[Study Guide Draft : Feb 11, 2026] श्रीमत् तीनकोड़ी गोस्वामीजी प्रभुपाद का दिव्य जीवन चरित्र

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श्री भगवत चर्चा
11 February 2026

श्री गुरुदेव त्रिदण्डी गोस्वामी प्रभुपाद का दिव्य जीवन चरित्र - जन्म से वैराग्य तक

श्री गुरुदेव त्रिदण्डी गोस्वामी प्रभुपाद का दिव्य जीवन चरित्र - जन्म से वैराग्य तक

Sri Sri 108 Sri Vinod Baba ji Maharaj
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हमारे प्रिय सद्गुरुदेव बताते हैं:
" उनका माला करने का समय नहीं और हमारा माला छोड़ने का समय नहीं। "

" जिसका जो कोटि है, वही जाकर उससे मुक्ति होगी। सब एक कोटि के नहीं है। "

" एकांत माने एका, अंत माने तुम ही हो और कोई नहीं है। "

" जब तक कामना है, स्पृहा है, तब तक कर्म है - कर्म से निवृत्ति संभव नहीं। "

" सबसे उत्तम समय अभी मिल गया है, कल के शुभ दिन के इंतजार नहीं करना। "

" गुरु तुम्हारे देह-देहिक विषय में नहीं, गुरु सिर्फ आत्म कृपा करने के लिए है। "

" जब भगवत चरण में अनुराग होता है, तभी वैराग्य होता है संसार में। "
एकांतता (8)वैराग्य (7)जीव कोटि (5)शास्त्र ज्ञान (6)कुल गुरु (4)निष्प्रिय (3)कामना (5)दैवी शक्ति (3)भगवत प्राप्ति (4)प्रेरक (4)स्पृहा (6)एकांत (4)डोर-कोपिन (3)परीक्षा (4)निष्प्रियता (3)अलौकिक शक्ति (3)अनुराग (5)तिरोभाव (4)नित्यानंद (6)जगन्नाथपुरी (4)नवद्वीप (5)कोकिलाबन (2)अंतर्दशा (3)
🔍 सत्संग सार (Executive Summary)

इस सत्संग में सद्गुरुदेव अपने श्री गुरुदेव त्रिदण्डी गोस्वामी प्रभुपाद बाबाजी महाराज के दिव्य जीवन चरित्र का वर्णन करते हैं। गुरुदेव का जन्म पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर जिले में हुआ, जहाँ छह पुत्रों के देहत्याग के पश्चात सातवें पुत्र को तीन कड़ी देकर बचाया गया। बाल्यावस्था में ही मातृ-पितृ वियोग के पश्चात उनमें तीव्र वैराग्य उत्पन्न हुआ। हिमालय में एक बुद्ध सन्यासी से भेंट हुई जिन्होंने जीव कोटि के सिद्धांत के आधार पर वृंदावन जाने का आदेश दिया और शास्त्र ज्ञान का वरदान प्रदान किया। सद्गुरुदेव भगवत प्राप्ति हेतु एकांतता की अनिवार्यता पर बल देते हुए बताते हैं कि निष्प्रियता और निराशा ही सच्चे भजन की पूर्वशर्त है। कामना और स्पृहा ही कर्म का प्रेरक है, अतः भगवत प्राप्ति की लालसा ही भजन का वास्तविक प्रेरक होना चाहिए।

🧱 ज्ञान प्रवाह
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📌 विषय सूची (Table of Contents)

📖 आज की शिक्षाएं 📖 आज की विस्तृत शिक्षाएं

मंगलाचरण एवं विषय प्रवेश
गुरु वंदना तथा आलोच्य विषय का परिचय
🙏
गुरु वंदना मंत्र
गुरु वंदना एवं भगवत स्मरण
▶ देखें (0:14) ▶ Watch (0:14)
सद्गुरुदेव सत्संग का शुभारंभ गुरु वंदना मंत्र के उच्चारण से करते हैं। 'गुरवे गौरचंद्राय राधिका' - इस मंत्र में श्री गुरुदेव, श्री गौरचंद्र महाप्रभु एवं श्री राधिका जी को प्रणाम निवेदित किया गया है। तत्पश्चात 'कृष्णाय कृष्णभक्ताय तदभक्ताय नमो नमः' के द्वारा श्री कृष्ण, उनके भक्त और उन भक्तों के भक्तों को भी नमस्कार किया गया है। यह गौड़ीय वैष्णव परंपरा की विशेषता है जहाँ भगवान के साथ-साथ भक्त परंपरा को भी समान श्रद्धा से वंदित किया जाता है।
🔗 सत्संग का शुभारंभ गुरु वंदना से होता है जो समस्त ज्ञान प्राप्ति का मूल है।
गुरु-गौर-राधा वंदना— गौड़ीय वैष्णव परंपरा गुरु वंदना मंत्र
▶ 0:14
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
गुरवे गौरचंद्राय राधिकायै तदालयाय। कृष्णाय कृष्णभक्ताय तदभक्ताय नमो नमः॥
gurave gaurachandrāya rādhikāyai tadālayāya | kṛṣṇāya kṛṣṇabhaktāya tadbhaktāya namo namaḥ ||
श्री गुरुदेव को, श्री गौरचंद्र को, श्री राधिका जी को एवं उनके धाम को नमस्कार। श्री कृष्ण को, उनके भक्तों को और उन भक्तों के भक्तों को बारंबार नमस्कार।
📖
आलोच्य विषय परिचय
श्री गुरुदेव प्रभुपाद के जीवन चरित्र का परिचय
▶ देखें (0:40) ▶ Watch (0:40)
सद्गुरुदेव आज के सत्संग का आलोच्य विषय प्रस्तुत करते हैं। आज के सत्संग में श्री गुरुदेव प्रभुपाद अनंत श्री विभूषित ओम विष्णुपाद श्री श्री त्रिदण्डी गोस्वामी प्रभुपाद बाबाजी महाराज के पावन जीवन चरित्र संबंध में किंचित दिक्दर्शन करेंगे। दो दिन से यह आलोचना चल रही है, परंतु नवागत श्रोताओं के लिए थोड़ी प्राक कथा प्रस्तुत की जाएगी ताकि वे भी इस दिव्य जीवन गाथा से परिचित हो सकें।
🔗 गुरुदेव के जीवन चरित्र का श्रवण भक्तों के लिए प्रेरणादायक एवं शिक्षाप्रद है।
गुरुदेव का जन्म एवं बाल्यकाल
गुरुदेव के जन्म की अलौकिक परिस्थितियाँ एवं बाल्यकाल का वर्णन
👶
गुरुदेव का जन्म - तीन कड़ी की कथा
तीन कड़ी नाम की अलौकिक कथा
▶ देखें (1:50) ▶ Watch (1:50)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि श्री गुरुदेव पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर जिले के मनोहरपुर नामक स्थान में प्रकट हुए थे। उनके जन्म से पूर्व छह-छह पुत्र जन्म लेकर शरीर त्याग दिए थे - कोई मृतक अवस्था में जन्म लेता, कोई जन्म लेकर थोड़े दिन पश्चात देह त्याग देता। उनके पिता श्री हरिभान गोस्वामी चिंतित थे कि इस प्रकार तो वंश परंपरा ही समाप्त हो जाएगी। सप्तम बार जब पुत्र जन्म लिया तो उनकी एक बहन दुर्गासुंदरी आकर बोलीं कि यह पुत्र हमको दे दो, यह अब तुम्हारा पुत्र नहीं, हमारा पुत्र है। देखो इस प्रकार शायद बच जाए। तो तीन कड़ी (सोने की कड़ी) देकर उनको वचन देकर खरीद लिया। इसी कारण उनका नाम 'तीन कड़ी' पड़ा।
🔗 महापुरुषों के जन्म की परिस्थितियाँ भी अलौकिक होती हैं।
📌 तीन कड़ी नाम का कारण:
  • छह पुत्रों का जन्म लेकर देहत्याग
  • सातवें पुत्र को बुआ ने तीन सोने की कड़ी देकर खरीदा
  • इसी कारण नाम पड़ा 'तीन कड़ी गोस्वामी'
🕉️
कुल गुरु परंपरा
नित्यानंद वंश की कुल गुरु प्रथा
▶ देखें (3:25) ▶ Watch (3:25)
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि गुरुदेव नित्यानंद प्रभु की धर्मपत्नी श्री जाह्नवी माता की परंपरा से आए हैं। यह आचार्य परिवार कुल गुरु प्रथा के अनुसार गुरुगिरी करते हैं। बंगाल में अभी भी यह प्रचलन है कि वंश परंपरा में कुल गुरु से ही दीक्षा लेते हैं। गुरुदेव दीक्षा देते हैं, उनके पुत्र दीक्षा देते हैं, फिर उनके पुत्र - इस प्रकार एक कुल गुरु प्रथा चलती है। दूसरे से दीक्षा नहीं लेते। इस परंपरा में शिष्यमान (शिष्यों के घर) में जाकर गुरुगिरी करते हैं और इस प्रकार अपना जीवन निर्वाह करते हैं।
🔗 गौड़ीय वैष्णव परंपरा में विभिन्न गुरु प्रथाएँ विद्यमान हैं।
📌 कुल गुरु प्रथा की विशेषताएँ:
  • नित्यानंद प्रभु की धर्मपत्नी जाह्नवी माता की परंपरा
  • वंश परंपरा में दीक्षा - पिता से पुत्र को
  • शिष्यमान में जाकर गुरुगिरी करना
  • दूसरे से दीक्षा न लेने की प्रथा
😢
माता का वियोग
बाल्यावस्था में मातृ वियोग
▶ देखें (4:15) ▶ Watch (4:15)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि जब बालक पाँच वर्ष का हुआ तब माता सुरधनी देवी नित्य लीला में प्रवेश कर गईं। अनाथ बालक को कौन देखेगा? इस प्रश्न पर पिता की एक बहन ने कहा कि वे इस बालक को देखेंगी। इस प्रकार वही धात्री माता बनकर पुत्र का पालन-पोषण करने लगीं। परंतु बालक की पढ़ाई-लिखाई में कोई रुचि नहीं थी। स्कूल जाने से मना करता, पढ़ने से मना करता, स्कूल जाते समय रोदन-क्रंदन और नाना प्रकार के बहाने बनाता। किसी प्रकार स्कूल में भर्ती तो करा दिया परंतु पढ़ता नहीं था। इस प्रकार मात्र पास क्लास तक ही पढ़ पाए।
🔗 महापुरुषों की लौकिक शिक्षा में अरुचि उनकी पारमार्थिक प्रवृत्ति का संकेत है।
गुरु के आवश्यक गुण एवं दैवी शक्ति
सद्गुरु के लिए आवश्यक गुणों एवं दैवी शक्ति संपन्न महापुरुषों का वर्णन
📚
गुरु के दो अनिवार्य गुण
सद्गुरु के लिए शास्त्र ज्ञान एवं अनुभव सिद्ध ज्ञान की आवश्यकता
▶ देखें (5:29) ▶ Watch (5:29)
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि पितृ वियोग के पश्चात किशोरावस्था में गुरुदेव को शिष्यमान में परिचय कराया गया। परंतु शिष्यमान में जाने से गुरुगिरी में एक समस्या थी - शिष्यों के मन की जिज्ञासाओं का निराकरण करने के लिए शास्त्र ज्ञान आवश्यक है। गुरु के लिए दो गुण अनिवार्य हैं - एक शास्त्र ज्ञान और दूसरा प्रत्यक्ष अनुभव सिद्ध ज्ञान। शब्द ब्रह्म (शास्त्र ज्ञान) के बिना शिष्य के मन की संशय और जिज्ञासा का निरसन संभव नहीं होता। सिर्फ ज्ञान से नहीं होगा, शास्त्र सिद्धांत के द्वारा समझाना आवश्यक है। जो कुछ भी कहना है वह शास्त्र सिद्धांत अनुसार कहना होगा, अपने मनमुखी कुछ नहीं बोल सकते। सद्गुरुदेव इस सिद्धांत की पुष्टि हेतु निम्नलिखित श्लोकों का उल्लेख करते हैं:
🔗 सद्गुरु में शास्त्र ज्ञान और अनुभव दोनों का समन्वय आवश्यक है।
गुरु के दो गुण - शब्द ब्रह्म एवं पर ब्रह्म निष्ठा— श्रीमद्भागवतम् Srimad Bhagavatam 11.3.21
▶ 5:50
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
तस्माद्गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम्। शाब्दे परे च निष्णातं ब्रह्मण्युपशमाश्रयम्॥
tasmād guruṁ prapadyeta jijñāsuḥ śreya uttamam | śābde pare ca niṣṇātaṁ brahmaṇy-upaśamāśrayam ||
इसलिए जो परम श्रेय की जिज्ञासा रखता है, उसे ऐसे गुरु की शरण लेनी चाहिए जो शब्द ब्रह्म (शास्त्र) और पर ब्रह्म दोनों में निष्णात हों तथा जिन्होंने ब्रह्म में शांति प्राप्त की हो।
शास्त्र ही प्रमाण है— भगवद्गीता Bhagavad Gita 16.24
▶ 6:21
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥
tasmāc chāstraṁ pramāṇaṁ te kāryākārya-vyavasthitau | jñātvā śāstra-vidhānoktaṁ karma kartum ihārhasi ||
इसलिए कर्तव्य-अकर्तव्य के निर्धारण में शास्त्र ही तुम्हारा प्रमाण है। शास्त्र विधान को जानकर ही तुम्हें कर्म करना चाहिए।
📌 गुरु के दो अनिवार्य गुण:
  • शास्त्र ज्ञान (शब्द ब्रह्म में निष्ठा)
  • प्रत्यक्ष अनुभव सिद्ध ज्ञान (पर ब्रह्म में निष्ठा)
दैवी शक्ति संपन्न महापुरुष
पूर्वजन्म के सुकृत से दैवी शक्ति संपन्न जन्म
▶ देखें (7:02) ▶ Watch (7:02)
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि गुरुदेव ऐसे धी शक्ति संपन्न थे कि श्रवण मात्र से ही सब याद कर लेते थे। यह पूर्वजन्म के शुभ संस्कार का फल है। जो महापुरुष दैवी शक्ति संपन्न जन्म लेते हैं, वही जाकर तीव्र भजन कर सकते हैं और जगत का मंगल कर सकते हैं। गुरुदेव ऐसे ही दैवी शक्ति लेकर प्रकट हुए थे। यद्यपि शास्त्र अध्ययन नहीं किया था, परंतु जब कथा कहते थे तो ऐसा प्रतीत होता था मानो समस्त शास्त्र ज्ञान उनमें पूर्ण रूप से विद्यमान है। सद्गुरुदेव इस विषय को स्पष्ट करते हुए गीता का श्लोक उद्धृत करते हैं:
🔗 महापुरुष पूर्वजन्म के सुकृत से दैवी गुणों से संपन्न होकर प्रकट होते हैं।
दैवी संपदा के लक्षण— भगवद्गीता Bhagavad Gita 16.1-3
▶ 7:32
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः। दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥ अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्। दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्॥ तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता। भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत॥
abhayaṁ sattva-saṁśuddhir jñāna-yoga-vyavasthitiḥ | dānaṁ damaś ca yajñaś ca svādhyāyas tapa ārjavam || ahiṁsā satyam akrodhas tyāgaḥ śāntir apaiśunam | dayā bhūteṣv aloluptvaṁ mārdavaṁ hrīr acāpalam || tejaḥ kṣamā dhṛtiḥ śaucam adroho nāti-mānitā | bhavanti sampadaṁ daivīm abhijātasya bhārata ||
निर्भयता, अंतःकरण की शुद्धि, ज्ञान-योग में स्थिति, दान, इंद्रिय संयम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप, सरलता, अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, शांति, किसी की निंदा न करना, प्राणियों पर दया, लोलुपता का अभाव, कोमलता, लज्जा, अचंचलता, तेज, क्षमा, धैर्य, पवित्रता, द्रोह का अभाव, अभिमान का अभाव - हे भारत! ये सब दैवी संपदा को प्राप्त मनुष्य के लक्षण हैं।
📌 दैवी शक्ति संपन्न जन्म के कारण:
  • पूर्वजन्म के शुभ संस्कार
  • पूर्वजन्म अर्जित सुकृति
  • श्रवण मात्र से स्मृति में धारण क्षमता
विवाह, शिष्य कार्य एवं वैराग्य का उदय
गृहस्थ जीवन के मध्य वैराग्य की उत्पत्ति का वर्णन
💒
विवाह एवं शिष्य कार्य
प्रथम विवाह एवं गुरुगिरी का आरंभ
▶ देखें (8:26) ▶ Watch (8:26)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि गुरुदेव का विवाह अनुष्ठान संपन्न हुआ। उनके पिता ने सुलक्षणा शीतला सुंदरी नामक एक सुकन्या के साथ, जो समस्त सद्गुणों से अलंकृत थीं और श्री गोपीनाथ गोस्वामी की कन्या थीं, विवाह कार्य संपन्न कराया। उनके एक पुत्र भी हुआ। उपनयन संस्कार के पश्चात उनके भीतर विशेष परिवर्तन दिखाई देने लगा - हरि कथा, हरि गुणानुवाद एवं हरि कीर्तन में उनकी रुचि बढ़ गई जबकि सांसारिक विषयों में रुचि क्षीण होने लगी। शिष्यमान में जाते थे, बहुत प्रभावशाली थे, हजारों शिष्य बनाए। देखने में भी सुदर्शन एवं समस्त सुलक्षणों से युक्त थे।
🔗 संस्कार साधक के आंतरिक परिवर्तन में सहायक होते हैं।
📌 उपनयन संस्कार पश्चात परिवर्तन:
  • हरि कथा में रुचि
  • हरि गुणानुवाद में रुचि
  • हरि कीर्तन में रुचि
  • सांसारिक विषयों में अरुचि
🚶
पितृ वियोग और वैराग्य
पितृ वियोग से तीव्र वैराग्य की उत्पत्ति
▶ देखें (9:39) ▶ Watch (9:39)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि इसी मध्य गुरुदेव के पितृ वियोग हो गया। पितृ वियोग के पश्चात उनके भीतर और भी तीव्र वैराग्य उत्पन्न हो गया। फिर तीर्थ-तीर्थ परिक्रमा करना आरंभ कर दिया। कभी हिमालय, केदार, बद्री आदि समस्त तीर्थ स्थलियों में अपने भक्तों को साथ लेकर परिक्रमा करने लगे।
🔗 वियोग वैराग्य का प्रबल कारण बनता है।
🏔️
हिमालय में वैराग्य
हिमालय की दिव्य भूमि का प्रभाव
▶ देखें (10:09) ▶ Watch (10:09)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि एक बार घूमते-घूमते गुरुदेव पूर्व भारत के परशुराम कुंड से होते हुए हिमालय पहुँचे। वहाँ तीव्र वैराग्य उत्पन्न हुआ - अब घर नहीं लौटेंगे, यहीं रहेंगे। हिमालय का ऐसा दिव्य स्वभाव एवं सुंदर परिवेश है कि जिसके मन में थोड़ी सी भी भगवत भावना है, वहाँ जाने से स्वाभाविक ही विरक्ति आ जाती है और भगवत प्राप्ति के लिए तीव्र लालसा उत्पन्न हो जाती है। सद्गुरुदेव स्वयं का अनुभव साझा करते हुए बताते हैं कि दीक्षा लेने से पूर्व वे भी हिमालय में बहुत घूमे हैं और वहाँ जाने से ही मन उदास हो जाता था, संसार की अनित्यता का बोध होता था और भजन करने की प्रेरणा मिलती थी। हिमालय देव भूमि है जहाँ मुनि-ऋषियों का निवास है और अभी भी वहाँ गिरि कंदरों में बड़े-बड़े त्रिकालदर्शी महापुरुष तीव्र भजन कर रहे हैं।
🔗 पवित्र तीर्थ स्थलों का वातावरण साधक के मन पर प्रभाव डालता है।
📌 हिमालय के दिव्य प्रभाव:
  • स्वाभाविक विरक्ति का उदय
  • भगवत प्राप्ति की तीव्र लालसा
  • संसार की अनित्यता का बोध
  • भजन की प्रेरणा
बुद्ध सन्यासी से भेंट एवं जीव कोटि का सिद्धांत
हिमालय में बुद्ध सन्यासी से भेंट एवं जीव कोटि के गहन सिद्धांत का वर्णन
🎯
जीव कोटि का सिद्धांत
जीव कोटि - प्रत्येक जीव की विशिष्ट गति
▶ देखें (12:23) ▶ Watch (12:23)
सद्गुरुदेव जीव कोटि के गहन सिद्धांत को समझाते हैं। जीव अलग-अलग कोटि के हैं, सब एक कोटि के नहीं हैं। जिसकी जो कोटि है, वही जाकर उससे मुक्ति होगी। भगवान के अनंत धाम, अनंत लोक, अनंत स्वरूप हैं - जिसकी जहाँ गति है, वहीं जाकर उसकी मुक्ति होगी और वही उसे अच्छा भी लगेगा। मान लीजिए कोई निर्गुण निर्विशेष ब्रह्म का उपासक है, तो उन्हें वही उपासना अच्छी लगेगी और अन्य उपासना में न तो विश्वास होगा, न रुचि। उन्हें लगेगा कि यह सब माया है, मूर्ति पूजा माया है। किसी भी युक्ति-तर्क से आप उन्हें समझा नहीं पाओगे। इसी प्रकार कोई वैकुंठ लोक के, कोई विष्णु लोक के - अनंत कोटि लोकों में जहाँ के जो जीव कोटि हैं, वहीं जाकर उनकी मुक्ति होती है। इस सिद्धांत को स्पष्ट करने के लिए सद्गुरुदेव एक सुंदर दृष्टांत प्रस्तुत करते हैं:
🔗 प्रत्येक जीव की अपनी आध्यात्मिक पहचान एवं गंतव्य है।
📌 जीव कोटि सिद्धांत के मुख्य बिंदु:
  • सब जीव एक कोटि के नहीं हैं
  • जिसकी जो कोटि है, वहीं मुक्ति होगी
  • भगवान के अनंत धाम, अनंत लोक, अनंत स्वरूप
  • जिसकी जहाँ गति, वही अच्छा लगेगा
  • ब्रह्म उपासक को मूर्ति पूजा माया प्रतीत होती है
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वृंदावन जाने का आदेश
बुद्ध सन्यासी का आदेश - वृंदावन जाओ
▶ देखें (14:40) ▶ Watch (14:40)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि बुद्ध सन्यासी ने गुरुदेव से कहा कि तुम्हारा यह घर नहीं है, तुम वैष्णव घर के हो, तुम वृंदावन जाओ। जो भी प्राप्ति तुम्हें होनी है वह वहीं जाकर होगी। गुरुदेव ने कहा - 'बाबा, आप जाने दीजिए।' उन्होंने कहा - 'अब तुम यहाँ अधिक दिन मत रहो, तुम जाओ। बहुत दिन हो गए, हमने तुम्हारी सेवा ले ली है। तो माँगो, हमसे कुछ माँगो।'
🔗 सच्चे महापुरुष साधक को उसके उचित मार्ग की ओर निर्देशित करते हैं।
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शास्त्र ज्ञान का वरदान
बुद्ध सन्यासी का अद्भुत वरदान
▶ देखें (15:10) ▶ Watch (15:10)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि जब बुद्ध सन्यासी ने गुरुदेव से कुछ माँगने को कहा तो गुरुदेव ने निवेदन किया - 'हम तो गोसाई हैं, हम लोगों को शिष्यमान में जाना पड़ता है, दीक्षा भी देना पड़ता है, परंतु कोई शास्त्र ज्ञान तो है नहीं। शास्त्र अध्ययन करने का समय भी नहीं है। तो क्या करें?' बुद्ध सन्यासी ने कहा - 'जाओ, मैं आशीर्वाद करता हूँ। जब भी तुम कथा-प्रवचन करो, तुम्हारे भीतर समस्त शास्त्र स्वाभाविक रूप से प्रकाशित हो जाएँगे।' तब से गुरुदेव समस्त शास्त्रों में इतने पारदर्शी हो गए कि बड़े-बड़े विद्वान जैसे श्री रामदास बाबाजी महाराज, पीठ तुम्हारा रामकृष्णदास पंडित बाबा, श्री गौरांग दास बाबा आदि उनका प्रवचन श्रवण करते थे। मात्र पास क्लास तक पढ़े थे, परंतु जब संस्कृत श्लोक उच्चारण करते थे तो ऐसा प्रतीत होता था मानो संस्कृत में एम.ए., पी.एच.डी. हों। इतनी बड़ी विद्वत्ता, शास्त्र सिद्धांत की ऐसी व्याख्या करते कि दूसरों की व्याख्या में भी त्रुटि निकाल देते।
🔗 महापुरुषों का आशीर्वाद साधक में दिव्य क्षमताओं का संचार करता है।
📌 वरदान का प्रभाव:
  • समस्त शास्त्र स्वाभाविक प्रकाशित
  • बड़े-बड़े विद्वानों द्वारा श्रवण
  • संस्कृत श्लोकों का अद्भुत उच्चारण
  • दूसरों की व्याख्या में त्रुटि पकड़ने की क्षमता
📝
प्रादेशिकता की शिक्षा
सद्गुरुदेव का व्यक्तिगत अनुभव - सांप्रदायिकता बनाम प्रादेशिकता
▶ देखें (16:33) ▶ Watch (16:33)
सद्गुरुदेव अपना व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हैं। एक दिन गुरुजी के साथ बैठकर बात कर रहे थे। सद्गुरुदेव ने कहा - 'देखिए बाबा, अभी भारत में यह जो सांप्रदायिकता है - यह पंजाबी है, यह बंगाली है, यह उड़िया है - यह बहुत अनर्थकारी है, हमारे सनातन धर्म के लिए बहुत विघातक है।' गुरुजी ने तुरंत कहा - 'इसको सांप्रदायिकता थोड़ी कहा जाता है, प्रादेशिकता कहते हैं।' सद्गुरुदेव बताते हैं कि वे स्तब्ध रह गए। यह भूल पकड़ना तो किसी एम.ए., पी.एच.डी. साहित्य वाले के लिए भी संभव नहीं था। वास्तव में सांप्रदायिकता अलग है - यह धर्म में विभिन्न संप्रदायों (मुसलमान, ईसाई, हिंदू) या एक धर्म में विभिन्न संप्रदायों (योगी, कर्मी, ज्ञानी) से संबंधित है। परंतु पंजाबी-बंगाली-उड़िया का विभाजन तो प्रादेशिकता है। सद्गुरुदेव कहते हैं यह भगवत्प्रदत्त शक्ति है, गॉड गिफ्टेड विद्वत्ता है।
🔗 गुरुदेव की भगवत्प्रदत्त विद्वत्ता अद्भुत थी।
⚖️ सांप्रदायिकता बनाम प्रादेशिकता
सांप्रदायिकता: धर्म के आधार पर विभाजन - मुसलमान, ईसाई, हिंदू या एक धर्म में योगी, कर्मी, ज्ञानी आदि संप्रदाय
प्रादेशिकता: प्रदेश/भाषा के आधार पर विभाजन - पंजाबी, बंगाली, उड़िया आदि
द्वितीय विवाह एवं एकांतता का सिद्धांत
गृहस्थ जीवन से पुनः वैराग्य एवं एकांत भजन की आवश्यकता का प्रतिपादन
💔
प्रथमा पत्नी वियोग
प्रथमा पत्नी के वियोग से तीव्र वैराग्य
▶ देखें (18:17) ▶ Watch (18:17)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि इस प्रकार बुद्ध सन्यासी से आशीर्वाद प्राप्त कर गुरुदेव शिष्यमान में खूब प्रवचन करते थे और हजारों शिष्य बनाए। इसके पश्चात उनकी प्रथमा पत्नी का वियोग हो गया। इस वियोग के बाद और भी तीव्र वैराग्य उत्पन्न हुआ। वे वृंदावन आए और वहाँ सिद्ध मनोहरदास बाबा के सानिध्य में गए जो त्रिकालदर्शी महापुरुष थे और गोवर्धन में निवास करते थे। उन्हें सात जन्म की स्मृति थी और सात जन्म की बात बता देते थे। उनके सानिध्य में रहकर गुरुदेव का वैराग्य और भी तीव्र हो गया।
🔗 सिद्ध महापुरुषों का सानिध्य वैराग्य को तीव्र करता है।
📌 सिद्ध मनोहरदास बाबा की विशेषताएँ:
  • त्रिकालदर्शी महापुरुष
  • गोवर्धन में निवास
  • सात जन्म की स्मृति
🏠
मनोहरदास बाबा का आदेश
मनोहरदास बाबा का आदेश - अभी समय नहीं हुआ
▶ देखें (18:47) ▶ Watch (18:47)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि एक दिन सिद्ध मनोहरदास बाबा ने गुरुदेव से कहा - 'गोसाई, अभी भी तुम्हारा कर्म बाकी है, तुमको जाना पड़ेगा। अभी भी तुम्हारा समय हुआ नहीं, कुछ काम बाकी है।' गुरुदेव ने पूछा - 'तो क्या करें?' मनोहरदास बाबा ने कहा - 'तुम जाओ, अभी घर चले जाओ।' गुरुदेव ने कहा - 'हम तो साधु बनने के लिए आए हैं, हम घर क्यों जाएंगे? हमारे पास पैसा भी नहीं है।' मनोहरदास बाबा ने कहा - 'जाओ वृंदावन में, बंगाल से किसी ने तुम्हारे लिए पैसा भेजा है, उस पैसे को लेकर तुम चले जाओ।' वृंदावन आकर सुना कि सचमुच किसी भक्त ने उनके नाम से पैसा भेजा है। वह पैसा लेकर फिर बंगाल गए।
🔗 सिद्ध महापुरुष साधक के प्रारब्ध को जानकर मार्गदर्शन करते हैं।
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एकांतता की आवश्यकता
भगवत प्राप्ति के लिए एकांतता अनिवार्य
▶ देखें (19:49) ▶ Watch (19:49)
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि वास्तविक भगवत प्राप्ति के लिए एकांतता बहुत आवश्यक है। जो साधक भगवत प्राप्ति तो दूर, अनुभव जगत में किंचित भी प्रवेश नहीं कर पाए हैं, यदि वे बहुसंघ अर्थात बहुत लोगों के संसर्ग-संपर्क में रहते हैं, तो वास्तव में उनका मन आगे नहीं बढ़ सकता, वे अनुभव की स्थिति में पहुँचना कदापि संभव नहीं। सीधी बात है - एकांत होना ही पड़ेगा। सद्गुरुदेव इस विषय पर गीता के श्लोक का उल्लेख करते हैं:
🔗 एकांत भजन की अनिवार्य शर्त है।
एकांत में भजन का विधान— भगवद्गीता Bhagavad Gita 6.10
▶ 20:30
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः। एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥
yogī yuñjīta satatam ātmānaṁ rahasi sthitaḥ | ekākī yata-cittātmā nirāśīr aparigrahaḥ ||
योगी एकांत स्थान में स्थित होकर, अकेला रहकर, चित्त और आत्मा को वश में करके, आशा और परिग्रह से रहित होकर सतत आत्मा को भगवान में लगाए।
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एकांत के तीन प्रकार
एकांतता के तीन स्तर - बाह्य, पारिवारिक एवं आंतरिक
▶ देखें (20:40) ▶ Watch (20:40)
सद्गुरुदेव एकांत शब्द की व्याख्या करते हुए बताते हैं कि एकांत का अर्थ है 'एका अंत' अर्थात तुम अकेले हो, और कोई नहीं है। जंगल में जाकर दो-चार जनों के साथ रहना एकांत नहीं कहलाएगा। एकांत के तीन प्रकार हैं: (1) बाह्य एकांत - लोक संसर्ग से दूर रहना, (2) पारिवारिक एकांत - घर में रहते हुए भी अपने प्रियजनों के संसर्ग-संपर्क से भी एकांत, (3) आंतरिक एकांत - यह सबसे महत्वपूर्ण है, जहाँ दृश्यमान जागतिक कोई विषय, कोई चिंता चित्त में किंचित समय के लिए भी प्रवेश न करे। वहाँ बस भगवत चिंतन में एक तल्लीनता, तन्मयता हो। यही सर्वोत्तम एकांतता है। कहीं भी रहो, मन रँगना चाहिए। मन में दृश्यमान जागतिक कोई भी विषय - शुभ हो या अशुभ - चित्त में प्रवेश करके चित्त विक्षेप नहीं होनी चाहिए। सद्गुरुदेव इसे स्पष्ट करते हुए गीता का श्लोक उद्धृत करते हैं:
🔗 सच्चा एकांत बाहरी नहीं, आंतरिक है।
स्थितप्रज्ञ का लक्षण— भगवद्गीता Bhagavad Gita 2.56
▶ 21:52
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः। वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥
duḥkheṣv anudvigna-manāḥ sukheṣu vigata-spṛhaḥ | vīta-rāga-bhaya-krodhaḥ sthita-dhīr munir ucyate ||
जो दुःखों में उद्विग्न नहीं होता, सुखों में जिसकी स्पृहा नहीं है, जो राग, भय और क्रोध से रहित है - वह स्थिर बुद्धि वाला मुनि कहलाता है।
📌 एकांत के तीन प्रकार:
  • बाह्य एकांत - लोक संसर्ग से दूर रहना
  • पारिवारिक एकांत - प्रियजनों के संपर्क से भी दूरी
  • आंतरिक एकांत (सर्वोत्तम) - मन में भगवत चिंतन के अतिरिक्त किसी विषय का प्रवेश न हो
निष्प्रिय होने की शर्त
एकांत की पूर्वशर्त - निष्प्रियता
▶ देखें (22:33) ▶ Watch (22:33)
सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि जंगल में जाने से कुछ लाभ नहीं यदि मन एकांत नहीं है। मन में नाना प्रकार की वासना, कामना, संकल्प-विकल्प हों तो एकांत जाने से कुछ होता नहीं। एकांत में तभी जाना चाहिए जब हृदय में भगवत प्राप्ति को छोड़कर किसी भी वस्तु-पदार्थ के प्रति किंचित मात्र भी आसक्ति न हो, कोई चाहन न हो - अर्थात निष्प्रिय हो। तभी एकांतता मंगलकारी होती है। परंतु यदि मन में कामना, वासना, इच्छा और चाहन है तो एकांत में रहने का कोई लाभ नहीं। गीता में कहा है - 'निराशी' अर्थात कोई आशा नहीं रखना चाहिए। यदि मन में कोई आशा है तो वह आशा ही कामना बन जाती है।
🔗 निष्प्रियता एकांत भजन की अनिवार्य पूर्वशर्त है।
✅ करें:
  • भगवत प्राप्ति के अतिरिक्त सर्वत्र निष्प्रिय हो जाना
❌ न करें:
  • मन में कामना-वासना रखकर एकांत में जाना
कर्म का प्रेरक - कामना
कामना ही कर्म का प्रेरक है
▶ देखें (23:15) ▶ Watch (23:15)
सद्गुरुदेव गहन दार्शनिक सिद्धांत प्रस्तुत करते हैं कि कामना ही कर्म का प्रेरक बनकर साधक को कर्म में प्रेरित करके कर्म करने में मजबूर कर देती है। हम जो भी कर्म करते हैं, उसका प्रेरक कौन है? हमारा प्रयोजन बोध, आशा, कामना, स्पृहा। जब तक कामना है, स्पृहा है, तब तक कर्म है और कर्म से निवृत्ति संभव नहीं। कर्म किसी को कराता नहीं है - तुम्हारा प्रयोजन बोध ही तुम्हारे कर्म का प्रेरक है। जिसको जिस विषय में स्पृहा है, वही वस्तु प्राप्ति के लिए उसकी समस्त चेष्टा होती है। उदाहरण के लिए, जिसकी संसार में आसक्ति है, उसको पैसा चाहिए। उसका मन पैसे में लगा है - कहाँ पैसा मिलेगा, कैसे धन मिलेगा? क्योंकि उसकी स्पृहा है और आसक्ति पूर्ति के लिए पैसा चाहिए, इसलिए उसकी हर चेष्टा धन कमाने की ओर होती है। यही उसके कर्म का प्रेरक है।
🔗 कामना ही समस्त कर्मों का मूल प्रेरक है।
📌 कर्म का प्रेरक तंत्र:
  • प्रयोजन बोध → आशा → कामना → स्पृहा → कर्म
  • जब तक कामना, तब तक कर्म से निवृत्ति असंभव
  • जिसमें स्पृहा, उसी की प्राप्ति हेतु समस्त चेष्टा
भजन का समय और प्रेरणा
भजन का समय क्यों नहीं मिलता?
▶ देखें (24:17) ▶ Watch (24:17)
सद्गुरुदेव एक सामान्य शिकायत पर टिप्पणी करते हैं। लोग कहते हैं - 'हमारे पास भजन करने का समय नहीं है, इतना काम है, इतनी व्यस्तता है। आप लोग तो त्यागी हैं, हम क्या करें? इच्छा है, कोशिश करते हैं, परंतु समय नहीं मिलता। बहुत कोशिश से चार फेरा माला होती है।' सद्गुरुदेव तीक्ष्ण टिप्पणी करते हैं - 'उनका माला करने का समय नहीं और हमारा माला छोड़ने का समय नहीं।' जब कोई आता है तो बाबा कहते हैं - 'माफ कीजिए, अभी जाइए, अभी हमारा बहुत नियम है, पीछे बात करेंगे।' क्यों? क्योंकि हमारे कर्म का प्रेरक हमारी प्रेरणा है - हमको भगवत प्राप्ति करनी है। यह लालसा ही भजन का प्रेरक है। भजन जोर से थोड़े ही होता है, 'भजन करो, भजन करो' कहने से नहीं होता।
🔗 भगवत प्राप्ति की लालसा ही भजन का सच्चा प्रेरक है।
❓ प्रश्न: भजन का समय क्यों नहीं मिलता? ▶ 24:17
💡 उत्तर: भजन का समय न मिलना वास्तव में भगवत प्राप्ति की लालसा का अभाव दर्शाता है। जिसके कर्म का प्रेरक संसार है, उसका समय संसार में लगता है। जिसके कर्म का प्रेरक भगवत प्राप्ति है, उसका समय भजन में स्वाभाविक रूप से लगता है। भजन जबरदस्ती नहीं होता, यह भगवत प्राप्ति की तीव्र लालसा से स्वाभाविक होता है।
⚖️ समय का उपयोग
संसारी: माला करने का समय नहीं - क्योंकि प्रेरक संसारिक स्पृहा है
साधक: माला छोड़ने का समय नहीं - क्योंकि प्रेरक भगवत प्राप्ति की लालसा है
कर्म-प्रेरणा और भजन का सिद्धांत
कामना को कर्म का मूल प्रेरक बताते हुए भजन न करने के बहानों का खंडन करना
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श्री रघुनाथ दास गोस्वामी का त्याग
कुबेर-सम संपत्ति का विष्ठा-सम परित्याग - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी
▶ देखें (25:50) ▶ Watch (25:50)
सद्गुरुदेव दृष्टांत देते हैं कि ऐसे राजा-महाराजा घर छोड़कर चले गए हैं भगवत् प्राप्ति का उद्देश्य लेकर। श्री रघुनाथ दास गोस्वामी के पास कुबेर-सम ऐश्वर्य था, अप्सरा-सम भार्या थी, परंतु उनके मन को किंचित समय के लिए भी आकर्षित करना संसार के लिए असंभव हो गया। कोई भी वस्तु-पदार्थ उनके मन को आकर्षित नहीं कर पाया। समस्त संपत्ति को विष्ठा के समान परित्याग करके रात्रि के अंधकार में जगन्नाथपुरी के लिए निकल गए। उनकी प्रेरणा थी - 'हमको महाप्रभु के सानिध्य में जाना है।' यही भगवत् प्राप्ति की स्पृहा उनके समस्त कर्मों की प्रेरक थी।
🔗 यह दृष्टांत सिद्ध करता है कि तीव्र भगवत् प्राप्ति की स्पृहा से ही सच्चा वैराग्य आता है।
📌 श्री रघुनाथ दास गोस्वामी का वैराग्य:
  • कुबेर-सम ऐश्वर्य - किंतु मन में आसक्ति नहीं
  • अप्सरा-सम भार्या - किंतु किंचित आकर्षण नहीं
  • समस्त संपत्ति का विष्ठा-सम परित्याग
  • रात्रि के अंधकार में जगन्नाथपुरी गमन
  • प्रेरणा - महाप्रभु का सानिध्य प्राप्त करना
वर्तमान क्षण का महत्व
सबसे उत्तम समय अभी है - शुभ दिन की प्रतीक्षा मूर्खता
▶ देखें (26:42) ▶ Watch (26:42)
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि यह दुर्लभ मानव जीवन रहते-रहते यदि भगवत् प्राप्ति नहीं हुई तो बहुत भारी भूल हो जाएगी। फिर न जाने कालचक्र कहाँ से कहाँ ले जाएगा, फिर कौन योनि में जाना पड़ेगा, फिर कब मानव जन्म मिलेगा। और मानव जन्म मिलने से भी क्या होगा? उस समय भी ऐसी ही परिस्थिति होगी, माया थोड़े ही छोड़ेगी। सबसे उत्तम समय अभी मिल गया है - इसको यूटिलाइज़ करो। कल के शुभ दिन के इंतज़ार नहीं करना। जो शुभ दिन के इंतज़ार करता है, वह सर्वोत्तम मूर्ख है - कभी वह मंगल नहीं कर सकता। वर्तमान के एक-एक पल, एक-एक क्षण को काम में लगाओ - हरि भजन करो।
🔗 वर्तमान क्षण का सदुपयोग ही भजन की सफलता का मार्ग है।
✅ करें:
  • वर्तमान के प्रत्येक क्षण को भजन में लगाओ
  • मुख में अखंड नाम रखो, मन में अखंड चिंतन करो
  • दृश्यमान जगत को माया जानो
❌ न करें:
  • कल के शुभ दिन की प्रतीक्षा मत करो
  • मानव जीवन को व्यर्थ मत गँवाओ
सद्गुरुदेव की वैराग्य यात्रा
गुरुदेव के त्याग, साधना और राधा दर्शन की अलौकिक कथा
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श्री सिद्ध मनोहर बाबा के पास आगमन
समस्त परित्याग करके श्री सिद्ध मनोहर बाबा के पास आगमन
▶ देखें (28:46) ▶ Watch (28:46)
सद्गुरुदेव अपने गुरुदेव की वैराग्य यात्रा का वर्णन करते हुए बताते हैं कि उन्होंने देखा कि समय बीतता जा रहा है। तब सब कुछ परित्याग करके एक दिन श्री सिद्ध मनोहर बाबा के पास चले आए। वहाँ कुछ दिन रहे और फिर निश्चय किया कि अब देश परिवर्तन करके जंगल-जंगल घूमेंगे, साधु बनेंगे, त्यागी बनेंगे। परंतु एक समस्या आई - वे गोसाईं थे, आचार्य संतान थे। उनको दीक्षा देकर, कोपिन देकर कौन उनका गुरु बनेगा? सब कहते थे - 'आपको प्रणाम करेंगे, पर गुरु बनने से हम असमर्थ हैं, आपको वैराग देने में हम समर्थ नहीं हैं। कहीं और जाइए।'
🔗 वैराग्य मार्ग में आचार्य संतान होने की विशेष चुनौती।
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स्वयं डोर-कोपिन धारण
चंद्रमा और राधा रानी को साक्षी करके स्वयं डोर-कोपिन धारण
▶ देखें (29:27) ▶ Watch (29:27)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि जब किसी ने गुरुदेव को डोर-कोपिन देने की स्वीकृति नहीं दी, तो वे विरक्त होकर श्री सिद्ध मनोहर बाबा के पास से एक डोर-कोपिन लेकर चंद्रमा को साक्षी करके, भगवती श्री राधा को साक्षी करके स्वयं ही पहन लिया। डोर-कोपिन और दंड-कमंडल धारण कर लिया। कभी भैरव वास नहीं पहने, सदा ऐसे कोपिन ही पहनते थे - यही उनका पोशाक था। इस प्रकार पूर्ण विरक्त होकर वृंदावन के जंगलों में एकांत में तीव्र भजन करने लगे।
🔗 परम वैराग्य का प्रतीक - स्वयं साक्षी मानकर त्याग।
❓ प्रश्न: गुरुदेव को किसने वैराग दिया? ▶ 29:27
💡 उत्तर: सद्गुरुदेव बताते हैं कि आचार्य संतान होने के कारण कोई भी उनके गुरुदेव को दीक्षा देने और कोपिन देने को तैयार नहीं था। सब कहते थे कि प्रणाम करेंगे, पर गुरु नहीं बनेंगे। तब गुरुदेव ने श्री सिद्ध मनोहर बाबा के पास से डोर-कोपिन लेकर, चंद्रमा और राधा रानी को साक्षी मानकर स्वयं ही धारण कर लिया।
📌 गुरुदेव का वेश-परिधान:
  • डोर-कोपिन (कौपीन)
  • दंड-कमंडल
  • कभी भैरव वास नहीं पहने
  • यही सदा का पोशाक रहा
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वृंदावन में तीव्र भजन और प्रेम सरोवर में राधा दर्शन
प्रेम सरोवर में श्री राधा रानी का अनाव्रित दर्शन
▶ देखें (29:58) ▶ Watch (29:58)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि 70-80 वर्ष पहले वृंदावन में जंगल ही जंगल था। गुरुदेव एकांत में जंगल-जंगल घूमते हुए तीव्र भजन करते रहे। समस्त ब्रजमंडल में एक जगह नहीं रहते थे। जंगल-जंगल घूमते-घूमते प्रेम सरोवर आए। वहाँ श्री वल्लभाचार्य जी ने कृपा की, श्री विट्ठलनाथ जी ने कृपा की। उसके पश्चात् प्रेम सरोवर में साक्षात् श्री राधा रानी ने गुरुदेव को अनाव्रित दर्शन प्रदान करके उनको कृतार्थ किया। यह बात गुरुदेव ने किसी को नहीं कही थी। एक बार उनके परम मित्र गोवर्धन के श्री प्रिय चरण बाबा ने उनको पकड़कर वचन लिया और पूछा - 'राधा रानी ने आपको दर्शन दिए हैं कि नहीं?' तब गुरुदेव ने कहा - 'प्रेम सरोवर में हमको राधा रानी ने पूर्ण कृपा की।'
🔗 तीव्र एकांत भजन का परम फल - राधा दर्शन।
❓ प्रश्न: राधा रानी के दर्शन के पश्चात् क्या आदेश हुआ? ▶ 31:20
💡 उत्तर: सद्गुरुदेव बताते हैं कि राधा रानी ने दर्शन देने के पश्चात् आदेश किया - 'जो साधना होनी थी, कृपा तो हो गई, अब हम तुम्हारे साथ हैं। लेकिन अब तुम प्रचार करो, जगत कल्याण के लिए आगे बढ़ते रहो।' इस आदेश के पश्चात् गुरुदेव प्रचार कार्य में लग गए - ब्रज के गाँव-गाँव में जाकर भागवत सप्ताह करना, दीक्षा देना आदि।
📌 प्रेम सरोवर में प्राप्त कृपा:
  • श्री वल्लभाचार्य जी की कृपा
  • श्री विट्ठलनाथ जी की कृपा
  • राधा रानी का प्रचार कार्य का आदेश
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बंशीबट में लकवा
बंशीबट में गुरुदेव को लकवा मारना - महापुरुष की लीला
▶ देखें (31:51) ▶ Watch (31:51)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि प्रचार कार्य आरंभ करने के पश्चात् गुरुदेव बंशीबट में आए। वहाँ एक बहुत ही गुफा जैसे, मैला-कुचला, कच्चा स्थान था। वहाँ रहकर तीव्र भजन कर रहे थे। उस समय अचानक उनको लकवा मार गया। यह भी महापुरुष का एक नाटक है - न जाने क्या लीला करते हैं बड़े-बड़े महापुरुष! कभी जीवन में ऐसा दिखता है कि कोई-कोई व्याधि को शिकार कर लेते हैं। क्यों करते हैं? यह पता नहीं। क्यों होता है? यह भी पता नहीं। उसके पश्चात् उनको राधाकुंड-गोवर्धन में लाया गया। वहाँ वैद्यों ने नाना प्रकार के तेल आदि से मालिश की, दवाइयाँ दीं। कुछ वर्षों के उपचार से कुछ हद तक ठीक हो गए - चल-फिर लेते थे, पहले जैसी ताकत नहीं आई, पर शौच-क्रिया आदि स्वयं कर लेते थे।
🔗 महापुरुषों की लीला अगम्य होती है।
वक्ता का स्वयं लकवा अनुभव
सद्गुरुदेव का स्वयं लकवा और गुरु कृपा से बिना दवा स्वस्थ होना
▶ देखें (33:23) ▶ Watch (33:23)
सद्गुरुदेव अपना व्यक्तिगत अनुभव सुनाते हैं कि 45 वर्ष पहले उन्हें भी एक बार लकवा मार गया था। उस समय वे मुरारी मोहन में गुरुदेव के पास रहते थे। गुरुदेव की कृपा से बिना किसी दवा के लकवा ठीक हो गया। यह अंग लकवाग्रस्त हो गया था, परंतु एक मात्र गुरु कृपा से, बिना किसी दवा-पानी के पूर्णतः स्वस्थ हो गए। यह गुरुदेव की अलौकिक शक्ति का प्रत्यक्ष प्रमाण था।
🔗 गुरु कृपा की अलौकिक शक्ति का प्रत्यक्ष प्रमाण।
गुरुदेव की अलौकिक शक्ति के प्रमाण
गुरुदेव की दिव्य शक्ति और निष्प्रियता का वर्णन
🌟
जीवन लाल नेताजी की चमत्कारिक कथा
ट्रैक्टर दुर्घटना से टूटी कमर - गुरुदेव के आशीर्वाद से चलना संभव
▶ देखें (33:54) ▶ Watch (33:54)
सद्गुरुदेव गुरुदेव की अलौकिक शक्ति का प्रमाण देते हुए जीवन लाल नेताजी की कथा सुनाते हैं। वे बैठेन गाँव में रहते थे, बड़े प्रेमी भक्त थे। एक दिन रास्ते में ट्रैक्टर ने धक्का मार दिया, कमर के ऊपर से ट्रैक्टर चला गया। कमर की हड्डी टुकड़े-टुकड़े हो गई। हॉस्पिटल में तीन दिन अचेत रहे। चौथे दिन जब चेतना आई, तब डॉक्टरों ने कहा - 'यह कभी ठीक नहीं होगा, कभी चल नहीं पाएगा। अगर बैठा भी रहेगा, ठीक हो गया, तो भी स्वयं चल नहीं पाएगा।' यह सुनकर जीवन लाल जी फूट-फूटकर रोने लगे - 'ऐसे जीवन से क्या लेना-देना? जीवन भर दूसरों के सहारे जीना पड़ेगा।' तभी देखते हैं कि उनके मस्तक के पास गुरुदेव बैठे हैं। गुरुदेव ने कहा - 'जीवन, तुम चिंता क्यों करते हो? तुम चिंता मत करो, तुम ठीक हो जाओगे।' ऐसा कहकर माथे पर हाथ फेरकर चले गए। तीन दिन बाद वह पेशेंट खड़ा हो गया जिसके बारे में डॉक्टरों ने कहा था कि कभी चल नहीं पाएगा। धीरे-धीरे चलना भी शुरू कर दिया और 15-20 दिन बाद चलकर घर भी आ गया। डॉक्टर लोग चकित हो गए। जब पूछा तो जीवन लाल जी ने बताया - 'बाबा की कृपा से ठीक हो गए, बाबा हॉस्पिटल में देखने आए थे और आशीर्वाद करके चले गए।' परंतु बाबा उस समय नवद्वीप में थे - वहाँ थे ही नहीं। फिर भी वहाँ जाकर आशीर्वाद करके ठीक कर दिया।
🔗 गुरुदेव की सर्वव्यापकता और अलौकिक शक्ति का प्रमाण।
📌 जीवन लाल नेताजी की कथा:
  • ट्रैक्टर दुर्घटना में कमर की हड्डी टुकड़े-टुकड़े
  • डॉक्टरों का निर्णय - कभी चल नहीं पाएगा
  • गुरुदेव का हॉस्पिटल में प्रकट होकर आशीर्वाद
  • तीन दिन में खड़े हो गए
  • दिन में चलकर घर आ गए
  • गुरुदेव उस समय नवद्वीप में थे - फिर भी प्रकट हुए
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गुरुदेव का भागने का नियम
भीड़-भड़क्का होते ही बिना बताए भाग जाना - गुरुदेव का नियम
▶ देखें (36:19) ▶ Watch (36:19)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि 1980 में वे गुरुदेव के सानिध्य में आए और उनकी सेवा में रहे। गुरुदेव का एक विशेष नियम था - जब थोड़ा सा भीड़-भड़क्का शुरू हो जाता था, तो वे किसी को बिना बताए भाग जाते थे। कहाँ जाएंगे, किसी को नहीं बताते थे। एक बार गिरिराज गोवर्धन में जंगल में रहते समय सीतानाथ दा को बोले - 'सीतानाथ, मैं जा रहा हूँ।' सीतानाथ दा ने पूछा - 'बाबा कहाँ जाएंगे?' बाबा बोले - 'मैं जा रहा हूँ।' 'अरे बाबा, अभी तो बिस्तर...' 'तू बिस्तर लेकर आ जा, मैं जा रहा हूँ।' 'बाबा कहाँ जा रहे हैं?' कोई उत्तर नहीं। ऐसा था उनका नियम - एकांत की खोज में बिना बताए भाग जाते थे।
🔗 एकांत प्रेमी गुरुदेव का स्वभाव।
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गोवर्धन में भीषण बीमारी और गुरुदेव का जाना
आमाशय रोग से मरणासन्न - गुरुदेव बिना बताए वृंदावन चले गए
▶ देखें (37:10) ▶ Watch (37:10)
सद्गुरुदेव अपना अनुभव सुनाते हैं कि गोवर्धन में गिरिराज गोवर्धन तराटी के जंगल में रहते समय उन्हें भीषण आमाशय रोग (स्ट्रॉन्ग डिसेंट्री) हो गया। गर्मी का मौसम था, पानी नहीं, खाना नहीं। दोपहर 1 बजे गर्म बालू वाले रास्ते से माधुरी लाने जाते थे। सूखी रोटी भी डिब्बे में नहीं रखते थे - पेड़ पर टाँग देते थे, गिलहरी आधा पोंछ करके चली जाती थी। दो-चार टुकड़े जो बचते थे, वही खाकर रहना पड़ता था। जंगल में रहने का घर तो था नहीं। इस तरह से स्ट्रॉन्ग आमाशय रोग हो गया। एक दिन तो मरने की नौबत आ गई। सुबह एक बुजुर्गी के पास जाकर पड़े रहे। और गुरुदेव ने क्या किया? 'सीतानाथ, चल रे' बोलकर सीधे वृंदावन चले गए! उन्हें अकेला छोड़कर, बीमार अवस्था में, वे एकमात्र प्रधान अंग-सेवक थे - और गुरुदेव बिना बताए चले गए।
🔗 गुरु की निष्प्रियता की परीक्षा।
📌 गोवर्धन जंगल में कठिनाइयाँ:
  • गर्मी में गर्म बालू पर चलकर माधुरी लाना
  • सूखी रोटी पेड़ पर टाँगना - गिलहरी का हिस्सा
  • जो बचता वही खाना
  • रहने का कोई स्थान नहीं
  • भीषण आमाशय रोग (डिसेंट्री)
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गोपी गीत का श्लोक - गुरु की निष्प्रियता का सिद्धांत
भक्तों को भजते नहीं, अभक्तों को भी भजते नहीं - चार श्रेणियाँ
▶ देखें (40:25) ▶ Watch (40:25)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि एक भक्त ने उन्हें 12 पैसे और एक इंट्रोस्ट्रिप टैबलेट दी। वह खाकर सुबह ठीक हो गए और तुरंत वृंदावन गुरुदेव के पास पहुँचे। गुरुदेव ने कहा - 'विनोद, तुम आ गए! अरे, हम बहुत चिंता कर रहे थे तुम्हारे लिए।' तब श्रीमद् भागवतम् का गोपी गीत का वह श्लोक याद आया जिसमें भगवान की चार श्रेणियाँ बताई गई हैं - जो भक्तों को भजते हैं, जो भक्तों को नहीं भजते, जो अभक्तों को भी भजते हैं, जो अभक्तों को भी नहीं भजते। तब उन्होंने सोचा - 'हमारे गुरुदेव कौन सी श्रेणी में आते हैं? हम एकमात्र सेवक, हमें बीमार छोड़कर चले गए।' तब स्पष्ट हो गया कि गुरुदेव लोकातीत हैं, इंद्रियातीत हैं, गुणातीत हैं। साधारण मनुष्य के लिए ऐसी निष्प्रियता दिखाना संभव नहीं - एक द्रष्टा पुरुष ही ऐसा कर सकता है। सद्गुरुदेव ने इससे शिक्षा ली कि गुरु का कार्य देह-देहिक सुविधा देना नहीं, दवा का प्रबंध करना नहीं - गुरु सिर्फ आत्म कृपा करने के लिए है।
🔗 गुरु की निष्प्रियता आत्म कृपा का ही रूप है।
भगवान की चार श्रेणियाँ - भक्त वत्सलता का रहस्य— श्रीमद् भागवतम् Srimad Bhagavatam 10.32.20
▶ 40:35
संदर्भ पूरक संदर्भ
न पारये ऽहं निरवद्य-संयुजां स्व-साधु-कृत्यं विबुधायुषापि वः। या माभजन् दुर्जय-गेहशृङ्खलाः संवृश्च्य तद् वः प्रतियातु साधुना॥
na pāraye 'haṁ niravadya-saṁyujāṁ sva-sādhu-kṛtyaṁ vibudhāyuṣāpi vaḥ। yā mābhajan durjaya-geha-śṛṅkhalāḥ saṁvṛścya tad vaḥ pratiyātu sādhunā॥
हे निर्दोष गोपियो! तुमने जो दुर्जय गृह-शृंखलाओं को तोड़कर मुझे भजा है, उसका प्रतिफल देवताओं की आयु में भी मैं नहीं दे सकता। तुम्हारी भक्ति ही तुम्हारा पुरस्कार हो।
❓ प्रश्न: गुरु का वास्तविक कार्य क्या है? ▶ 41:46
💡 उत्तर: सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि गुरु का कार्य शिष्य की देह-देहिक सुविधाओं का प्रबंध करना नहीं है। गुरु तुम्हारे लिए दवा का व्यवस्था करेंगे, ऐसा मत समझना। यह गुरुदेव ने शिक्षा देने के लिए दिखाया। गुरु सिर्फ आत्म कृपा करने के लिए हैं। भारी कृपा तो है ही - बिना दवा, मरणासन्न अवस्था में, सुबह ठीक होकर प्रीत्त बनना - यह गुरु कृपा का ही फल था।
📌 गुरुदेव की श्रेणी:
  • लोकातीत - लौकिक मोह से परे
  • इंद्रियातीत - इंद्रियों के वश में नहीं
  • गुणातीत - सत्त्व-रज-तम से परे
  • द्रष्टा पुरुष - साक्षी भाव में स्थित
शिष्य की कठोर परीक्षा की लीलाएँ
गुरु सेवा में कठोर परीक्षाओं का वर्णन
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तख्त ढोने की परीक्षा
गोवर्धन से राधाकुंड तक तख्त ढोना - गुरु कृपा का प्रमाण
▶ देखें (42:17) ▶ Watch (42:17)
सद्गुरुदेव एक कठोर परीक्षा की कथा सुनाते हैं। एक बार राधाकुंड में गुरुदेव थे और गिरिराज गोवर्धन तराटी से उन्हें आदेश मिला कि गुरुदेव का तख्त (जंगल में कीड़े-मकोड़ों से बचने के लिए जिस पर विश्राम करते थे) राधाकुंड पहुँचाओ। भाई, माथे पर ढोना तो आदत नहीं थी - पहले कुर्सी में बैठने की नौकरी करते थे। दोपहर के समय तख्त लेकर चले। आते-आते कुसुम सरोवर तक आए - तब लगा कि माथे की चाँदी फट जाएगी, एक कदम चलना संभव नहीं। विवश होकर तख्त गिरा दिया। कुसुम सरोवर गोवर्धन और राधाकुंड के मध्य में है। सोचा - तख्त छोड़कर जा नहीं सकते क्योंकि गुरुदेव का तख्त है; तख्त लेकर जा नहीं सकते क्योंकि सामर्थ्य नहीं है। बड़ी चिंता में पड़ गए - कोई सहारा देने वाला नहीं था। तभी राधाकुंड में गुरुदेव को खबर हो गई। उन्होंने गुरुभाई गौरहरी को भेजा - 'तू दौड़ते-दौड़ते जा, कुसुम सरोवर में विनोद तख्त लेकर बैठा है, दोनों मिलकर तख्त ले आ।' देखते हैं गौरहरी भैया दौड़ते-दौड़ते आ रहे हैं। दोनों मिलकर तख्त लेकर आ गए।
🔗 गुरु सेवा में विपत्ति आने पर भी गुरु स्वयं सहायता भेजते हैं।
📌 तख्त ढोने की परीक्षा:
  • गिरिराज गोवर्धन से राधाकुंड तक
  • दोपहर की गर्मी में माथे पर ढोना
  • कुसुम सरोवर में असमर्थ होकर रुके
  • गुरुदेव को दूर से खबर हो गई
  • गौरहरी भैया को सहायता भेजी
❄️
कठोर परीक्षा - खाने-रहने का कोई प्रबंध नहीं
आश्रम में कोई सुविधा नहीं - पोष-माघ में चौड़ाई में शयन
▶ देखें (45:05) ▶ Watch (45:05)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि आश्रम में खाने के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी - एक रोटी नहीं देते थे, एक गिलास पानी भी नहीं देते थे। रहने के लिए कोई स्थान नहीं था। ठंडी मौसम में चौड़ाई (बरामदे) में पड़े रहते थे। पोष-माघ महीने में कंबल नहीं था - माथे में ईंट, नीचे बोरा, एक रुई का चादर और एक सूती का कपड़ा - बस इतना ओढ़कर सारी रात चौड़ाई में पड़े रहते थे। लेकिन राधा जी की कृपा से ठंड लगती नहीं थी - न जाने राधा जी की ऐसी कृपा थी। इस प्रकार की तीव्र परीक्षाएँ होती थीं।
🔗 कठोर परीक्षा में भी राधा कृपा ही सहारा है।
📌 कठोर परीक्षा की परिस्थितियाँ:
  • आश्रम में एक रोटी नहीं मिलती थी
  • एक गिलास पानी भी नहीं देते थे
  • रहने का कोई स्थान नहीं था
  • पोष-माघ की ठंड में चौड़ाई में शयन
  • कंबल नहीं - ईंट, बोरा, सूती चादर से काम
  • राधा जी की कृपा से ठंड नहीं लगती थी
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कोकिलाबन में घास खाकर रहना
हेलेंचा शाक और सूखी रोटी - कोकिलाबन में एक मास का कठोर जीवन
▶ देखें (46:50) ▶ Watch (46:50)
सद्गुरुदेव आगे की यात्रा का वर्णन करते हैं। प्रेम सरोवर से चलकर कामेर बैठन के पास गए, फिर सीधे कोकिलाबन आ गए। उस समय कोकिलाबन में जंगल था। जहाँ शनिदेव का मंदिर है, वहाँ कोई मंदिर नहीं था - ऊपर छत थी और खुला था। जहाँ वे शौचादि क्रिया के लिए जाते थे, वहाँ आज विशाल बड़े-बड़े मकान और VIP स्थान बन गए हैं - उस समय सब घना जंगल था। वहाँ रहते समय खाने के लिए जंगल का घास - पानी में उगने वाला हेलेंचा शाक - लाकर पानी में उबालकर, उसमें नमक डालकर खाते थे। आटा माँगने के लिए जाबट जाते थे - तीन-चार किलोमीटर दूर। कोई-कोई भाई को बिना मतलब भिक्षा करके लाते थे। जो रोटी मिलती वह भी ऐसी - एक तरफ मोटी, एक तरफ पतली, एक तरफ जली हुई, एक तरफ कच्ची। कभी ऑस्ट्रेलिया का नक्शा, कभी भारत का मानचित्र - रोटी नहीं, डिज़ाइन! नमक नहीं, मिर्च नहीं - घास को पानी में उबालकर नमक डालकर इसी के साथ खाओ। एक महीने ऐसे रहकर बीमार पड़ गए - एकदम उल्टी शुरू हो गई।
🔗 साधक जीवन में आहार की कठिनाइयाँ भी परीक्षा का अंग हैं।
📌 कोकिलाबन का कठोर जीवन:
  • घना जंगल - आज के VIP स्थान वहीं हैं
  • हेलेंचा शाक (पानी का घास) उबालकर खाना
  • नमक मात्र - मिर्च नहीं
  • किलोमीटर जाकर आटा माँगना
  • रोटी - एक तरफ मोटी, एक तरफ पतली, जली-कच्ची
  • एक महीने में बीमार पड़ गए - उल्टी शुरू
ब्रजमण्डल में कठोर वैराग्य तपस्या
गुरुदेव के साथ विभिन्न स्थानों पर की गई कठोर तपस्या एवं अखाद्य भोजन का वर्णन
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अक्षयवट में लाल पत्तों का साग
अक्षयवट में सीतानाथ दादा का विचित्र भोजन प्रबंध
▶ देखें (48:36) ▶ Watch (48:36)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि कोकिलाबन से निकलकर वे अक्षयवट पहुँचे। वहाँ सीतानाथ दादा भोजन की व्यवस्था करते थे — उनकी मानसिकता भी अत्यंत विचित्र थी, भगवान ने उन्हें एक अलग ही डिज़ाइन में बनाया था। एक दिन उन्होंने कहा 'टोकरी लो' — पूछने पर बताया कि साग लाना है। खेत में एक प्रकार की लाल-लाल पत्ती वाली घास होती थी — टोकरी भरकर लाकर उसी को उबालकर खिलाया जाता था। सद्गुरुदेव कहते हैं — 'भाई, यह कहाँ से डिज़ाइन आ गया? यह भी घास ही है, बस दूसरी क्वालिटी की!'
🔗 विभिन्न स्थानों पर समान कष्टकारी आहार की निरंतरता
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रेडीमेड कढ़ी का प्रकरण
भात के माँड़ से बनी 'रेडीमेड कढ़ी' — हास्यास्पद किन्तु कष्टकारी
▶ देखें (50:01) ▶ Watch (50:01)
सद्गुरुदेव एक हास्यास्पद किन्तु कष्टकारी प्रसंग सुनाते हैं। एक दिन किसी ने सीतानाथ दादा से कहा कि आज कढ़ी बनाइए। सद्गुरुदेव ने सोचा कि आज तो घास से मुक्ति मिलेगी, कम से कम मुँह को कुछ स्वाद तो मिलेगा। परन्तु सीतानाथ दादा ने क्या किया? भात का माँड़ (चावल का पानी) बाल्टी में लिया — वह तो सफ़ेद था। कढ़ी का रंग पीला होता है, तो उसमें हल्दी मिला दी। फिर नमक डाला। मिर्च तो थी नहीं — तो बस ऐसे ही परोस दिया। खाते समय एक कौर मुँह में डाला तो सद्गुरुदेव कहते हैं — 'भाई, ज़हर दे दो तो खा लेंगे, यह ज़हर से भी ख़तरनाक है!' यह 'रेडीमेड कढ़ी' थी — भात के माँड़ में हल्दी-नमक डालकर बनाई गई।
🔗 वैराग्य जीवन में भोजन की अत्यंत कठिन परिस्थितियाँ
📌 रेडीमेड कढ़ी की विधि:
  • भात का माँड़ (चावल का पानी) — आधार
  • हल्दी — पीला रंग लाने हेतु
  • नमक — स्वाद हेतु
  • मिर्च — उपलब्ध नहीं थी
  • परिणाम — ज़हर से भी ख़राब स्वाद
🌱
तपोवन में परवल के पत्ते
तपोवन में कड़वे फल के पत्तों का भोजन
▶ देखें (51:24) ▶ Watch (51:24)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि अक्षयवट से वे तपोवन पहुँचे। वहाँ भी सीतानाथ दादा ने कहा 'टोकरी लेकर चलो'। जंगल में परवल जैसा एक कड़वा फल होता था — उसके पत्ते खूब उगते थे। टोकरी भर-भरकर वही पत्ते लाए जाते और उबालकर खिलाए जाते — रोज़ वही पत्ते। सद्गुरुदेव कहते हैं — 'इस तरह जान हैरान कर दी!'
🔗 प्रत्येक स्थान पर नवीन प्रकार के अखाद्य भोजन का अनुभव
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केशीघाट में कीड़ालगे कुम्हड़े की सब्जी
केशीघाट में मंडी के फेंके हुए कुम्हड़ों का भोजन
▶ देखें (52:05) ▶ Watch (52:05)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि तपोवन से वे केशीघाट पहुँचे। वहाँ सीतानाथ दादा से पूछा — 'अब क्या खिलाओगे? यहाँ तो घास भी नहीं मिलेगी, अब तो सब्जी बनानी ही पड़ेगी।' परन्तु सीतानाथ दादा का डिज़ाइन अलग ही था। मंडी में जमुना के किनारे जो कुम्हड़े (कद्दू/कैला) होते थे — जिनमें कीड़ा लग जाता था, जो टेढ़े-मेढ़े रह जाते थे, जो बड़े नहीं हो पाते थे — उन्हें किसान लोग क्विंटल-क्विंटल काटकर गाय-भैंसों को खिलाते थे या बाज़ार में फेंक देते थे। यह कोई खाने की चीज़ नहीं थी। सीतानाथ दादा ने बोरा भरकर वही कीड़ालगे कुम्हड़े ढूँढ-ढाँढ़कर ले आए। उन्हीं को उबालकर — बिना आलू, बिना कुछ — वही रोटी के साथ खिलाया जाता था।
🔗 वैराग्य की पराकाष्ठा — पशु-आहार को भी ग्रहण करना
📌 केशीघाट के कुम्हड़ों की विशेषताएँ:
  • कीड़ा लगा हुआ
  • टेढ़ा-मेढ़ा — ठीक से विकसित नहीं
  • भीतर कोई माल-मसाला नहीं
  • गाय-भैंसों के चारे हेतु प्रयुक्त
  • बाज़ार में फेंक दिए जाते थे
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अमलतास की विषाक्त सब्जी
भगवत निवास में अमलतास की फली से विषाक्तता — प्राणसंकट
▶ देखें (53:18) ▶ Watch (53:18)
सद्गुरुदेव एक गंभीर प्रसंग सुनाते हैं। भगवत निवास में अमलतास का पेड़ था — बसंत काल में जिस पर पीले-पीले फूल आते हैं और सहजन जैसी लंबी-लंबी फलियाँ लगती हैं। किसी ने कह दिया कि 'यह देखने में सुंदर है, इसकी सब्जी बनती है क्या?' सीतानाथ दादा ने तुरंत कहा 'हाँ, इसकी सब्जी बनाएंगे।' सद्गुरुदेव को संदेह हुआ कि यह खाने की चीज़ नहीं है, कहीं कोई मर न जाए। उन्होंने परीक्षण हेतु तीन-चार डंडी खाई — थोड़ा कड़वापन था, किन्तु कष्ट से खाया जा सकता था। परन्तु चार-पाँच वृद्ध भक्तों ने बिना जाने पूरा खा लिया। रात बारह बजे तक एक ही शौचालय में लाइन लग गई — ऐसा लग रहा था मानो हज़ारों लोग जा रहे हों। सद्गुरुदेव तो तीन-चार डंडी खाने से चार-पाँच बार गए, किन्तु वृद्धों की हालत अत्यंत गंभीर हो गई। रात बारह बजे देखा तो पेट फाड़कर जा रहा था — मरने की नौबत आ गई। सद्गुरुदेव कहते हैं यह सत्य घटना है, कोई मनोरंजन नहीं कर रहे। चिंता हुई कि यदि कोई मर गया तो पुलिस केस होगा, आश्रम बदनाम होगा।
🔗 वैराग्य जीवन में प्राणसंकट तक की परिस्थितियाँ
❌ न करें:
  • अज्ञात वनस्पतियों को बिना जाने भोजन न करें
📌 अमलतास विषाक्तता का प्रभाव:
  • रात 12 बजे तक तीव्र दस्त
  • एक शौचालय में लम्बी कतार
  • वृद्ध भक्तों की गंभीर स्थिति
  • मृत्यु का भय उत्पन्न
  • सद्गुरुदेव को 4-5 बार, अन्यों को अनगिनत बार
सच्चे वैराग्य का दार्शनिक विवेचन
प्रयासजन्य एवं अनुरागजन्य वैराग्य में अंतर का दार्शनिक विश्लेषण
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वैराग्य का प्रयास व्यर्थ है
प्रयासजन्य वैराग्य बनाम अनुरागजन्य वैराग्य — कच्चे आम का दृष्टांत
▶ देखें (55:32) ▶ Watch (55:32)
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि गुरुदेव ने वैराग्य कराने का बहुत प्रयास किया, किन्तु जिन लोगों में संस्कार नहीं था, उनका वैराग्य केवल दिखावा रहा — बाह्य वेश वैरागी का, किन्तु भीतर में स्पृहा (लालसा) पूर्ववत् थी। सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि संस्कार बिना वैरागी नहीं होता। वैराग्य तब होता है जब भगवत-चरणों में अनुराग होता है — जब तक वह अनुराग नहीं होता, संसार से वैराग्य साधन का विषय नहीं है। सद्गुरुदेव कच्चे आम का दृष्टांत देते हैं — यदि पेड़ पर फल पका नहीं है और जोड़-तोड़ करके कार्बाइड लगाकर पकाया जाए, तो रंग तो आ जाएगा किन्तु मिठास नहीं होगी। एक बार फाल्गुन महीने में ट्रेन यात्रा के समय पीला आम देखकर सद्गुरुदेव ने खरीदा — मुँह में रखते ही इतना बेस्वाद निकला कि फेंकना पड़ा, मीठा का नाम-निशान नहीं था। इसी प्रकार जबरदस्ती का वैराग्य ऐसा ही होता है — कपड़ा तो रंग जाता है (बाह्य वेश बदल जाता है), किन्तु मन नहीं रंगता। देखने में वैराग्य है, भीतर में कोई स्वाद (आनंद) नहीं होता।
🔗 कठोर तपस्या के अनुभवों से सच्चे वैराग्य के सिद्धांत का निष्कर्ष
❓ प्रश्न: सच्चा वैराग्य कब और कैसे होता है? ▶ 57:16
💡 उत्तर: सद्गुरुदेव समझाते हैं कि सच्चा वैराग्य तब होता है जब फल पक जाता है — तब वह स्वतः (ऑटोमेटिक) पेड़ से गिर जाता है, और वह फल मीठा होता है। इसी प्रकार जिस दिन सही-सही वैराग्य होगा, संसार से मन स्वतः अलग हो जाएगा। संसार की कोई भी वस्तु या पदार्थ उस मन को अनुरंजित (आकर्षित) करने में असमर्थ हो जाएगी — कुछ भी अच्छा नहीं लगेगा। उस दिन होगा ठीक-ठीक वैराग्य।
⚖️ वैराग्य के दो प्रकार
प्रयासजन्य वैराग्य (कच्चा आम): जबरदस्ती वस्तु-त्याग, कार्बाइड से पकाया आम — रंग आता है किन्तु मिठास नहीं, कपड़ा रंगता है मन नहीं, दिखावा मात्र
अनुरागजन्य वैराग्य (पका फल): भगवत-चरणों में अनुराग से स्वतः उत्पन्न, पका फल स्वयं गिरता है — मीठा होता है, मन स्वतः संसार से विरक्त, कोई वस्तु आकर्षित नहीं करती
📌 दृष्टांत: कच्चे आम की कहानी:
  • फाल्गुन महीने में ट्रेन यात्रा
  • पीला आम देखकर खरीदा
  • मुँह में रखते ही बेस्वाद — फेंकना पड़ा
  • कार्बाइड से रंग आया, मिठास नहीं
  • शिक्षा: जबरन वैराग्य ऐसा ही निरर्थक है
जगन्नाथपुरी यात्रा एवं चमत्कारिक प्रसंग
1982 की जगन्नाथपुरी यात्रा एवं ट्रेन विलम्ब के चमत्कार का वर्णन
🚂
जगन्नाथपुरी यात्रा का चमत्कार
1982 जगन्नाथपुरी यात्रा — ट्रेन का अकारण एक घंटा विलम्ब
▶ देखें (57:47) ▶ Watch (57:47)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि 1982 में गुरुदेव ब्रजमण्डल से घूमते हुए जगन्नाथपुरी गए। पहले वे भुवनेश्वर होते हुए टोटा गोपीनाथ पहुँचे और वहाँ रुके। नवद्वीप से बहुत सारे भक्त मंडली गुरुदेव को लेने आए, किन्तु वहाँ भीड़-भाड़ के कारण गुरुदेव का मन अच्छा नहीं लगा। गुरुदेव ने कहा 'चलो, हम जगन्नाथपुरी जाएंगे।' भक्त लोग रोकना चाहते थे — 'आप यहीं रह जाइए।' गुरुदेव ने सद्गुरुदेव से पूछा 'विनोद, क्या कहते हो?' सद्गुरुदेव ने कहा 'बाबा, इस भीड़-भाड़ से अच्छा है समुद्र किनारे जगन्नाथपुरी चलिए।' जगन्नाथपुरी जाते समय रास्ते में इतना ट्रैफिक जाम था कि स्टेशन पहुँचने में एक घंटा विलम्ब हो गया। AC कोच बुक था, किन्तु गाड़ी छूट जाने का भय था। परन्तु आश्चर्यजनक रूप से उस दिन बिना किसी ज्ञात कारण के गाड़ी भी एक घंटा विलम्ब से चली। कोई नहीं जानता था कि गाड़ी क्यों लेट है — किन्तु ठीक उतना ही विलम्ब जितना उन्हें पहुँचने में लगा। सद्गुरुदेव कहते हैं यह गुरुदेव की कृपा का चमत्कार था।
🔗 संतों की उपस्थिति में प्रकृति भी अनुकूल हो जाती है
📌 यात्रा का क्रम:
  • ब्रजमण्डल से भुवनेश्वर
  • टोटा गोपीनाथ में विश्राम
  • नवद्वीप के भक्तों का आगमन
  • भीड़ से व्याकुल होकर जगन्नाथपुरी प्रस्थान
  • ट्रैफिक जाम से एक घंटा विलम्ब
  • गाड़ी भी अकारण एक घंटा विलम्ब — चमत्कार
जगन्नाथपुरी से नवद्वीप आगमन एवं अंतिम उपदेश
जगन्नाथपुरी से नवद्वीप गमन और शरीर त्यागने का पूर्व संकेत
🚂
जगन्नाथपुरी से नवद्वीप गमन
जगन्नाथपुरी से नवद्वीप वापसी और शरीर त्यागने का संकेत
▶ देखें (59:33) ▶ Watch (59:33)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि जगन्नाथपुरी में बहुत भक्त मंडली को कृपा करने के बाद गुरुदेव नवद्वीप आए। नवद्वीप में भी बहुतों को दीक्षा दी और कृपा की। इसके पश्चात नवद्वीप में ही अंतिम समय तक रहे। सद्गुरुदेव एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना का उल्लेख करते हैं—जब वे एक बार गुरुदेव के साथ राधाकुंड जा रहे थे, तब रास्ते में गुरुदेव ने स्पष्ट कह दिया था: 'विनोद, अब ज्यादा दिन हम रहेंगे नहीं, हमारा समय आ गया है।' सद्गुरुदेव कहते हैं कि वे तभी समझ गए थे कि गुरुदेव अब शरीर छोड़ देंगे।
🔗 महापुरुषों को अपने तिरोभाव का पूर्व ज्ञान होता है और वे अपने अंतरंग सेवकों को संकेत दे देते हैं।
📌 नवद्वीप गमन और अंतिम संकेत:
  • जगन्नाथपुरी से नवद्वीप आगमन
  • नवद्वीप में अंतिम लीला और दीक्षा दान
  • राधाकुंड जाते समय विनोद बाबा को पूर्व संकेत
  • संकेत: 'अब ज्यादा दिन हम रहेंगे नहीं, समय आ गया है'
नवद्वीप में अंतर्दशा एवं तिरोभाव
गुरुदेव की अंतिम अवस्था, अंतर्दशा एवं नित्य लीला प्रवेश का मर्मस्पर्शी वृत्तांत
✉️
मुरारीमोहन का स्वप्नादेश
वृंदावन से पत्र — श्री मुरारीमोहन का स्वप्नादेश
▶ देखें (61:04) ▶ Watch (61:04)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि वृंदावन से एक पत्र आया जिसमें लिखा था कि श्री ठाकुरजी ने स्वप्न में आदेश दिया है — 'तुम लोगों ने गोसाईं जी को विदा कर दिया! गोसाईं जी मुरारीमोहन को छोड़कर चले गए। तुम जाओ, जल्दी जाओ, गोसाईं जी को वृंदावन ले आओ।' सद्गुरुदेव समझाते हैं कि यह साक्षात् मुरारीमोहन (श्री कृष्ण का विग्रह) ने स्वप्न में आविर्भूत होकर आदेश दिया था। यह पत्र एक उच्च कोटि के बाबा — ठोरी के बाबा — ने भेजा था जो अत्यंत उच्च कोटि के संत थे। उन्हें स्वप्न में साक्षात्कार हुआ और उन्होंने लिखा कि मुरारीमोहन गुरुदेव की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
🔗 भगवान स्वयं अपने प्रिय भक्तों के लिए व्याकुल रहते हैं
📌 स्वप्नादेश का सार:
  • श्री मुरारीमोहन ने स्वप्न में आदेश दिया
  • गोसाईं जी को वृंदावन लाने का निर्देश
  • ठोरी के उच्च कोटि बाबा को साक्षात्कार
  • मुरारीमोहन गुरुदेव की प्रतीक्षा में
🙏
श्री जीव गोस्वामी का आगमन एवं तिरोभाव
12 मार्च 1984 — 'जय नित्यानंद राम' कीर्तन के साथ नित्य लीला प्रवेश
▶ देखें (62:07) ▶ Watch (62:07)
सद्गुरुदेव मर्मस्पर्शी वृत्तांत सुनाते हैं कि जब उस पत्र को पढ़कर सुनाया गया, गुरुदेव ने तुरंत आँखें बंद कर लीं — और फिर आँखें खुली नहीं। प्रातःकाल आठ बजे श्री जीव गोस्वामी नामक एक उच्च कोटि के त्रिकालदर्शी महापुरुष आए। वे 'जय नित्यानंद, जय नित्यानंद' करते हुए सीधे घर में प्रवेश कर गए और गुरुदेव के मस्तक को अपनी गोदी में ले लिया। वे भी जान गए थे कि गुरुदेव अब चले जाएंगे — इसीलिए प्रातःकाल ही स्वयं उपस्थित हो गए। श्री जीव गोस्वामी 'जय नित्यानंद राम, जय नित्यानंद राम' कीर्तन कर रहे थे। गुरुदेव ने भी अंतिम समय 'जय नित्यानंद राम' कहा — बस इतना कहकर अंतिम श्वास लिए और नित्य लीला में प्रवेश कर गए। सद्गुरुदेव बताते हैं कि यह 1984 के मार्च महीने की 12 तारीख थी, नवद्वीप धाम में। आज वही तिरोभाव तिथि है — यह पावन तिथि है। आज उनकी पावन कथा का आस्वादन करके वाणी को पवित्र किया।
🔗 संतों का प्रस्थान भी दिव्य कीर्तन एवं भगवत-स्मरण में होता है
📌 तिरोभाव का विवरण:
  • तिथि: 12 मार्च 1984
  • स्थान: नवद्वीप धाम
  • अंतिम वचन: 'जय नित्यानंद राम'
  • श्री जीव गोस्वामी की उपस्थिति
  • त्रिकालदर्शी संत का पूर्वज्ञान
🧠 आत्म-चिंतन (Self Assessment)
इस सत्संग से आपने क्या सीखा? (Test your understanding)
Core Essence
सच्चा वैराग्य कैसे प्राप्त होता है और गुरुदेव का अंतिम समय कैसा था?
उत्तर: सच्चा वैराग्य प्रयास या वस्तु-त्याग से नहीं, अपितु भगवत-चरणों में अनुराग से स्वतः उत्पन्न होता है — जैसे पका फल स्वयं वृक्ष से गिर जाता है। गुरुदेव ने अंतिम समय 'जय नित्यानंद राम' कीर्तन के साथ नित्य लीला में प्रवेश किया।
Multiple Choice
🔢 सत्संग के अनुसार, किसी भी कर्म का मूल प्रेरक क्या है?
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
प्रवचन में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि कामना और स्पृहा (इच्छा) ही किसी भी कर्म के पीछे की मुख्य प्रेरक शक्ति होती है।
Multiple Choice
🔢 सच्चे भजन (आध्यात्मिक अभ्यास) के लिए कौन सी दो बातें अनिवार्य पूर्वशर्तें बताई गई हैं?
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
सद्गुरुदेव बताते हैं कि जब तक व्यक्ति सांसारिक वस्तुओं से निष्प्रिय (इच्छारहित) और निराश नहीं होता, तब तक सच्चा भजन आरम्भ नहीं हो सकता।
Multiple Choice
🔢 हिमालय में मिले बुद्ध सन्यासी ने गुरुदेव को वृंदावन जाने का आदेश किस सिद्धांत के आधार पर दिया?
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
बुद्ध सन्यासी ने समझाया कि गुरुदेव 'जीव कोटि' के साधक हैं, जिनकी साधना भूमि वृंदावन है, न कि हिमालय।
Multiple Choice
🔢 भगवत प्राप्ति के मार्ग में सद्गुरुदेव ने किस तत्व की अनिवार्यता पर विशेष बल दिया है?
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
सत्संग में यह बताया गया है कि भगवत प्राप्ति के लिए एकांत में रहकर साधना करना अनिवार्य है।
Multiple Choice
🔢 प्रवचन के अनुसार, भजन का वास्तविक प्रेरक क्या होना चाहिए?
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
जैसे कर्म का प्रेरक कामना है, उसी प्रकार भजन का सच्चा प्रेरक केवल और केवल भगवत प्राप्ति की तीव्र लालसा ही होनी चाहिए।
True/False
🤔 इस प्रवचन का सिद्धांत है कि किसी भी प्रकार की कामना या स्पृहा के बिना कर्म करना असंभव है।
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
सत्संग में यह दार्शनिक विवेचन किया गया है कि कामना और स्पृहा ही कर्म के प्रेरक हैं। इनके अभाव में कोई कर्म संभव नहीं है।
True/False
🤔 हिमालय में मिले बुद्ध सन्यासी ने गुरुदेव को भौतिक संपत्ति और सिद्धि का वरदान दिया था।
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
बुद्ध सन्यासी ने गुरुदेव को भौतिक संपत्ति का नहीं, बल्कि शास्त्र ज्ञान का वरदान प्रदान किया था।
True/False
🤔 सत्संग के अनुसार, भगवत प्राप्ति के लिए एकांतवास आवश्यक नहीं है, केवल मन की शुद्धता ही पर्याप्त है।
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
सद्गुरुदेव ने भगवत प्राप्ति हेतु एकांतता की अनिवार्यता पर बल दिया है, इसे भजन के लिए एक महत्वपूर्ण अंग बताया है।
स्पष्टीकरण (Clarification)

यह सारांश AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग गुरु सेवा में करके तैयार किया गया है। इसमें त्रुटि हो सकती है। कृपया पूर्ण लाभ के लिए पूरा वीडियो अवश्य देखें।

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