श्री भगवत चर्चा
02 February 2026
श्री नित्यानंद प्रभु की दिव्य बाल लीला
श्री नित्यानंद प्रभु की दिव्य बाल लीला
Sri Sri 108 Sri Vinod Baba ji Maharaj
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विस्तार
हमारे प्रिय सद्गुरुदेव बताते हैं:
"
जो भगवत प्रेमी होता है वो संत प्रेमी भी होते हैं। भगवान में प्रेम है और संत में प्रेम नहीं, यह तो ढोंगी है।
"
"
संत सेवा से भगवान बहुत अधिक प्रसन्न होते हैं। 56 भोग लगा कर के आप ठाकुर जी को प्रसन्न नहीं कर सकते जितना एक संत की सेवा से।
"
"
अह भक्त पराधीन - हम भक्त के अधीन है। भक्त प्रेम में हमको इस तरह से फसा लेते हैं कि मैं अपने भगवत्ता तक भूल जाता हूं।
"
नित्यानंद प्रभु (15)कुबेर (12)संत सेवा (8)भगवत प्रेमी (6)तीर्थ यात्रा (5)महाप्रभु (10)हराई पंडित (4)बलराम (4)वृंदावन (3)
🔍 सत्संग सार (Executive Summary)
इस सत्संग में सद्गुरुदेव ने श्री नित्यानंद प्रभु की अद्भुत बाल्य लीलाओं का वर्णन किया है। बालक कुबेर (नित्यानंद) कैसे राम-लक्ष्मण की लीला का अभिनय करते थे, यह सुनाया गया। भगवत-प्रेमी का वास्तविक लक्षण संत-प्रेम है, यह सिद्धांत प्रतिपादित किया गया। श्री हराई पंडित और पद्मा देवी की संत-सेवा तथा एक सन्यासी द्वारा कुबेर को तीर्थ यात्रा हेतु मांगने की हृदयद्रावक कथा सुनाई गई। तीर्थों के आधुनिकीकरण पर सामाजिक कटाक्ष करते हुए भक्ति-भाव के क्षरण पर चिंता व्यक्त की गई। महाप्रभु के गया-गमन और भक्तों के समक्ष स्वरूप-प्रदर्शन का वर्णन किया गया।
🧱 ज्ञान प्रवाह
graph TD
A["बालक कुबेर की बाल लीला"] --> B["राम-लक्ष्मण लीला प्रकटन"]
B --> C["संजीवनी बूटी नाटक"]
A --> D["ग्रामवासियों में प्रेम"]
D --> E["तत्व-सिद्धांत वचन"]
F["भगवत-प्रेमी का लक्षण"] --> G["संत-प्रेम अनिवार्य"]
G --> H["संत सेवा से भगवत प्रसन्नता"]
H --> I["वैष्णव सेवा परम उपाय"]
J["सन्यासी का आगमन"] --> K["हराई पंडित की सेवा"]
K --> L["कुबेर की मांग"]
L --> M["प्रतिज्ञा और विरह"]
M --> N["तीर्थ यात्रा प्रारंभ"]
O["सामाजिक कटाक्ष"] --> P["तीर्थों का शहरीकरण"]
P --> Q["भक्ति-भाव का क्षरण"]
N --> R["वृंदावन में बलराम-भाव"]
R --> S["महाप्रभु के प्रकटन की प्रतीक्षा"]
S --> T["महाप्रभु का गया-गमन"]
T --> U["श्रीवास पंडित को स्वरूप दर्शन"]
U --> V["भक्तों को स्वरूप प्रदर्शन"]
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📖 आज की शिक्षाएं 📖 आज की विस्तृत शिक्षाएं
बालक कुबेर की अलौकिक लीलाएं
श्री नित्यानंद प्रभु की बाल्यावस्था में राम-कृष्ण लीला प्रकटन का वर्णन
🎭
राम-लक्ष्मण लीला का नाटक
बालक कुबेर द्वारा संजीवनी बूटी लीला का अद्भुत प्रकटन
▶ देखें (0:01)
▶ Watch (0:01)
बालक कुबेर (श्री नित्यानंद प्रभु का बचपन का नाम) ने एक दिन अचेत होकर गिर गए। उनके शरीर में कोई चेतना नहीं थी - नाक में रूई पकड़ने पर भी कोई हलचल नहीं होती थी। माता-पिता श्री हराई पंडित और पद्मा देवी रोना-पीटना शुरू कर दिए। वास्तव में यह राम-लीला का नाटक था जिसमें लक्ष्मण मूर्छित हो गए थे। जब किसी ने हनुमान जी को संजीवनी बूटी लाने की याद दिलाई, तब एक बनावटी पत्थर और पुष्प फेंकने पर 'जय श्री राम' के उद्घोष से वे सचेत हो गए। सद्गुरुदेव बताते हैं कि यही पूर्व लीला में लक्ष्मण थे और यही बलराम थे।
🔗 नित्यानंद प्रभु की दिव्यता का प्रमाण उनकी बाल लीलाओं में
📌 लीला के विशेष बिंदु:
- बालक कुबेर बिल्कुल अचेतन होकर गिर गए
- हनुमान की भूमिका निभाने वाले सब भूल गए
- जय श्री राम के उद्घोष से सचेत हुए
- नित्य नवीन कृष्ण लीला और राम लीला का प्रकटन
✨
बालक कुबेर का ग्रामवासियों में प्रभाव
अद्भुत तत्व-ज्ञान और सिद्धांत-निपुणता से ग्रामवासियों का आश्चर्य
▶ देखें (2:08)
▶ Watch (2:08)
बालक कुबेर की अद्भुत भाव-चेष्टा और सुंदरता से पूरा ग्राम मोहित था। प्रतिदिन लोग उनके दर्शन हेतु आते थे। श्री हराई पंडित को सब हराई बोलते और कुबेर को सबके प्राण स्वरूप मानते थे। सद्गुरुदेव बताते हैं कि इतने छोटे बालक ने कभी कोई ज्ञान नहीं लिया था, फिर भी परतत्व विषय में ऐसे सिद्धांत कह बैठते थे कि बड़े-बड़े पंडित भी चकित हो जाते थे। जब भी कोई विशेष प्रश्न होता, हराई पंडित स्वयं कुबेर से पूछते - 'तू ही बता कौन सा कर्म करना ठीक है' और वे सदैव सही मार्गदर्शन देते थे।
🔗 दिव्य पुरुषों में स्वाभाविक ज्ञान का प्रकटन
📌 कुबेर की विशेषताएं:
- अद्भुत भाव-चेष्टा और सुंदरता
- बिना शिक्षा के तत्व-सिद्धांत का ज्ञान
- पिता को भी मार्गदर्शन देना
- ग्रामवासियों के प्राण स्वरूप
भगवत-प्रेमी का वास्तविक लक्षण: संत-प्रेम
संत सेवा की महिमा और भगवत-प्रेम के साथ इसका अनिवार्य संबंध
💖
भगवत-प्रेमी का अनिवार्य लक्षण
जो भगवत-प्रेमी है वह अनिवार्य रूप से संत-प्रेमी भी होता है
▶ देखें (3:33)
▶ Watch (3:33)
एक बार एक दिव्य सन्यासी आए और श्री हराई पंडित ने बड़े आदर से उनका सत्कार किया। पद्मा देवी और हराई पंडित दोनों भगवत-प्रेमी एवं संत-प्रेमी थे। सद्गुरुदेव सिद्धांत प्रतिपादित करते हैं कि जो भगवत-प्रेमी होता है वह संत-प्रेमी भी होता है। भगवान में प्रेम है और संत में प्रेम नहीं - यह तो ढोंग है, ऐसा होता नहीं है। यह स्वाभाविक मनोविज्ञान है - जिनसे प्रेम है, उनके संबंधी वस्तु और संबंधी व्यक्तियों से भी उतना ही प्रेम होता है। जैसे किसी प्रेमी जन का बेटा आए तो उसके प्रति भी प्रेम स्वतः बढ़ जाता है। सद्गुरुदेव इस सिद्धांत की पुष्टि हेतु भगवान के वचनों का उल्लेख करते हैं।
🔗 भक्ति का मूलभूत सिद्धांत
⚖️ प्रेम का स्वभाव
वास्तविक भगवत-प्रेमी: भगवान और संत दोनों में प्रेम रखता है
ढोंगी भक्त: केवल भगवान में प्रेम का दावा, संत में उपेक्षा
🙏
संत सेवा की महिमा
संत सेवा से भगवान की प्रसन्नता: वैष्णव सेवा परम उपाय
▶ देखें (5:31)
▶ Watch (5:31)
संत-प्रेमी भगवत-भक्तों को संत में अधिक प्रेम होता है क्योंकि संत के मुख से निश्चित हरि-कथामृत सुधापान मिलता है और संत-सानिध्य से परम शांति प्राप्त होती है। सद्गुरुदेव बताते हैं कि संत सेवा से भगवान बहुत अधिक प्रसन्न होते हैं - भगवत सेवा से, विग्रह सेवा से, 56 भोग लगाकर आप ठाकुर जी को उतना प्रसन्न नहीं कर सकते जितना एक संत की सेवा से उनकी प्रसन्नता संपादन कर सकते हैं। 'वैष्णव सेवा परम उपाय' - यह सिद्धांत है। भगवान स्वयं कहते हैं कि जो मेरा भजन करने की इच्छा रखता है, उसे मेरे भजन की जरूरत नहीं क्योंकि मैं आत्माराम, आप्तकाम, पूर्णकाम हूं।
🔗 संत सेवा भक्ति का सर्वोच्च साधन
भगवान की सर्वव्यापकता का सिद्धांत— भगवद् गीता Bhagavad Gita 7.7
▶ 6:33
संदर्भ
पूरक संदर्भ
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥
mattaḥ parataraṁ nānyat kiñcid asti dhanañjaya |
mayi sarvam idaṁ protaṁ sūtre maṇi-gaṇā iva ||
हे धनंजय! मुझसे परे कोई तत्व नहीं है। सब कुछ मुझमें सूत्र में मणियों के समान पिरोया हुआ है।
📌 संत सेवा की विशेषताएं:
- संत मुख से हरि-कथामृत सुधापान
- संत सानिध्य से परम शांति
- 56 भोग से अधिक प्रसन्नता संत सेवा से
- वैष्णव सेवा परम उपाय है
💝
भगवान कहते हैं कि जगत में कौन सा वस्तु तुम्हारा है जो तुम मुझे दोगे? समस्त सृष्टि रचना करके, समस्त प्रकृति संपदा तुम्हारे जीने के लिए मैंने रची है - मैं तुम्हारी सेवा करता हूं, तुम मेरी क्या सेवा करोगे? फिर भगवान अपनी एकमात्र दुर्बलता बताते हैं - 'अह भक्त पराधीन' - हम भक्त के अधीन हैं। भक्त प्रेम में हमको इस तरह फसा लेते हैं कि मैं अपनी भगवत्ता तक भूल जाता हूं। सद्गुरुदेव बताते हैं कि भगवान देना चाहते हैं परंतु परम प्रेमी भक्त कभी मांगते नहीं। उनके मन में कोई कामना नहीं - निष्प्रिय हृदय। उनकी एकमात्र इच्छा है कि उनके इष्ट कैसे प्रसन्न हो जाएं - इष्ट की प्रसन्नता संपादन ही उनके साधन का एकमात्र कारण है।
🔗 भक्त-भगवान के प्रेम का रहस्य
भगवान की भक्त-पराधीनता— श्रीमद् भागवतम् Srimad Bhagavatam 9.4.63
▶ 7:16
संदर्भ
पूरक संदर्भ
अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज।
साधुभिर्ग्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः॥
ahaṁ bhakta-parādhīno hy asvatantra iva dvija |
sādhubhir grasta-hṛdayo bhaktair bhakta-jana-priyaḥ ||
हे द्विज! मैं भक्त के पराधीन हूं, मानो स्वतंत्र नहीं हूं। साधुओं ने मेरे हृदय को ग्रस्त कर लिया है और मैं भक्तों का प्रिय हूं।
⚖️ भक्त के प्रकार
सकाम भक्त: कामना लेकर भगवान की उपासना, विपत्ति में याद करना, पूजा के माध्यम से मांगना
परम प्रेमी भक्त: कभी नहीं मांगते, अपने लिए कुछ नहीं चाहते, निष्प्रिय हृदय, केवल इष्ट की प्रसन्नता चाहते हैं
🏠
अतिथि सेवा और साधु सेवा की परंपरा
सनातन धर्म में अतिथि सेवा और साधु सेवा का विशेष महत्व
▶ देखें (9:23)
▶ Watch (9:23)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि अतिथि (अनजान व्यक्ति जो द्वार पर आए) की सेवा का विशेष महत्व है। अतिथि अनादृत होकर यदि घर से निकल जाए तो विशेष अमंगल होता है - ऐसी मान्यता थी पहले। साधु आ जाएं तो मान लो भगवान आ गए - ऐसी भावना सभी भगवत-भक्तों के भीतर थी। हमारे सनातन धर्म भक्ति मार्ग अवलंबी साधकों में ऐसी भावना थी कि साधु सेवा, संत सेवा करने की प्रेरणा है क्योंकि भगवान को हम कहां प्राप्त करेंगे? संत आ गया मान लो भगवान आ गया। संत सेवा से भगवान प्रसन्न होते हैं - आदर के साथ संत को सेवा करो। ऐसी भावना से हराई पंडित ने जब एक संत आए तो बड़े प्रसन्न होकर उनकी खूब सेवा की।
🔗 सनातन धर्म की सेवा परंपरा
✅ करें:
- अतिथि की आदरपूर्वक सेवा करें
- साधु को भगवान समझकर सेवा करें
❌ न करें:
- अतिथि को अनादृत करके न भेजें
सन्यासी द्वारा कुबेर की मांग: प्राण-वियोग की कथा
संत को वचन देना और प्राणसम पुत्र का त्याग
🎁
सन्यासी की भिक्षा: बालक कुबेर
हराई पंडित का वचन और सन्यासी द्वारा कुबेर की मांग
▶ देखें (10:55)
▶ Watch (10:55)
सेवा के पश्चात जब संत विदा होने लगे, हराई पंडित ने कहा - 'महाराज, हम तो गरीब ब्राह्मण हैं, कौन सा वस्तु देकर आपको प्रसन्न करेंगे?' संत ने कहा कि एक वस्तु चाहिए जो आपके देने लायक है और मेरी बहुत जरूरत भी है। हराई पंडित ने आचमन करके प्रतिज्ञा की। तब सन्यासी ने कहा - 'मैं तीर्थ यात्रा करता हूं, मेरे साथ कोई सेवक नहीं है। आपका बालक कुबेर चाहिए - इसे अच्छा संत बनाऊंगा, पंडित बनाऊंगा, विद्वान बनाऊंगा और तीर्थ-तीर्थ घूमेंगे।' सद्गुरुदेव बताते हैं कि एक वंश में यदि एक वैष्णव हो जाए तो 21-27 पीढ़ियों का उद्धार हो जाता है।
🔗 वंश में संत होने का फल
📌 वंश में वैष्णव का महत्व:
- एक वंश में एक वैष्णव होने से 21-27 पीढ़ी का उद्धार
- बिना साधना के वंश उद्धार संभव
- संत परिवार के लिए मंगलकारी
💔
प्राणसम पुत्र का विरह
हराई पंडित का हृदयद्रावक त्याग और खुशी से दान का सिद्धांत
▶ देखें (13:07)
▶ Watch (13:07)
वचन दे चुके थे तो देना पड़ेगा - अब रोना-पीटना शुरू हो गया। 'हमारा एक मात्र जीने का आधार, हमारा प्राण सम है कुबेर - इसको देखकर जिएंगे कैसे?' कुबेर भी तैयार हो गए - धोती-कुर्ता पहनकर तीर्थ पर्यटन के लिए। सन्यासी ने कहा - 'दुखी होकर जो वस्तु देते हैं वह दान में कोई मायने नहीं रखता। खुशी से, हासी मुख से देना पड़ेगा।' बड़े कष्ट से एक टेढ़ी मुस्कान के साथ पुत्र को दिए। साधु महाराज चल दिए, सीधा पीछे मोड़कर भी नहीं देखा। हराई पंडित, पद्मा देवी और ग्रामवासी सब गिर गए, बहुत रोए।
🔗 त्याग और दान की शुद्धता
📌 दान का सिद्धांत:
- दुखी होकर दिया दान मायने नहीं रखता
- खुशी से, हासी मुख से देना चाहिए
- वचन दिए हैं तो प्रतिज्ञा पालन अनिवार्य
सामाजिक कटाक्ष: तीर्थों का आधुनिकीकरण
तीर्थ भूमियों में भक्ति-भाव के क्षरण पर चिंता
🏙️
तीर्थों का शहरीकरण और भक्ति-भाव का क्षरण
सामाजिक कटाक्ष: तीर्थ भूमियों में पाश्चात्य प्रभाव और भक्ति-भाव की हानि
▶ देखें (13:37)
▶ Watch (13:37)
सद्गुरुदेव तीर्थों की वर्तमान दशा पर सामाजिक कटाक्ष करते हैं। पहले तीर्थ पर्यटन का बहुत महिमा था, अब बहुत सारे तीर्थ लुप्त हो गए, सब शहर हो गए। बहुत सारी जातियां आकर तीर्थों की महिमा को क्षुण्ण कर दी। एक उदाहरण देते हैं - बंगाल से आए एक भक्त 'कामवन' जाना चाहते थे, सोचते थे वन प्रदेश होगी जहां एकांत में साधु भजन करते हों, परंतु वहां पहुंचकर देखा तो शहर है! 50 साल पहले हरिद्वार और ऋषिकेश के बीच जंगल ही जंगल था, आज जाइए तो लगेगा जैसे वाशिंगटन आ गए हैं। बड़े-बड़े मकान, शहर, गाड़ियां - भक्ति का भाव कुछ दिखता नहीं। पश्चिमी कल्चर का प्रभाव समाज जीवन में ऐसा प्रभावित कर दिया कि तरुण-तरुणियों के चलन-बलन देखकर भक्त को अटपटा लगेगा - 'यह क्या हरिद्वार है? तीर्थ भूमि है?'
🔗 आधुनिकता का आध्यात्मिक प्रभाव
⚖️ तीर्थ का परिवर्तन
पहले का तीर्थ: एकांत, वन प्रदेश, साधु भजन करते, गंगा किनार शांति, भक्ति भाव
आज का तीर्थ: शहरीकरण, बड़े मकान, पाश्चात्य प्रभाव, भक्ति भाव का अभाव
📌 तीर्थ यात्रा की पुरानी परंपरा:
- वानप्रस्थ आश्रम में तीर्थ यात्रा
- 10-15-20 साल बाद लौटना
- तीर्थ यात्री का चरण धोकर पान करना
- तीर्थ करके आए व्यक्ति को पवित्र मानना
वृंदावन में बलराम-भाव और महाप्रभु की प्रतीक्षा
नित्यानंद प्रभु का वृंदावन आगमन और पूर्वस्मृति जागरण
🌳
वृंदावन में बलराम-स्मृति का प्राकट्य
तीर्थ यात्रा का समापन और वृंदावन में बलराम-भाव का जागरण
▶ देखें (17:58)
▶ Watch (17:58)
सारा तीर्थ भ्रमण करते-करते दक्षिण भारत से लेकर सारा भारत भूमि पर्यटन किए। उन सन्यासी के विषय में कोई कहते हैं श्री ईश्वर पुरी जी थे (महाप्रभु के गुरुदेव), कोई कहते हैं श्री माधवेंद्र पुरी जी थे - वास्तव में इतिहास का कोई प्रामाणिक प्रमाण नहीं मिलता। गुरुदेव ने उनको समस्त शक्ति संचार करके दीक्षा दी और नित्य लीला में प्रवेश कर गए। उसके बाद सीधे वृंदावन आए। वृंदावन में आकर उनकी पूर्वस्मृति जागृत हुई - साक्षात बलराम जान गए कि 'हम तो बलराम हैं, इस तरह से लीला प्रकटन करने के लिए कलियुग में आए हैं।' ध्यान करके जान लिए कि हमारे भैया कन्हैया अब अवतीर्ण होने वाले हैं।
🔗 अवतार का उद्देश्य
📌 नित्यानंद प्रभु का मिशन:
- सनातन धर्म की प्रगति
- भक्ति धर्म को आगे बढ़ाना
- प्रेम धर्म का प्रचार
- दिव्य प्रेम प्रदान करना जो कलियुग में किसी को नहीं मिला
🎺
ग्वारिया वेष में महाप्रभु की प्रतीक्षा
वृंदावन में नील वसन और सिंगा धारण कर भैया की प्रतीक्षा
▶ देखें (19:53)
▶ Watch (19:53)
वृंदावन में नित्यानंद प्रभु सन्यासी वेश में नहीं थे - नील वसन (नीले वस्त्र) पहने, सिंगा रखे, ग्वारिया वेश धारण करके दिन व्यतीत कर रहे थे। चिंतन कर रहे थे - 'कब हमारे भैया अवतीर्ण होंगे, अपने को प्रकाश करेंगे - अवतीर्ण नहीं, प्रकाश करेंगे - तभी हम जाएंगे।' इतने में महाप्रभु अवतीर्ण हुए, बाल्य लीला समाप्त करके विद्या अध्ययन लीला की।
🔗 दो भाइयों का दिव्य प्रेम
महाप्रभु का प्रेम प्रकटन और स्वरूप दर्शन
गया में दीक्षा, प्रेम प्रकटन और भक्तों को स्वरूप प्रदर्शन
✨
गया में दीक्षा और प्रेम प्रकटन
महाप्रभु का गया-गमन, ईश्वर पुरी से दीक्षा और अलौकिक प्रेम विकार
▶ देखें (20:24)
▶ Watch (20:24)
महाप्रभु गया में गए और वहां श्री ईश्वर पुरी से दीक्षा प्राप्त की। दीक्षा के बाद उनके अंदर अलौकिक प्रेम प्रकटन हुआ - स्वाभाविक दिव्य प्रेम। ऐसा प्रेम विकार लोक में दिखता नहीं है। इसे देखकर सब बहुत प्रभावित हो गए - 'यह कोई साधारण मनुष्य नहीं, यह तो ईश्वर कोटि का कोई महापुरुष है।'
🔗 अलौकिक प्रेम का प्रकटन
🙏
श्रीवास पंडित को स्वरूप दर्शन
श्रीवास पंडित के समक्ष चतुर्भुज स्वरूप प्रकाश
▶ देखें (21:16)
▶ Watch (21:16)
एक दिन श्री श्रीवास पंडित के घर जाकर महाप्रभु ने आत्म-प्रकाश किया - 'हे श्रीवाशिया, देख ले मैं कौन हूं! इतने दिन तेरे को पता नहीं, मैं आया हूं, मेरे को जाना नहीं।' श्रीवास पंडित मंदिर में पूजा कर रहे थे। दरजा खोलकर देखते हैं - साक्षात पूर्ण ब्रह्म सनातन, चतुर्भुज, शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी विराजमान हैं। देखकर अचेत हो गए। फिर महाप्रभु ने शक्ति संचार करके उन्हें सचेत किया। 'हमको बैठने के लिए आसन दो' - तो ठाकुर जी के आसन पर विराजमान हुए।
🔗 भगवान का आत्म-प्रकाश
📌 स्वरूप दर्शन के बिंदु:
- पूर्ण ब्रह्म सनातन
- चतुर्भुज स्वरूप
- शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी
- श्रीवास पंडित अचेत हुए
👥
समस्त भक्तों को स्वरूप प्रदर्शन
एक-एक भक्त को बुलाकर अपना स्वरूप दिखाना और मुरारी गुप्त का राम दर्शन
▶ देखें (21:57)
▶ Watch (21:57)
उसके बाद 'बुलाओ समस्त भक्त वृंदों को' - एक-एक करके सबको बुलाया। श्री मुकुंद से लेकर श्री श्रीधर तक जितने प्रिय पार्षद थे सबको बुलाकर दिखाए - 'देखो मैं कौन हूं, मन में भ्रम नहीं रखना।' सद्गुरुदेव बताते हैं कि एकमात्र श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु ने कभी मुख से नहीं कहा 'मैं भगवान हूं', लेकिन बुला-बुलाकर सबको अपना स्वरूप प्रदर्शन किए। श्री मुरारी गुप्त (साक्षात हनुमान जी के अवतार) राम उपासक थे - उन्होंने राधा-कृष्ण नहीं, राम दरबार देखा। राम-सीता-भरत-लक्ष्मण-हनुमान देखकर मूर्छित हो गए और वहीं राम जी का अष्टक रचना किए।
🔗 भगवान की विनम्र भगवत्ता
📌 महाप्रभु की विशेषता:
- कभी मुख से 'मैं भगवान हूं' नहीं कहा
- स्वरूप प्रदर्शन से भ्रम निवारण
- प्रत्येक भक्त को उनकी उपासना के अनुसार दर्शन
- मुरारी गुप्त को राम दरबार दिखाया
📚
चैतन्य चरितामृत की प्रामाणिकता
मुरारी गुप्त का कर्चा और चैतन्य चरितामृत: प्रामाणिक ग्रंथ
▶ देखें (24:42)
▶ Watch (24:42)
सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि महाप्रभु की लीला इतिहास कहती है, यह कोई अपने इष्ट को बढ़ा-चढ़ाकर कहना नहीं है। श्री मुरारी गुप्त का कर्चा प्रामाणिक ग्रंथ है - उस समय का प्रमाण ग्रंथ है महाप्रभु के विषय जानने के लिए। उसी का विषद विवरण चैतन्य चरितामृत में मिलेगा। महाप्रभु की लीला शास्त्रीय आधार और ऐतिहासिक भित्ति पर लिखी गई है - कोई काल्पनिक शब्द नहीं है। चैतन्य चरितामृत गौड़ीय वैष्णव समाज में विशेष प्रामाण्य ग्रंथ है। इस ग्रंथ में समस्त तत्व निहित है - जीव तत्व, सृष्टि तत्व, लीला तत्व, प्रेम तत्व, भगवत तत्व, कृष्ण तत्व, परमार्थ तत्व। वेद प्रमाण आदि देकर निचोड़ निष्कर्ष प्रस्तुत है।
🔗 गौड़ीय वैष्णव साहित्य का महत्व
📌 चैतन्य चरितामृत की विशेषताएं:
- जीव तत्व, सृष्टि तत्व, लीला तत्व का निचोड़
- प्रेम तत्व, भगवत तत्व, कृष्ण तत्व का विवरण
- परमार्थ तत्व का समावेश
- वेद प्रमाण सहित निष्कर्ष
- इस ग्रंथ के अध्ययन से अन्य शास्त्र की आवश्यकता नहीं
दो भाइयों का अलौकिक मिलन
नंदन आचार्य के घर पर नित्यानंद और महाप्रभु का प्रथम मिलन
🚗
तालध्वज रथ का स्वप्न
महाप्रभु का स्वप्न: वृंदावन से आए दिव्य पुरुष की खोज
▶ देखें (26:26)
▶ Watch (26:26)
सद्गुरुदेव रथों के चिह्नों का वर्णन करते हैं - श्री कृष्ण के रथ पर गरुड़ध्वज (बंदर की मूर्ति), श्री अर्जुन के रथ पर कपिध्वज, और श्री बलराम के रथ पर तालध्वज (ताल पेड़ का चिह्न)। महाप्रभु ने स्वप्न में देखा कि एक तालध्वज रथ उनके द्वार पर आया है। कहते हैं - 'एक दिव्य पुरुष वृंदावन से आए हैं, तुम लोग जानते हो? ऐसे पुरुष तो हमने कभी देखा नहीं इस कलियुग में।' श्री नित्यानंद प्रभु जान गए कि हमारे भैया कन्हैया ने अपने को प्रकाश किया है, अपना स्वरूप प्रकट किया है, दिव्य लीला में निमग्न हैं और जीवों को प्रेम प्रदान करने में तत्पर हैं।
📌 रथ ध्वज चिह्न:
- कृष्ण का रथ - गरुड़ध्वज
- अर्जुन का रथ - कपिध्वज (बंदर)
- बलराम का रथ - तालध्वज (ताल वृक्ष)
दो भाइयों का दिव्य पुनर्मिलन
श्री नित्यानंद प्रभु और श्री गौरांग महाप्रभु के प्रथम मिलन की अलौकिक लीला का वर्णन
🔍
महाप्रभु द्वारा नित्यानंद प्रभु की खोज
तालध्वज रथ का स्वप्न और नित्यानंद प्रभु की खोज
▶ देखें (30:33)
▶ Watch (30:33)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि एक दिन महाप्रभु ने सबको बुलाकर कहा कि उन्होंने स्वप्न में तालध्वज रथ देखा है। बलराम जी का रथ चिह्न ताल वृक्ष है, कृष्ण का गरुड़ध्वज और अर्जुन का कपिध्वज। महाप्रभु ने कहा कि वृंदावन से कोई दिव्य पुरुष आए हैं जो नील वसन धारण किए, जटाजूट युक्त, एक कान में कुंडल और कमर में रस्सी बांधे हैं। समस्त भक्तगण नवद्वीप में खोजने लगे परंतु कहीं नहीं मिले। नंदन आचार्य के घर भी पूछा गया परंतु उन्होंने पहले से वचन दिया था कि किसी को नहीं बताएंगे। वे न हाँ कह सकते थे न ना, क्योंकि दोनों में झूठ होता। महाप्रभु समझ गए कि नंदन आचार्य धर्मसंकट में हैं।
🔗 भगवान स्वयं अपने भक्तों को खोजने जाते हैं, यह उनकी भक्त-वत्सलता का प्रमाण है।
📌 रथ ध्वज चिह्न:
- तालध्वज - बलराम जी का रथ (ताल वृक्ष चिह्न)
- गरुड़ध्वज - श्री कृष्ण का रथ
- कपिध्वज - अर्जुन का रथ (बंदर की मूर्ति)
📌 नित्यानंद प्रभु का वेश:
- नील वसन धारण
- जटाजूट
- एक कान में कुंडल
- कमर में रस्सी
- सिंगा (शृंग)
🙏
कृष्ण-बलराम का प्रथम मिलन
द्वापर के पश्चात प्रथम दिव्य मिलन - अपलक नेत्र दर्शन
▶ देखें (34:19)
▶ Watch (34:19)
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि महाप्रभु स्वयं सीढ़ी चढ़कर नंदन आचार्य के दो-तल्ला घर में गए। एक दिव्य सुंदर कोठरी में नित्यानंद प्रभु विराजमान थे। यह कृष्ण अंतर्धान के पश्चात द्वापर लीला की समाप्ति के बाद दो भाइयों का प्रथम मिलन था। दोनों टकटकी लगाकर अपलक नेत्रों से एक-दूसरे को निहारने लगे, जैसे नेत्रों द्वारा समस्त अमृत सुधा और माधुर्य रस का पान कर रहे हों। दोनों पत्थर के समान स्थिर हो गए। तब नित्यानंद प्रभु कांपते-कांपते धड़ाम से अचेत होकर गिर पड़े। महाप्रभु ने उनके मस्तक को अपनी गोद में धारण किया - जो शेष सर्वदा सबको धारण करते हैं, आज उन शेष को गौरांग महाप्रभु धारण कर रहे थे।
🔗 यह मिलन भक्ति के चरम आनंद और दो दिव्य स्वरूपों के पुनर्मिलन का अद्भुत क्षण था।
📌 मिलन की विशेषताएं:
- द्वापर के बाद प्रथम मिलन
- अपलक नेत्र दर्शन
- माधुर्य रस का पान
- नित्यानंद प्रभु का अचेत होना
- शेष को गौरांग ने धारण किया
हरिनाम प्रचार और जगाई-माधाई उद्धार
कलियुग में हरिनाम की महिमा और भगवान की अहैतुकी करुणा का प्रदर्शन
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सद्गुरुदेव बताते हैं कि महाप्रभु ने आदेश दिया कि सभी घर-घर जाकर हरिनाम का प्रचार करें। कलियुग में एकमात्र हरिनाम ही गति है - 'हरि नाम हरि नाम हरि नाम केवलम्'। महाप्रभु ने सबके भीतर शक्ति संचार करके मृदंग, करताल आदि वाद्य दिए और मंडलियां बनाकर भेजा। नित्यानंद प्रभु और हरिदास ठाकुर साथ चलते थे। हरे कृष्ण महामंत्र जो राधा-कृष्ण युगल प्रेम प्रदायिनी शक्ति है, इसका प्रचार करने का आदेश दिया। नित्यानंद प्रभु विशेष रूप से 'भजो गौरांग, लहो गौरांग, कहो गौरांग नाम रे' का प्रचार करते थे।
🔗 हरिनाम प्रचार का आदेश जगाई-माधाई उद्धार की पृष्ठभूमि तैयार करता है।
कलियुग में एकमात्र उपाय— कलि-संतरण उपनिषद् हरि नाम हरि नाम हरि नाम केवलम्
▶ 38:18
उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्। कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा॥
harer nāma harer nāma harer nāmaiva kevalam | kalau nāstyeva nāstyeva nāstyeva gatir anyathā ||
कलियुग में हरिनाम, हरिनाम, हरिनाम ही केवल उपाय है। इसके अतिरिक्त कोई गति नहीं, कोई गति नहीं, कोई गति नहीं।
✅ करें:
- प्रतिदिन हरे कृष्ण महामंत्र का जप करें
- जिसको देखो उसको हरिनाम का प्रचार करें
📌 हरे कृष्ण महामंत्र:
- हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
- हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे
- राधा-कृष्ण युगल प्रेम प्रदायिनी शक्ति
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जगाई-माधाई की पापाचार कथा
घोर पापी जगाई और माधाई - ब्राह्मण कुल के दुष्ट
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सद्गुरुदेव बताते हैं कि जगाई और माधाई दोनों भाई ब्राह्मण कुल के थे परंतु अत्यंत दुष्ट थे। ऐसा कोई कुकर्म नहीं था जो वे नहीं करते थे। उनके भय से दिन में भी स्त्रियां उस घाट की ओर जाने का साहस नहीं करती थीं। वे घाट के किनारे झोपड़ी बांधकर मदिरापान करते और लूटपाट करते थे। जब नित्यानंद प्रभु और हरिदास ठाकुर वहां हरिनाम प्रचार करने गए तो माधाई ने मदिरा की बोतल से नित्यानंद प्रभु पर प्रहार किया जिससे उनके मस्तक से रक्त बहने लगा। हरिदास ठाकुर वृद्ध थे, वे किसी प्रकार भाग कर बचे।
🔗 पापियों की चरम अवस्था दिखाकर भगवान की करुणा की महिमा और भी प्रकट होती है।
📌 जगाई-माधाई के दुष्कर्म:
- ब्राह्मण कुल होते हुए भी पापाचारी
- मदिरापान
- लूटपाट
- स्त्रियों पर अत्याचार का भय
- साधुओं पर प्रहार
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नित्यानंद प्रभु की क्षमा याचना
अहैतुकी करुणा - करुणा अवतार से पापियों के लिए प्रार्थना
▶ देखें (45:40)
▶ Watch (45:40)
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि जब माधाई ने प्रहार किया तो जगाई ने उसे रोका कि एक साधु को मारने से क्या मिलेगा। इसी बीच नित्यानंद प्रभु ने महाप्रभु के चरण पकड़कर कहा - 'प्रभु ये दो जीव हैं, इनको क्षमा कर दो। अब तो करुणा अवतार हो, करुणा करने के लिए आए हो। क्या जीव निष्पाप होगा, समस्त दोष वर्जित होगा, समस्त सद्गुण से संपन्न होगा, बहुत भक्तिमय होगा तब जाकर कृपा करोगे? ऐसी तुम्हारी करुणा?' नित्यानंद प्रभु ने भगवद्गीता के वचन 'अपि चेत्सुदुराचार' का स्मरण कराया कि तुमने स्वयं कहा है सुदुराचारी भी भक्त माने जाए।
🔗 नित्यानंद प्रभु की यह प्रार्थना भक्त की करुणा और भगवान की कृपा का अद्भुत संगम है।
सुदुराचारी भक्त की प्रतिज्ञा— भगवद् गीता Bhagavad Gita 9.30
▶ 46:25
संदर्भ
पूरक संदर्भ
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्। साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥
api cet sudurācāro bhajate mām ananya-bhāk | sādhur eva sa mantavyaḥ samyag vyavasito hi saḥ ||
यदि कोई अत्यंत दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भजन करे, वह साधु ही मानने योग्य है क्योंकि वह सम्यक् निश्चय वाला है।
📌 अहैतुकी करुणा का सिद्धांत:
- करुणा पात्रता नहीं देखती
- पापी का उद्धार ही करुणा है
- भगवान की प्रतिज्ञा - सुदुराचारी भी भक्त माने जाएं
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जगाई-माधाई का तत्काल उद्धार
भगवत कृपा से पलक में उद्धार - अंधकार से प्रकाश
▶ देखें (47:06)
▶ Watch (47:06)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि जगाई ने नित्यानंद प्रभु को बचाया था, अतः महाप्रभु ने तुरंत जगाई को छाती में भर लिया। महाप्रभु के स्पर्श मात्र से जगाई को प्रेम प्राप्ति हो गई और वह तत्काल गिर पड़ा। फिर माधाई ने भी प्रार्थना की कि हमको भी कृपा करो, हम दोनों साथ में पाप करते थे। महाप्रभु ने कहा तूने तो मेरे भैया पर प्रहार किया है, तुझे नरक में भेजूंगा। परंतु नित्यानंद प्रभु ने कहा - 'प्रभु इस जीवात्मा को मैं भिक्षा चाहता हूं।' तब महाप्रभु ने माधाई को भी कृपा प्रदान की। सद्गुरुदेव समझाते हैं कि भगवत कृपा से पलक में लाखों साल का अंधकार उजाला हो जाता है, इसके लिए समय का इंतजार नहीं।
🔗 यह प्रसंग सिद्ध करता है कि भगवान की कृपा के लिए योग्यता नहीं, केवल उनकी इच्छा आवश्यक है।
📌 तत्काल उद्धार की विशेषताएं:
- भगवत स्पर्श से प्रेम प्राप्ति
- पलक में अंधकार से प्रकाश
- 84 लाख जन्म का भ्रमण समाप्त
- साधन-भजन-तपस्या की आवश्यकता नहीं
- हृदय का तत्काल परिशोधन
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महाप्रभु की प्रतिज्ञा और पाप ग्रहण
कोटि कोटि जन्म के पाप का ग्रहण - भगवान की अद्भुत प्रतिज्ञा
▶ देखें (49:52)
▶ Watch (49:52)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि जगाई-माधाई परम प्रेमी भक्त बन गए। महाप्रभु ने उनसे कहा - 'तेरे सब पाप हमको दे दे, कोटि कोटि जन्म का जितना पाप है सब मेरे को दे दे। अगर प्रतिज्ञा कर अब नहीं करेगा तो सब जिम्मेदारी मेरी है।' इस लीला को सुनाने में एक पूरा दिन बीत जाएगा - कैसे इन लोगों के जीवन में परिवर्तन आया, कैसे परम भक्त बन गए। सुनते ही हृदय गदगद हो जाएगा और मन में इच्छा आएगी कि हम भी संसार से मुक्त होकर कृष्ण प्रेम की किंचित छटा प्राप्त करें।
🔗 यह महाप्रभु की अहैतुकी करुणा का चरम उदाहरण है जो समस्त पापों को क्षमा कर देती है।
📌 उद्धार की शर्तें:
- भविष्य में पाप न करने की प्रतिज्ञा
- भगवान समस्त पाप ग्रहण करते हैं
- जिम्मेदारी भगवान की
महाप्रभु का सन्यास और नित्यानंद प्रभु को आदेश
धर्म रक्षा हेतु नित्यानंद प्रभु को गृहस्थ आश्रम रचना का आदेश
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महाप्रभु का सन्यास और नित्यानंद प्रभु को भार
कटवा में सन्यास और नीलाचल गमन
▶ देखें (51:23)
▶ Watch (51:23)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि महाप्रभु ने देखा कि अब सन्यास लेना है और इधर का कार्य संभालने के लिए नित्यानंद प्रभु को भार दे दिया। कटवा जाकर श्री केशव भारती से सन्यास मंत्र लेकर सन्यास ग्रहण किया। सात दिन भक्तों के साथ आनंद कीर्तन किया। माता शचीदेवी से पूछा कि कहां रहूं तो माता ने कहा कि साधु होकर घर में रहना निंदनीय है, अतः नीलाचल चले जाओ जहां भक्तगण भी आ सकें। छह वर्ष तक महाप्रभु ने दक्षिण भारत, वृंदावन आदि में गमनागमन किया। प्रतिवर्ष चातुर्मास में बंगाल से समस्त भक्तमंडली आकर चार महीना उनके सान्निध्य में बिताती थी।
🔗 महाप्रभु के सन्यास से नित्यानंद प्रभु को गृहस्थ आश्रम का आदेश का मार्ग प्रशस्त होता है।
📌 सन्यास के पश्चात यात्राएं:
- कटवा में केशव भारती से सन्यास
- नीलाचल (पुरी) में निवास
- दक्षिण भारत में प्रेम धर्म प्रचार
- वृंदावन गमन
- छह गोस्वामियों को वृंदावन भेजा
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नित्यानंद प्रभु को गृहस्थ आश्रम का आदेश
धर्म रक्षा हेतु गृहस्थ आश्रम - दिव्य वंश की आवश्यकता
▶ देखें (54:17)
▶ Watch (54:17)
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि महाप्रभु ने देखा कि परवर्ती काल में इस प्रेम धर्म की रक्षा कौन करेगा। साधारण मनुष्य में यह शक्ति नहीं है, वे अपने धर्म की रक्षा भी नहीं कर पाते, भूल-भ्रांति और पदस्खलन हो जाता है। अतः महाप्रभु ने नित्यानंद प्रभु को एकांत में बुलाकर भिक्षा मांगी - 'तुम गृहस्थ आश्रम रचना करो और वहां प्रचार करो।' नित्यानंद प्रभु रोने लगे - 'तुम सन्यास लेकर आनंद करोगे, मुक्त हो, कोई बंधन नहीं, और हमको संसार में फंसाओगे!' महाप्रभु ने समझाया कि तुम्हारे द्वारा जो संतान जन्म लेगी वह शक्ति समर्थ होगी, परवर्ती काल में धर्म रक्षा करने में समर्थ होगी क्योंकि तुम्हारी शक्ति से आएगी।
🔗 यह आदेश वीरचंद्र प्रभु के जन्म की पृष्ठभूमि तैयार करता है।
⚖️ सन्यास बनाम गृहस्थ धर्म
सन्यास: मुक्त, कोई बंधन नहीं, कहीं भी जाओ, खाना-रहना मिल जाता है, आनंद ही आनंद
गृहस्थ आश्रम: संसार का बंधन, जिम्मेदारी, परंतु धर्म रक्षार्थ दिव्य शक्ति का संचार संभव
📌 गृहस्थ आश्रम का उद्देश्य:
- धर्म रक्षा हेतु शक्तिशाली वंश
- नित्यानंद प्रभु की शक्ति का संचार
- साधारण मनुष्य में यह सामर्थ्य नहीं
- परवर्ती काल में प्रेम धर्म की रक्षा
विवाह लीला और खरदा स्थापना
श्री वसुधा-जान्हवा देवी से विवाह और खरदा में आश्रम स्थापना
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सूर्यदास पंडित की कन्याओं से विवाह
हाजा रोग और दिव्य विवाह - वसुधा एवं जान्हवा देवी
▶ देखें (59:17)
▶ Watch (59:17)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि नित्यानंद प्रभु सूर्यदास पंडित के घर आए और संसार रचना की इच्छा प्रकट की। सूर्यदास पंडित चिंतित हुए कि इनका तो घर-मकान-दुकान कुछ नहीं, फकीर हैं, कन्या का जीवन कैसे होगा। उन्होंने टाल दिया। तब दोनों कन्याओं - वसुधा और जान्हवा - को हाजा (कॉलेरा) हो गया जो उस समय दुरारोग्य था, कोई इलाज नहीं था। सूर्यदास पंडित ने नित्यानंद प्रभु से प्रार्थना की। नित्यानंद प्रभु ने कहा कि एक कन्या दो तो ठीक कर दूंगा, दूसरी को भी ठीक करूंगा पर वह दहेज में देनी पड़ेगी। इस प्रकार विवाह संपन्न हुआ और रात्रि में नित्यानंद प्रभु ने अनेक अलौकिक शक्तियों का परिचय दिया।
🔗 यह विवाह महाप्रभु की आज्ञा की पूर्ति और धर्म रक्षार्थ वंश स्थापना का प्रथम चरण था।
📌 विवाह की विशेषताएं:
- वसुधा देवी - प्रथम पत्नी
- जान्हवा देवी - द्वितीय पत्नी (दहेज में)
- हाजा रोग से मुक्ति
- विवाह रात्रि में अलौकिक शक्ति प्रदर्शन
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शिष्यों के घर भ्रमण और खरदा स्थापना
गृहस्थ जीवन की विचित्र लीला - घर-मकान बिना भ्रमण
▶ देखें (66:07)
▶ Watch (66:07)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि विवाह के पश्चात नित्यानंद प्रभु के पास घर-मकान-दुकान कुछ नहीं था। ससुराल में बैठकर खाना कब तक संभव है। अतः दोनों पत्नियों को लेकर शिष्यों के घर-घर जाने लगे। जहां जाते खूब खातिर होती, आठ-दस दिन रहते, भेट-प्रणामी मिलती, परंतु रखने का स्थान नहीं तो वहीं रखवा देते। नवद्वीप में शचीमाता के पास भी बहुत दिन रहे। फिर खरदा में जमींदार से जगह मांगी। जमींदार ने अश्रद्धा से एक गड्ढा (दहा) दिखाकर धान का खड़ फेंक दिया। परंतु नित्यानंद प्रभु की कृपा से वह दहा ऊंचा होकर समतल हो गया। एक भक्त ने वहां सुंदर मकान बनवा दिया और लाखों भक्तों ने नित्यानंद प्रभु की सेवा की।
🔗 खरदा की स्थापना नित्यानंद प्रभु के गृहस्थ आश्रम की सफलता और वीरचंद्र प्रभु के जन्मस्थान की तैयारी थी।
📌 खरदा स्थापना का चमत्कार:
- जमींदार की अश्रद्धा
- धान के खड़ से स्थान निर्देश
- गड्ढे का समतल होना
- भक्त द्वारा मकान निर्माण
- बंगाल में व्यापक प्रचार-प्रसार
श्री अभिराम ठाकुर और श्रीदाम सखा की लीला
गोलोक से आए श्रीदाम सखा की अद्भुत लीला और शक्ति का वर्णन
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श्री अभिराम ठाकुर - गोलोक से श्रीदाम सखा
सात हाथ लंबे श्रीदाम - बिना जन्म लिए लीला
▶ देखें (69:35)
▶ Watch (69:35)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि अभिराम ठाकुर साक्षात व्रज के श्रीदाम सखा थे। जब महाप्रभु ने लीला संवरण की तो श्रीदाम सखा ने कहा कि हम नहीं जाएंगे, जब बुलाओगे तब जाएंगे। महाप्रभु प्रकट हुए तो रोने लगे 'श्रीदाम श्रीदाम'। बलराम (नित्यानंद प्रभु) ने वृंदावन जाकर गुफा में छुपे श्रीदाम सखा को बुलाया। वे सात हाथ लंबे थे! उन्होंने कलियुग देखकर पूछा - यह कौन युग है? मेरे कन्हैया का चेहरा इतना छोटा कैसे हो गया? श्रीदाम ने महाप्रभु से प्रमाण मांगा - उस विशाल लकड़ी को उठाकर बंशी जैसे धारण करो जिसे 20-25 व्यक्ति भी न उठा सकें। महाप्रभु ने ऐसा किया। एकमात्र महाप्रभु की लीला में श्रीदाम सखा गोलोक से आए और गोलोक में गए - मानव शरीर धारण ही नहीं किया।
🔗 अभिराम ठाकुर की शक्ति वीरचंद्र प्रभु की परीक्षा का आधार बनती है।
📌 श्रीदाम सखा की विशेषताएं:
- गोलोक के नित्य सखा
- सात हाथ लंबा स्वरूप
- जन्म-मृत्यु चक्र से परे
- महाप्रभु ने साढ़े तीन हाथ किया
- सर्पी (सांप) पर बैठकर यात्रा
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अभिराम ठाकुर की दंडवत शक्ति
जिसे प्रणाम किया वह मर गया - छह संतान का देहत्याग
▶ देखें (74:03)
▶ Watch (74:03)
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि अभिराम ठाकुर में इतनी शक्ति थी कि जिसको वे प्रणाम करते थे वह तत्काल प्राण त्याग कर देता था क्योंकि उनकी शक्ति को धारण करने का सामर्थ्य किसी में नहीं था। उन्होंने भारतखंड में कितने ही विग्रह तोड़ दिए क्योंकि वे उनके प्रणाम को सह न सके। नित्यानंद प्रभु की छह संतानों को जब अभिराम ठाकुर दंडवत करते तो वे मर जाती थीं। तब नित्यानंद प्रभु ने कहा कि अब तो वंश निर्वंश हो जाएगा, इस बार संतान होने पर इसे बुलाना नहीं। तब वीरचंद्र प्रभु का जन्म हुआ जो साक्षात वासुदेव-संकर्षण अवतार थे।
🔗 यह शक्ति वीरचंद्र प्रभु की दिव्यता को प्रमाणित करने का माध्यम बनती है।
📌 चार प्रभु तत्व:
- श्री कृष्ण चैतन्य प्रभु
- श्री नित्यानंद प्रभु
- श्री अद्वैतानंद प्रभु
- श्री वीरचंद्र प्रभु (वासुदेव-संकर्षण अवतार)
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वीरचंद्र प्रभु का अन्नप्राशन और अभिराम ठाकुर की परीक्षा
खिलखिलाता बालक - ईश्वरीय पुरुष की पहचान
▶ देखें (76:08)
▶ Watch (76:08)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि वीरचंद्र प्रभु के अन्नप्राशन का समाचार अभिराम ठाकुर को मिला परंतु निमंत्रण नहीं आया। उन्होंने कहा कि पितृगृह, गुरुगृह, प्रिय मित्र के घर और पति के घर बिना निमंत्रण भी जाने में कोई दोष नहीं। वे अपनी सर्पी (सांप) पर बैठकर खरदा पहुंचे। सबने रोना-पीटना शुरू कर दिया कि आज तो सब गया। उन्हें भोजन कराने का बहाना बनाकर बच्चे से दूर रखने का प्रयास किया गया। परंतु अभिराम ठाकुर सीधे बच्चे के पास गए और तीन बार दंडवत किया। प्रत्येक बार बच्चा खिलखिलाकर हंसता रहा। तब समझ गए - यह ईश्वरीय पुरुष है, क्या मरेगा! यह तो जगत कल्याण के लिए आया है।
🔗 यह परीक्षा वीरचंद्र प्रभु की दिव्यता और धर्म रक्षा के सामर्थ्य को प्रमाणित करती है।
📌 बिना निमंत्रण जाने के चार स्थान:
- पितृगृह (पिता का घर)
- गुरुगृह (गुरु का घर)
- प्रिय मित्र का घर
- पति का घर
नित्यानंद प्रभु का अंतर्धान
खरदा में कीर्तन और श्यामसुंदर विग्रह में विलीन होने की लीला
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खरदा में कीर्तन और श्यामसुंदर में विलीन
तीन दिवसीय कीर्तन और अंतर्धान लीला
▶ देखें (81:37)
▶ Watch (81:37)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि महाप्रभु के अंतर्धान से दुखी होकर नित्यानंद प्रभु खरदा आए। उन्होंने समस्त कीर्तन मंडली को बुलाया और तीन दिन कीर्तन हुआ। अद्वैतानंद प्रभु सहित सभी भक्त आए। नित्यानंद प्रभु मंदिर के द्वार पर खड़े होकर सबको हस्त संप्रसारण करके जैसे विदाय दे रहे थे - जैसे कोई जाते समय बाय-बाय करता है। फिर मंदिर में प्रवेश किया, द्वार खोला और श्यामसुंदर विग्रह में विलीन हो गए। कुछ वर्षों बाद अद्वैतानंद प्रभु भी अपने मदनगोपाल विग्रह में विलीन हो गए। वीरचंद्र प्रभु ने माता जान्हवा ठाकुरानी से दीक्षा लेकर धर्म प्रचार किया।
🔗 यह अंतर्धान लीला नित्यानंद प्रभु की दिव्यता का चरम प्रमाण है।
📌 अंतर्धान की विशेषताएं:
- तीन दिवसीय कीर्तन समारोह
- समस्त भक्त मंडली का आगमन
- हस्त संप्रसारण द्वारा विदाई
- श्यामसुंदर विग्रह में विलीन
- अद्वैतानंद प्रभु का मदनगोपाल में विलीन होना
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कथा श्रवण की महिमा
कथा सिंधु सुधा में अवगाहन से भक्ति पुष्प का प्रस्फुटन
▶ देखें (83:20)
▶ Watch (83:20)
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि अभिराम ठाकुर के जीवन चरित्र का भी बहुत सुंदर वर्
स्पष्टीकरण (Clarification)
यह सारांश AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग गुरु सेवा में करके तैयार किया गया है। इसमें त्रुटि हो सकती है। कृपया पूर्ण लाभ के लिए पूरा वीडियो अवश्य देखें।
श्री नित्यानंद प्रभु की दिव्य बाल लीला, बालक कुबेर (श्री नित्यानंद प्रभु) की राम-कृष्ण लीला प्रकटन, भगवत-प्रेमी का संत-प्रेम, और तीर्थ यात्रा हेतु सन्यासी द्वारा पुत्र-ग्रहण की अलौकिक कथा
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