श्री गुरुदेव त्रिदण्डी गोस्वामी प्रभुपाद का दिव्य जीवन चरित्र - जन्म से वैराग्य तक
श्री गुरुदेव त्रिदण्डी गोस्वामी प्रभुपाद का दिव्य जीवन चरित्र - जन्म से वैराग्य तक
इस सत्संग में सद्गुरुदेव अपने श्री गुरुदेव त्रिदण्डी गोस्वामी प्रभुपाद बाबाजी महाराज के दिव्य जीवन चरित्र का वर्णन करते हैं। गुरुदेव का जन्म पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर जिले में हुआ, जहाँ छह पुत्रों के देहत्याग के पश्चात सातवें पुत्र को तीन कड़ी देकर बचाया गया। बाल्यावस्था में ही मातृ-पितृ वियोग के पश्चात उनमें तीव्र वैराग्य उत्पन्न हुआ। हिमालय में एक बुद्ध सन्यासी से भेंट हुई जिन्होंने जीव कोटि के सिद्धांत के आधार पर वृंदावन जाने का आदेश दिया और शास्त्र ज्ञान का वरदान प्रदान किया। सद्गुरुदेव भगवत प्राप्ति हेतु एकांतता की अनिवार्यता पर बल देते हुए बताते हैं कि निष्प्रियता और निराशा ही सच्चे भजन की पूर्वशर्त है। कामना और स्पृहा ही कर्म का प्रेरक है, अतः भगवत प्राप्ति की लालसा ही भजन का वास्तविक प्रेरक होना चाहिए।
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- 🔹 प्रथमा पत्नी के वियोग से तीव्र वैराग्य (18:17)
- 🔹 मनोहरदास बाबा का आदेश - अभी समय नहीं हुआ (18:47)
- 🔹 भगवत प्राप्ति के लिए एकांतता अनिवार्य (19:49)
- 🔹 एकांतता के तीन स्तर - बाह्य, पारिवारिक एवं आंतरिक (20:40)
- 🔹 एकांत की पूर्वशर्त - निष्प्रियता (22:33)
- 🔹 कामना ही कर्म का प्रेरक है (23:15)
- 🔹 भजन का समय क्यों नहीं मिलता? (24:17)
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- 🔹 समस्त परित्याग करके श्री सिद्ध मनोहर बाबा के पास आगमन (28:46)
- 🔹 चंद्रमा और राधा रानी को साक्षी करके स्वयं डोर-कोपिन धारण (29:27)
- 🔹 प्रेम सरोवर में श्री राधा रानी का अनाव्रित दर्शन (29:58)
- 🔹 बंशीबट में गुरुदेव को लकवा मारना - महापुरुष की लीला (31:51)
- 🔹 सद्गुरुदेव का स्वयं लकवा और गुरु कृपा से बिना दवा स्वस्थ होना (33:23)
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- 🔹 अक्षयवट में सीतानाथ दादा का विचित्र भोजन प्रबंध (48:36)
- 🔹 भात के माँड़ से बनी 'रेडीमेड कढ़ी' — हास्यास्पद किन्तु कष्टकारी (50:01)
- 🔹 तपोवन में कड़वे फल के पत्तों का भोजन (51:24)
- 🔹 केशीघाट में मंडी के फेंके हुए कुम्हड़ों का भोजन (52:05)
- 🔹 भगवत निवास में अमलतास की फली से विषाक्तता — प्राणसंकट (53:18)
📖 आज की शिक्षाएं 📖 आज की विस्तृत शिक्षाएं
- छह पुत्रों का जन्म लेकर देहत्याग
- सातवें पुत्र को बुआ ने तीन सोने की कड़ी देकर खरीदा
- इसी कारण नाम पड़ा 'तीन कड़ी गोस्वामी'
- नित्यानंद प्रभु की धर्मपत्नी जाह्नवी माता की परंपरा
- वंश परंपरा में दीक्षा - पिता से पुत्र को
- शिष्यमान में जाकर गुरुगिरी करना
- दूसरे से दीक्षा न लेने की प्रथा
- शास्त्र ज्ञान (शब्द ब्रह्म में निष्ठा)
- प्रत्यक्ष अनुभव सिद्ध ज्ञान (पर ब्रह्म में निष्ठा)
- पूर्वजन्म के शुभ संस्कार
- पूर्वजन्म अर्जित सुकृति
- श्रवण मात्र से स्मृति में धारण क्षमता
- हरि कथा में रुचि
- हरि गुणानुवाद में रुचि
- हरि कीर्तन में रुचि
- सांसारिक विषयों में अरुचि
- स्वाभाविक विरक्ति का उदय
- भगवत प्राप्ति की तीव्र लालसा
- संसार की अनित्यता का बोध
- भजन की प्रेरणा
- सब जीव एक कोटि के नहीं हैं
- जिसकी जो कोटि है, वहीं मुक्ति होगी
- भगवान के अनंत धाम, अनंत लोक, अनंत स्वरूप
- जिसकी जहाँ गति, वही अच्छा लगेगा
- ब्रह्म उपासक को मूर्ति पूजा माया प्रतीत होती है
- समस्त शास्त्र स्वाभाविक प्रकाशित
- बड़े-बड़े विद्वानों द्वारा श्रवण
- संस्कृत श्लोकों का अद्भुत उच्चारण
- दूसरों की व्याख्या में त्रुटि पकड़ने की क्षमता
- त्रिकालदर्शी महापुरुष
- गोवर्धन में निवास
- सात जन्म की स्मृति
- बाह्य एकांत - लोक संसर्ग से दूर रहना
- पारिवारिक एकांत - प्रियजनों के संपर्क से भी दूरी
- आंतरिक एकांत (सर्वोत्तम) - मन में भगवत चिंतन के अतिरिक्त किसी विषय का प्रवेश न हो
- भगवत प्राप्ति के अतिरिक्त सर्वत्र निष्प्रिय हो जाना
- मन में कामना-वासना रखकर एकांत में जाना
- प्रयोजन बोध → आशा → कामना → स्पृहा → कर्म
- जब तक कामना, तब तक कर्म से निवृत्ति असंभव
- जिसमें स्पृहा, उसी की प्राप्ति हेतु समस्त चेष्टा
- कुबेर-सम ऐश्वर्य - किंतु मन में आसक्ति नहीं
- अप्सरा-सम भार्या - किंतु किंचित आकर्षण नहीं
- समस्त संपत्ति का विष्ठा-सम परित्याग
- रात्रि के अंधकार में जगन्नाथपुरी गमन
- प्रेरणा - महाप्रभु का सानिध्य प्राप्त करना
- वर्तमान के प्रत्येक क्षण को भजन में लगाओ
- मुख में अखंड नाम रखो, मन में अखंड चिंतन करो
- दृश्यमान जगत को माया जानो
- कल के शुभ दिन की प्रतीक्षा मत करो
- मानव जीवन को व्यर्थ मत गँवाओ
- डोर-कोपिन (कौपीन)
- दंड-कमंडल
- कभी भैरव वास नहीं पहने
- यही सदा का पोशाक रहा
- श्री वल्लभाचार्य जी की कृपा
- श्री विट्ठलनाथ जी की कृपा
- राधा रानी का प्रचार कार्य का आदेश
- ट्रैक्टर दुर्घटना में कमर की हड्डी टुकड़े-टुकड़े
- डॉक्टरों का निर्णय - कभी चल नहीं पाएगा
- गुरुदेव का हॉस्पिटल में प्रकट होकर आशीर्वाद
- तीन दिन में खड़े हो गए
- दिन में चलकर घर आ गए
- गुरुदेव उस समय नवद्वीप में थे - फिर भी प्रकट हुए
- गर्मी में गर्म बालू पर चलकर माधुरी लाना
- सूखी रोटी पेड़ पर टाँगना - गिलहरी का हिस्सा
- जो बचता वही खाना
- रहने का कोई स्थान नहीं
- भीषण आमाशय रोग (डिसेंट्री)
- लोकातीत - लौकिक मोह से परे
- इंद्रियातीत - इंद्रियों के वश में नहीं
- गुणातीत - सत्त्व-रज-तम से परे
- द्रष्टा पुरुष - साक्षी भाव में स्थित
- गिरिराज गोवर्धन से राधाकुंड तक
- दोपहर की गर्मी में माथे पर ढोना
- कुसुम सरोवर में असमर्थ होकर रुके
- गुरुदेव को दूर से खबर हो गई
- गौरहरी भैया को सहायता भेजी
- आश्रम में एक रोटी नहीं मिलती थी
- एक गिलास पानी भी नहीं देते थे
- रहने का कोई स्थान नहीं था
- पोष-माघ की ठंड में चौड़ाई में शयन
- कंबल नहीं - ईंट, बोरा, सूती चादर से काम
- राधा जी की कृपा से ठंड नहीं लगती थी
- घना जंगल - आज के VIP स्थान वहीं हैं
- हेलेंचा शाक (पानी का घास) उबालकर खाना
- नमक मात्र - मिर्च नहीं
- किलोमीटर जाकर आटा माँगना
- रोटी - एक तरफ मोटी, एक तरफ पतली, जली-कच्ची
- एक महीने में बीमार पड़ गए - उल्टी शुरू
- भात का माँड़ (चावल का पानी) — आधार
- हल्दी — पीला रंग लाने हेतु
- नमक — स्वाद हेतु
- मिर्च — उपलब्ध नहीं थी
- परिणाम — ज़हर से भी ख़राब स्वाद
- कीड़ा लगा हुआ
- टेढ़ा-मेढ़ा — ठीक से विकसित नहीं
- भीतर कोई माल-मसाला नहीं
- गाय-भैंसों के चारे हेतु प्रयुक्त
- बाज़ार में फेंक दिए जाते थे
- अज्ञात वनस्पतियों को बिना जाने भोजन न करें
- रात 12 बजे तक तीव्र दस्त
- एक शौचालय में लम्बी कतार
- वृद्ध भक्तों की गंभीर स्थिति
- मृत्यु का भय उत्पन्न
- सद्गुरुदेव को 4-5 बार, अन्यों को अनगिनत बार
- फाल्गुन महीने में ट्रेन यात्रा
- पीला आम देखकर खरीदा
- मुँह में रखते ही बेस्वाद — फेंकना पड़ा
- कार्बाइड से रंग आया, मिठास नहीं
- शिक्षा: जबरन वैराग्य ऐसा ही निरर्थक है
- ब्रजमण्डल से भुवनेश्वर
- टोटा गोपीनाथ में विश्राम
- नवद्वीप के भक्तों का आगमन
- भीड़ से व्याकुल होकर जगन्नाथपुरी प्रस्थान
- ट्रैफिक जाम से एक घंटा विलम्ब
- गाड़ी भी अकारण एक घंटा विलम्ब — चमत्कार
- जगन्नाथपुरी से नवद्वीप आगमन
- नवद्वीप में अंतिम लीला और दीक्षा दान
- राधाकुंड जाते समय विनोद बाबा को पूर्व संकेत
- संकेत: 'अब ज्यादा दिन हम रहेंगे नहीं, समय आ गया है'
- श्री मुरारीमोहन ने स्वप्न में आदेश दिया
- गोसाईं जी को वृंदावन लाने का निर्देश
- ठोरी के उच्च कोटि बाबा को साक्षात्कार
- मुरारीमोहन गुरुदेव की प्रतीक्षा में
- तिथि: 12 मार्च 1984
- स्थान: नवद्वीप धाम
- अंतिम वचन: 'जय नित्यानंद राम'
- श्री जीव गोस्वामी की उपस्थिति
- त्रिकालदर्शी संत का पूर्वज्ञान
प्रवचन में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि कामना और स्पृहा (इच्छा) ही किसी भी कर्म के पीछे की मुख्य प्रेरक शक्ति होती है।
सद्गुरुदेव बताते हैं कि जब तक व्यक्ति सांसारिक वस्तुओं से निष्प्रिय (इच्छारहित) और निराश नहीं होता, तब तक सच्चा भजन आरम्भ नहीं हो सकता।
बुद्ध सन्यासी ने समझाया कि गुरुदेव 'जीव कोटि' के साधक हैं, जिनकी साधना भूमि वृंदावन है, न कि हिमालय।
सत्संग में यह बताया गया है कि भगवत प्राप्ति के लिए एकांत में रहकर साधना करना अनिवार्य है।
जैसे कर्म का प्रेरक कामना है, उसी प्रकार भजन का सच्चा प्रेरक केवल और केवल भगवत प्राप्ति की तीव्र लालसा ही होनी चाहिए।
सत्संग में यह दार्शनिक विवेचन किया गया है कि कामना और स्पृहा ही कर्म के प्रेरक हैं। इनके अभाव में कोई कर्म संभव नहीं है।
बुद्ध सन्यासी ने गुरुदेव को भौतिक संपत्ति का नहीं, बल्कि शास्त्र ज्ञान का वरदान प्रदान किया था।
सद्गुरुदेव ने भगवत प्राप्ति हेतु एकांतता की अनिवार्यता पर बल दिया है, इसे भजन के लिए एक महत्वपूर्ण अंग बताया है।
यह सारांश AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग गुरु सेवा में करके तैयार किया गया है। इसमें त्रुटि हो सकती है। कृपया पूर्ण लाभ के लिए पूरा वीडियो अवश्य देखें।
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