श्री भगवत चर्चा
14 November 2025
मन का निग्रह और शरणागति का रहस्य
व्यर्थ चिंतन से मुक्ति, भगवत कृपा, और पूर्ण शरणागति के माध्यम से परम शांति की प्राप्ति
Sri Sri 108 Sri Vinod Baba ji Maharaj
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विस्तार
हमारे प्रिय सद्गुरुदेव बताते हैं:
"
समर्पण माने कर्तृत्व अभिमान को संपूर्ण रूप से परित्याग करना। तुम करा रहे हो, एक भी नाम उच्चारित हो रही है तो यह तुम्हारी कृपा है।
"
🔑 आज के सत्संग के मुख्य शब्द 🔑 Key Words of Today's Satsang
नाम (39)
विषय (23)
वस्तु (22)
धीरे (21)
बाबा (19)
भगवान (19)
चिंतन (19)
चेष्टा (18)
भगवत (17)
श्री (16)
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महत पुरुष की सेवा: मुक्ति का द्वार
भजन से भी श्रेष्ठ: महापुरुष की सेवा का माहात्म्य
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सदगुरुदेव बताते हैं कि महत पुरुष की सेवा मुक्ति का द्वार है। यदि किसी कारणवश भजन में रुचि न हो या समय का अभाव हो, तो महापुरुष की सेवा से सब कुछ प्राप्त हो सकता है। गुरु सेवा तो सर्वोत्तम है क्योंकि गुरु में भगवान, महत और वैष्णव सभी का समावेश होता है।
सदगुरुदेव ने समझाया कि 'महत सेवां द्वारमाहुर्विमुक्तेः', अर्थात महापुरुषों की सेवा मुक्ति का द्वार है। जिनके जीवन में भजन करने का अवसर नहीं मिलता या अनेक बाधाओं के कारण मन भगवत्-चरणों में नहीं लग पाता, उनके लिए यह एक श्रेष्ठ उपाय है। यदि किसी को ऐसे महापुरुष की सेवा का सौभाग्य मिल जाए, तो उसे सब कुछ स्वतः ही प्राप्त हो जाता है। वास्तव में, भजन से भी बढ़कर फल महापुरुष की सेवा में मिलता है। गुरु सेवा तो सर्वोच्च है, क्योंकि गुरु साक्षात भगवान, महत पुरुष और वैष्णव, सब कुछ हैं।
🔗 यह उपदेश सत्संग के आरंभ में ही शरणागति और कृपा-प्राप्ति के सर्वोच्च साधन के रूप में स्थापित किया गया है।
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सदगुरुदेव ने मन की तुलना एक मक्खी से की है। जैसे मक्खी को मिठाई से बार-बार भगाने पर भी वह घूम-फिरकर वहीं आकर बैठ जाती है, वैसे ही हमारा मन भी बार-बार वहीं जाता है जहाँ हमारी रुचि, आसक्ति और दुर्बलता होती है। इसे ज़बरदस्ती नहीं रोका जा सकता।
व्यर्थ चिंतन के प्रश्न पर सदगुरुदेव ने एक सुंदर दृष्टांत दिया। उन्होंने कहा कि हमारा मन एक मक्खी की तरह है। जैसे आप किसी मिठाई पर बैठी मक्खी को भगा भी दें, तो भी वह थोड़ी देर बाद घूम-घूमकर वापस उसी मिठाई पर आकर बैठ जाएगी। ठीक इसी प्रकार, हमारा मन भी बिना किसी विशेष चेष्टा के स्वाभाविक रूप से उन विषयों की ओर भागता है, जहाँ हमारी गहरी रुचि, आसक्ति या दुर्बलता छिपी होती है। मन को बलपूर्वक विषयों से हटाना लगभग असंभव है; समाधान रुचि को बदलने में है, न कि मन से युद्ध करने में।
🔗 यह दृष्टांत मन के निग्रह की समस्या को सरलता से समझाता है, जो आज के सत्संग का एक मुख्य विषय है।
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प्रसंग: श्री जीव गोस्वामी की विनम्रता
प्रसंग: श्री जीव गोस्वामी की शास्त्र-सम्मत समाधान शैली
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सदगुरुदेव ने श्रील जीव गोस्वामी का उदाहरण दिया। यद्यपि वे अपने गुरु-वर्ग श्री रूप गोस्वामी और श्री सनातन गोस्वामी में सबसे छोटे थे, फिर भी अपनी विद्वत्ता के कारण वे ही सब प्रश्नों का समाधान करते थे। वे अपना मत 'मैं कहता हूँ' कहकर नहीं, बल्कि 'शास्त्र और महापुरुष ऐसा कहते हैं' कहकर प्रस्तुत करते थे।
सत्संग में प्रश्न पूछने की महत्ता बताते हुए सदगुरुदेव ने श्रील जीव गोस्वामी का प्रसंग सुनाया। हमारे षड्गोस्वामी जब सत्संग करते थे, तो श्री जीव गोस्वामी आयु में सबसे छोटे थे, परन्तु विद्या में सबसे आगे थे। जब भी कोई गहन प्रश्न उठता, तो उनके गुरु-वर्ग श्री रूप गोस्वामी और श्री सनातन गोस्वामी जैसे महान आचार्य भी कहते, 'जीव को बुलाओ'। श्री जीव गोस्वामी समाधान करते समय कभी यह नहीं कहते थे कि 'मैं ऐसा कहता हूँ'। वे अत्यंत विनम्रता से कहते, 'शास्त्र ऐसा कहते हैं, महापुरुषों के मुख से हमने ऐसा सुना है'। यह बड़ों के बीच में अपनी बात रखने का सही तरीका है।
🔗 यह प्रसंग सत्संग में ज्ञान और विनम्रता के समन्वय को दर्शाता है, जो साधक के लिए अनुकरणीय है।
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पुनर्जन्म से मुक्ति का एकमात्र उपाय
आसक्ति-शून्य हृदय ही मुक्ति का द्वार है
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सदगुरुदेव ने स्पष्ट किया कि पुनर्जन्म का कारण केवल वासना है। दोबारा जन्म न लेने का एक ही उपाय है - हृदय में श्री राधा रानी के चरणों को छोड़कर किसी भी अन्य वस्तु, व्यक्ति या पदार्थ के प्रति किंचित मात्र भी आसक्ति का न रहना। जब आसक्ति शून्य हो जाती है, तभी मुक्ति संभव है।
पुनर्जन्म से कैसे बचें, इस प्रश्न का उत्तर देते हुए सदगुरुदेव ने एक सीधा और स्पष्ट सिद्धांत बताया। जन्म-मृत्यु के चक्र का मूल कारण केवल वासना और आसक्ति है। भगवान किसी जीव को इस चक्र में फँसाना नहीं चाहते। यदि हम इस चक्र से बाहर निकलना चाहते हैं, तो हमें अपने हृदय को टटोलना होगा। अगर श्री जी के चरणों के अतिरिक्त किसी भी सांसारिक वस्तु, पुत्र, कन्या, धन या भोग-पदार्थ के प्रति जरा सी भी आसक्ति शेष है, तो वापस आना ही पड़ेगा। जिस क्षण यह आसक्ति पूरी तरह शून्य हो जाती है, उसी क्षण व्यक्ति शरीर में रहते हुए भी मुक्त हो जाता है।
🔗 यह शिक्षा सत्संग के मुख्य विषय, मोह-माया से मुक्ति और भगवत्-प्राप्ति, का सार प्रस्तुत करती है।
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दृष्टांत: ज्ञान का दीपक और अज्ञान का अंधकार
दृष्टांत: भगवान द्वारा अज्ञान-अंधकार का नाश
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सदगुरुदेव ने भगवान के वचन को उद्धृत करते हुए समझाया कि भगवान स्वयं समर्पित भक्त के हृदय में वास करते हैं। वे वहाँ ज्ञान के प्रकाशमान दीपक को प्रज्वलित करके अज्ञान से उत्पन्न अंधकार का नाश कर देते हैं। यह साधक के प्रयास से नहीं, बल्कि भगवान की अनुकंपा से होता है।
शरणागति की पराकाष्ठा को समझाते हुए सदगुरुदेव ने गीता के एक सुंदर रूपक का वर्णन किया। जब भक्त अपनी बुद्धि और प्रयास से थककर पूर्ण रूप से समर्पित हो जाता है, तब भगवान उस पर विशेष अनुकंपा करते हैं। वे कहते हैं, 'मैं उसके हृदय में स्थित होकर, ज्ञान के तेजस्वी दीपक द्वारा उसके अज्ञान से उत्पन्न घने अंधकार को नष्ट कर देता हूँ।' यहाँ अज्ञान को 'तमः' यानी अंधकार और ज्ञान को 'दीपक' कहा गया है। यह दर्शाता है कि अंतिम शुद्धि और ज्ञान की प्राप्ति ईश्वर की प्रत्यक्ष कृपा से ही होती है, जो साधक के अहंकार-शून्य होने पर ही संभव है।
🔗 यह रूपक शरणागति के परम फल को दर्शाता है, जो आज के सत्संग का केंद्रीय संदेश है।
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कृष्ण भक्ति में मन लगाना
विषय-आसक्ति और कृष्ण भक्ति की चुनौती
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भौतिक विषयों में आसक्त चित्त के लिए कृष्ण भक्ति में मन लगाना अत्यंत कठिन है, इसके लिए सतत प्रयास आवश्यक है।
वक्ता बताते हैं कि जिन व्यक्तियों का मन सांसारिक भोग्य पदार्थों और विषयों में गहराई से आसक्त है, उनके लिए अपने चित्त को उन विषयों से हटाकर भगवान कृष्ण की भक्ति में पूर्ण रूप से संलग्न करना अत्यंत दुष्कर कार्य है। यह केवल बलपूर्वक या चेष्टा करने से संभव नहीं है। मन स्वाभाविक रूप से अपनी रुचि और आसक्ति के स्थलों पर ही जाता है, ठीक वैसे ही जैसे मक्खी बार-बार अपनी पसंद की जगह पर बैठती है। अतः, मन को धीरे-धीरे सांसारिक वस्तुओं से विमुख करके भगवत् चरणों में संलग्न करने का सतत प्रयत्न करना पड़ता है। यह प्रक्रिया सत्संग, एकांतवास, आहार शुद्धि, और संग शुद्धि जैसे साधनों के माध्यम से संभव होती है।
🔗 यह उपदेश मन को सांसारिक आसक्तियों से हटाकर ईश्वर (कृष्ण) में लगाने की प्रक्रिया और उससे जुड़ी चुनौतियों को बताता है, जो सत्संग और साधना के केंद्रीय विषयों में से एक है। यह मन पर नियंत्रण और आध्यात्मिक प्रगति के महत्व को दर्शाता है।
✨ विशेष उल्लेख
📋 चित्त शुद्धि के लक्षण
▶ 20:22
▶ देखें (20:22)
- भगवत चिंतन में हृदय का गदगद हो जाना
- भगवत नाम या कथा से शब्द का गदगद होना
- चित्त का द्रविभूत होकर पिघल जाना
- आनंदाश्रुओं की धारा स्वाभाविक रूप से बहना
✨ समर्पण का वास्तविक अर्थ
▶ 22:24
▶ देखें (22:24)
"सदगुरुदेव ने समझाया कि समर्पण का अर्थ अपने किये हुए कर्म-फल को भगवान को अर्पित करना नहीं है, क्योंकि इसमें 'मैंने किया' का अभिमान छुपा है। वास्तविक समर्पण कर्तृत्व के अभिमान का पूर्ण त्याग है। यह भावना रखना कि 'प्रभु ही करा रहे हैं, उनकी कृपा से ही सब हो रहा है' ही सच्चा समर्पण है।"
🧱 अभिमान युक्त समर्पण
सोचता है: 'मैंने इतना नाम जप किया, अब मैं इसे गुरु को समर्पित करता हूँ।' इसमें कर्तापन का सूक्ष्म अभिमान रहता है।
बनाम
🪔 वास्तविक समर्पण
अनुभव करता है: 'प्रभु की कृपा से ही नाम हो रहा है, यह सब उन्हीं का है।' इसमें कर्तापन का पूर्ण अभाव होता है।
जिज्ञासा (Q&A)
प्रश्न: व्यर्थ का चिंतन कैसे छोड़ें? इसमें बहुत समय खराब हो जाता है।
▶ देखें (5:59)
▶ देखें (5:59)
उत्तर: मन को ज़बरदस्ती रोकने के बजाय, जहाँ आपकी रुचि और आसक्ति है, उसे बदलने का प्रयास करें। सत्संग के माध्यम से भगवत्-चरणों में रुचि बढ़ाएँ, जिससे मन स्वाभाविक रूप से सांसारिक विषयों से हट जाएगा।
उत्तर: सदगुरुदेव ने समझाया कि मन का स्वभाव मक्खी की तरह है, जो बार-बार अपनी रुचि के विषय पर ही जाता है। इसे ज़ोर करके नहीं रोका जा सकता। इसका उपाय है रुचि को बदलना। इसके लिए संत-मुख से हरि कथा श्रवण करके भगवत्-विषयों में रुचि बढ़ानी चाहिए। जब साधक को यह बोध होता है कि सांसारिक वस्तुएँ नीरस हैं और असली आनंद भगवत्-वस्तु में ही है, तो उसका मन धीरे-धीरे विषयों से हटकर भगवान में लगने लगता है। यह प्रक्रिया सत्संग, एकांत वास, और आहार-शुद्धि के माध्यम से संभव होती है।
प्रश्न: नाम जप करते समय भी मन में व्यर्थ चिंतन चलता रहता है, जिसका कोई मतलब नहीं होता। ऐसे में क्या करें?
▶ देखें (11:49)
▶ देखें (11:49)
उत्तर: ऐसी स्थिति में ऊँचे स्वर में कीर्तन करना सर्वोत्तम उपाय है। ज़ोर-ज़ोर से हरिनाम कीर्तन करने का प्रयास करें, क्योंकि नाम और नामी (भगवान) अभिन्न हैं।
उत्तर: सदगुरुदेव ने सलाह दी कि जब नाम जप के दौरान भी मन भटकता है और व्यर्थ के विचार आते हैं, तो उस स्थिति में ज़ोर-ज़ोर से हरिनाम कीर्तन करना चाहिए। नाम स्वयं भगवान का अभिन्न स्वरूप है। नाम का चिंतन, नाम का ध्यान, और नाम का कीर्तन साक्षात भगवत्-चिंतन ही है। ऊँचे स्वर में कीर्तन करने से मन को भटकने का अवसर कम मिलता है और वह नाम की ध्वनि में केंद्रित होने लगता है।
प्रश्न: श्री रामकृष्ण परमहंस ने कहा कि प्रभु को पाने का सरल उपाय उनके लिए आँसू बहाना है। क्या एकांत में श्री जी के लिए आँसू बहाना एक सेवा है जिसे वे स्वीकार करती हैं?
▶ देखें (14:11)
▶ देखें (14:11)
उत्तर: भगवान के लिए आँसू बहाना कोई प्रयास करके की जाने वाली क्रिया नहीं है, यह प्रेम और विरह की एक स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। जब भगवान के लिए तीव्र अभाव बोध होता है, तब आँसू अपने आप आते हैं; ज़बरदस्ती रोने से लाभ नहीं होता।
उत्तर: सदगुरुदेव ने स्पष्ट किया कि भगवत्-प्रेम में अश्रुपात कोई चेष्टा-सापेक्ष कर्म नहीं है। यह तो प्रेम की एक स्वाभाविक परिणति है। जैसे किसी प्रियजन के वियोग में आँसू अपने आप आ जाते हैं, वैसे ही जब भगवान के प्रति तीव्र प्रेम और उनके विरह का गहरा अभाव बोध होता है, तब हृदय द्रवित होकर अश्रुधारा बहने लगती है। यह ज़बरदस्ती करने वाली चीज़ नहीं है। जब यह भाव सच्चा होता है, तो आँसू स्वाभाविक रूप से आते हैं और उन्हें रोकना भी मुश्किल हो जाता है।
प्रश्न: मरने के बाद श्री राधा रानी के चरणों में स्थान मिले और दोबारा जन्म न लेना पड़े, इसके लिए ज्यादा से ज्यादा क्या करें?
▶ देखें (16:04)
▶ देखें (16:04)
उत्तर: पुनर्जन्म से मुक्ति का एक ही मार्ग है - हृदय से हर प्रकार की सांसारिक आसक्ति को शून्य करना। जब श्री राधा रानी के चरणों के अलावा किसी भी वस्तु, व्यक्ति या पदार्थ के प्रति किंचित भी लगाव नहीं रहता, तभी मुक्ति संभव है।
उत्तर: सदगुरुदेव ने बताया कि जन्म और मृत्यु का चक्र केवल वासना के कारण चलता है। इससे छूटने का निश्चित उपाय यह है कि आप अपने हृदय में झाँक कर देखें। यदि श्री जी के चरणों के अलावा किसी भी चीज़ - पुत्र, पुत्री, धन, या कोई अन्य भोग्य वस्तु - के प्रति थोड़ी सी भी आसक्ति बची है, तो जन्म लेना पड़ेगा। जिस क्षण हृदय इस सांसारिक आसक्ति से पूरी तरह खाली हो जाता है, उसी क्षण आप शरीर में रहते हुए भी मुक्त हो जाते हैं।
प्रश्न: जब मैं भगवान का नाम लेता हूँ तो शरीर में झटके लगते हैं और आरती के समय गला भर आता है। ऐसा क्यों होता है?
▶ देखें (19:21)
▶ देखें (19:21)
उत्तर: यह एक बहुत ही शुभ लक्षण है और सौभाग्य की बात है। यह चित्त की शुद्धि को दर्शाता है। जब चित्त शुद्ध होने लगता है, तो भगवत्-चिंतन के समय ऐसे सात्विक भाव स्वाभाविक रूप से प्रकट होते हैं।
उत्तर: सदगुरुदेव ने इसे एक उत्तम और शुभ लक्षण बताया। उन्होंने कहा कि यह चित्त शुद्धि का संकेत है, जो पूर्व जन्मों के संस्कारों के कारण किसी को जल्दी तो किसी को देर से प्राप्त होता है। श्रीमद्भागवत का प्रमाण देते हुए उन्होंने कहा कि जब चित्त शुद्ध होता है, तो भगवत्-चिंतन, गुणानुवाद या नाम-साधन करते समय हृदय गदगद हो जाता है, चित्त द्रवित हो जाता है, और वाणी अवरुद्ध हो जाती है। यह सौभाग्य का सूचक है।
प्रश्न: क्या हम अपने नित्य नाम जप को गुरु को समर्पित कर सकते हैं?
▶ देखें (21:54)
▶ देखें (21:54)
उत्तर: समर्पण का अर्थ है कर्तृत्व के अभिमान का त्याग करना। यह भावना रखना कि 'मैंने जप किया' और अब 'मैं इसे समर्पित करता हूँ' इसमें भी अहंकार है। सच्चा समर्पण यह मानना है कि प्रभु की कृपा से ही नाम हो रहा है, इसमें मेरा कुछ नहीं है।
उत्तर: सदगुरुदेव ने समर्पण का गहरा अर्थ समझाया। उन्होंने कहा कि समर्पण का मतलब यह नहीं है कि हम जप करके उसके फल को गुरु को दे दें। इस भाव में 'मैंने किया' का अहंकार छिपा है। सच्चा समर्पण है कर्तृत्व-अभिमान का पूर्ण परित्याग। साधक को यह भावना रखनी चाहिए कि 'एक भी नाम यदि मुख से निकल रहा है तो यह गुरु और भगवान की कृपा से ही संभव हो रहा है।' यह निराभिमानी अवस्था ही वास्तविक समर्पण है।
प्रश्न: दीक्षा लेने का भाव आने के बाद से भजन में प्रतिकूलताएँ बढ़ गई हैं। क्या मुझे प्रतिकूलता हटाने के लिए फिर से प्रार्थना करनी चाहिए या यह विश्वास रखूँ कि गुरुदेव स्वयं संभाल लेंगे? कहीं मैं लापरवाह तो नहीं हो रहा?
▶ देखें (24:42)
▶ देखें (24:42)
उत्तर: जीव के हाथ में कुछ नहीं है, सब कुछ भगवान ही करा रहे हैं। भजन में आने वाली प्रतिकूलताएँ अक्सर प्रभु की कृपा होती हैं, जो वे साधक का भजन-अहंकार तोड़ने के लिए भेजते हैं। आपको सर्वभाव से उनकी शरणागति का दृढ़ विश्वास रखना चाहिए।
उत्तर: सदगुरुदेव ने गीता के श्लोकों का उद्धरण देते हुए समझाया कि भगवान ही सबके भीतर रहकर सब कुछ करा रहे हैं। साधक का कर्तव्य है कि वह सर्वभाव से उनकी शरण में जाए। कभी-कभी भजन में आने वाली बाधाएँ वास्तव में प्रभु की कृपा होती हैं। वे साधक के भीतर के 'मैं भजन करता हूँ' इस अहंकार को नष्ट करने के लिए ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न करते हैं। इसलिए, निराश होने के बजाय शरणागति को और दृढ़ करना चाहिए और यह विश्वास रखना चाहिए कि उनकी कृपा से ही सारी बाधाएँ दूर होंगी।
प्रश्न: परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करते हुए भी उनसे मोह और ममत्व कैसे दूर करें, ताकि प्रेम सिर्फ श्यामा-श्याम से रहे?
▶ देखें (30:05)
▶ देखें (30:05)
उत्तर: यह भावना लेकर संसार में रहें कि 'मैं शरीर नहीं हूँ और शरीर से संबंधित कोई भी मेरा नहीं है; मैं तो केवल राधा रानी का हूँ।' यह अवस्था उत्तम है, लेकिन प्राप्त करना अत्यंत कठिन है। यह पूर्ण कृपा-सापेक्ष है, इसलिए निरंतर नाम जप और सत्संग करते रहें।
उत्तर: सदगुरुदेव ने कहा कि यह अवस्था सर्वोत्तम है, जहाँ व्यक्ति संसार में रहते हुए भी उससे अलिप्त रहता है। वह यह मानकर चलता है कि 'मैं यह शरीर नहीं हूँ, और शरीर के संबंधी मेरे नहीं हैं, मेरा संबंध तो केवल प्रिया-प्रियतम से है।' हालांकि, ऐसे अभिमान-शून्य होना बहुत ही कठिन है और यह पूरी तरह भगवान की कृपा पर निर्भर करता है। इसके लिए निरंतर सत्संग करते रहना चाहिए और प्रीति-पूर्वक भजन में लगे रहना चाहिए। जब भगवान देखते हैं कि भक्त पूर्ण समर्पित है, तो वे स्वयं उसे ऐसी बुद्धि प्रदान करते हैं जिससे वह मोह से पार हो जाता है।
✅ करें (Do's)
- अपने दोषों को मिटाने के लिए साधु-संग और सत्संग का आश्रय लें।
- अभ्यास द्वारा धीरे-धीरे मन को सांसारिक विषयों से हटाकर भगवत्-चिंतन में लगाने का प्रयास करें।
- सर्वभाव से भगवान के शरणागत हों और यह विश्वास रखें कि वे ही सब कुछ कर और करा रहे हैं।
- परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को मोह और ममत्व से रहित होकर, कर्तव्य-भाव से पूरा करें।
❌ न करें (Don'ts)
- मन को बलपूर्वक या ज़बरदस्ती नियंत्रित करने की कोशिश न करें।
- हृदय में किसी भी सांसारिक वस्तु या व्यक्ति के प्रति किंचित मात्र भी आसक्ति न रखें।
- अपने भजन, जप या साधना का कर्तापन का अभिमान न करें।
- भजन में प्रतिकूलता आने पर घबराएँ नहीं, इसे अहंकार को नष्ट करने वाली प्रभु की कृपा समझें।
शास्त्र प्रमाण (Scriptural References)
इस खंड में वे श्लोक व कथा-प्रसंग सम्मिलित हैं जो सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित किए गए हैं या सत्संग के भाव को समझने में सहायक संदर्भ के रूप में दिए गए हैं।
भगवद् गीता 4.34
Bhagavad Gita 4.34
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सदगुरुदेव ने साधक जीवन में महापुरुष के सान्निध्य, प्रश्न और सेवा की अनिवार्यता को समझाने के लिए इस श्लोक का उल्लेख किया।
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥
tad viddhi praṇipātena paripraśnena sevayā |
upadekṣyanti te jñānaṁ jñāninas tattva-darśinaḥ ||
उस ज्ञान को तुम गुरु के पास जाकर समझो। उनको सादर प्रणाम करने, उनकी सेवा करने और विनम्रतापूर्वक प्रश्न करने पर वे तत्त्वदर्शी महापुरुष तुम्हें उस ज्ञान का उपदेश देंगे।
श्रीमद् भागवतम् 5.5.2
Srimad Bhagavatam 5.5.2
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
यह समझाने के लिए कि महापुरुष की सेवा भजन से भी बढ़कर है और मुक्ति का साक्षात साधन है, इस श्लोक का भावार्थ प्रस्तुत किया गया।
महत्सेवां द्वारमाहुर्विमुक्तेस्तमोद्वारं योषितां सङ्गिसङ्गम्।
महान्तस्ते समचित्ताः प्रशान्ता विमन्यवः सुहृदः साधवो ये॥
mahat-sevāṁ dvāram āhur vimuktes tamo-dvāraṁ yoṣitāṁ saṅgi-saṅgam |
mahāntas te sama-cittāḥ praśāntā vimanyavaḥ suhṛdaḥ sādhavaḥ ye ||
विवेकी पुरुष महापुरुषों की सेवा को मुक्ति का द्वार कहते हैं और स्त्री-संगी लोगों के संग को नरक का द्वार कहते हैं। महान पुरुष वे हैं जो समदर्शी, परम शांत, क्रोधरहित, दयालु और सबके हितैषी होते हैं।
भगवद् गीता 8.8
Bhagavad Gita 8.8
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
मन को व्यर्थ चिंतन से हटाकर भगवान में लगाने के लिए निरंतर अभ्यास के महत्व को बताने हेतु इस श्लोक का उल्लेख किया गया।
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्॥
abhyāsa-yoga-yuktena cetasā nānya-gāminā |
paramaṁ puruṣaṁ divyaṁ yāti pārthānucintayan ||
हे पार्थ! जो व्यक्ति अभ्यास-योग से युक्त होकर, विचलित हुए बिना अपने मन से परम दिव्य पुरुष का निरंतर चिंतन करता है, वह उन्हीं को प्राप्त होता है।
चैतन्य चरितामृत (quoting Padma Purana) CC Madhya 8.200
Chaitanya Charitamrita (quoting Padma Purana) CC Madhya 8.200
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सदगुरुदेव ने इस भाव को व्यक्त करते हुए कहा कि जो व्यक्ति विषय-सान्निध्य, विषय-संपर्क, और विषय-सेवन में लगा रहता है, उसके लिए कृष्ण भक्ति प्राप्त करना संभव नहीं है।
विषयाविष्टचित्तानां कृष्णभक्तिः सुदुर्लभा।
viṣayāviṣṭa-cittānāṁ kṛṣṇa-bhaktiḥ sudurlabhā
जिनका चित्त विषयों में आसक्त है, उनके लिए कृष्ण भक्ति अत्यंत दुर्लभ है।
भगवद् गीता 15.7
Bhagavad Gita 15.7
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
यह बताने के लिए कि जीव मूलतः भगवान का ही अंश है, पर अपनी वासनाओं के कारण प्रकृति में बँधकर संसार चक्र में घूमता है।
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥
mamaivāṁśo jīva-loke jīva-bhūtaḥ sanātanaḥ |
manaḥ-ṣaṣṭhānīndriyāṇi prakṛti-sthāni karṣati ||
इस संसार में प्रत्येक जीव मेरा ही सनातन अंश है, परन्तु वह प्रकृति में स्थित मन सहित छह इन्द्रियों के द्वारा घोर संघर्ष कर रहा है।
श्रीमद् भागवतम् 11.14.24
Srimad Bhagavatam 11.14.24
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सदगुरुदेव ने चित्त शुद्धि के लक्षणों का वर्णन करते हुए इस श्लोक का भावार्थ समझाया, कि कैसे शुद्ध भक्त में स्वाभाविक रूप से सात्विक भाव प्रकट होते हैं।
वाग्गद्गदा द्रवते यस्य चित्तं
रुदत्यभीक्ष्णं हसति क्वचिच्च ।
विलज्ज उद्गायति नृत्यते च
मद्भक्तियुक्तो भुवनं पुनाति ॥
vāg-gadgadā dravate yasya cittaṁ
rudaty abhīkṣṇaṁ hasati kvacic ca |
vilajja udgāyati nṛtyate ca
mad-bhakti-yukto bhuvanaṁ punāti ||
जिसकी वाणी प्रेम से गद्गद हो जाती है, जिसका चित्त द्रवित हो जाता है, जो बार-बार रोता है और कभी-कभी हँसता है, जो लाज छोड़कर ऊँचे स्वर में गाता है और नाचता है - ऐसा मेरा भक्त सारे संसार को पवित्र कर देता है।
भगवद् गीता 18.61
Bhagavad Gita 18.61
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
यह समझाने के लिए कि कर्ता जीव नहीं, बल्कि ईश्वर हैं, और साधक को इसी भाव से शरणागत होना चाहिए।
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥
īśvaraḥ sarva-bhūtānāṁ hṛd-deśe 'rjuna tiṣṭhati |
bhrāmayan sarva-bhūtāni yantrārūḍhāni māyayā ||
हे अर्जुन! ईश्वर सभी जीवों के हृदय में निवास करते हैं और अपनी माया शक्ति द्वारा उन्हें एक यन्त्र पर आरूढ़ कठपुतलियों की भाँति घुमाते हैं।
भगवद् गीता 18.62
Bhagavad Gita 18.62
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
पूर्व श्लोक के बाद, यह बताते हुए कि जब ईश्वर ही सब कुछ करा रहे हैं, तो साधक का एकमात्र कर्तव्य सर्वभाव से उनकी शरण लेना है।
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्॥
tam eva śaraṇaṁ gaccha sarva-bhāvena bhārata |
tat-prasādāt parāṁ śāntiṁ sthānaṁ prāpsyasi śāśvatam ||
हे भारत! तुम सब प्रकार से केवल उन्हीं की शरण में जाओ। उनकी कृपा से ही तुम परम शांति तथा शाश्वत परमधाम को प्राप्त होगे।
भगवद् गीता 18.58
Bhagavad Gita 18.58
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
शरणागति के फल और अहंकार के दुष्परिणाम को स्पष्ट करने के लिए भगवान के इस आश्वासन का उल्लेख किया गया।
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥
mac-cittaḥ sarva-durgāṇi mat-prasādāt tariṣyasi |
atha cet tvam ahaṅkārān na śroṣyasi vinaṅkṣyasi ||
मुझमें चित्त लगाकर तुम मेरी कृपा से समस्त बाधाओं को पार कर जाओगे। किन्तु यदि अहंकार के कारण मेरी बात नहीं सुनोगे, तो तुम नष्ट हो जाओगे।
भगवद् गीता 10.10
Bhagavad Gita 10.10
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
यह बताने के लिए कि भगवान स्वयं समर्पित भक्त को भीतर से प्रेरणा और बुद्धि देते हैं, जिससे वह मोह से पार हो जाता है।
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥
teṣāṁ satata-yuktānāṁ bhajatāṁ prīti-pūrvakam |
dadāmi buddhi-yogaṁ taṁ yena mām upayanti te ||
जो भक्त निरंतर प्रीतिपूर्वक मेरा भजन करते हैं, मैं उन्हें वह दिव्य बुद्धि प्रदान करता हूँ, जिससे वे मुझ तक पहुँच सकते हैं।
भगवद् गीता 10.11
Bhagavad Gita 10.11
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
यह दर्शाने के लिए कि जब भक्त पूर्ण समर्पित हो जाता है, तो भगवान स्वयं उसके अज्ञान को नष्ट करने का भार उठा लेते हैं।
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥
teṣām evānukampārtham aham ajñāna-jaṁ tamaḥ |
nāśayāmy ātma-bhāvastho jñāna-dīpena bhāsvatā ||
उन पर विशेष कृपा करने के लिए मैं उनके हृदय में स्थित होकर ज्ञान के प्रकाशमान दीपक द्वारा अज्ञान से उत्पन्न अंधकार को नष्ट कर देता हूँ।
स्पष्टीकरण (Clarification)
यह सारांश AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग गुरु सेवा में करके तैयार किया गया है। इसमें त्रुटि हो सकती है। कृपया पूर्ण लाभ के लिए पूरा वीडियो अवश्य देखें।
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