श्री भगवत चर्चा
03 January 2026
अहंकार का स्वरूप और भक्ति योग की श्रेष्ठता
अहंकार के जड़-बंधन से चित्-स्वरूप में स्थिति द्वारा भगवत्प्रेम की प्राप्ति
Sri Sri 108 Sri Vinod Baba ji Maharaj
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संक्षेप
विस्तार
हमारे प्रिय सद्गुरुदेव बताते हैं:
"
यह शरीर मैं नहीं, शरीर संबंधी वस्तु मेरा नहीं। मैं राधारानी का हूं, राधारानी मेरी है। यह दुनिया से हमारा कोई लेना ना देना, मगन रहना।
"
अहंकार (25)भक्ति योग (15)जड़ वृत्ति (8)चित् वृत्ति (7)योगी (12)माया (10)शरणागति (5)भाव दशा (9)माधुकरी (6)
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सृष्टि का रहस्य और जीव का भ्रम
इस खंड में सद्गुरुदेव भगवान की त्रिविध शक्तियों, जीव के तटस्थ स्वरूप और माया के प्रभाव का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि कैसे माया की आवरण और विक्षेप शक्तियाँ जीव को उसके वास्तविक स्वरूप से विस्मृत कर संसार में फँसा देती हैं।
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भगवान का सच्चिदानंद स्वरूप
भगवान की त्रिविध शक्तियाँ: संधिनी, संवित् और ह्लादिनी
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सद्गुरुदेव बताते हैं कि भगवान का विग्रह सच्चिदानंद है, जो उनकी तीन प्रमुख शक्तियों के मिलन से प्रकट होता है। सत् अंग से 'संधिनी' शक्ति, चित् अंग से 'संवित्' शक्ति और आनंद अंग से 'ह्लादिनी' शक्ति प्रकट होती है। इन्हीं शक्तियों के द्वारा भगवान धाम, ज्ञान और आनंद का विस्तार करते हैं।
सद्गुरुदेव सत्संग के आरंभ में भगवान के मूल स्वरूप का वर्णन करते हैं। वे समझाते हैं कि भगवान का सच्चिदानंद विग्रह उनकी तीन अंतरंगा शक्तियों का समन्वय है। 'संधिनी' शक्ति सत्-अंश है, जिससे धाम और सृष्टि की रचना होती है। 'संवित्' शक्ति चित्-अंश है, जो ज्ञान और अनुभव का आधार है, और जीव इसी का अभिन्न अंश है। 'ह्लादिनी' शक्ति आनंद-अंश है, जो आनंद प्रदान करती है, और श्रीमती राधारानी इसी आनंद-दायिनी शक्ति की मूर्त विग्रह हैं।
🔗 यह शिक्षा सृष्टि के मूल आध्यात्मिक विज्ञान को स्पष्ट करती है, जो जीव और भगवान के संबंध का आधार है।
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जीव: भगवान की तटस्थ शक्ति
जीव शक्ति का तटस्थ स्वरूप और उसकी स्वतंत्रता
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सद्गुरुदेव जीव को भगवान की 'तटस्थ शक्ति' के रूप में परिभाषित करते हैं। इसका अर्थ है कि जीव के पास चुनाव की स्वतंत्रता है। वह चाहे तो भगवान की ओर जा सकता है या फिर माया के प्रभाव में आकर संसार में आ सकता है। इसी तटस्थ स्वभाव के कारण जीव का पतन संभव होता है।
सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि जीव भगवान की 'तटस्थ शक्ति' है, जिसका अर्थ है कि वह भगवान की अंतरंगा शक्ति (चिन्मय जगत) और बहिरंगा शक्ति (माया) के बीच स्थित है। जीव के पास यह स्वतंत्रता है कि वह भगवान की ओर उन्मुख हो या माया की ओर। जब जीव भगवान से विमुख होता है, तो बहिरंगा माया शक्ति उस पर प्रभाव डालती है और उसे अपने वास्तविक स्वरूप को भुलाकर संसार चक्र में फँसा देती है। यही जीव के बंधन का मूल कारण है।
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माया की आवरण और विक्षेप शक्ति
माया का दोहरा प्रहार: स्वरूप-विस्मृति और भेद-बुद्धि
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सद्गुरुदेव माया के दोहरे प्रहार का वर्णन करते हैं। पहले 'आवरण शक्ति' जीव के वास्तविक चेतन स्वरूप को ढक देती है, जिससे वह खुद को भूल जाता है। फिर 'विक्षेप शक्ति' उसमें भेद-बुद्धि पैदा करती है, जिससे वह खुद को शरीर मानने लगता है और दूसरों को अलग-अलग देखने लगता है।
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि भगवान की इच्छा से जब माया सक्रिय होती है, तो वह जीव पर दो प्रकार से कार्य करती है। सर्वप्रथम, 'आवरण शक्ति' द्वारा वह जीव के दिव्य स्वरूप को ढक देती है, जिससे 'स्वरूप-विस्मृति' हो जाती है। इसके बाद, 'विक्षेप शक्ति' उस पर एक झूठा आरोपण करती है, जिससे जीव में भेद-बुद्धि उत्पन्न होती है। वह स्वयं को पंचभौतिक शरीर मानने लगता है और संसार में 'यह मैं हूँ', 'यह मेरा है', 'यह अलग है' जैसी भ्रांतियों में पड़कर कर्म-बंधन में फँस जाता है।
🔗 यह ज्ञान साधक को अपने बंधन के मूल कारण को समझने में सहायता करता है, जो कि माया का अज्ञान है।
योग की श्रेष्ठता और भक्ति का मार्ग
इस खंड में सद्गुरुदेव 'योगी' शब्द का वास्तविक अर्थ समझाते हैं और गीता के श्लोकों के माध्यम से कर्म, ज्ञान और तप के योगियों से भक्तियोगी की श्रेष्ठता को सिद्ध करते हैं। वे स्थापित करते हैं कि भगवान से प्रेममय मिलन ही सर्वोच्च योग है।
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सद्गुरुदेव गीता का संदर्भ देते हुए श्रेष्ठ योगी के लक्षण बताते हैं। श्रेष्ठ योगी वह है जो सबमें समान रूप से उसी आत्मा को देखता है और दूसरों के सुख-दुःख को अपने सुख-दुःख के समान अनुभव करता है। यह समदर्शिता ही योग की पराकाष्ठा है।
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि हमारे सनातन धर्म में श्रेष्ठ योगी उसे माना गया है जो समदर्शी हो। वह अपने और दूसरों में कोई भेद नहीं देखता, क्योंकि वह जानता है कि सभी शरीरों में एक ही चेतन सत्ता, भगवान का अविनाशी अंश, विद्यमान है। जैसे हम अपना सुख-दुःख अनुभव करते हैं, वैसे ही जो दूसरों के सुख-दुःख को अनुभव करता है, भगवान उसे ही परम योगी मानते हैं। यह अवस्था भेद-बुद्धि के नाश होने पर ही प्राप्त होती है।
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सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि 'योग' का अर्थ केवल शारीरिक क्रियाएं या आसन नहीं है। योग का मूल अर्थ है 'मिलन' - जीवात्मा का परमात्मा से मिलन। यह मिलन कर्म, ज्ञान, हठ या भक्ति जैसे विभिन्न मार्गों से हो सकता है, और इन सभी प्रक्रियाओं को योग कहा जाता है।
सद्गुरुदेव 'योग' शब्द की भ्रांति को दूर करते हुए बताते हैं कि इसका शाब्दिक अर्थ 'जुड़ना' या 'मिलन' है। यह जीवात्मा और परमात्मा का, या भक्त और भगवान का मिलन है। जिस भी प्रक्रिया के द्वारा यह मिलन संभव होता है, उसे योग कहते हैं। चाहे वह कर्म के द्वारा हो (कर्मयोग), ज्ञान के द्वारा हो (ज्ञानयोग), या भक्ति के द्वारा हो (भक्तियोग), सभी का अंतिम लक्ष्य भगवान से जुड़ना ही है।
🔗 यह परिभाषा योग के प्रति एक व्यापक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण प्रदान करती है।
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भक्ति योग की सर्वोच्चता
योगिनामपि सर्वेषां: सभी योगों में भक्ति ही श्रेष्ठ
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सद्गुरुदेव गीता के श्लोकों का उद्धरण देते हुए सिद्ध करते हैं कि सभी योगियों में वह योगी श्रेष्ठ है जो श्रद्धापूर्वक भगवान को अपना मानकर, परम प्रियतम जानकर उनका भजन करता है। कर्मयोगी, ज्ञानयोगी और तपस्वी से भी भक्तियोगी को भगवान ने श्रेष्ठ माना है।
सद्गुरुदेव गीता के छठे अध्याय के श्लोकों का विश्लेषण करते हुए भक्ति योग की सर्वोच्चता स्थापित करते हैं। वे बताते हैं कि भगवान अर्जुन को 'योगी' बनने के लिए कहते हैं, जो तपस्वी, ज्ञानी और कर्मी से श्रेष्ठ है। फिर भगवान स्पष्ट करते हैं कि सभी प्रकार के योगियों में भी वह योगी उन्हें सबसे प्रिय है जो अपने अंतरात्मा से, श्रद्धा के साथ, उन्हें अपना मानकर भजता है। यह प्रेममयी साधना ही सबसे सहज, सरल और शीघ्र फल देने वाली है।
🔗 यह शिक्षा साधक को विभिन्न साधना मार्गों के बीच भक्ति मार्ग के अद्वितीय महत्व को समझने में मदद करती है।
अहंकार: बंधन का मूल और मुक्ति का उपाय
यह खंड सत्संग का हृदय है, जहाँ सद्गुरुदेव संसार-बंधन के मूल कारण 'अहंकार' का विश्लेषण करते हैं। वे अहंकार की दो वृत्तियों - 'जड़-वृत्ति' (बंधनकारी) और 'चित्-वृत्ति' (मुक्तिकारी) - के भेद को स्पष्ट करते हुए साधना का व्यावहारिक सूत्र प्रदान करते हैं।
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अहंकार: संसार बंधन का मूल
अहंकार विमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते: बंधन का मूल कारण
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सद्गुरुदेव बताते हैं कि संसार में जीव के समस्त दुःखों और बंधनों का एकमात्र कारण अहंकार है। 'मैं कर्ता हूँ' (कर्तृत्व अभिमान) और 'यह शरीर मैं हूँ' (देहात्मबुद्धि) - यही वह मूल भ्रम है जो जीव को प्रकृति के गुणों से बांधकर 84 लाख योनियों में घुमाता है। वास्तव में कोई बंधन है ही नहीं, यह केवल हमारी मान्यता है।
सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि संसार में जीव के फँसने का मूल कारण अहंकार ही है। माया की शक्तियों से आवृत होकर जीव स्वयं को शरीर मान लेता है और शरीर से संबंधित वस्तुओं को 'मेरा' मानने लगता है। वह प्रकृति के गुणों द्वारा किए जा रहे कर्मों का कर्ता स्वयं को मान बैठता है ('कर्ताहमिति मन्यते')। यही 'मैं-पन' और 'मेरे-पन' का भाव उसे कर्मफल में लिप्त करके संसार चक्र में बाँध देता है, जबकि वास्तव में आत्मा अकर्ता और असंग है।
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दृष्टांत: कमल पत्र और जल
दृष्टांत: पद्यपत्रमिवाम्भसा - संसार में अनासक्त जीवन
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सद्गुरुदेव कमल के पत्ते का दृष्टांत देते हैं, जो पानी में रहते हुए भी उससे भीगता नहीं है। इसी प्रकार, जो व्यक्ति अपने समस्त कर्म भगवान को अर्पित करके, अनासक्त होकर संसार में रहता है, वह संसार के पाप-पुण्य और कर्मफलों से लिप्त नहीं होता। वह संसार में रहते हुए भी उससे परे रहता है।
सद्गुरुदेव गीता के श्लोक 'ब्रह्मण्याधाय कर्माणि' का संदर्भ देते हुए कमल पत्र का सुंदर दृष्टांत प्रस्तुत करते हैं। जैसे कमल का पत्ता जल में ही उत्पन्न होता है और उसी में रहता है, परंतु जल की एक भी बूँद उसे स्पर्श नहीं कर पाती, वह सदा निर्लिप्त रहता है। ठीक उसी प्रकार, जो साधक कर्तृत्व अभिमान त्यागकर और फल की आसक्ति छोड़कर अपने सभी कर्म भगवान को समर्पित कर देता है, वह गृहस्थ में रहते हुए भी सांसारिक कर्मों के बंधन से मुक्त रहता है।
🔗 यह दृष्टांत गृहस्थ साधकों के लिए एक व्यावहारिक आदर्श प्रस्तुत करता है कि संसार का त्याग आवश्यक नहीं, आसक्ति का त्याग आवश्यक है।
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अहंकार की जड़-वृत्ति: आत्मा का शत्रु
अहंकार की जड़-वृत्ति: बंधन का कारण
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सद्गुरुदेव अहंकार की उस वृत्ति को 'जड़-वृत्ति' कहते हैं जो हमें यह मानने पर विवश करती है कि 'यह शरीर मैं हूँ और शरीर से संबंधित वस्तुएँ मेरी हैं'। यह जड़ता से तादात्म्य ही आत्मा का सबसे बड़ा शत्रु है, क्योंकि यह हमें हमारे नित्य, चेतन स्वरूप से दूर ले जाकर अनित्य, जड़ संसार में फँसा देता है।
सद्गुरुदेव साधना के मूल शत्रु की पहचान कराते हुए अहंकार की 'जड़-वृत्ति' का वर्णन करते हैं। यह वह वृत्ति है जिसके कारण चेतन आत्मा जड़ शरीर के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेती है। 'मैं शरीर हूँ' यह भाव आते ही शरीर के भोग, सुख-सुविधा, काम, क्रोध, और शरीर से संबंधित स्त्री, पुत्र, धन आदि में 'मेरापन' आ जाता है। यही जड़-अभिनिवेश आत्मा का वास्तविक दुश्मन है जो उसे बंधन में डालता है।
🔗 यह विश्लेषण साधक को अपनी साधना की सही दिशा निर्धारित करने में मदद करता है - जड़-अभिमान को तोड़ना।
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अहंकार की चित्-वृत्ति: मुक्ति का समाधान
अहंकार की चित्-वृत्ति: मुक्ति का साधन
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सद्गुरुदेव बंधनकारी जड़-वृत्ति के समाधान के रूप में 'चित्-वृत्ति' को प्रस्तुत करते हैं। यह भी 'मैं' का भाव है, लेकिन यह दिव्य है। गुरु कृपा से साधक यह चिंतन करता है कि 'मैं यह शरीर नहीं, मैं तो राधारानी की नित्य सहचरी, एक चिन्मय मंजरी हूँ'। यह चिद-अभिमान ही जीव को मुक्त करता है।
सद्गुरुदेव अहंकार के सकारात्मक उपयोग का मार्ग बताते हैं, जिसे वे 'चित्-वृत्ति' कहते हैं। यह भी एक प्रकार का अहंकार या 'मैं-पन' है, परंतु यह दिव्य और मुक्तिदायक है। गुरुदेव जब साधक को उसके वास्तविक, नित्य, चिन्मय स्वरूप का बोध कराते हैं (जैसे - 'तुम शरीर नहीं, तुम भगवान के नित्य दास या राधारानी की सहचरी हो'), तब साधक उस दिव्य स्वरूप का चिंतन करने लगता है। 'मैं राधारानी का हूँ' - यह चिद-अभिमान, 'मैं शरीर हूँ' - इस जड़-अभिमान को काट देता है और साधक को भगवत्-सेवा में प्रतिष्ठित करता है।
🔗 यह Gaudiya Vaishnavism का एक केंद्रीय सिद्धांत है, जो स्वरूप-सिद्धि के माध्यम से मुक्ति का मार्ग दिखाता है।
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सद्गुरुदेव इस भ्रांति का खंडन करते हैं कि साधना के लिए घर-परिवार छोड़ना आवश्यक है। वे कहते हैं कि वास्तविक त्याग बाहरी वस्तुओं का नहीं, बल्कि आंतरिक वृत्ति का है। यदि साधक घर में रहते हुए भी यह जान ले कि यह संसार एक धर्मशाला है और यहाँ कोई भी अपना नहीं है, तो घर उसके लिए बंधन का कारण नहीं बनेगा।
सद्गुरुदेव साधकों को एक बहुत महत्वपूर्ण व्यावहारिक निर्देश देते हैं। वे कहते हैं कि भजन करने के लिए घर-बार या जंगल जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। असली परिवर्तन वृत्ति में लाना है, स्थान में नहीं। साधक को घर-परिवार में रहते हुए ही यह समझना है कि यह सब एक नाटक है, एक धर्मशाला है, और यहाँ कोई भी वस्तु या व्यक्ति स्थायी रूप से उसका नहीं है। इस ज्ञान के साथ संसार में रहने से संसार बंधन का कारण नहीं बनता, बल्कि साधना में सहायक हो सकता है।
साधना की क्रमिक अवस्थाएँ
इस खंड में सद्गुरुदेव भक्ति की क्रमिक उन्नति का वर्णन करते हैं, जो आसक्ति से भाव-दशा तक पहुँचती है। वे भाव-दशा के लक्षणों, जैसे मान-शून्यता और अव्यर्थकालत्व, का वर्णन करते हैं और अपने गुरुदेव के जीवन के प्रेरक प्रसंगों से इसे और स्पष्ट करते हैं।
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सद्गुरुदेव बताते हैं कि भक्ति में उन्नति क्रमिक होती है। जैसे-जैसे साधक आगे बढ़ता है, कृष्ण-प्रीति का अंश बढ़ता जाता है और शरीर-प्रीति (सांसारिक आसक्ति) का अंश घटता जाता है। यह प्रक्रिया रुचि, आसक्ति से होते हुए भाव-दशा तक पहुँचती है, जहाँ शरीर-प्रीति केवल गंध मात्र रह जाती है।
सद्गुरुदेव भक्ति की प्रगति को एक सुंदर गणितीय रूपक से समझाते हैं। वे बताते हैं कि साधना की विभिन्न अवस्थाओं में कृष्ण के प्रति प्रेम और शरीर के प्रति आसक्ति का अनुपात बदलता रहता है। रुचि की अवस्था में यह आधा-आधा (आठ-आना) होता है। आसक्ति की अवस्था में कृष्ण-प्रीति सोलह आने हो जाती है और शरीर-प्रीति केवल चार आना रह जाती है। अंत में, भाव-दशा में कृष्ण-प्रीति अपनी पराकाष्ठा पर होती है और शरीर-प्रीति केवल नाम-मात्र (गंध-मात्र) शेष रहती है।
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सद्गुरुदेव भक्ति की अवस्थाओं की तुलना रात्रि के समाप्त होने और प्रभात के आगमन से करते हैं। आसक्ति दशा पूर्व दिशा में दिखने वाली लालिमा की तरह है, जो सूर्योदय का संकेत है। भाव-दशा वह स्थिति है जब सूर्य तो नहीं निकला, पर सब कुछ स्पष्ट दिखने लगता है। प्रेम-भक्ति साक्षात सूर्योदय है।
सद्गुरुदेव आसक्ति, भाव और प्रेम भक्ति की अवस्थाओं को समझाने के लिए प्रभात का सुंदर दृष्टांत देते हैं। वे कहते हैं कि घोर अंधकारमयी रात्रि के बाद, जब पूर्व दिशा में लालिमा छा जाती है, तो यह 'आसक्ति दशा' का संकेत है - अब सूर्योदय दूर नहीं। जब सूर्य उदित नहीं हुआ है, फिर भी चारों ओर प्रकाश फैल गया है और वस्तुएँ दिखने लगी हैं, यह 'भाव दशा' है। और जब साक्षात सूर्य का उदय हो जाता है, तो वह 'प्रेम भक्ति' की अवस्था है, जहाँ भगवान का प्रत्यक्ष अनुभव होता है।
🔗 यह दृष्टांत साधक को अपनी आध्यात्मिक प्रगति को समझने और धैर्य रखने के लिए प्रेरित करता है।
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भाव भक्ति में साधक की स्थिति
भाव दशा: उन्मत्त अवस्था और क्रियात्मक भजन का अंत
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सद्गुरुदेव बताते हैं कि भाव भक्ति की दशा में साधक की बाहरी क्रियाएं (पूजा, पाठ, नियम) छूट जाती हैं, क्योंकि उसका मन भगवान में इतना तल्लीन हो जाता है कि उसे शरीर का बोध ही नहीं रहता। वह कभी रोता है, कभी हंसता है, कभी जड़वत हो जाता है। साधारण लोग उसे पागल समझ सकते हैं।
सद्गुरुदेव भाव भक्ति की उन्नत अवस्था का वर्णन करते हैं। इस स्थिति में साधक का मन भगवत्-चिंतन में इतना तल्लीन और तन्मय हो जाता है कि उसे अपने शरीर और बाहरी जगत की सुध नहीं रहती। इस कारण, विधि-निषेध पर आधारित क्रियात्मक भजन (जैसे पूजा, स्नान, तिलक) स्वाभाविक रूप से छूट जाते हैं। साधक उन्मत्त की तरह व्यवहार करने लगता है - कभी रोता है, कभी गाता है, तो कभी जड़वत स्थिर हो जाता है। उसकी इस आंतरिक स्थिति को केवल कोई सिद्ध महापुरुष ही पहचान सकता है।
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सद्गुरुदेव बताते हैं कि भाव दशा का एक प्रमुख लक्षण है 'मान-शून्यता'। इस अवस्था में साधक को मान और अपमान का कोई बोध नहीं रहता। कोई सम्मान करे या तिरस्कार, उसके चित्त में कोई विक्षेप नहीं होता, क्योंकि उसका अहंकार पूरी तरह से नष्ट हो चुका होता है। मान-अपमान का अनुभव अहंकार का ही परिचायक है।
सद्गुरुदेव साधकों को आत्म-निरीक्षण का एक महत्वपूर्ण पैमाना देते हैं। वे कहते हैं कि यदि किसी के सम्मान करने पर मन प्रसन्न होता है और अपमान करने पर खिन्न होता है, तो यह स्पष्ट संकेत है कि भीतर अहंकार विद्यमान है। भाव दशा में पहुँचे हुए भक्त के लिए मान और अपमान दोनों झूठे और अर्थहीन हो जाते हैं। कोई उसे गाली दे या माला पहनाए, उसके समदर्शी चित्त पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। यह मान-शून्यता ही भक्ति की परिपक्वता का लक्षण है।
🔗 यह शिक्षा साधक को प्रतिष्ठा की इच्छा से सावधान करती है, जो भक्ति-पथ में एक बड़ी बाधा है।
व्यावहारिक साधना और शरणागति का सत्य
सत्संग के अंतिम खंड में सद्गुरुदेव श्रोताओं के प्रश्नों का उत्तर देते हुए साधना के व्यावहारिक पहलुओं पर प्रकाश डालते हैं। वे ब्रह्मार्पण, शरणागति का वास्तविक अर्थ, और माधुकरी वृत्ति के रहस्य को खोलते हैं, जिससे साधक को अपने दैनिक जीवन में इन सिद्धांतों को लागू करने की प्रेरणा मिलती है।
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सद्गुरुदेव समर्पण का अर्थ समझाने के लिए गाय बेचने का दृष्टांत देते हैं। जैसे एक बार गाय बेच देने के बाद हमारा उस पर कोई अधिकार नहीं रहता, चाहे नया मालिक उसे भूखा रखे या धूप में बांधे। उसी प्रकार, स्वयं को भगवान को समर्पित कर देने के बाद अपनी चिंता करने का अधिकार हमें नहीं रहता।
सद्गुरुदेव आत्म-समर्पण के गहरे अर्थ को एक व्यावहारिक दृष्टांत से स्पष्ट करते हैं। वे कहते हैं कि जैसे कोई व्यक्ति अपनी गाय किसी और को बेच देता है, तो उसके बाद उसे यह चिंता करने का कोई अधिकार नहीं है कि नया मालिक गाय को चारा देता है या नहीं, या उसे धूप में रखता है या छाँव में। ठीक इसी तरह, जिसने वास्तव में स्वयं को भगवान के चरणों में समर्पित कर दिया है, उसे अपने भविष्य, अपनी सुरक्षा या अपनी आवश्यकताओं की चिंता करने का कोई अधिकार नहीं है। उसकी सारी चिंता अब भगवान की है।
🔗 यह दृष्टांत शरणागति के साथ आने वाली निश्चिंतता को उजागर करता है।
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सद्गुरुदेव शरणागति का सार एक वाक्य में बताते हैं: 'शरणागति माने निश्चिंतता'। यदि जीवन में किसी भी बात को लेकर चिंता या भय है, तो समझना चाहिए कि शरणागति अभी पूरी नहीं हुई है। सच्चा शरणागत भक्त हर परिस्थिति में, यहाँ तक कि मृत्यु के सामने भी, निश्चिंत रहता है क्योंकि उसे विश्वास होता है कि भगवान उसकी रक्षा करेंगे।
सद्गुरुदेव शरणागति की सबसे बड़ी पहचान बताते हैं - निश्चिंतता। वे कहते हैं कि यदि कोई कहता है कि मैं शरणागत हूँ, लेकिन फिर भी 'मेरा क्या होगा' इस चिंता में डूबा रहता है, तो उसकी शरणागति सच्ची नहीं है। वास्तविक शरणागति का अर्थ है भगवान पर पूर्ण निर्भरता और अपनी समस्त चिंताओं से मुक्ति। चाहे जीवन में आँधी आए या तूफ़ान, भक्त निश्चिंत रहता है, क्योंकि वह जानता है कि उसका रक्षक स्वयं भगवान है।
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सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि माधुकरी (भिक्षावृत्ति) का उद्देश्य केवल पेट भरना नहीं है, बल्कि अहंकार को नष्ट करना है। भिक्षा मांगते समय मिलने वाले तिरस्कार और अपमान को सहन करने से साधक का 'मैं-पन' टूटता है। यह अहंकार को मारने का एक विशेष उपाय है, न कि भोजन जुटाने का।
सद्गुरुदेव माधुकरी वृत्ति के पीछे छिपे गहरे आध्यात्मिक रहस्य को उजागर करते हैं। वे बताते हैं कि आश्रम में भोजन का अभाव न होते हुए भी साधु माधुकरी के लिए इसलिए जाते हैं क्योंकि यह अहंकार को नष्ट करने का सबसे उत्तम साधन है। भिक्षावृत्ति सबसे हीन वृत्ति मानी जाती है। जब कोई फटकारता है, घृणा से देखता है या अपमान करता है, तो उसे सहन करने से साधक के भीतर का अभिमान चूर-चूर हो जाता है। अतः माधुकरी का मुख्य उद्देश्य उदर-भरण नहीं, अपितु अहंकार-हनन है।
🔗 यह शिक्षा साधक को बाहरी क्रियाओं के आंतरिक उद्देश्य को समझने की दृष्टि प्रदान करती है।
✨ विशेष उल्लेख
📋 माया की दो प्रमुख शक्तियाँ
▶ 2:25
▶ देखें (2:25)
- आवरण शक्ति: यह जीव के वास्तविक स्वरूप (भगवान का अंश) को ढक देती है, जिससे स्वरूप-विस्मृति हो जाती है।
- विक्षेप शक्ति: यह जीव में भेद-बुद्धि उत्पन्न करती है, जिससे वह स्वयं को दूसरों से और भगवान से अलग समझने लगता है।
📋 तीन प्रकार की माधुकरी वृत्ति
▶ 54:35
▶ देखें (54:35)
- माधुकरी: बिना किसी परिचय या अपेक्षा के, मौन रहकर, जो कुछ भी मिले उसे स्वीकार करना। यह अहंकार को नष्ट करने के लिए है।
- फादुकरी: गृहस्थ से परिचय बनाकर, उनकी समस्याओं में रुचि दिखाकर, झाड़-फूंक करके विशेष भोजन प्राप्त करने का प्रयास करना।
- जादुकरी: तंत्र-मंत्र का भय दिखाकर या चमत्कार का दावा करके लोगों से विशेष सेवा और सामग्री प्राप्त करना।
✨ चरित्र: श्री अम्बरीष महाराज
▶ 29:32
▶ देखें (29:32)
"सद्गुरुदेव ने श्री अम्बरीष महाराज का उदाहरण देते हुए समझाया कि चक्रवर्ती राजा होते हुए भी, वे सबसे बड़े त्यागी थे क्योंकि उनका मन भगवान में था। इससे यह सिद्ध होता है कि बाहरी त्याग नहीं, बल्कि आंतरिक अनासक्ति ही वास्तविक त्याग है।"
⛓️ जड़-वृत्ति (बंधनकारी)
यह वृत्ति जीव को जड़ शरीर और संसार से जोड़ती है। 'मैं शरीर हूँ' और 'यह संसार मेरा है' - यह भाव ही बंधन का कारण है। यह आत्मा का शत्रु है।
बनाम
🕊️ चित्-वृत्ति (मुक्तिकारी)
यह वृत्ति जीव को उसके नित्य, चिन्मय स्वरूप और भगवान से जोड़ती है। 'मैं भगवान का नित्य दास/सखी हूँ' - यह भाव (चिद-अभिमान) मुक्ति का साधन है। यह आत्मा का बंधु है।
जिज्ञासा (Q&A)
प्रश्न: यदि सम्मान पाने की इच्छा न हो, फिर भी अपमान होने पर कष्ट क्यों होता है?
▶ देखें (45:40)
▶ देखें (45:40)
उत्तर: सद्गुरुदेव कहते हैं कि यह कहना झूठ है कि सम्मान की इच्छा नहीं है। जितना अपमान का बोध होता है, उतना ही सम्मान का बोध भी भीतर छिपा होता है। ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और अहंकार के ही लक्षण हैं।
उत्तर: सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि मान और अपमान एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। यदि अपमान से कष्ट होता है, तो यह निश्चित है कि अंतःकरण में सम्मान की सूक्ष्म इच्छा विद्यमान है। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व नहीं हो सकता। जो व्यक्ति वास्तव में मान-शून्य हो गया है, उसे अपमान से भी कोई कष्ट नहीं होगा। इसलिए, अपमान में कष्ट का अनुभव करना इस बात का सूचक है कि साधक को अभी अपने अहंकार पर और कार्य करने की आवश्यकता है।
प्रश्न: एक आरंभिक साधक, जिसमें अभी विवेक नहीं है, वह अपने कर्मों को 'ब्रह्मार्पण' करना कैसे शुरू करे?
▶ देखें (49:22)
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उत्तर: सद्गुरुदेव समझाते हैं कि सच्चा समर्पण 'कर्म' का नहीं, बल्कि 'कर्ता' का होता है। जब तक 'मैं समर्पण कर रहा हूँ' यह भाव है, तब तक कर्ता बचा हुआ है। सच्चा समर्पण है स्वयं को भगवान को सौंप देना और फिर अपनी कोई चिंता न करना।
उत्तर: सद्गुरुदेव बताते हैं कि 'ब्रह्मार्पण' केवल एक क्रिया नहीं, बल्कि एक भाव है। आरंभिक साधक के लिए इसका अभ्यास है - स्वयं को ही भगवान को समर्पित कर देना। इसका अर्थ है यह मान लेना कि अब मैं और मेरा कुछ भी नहीं, सब कुछ प्रभु का है। जैसे गाय बेचने के बाद उस पर हमारा अधिकार नहीं रहता, वैसे ही स्वयं को सौंपने के बाद अपनी चिंता करने का अधिकार भी नहीं रहता। शरणागति का अर्थ ही है निश्चिंतता। यह भाव धीरे-धीरे अभ्यास से दृढ़ होता है।
प्रश्न: मनुष्य से आशा न रखने का जो सिद्धांत है, वह बहुत कठिन लगता है क्योंकि हम मनुष्यों के बीच ही रहते हैं। इसका पालन कैसे करें?
▶ देखें (52:05)
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उत्तर: सद्गुरुदेव गीता के श्लोक 'यदृच्छालाभसन्तुष्टो' का संदर्भ देते हुए कहते हैं कि साधक को बिना किसी से आशा रखे, जो कुछ भी स्वतः प्राप्त हो जाए, उसी में संतुष्ट रहना चाहिए। यह माधुकरी वृत्ति का भाव है।
उत्तर: सद्गुरुदेव समझाते हैं कि मनुष्य से आशा न रखने का अर्थ है किसी पर निर्भर न होना और किसी से कोई अपेक्षा न रखना। इसका अभ्यास 'यदृच्छा-लाभ-संतोष' के माध्यम से होता है, अर्थात् बिना प्रयास के जो कुछ भी प्रारब्धवश मिल जाए, उसी में प्रसन्न रहना। यह एक प्रकार की माधुकरी वृत्ति है, जहाँ साधक किसी विशेष व्यक्ति या घर से अपेक्षा नहीं रखता, बल्कि भगवान की इच्छा पर निर्भर रहता है। यह वृत्ति धीरे-धीरे मनुष्य की आशा को तोड़कर भगवान पर आशा को दृढ़ करती है।
✅ करें (Do's)
- अपने को शरीर नहीं, बल्कि भगवान का नित्य अंश (आत्मा) मानें।
- संसार को एक धर्मशाला या नाटक समझकर अनासक्त भाव से रहें।
- अपने मान-अपमान के प्रति सजग रहें और इसे अहंकार का लक्षण समझें।
- भगवान के प्रति पूर्ण शरणागत होकर निश्चिंत रहने का अभ्यास करें।
- जो कुछ भी प्रारब्धवश प्राप्त हो, उसी में संतुष्ट रहने का प्रयास करें।
❌ न करें (Don'ts)
- स्वयं को कर्मों का कर्ता न मानें।
- साधना के लिए घर-परिवार छोड़कर जंगल जाने की अनावश्यक सोच न रखें।
- सम्मान या प्रतिष्ठा की इच्छा न करें, यह भक्ति में बाधक है।
- भविष्य की चिंता न करें, उसे भगवान पर छोड़ दें।
- भिक्षावृत्ति को पेट भरने का नहीं, बल्कि अहंकार मिटाने का साधन मानें।
शास्त्र प्रमाण (Scriptural References)
इस खंड में वे श्लोक व कथा-प्रसंग सम्मिलित हैं जो सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित किए गए हैं या सत्संग के भाव को समझने में सहायक संदर्भ के रूप में दिए गए हैं।
भगवद् गीता 6.32
Bhagavad Gita 6.32
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव इस श्लोक के माध्यम से श्रेष्ठ योगी की परिभाषा देते हुए समझाते हैं कि समदर्शिता, अर्थात् सभी के सुख-दुःख को अपना समझना, ही योग की सर्वोच्च अवस्था है।
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥
ātmaupamyena sarvatra samaṁ paśyati yo 'rjuna |
sukhaṁ vā yadi vā duḥkhaṁ sa yogī paramo mataḥ ||
हे अर्जुन! जो योगी अपनी ही भाँति सब प्राणियों में समदृष्टि रखता है और सुख अथवा दुःख को भी सबमें समान समझता है, वही परम श्रेष्ठ योगी माना गया है।
भगवद् गीता 6.47
Bhagavad Gita 6.47
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
इस श्लोक को उद्धृत कर सद्गुरुदेव यह सिद्ध करते हैं कि भगवान की दृष्टि में सभी योगियों में भक्तियोगी ही सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि वह प्रेम और श्रद्धा से भगवान से जुड़ा होता है।
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः॥
yoginām api sarveṣāṁ mad-gatenāntar-ātmanā |
śraddhāvān bhajate yo māṁ sa me yuktatamo mataḥ ||
सम्पूर्ण योगियों में भी जो श्रद्धावान् योगी मुझमें लगे हुए अन्तरात्मा से मुझको निरन्तर भजता है, वह योगी मुझे परम श्रेष्ठ मान्य है।
भगवद् गीता 6.46
Bhagavad Gita 6.46
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव इस श्लोक का उल्लेख यह बताने के लिए करते हैं कि भगवान ने स्वयं योगी को तपस्वी, ज्ञानी और कर्मी से श्रेष्ठ बताया है, और फिर अगले श्लोक में भक्तियोगी को सभी योगियों में श्रेष्ठ कहा है।
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन॥
tapasvibhyo 'dhiko yogī jñānibhyo 'pi mato 'dhikaḥ |
karmibhyaś cādhiko yogī tasmād yogī bhavārjuna ||
योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, ज्ञानियों से भी श्रेष्ठ माना गया है और सकाम कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है, इसलिये हे अर्जुन! तू योगी बन।
भगवद् गीता 5.12
Bhagavad Gita 5.12
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव इस श्लोक से 'युक्त' (योगी) और 'अयुक्त' (अयोगी) का भेद स्पष्ट करते हैं। सच्चा योगी वही है जो कर्मफल का त्याग करता है, कामना से कर्म करने वाला तो बंधा हुआ है।
युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्।
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते॥
yuktaḥ karma-phalaṁ tyaktvā śāntim āpnoti naiṣṭhikīm |
ayuktaḥ kāma-kāreṇa phale sakto nibadhyate ||
कर्मयोगी कर्मों के फल का त्याग करके भगवत्प्राप्ति रूप नैष्ठिकी शान्ति को प्राप्त होता है और सकाम पुरुष कामना के कारण फल में आसक्त होकर बँधता है।
भगवद् गीता 5.10
Bhagavad Gita 5.10
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव इस श्लोक का उपयोग यह समझाने के लिए करते हैं कि संसार में रहते हुए भी कर्मबंधन से कैसे मुक्त रहा जा सकता है - इसका उपाय है अनासक्त होकर कर्म करना और उसे भगवान को समर्पित कर देना।
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥
brahmaṇy ādhāya karmāṇi saṅgaṁ tyaktvā karoti yaḥ |
lipyate na sa pāpena padma-patram ivāmbhasā ||
जो पुरुष सब कर्मों को परमात्मा में अर्पण करके और आसक्ति को त्यागकर कर्म करता है, वह पुरुष जल से कमल के पत्ते की भाँति पाप से लिप्त नहीं होता।
भगवद् गीता 4.22
Bhagavad Gita 4.22
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव इस श्लोक को उद्धृत कर मनुष्य से आशा न रखने का उपाय बताते हैं। साधक को जो कुछ भी प्रारब्धवश स्वतः मिल जाए, उसी में संतुष्ट रहना चाहिए।
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते॥
yadṛcchā-lābha-santuṣṭo dvandvātīto vimatsaraḥ |
samaḥ siddhāv asiddhau ca kṛtvāpi na nibadhyate ||
जो बिना इच्छा के अपने-आप प्राप्त हुए पदार्थ में सदा सन्तुष्ट रहता है, जिसमें ईर्ष्या का सर्वथा अभाव हो गया है, जो हर्ष-शोकादि द्वन्द्वों से सर्वथा अतीत हो गया है - ऐसा सिद्धि और असिद्धि में सम रहने वाला कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी उनसे नहीं बँधता।
उपनिषद Chandogya Upanishad 6.2.3 / Taittiriya Upanishad 2.6.1
Upanishad Chandogya Upanishad 6.2.3 / Taittiriya Upanishad 2.6.1
पूरक संदर्भ (Siddhant)
पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव भगवान की एक से अनेक होने की इच्छा का वर्णन करते हैं, जो सृष्टि का मूल कारण है।
एकोऽहं बहु स्याम् प्रजायेय
मैं एक हूँ, अनेक हो जाऊँ, उत्पन्न हो जाऊँ।
भगवद् गीता 3.27
Bhagavad Gita 3.27
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव बताते हैं कि अहंकार के कारण जीव स्वयं को कर्ता मानकर संसार चक्र में फँस जाता है, जबकि सभी कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं।
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥
प्रकृति के गुणों द्वारा सभी कर्म किए जाते हैं, परन्तु अहंकार से मोहित आत्मा स्वयं को कर्ता मानती है।
भगवद् गीता 6.5-6
Bhagavad Gita 6.5-6
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव अहंकार को आत्मा का दुश्मन बताते हुए कहते हैं कि मनुष्य को स्वयं अपना उद्धार करना चाहिए, क्योंकि आत्मा ही अपना मित्र और शत्रु है।
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥ बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः। अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्॥
मनुष्य को अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिए, अपने को अधोगति में नहीं डालना चाहिए। क्योंकि मनुष्य आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है। जिस जीवात्मा के द्वारा मन और इन्द्रियों सहित शरीर जीता हुआ है, उस जीवात्मा का तो वह आप ही मित्र है और जिसके द्वारा मन तथा इन्द्रियों सहित शरीर नहीं जीता गया है, उसके लिए वह आप ही शत्रु के समान बर्ताव करता है।
भगवद् गीता 2.13
Bhagavad Gita 2.13
पूरक संदर्भ (Siddhant)
पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव शरीर के बदलते स्वरूप (बचपन, जवानी, बुढ़ापा) का उदाहरण देकर समझाते हैं कि आत्मा अपरिवर्तनीय है और शरीर से भिन्न है।
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा। तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥
जिस प्रकार जीवात्मा इस देह में बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था को प्राप्त करता है, उसी प्रकार वह अन्य शरीर को भी प्राप्त करता है। धीर पुरुष इससे मोहित नहीं होता।
भगवद् गीता 3.36
Bhagavad Gita 3.36
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव बताते हैं कि पूर्व संस्कारों और वासनाओं के कारण जीव न चाहते हुए भी पाप कर्मों की ओर आकर्षित होता है, जैसे हींग की गंध डिब्बे में रह जाती है।
अर्जुन उवाच। अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः। अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः॥
अर्जुन ने कहा: हे वृष्णिवंशी! मनुष्य न चाहते हुए भी, बलपूर्वक लगाए गए के समान, किससे प्रेरित होकर पाप करता है?
श्रीमद् भागवतम् 9.4.63
Srimad Bhagavatam 9.4.63
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव अंबरीष महाराज के उदाहरण से समझाते हैं कि भगवान अपने भक्तों के अधीन होते हैं, भले ही भक्त सांसारिक रूप से बड़े राजा हों, यदि वे आंतरिक रूप से अनासक्त हों।
अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतंत्र इव द्विज। साधुभिर्ग्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः॥
भगवान ने कहा: हे ब्राह्मण! मैं अपने भक्तों के अधीन हूँ, मानो मैं स्वतंत्र नहीं हूँ। मेरे हृदय को साधु-भक्तों ने वश में कर लिया है, क्योंकि मैं भक्तों का प्रिय हूँ।
Saint Vani / Doha Doha
Saint Vani / Doha Doha
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव संसार को स्वप्नवत बताते हुए कहते हैं कि यह मान्यता ही मुक्ति का मार्ग है।
संसार सपनो मान, विषय विपत्ति जान। नर-तन भजन का मूल, यह अवसर मत गँवा॥
संसार को स्वप्न के समान मानो, विषयों को विपत्ति जानो। मनुष्य शरीर भजन का मूल है, इस अवसर को मत गंवाओ।
Bhakti-rasamrita-sindhu 1.3.25-26
Bhakti-rasamrita-sindhu 1.3.25-26
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव भावदशा के लक्षणों का वर्णन करते हैं, जिसमें क्षमा, समय का सदुपयोग, वैराग्य, मान-शून्यता, उत्कंठा, नाम-गान में रुचि, भगवान के गुणों के आख्यान में आसक्ति और उनके निवास स्थान में प्रीति शामिल है।
क्षान्तिरव्यर्थ-कालता विरक्तिर्मान-शून्यता। आशा-बन्धः समुत्कण्ठा नाम-गाने सदा रुचिः॥ आसक्तिस् तद्-गुणाख्याने प्रीतिस् तद्-वसति-स्थले। इत्य् आदयोऽनुभावाः स्युर् भाव-भक्ति-प्रवर्तने॥
क्षमा, समय का व्यर्थ न जाना, वैराग्य, मान-शून्यता, आशा-बन्ध, उत्कण्ठा, नाम-गान में सदा रुचि, भगवान के गुणों के आख्यान में आसक्ति, और उनकी निवास-स्थली में प्रीति - ये भाव-भक्ति के लक्षण हैं।
भगवद् गीता 13.8-12
Bhagavad Gita 13.8-12
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव भावदशा के लक्षणों का वर्णन करते हुए ज्ञान के गुणों का उल्लेख करते हैं, जैसे अमानित्व, अदम्भित्व, अहिंसा, क्षान्ति और आर्जव।
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्। आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥ इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च। जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्॥ असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु। नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु॥ मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी। विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥ अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्। एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा॥
मानरहित होना, दम्भरहित होना, अहिंसा, क्षमा, सरलता, आचार्य की सेवा, शुद्धि, स्थिरता, आत्मसंयम; इन्द्रियों के विषयों में वैराग्य, अहंकार का अभाव, जन्म, मृत्यु, जरा और व्याधि रूपी दुःखों में दोषों को बार-बार देखना; पुत्र, स्त्री, घर आदि में आसक्ति का अभाव, मोह का न होना तथा इष्ट और अनिष्ट की प्राप्ति में सदा समचित्त रहना; मुझमें अनन्य भाव से अव्यभिचारिणी भक्ति, एकान्त और शुद्ध देश में रहने का स्वभाव तथा जनसमूह में प्रीति का न होना; अध्यात्मज्ञान में नित्य स्थिति और तत्त्वज्ञान के अर्थ को देखना—यह सब ज्ञान कहा जाता है और जो इससे विपरीत है, वह अज्ञान है।
Sri Shikshashtakam Verse 3
Sri Shikshashtakam Verse 3
पूरक संदर्भ (Siddhant)
पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव मान-अपमान से परे रहने की बात करते हैं और बताते हैं कि मान-शून्यता अहंकार के अभाव का लक्षण है, जो एक भक्त का गुण है।
तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना। अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः॥
जो स्वयं को घास से भी अधिक नीचा मानता है, वृक्ष से भी अधिक सहिष्णु है, स्वयं मान की इच्छा न कर दूसरों को मान देता है, वह सदा हरिनाम का कीर्तन करने योग्य है।
स्पष्टीकरण (Clarification)
यह सारांश AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग गुरु सेवा में करके तैयार किया गया है। इसमें त्रुटि हो सकती है। कृपया पूर्ण लाभ के लिए पूरा वीडियो अवश्य देखें।
अहंकार का स्वरूप और भक्ति योग की श्रेष्ठता, अहंकार के जड़-बंधन से चित्-स्वरूप में स्थिति द्वारा भगवत्प्रेम की प्राप्ति
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