[Study Guide Draft : Jan 31, 2026]

0
Thumbnail
श्री भगवत चर्चा
01 February 2026

श्री गौर-निताई लीला अमृत

श्री गौर-निताई लीला अमृत

Sri Sri 108 Sri Vinod Baba ji Maharaj
पूरा सत्संग देखें
पढ़ने का तरीका चुनें:
संक्षेप विस्तार
Quote Decor
हमारे प्रिय सद्गुरुदेव बताते हैं:
" संत सेवा से भगवान बहुत अधिक प्रसन्न होते हैं। भगवत सेवा से, विग्रह सेवा छप्पन भोग लगा कर के आप ठाकुर जी को प्रसन्न नहीं कर सकते हैं, जितना कि एक संत को सेवा करके उनकी प्रसन्नता संपादन कर सकते हैं। "

" कलियुग में हरि नाम, हरि नाम, हरि नाम छोड़ के और कोई गति नहीं, गति नहीं, गति नहीं। "


नित्यानंद प्रभु (35)महाप्रभु (30)लीला (25)जगाई-माधाई (10)संत सेवा (12)हरिनाम (8)अभिराम ठाकुर (7)गृहस्थ आश्रम (5)
🔍 सत्संग सार (Executive Summary)

यह सत्संग श्री नित्यानंद प्रभु के सम्पूर्ण जीवन-चरित्र का एक गहन अध्ययन है। सद्गुरुदेव उनके बाल्यकाल की दिव्य लीलाओं से प्रारम्भ करते हुए, एक सन्यासी द्वारा उन्हें भिक्षा में मांगे जाने और उनकी तीर्थ यात्रा का वर्णन करते हैं। इसके पश्चात, श्री गौर-निताई के नवद्वीप में हुए प्रथम अलौकिक मिलन, हरिनाम संकीर्तन के प्रचार और पतित-पावन जगाई-माधाई के उद्धार की हृदयस्पर्शी कथा का विस्तार से वर्णन किया गया है। सत्संग का उत्तरार्ध श्री महाप्रभु के आदेश पर श्री नित्यानंद प्रभु द्वारा गृहस्थ आश्रम स्वीकार करने, उनके विवाह और धर्म-रक्षा हेतु वंश-विस्तार की लीला पर केंद्रित है। अंत में, श्री अभिराम ठाकुर जैसे दिव्य पार्षदों की अद्भुत लीलाओं और श्री नित्यानंद प्रभु के तिरोभाव का मार्मिक वर्णन है।

🧱 ज्ञान प्रवाह
graph TD subgraph Phase1 [बाल्यकाल एवं प्रस्थान] A["🎭 बालक कुबेर (नित्यानंद) की लीला"] --> B["🧠 अद्भुत आध्यात्मिक ज्ञान का प्रदर्शन"]; B --> C["🚶‍♂️ एक दिव्य सन्यासी का आगमन"]; C --> D["🙏 संत सेवा का माहात्म्य"]; D --> E["🎁 सन्यासी द्वारा कुबेर को भिक्षा में मांगना"]; E --> F["🌍 तीर्थ यात्रा हेतु प्रस्थान"]; end subgraph Phase2 [गौर-निताई मिलन] G["🌳 वृन्दावन में पूर्व-स्मृति जागरण"] --> H["🌟 नवद्वीप में महाप्रभु का आत्म-प्रकाश"]; H --> I["💭 महाप्रभु का दिव्य स्वप्न"]; I --> J["🤫 नंदन आचार्य के घर नित्यानंद प्रभु का गुप्त वास"]; J --> K["🤝 श्री गौर-निताई का प्रथम अलौकिक मिलन"]; end subgraph Phase3 [पतित-पावन लीला] L["📢 हरिनाम संकीर्तन का आदेश"] --> M["👺 जगाई-माधाई का अत्याचार"]; M --> N["🩸 नित्यानंद प्रभु पर प्रहार"]; N --> O["💖 नित्यानंद प्रभु की करुणा और क्षमा"]; O --> P["🙌 जगाई-माधाई का सम्पूर्ण उद्धार"]; end subgraph Phase4 [गृहस्थ आश्रम] Q["🪔 महाप्रभु का सन्यास ग्रहण"] --> R["📜 नित्यानंद प्रभु को गृहस्थ बनने का आदेश"]; R --> S["💍 सूर्यदास पंडित की कन्याओं से विवाह की कथा"]; S --> T["🏡 खरदा में निवास एवं प्रचार"]; end subgraph Phase5 [दिव्य पार्षद एवं तिरोभाव] U["💪 श्री अभिराम ठाकुर (श्रीदाम सखा) की लीला"] --> V["👶 श्री वीरचंद्र प्रभु का प्राकट्य"]; V --> W["🙏 अभिराम ठाकुर द्वारा परीक्षा"]; W --> X["✨ श्री नित्यानंद प्रभु की तिरोभाव लीला"]; end A --> G; K --> L; P --> Q; T --> U;
graph TD subgraph Phase1 [बाल्यकाल एवं प्रस्थान] A["🎭 बालक कुबेर (नित्यानंद) की लीला"] --> B["🧠 अद्भुत आध्यात्मिक ज्ञान का प्रदर्शन"]; B --> C["🚶‍♂️ एक दिव्य सन्यासी का आगमन"]; C --> D["🙏 संत सेवा का माहात्म्य"]; D --> E["🎁 सन्यासी द्वारा कुबेर को भिक्षा में मांगना"]; E --> F["🌍 तीर्थ यात्रा हेतु प्रस्थान"]; end subgraph Phase2 [गौर-निताई मिलन] G["🌳 वृन्दावन में पूर्व-स्मृति जागरण"] --> H["🌟 नवद्वीप में महाप्रभु का आत्म-प्रकाश"]; H --> I["💭 महाप्रभु का दिव्य स्वप्न"]; I --> J["🤫 नंदन आचार्य के घर नित्यानंद प्रभु का गुप्त वास"]; J --> K["🤝 श्री गौर-निताई का प्रथम अलौकिक मिलन"]; end subgraph Phase3 [पतित-पावन लीला] L["📢 हरिनाम संकीर्तन का आदेश"] --> M["👺 जगाई-माधाई का अत्याचार"]; M --> N["🩸 नित्यानंद प्रभु पर प्रहार"]; N --> O["💖 नित्यानंद प्रभु की करुणा और क्षमा"]; O --> P["🙌 जगाई-माधाई का सम्पूर्ण उद्धार"]; end subgraph Phase4 [गृहस्थ आश्रम] Q["🪔 महाप्रभु का सन्यास ग्रहण"] --> R["📜 नित्यानंद प्रभु को गृहस्थ बनने का आदेश"]; R --> S["💍 सूर्यदास पंडित की कन्याओं से विवाह की कथा"]; S --> T["🏡 खरदा में निवास एवं प्रचार"]; end subgraph Phase5 [दिव्य पार्षद एवं तिरोभाव] U["💪 श्री अभिराम ठाकुर (श्रीदाम सखा) की लीला"] --> V["👶 श्री वीरचंद्र प्रभु का प्राकट्य"]; V --> W["🙏 अभिराम ठाकुर द्वारा परीक्षा"]; W --> X["✨ श्री नित्यानंद प्रभु की तिरोभाव लीला"]; end A --> G; K --> L; P --> Q; T --> U;

📖 आज की शिक्षाएं 📖 आज की विस्तृत शिक्षाएं

प्रारंभिक लीला: बालक कुबेर का दिव्य चरित्र एवं प्रस्थान
श्री नित्यानंद प्रभु के बाल्यकाल की अलौकिक घटनाओं, उनके जन्मजात ज्ञान और एक सन्यासी के साथ तीर्थ यात्रा पर जाने के प्रसंग को समझना।
🎭
बालक कुबेर की अद्भुत लीलाएं
बालक कुबेर (श्री नित्यानंद) की नित्य नवीन राम-कृष्ण लीलाएं
▶ देखें (0:01) ▶ Watch (0:01)
सद्गुरुदेव श्री नित्यानंद प्रभु के बाल्यकाल का वर्णन करते हुए बताते हैं कि उनका बचपन का नाम कुबेर था। वे बचपन से ही अपने साथियों के साथ नित्य नवीन कृष्ण लीला और राम लीला का अभिनय करते थे। लक्ष्मण की मूर्छा जैसे प्रसंगों में वे इतने तन्मय हो जाते थे कि वे सचमुच अचेत हो जाते थे, जिससे उनके माता-पिता, हराई पंडित और पद्मा देवी, अत्यंत चिंतित हो जाते थे। यह उनकी लीला का एक अंग था, जिससे ग्रामवासी भी चकित और आनंदित होते थे। उनकी वाणी में ऐसा माधुर्य और ज्ञान था कि वे बाल्यकाल में ही गूढ़ तात्विक सिद्धांतों का सहजता से विवेचन कर देते थे, जिससे बड़े-बड़े पंडित भी आश्चर्यचकित रह जाते थे।
🔗 यह प्रसंग श्री नित्यानंद प्रभु के दिव्य, अहैतुकी और जन्मजात भगवदीय स्वरूप को स्थापित करता है, जो साधारण बालक न होकर स्वयं लीला-पुरुष थे।
📌 बाल्यकाल की विशेषताएं:
  • बचपन का नाम: कुबेर
  • माता-पिता: हराई पंडित एवं पद्मा देवी
  • लीला अभिनय: राम लीला (लक्ष्मण मूर्छा) एवं कृष्ण लीला में पूर्ण तन्मयता।
  • वाणी: बाल्यकाल में ही गूढ़ तात्विक सिद्धांतों का सहज विवेचन।
  • प्रभाव: ग्रामवासियों के प्राण-स्वरूप और आनंद के केंद्र थे।
🙏
संत सेवा का माहात्म्य
भगवत् प्रेमी का लक्षण: संत के प्रति अनन्य प्रेम
▶ देखें (3:33) ▶ Watch (3:33)
सद्गुरुदेव एक दिव्य सन्यासी के आगमन का प्रसंग सुनाते हैं, जिनकी सेवा हराई पंडित और पद्मा देवी ने बड़े प्रेम से की। इस माध्यम से सद्गुरुदेव समझाते हैं कि जो सच्चा भगवत् प्रेमी होता है, वह अनिवार्य रूप से संत प्रेमी भी होता है। भगवान में प्रेम और संतों में प्रेम का अभाव, यह ढोंग मात्र है। जैसे किसी प्रियजन के संबंधियों से भी स्वतः प्रेम हो जाता है, वैसे ही भगवान के प्रिय भक्त (संतों) से प्रेम होना स्वाभाविक है। वास्तव में, भगवान अपनी सेवा से उतने प्रसन्न नहीं होते, जितने अपने भक्त की सेवा से होते हैं। संत सेवा ही भगवान को प्रसन्न करने का परम उपाय है। सद्गुरुदेव इस सिद्धांत की पुष्टि हेतु निम्नलिखित प्रमाण प्रस्तुत करते हैं:
🔗 यह खंड भक्ति मार्ग के एक गूढ़ सिद्धांत को स्थापित करता है कि ईश्वर तक पहुँचने का राजमार्ग उनके भक्तों की सेवा से होकर जाता है।
⚖️ भगवत् सेवा बनाम संत सेवा
भगवत् सेवा (विग्रह पूजा): भगवान आत्मकाम, पूर्णकाम हैं। उन्हें किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं। जगत की समस्त वस्तुएं उन्हीं की हैं, अतः हम उन्हें क्या दे सकते हैं?
संत सेवा: भगवान की एक ही दुर्बलता है - वे भक्त के अधीन हैं। अतः उनके भक्त (संत) की सेवा करने से वे सर्वाधिक प्रसन्न होते हैं।
🎁
सन्यासी की भिक्षा: बालक कुबेर का दान
सन्यासी द्वारा भिक्षा में बालक कुबेर को मांगना और माता-पिता का त्याग
▶ देखें (10:55) ▶ Watch (10:55)
सद्गुरुदेव कथा को आगे बढ़ाते हुए बताते हैं कि जब सन्यासी विदा लेने लगे, तो हराई पंडित ने उनसे कुछ भेंट मांगने का आग्रह किया। सन्यासी ने वचन लेकर उनके एकमात्र पुत्र कुबेर को ही मांग लिया, ताकि वे उसे अपने साथ तीर्थ यात्रा पर ले जा सकें और एक उत्तम संत बना सकें। यह सुनकर माता-पिता पर वज्रपात हो गया, क्योंकि कुबेर ही उनके जीवन का आधार थे। वचनबद्ध होने के कारण, उन्होंने अत्यंत दुःख और फटे हुए हृदय से, बनावटी मुस्कान के साथ अपने प्राणप्रिय पुत्र को सन्यासी को सौंप दिया। बालक कुबेर भी तीर्थाटन और संत-दर्शन की इच्छा से जाने के लिए सहज ही तैयार हो गए।
🔗 यह प्रसंग धर्म और वचन के पालन के लिए सर्वोच्च त्याग का एक मार्मिक उदाहरण प्रस्तुत करता है, जो श्री नित्यानंद प्रभु की लीला का एक महत्वपूर्ण मोड़ था।
📌 दान की शर्त:
  • सन्यासी ने कहा: "हमको चाहिए नहीं आपका पुत्र आप रख लीजिए। दुखी होकर जो वस्तु देते हैं वह दान में कोई मायने नहीं रखता है।"
  • आवश्यकता: दान प्रसन्नतापूर्वक और हास्य मुख से देना होगा।
🏞️
सामाजिक कटाक्ष: तीर्थों का बदलता स्वरूप
सामाजिक कटाक्ष: तीर्थों का आधुनिकीकरण और भक्ति-भाव का क्षरण
▶ देखें (13:37) ▶ Watch (13:37)
श्री कुबेर की तीर्थ यात्रा के प्रसंग में, सद्गुरुदेव आधुनिक समय में तीर्थों की दुर्दशा पर टिप्पणी करते हैं। वे बताते हैं कि पहले के समय में तीर्थ यात्रा का बड़ा महात्म्य था, जहाँ भक्त वर्षों तक पैदल यात्रा करते थे। किन्तु अब, कामवन और हरिद्वार जैसे पवित्र स्थान भी शहरों में बदल गए हैं। वे अपने 50 वर्ष पूर्व के हरिद्वार के अनुभव को याद करते हैं, जब वह स्थान शांत और जंगलमय था, और आज के 'वाशिंगटन' जैसे स्वरूप से उसकी तुलना करते हैं। सद्गुरुदेव चिंता व्यक्त करते हैं कि आधुनिकता, बड़े-बड़े मकान, गाड़ियाँ और पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव ने तीर्थों के भक्तिमय वातावरण को नष्ट कर दिया है, जिससे सच्चे भक्त का मन खिन्न हो जाता है।
🔗 यह सामाजिक टिप्पणी दिखाती है कि बाहरी विकास और आंतरिक आध्यात्मिक पतन कैसे साथ-साथ चल सकते हैं, और यह भक्तों के लिए एक चेतावनी है कि वे तीर्थों के वास्तविक स्वरूप को खोजें।
⚖️ तीर्थ यात्रा: पहले बनाम अब
पहले: वानप्रस्थ आश्रम में वर्षों की यात्रा, लौटने की अनिश्चितता, तीर्थयात्री का पवित्र मानकर सम्मान, भक्तिमय वातावरण।
अब: तीर्थों का शहरीकरण, पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव, भक्ति-भाव का अभाव, पर्यटन स्थल के रूप में परिवर्तन।
दिव्य मिलन: श्री गौर-निताई का नवद्वीप में समागम
श्री नित्यानंद प्रभु के वृन्दावन आगमन, श्री चैतन्य महाप्रभु के आत्म-प्रकाश और दोनों भाइयों के अलौकिक प्रथम मिलन की लीला को समझना।
🌳
वृन्दावन में पूर्व-स्मृति जागरण
तीर्थ यात्रा का समापन और वृन्दावन में बलराम-भाव का प्राकट्य
▶ देखें (17:58) ▶ Watch (17:58)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि बालक कुबेर ने सन्यासी (जिनके विषय में मतभेद है कि वे श्री ईश्वर पुरी थे या श्री माधवेन्द्र पुरी) के साथ सम्पूर्ण भारत की तीर्थ यात्रा की। यात्रा के उपरांत गुरुदेव ने उन्हें दीक्षा देकर समस्त शक्ति संचारित की और फिर अंतर्धान हो गए। इसके पश्चात, श्री नित्यानंद प्रभु वृन्दावन पहुँचे। वृन्दावन की भूमि पर आते ही उन्हें अपनी पूर्व-स्मृति जाग्रत हो गई और वे जान गए कि वे साक्षात बलराम हैं और कलयुग में लीला करने हेतु आए हैं। उन्होंने ध्यान द्वारा जाना कि उनके भैया कन्हैया (श्री कृष्ण) अब श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में अवतीर्ण होने वाले हैं, और वे उनकी लीला में सहयोग करने के लिए सही समय की प्रतीक्षा करने लगे। वे वृन्दावन में ग्वाल-बाल के वेश में (नील वसन, शींगा धारण कर) रहने लगे।
🔗 यह प्रसंग श्री नित्यानंद प्रभु की लीला के अगले चरण की भूमिका है, जहाँ वे अपने मूल स्वरूप को जानकर अपने स्वामी श्री गौरसुंदर के प्राकट्य की प्रतीक्षा करते हैं।
📌 सन्यासी गुरु की पहचान पर मत:
  • कुछ मतों के अनुसार: श्री ईश्वर पुरी (महाप्रभु के गुरु)
  • अन्य मतों के अनुसार: श्री माधवेन्द्र पुरी
📌 वृन्दावन में वेश:
  • सन्यासी वेश का त्याग
  • नील वसन धारण
  • हाथ में शींगा (जैसे ग्वाल-बाल)
🌟
महाप्रभु का आत्म-प्रकाश
श्री चैतन्य महाप्रभु का गया-गमन और भक्तों के समक्ष स्वरूप-प्रदर्शन
▶ देखें (20:24) ▶ Watch (20:24)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि इसी बीच श्री चैतन्य महाप्रभु ने गया में श्री ईश्वर पुरी से दीक्षा प्राप्त की और उनमें दिव्य प्रेम का प्रकटन हुआ। उनके अलौकिक प्रेम-विकार को देखकर सब समझ गए कि वे कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं। एक दिन उन्होंने श्रीवास पंडित के घर पर अपना चतुर्भुज नारायण रूप प्रकट कर आत्म-प्रकाश किया। इसके बाद उन्होंने एक-एक करके अपने सभी पार्षदों को बुलाया और उनके भाव के अनुरूप अपना स्वरूप दिखाया। जैसे राम-उपासक श्री मुरारी गुप्त को उन्होंने सम्पूर्ण राम-दरबार का दर्शन कराया। यह महाप्रभु की अद्भुत लीला थी कि वे भक्तों को अपना भगवत्-स्वरूप दिखाते थे, किन्तु सामान्य अवस्था में अत्यंत विनम्रतापूर्वक स्वयं को एक साधारण जीव बताते थे और किसी को भी उन्हें भगवान कहने से रोकते थे।
🔗 यह खंड महाप्रभु के 'अचिंत्य भेदाभेद' तत्व को लीला के माध्यम से दर्शाता है, जहाँ वे एक ही समय में परमेश्वर और परम भक्त, दोनों रूपों में प्रकट होते हैं।
⚖️ महाप्रभु की भाव दशा
ऐश्वर्य भाव में: भक्तों को बुला-बुलाकर अपना चतुर्भुज रूप, राम-दरबार आदि दिखाकर अपने ईश्वरत्व का प्रमाण देना।
माधुर्य/विनम्र भाव में: स्वयं को साधारण जीव बताना, भगवान कहे जाने पर कान बंद करना और अपराध मानने का उपदेश देना।
📌 लीला की प्रामाणिकता:
  • सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि यह लीलाएं काल्पनिक नहीं हैं।
  • इनका प्रमाण श्री मुरारी गुप्त द्वारा लिखित 'कड़चा' और श्री कृष्णदास कविराज गोस्वामी कृत 'श्री चैतन्य चरितामृत' जैसे प्रामाणिक ग्रंथों में मिलता है।
🤝
श्री गौर-निताई का प्रथम मिलन
दिव्य स्वप्न और नंदन आचार्य के घर पर दो भाइयों का अलौकिक मिलन
▶ देखें (26:26) ▶ Watch (26:26)
सद्गुरुदेव वर्णन करते हैं कि एक दिन महाप्रभु ने अपने भक्तों को एक स्वप्न के बारे में बताया, जिसमें उन्होंने एक तालध्वज रथ और एक दिव्य पुरुष को देखा। उन्होंने भक्तों को उस महापुरुष को खोजने भेजा। इसी बीच, श्री नित्यानंद प्रभु नवद्वीप पहुँचकर नंदन आचार्य के घर इस शर्त पर गुप्त रूप से निवास कर रहे थे कि कोई उनके आगमन के बारे में न जाने। जब भक्त उन्हें कहीं नहीं खोज पाए, तो महाप्रभु स्वयं उन्हें खोजने निकले। नंदन आचार्य के घर पहुँचकर जब महाप्रभु ने पूछा, तो वे दुविधा में पड़ गए क्योंकि उन्होंने नित्यानंद प्रभु को वचन दिया था। महाप्रभु उनकी स्थिति समझकर स्वयं ऊपर गए और वहाँ दोनों भाइयों का (श्री कृष्ण और श्री बलराम का) युगांतरों के बाद प्रथम मिलन हुआ। दोनों एक-दूसरे को अपलक निहारते रहे, और फिर श्री नित्यानंद प्रभु भाव में अचेत होकर गिर पड़े, जिन्हें महाप्रभु ने अपनी गोद में धारण किया।
🔗 यह सत्संग का चरमोत्कर्ष है, जहाँ दो महा-प्रकाशों का मिलन होता है, जो कलियुग में हरिनाम संकीर्तन आंदोलन की शुरुआत का प्रतीक है।
📌 मिलन का क्रम:
  • महाप्रभु का स्वप्न देखना और भक्तों को भेजना।
  • नित्यानंद प्रभु का नंदन आचार्य के घर गुप्त वास।
  • भक्तों का असफल होना और महाप्रभु का स्वयं जाना।
  • नंदन आचार्य की दुविधा।
  • दोनों भाइयों का अपलक दृष्टि से एक दूसरे को देखना।
  • नित्यानंद प्रभु का भाव में अचेत होना।
पतित-पावन लीला: हरिनाम का प्रचार और उद्धार
श्री गौर-निताई द्वारा हरिनाम संकीर्तन के प्रचार के आदेश और जगाई-माधाई जैसे अत्यंत पतित जीवों के उद्धार की करुणापूर्ण लीला को समझना।
📢
हरिनाम संकीर्तन का आदेश
घर-घर में हरिनाम प्रचार का आदेश और कलियुग का एकमात्र उपाय
▶ देखें (37:56) ▶ Watch (37:56)
श्री नित्यानंद प्रभु से मिलन के पश्चात, श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने सभी भक्तों को घर-घर जाकर हरिनाम का प्रचार करने का आदेश दिया। उन्होंने विभिन्न मंडलियां बनाईं, जिनमें श्री नित्यानंद प्रभु और श्री हरिदास ठाकुर की मंडली प्रमुख थी। महाप्रभु ने स्पष्ट निर्देश दिया कि कलियुग में जीवों के उद्धार का हरिनाम के अतिरिक्त कोई दूसरा उपाय नहीं है। उन्होंने 'हरे कृष्ण महामंत्र' को कलियुग का तारक मंत्र बताया, जिसमें राधा-कृष्ण की युगल प्रेम-प्रदायिनी शक्ति निहित है। श्री नित्यानंद प्रभु अपनी विशेष शैली में 'भजो गौरांग, कहो गौरांग, लहो गौरांगर नाम रे' गाते हुए प्रचार करते थे, और उनकी शक्ति से बड़े-बड़े पाखंडी भी कृष्ण प्रेम में रोने लगते थे। सद्गुरुदेव इस संदर्भ में कलियुग के धर्म का सार बताते हैं:
🔗 यह खंड संकीर्तन आंदोलन के व्यावहारिक पक्ष को दर्शाता है, जहाँ सिद्धांत को क्रिया में बदला जा रहा है और भगवत् प्रेम को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य प्रारम्भ हो रहा है।
कलियुग में नाम ही एकमात्र गति— Brihan-naradiya Purana 38.126
▶ 38:06
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्। कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा॥
harernāma harernāma harernāmaiva kevalam | kalau nāstyeva nāstyeva nāstyeva gatiranyathā ||
कलियुग में हरि का नाम, हरि का नाम, केवल हरि का नाम ही (उद्धार का उपाय) है। इसके अतिरिक्त और कोई गति नहीं है, नहीं है, नहीं है।
✅ करें:
  • जिसको देखो, उसी को हरिनाम करने को कहो।
📌 प्रचार की प्रमुख मंडलियां:
  • श्री अद्वैत प्रभु की मंडली
  • श्री नित्यानंद प्रभु एवं श्री हरिदास ठाकुर की मंडली
💖
जगाई-माधाई का उद्धार
अहैतुकी करुणा की पराकाष्ठा: जगाई और माधाई का उद्धार
▶ देखें (40:57) ▶ Watch (40:57)
सद्गुरुदेव पतित-पावन लीला का सबसे प्रसिद्ध आख्यान सुनाते हैं। जगाई और माधाई दो ब्राह्मण पुत्र थे, जो अत्यंत दुष्ट, मदिरा पीने वाले और हर प्रकार के कुकर्म में लिप्त थे। जब श्री नित्यानंद प्रभु और श्री हरिदास ठाकुर उन्हें हरिनाम करने को कहते हैं, तो वे उन्हें मारने दौड़ते हैं। दूसरी बार, माधाई मदिरा की हाँडी से श्री नित्यानंद प्रभु के मस्तक पर प्रहार कर देता है, जिससे रक्त बहने लगता है। इस पर भी, नित्यानंद प्रभु क्रोधित होने के बजाय माधाई से क्षमा याचना करते हैं कि उसके कारण उसे कष्ट हुआ। जब महाप्रभु सुदर्शन चक्र का आह्वान करते हैं, तो नित्यानंद प्रभु उनके चरण पकड़कर उन पापियों के लिए क्षमा मांगते हैं। जगाई द्वारा भाई को रोकने के कारण महाप्रभु पहले उसे कृपा प्रदान करते हैं, और फिर नित्यानंद प्रभु की प्रार्थना पर माधाई को भी अपनाते हैं। महाप्रभु उनके जन्म-जन्मांतर के पापों को स्वयं पर ले लेते हैं और उन्हें परम भक्त बना देते हैं। सद्गुरुदेव इस उद्धार के पीछे के सिद्धांत को श्रीमद्भगवद्गीता के माध्यम से स्पष्ट करते हैं:
🔗 यह लीला श्री गौर-नित्यानंद के 'पतित-पावन' अवतार के उद्देश्य को चरितार्थ करती है, जो यह दर्शाती है कि उनकी कृपा किसी योग्यता पर निर्भर नहीं करती, बल्कि अयोग्य और पापियों पर ही विशेष रूप से बरसती है।
भगवान की प्रतिज्ञा: दुराचारी का भी उद्धार— भगवद् गीता 9.30
▶ 46:11
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्। साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥
api cetsudurācāro bhajate māmananyabhāk | sādhureva sa mantavyaḥ samyagvyavasito hi saḥ ||
यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभावसे मेरा भक्त होकर मुझे भजता है तो उसे साधु ही मानना चाहिये; क्योंकि वह यथार्थ निश्चयवाला है।
📌 उद्धार का क्रम:
  • माधाई द्वारा नित्यानंद प्रभु पर प्रहार।
  • नित्यानंद प्रभु द्वारा क्षमा और करुणा का प्रदर्शन।
  • महाप्रभु का क्रोध और चक्र का आह्वान।
  • जगाई द्वारा माधाई को रोकने पर उसे पहले कृपा मिलना।
  • नित्यानंद प्रभु की प्रार्थना पर माधाई का भी उद्धार।
गृहस्थ लीला: धर्म-रक्षा का दिव्य विधान
श्री महाप्रभु के सन्यास ग्रहण और उनके द्वारा श्री नित्यानंद प्रभु को धर्म-रक्षा एवं वंश-विस्तार हेतु गृहस्थ आश्रम स्वीकार करने के आदेश की लीला को समझना।
📜
गृहस्थ आश्रम का आदेश
महाप्रभु का सन्यास और नित्यानंद प्रभु को गृहस्थ बनने का आदेश
▶ देखें (51:23) ▶ Watch (51:23)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि जगाई-माधाई के उद्धार के बाद, महाप्रभु ने सन्यास लेने का निर्णय किया। उन्होंने केशव भारती से सन्यास दीक्षा ली और अपनी माता शची देवी की आज्ञा से नीलाचल (जगन्नाथ पुरी) में निवास करने चले गए। वहाँ से उन्होंने धर्म प्रचार किया। कुछ वर्षों बाद, महाप्रभु ने भविष्य में प्रेम-धर्म की रक्षा के लिए एक योग्य अधिकारी की आवश्यकता महसूस की। उन्होंने श्री नित्यानंद प्रभु को एकांत में बुलाकर उनसे गृहस्थ आश्रम स्वीकार करने की भिक्षा मांगी, ताकि उनके द्वारा जो वंश उत्पन्न हो, वह इस धर्म की ध्वजा को आगे बढ़ा सके। नित्यानंद प्रभु यह सुनकर बहुत दुखी हुए और रोने लगे कि आप तो सन्यास लेकर मुक्त होकर आनंद करेंगे और मुझे संसार में फंसा रहे हैं। किन्तु महाप्रभु के विशेष आग्रह और धर्म-रक्षा के महान उद्देश्य को समझकर उन्होंने यह कठिन आज्ञा स्वीकार कर ली।
🔗 यह प्रसंग दर्शाता है कि वैष्णव धर्म में आश्रम (गृहस्थ या सन्यास) व्यक्तिगत मुक्ति से अधिक भगवान की सेवा और उनके मिशन को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से निर्धारित होता है।
📌 गृहस्थ आश्रम का उद्देश्य:
  • महाप्रभु के प्रेम-धर्म की भविष्य में रक्षा करना।
  • एक ऐसे वंश की स्थापना करना जो आध्यात्मिक शक्ति से संपन्न हो।
  • साधारण मनुष्य धर्म-रक्षा में समर्थ नहीं, इसलिए दिव्य शक्ति-संपन्न वंश की आवश्यकता थी।
💍
श्री नित्यानंद प्रभु का विवाह
सूर्यदास पंडित की कन्याओं वसुधा और जान्हवा से विवाह की लीला
▶ देखें (59:17) ▶ Watch (59:17)
महाप्रभु की आज्ञा पाकर श्री नित्यानंद प्रभु बंगाल में प्रचार करने लगे। वे सूर्यदास पंडित के घर गए और उनकी एक कन्या से विवाह का प्रस्ताव रखा। सूर्यदास पंडित यह देखकर चिंतित हो गए कि यह तो एक अवधूत, वैरागी (भैगा बैंड) हैं, जिनका कोई घर-द्वार नहीं, मेरी कन्या इनके साथ कैसे सुखी रहेगी। उनकी अनिक्षा देखकर नित्यानंद प्रभु चुपचाप एक वृक्ष के नीचे जाकर बैठ गए। तभी उनकी दोनों कन्याओं, वसुधा और जान्हवा, को हैजा (कॉलेरा) हो गया जो उस समय एक असाध्य रोग था। जब सब उपाय विफल हो गए, तो सूर्यदास पंडित ने नित्यानंद प्रभु से अपनी कन्याओं को बचाने की प्रार्थना की। नित्यानंद प्रभु ने एक कन्या से विवाह की शर्त पर उन्हें बचाने का वचन दिया। जब उन्होंने दूसरी कन्या को भी बचाने का आग्रह किया, तो प्रभु ने उसे दहेज में मांग लिया। इस प्रकार, दोनों कन्याओं के प्राण बचाने के बदले में, सूर्यदास पंडित ने अपनी दोनों पुत्रियों का विवाह श्री नित्यानंद प्रभु से कर दिया।
🔗 यह लीला दर्शाती है कि भगवान अपने संकल्प को पूरा करने के लिए किसी भी परिस्थिति का निर्माण कर सकते हैं और उनकी लीलाएं साधारण मानवीय तर्क से परे होती हैं।
📌 विवाह का घटनाक्रम:
  • नित्यानंद प्रभु द्वारा विवाह का प्रस्ताव।
  • सूर्यदास पंडित की चिंता और अनिक्षा।
  • दोनों कन्याओं को असाध्य रोग (हैजा) होना।
  • नित्यानंद प्रभु द्वारा प्राण बचाने की शर्त रखना।
  • एक कन्या विवाह में और दूसरी दहेज में प्राप्त होना।
🏡
विवाह पश्चात जीवन और खरदा में निवास
शिष्यों के घर भ्रमण और खरदा ग्राम की स्थापना
▶ देखें (66:07) ▶ Watch (66:07)
विवाह के पश्चात श्री नित्यानंद प्रभु के पास रहने का कोई स्थान नहीं था। अतः वे अपनी दोनों पत्नियों को लेकर अपने शिष्यों के घर-घर भ्रमण करने लगे। शिष्य अपने गुरु और गुरु-माताओं का बड़े आदर से सत्कार करते और बहुत सारी भेंट-प्रणामी देते। चूँकि रखने का कोई स्थान नहीं था, वे सारा सामान शिष्यों के पास ही छोड़ देते थे। इस प्रकार एक ओर धर्म-प्रचार और दूसरी ओर जीवन-निर्वाह का कार्य चलता रहा। अंत में, वे खरदा नामक स्थान पर पहुँचे। वहाँ एक ज़मींदार ने उन्हें उपेक्षापूर्वक एक गड्ढा (दह) युक्त भूमि दी। नित्यानंद प्रभु की कृपा से वह भूमि समतल और रहने योग्य हो गई, और उनके एक भक्त ने वहाँ एक सुंदर मकान बना दिया। वहीं पर वे निवास करने लगे और खरदा ग्राम गौड़ीय वैष्णवों का एक प्रमुख केंद्र बन गया।
🔗 यह प्रसंग एक वैरागी के गृहस्थ जीवन के व्यावहारिक चुनौतियों और भगवान की कृपा से सभी व्यवस्थाओं के स्वतः हो जाने के सिद्धांत को दर्शाता है।
अंतिम लीला: दिव्य पार्षद एवं तिरोभाव
श्री अभिराम ठाकुर जैसे महाप्रभु के दिव्य पार्षदों की अलौकिक लीलाओं, श्री वीरचंद्र प्रभु के प्राकट्य और श्री नित्यानंद प्रभु की तिरोभाव लीला को समझना।
💪
श्री अभिराम ठाकुर (श्रीदाम सखा) की लीला
गोलोक से आए श्रीदाम सखा: श्री अभिराम ठाकुर की अद्भुत लीला
▶ देखें (69:35) ▶ Watch (69:35)
सद्गुरुदेव श्री अभिराम ठाकुर की अद्भुत कथा सुनाते हैं, जो द्वापर युग के श्री कृष्ण के सखा श्रीदाम थे। वे महाप्रभु की लीला में सहयोग करने के लिए मानव शरीर धारण किए बिना, सीधे अपने सात हाथ लंबे दिव्य स्वरूप में गोलोक से आए थे। महाप्रभु ने चांटा मारकर उनका आकार साढ़े तीन हाथ का किया। उनकी शक्ति इतनी प्रचंड थी कि वे जिसे प्रणाम करते थे, वह मर जाता था। उन्होंने कई विग्रहों को भी प्रणाम करके तोड़ दिया था। उनका विवाह भी एक अलौकिक कन्या से हुआ जो एक मुसलमान के घर पली-बढ़ी, पर कभी उसका अन्न-जल ग्रहण नहीं किया। यह पार्षद लीला की दिव्यता और अचिन्त्य शक्ति को प्रदर्शित करता है।
🔗 यह कथा गौड़ीय वैष्णव सिद्धांत के 'परिकर-तत्व' को दर्शाती है, जहाँ भगवान के नित्य पार्षद उनकी लीला में सहायता करने के लिए दिव्य रूपों में अवतरित होते हैं।
📌 श्री अभिराम ठाकुर की विशेषताएं:
  • पूर्व स्वरूप: द्वापर युग के श्रीदाम सखा।
  • आगमन: बिना जन्म लिए सीधे गोलोक से दिव्य शरीर में आगमन।
  • शक्ति: उनके प्रणाम को सहन करने की शक्ति साधारण जीवों में नहीं थी।
  • लीला: महाप्रभु की लीला में एक विशिष्ट भूमिका निभाई।
👶
श्री वीरचंद्र प्रभु का प्राकट्य
अभिराम ठाकुर की परीक्षा और श्री वीरचंद्र प्रभु का प्राकट्य
▶ देखें (73:53) ▶ Watch (73:53)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि जब श्री नित्यानंद प्रभु के पुत्र होते, तो श्री अभिराम ठाकुर दर्शन करने आते और उन्हें प्रणाम करते, जिससे शिशु की मृत्यु हो जाती। इस प्रकार उनके छह पुत्रों की मृत्यु हो गई। जब सातवीं संतान, श्री वीरचंद्र प्रभु का जन्म हुआ, तो अभिराम ठाकुर को निमंत्रण नहीं दिया गया। फिर भी, वे बिना बुलाए अपनी सर्प-रूपी नौका पर बैठकर पहुँच गए। जब उन्होंने बालक वीरचंद्र को प्रणाम किया, तो बालक की मृत्यु होने के बजाय वे खिलखिलाकर हंस पड़े। अभिराम ठाकुर ने तीन बार प्रणाम किया, पर बालक पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। तब वे समझ गए कि यह कोई साधारण जीव नहीं, बल्कि स्वयं भगवान का अवतार (वासुदेव-संकर्षण अवतार) है जो जगत के कल्याण के लिए आया है।
🔗 यह लीला श्री वीरचंद्र प्रभु के दिव्य और शक्तिशाली स्वरूप को स्थापित करती है, जिन्होंने बाद में गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय का नेतृत्व किया।
📌 अभिराम ठाकुर की परीक्षा:
  • छह पुत्रों का उनके प्रणाम से देहत्याग।
  • सातवें पुत्र (वीरचंद्र) के अन्नप्राशन में बिना बुलाए पहुँचना।
  • तीन बार प्रणाम करने पर भी बालक का हंसते रहना।
  • वीरचंद्र प्रभु का ईश्वर-कोटि का पुरुष होना सिद्ध होना।
श्री नित्यानंद प्रभु की तिरोभाव लीला
खरदा में कीर्तन और श्यामसुंदर विग्रह में विलीन होना
▶ देखें (81:37) ▶ Watch (81:37)
सद्गुरुदेव श्री नित्यानंद प्रभु की अंतिम लीला का वर्णन करते हैं। उन्होंने खरदा में एक विशाल तीन दिवसीय कीर्तन समारोह का आयोजन किया, जिसमें सभी भक्त सम्मिलित हुए। कीर्तन के समापन पर, श्री नित्यानंद प्रभु मंदिर के द्वार पर खड़े होकर सबको ऐसे हाथ हिलाकर विदाई देने लगे जैसे कोई यात्रा पर जा रहा हो। इसके बाद वे मंदिर के भीतर प्रवेश कर गए और वहाँ श्यामसुंदर के विग्रह में सदा के लिए विलीन हो गए। इस प्रकार उन्होंने अपनी प्रकट लीला का संवरण किया। कुछ वर्षों बाद, श्री अद्वैत आचार्य प्रभु भी अपने मदन गोपाल विग्रह में विलीन हो गए।
🔗 यह प्रसंग भगवान और उनके नित्य पार्षदों की 'अप्रकट' लीला को दर्शाता है, जहाँ वे भौतिक दृष्टि से ओझल होकर अपनी नित्य लीला में प्रवेश कर जाते हैं।
भगवद् गीता 7.7
▶ 83:40
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव भगवान के सर्वोपरि होने और सभी वस्तुओं में उनकी सत्ता के सिद्धांत को बताते हुए भगवद गीता के श्लोक का उल्लेख करते हैं।
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय। मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥
हे धनंजय! मुझसे श्रेष्ठ दूसरा कोई भी नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत् सूत्र में मणियों के सदृश मुझमें पिरोया हुआ है।
Brihan-naradiya Purana 38.126
▶ 83:40
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव कलियुग में हरिनाम संकीर्तन के सर्वोच्च महत्व पर जोर देते हुए बृहन्नारदीय पुराण के प्रसिद्ध श्लोक का उच्चारण करते हैं।
हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्। कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा॥
कलियुग में हरिनाम, हरिनाम, हरिनाम ही एकमात्र साधन है। कलियुग में इसके अतिरिक्त और कोई गति नहीं है, कोई गति नहीं है, कोई गति नहीं है।
भगवद् गीता 9.31
▶ 83:40
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव नित्यानंद प्रभु के माध्यम से भगवान के इस वचन का स्मरण कराते हैं कि उनके भक्त का कभी विनाश नहीं होता, भले ही वह पापी क्यों न हो।
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति। कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥
वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और शाश्वत शान्ति को प्राप्त होता है। हे कुन्तीपुत्र! तुम यह निश्चयपूर्वक जान लो कि मेरे भक्त का कभी विनाश नहीं होता।
📌 तिरोभाव का स्वरूप:
  • स्थान: खरदा ग्राम।
  • घटना: तीन दिवसीय कीर्तन के बाद।
  • प्रक्रिया: मंदिर में प्रवेश कर श्यामसुंदर विग्रह में विलीन हो जाना।
स्पष्टीकरण (Clarification)

यह सारांश AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग गुरु सेवा में करके तैयार किया गया है। इसमें त्रुटि हो सकती है। कृपया पूर्ण लाभ के लिए पूरा वीडियो अवश्य देखें।

Comments

Replying to a comment. Cancel
100%

Select Language

Home
Widgets
Top
Text
Lang