परम पूज्य श्री श्री १०८
तीनकौड़ी गोस्वामी महाराज
(संक्षिप्त जीवन चरित्र एवं अलौकिक लीलाएँ)
बाघ के साथ साक्षात्कार (आदि बद्री की घटना)
प्रायः तीस वर्ष पूर्व की बात है। श्रीधाम ब्रजमण्डल के 'आदि बद्री' नामक गहन वन में एक साधक भजन में लीन थे। मध्य रात्रि में शौच के लिए वे कमण्डल लेकर बाहर निकले। घोर अंधकार में अचानक दो जलती हुई आँखें दिखाई दीं। वह एक विशालकाय बाघ था।
साधक डरे नहीं, न ही विचलित हुए। वे हाथ में कमण्डल लिए स्थिर खड़े रहे। हिंसक पशु भी उस महापुरुष के तेज के सामने शांत हो गया और अपना रास्ता बदल कर चला गया। वह निर्भीक साधक और कोई नहीं, हमारे श्री तीनकौड़ी बाबा (मौनी बाबा) थे।
जन्म और नामकरण
जन्म स्थान: मनोहरपुर ग्राम, मेदिनीपुर (पश्चिम बंगाल)।
माता-पिता: श्री हरिमोहन गोस्वामी एवं माता सुरधुनी देवी।
तिथि: माघी पूर्णिमा, वि. संवत् १९६३ (बांग्ला १३१३)।
माता सुरधुनी की यह आठवीं संतान थी। पूर्व की संताने जीवित न रहने के कारण, टोटके के रूप में धात्री माँ ने नवजात शिशु को "तीन कौड़ी" में खरीदा, जिससे इनका नाम 'तीनकौड़ी' पड़ा। पिता ने नाम रखा 'किशोरी-किशोरानन्द'।
बाल्यकाल और चंचलता
मात्र ५ वर्ष की आयु में माता का देहांत हो गया। पिता हरिमोहन गोसाईं ने दूसरा विवाह नहीं किया। शिशु का पालन एक 'धाई माँ' (रानीचक ग्राम निवासी) ने किया।
बालक तीनकौड़ी अत्यंत चंचल थे। पढ़ाई में बिल्कुल मन नहीं लगता था। विद्यालय जाने के समय कभी पेड़ पर चढ़ जाते, तो कभी खाट के नीचे छिप जाते। धाई माँ के असीम स्नेह ने ही उन्हें संभाला।
युवावस्था में पिता ने इनका विवाह 'शीतला सुन्दरी' के साथ कर दिया। विवाह के एक वर्ष बाद ही पिता का देहांत हो गया। १६ वर्ष की आयु में पितृ-वियोग और गृहस्थी का भार कंधों पर आ गया।
संसार से विरक्ति
समय बीतता गया, एक पुत्र का जन्म हुआ। लेकिन प्रभुपाद का मन संसार में नहीं लगता था। वे अक्सर सोचते:
इसी चिंता में वे अक्सर श्रीधाम वृन्दावन और नीलाचल भाग जाते थे। पत्नी शीतला सुन्दरी के निधन के बाद वैराग्य और तीव्र हो गया।
तीर्थ पर्यटन और हिमालय
प्रभुपाद ने केदारनाथ, बद्रीनाथ और दक्षिण भारत की कठिन पैदल यात्राएँ कीं।
कामाख्या देवी का चमत्कार: कामरूप कामाख्या के घने जंगल में जब वे भूख से व्याकुल और रास्ता भटक गए थे, तब एक रहस्यमयी महिला ने, जिसके पैरों में नूपुर की ध्वनि थी, उन्हें भोजन (प्रसाद) दिया। सुबह होने पर वहां कोई नहीं था। प्रभुपाद को विश्वास हो गया कि स्वयं देवी ने प्रसाद खिलाया है।
द्वितीय विवाह और सिद्ध बाबा का आदेश
पुत्र के पालन और समाज के दबाव में, और विशेषकर गोविन्द कुण्ड के सिद्ध मनोहर दास बाबाजी के आदेश पर ("अभी समय नहीं आया"), उन्हें अनिच्छा से दूसरा विवाह 'सरस्वती देवी' से करना पड़ा। किन्तु, मन पूरी तरह कृष्ण-चरणों में था।
अंततः वह समय आ गया। प्रभुपाद ने पत्नी से अनुमति ली और हमेशा के लिए घर छोड़ दिया।
स्वतः वेश ग्रहण और कठोर प्रतिज्ञा
वृन्दावन आकर वे सिद्ध मनोहर दास बाबाजी के पास गए। आचार्य वंश का होने के कारण किसी ने उन्हें 'बाबाजी वेश' नहीं दिया। अंततः उन्होंने स्वयं भगवान को साक्षी मानकर वेश (कौपीन) धारण किया और प्रतिज्ञा की:
- मैं अब कभी भी रुपये-पैसे (अर्थ) का स्पर्श नहीं करूँगा।
- मैं अब कभी अपनी पत्नी का मुख नहीं देखूँगा।
निर्जन भजन
वे प्रेम सरोवर, बरसाना, कोकिलावन, और टेर-कदम्ब जैसे निर्जन वनों में रहने लगे।
नियम: रात्रि १ या २ बजे उठकर स्नान और फिर लगातार भजन।
आहार: केवल थोड़ा सा 'शुठींर पालो' (बार्ली जैसा) या माधुकरी।
श्री वल्लभाचार्य और विट्ठलनाथ जी का दर्शन
भजन के दौरान चित्त की चंचलता दूर करने के लिए उन्हें साक्षात् श्री वल्लभाचार्य जी ने दर्शन देकर एक विशेष मंत्र दिया। बाद में श्री विट्ठलनाथ जी ने उन्हें कंठी माला पहनाने की इच्छा प्रकट की।
राधारानी का दर्शन: कठोर भजन के फलस्वरूप एक दिन ज्योतिर्मय प्रकाश हुआ और स्वयं श्री राधारानी ने उन्हें दर्शन देकर कृतार्थ किया।
भजन सिद्ध होने के बाद, जीवों के कल्याण के लिए वे बाहर निकले। नवद्वीप, पुरी और ब्रज के गाँव-गाँव में 'हरिनाम संकीर्तन' और 'श्रीमद्भागवत सप्ताह' का आयोजन किया।
नवद्वीप और मनोहरपुर में उत्सव
मनोहरपुर में उन्होंने 'नवकुंज' स्थापित कर अखंड हरिनाम यज्ञ करवाया। हजारों लोग प्रसाद पाते थे। एक बार प्रसाद कम पड़ गया, लेकिन प्रभुपाद के आदेश पर उसी थोड़े प्रसाद को वितरित किया गया और हजारों लोग तृप्त हो गए।
वर्षा का चमत्कार
मनोहरपुर में भीषण गर्मी थी। प्रभुपाद के एक बचपन के मित्र ने चुनौती दी: "अगर तुम सिद्ध हो, तो दो दिन में बारिश करवाओ, नहीं तो तुम्हें तालाब में फेंक दूँगा।" प्रभुपाद हँसे। अगले ही दिन मूसलाधार वर्षा हुई और सूखी धरती तृप्त हो गई।
प्रभुपाद यद्यपि सिद्धियों के प्रदर्शन के खिलाफ थे, तथापि भक्तों की रक्षा के लिए अनेक चमत्कार घटित हुए।
1. ट्रैक्टर और भक्त की रक्षा
बड़ी बठैन के जीवनलाल ने प्रभुपाद को ट्रैक्टर से ले जाने से मना कर दिया क्योंकि वह गेहूँ काट रहा था। तुरंत केवल उसके खेत पर बारिश हुई और गेहूँ भीग गया। बाद में, जब जीवनलाल एक दुर्घटना में ट्रैक्टर के नीचे आकर बुरी तरह घायल हो गया और डॉक्टरों ने जवाब दे दिया, तब प्रभुपाद ने सूक्ष्म शरीर से अस्पताल में आकर उसे ठीक किया।
2. प्रेत योनि से उद्धार
राधाकुण्ड का भूत: एक घर में आत्महत्या करने वाले प्रेत ने प्रभुपाद के पैर पकड़े। प्रभुपाद ने भागवत सप्ताह कराकर उसे मुक्त किया।
उद्धव कुण्ड का उत्पाती प्रेत: एक बाबाजी को एक प्रेत तंग करता था (कभी घोड़ा, कभी औरत बन जाता)। वह बाबाजी का धागा (कौंधनी) भी खोल ले गया था। प्रभुपाद ने भागवत सप्ताह करवाया। सप्ताह के तीसरे दिन वह प्रेत आश्रम की दीवार तोड़कर भाग गया।
3. डाकुओं को प्रसाद
एक बार रात में डाकुओं का दल (बंदूक और पिस्तौल के साथ) तपोवन में प्रभुपाद के पास आया। प्रभुपाद ने डरने के बजाय उन्हें प्रेम से बैठाकर भरपेट प्रसाद खिलाया। डाकुओं का हृदय परिवर्तन हो गया और वे १०० रुपये प्रणामी देकर और सुरक्षा का वचन देकर गए।
लड्डू का प्रसंग: कुसुम सरोवर पर डकैतों ने पैसे छीने। फिर भूख लगने पर प्रभुपाद ने अपने लिए रखे 'गाय के घी के लड्डू' भी उन्हें खिला दिए। डकैत इतने प्रभावित हुए कि पैसे लौटाकर चले गए।
अन्य सिद्धियाँ
- मन की बात जानना: सेवक के मन में चल रहे गुरु-त्याग के विचार को बिना कहे जान लेना ("माँ के पेट में बच्चा लात मारता है तो क्या माँ उसे फेंक देती है?")।
- सट्टा नंबर ५: एक जुआरी को ५ उंगलियां दिखाई (शाम को ५ बजे आने के लिए), उसने इसे 'लकी नंबर ५' समझा और बहुत पैसे जीते।
- चैतन्य पाल की रीढ़: चैतन्य पाल की रीढ़ की हड्डी में पानी भर गया था। बेहोशी की हालत में प्रभुपाद ने सूक्ष्म रूप में आकर माला छुआकर उसे ठीक किया।
जीवन के अंतिम समय में प्रभुपाद को पक्षाघात (Paralysis) हो गया। वे नवद्वीप आ गए। उनकी अवस्था अत्यंत 'अंतर्मुखी' हो गई थी। हाथ में माला न होने पर भी उनकी उंगलियां माला जपने की मुद्रा में चलती रहती थीं।
वृन्दावन का बुलावा
वृन्दावन में किशोरी दास बाबाजी को स्वप्न में ठाकुर मुरारी मोहन (बालक रूप में) ने कहा: "तुमने गोसाईं जी को भागवत सप्ताह के बीच से नवद्वीप क्यों भेज दिया? उन्हें वापस लाओ।" लेकिन तब तक देर हो चुकी थी।
श्रीवास आंगन के श्रीजीव गोस्वामी प्रभुपाद के दर्शन को आए। ठीक उसी समय प्रभुपाद ने अस्पष्ट स्वर में "जय नित्यानन्द राम, जय नित्यानन्द राम" उच्चारण करते हुए नश्वर देह का त्याग किया।
नवद्वीप में गंगा तट पर, जहाँ वे भजन करते थे, वहीं उनका अंतिम संस्कार किया गया। उसी समय ब्रज में भी भक्तों को स्वप्न देकर उन्होंने अपने जाने की सूचना दी।
॥ जय श्रीराधे - जय निताई ॥
श्री गुरुदेव कृपा हि केवलम्
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