचने के लिए निरंतर साधु-संग का आश्रय लेना चाहिए।
उत्तर: अर्जुन ने पूछा, 'हे कृष्ण! इच्छा न होते हुए भी, ऐसा लगता है जैसे कोई बलपूर्वक मनुष्य को पाप कर्म में लगा रहा है, वह शक्ति क्या है?'सद्गुरुदेव इस प्रश्न का उल्लेख करते हुए बताते हैं कि यह बलपूर्वक खींचने वाली शक्ति हमारे अनादि काल के संचित 'संस्कार' और 'काम' (वासना) ही हैं। ये रजोगुण से उत्पन्न होते हैं और हमारे भीतर शत्रु बनकर बैठे हैं। यही कारण है कि मन पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए और इनसे बचने के लिए निरंतर साधु-संग का आश्रय लेना चाहिए।
✅ करें (Do's)
- निरंतर अपने चिन्मय स्वरूप (चिद-अभिमान) का चिंतन करें।
- सत्संग और साधु-संग का आश्रय लें, विशेषकर जब मन विचलित हो।
- श्रद्धापूर्वक गुरु-उपदेशों का पालन करते हुए भजन-क्रिया में लगें।
- मान-अपमान, सुख-दुःख में सम रहने का अभ्यास करें।
- भगवान की कृपा पर दृढ़ विश्वास (आशा-बन्ध) रखें।
❌ न करें (Don'ts)
- स्वयं को यह पंचभौतिक शरीर (जड़-अभिमान) न मानें।
- अपने मन पर कभी भी पूरी तरह विश्वास न करें, क्योंकि पुराने संस्कार प्रबल होते हैं।
- विषयों के सानिध्य में अधिक न रहें, क्योंकि यह मन को खींच सकता है।
- सम्मान मिलने पर फूलें नहीं और अपमान होने पर दुःखी न हों।
- दुर्लभ मानव जीवन को व्यर्थ के सांसारिक कार्यों में न गँवाएँ।
शास्त्र प्रमाण (Scriptural References)
इस खंड में वे श्लोक व कथा-प्रसंग सम्मिलित हैं जो सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित किए गए हैं या सत्संग के भाव को समझने में सहायक संदर्भ के रूप में दिए गए हैं।
Mangalacharan वन्दना
Mangalacharan वन्दना
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव ने सत्संग का आरंभ इस पारंपरिक मंगलाचरण से किया, जो गौड़ीय वैष्णव परंपरा में गुरु, गौर, राधा, कृष्ण और उनके भक्तों के प्रति विनम्र प्रणाम निवेदित करता है।
गुरवे गौरचन्द्राय राधिकायै तदालये। कृष्णाय कृष्णभक्ताय तद्भक्ताय नमो नमः॥
gurave gauracandrāya rādhikāyai tadālaye। kṛṣṇāya kṛṣṇabhaktāya tadbhaktāya namo namaḥ॥
मैं श्री गुरुदेव को, श्री गौरचंद्र (चैतन्य महाप्रभु) को, श्रीमती राधिका जी और उनके धाम (वृंदावन) को, श्री कृष्ण को, कृष्ण के भक्तों को और उन भक्तों के भी भक्तों को बारंबार प्रणाम करता हूँ।
भगवद् गीता 6.5
Bhagavad Gita 6.5
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव इस श्लोक को उद्धृत करते हुए समझाते हैं कि जब हम 'जड़-अभिमान' (मैं शरीर हूँ) में स्थित होते हैं, तो हमारा मन ही हमारा शत्रु बनकर हमें संसार में गिराता है। जब हम 'चिद-अभिमान' में स्थित होते हैं, तो वही मन हमारा मित्र बनकर हमारा उद्धार करता है।
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
uddharedātmanātmānaṃ nātmānamavasādayet। ātmaiva hyātmano bandhurātmaiva ripurātmanaḥ॥
मनुष्य को चाहिए कि वह अपने द्वारा अपना उद्धार करे और अपना पतन न करे। क्योंकि यह आत्मा ही आत्मा का मित्र है और आत्मा ही आत्मा का शत्रु है।
भगवद् गीता 15.8
Bhagavad Gita 15.8
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव इस श्लोक के माध्यम से आत्मा के देहांतरण की प्रक्रिया को समझाते हैं। वे बताते हैं कि यदि चेतन सत्ता का जागरण नहीं हुआ, तो कर्म-संस्कारों से आवृत होकर जीव को बार-बार नया शरीर धारण करना पड़ता है।
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः। गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्॥
śarīraṃ yadavāpnoti yaccāpyutkrāmatīśvaraḥ। gṛhītvaitāni saṃyāti vāyurgandhānivāśayāt॥
जैसे वायु गंध के स्थान से गंध को ग्रहण करके ले जाती है, वैसे ही देहादि का स्वामी जीवात्मा भी जिस पुराने शरीर को त्यागता है, उससे मन सहित इन्द्रियों को ग्रहण करके फिर नये शरीर में चला जाता है जिसे वह प्राप्त करता है।
भगवद् गीता 3.36
Bhagavad Gita 3.36
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव इस श्लोक का उल्लेख यह समझाने के लिए करते हैं कि साधक के भीतर अनादि काल के संस्कार इतने प्रबल होते हैं कि वे कभी-कभी इच्छा न होने पर भी उसे विषय-भोग में खींच ले जाते हैं। इसका उत्तर भगवान ने काम और क्रोध को बताया है।
अर्जुन उवाच। अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः। अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः॥
arjuna uvāca। atha kena prayukto'yaṃ pāpaṃ carati pūruṣaḥ। anicchannapi vārṣṇeya balādiva niyojitaḥ॥
अर्जुन ने कहा - हे वार्ष्णेय (कृष्ण)! तो फिर यह मनुष्य स्वयं न चाहता हुआ भी, बलपूर्वक लगाए हुए की भाँति किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है?
श्रीमद् भागवतम् 11.20.17
Srimad Bhagavatam 11.20.17
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव इस श्लोक को उद्धृत कर मानव जीवन की महिमा और दुर्लभता पर प्रकाश डालते हैं। वे कहते हैं कि ऐसा अमूल्य अवसर पाकर जो भजन नहीं करता, वह आत्महत्या करने वाले के समान है।
नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारम्। मयानुकूलेन नभस्वतेरितं पुमान् भवाब्धिं न तरेत् स आत्महा॥
nṛ-deham ādyaṁ sulabhaṁ su-durlabhaṁ plavaṁ sukalpaṁ guru-karṇadhāram। mayānukūlena nabhasvateritaṁ pumān bhavābdhiṁ na taret sa ātma-hā॥
यह मनुष्य शरीर सभी योनियों में श्रेष्ठ, सुलभ होने पर भी अत्यंत दुर्लभ है। यह भवसागर को पार करने के लिए एक सुदृढ़ नौका के समान है, जिसमें गुरु ही केवट (नाविक) हैं और मेरी कृपा ही अनुकूल वायु है। जो मनुष्य ऐसे साधनों को पाकर भी भवसागर को पार करने का प्रयत्न नहीं करता, वह निश्चय ही अपनी आत्मा का हनन करने वाला है।
श्रीमद् भागवतम् 11.2.40
Srimad Bhagavatam 11.2.40
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव इस श्लोक के माध्यम से भाव-भक्ति की अवस्था में पहुँचे भक्त के दिव्योन्माद के लक्षणों का वर्णन करते हैं, जो बाहरी लोगों को पागलपन जैसा प्रतीत हो सकता है।
एवंव्रतः स्वप्रियनामकीर्त्या जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चैः। हसत्यथो रोदिति रौति गायत्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्यः॥
evaṁ-vrataḥ sva-priya-nāma-kīrtyā jātānurāgo druta-citta uccaiḥ। hasaty atho roditi rauti gāyaty unmāda-van nṛtyati loka-bāhyaḥ॥
इस प्रकार अपने प्रिय भगवान के नाम का कीर्तन करने का व्रत लेकर, भक्त का अनुराग बढ़ता है, उसका चित्त द्रवित हो जाता है और वह ज़ोर-ज़ोर से कभी हँसता है, कभी रोता है, कभी चिल्लाता है, कभी गाता है और कभी पागलों की तरह लोक-लाज की परवाह किए बिना नाचने लगता है।
भगवद् गीता 14.24
Bhagavad Gita 14.24
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव इस श्लोक का उल्लेख मान-अपमान में सम रहने वाले भक्त की स्थिति का वर्णन करने के लिए करते हैं, जो भाव-दशा का एक प्रमुख लक्षण 'मानशून्यता' है।
समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः। तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः॥
sama-duḥkha-sukhaḥ sva-sthaḥ sama-loṣṭāśma-kāñcanaḥ। tulya-priyāpriyo dhīras tulya-nindātma-saṁstutiḥ॥
जो धीर पुरुष दुःख और सुख में समान रहता है, जो अपने स्वरूप में स्थित है, जो मिट्टी के ढेले, पत्थर और सोने के टुकड़े को समान समझता है, जो प्रिय और अप्रिय में समान है, तथा जो अपनी निंदा और स्तुति में भी समान भाव रखता है (वह गुणातीत कहलाता है)।
Padma Purana उत्तराखण्ड ९२.२१
Padma Purana उत्तराखण्ड ९२.२१
पूरक संदर्भ (Siddhant)
पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव जब भगवान के निवास स्थलों की चर्चा कर रहे थे, तब उन्होंने इस सिद्धांत का उल्लेख किया कि जहाँ हरि-कथा और कीर्तन होता है, भगवान स्वयं वहाँ उपस्थित रहते हैं। यह भाव-भक्त की 'प्रीतिस्तद्वसतिस्थले' (भगवान के निवास स्थल में प्रीति) का एक महत्वपूर्ण अंग है।
नाहं वसामि वैकुण्ठे योगिनां हृदये न च। मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद॥
nāhaṃ vasāmi vaikuṇṭhe yogināṃ hṛdaye na ca। madbhaktā yatra gāyanti tatra tiṣṭhāmi nārada॥
हे नारद! मैं न तो वैकुण्ठ में निवास करता हूँ और न ही योगियों के हृदय में। मैं तो वहाँ निवास करता हूँ जहाँ मेरे भक्त मेरे नामों और लीलाओं का गान करते हैं।
भगवद् गीता 15.7
Bhagavad Gita 15.7
पूरक संदर्भ (Siddhant)
पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव बताते हैं कि जीव भगवान का सनातन अंश होते हुए भी मन और इंद्रियों के कारण प्रकृति में फँसकर संसार चक्र में दुख भोगता है।
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः। मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥
इस संसार में जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है। वह मन सहित छहों इन्द्रियों को प्रकृति में स्थित होकर आकर्षित करता है।
भगवद् गीता 3.27
Bhagavad Gita 3.27
पूरक संदर्भ (Siddhant)
पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि अहंकार ही जीव को शरीर से तादात्म्य कराकर 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा मानने पर विवश करता है, जबकि सभी कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा होते हैं।
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥
प्रकृति के गुणों द्वारा सभी कर्म किए जाते हैं, परन्तु अहंकार से मोहित आत्मा 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा मानती है।
Prem Bhakti Chandrika Verse
Prem Bhakti Chandrika Verse
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव राधा-रानी के युगल-विलास की स्मृति को साधना का प्राण केंद्र बताते हुए कहते हैं कि यही सबसे श्रेष्ठ साधन है।
साधन-स्वर्ण-प्राण मधुर-मधुर-धाम जुगल-विलास-स्मृति-सार। साध्य-साधन-तत्त्वे एइ विधि आर नाइ, एइ विधि सर्व-साध्य-सार॥
साधन-भक्ति का प्राण, मधुर-मधुर धाम में युगल-विलास की स्मृति का सार है। साध्य और साधन के तत्वों में यह विधि और कोई नहीं है, यही विधि सभी साध्यों का सार है।
भगवद् गीता 12.3-4
Bhagavad Gita 12.3-4
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव ज्ञान मार्ग का वर्णन करते हुए अव्यक्त, निराकार ब्रह्म की उपासना के लक्षणों को बताते हैं, जिसमें इन्द्रिय-संयम और सर्वत्र समबुद्धि प्रमुख हैं।
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते। सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्॥ सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः। ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः॥
जो लोग अनिर्देश्य, अव्यक्त, सर्वव्यापी, अचिन्त्य, कूटस्थ, अचल और ध्रुव अक्षर ब्रह्म की उपासना करते हैं, वे इन्द्रियों के समूह को भलीभाँति वश में करके, सब जगह समान बुद्धि वाले और सब भूतों के हित में रत होकर मुझको ही प्राप्त होते हैं।
भगवद् गीता 3.37
Bhagavad Gita 3.37
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हुए बताते हैं कि काम और क्रोध ही जीव के भीतर के सबसे बड़े शत्रु हैं, जो उसे बलपूर्वक पाप कर्मों में प्रवृत्त करते हैं।
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः। महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्॥
यह काम ही क्रोध है, जो रजोगुण से उत्पन्न होता है। यह महाभक्षी और महापापी है, तुम इसे ही इस संसार में अपना सबसे बड़ा शत्रु जानो।
रामचरितमानस Doha
Ramcharitmanas Doha
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव सत्संग के महत्व पर जोर देते हुए कहते हैं कि सत्संग के बिना हरि कथा और हरि कथा के बिना भगवान के प्रति दृढ़ अनुराग संभव नहीं है।
बिनु सत्संग न हरि कथा, तेहि बिनु मोह न भाग। मोह गएँ बिनु राम पद, होइ न दृढ़ अनुराग॥
सत्संग के बिना हरि कथा नहीं मिलती, उसके बिना मोह दूर नहीं होता। मोह दूर हुए बिना श्री राम के चरणों में दृढ़ प्रेम नहीं होता।
Bhakti-rasamrita-sindhu 1.4.15-16
Bhakti-rasamrita-sindhu 1.4.15-16
पूरक संदर्भ (Siddhant)
पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव भक्ति मार्ग में प्रगति के क्रमिक चरणों का वर्णन करते हैं, जो श्रद्धा से शुरू होकर प्रेम पर समाप्त होते हैं।
आदौ श्रद्धा ततः साधु-सङ्गोऽथ भजन-क्रिया। ततोऽनर्थ-निवृत्तिः स्यात् ततो निष्ठा रुचिः॥ अथासक्तिस् ततो भावस् ततः प्रेमाभ्युदञ्चति। साधकानाम् अयं प्रेमणः प्रादुर्भावे भवेत् क्रमः॥
पहले श्रद्धा, फिर साधु-संग, फिर भजन-क्रिया, उसके बाद अनर्थ-निवृत्ति होती है, फिर निष्ठा और रुचि उत्पन्न होती है। तत्पश्चात् आसक्ति, फिर भाव और अंत में प्रेम का उदय होता है। साधकों के लिए प्रेम के प्रादुर्भाव का यही क्रम है।
Bhakti-rasamrita-sindhu 1.1.11
Bhakti-rasamrita-sindhu 1.1.11
पूरक संदर्भ (Siddhant)
पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव श्रद्धा की परिभाषा देते हुए बताते हैं कि यह अन्य सभी इच्छाओं से रहित होकर भगवान की अनुकूल सेवा में चित्त की विशेष वृत्ति है।
अन्याभिलाषिता-शून्यं ज्ञान-कर्माद्य्-अनावृतम्। आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिर् उत्तमा॥
अन्य अभिलाषाओं से रहित, ज्ञान और कर्म आदि से अनावृत, अनुकूल भाव से श्रीकृष्ण का अनुशीलन ही उत्तमा भक्ति है।
Sri Shikshashtakam Verse 1
Sri Shikshashtakam Verse 1
पूरक संदर्भ (Siddhant)
पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव बताते हैं कि जब नाम, चिंतन और सत्संग में रुचि बढ़ती है, तो यह भव-रोग के नष्ट होने का लक्षण है, जो हृदय को शुद्ध करने और भौतिक दुखों की अग्नि को बुझाने के समान है।
चेतो-दर्पण-मार्जनं भव-महा-दावाग्नि-निर्वापणं। श्रेयः-कैरव-चन्द्रिका-वितरणं विद्या-वधू-जीवनम्॥ आनन्दाम्बुधि-वर्धनं प्रति-पदं पूर्णामृतास्वादनं। सर्वात्म-स्नपनं परं विजयते श्री-कृष्ण-संकीर्तनम्॥
श्री कृष्ण संकीर्तन की परम विजय हो, जो चित्त रूपी दर्पण को स्वच्छ करता है, भवसागर की महादावाग्नि को बुझाता है, कल्याण रूपी कुमुद को चाँदनी प्रदान करता है, विद्या रूपी वधू का जीवन है, आनंद के सागर को बढ़ाता है, प्रतिपल पूर्ण अमृत का आस्वादन कराता है, और सभी आत्माओं को स्नान कराता है।
Sri Shikshashtakam Verse 4
Sri Shikshashtakam Verse 4
पूरक संदर्भ (Siddhant)
पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव विरक्ति की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि यह देह और देह-संबंधी भोग्य पदार्थों के प्रति पूर्ण अनासक्ति है, जो भौतिक इच्छाओं से रहित होकर केवल भगवान की भक्ति की कामना के समान है।
न धनं न जनं न सुन्दरीं कवितां वा जगद्-ईश कामये। मम जन्मनि जन्मनीश्वरे भवताद् भक्तिर् अहैतुकी त्वयि॥
हे जगदीश्वर! मुझे न धन की, न अनुयायियों की, न सुंदर स्त्री की और न ही काव्य-रचना की इच्छा है। मेरी तो बस यही कामना है कि जन्म-जन्मांतर तक आप में मेरी अहैतुकी भक्ति बनी रहे।
Sri Shikshashtakam Verse 5
Sri Shikshashtakam Verse 5
पूरक संदर्भ (Siddhant)
पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव जीव की वर्तमान स्थिति का वर्णन करते हैं कि कैसे वह स्वरूप विस्मृति के कारण स्वयं को दुखमय संसार सागर में डूबा हुआ अनुभव करता है, जैसे भवसागर में गिरा हुआ दास।
अयि नन्द-तनुज किङ्करं पतितं मां विषमे भवाम्बुधौ। कृपया तव पाद-पङ्कज-स्थित-धूलि-सदृशं विचिन्तय॥
हे नंदनंदन! मैं आपका दास हूँ, जो इस विषम भवसागर में गिर गया हूँ। कृपा करके मुझे अपने चरण-कमलों की धूल के समान समझें।
Sri Shikshashtakam Verse 6
Sri Shikshashtakam Verse 6
पूरक संदर्भ (Siddhant)
पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव एक भक्त की भावदशा का वर्णन करते हैं, जहाँ वह राधा रानी को जगाते हुए अश्रुधारा बहा रहा है, जो नाम-संकीर्तन में होने वाले प्रेम के लक्षणों में से एक है।
नयनं गलद्-अश्रु-धारया वदनं गद्गद-रुद्धया गिरा। पुलकैर् निचितं वपुः कदा तव नाम-ग्रहणे भविष्यति॥
हे प्रभु! आपका नाम जपते हुए मेरी आँखें कब अश्रुधारा से भर जाएँगी, मेरा कंठ कब गद्गद हो जाएगा और मेरा शरीर कब रोमांच से भर जाएगा?
स्पष्टीकरण (Clarification)
यह सारांश AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग गुरु सेवा में करके तैयार किया गया है। इसमें त्रुटि हो सकती है। कृपया पूर्ण लाभ के लिए पूरा वीडियो अवश्य देखें।
स्वरूप विस्मृति से स्वरूप जागरण तक, अहंकार का त्याग, चिद-अभिमान का उदय और भाव-भक्ति की प्राप्ति
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