[Study Guide Draft : Feb 6, 2026] श्री रामाई ठाकुर : पावन जीवन चरित्र (Part 3)

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श्री भगवत चर्चा
06 February 2026

श्री रामाई ठाकुर का दिव्य जीवन चरित्र - माता जाह्नवी की कृपा से गौड़ीय वैष्णव धर्म के महान धारक-वाहक

श्री रामाई ठाकुर का दिव्य जीवन चरित्र - माता जाह्नवी की कृपा से गौड़ीय वैष्णव धर्म के महान धारक-वाहक

Sri Sri 108 Sri Vinod Baba ji Maharaj
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हमारे प्रिय सद्गुरुदेव बताते हैं:
" जो भगवत् चरण में समर्पित होकर के भगवत् प्रसन्नता ही उनके जीवन का उद्देश्य, निरभिमानी होकर के अभिमान शून्य होकर के उनके दास बनके भजन करते हैं, उनका योगक्षेम भगवान स्वयं वहन करते हैं। "

" शरीर रहते-रहते अगर हरिभजन करके भगवत चरण में भक्ति प्राप्त कर लेते हैं तो वह जीव सर्वोत्तम बुद्धिमान माना जाता है। "
रामाई ठाकुर (15)माता जाह्नवी ठाकुरानी (12)वंशीवदनानंद ठाकुर (8)वीरचंद्र प्रभु (6)खरधाम (4)गौरमंडल भूमि (5)वृंदावन (6)कानाई बलाई (3)प्रेम धर्म प्रचार (4)तिरोभाव (5)कानाई-बलाई (5)लीला संवरण (4)बाघना पाड़ा (3)नेड़ा-नेड़ी (3)योगक्षेम (2)निरभिमान (3)शरणागति (2)गुरुदेव (5)जीवन चरित्र (4)तिरोभाव तिथि (2)आविर्भाव तिथि (1)माघी पूर्णिमा (1)कृष्ण नवमी (1)उत्सव (2)अनुष्ठान (1)
🔍 सत्संग सार (Executive Summary)

इस सत्संग में सद्गुरुदेव श्री रामाई ठाकुर के दिव्य जीवन चरित्र का वर्णन करते हैं। रामाई ठाकुर के प्रपितामह श्री माधवदास (चकारि गोस्वामी) और पितामह श्री वंशीवदनानंद ठाकुर की भक्ति परंपरा का वर्णन है। वंशीवदनानंद ठाकुर ने देहत्याग से पूर्व अपनी पुत्रवधू को आशीर्वाद दिया कि वे उनके पुत्र रूप में पुनः आएंगे। माता जाह्नवी ठाकुरानी ने रामाई ठाकुर को पुत्र रूप में स्वीकार किया और गौड़ीय वैष्णव धर्म के प्रचार हेतु दीक्षित किया। वृंदावन यात्रा में माता ने पाखंडियों का उद्धार किया और ब्रजमंडल में एक मृत बालक को जीवनदान दिया। माता जाह्नवी के कामा में गोपीनाथ विग्रह में विलीन होने के पश्चात रामाई ठाकुर को यमुना स्नान में कानाई-बलाई विग्रह की प्राप्ति हुई।

🧱 ज्ञान प्रवाह
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📌 विषय सूची (Table of Contents)

📖 आज की शिक्षाएं 📖 आज की विस्तृत शिक्षाएं

वंश परिचय एवं परम वैष्णव परंपरा
रामाई ठाकुर के पूर्वजों की भक्ति परंपरा और पारिवारिक पृष्ठभूमि का वर्णन
🙏
रामाई ठाकुर का परिचय
श्री रामाई ठाकुर - महाप्रभु के प्रेम धर्म के धारक-वाहक
▶ देखें (0:45) ▶ Watch (0:45)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि श्री रामाई ठाकुर महाप्रभु के अंतर्धान के पश्चात प्रवृत्ति काल में गौड़ीय वैष्णव धर्म के प्रमुख धारक-वाहक रहे। वे वैष्णव समाज में वैष्णवाग्रगण्य रूप में प्रतिष्ठित थे। हमारा गौड़ीय वैष्णव धर्म राधा रानी की कृपापुष्ट भावोल्लासा रति पर आधारित है - यह मंजरी भाव उपासना पद्धति है। इस पद्धति के जगत में प्रचार हेतु माता जाह्नवी ठाकुरानी सर्वाग्रगण्य रहीं। महाप्रभु के अंतर्धान के पश्चात उन्होंने रामाई ठाकुर को पुत्र रूप में स्वीकार किया - यद्यपि उन्होंने स्वयं कोई संतान को जन्म नहीं दिया, परंतु संन्यास परंपरा में शिष्य को पुत्र रूप में ग्रहण करने की रीति के अनुसार रामाई ठाकुर उनके आध्यात्मिक पुत्र बने।
🔗 रामाई ठाकुर के जीवन चरित्र की भूमिका प्रस्तुत करता है।
📌 रामाई ठाकुर की विशेषताएं:
  • महाप्रभु के प्रेम धर्म के प्रमुख प्रचारक
  • वैष्णव समाज में वैष्णवाग्रगण्य
  • मंजरी भाव उपासना पद्धति के धारक
  • माता जाह्नवी ठाकुरानी के पुत्र रूप में स्वीकृत
🕉️
प्रपितामह श्री माधवदास का परिचय
श्री माधवदास (चकारि गोस्वामी) - परम वैष्णव कुल की नींव
▶ देखें (2:16) ▶ Watch (2:16)
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि रामाई ठाकुर के प्रपितामह श्री माधवदास महाप्रभु के परम अनुरागी भक्त थे। उनका प्रथम पितृप्रदत्त नाम चकारि गोस्वामी था और पूर्ण नाम माधव चट्टोपाध्याय था। वे महाप्रभु को छोड़कर कुछ भी नहीं जानते थे - उनका समग्र परिवार केवल महाप्रभु के गुणानुवाद और भक्ति रसधारा में निमग्न रहता था। महाप्रभु उनके एकमात्र आराध्य थे। उनकी पत्नी का नाम सुनीता देवी था। ऐसे परम वैष्णव दंपत्ति से इस दिव्य परंपरा का प्रारंभ हुआ।
🔗 रामाई ठाकुर के पूर्वजों की भक्ति परंपरा का वर्णन।
📌 श्री माधवदास का वंश वृक्ष:
  • मूल नाम: चकारि चट्टोपाध्याय
  • दीक्षा नाम: माधवदास / माधव चट्टोपाध्याय
  • पत्नी: सुनीता देवी
  • पुत्र: वंशीवदनानंद ठाकुर
🙏
श्री वंशीवदनानंद ठाकुर
श्री वंशीवदनानंद ठाकुर - महाप्रभु के अनन्य प्रेमी भक्त
▶ देखें (3:21) ▶ Watch (3:21)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि श्री माधवदास के पुत्र वंशीवदनानंद ठाकुर जन्म से ही महाप्रभु के अनन्य प्रेमी भक्त थे। बाल्यकाल से ही महाप्रभु के गुण कीर्तन श्रवण करके उनके अंतर्बाहिर में एकमात्र महाप्रभु ही जीवन धारण का प्राण केंद्र बन गए। वे नवद्वीप में जाकर रहने लगे और शची माता तथा विष्णुप्रिया ठाकुरानी की सेवा में तत्पर रहते थे। जब महाप्रभु ने संन्यास लेकर नवद्वीप छोड़ दिया, तब वंशीवदनानंद ठाकुर अत्यंत दुखी हुए। तब विष्णुप्रिया माता ने उन्हें मंत्र दीक्षा प्रदान की और आशीर्वाद दिया कि गृहस्थ आश्रम में रहकर प्रेम धर्म का प्रचार करो - तुम्हारी संतानें भी इस धर्म प्रचार में सर्वाग्रगण्य भूमिका निभाएंगी।
🔗 विष्णुप्रिया माता के आशीर्वाद से वंश परंपरा की स्थापना।
📌 वंशीवदनानंद ठाकुर की विशेषताएं:
  • जन्म से महाप्रभु के अनन्य प्रेमी
  • नवद्वीप में शची माता एवं विष्णुप्रिया माता की सेवा
  • विष्णुप्रिया माता से मंत्र दीक्षा प्राप्त
  • निवास: फुलिया ग्राम (नवद्वीप से कुछ दूर)
🕉️
चैतन्य और निताई - वंशीवदनानंद के पुत्र
परम वैष्णव परिवार - चैतन्य एवं निताई
▶ देखें (4:54) ▶ Watch (4:54)
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि विष्णुप्रिया माता के आशीर्वाद से पुष्ट होकर वंशीवदनानंद ठाकुर फुलिया ग्राम में गृहस्थ आश्रम में रहने लगे। उनके दो पुत्र हुए - चैतन्य और निताई। यह समग्र परिवार खानदानी परम वैष्णव था - प्रातःकाल से लेकर रात्रि तक केवल हरि कीर्तन, हरि गुणानुवाद, हरि कथा श्रवण और हरि भजन ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य था। समय के साथ दोनों पुत्रों का विवाह संपन्न हुआ। दोनों पुत्रवधुएं अनन्य सुंदरी एवं सर्व सद्गुण से अलंकृत थीं। वे अपने श्वसुर वंशीवदनानंद ठाकुर की सेवा में इतनी तत्पर रहती थीं कि मानो अपने पिता से भी अधिक सेवा भाव रखती थीं। वंशीवदनानंद ठाकुर भी अपनी पुत्रवधुओं को अपनी सगी कन्याओं से भी अधिक स्नेह करते थे।
🔗 रामाई ठाकुर के पिता एवं परिवार का परिचय।
📌 वंशीवदनानंद ठाकुर के परिवार का वंश वृक्ष:
  • वंशीवदनानंद ठाकुर के दो पुत्र: चैतन्य (बड़े) एवं निताई (छोटे)
  • चैतन्य के पुत्र: रामाई ठाकुर (बड़े) एवं सचिनंदन (छोटे - 10 वर्ष बाद जन्म)
  • दोनों पुत्रवधुएं सर्व सद्गुण संपन्ना एवं सेवा में तत्पर
  • परिवार का एकमात्र उद्देश्य: हरि कीर्तन एवं हरि भजन
वंशीवदनानंद ठाकुर का देहत्याग एवं दिव्य आशीर्वाद
वंशीवदनानंद ठाकुर के अंतिम समय का वर्णन और संसार की अनित्यता पर उपदेश
🙏
वंशीवदनानंद ठाकुर का देहत्याग
महाप्रभु विरह में देहत्याग की तैयारी
▶ देखें (6:34) ▶ Watch (6:34)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि जब महाप्रभु ने अंतर्धान किया, तब वंशीवदनानंद ठाकुर के लिए शरीर धारण करना अत्यंत कठिन हो गया। महाप्रभु के विरह में वे कहने लगे - 'अब हमारा इस शरीर को धारण करना संभव नहीं है। हमको गंगा के किनारे ले चलो, वहां हम शरीर परित्याग करेंगे।' परिवार उन्हें गंगा तट पर ले गया। वहां स्नान करके गंगा किनारे बैठकर उन्होंने शरीर परित्याग की तैयारी की। यह देखकर उनके बड़े पुत्र चैतन्य की पत्नी अत्यंत विलाप करने लगीं। वे इतनी व्याकुल चित्त होकर रो रही थीं कि वंशीवदनानंद ठाकुर भी व्यथित हो गए।
🔗 महाप्रभु के विरह में भक्त की अवस्था का वर्णन।
📖
संसार की अनित्यता पर उपदेश
आगंतुक शरीर एवं संसार का सत्य - वंशीवदनानंद ठाकुर का उपदेश
▶ देखें (7:48) ▶ Watch (7:48)
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि अपनी पुत्रवधू के विलाप को देखकर वंशीवदनानंद ठाकुर ने उन्हें संसार के सत्य का बोध कराया। उन्होंने कहा - 'मां, तुम क्या चाहती हो? हमको तो जाना है। यह अनित्य संसार है, यह आगंतुक है - पहले था नहीं, पीछे रहेगा नहीं। यह शरीर भी आगंतुक है - मातृ जठर में इसकी शुरुआत है और श्मशान में परिसमाप्ति। इस आगंतुक शरीर में जीव चेतन सत्ता आकर शरीर से तादात्म्य के कारण शरीर में आत्मबुद्धि करके शरीर संबंधी विषय-वस्तु में आसक्त होकर इसमें आनंद मानकर संसार चक्र में आवर्तन करता रहता है। यह मिथ्या माया है, यह स्वप्नवत है। इसलिए मां, दुखी मत हो। यह संसार का नियम है - जो आया है वह जाएगा जरूर, चाहे राजा हो या रंक, फकीर हो या धनवान। परंतु शरीर रहते-रहते जो हरिभजन करके भगवत चरण में भक्ति प्राप्त कर लेता है, वही सर्वोत्तम बुद्धिमान माना जाता है।'
🔗 भक्ति मार्ग की महत्ता और संसार के सत्य का बोध।
❓ प्रश्न: संसार में दुख से मुक्ति का मार्ग क्या है? ▶ 8:30
💡 उत्तर: 💡 उत्तर: वंशीवदनानंद ठाकुर ने बताया कि इस आगंतुक शरीर और अनित्य संसार के सत्य को समझना चाहिए। शरीर संबंधी विषयों में आसक्ति ही संसार चक्र में आवर्तन का कारण है। यह सब मिथ्या माया है, स्वप्नवत है। अतः शरीर रहते-रहते हरिभजन करके भगवत चरण में भक्ति प्राप्त करना ही सर्वोत्तम बुद्धिमानी है। जो ऐसा करता है, वही वास्तव में बुद्धिमान है।
✅ करें:
  • शरीर रहते-रहते हरिभजन करो
  • भगवत चरण में भक्ति प्राप्त करो
❌ न करें:
  • शरीर संबंधी विषयों में आसक्त मत हो
  • इस अनित्य संसार को सत्य मत मानो
📌 संसार की अनित्यता के लक्षण:
  • शरीर आगंतुक है - मातृ जठर में आरंभ, श्मशान में अंत
  • संसार अनित्य है - पहले था नहीं, पीछे रहेगा नहीं
  • जीव शरीर से तादात्म्य करके आसक्त होता है
  • यह माया मिथ्या एवं स्वप्नवत है
  • राजा-रंक, फकीर-धनवान सबको जाना है
दिव्य आशीर्वाद एवं पुनर्जन्म का वचन
पुत्र रूप में पुनः आगमन का आशीर्वाद
▶ देखें (9:11) ▶ Watch (9:11)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि संसार की अनित्यता का उपदेश देने के पश्चात वंशीवदनानंद ठाकुर ने अपनी पुत्रवधू को एक अद्भुत आशीर्वाद दिया। उन्होंने कहा - 'तुम दुखी मत हो, हमको तो जाना है, परंतु मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूं - हम तुम्हारे ऊपर बहुत प्रसन्न हैं। हम तुम्हारे प्रथम पुत्र रूप में तुम्हारे घर में आएंगे। तुम चिंता मत करो।' ऐसा आशीर्वाद देकर वे भगवत चिंतन करते-करते नित्यधाम में नित्य लीला में प्रवेश कर गए। यथासमय उनकी पुत्रवधू के पुत्र हुआ जिसका नाम रामाई रखा गया - यही श्री रामाई ठाकुर हैं। उनका छोटा पुत्र सचिनंदन था जो दस वर्ष बाद जन्मा।
🔗 रामाई ठाकुर के जन्म की पूर्व पीठिका।
📌 रामाई ठाकुर का जन्म वृत्तांत:
  • पितामह वंशीवदनानंद ठाकुर का आशीर्वाद - पुत्र रूप में पुनर्जन्म
  • पिता: चैतन्य (वंशीवदनानंद के बड़े पुत्र)
  • प्रथम पुत्र: रामाई ठाकुर (रामचंद्र)
  • द्वितीय पुत्र: सचिनंदन (10 वर्ष बाद जन्म)
माता जाह्नवी द्वारा पुत्र रूप में स्वीकार
रामाई ठाकुर के बाल्यकाल की विशेषताएं और माता जाह्नवी से संबंध की स्थापना
👶
रामाई ठाकुर का अलौकिक बाल्यकाल
जन्म से ही अलौकिक भक्ति शक्ति संपन्न
▶ देखें (9:43) ▶ Watch (9:43)
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि रामाई ठाकुर जन्म से ही अलौकिक शक्ति संपन्न थे। उनकी विद्वत्ता अद्भुत थी और हरि कथा में उनका भक्ति भाव अतुलनीय था। हरि कथा श्रवण में वे पुलकांग चित्त होते थे - अश्रु, कंप, पुलक जैसे सात्विक विकार उनमें सहज ही दिखाई देते थे। उनके माता-पिता समझ गए कि यह पुत्र साधारण नहीं है। इसी समय श्री नित्यानंद प्रभु ने विवाह करके खरधाम में निवास किया और वसुधा माता से उनके प्रथम पुत्र श्री वीरचंद्र प्रभु का जन्म हुआ। वीरचंद्र प्रभु और रामाई ठाकुर दोनों समान आयु के थे।
🔗 रामाई ठाकुर की जन्मजात भक्ति प्रवृत्ति।
📌 रामाई ठाकुर की बाल्यकालीन विशेषताएं:
  • अद्भुत विद्वत्ता
  • हरि कथा में पुलकांग चित्त
  • अश्रु, कंप, पुलक आदि सात्विक विकार सहज प्रकट
🙏
वसुधा माता एवं जाह्नवी माता
नित्यानंद प्रभु की दो पत्नियों का परिचय
▶ देखें (10:45) ▶ Watch (10:45)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि श्री नित्यानंद प्रभु की दो पत्नियां थीं - वसुधा माता और जाह्नवी माता। वसुधा माता से वीरचंद्र प्रभु का जन्म हुआ, परंतु जाह्नवी माता की कोई संतान नहीं थी। सद्गुरुदेव इनके नित्य लीला स्वरूप का वर्णन करते हैं - वसुधा माता नित्य लीला में बलराम की गृहिणी रेवती माता हैं, और जाह्नवी माता राधा रानी की बहन अनंग मंजरी हैं। अनंग मंजरी ने कभी संतान धारण नहीं की। यह जानकर जाह्नवी माता ने निश्चय किया कि संतान तो चाहिए, और वे सीधे वंशीवदनानंद ठाकुर के परिवार के पास गईं।
🔗 रामाई ठाकुर और माता जाह्नवी के संबंध की पृष्ठभूमि।
📌 नित्यानंद प्रभु परिवार:
  • वसुधा माता = नित्य लीला में रेवती माता (बलराम की पत्नी)
  • वसुधा माता के पुत्र: वीरचंद्र प्रभु
  • जाह्नवी माता = नित्य लीला में अनंग मंजरी (राधा रानी की बहन)
  • जाह्नवी माता की कोई संतान नहीं थी
🏠
माता जाह्नवी का फुलिया आगमन
गौरमंडल भूमि की आचार्या का शुभ आगमन
▶ देखें (11:05) ▶ Watch (11:05)
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि माता जाह्नवी ठाकुरानी वंशीवदनानंद ठाकुर के परिवार में पधारीं। उनके आगमन से सभी अत्यंत प्रसन्न हुए क्योंकि उस समय गौरमंडल भूमि में माता जाह्नवी ठाकुरानी की बहुत प्रसिद्धि थी। वे सांप्रदायिक धारक-वाहक रूप में आचार्या के पद पर विराजमान थीं और समस्त वैष्णव समाज उन्हें मानता था। परिवार में आकर रामाई ठाकुर का बहुत आदर किया और घर में रहकर सत्संग एवं साधु संग के माध्यम से उनके भीतर भक्ति धारा का स्रोत प्रवाहित किया। हरि कथामृत से सिंचन करके उन्होंने समस्त परिवार को कृतार्थ कर दिया।
🔗 माता जाह्नवी की आचार्य स्थिति का वर्णन।
🤝
पुत्र समर्पण का वचन
प्रथम पुत्र समर्पण का दिव्य संकल्प
▶ देखें (11:56) ▶ Watch (11:56)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि रामाई ठाकुर के पिता चैतन्य अत्यंत प्रसन्न होकर माता जाह्नवी से पूछने लगे - 'मां, बताओ हमसे कुछ सेवा बताओ, हम आपके लिए क्या सेवा कर सकते हैं?' माता जाह्नवी ने कहा - 'हां, सेवा तो तुमको करनी है। वह सेवा है कि तुम्हारे प्रथम पुत्र को हमको देना पड़ेगा।' पुत्रवधू ने कहा - 'ठीक है मैया, आप जब कहें तो देंगे जरूर, परंतु एक पुत्र और हमारे लिए चाहिए। जब छोटा पुत्र हो जाएगा तभी हम आपको समर्पण करेंगे।' इस प्रकार वचन दिया गया। छोटा पुत्र सचिनंदन दस वर्ष बाद जन्मा, तब माता जाह्नवी आईं और अपने वचन की याद दिलाई।
🔗 रामाई ठाकुर का माता जाह्नवी के पुत्र रूप में स्वीकार।
❓ प्रश्न: रामाई ठाकुर को माता जाह्नवी ने पुत्र रूप में कैसे स्वीकार किया? ▶ 12:37
💡 उत्तर: 💡 उत्तर: माता जाह्नवी ठाकुरानी ने रामाई ठाकुर के माता-पिता से उनके प्रथम पुत्र को पुत्र रूप में मांगा। यद्यपि इतने सुंदर, गुणवंत, सर्व सद्गुण संपन्न पुत्र को देना कठिन था - जो बाल्यकाल से ही हरि कथा में अश्रु, कंप, पुलक, स्वेद, वैवर्ण्य आदि अष्ट सात्विक विकारों से विकृत होते थे - परंतु वचन दिया था। जब छोटा पुत्र सचिनंदन जन्मा, तब रामाई ठाकुर ने स्वयं माता का आंचल पकड़कर उनके साथ जाना स्वीकार किया।
📌 रामाई ठाकुर के सद्गुण:
  • सर्व सद्गुण संपन्न
  • बाल्यकाल से भक्ति भावना युक्त चित्तवृत्ति
  • पुलकांग चित्त - हरि कथा में सहज प्रभावित
  • अष्ट सात्विक विकार: अश्रु, कंप, पुलक, स्वेद, वैवर्ण्य आदि
खरधाम में शिक्षा एवं प्रचार यात्राएं
रामाई ठाकुर की शिक्षा-दीक्षा और धर्म प्रचार यात्राओं का वर्णन
📚
गौरमंडल भूमि भ्रमण
गोस्वामियों एवं आचार्यों से आशीर्वाद प्राप्ति
▶ देखें (13:19) ▶ Watch (13:19)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि रामाई ठाकुर माता जाह्नवी का आंचल पकड़कर उनके साथ चल दिए। माता जाह्नवी ठाकुरानी उन्हें लेकर गौरमंडल भूमि में भ्रमण करती रहीं। जहां भी वे जाती थीं, सभी बड़े आदर-सत्कार से उनका स्वागत करते थे क्योंकि वे सांप्रदायिक आचार्या थीं। वे शची माता के स्थान पर गईं, श्री अद्वैत भवन गईं, और श्री अच्युतानंद प्रभु आदि सभी ने रामाई ठाकुर को बड़े आशीर्वाद दिए। इस प्रकार बहुत दिन तक गौरमंडल भूमि का भ्रमण करके आशीर्वाद पुष्ट होकर वे लौटे।
🔗 रामाई ठाकुर की आध्यात्मिक शिक्षा की नींव।
👬
खरधाम में दो भाइयों का संग
वीरचंद्र प्रभु एवं रामाई ठाकुर - विद्वत्ता के मूर्तिमंत स्वरूप
▶ देखें (14:00) ▶ Watch (14:00)
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि जब माता जाह्नवी रामाई ठाकुर को लेकर खरधाम लौटीं, तब वीरचंद्र प्रभु बहुत प्रसन्न हुए। वे चिंतित थे कि माता बहुत दिनों से नहीं आईं। दोनों भाई - वीरचंद्र प्रभु और रामाई ठाकुर - बड़े आनंद से दिन व्यतीत करने लगे। दोनों विद्वत्ता में अद्भुत थे, समस्त शास्त्रों में पारदर्शिता प्राप्त कर ली थी। वे विद्वत्ता के मूर्तिमंत स्वरूप थे। अल्प समय में ही वेद, वेदांत, समस्त पुराण आदि का अध्ययन कर लिया।
🔗 रामाई ठाकुर की शास्त्रीय शिक्षा का वर्णन।
📌 दोनों भाइयों की शैक्षिक उपलब्धियां:
  • समस्त शास्त्रों में पारदर्शिता
  • वेद-वेदांत का अध्ययन
  • समस्त पुराणों का अध्ययन
  • अल्प समय में शास्त्र पारंगत
  • विद्वत्ता के मूर्तिमंत स्वरूप
🚶
प्रचार यात्राएं
बांग्लादेश से जगन्नाथपुरी तक प्रेम धर्म प्रचार
▶ देखें (14:41) ▶ Watch (14:41)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि जब रामाई ठाकुर थोड़े बड़े हो गए, तब माता जाह्नवी ने उन्हें प्रचार के लिए भेजा - 'रामाई, अब तुम थोड़ा प्रचार करने जाओ, हमारे महाप्रभु के प्रेम धर्म का प्रचार करो।' रामाई ठाकुर बांग्लादेश गए, वहां कई महीने रहकर प्रेम धर्म का प्रचार किया। फिर लौटकर गौरमंडल भूमि में भ्रमण किया और जगन्नाथपुरी गए। जगन्नाथपुरी में कुछ दिन रहकर महाप्रभु की लीला स्थलियों का दर्शन किया, उनकी नित्य विहार भूमि का अनुभव किया। फिर नवद्वीप लौटे और श्रीखंड आदि सभी तीर्थों का परिभ्रमण करते हुए वापस आए।
🔗 रामाई ठाकुर द्वारा प्रेम धर्म प्रचार का आरंभ।
📌 रामाई ठाकुर की प्रचार यात्राएं:
  • गौरमंडल भूमि भ्रमण
  • जगन्नाथपुरी - महाप्रभु की लीला स्थली दर्शन
  • नवद्वीप आगमन
  • श्रीखंड आदि तीर्थ परिभ्रमण
वृंदावन यात्रा एवं दिव्य चमत्कार
माता जाह्नवी के साथ वृंदावन यात्रा और दिव्य लीलाओं का वर्णन
🛕
प्रथम वृंदावन यात्रा
रूप-सनातन गोस्वामियों से भेंट
▶ देखें (15:33) ▶ Watch (15:33)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि माता जाह्नवी ठाकुरानी ने रामाई ठाकुर से कहा - 'हम लोग थोड़ा वृंदावन जाना है, वृंदावन गए नहीं, आओ वृंदावन चलें। रामाई, तू चल हमारे साथ।' माता जाह्नवी ठाकुरानी दो बार वृंदावन गईं और दोनों बार रामाई ठाकुर उनके साथ थे। प्रथम बार जब वे गौरमंडल से ब्रजभूमि गए, तब वहां श्री रूप गोस्वामी, श्री सनातन गोस्वामी, श्री रघुनाथ दास गोस्वामी आदि सभी विद्यमान थे। सभी गोस्वामियों से भेंट हुई और माता का आशीर्वाद प्राप्त करके सभी कृतार्थ हो गए।
🔗 वृंदावन के षड् गोस्वामियों से आशीर्वाद प्राप्ति।
पाखंडियों का उद्धार
डाकुओं का परम भक्तों में रूपांतरण
▶ देखें (16:15) ▶ Watch (16:15)
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि द्वितीय वृंदावन यात्रा में रामाई ठाकुर माता जाह्नवी के साथ थे। रास्ते में बहुत सारे पाखंडी थे - जंगल में लूटने के लिए डाकू आ गए। परंतु जैसे ही वे माता जाह्नवी ठाकुरानी के चरण सान्निध्य में आए, उनके दर्शन मात्र से सब अपने आप को भूल गए। अपनी हिंसा वृत्ति भूलकर वे उनके चरण कमलों में समर्पित हो गए। माता जाह्नवी ठाकुरानी ने उन सभी को दीक्षा प्रदान की और वे सब दुष्ट, बदमाश, डाकू परम भक्त बन गए। माता ने सबका उद्धार किया। इस प्रकार भ्रमण करते हुए वे बनारस (काशी) आए, काशी विश्वनाथ जी का दर्शन किया और फिर वृंदावन पहुंचे।
🔗 माता जाह्नवी की दिव्य शक्ति का प्रमाण।
📌 द्वितीय वृंदावन यात्रा का मार्ग:
  • जंगल मार्ग में पाखंडियों से भेंट
  • माता के दर्शन से डाकुओं का हृदय परिवर्तन
  • दीक्षा प्रदान कर सबका उद्धार
  • बनारस (काशी) आगमन - काशी विश्वनाथ दर्शन
  • वृंदावन पहुंचना
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ब्रजमंडल परिक्रमा
दिव्य वृंदावन की शोभा एवं लीला स्थली दर्शन
▶ देखें (16:56) ▶ Watch (16:56)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि वृंदावन पहुंचकर माता जाह्नवी ने ब्रजमंडल की परिक्रमा की। रामाई ठाकुर साथ थे और भक्त मंडली भी साथ थी। उस समय का दिव्य वृंदावन आज जैसा भीड़-भाड़ वाला नहीं था - शांत परिवेश था, गाड़ी-बाड़ी का कोलाहल नहीं था। अत्यंत सुंदर दिव्य वृंदावन की शोभा थी। केशी घाट से लेकर मथुरा तक जंगल ही जंगल था, यमुना से लेकर छाटीकरा तक पूरी वन भूमि थी। इस प्रकार लीला स्थलियों का दर्शन करते-करते वे भ्रमण कर रहे थे।
🔗 ब्रजमंडल की दिव्यता का वर्णन।
📌 तत्कालीन वृंदावन का स्वरूप:
  • शांत एवं दिव्य परिवेश
  • गाड़ी-बाड़ी का कोलाहल रहित
  • केशी घाट से मथुरा तक वन भूमि
  • यमुना से छाटीकरा तक जंगल
  • दिव्य लीला स्थलियां
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मृत बालक को जीवनदान
माता जाह्नवी की करुणा - ब्रजवासी बालक का पुनर्जीवन
▶ देखें (17:51) ▶ Watch (17:51)
सद्गुरुदेव एक अद्भुत लीला का वर्णन करते हैं। ब्रजमंडल परिक्रमा करते हुए माता जाह्नवी एक ग्राम में पहुंचीं। वहां सभी ग्रामवासी करुण विलाप कर रहे थे, छाती पीट-पीटकर रो रहे थे। माता ने रामाई ठाकुर से कहा - 'रामाई, चल तो देख क्या बात है, ऐसे क्यों रो रहे हैं?' जाकर देखा तो एक छोटे बालक का देहांत हो गया था। ब्रज की माताएं विलाप कर रही थीं। वे माता जाह्नवी की ओर देखकर प्रार्थना करने लगीं - 'मैया, हमारे बच्चे को बचा दो, बच्चे के बिना जीवन धारण करना बहुत कठिन है।' माता जाह्नवी के मन में करुणा उमड़ आई - वे तो राधा रानी की बहन अनंग मंजरी हैं, राधा रानी का ही स्वरूप हैं। उन्होंने बच्चे को गोद में लिया और कहा - 'ए मुन्ना, क्यों सो रहा है? उठ उठ, अब मत सो। देख मैया कितना रो रही है, उठ उठ!' ऐसा कहकर गाल पर दो-चार थप्पड़ मार दिए। बच्चा जाग गया, जैसे निद्रा भंग हो गई हो। उठकर अपनी मां की गोद में जा बैठा। माता जाह्नवी ने उसमें प्राण संचारित करके जीवनदान दिया और वहां से आगे चल दीं।
🔗 माता जाह्नवी की दिव्य शक्ति एवं करुणा।
महान भक्तों का लीला संवरण
महाप्रभु, नित्यानंद प्रभु, अद्वैत आचार्य एवं माता जाह्नवी के तिरोभाव का वर्णन
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महाप्रभु एवं नित्यानंद प्रभु का अंतर्धान
भगवती तनुओं का दिव्य तिरोभाव
▶ देखें (19:44) ▶ Watch (19:44)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि इस प्रकार ब्रजमंडल में आनंदपूर्वक भ्रमण करते हुए अंततः माता जाह्नवी का भी अंतिम विदाई का समय आ गया। महाप्रभु ने जगन्नाथपुरी में लीला संवरण किया था - वे जगन्नाथ जी में विलीन हो गए। श्री नित्यानंद प्रभु ने महाप्रभु के अंतर्धान के पश्चात अपना तिरोभाव किया। उन्होंने खरधाम में एक कीर्तन समारोह का आयोजन किया और समस्त भक्त मंडली को निमंत्रण दिया। आनंदमुखरित हरिनाम संकीर्तन में मंदिर प्रांगण में खड़े होकर हस्त प्रसारण करके सबको विदाई दी और मंदिर में प्रवेश कर गए। मंदिर का द्वार खोलकर वे श्यामसुंदर विग्रह में विलीन हो गए।
🔗 भगवती तनुओं के दिव्य तिरोभाव का वर्णन।
📌 तिरोभाव का क्रम:
  • महाप्रभु - जगन्नाथपुरी में जगन्नाथ जी में विलीन
  • नित्यानंद प्रभु - खरधाम में श्यामसुंदर विग्रह में विलीन
  • भगवती तनु होने के कारण कोई समाधि नहीं - विलीन हो गए
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श्री अद्वैत आचार्य का तिरोभाव
मदनगोपाल विग्रह में विलीन
▶ देखें (20:46) ▶ Watch (20:46)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि महाप्रभु और नित्यानंद प्रभु के तिरोभाव के पश्चात श्री अद्वैत आचार्य प्रभु से भी रहा नहीं गया। उन्होंने सोचा - 'सब चले गए, अब हम रहकर क्या करें?' बाबला नामक स्थान में श्री अद्वैत आचार्य प्रभु ने समस्त भक्त मंडली को बुलाया और कीर्तन समारोह का आयोजन किया। कीर्तन चलते समय उन्होंने सबको विदाई संभाषण दिया, हाथ हिलाकर विदाई दी और मंदिर में प्रवेश कर गए। वे मदनगोपाल विग्रह में विलीन हो गए। सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि ये सब भगवती तनु हैं, ये कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं, इसलिए इनकी कोई समाधि नहीं है - ये सब विग्रहों में विलीन हो गए।
🔗 भगवती तनुओं के दिव्य स्वरूप का प्रमाण।
📌 विशेष भगवती तनुओं का तिरोभाव:
  • अद्वैत आचार्य प्रभु - बाबला में मदनगोपाल में विलीन
  • अभिराम ठाकुर - खानाकुल कृष्णनगर में कृष्ण विग्रह बनकर विलीन
  • भगवती तनु होने से कोई समाधि नहीं - सब विलीन हो गए
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वीर अभिराम ठाकुर का विग्रह में विलीन होना
अभिराम ठाकुर का खानाकुल कृष्णनगर में विग्रह रूप में स्थित होना
▶ देखें (21:37) ▶ Watch (21:37)
अभिराम ठाकुर खानाकुल कृष्णनगर में कृष्ण विग्रह के बगल में विलीन हो गए वीर अभिराम ठाकुर भी भगवती तनु थे - ईश्वर के अवतार पुरुष। उन्होंने खानाकुल कृष्णनगर में लीला संवरण करते समय शरीर त्याग नहीं किया, बल्कि वहां कृष्ण विग्रह के बगल में विग्रह बनकर विलीन हो गए। आज भी वहां कृष्ण के बगल में अभिराम ठाकुर का विग्रह विद्यमान है।
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माता जाह्नवी का तिरोभाव
गोपीनाथ विग्रह में अनंग मंजरी का विलीन होना
▶ देखें (21:57) ▶ Watch (21:57)
सद्गुरुदेव अत्यंत रसमय लीला का वर्णन करते हैं। माता जाह्नवी ठाकुरानी ने देखा कि सब चले गए - लीला बहुत हो गई, उम्र भी बहुत हो गई, अब जाना है। वे कामा में स्थित गोपीनाथ मंदिर गईं। उनके शुभ आगमन पर समस्त भक्त मंडली आनंदमुखरित हो गई और कीर्तन समारोह में आनंद नृत्य करने लगी। उसी समय श्रीकृष्ण ने बुलाया - गोपीनाथ ने मंदिर में आने का संकेत किया। माता मंदिर में गईं, गोपीनाथ ने अपने आंचल को धारण करके उन्हें खींचा और अपने बाएं भाग में विग्रह रूप में स्थापित कर लिया। माता जाह्नवी ठाकुरानी विग्रह बन गईं - अभी भी वह विग्रह कृष्ण के बाएं भाग में विद्यमान है।
🔗 माता जाह्नवी के दिव्य तिरोभाव का वर्णन।
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राधा रानी एवं अनंग मंजरी - दिव्य लीला
कामा में गोपीनाथ के साथ दो विग्रह
▶ देखें (22:49) ▶ Watch (22:49)
सद्गुरुदेव एक अनूठी लीला सुनाते हैं। जब माता जाह्नवी गोपीनाथ के बाएं भाग में विग्रह बन गईं, तब राधा रानी आईं। देखा कि कृष्ण के बाएं भाग में कोई विग्रह बनकर खड़ी है - 'यह कौन है?' फिर देखा - 'अरे, यह तो बंगाली है! बंगाली आकर हमारे गोपीनाथ के बाएं भाग में खड़ी हो गई!' यह आनंद लीला है। फिर जब ध्यान से देखा तो पहचान लिया - 'अरे, यह तो हमारी बहन है!' ठीक है, कोई बात नहीं। अपनी बहन को बाएं भाग में स्थापित देखकर राधा रानी दक्षिण भाग (दाहिने भाग) में विराजमान हो गईं। अभी भी कामा में गोपीनाथ के दाहिने भाग में राधा रानी और बाएं भाग में अनंग मंजरी अर्थात माता जाह्नवी ठाकुरानी विग्रह रूप में विराजमान हैं।
🔗 राधा रानी और अनंग मंजरी के दिव्य संबंध की लीला।
📌 कामा गोपीनाथ मंदिर में विग्रह स्थिति:
  • मध्य में: श्री गोपीनाथ जी
  • दक्षिण (दाहिने) भाग में: श्री राधा रानी
  • वाम (बाएं) भाग में: श्री अनंग मंजरी (माता जाह्नवी ठाकुरानी)
रामाई ठाकुर का विरह एवं कानाई-बलाई प्राप्ति
माता के तिरोभाव के पश्चात रामाई ठाकुर की अवस्था और दिव्य विग्रह प्राप्ति
कानाई-बलाई विग्रह की प्राप्ति
यमुना स्नान में दिव्य विग्रह प्राप्ति
▶ देखें (24:31) ▶ Watch (24:31)
सद्गुरुदेव एक अद्भुत घटना का वर्णन करते हैं। दुखी होकर रामाई ठाकुर यमुना में स्नान करने गए। जब वे यमुना में गोता लगा रहे थे, तब दो विग्रह उनकी दोनों बगलों में आ गए - एक कृष्ण और एक बलराम। यह स्वतः प्राप्त हुए, जैसे भगवान ने स्वयं उन्हें सान्त्वना देने के लिए भेज दिए हों। रामाई ठाकुर ने इन विग्रहों का नाम रखा 'कानाई-बलाई' - कानाई अर्थात कृष्ण और बलाई अर्थात बलराम। इसके पश्चात वे वृंदावन में विचरण करते रहे। उस समय एक-एक करके सभी गोस्वामी - श्री रूप गोस्वामी, श्री सनातन गोस्वामी आदि - सब नित्य लीला में प्रविष्ट हो गए।
🔗 भक्त की भक्ति का फल - भगवान स्वयं आते हैं।
📌 कानाई-बलाई विग्रह:
  • कानाई = कृष्ण विग्रह
  • बलाई = बलराम विग्रह
  • माता के विरह में सान्त्वना स्वरूप
माता जाह्नवी ठाकुरानी का विग्रह रूप एवं रामाई ठाकुर का विरह
माता जाह्नवी के लीला संवरण के पश्चात् उनके विग्रह रूप में प्रकट होने तथा श्री रामाई ठाकुर के गहन वियोग का वर्णन
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माता जाह्नवी का विग्रह रूप प्रकाश
माता जाह्नवी ठाकुरानी का गोपीनाथ मंदिर में विग्रह रूप प्रकाश
▶ देखें (23:09) ▶ Watch (23:09)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि माता जाह्नवी ठाकुरानी के लीला संवरण के पश्चात् एक अद्भुत लीला घटित हुई। गोपीनाथ मंदिर में श्री नित्यानंद प्रभु के विग्रह के बाएँ भाग में एक बंगाली स्त्री आकर खड़ी हो गईं। जब भक्तों ने ध्यान से देखा तो पाया कि यह तो उनकी माता जाह्नवी ही हैं जो विग्रह रूप में प्रकट हो गई हैं। इस प्रकार माता जाह्नवी ठाकुरानी अपनी छोटी बहन (राधारानी की सखी) के साथ गोपीनाथ विग्रह के समीप स्थापित हो गईं। आज भी उस मंदिर में गोपीनाथ के दाहिने भाग में राधारानी एवं बाएँ भाग में अनंग मंजरी अर्थात् माता जाह्नवी ठाकुरानी विग्रह रूप में विराजमान हैं। यह आनंदमयी लीला भक्तों के लिए अत्यंत दुर्लभ दर्शन का अवसर प्रदान करती है।
🔗 माता जाह्नवी का विग्रह रूप में प्रकट होना उनकी नित्य उपस्थिति का प्रमाण है।
📌 गोपीनाथ मंदिर में विग्रह स्थापना:
  • दाहिने भाग में - श्री राधारानी
  • बाएँ भाग में - अनंग मंजरी (माता जाह्नवी ठाकुरानी)
  • मध्य में - श्री गोपीनाथ (नित्यानंद प्रभु)
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रामाई ठाकुर का मातृ वियोग
श्री रामाई ठाकुर का गहन मातृ वियोग एवं वैराग्य
▶ देखें (23:51) ▶ Watch (23:51)
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि माता जाह्नवी के लीला संवरण के पश्चात् श्री रामाई ठाकुर अत्यंत दुःखी हो गए। वे सोचने लगे कि माता चली गईं, अब इस संसार में रहकर क्या करेंगे? किसके लिए जिएंगे? भैया वीरचंद्र प्रभु हैं, परिवार है, परंतु माता के बिना सब शून्य लगता है। सद्गुरुदेव एक अत्यंत मार्मिक बात कहते हैं - 'मातृहारा तो सर्वहारा' अर्थात् जिसकी माता नहीं है, उसके पास संसार में कुछ भी नहीं है। माता का स्नेह जिसको प्राप्त हुआ है, वही जानता है कि मातृ स्नेह क्या होता है। माता जाह्नवी ने कोटि माताओं के स्नेह से भी अधिक स्नेह देकर श्री रामाई ठाकुर को भगवत् भावना में पुष्ट किया था। उस पुष्टि से जो स्वरूप सिद्धि उन्होंने प्राप्त की, वह सब माता की कृपा का फल था।
🔗 मातृ स्नेह का महत्व और उसके अभाव में साधक की विरक्ति
📌 मातृ वियोग की पीड़ा:
  • मातृहारा = सर्वहारा (माता के बिना सब शून्य)
  • कोटि मातृ स्नेह से भी अधिक था माता जाह्नवी का स्नेह
  • माता की कृपा से ही भगवत् भावना में पुष्टि हुई
वृंदावन वियोग एवं कानाई-बलाई विग्रह प्राप्ति
श्री रामाई ठाकुर का वृंदावन से विदाई लेना एवं यमुना में कानाई-बलाई विग्रह की अलौकिक प्राप्ति
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वृंदावन से अश्रुपूर्ण विदाई
श्री रामाई ठाकुर का वृंदावन से अश्रुपूर्ण विदाई
▶ देखें (25:02) ▶ Watch (25:02)
सद्गुरुदेव वर्णन करते हैं कि वृंदावन में धीरे-धीरे सभी महान संत - श्री रूप गोस्वामी, श्री सनातन गोस्वामी आदि एक-एक करके नित्य लीला में प्रविष्ट हो गए। वृंदावन सूना हो गया। श्री रामाई ठाकुर ने वृंदावन को दंडवत प्रणाम करते हुए विदाई ली। उनके हृदय में यह शंका थी कि शायद कभी वृंदावन में फिर दोबारा आने का मौका मिलेगा कि नहीं? महाप्रभु की कृपा होगी कि नहीं? अश्रुधारा से अपने वक्षस्थल को अभिषिक्त करते हुए वे वृंदावन छोड़कर चल दिए। सद्गुरुदेव कहते हैं कि जिन महापुरुषों के चरण सान्निध्य में रहकर, जिनके मुखारविंद से निसृत हरिकथा अमृत सुधा में अवगाहन करके संतप्त हृदय शांति पाता था, वे सब चले गए - अब आएंगे तो किसके लिए आएंगे?
🔗 संत वियोग की पीड़ा और वृंदावन के प्रति गहन प्रेम
📌 वृंदावन के संतों का नित्य लीला प्रवेश:
  • श्री रूप गोस्वामी
  • श्री सनातन गोस्वामी
  • श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी
  • सभी एक-एक करके नित्य धाम पधारे
बाघना पाड़ा: जंगल वास एवं शेर को दीक्षा
श्री रामाई ठाकुर का जंगल में एकांत वास और हिंसक शेर को हरिनाम दीक्षा देकर शांत करने की अलौकिक लीला
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जंगल में एकांत वास
श्री रामाई ठाकुर का कालना के जंगल में वैराग्यपूर्ण एकांत वास
▶ देखें (26:04) ▶ Watch (26:04)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि वृंदावन से लौटकर श्री रामाई ठाकुर नवद्वीप होते हुए कालना नामक स्थान पर आ गए। मन में इतना वैराग्य था कि खरदा (अपने गृह स्थान) जाने की इच्छा नहीं हुई। वे सोचते थे - 'माँ नहीं हैं, खरदा में जाकर हम क्या करेंगे? माँ के सान्निध्य में रहते थे।' वहाँ एक घने जंगल में जाकर उन्होंने निवास करना आरंभ कर दिया। कानाई-बलाई विग्रह को एक पेड़ के कोटर (खोखले भाग) में रखकर वहीं रहने लगे। उस जंगल में एक अत्यंत खतरनाक शेर रहता था जिसके भय से गाँववासी वहाँ जाते नहीं थे। कुछ लोगों ने डंडा-लट्ठ लेकर जाकर बाबा को समझाया - 'यहाँ शेर रहता है, आप यहाँ मत रहो, ठाकुर जी को ऐसे पेड़ में रखना भी ठीक नहीं है।' गाँव वालों ने उनके लिए एक झोपड़ी बनाने का प्रस्ताव भी दिया ताकि वे सुरक्षित रहें, किन्तु श्री रामाई ठाकुर ने वह भी अस्वीकार कर दिया - 'हम तो जाएंगे नहीं। मरेंगे तो मरेंगे, शेर खा जाए तो कोई बात नहीं।'
🔗 परम वैराग्य की स्थिति जहाँ प्राण का भी मोह नहीं रहता
❓ प्रश्न: श्री रामाई ठाकुर ने खरदा जाने से क्यों मना किया? ▶ 26:14
💡 उत्तर: 💡 उत्तर: माता जाह्नवी के लीला संवरण के पश्चात् श्री रामाई ठाकुर का हृदय अत्यंत विरक्त हो गया था। वे कहते थे - 'माँ के सान्निध्य में रहते थे, मातृहारा तो सर्वहारा।' खरदा में माता की स्मृतियाँ थीं, वहाँ जाकर क्या करेंगे? इसीलिए उन्होंने जंगल में एकांत वास को चुना।
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शेर को हरिनाम दीक्षा
श्री रामाई ठाकुर द्वारा हिंसक शेर को हरिनाम दीक्षा - बाघना पाड़ा की उत्पत्ति
▶ देखें (27:47) ▶ Watch (27:47)
सद्गुरुदेव एक अत्यंत अद्भुत लीला का वर्णन करते हैं। एक दिन वह खतरनाक शेर गर्जना करते हुए श्री रामाई ठाकुर के पास आया। रामाई ठाकुर ने उसे प्रेम से बुलाया - 'इधर आ, इधर आ।' शेर बिल्ली की भाँति उनके बगल में बैठ गया। रामाई ठाकुर उसके माथे पर हाथ फेरते हुए बोले - 'तू ऐसे हिंसा करता है? सब तेरे डर के मारे यहाँ आना बंद कर दिए हैं। ऐसे नहीं करना चाहिए।' फिर उन्होंने कहा - 'सुन, आज तुझे हम हरिनाम दे रहे हैं, दीक्षा दे रहे हैं। आज से हिंसा करना छोड़ देना।' उन्होंने शेर के कान में हरिनाम मंत्र दिया और कहा - 'जा, आज से तू बाघ नहीं।' उस दिन से उस स्थान का नाम 'बाघना पाड़ा' (अर्थात् 'बाघ नहीं') पड़ गया। वह शेर अब किसी को हिंसा नहीं करता था, जंगल में ही रहता था और श्री रामाई ठाकुर के पास आकर बैठता था। वे जो भी फल-मूल देते, वह खाकर वहीं मस्ती से रहता था।
🔗 हरिनाम की अपार शक्ति जो हिंसक पशु को भी शांत कर दे
📌 बाघना पाड़ा नामकरण:
  • बाघना = बाघ नहीं (बाघ + ना)
  • शेर को हरिनाम दीक्षा के बाद नामकरण हुआ
  • आज भी यह स्थान इसी नाम से प्रसिद्ध है
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कानाई-बलाई मंदिर स्थापना
बाघना पाड़ा में कानाई-बलाई मंदिर की स्थापना
▶ देखें (29:52) ▶ Watch (29:52)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि श्री रामाई ठाकुर की प्रसिद्धि चारों ओर फैल गई। गाँववासियों ने जंगल को साफ करके वहाँ कानाई-बलाई मंदिर की स्थापना की। श्री रामाई ठाकुर ने अपने छोटे भाई श्री सचिनंदन को बुलाया और कहा - 'तू आकर ठाकुर जी की सेवा कर, सेवा पूजा तो हमसे होगी नहीं।' इस प्रकार श्री सचिनंदन मंदिर में सेवा पूजा के लिए नियुक्त हुए और वहाँ सेवा निर्वाह करने लगे।
🔗 विरक्त महात्मा का विग्रह सेवा के लिए उचित व्यवस्था करना
श्री वीरचंद्र प्रभु की दिव्य परीक्षा
श्री वीरचंद्र प्रभु द्वारा 11,000 नेड़ा-नेड़ी भेजकर श्री रामाई ठाकुर की परीक्षा एवं अदृश्य शक्ति से भंडारा
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वीरचंद्र प्रभु की परीक्षा
श्री वीरचंद्र प्रभु द्वारा 11,000 नेड़ा-नेड़ी भेजकर श्री रामाई ठाकुर की परीक्षा
▶ देखें (30:23) ▶ Watch (30:23)
सद्गुरुदेव एक रोचक लीला सुनाते हैं। श्री वीरचंद्र प्रभु (जो स्वयं अनिरुद्ध के अवतार पुरुष हैं) ने सुना कि उनके भाई श्री रामाई ठाकुर बड़े सिद्ध हो गए हैं - शेर को दीक्षा देकर बिल्ली बना दिया है। उन्होंने सोचा - 'अच्छा, बड़ी सिद्धाई दिखाते हैं! देखेंगे कितनी बड़ी सिद्धाई है।' उन्होंने अपनी शक्ति से 11,000 नेड़ा-नेड़ी (मुंडित मस्तक, तिलक धारी नवयुवक वैष्णव-वैष्णवी) सृष्टि किए और उन्हें आदेश दिया - 'रात 12 बजे श्री रामाई ठाकुर के यहाँ जाकर आतिथ्य स्वीकार करो और उनकी परीक्षा करो। ऐसी-ऐसी वस्तुएँ माँगना जो मिलना संभव न हो।'
🔗 भगवत् कृपा प्राप्त साधक की परीक्षा स्वयं भगवान के अवतार लेते हैं
📌 परीक्षा की योजना:
  • 11,000 नेड़ा-नेड़ी की सृष्टि
  • रात 12 बजे आगमन का आदेश
  • असम्भव वस्तुओं की माँग करने का निर्देश
  • उद्देश्य: भाई की सिद्धि की परीक्षा
🍽️
अदृश्य शक्ति से भंडारा
अदृश्य शक्ति द्वारा 11,000 वैष्णवों के लिए असंभव भंडारा
▶ देखें (32:49) ▶ Watch (32:49)
सद्गुरुदेव वर्णन करते हैं कि रात 12 बजे 'राधे श्याम, राधे श्याम' करते हुए 11,000 तेजस्वी वैष्णव जंगल में आ पहुँचे। उनके शरीर से तेज बिखर रहा था। उन्होंने माँग की - 'आम खाने दो, भूख लगी है।' (उस समय आम का मौसम नहीं था, ठंडी का मौसम था।) गरम-गरम चावल की रसोई करो। 'ज्यादा देरी नहीं करेंगे, हो सके तो करो, नहीं तो जा रहे हैं।' श्री रामाई ठाकुर ने मन ही मन माँ से प्रार्थना की - 'अब संकट से तो बचाओ।' देखते-देखते अदृश्य शक्ति आ गई। कहाँ से इतने सेवक आ गए, कहाँ से रसोई हो रही है - कोई नहीं जानता। बड़े-बड़े कढ़ाई, पत्तल, सब व्यवस्था हो गई। साधु-वैष्णव बनकर सेवक आ गए। 'जय जय राधे' बोलकर सबको पंगत में बैठाया। गरम-गरम प्रसाद - रसगुल्ला, गुलाब जामुन, और विशेष करके वही आम जो उस मौसम में मिलना असंभव था - सब परोसा गया। इस प्रकार 11,000 वैष्णव तृप्त होकर श्री वीरचंद्र प्रभु के पास गए और बोले - 'आपके भाई वास्तव में सिद्ध हैं।'
🔗 भगवान के शरणागत भक्त के लिए असंभव भी संभव हो जाता है
⚖️ भंडारा की विशालता — व्यावहारिक तुलना
सामान्य भंडारा: 1,000 लोगों के लिए 15 दिन पहले से चिंता, तैयारी, व्यवस्था
अदृश्य शक्ति का भंडारा: 11,000 लोगों के लिए रात 12 बजे, बेमौसम आम सहित पूर्ण व्यवस्था — तत्क्षण!
📌 असंभव माँगें जो पूर्ण हुईं:
  • बेमौसम आम (ठंडी में आम की माँग)
  • गरम-गरम रसोई (रात 12 बजे जंगल में)
  • 11,000 के लिए पंगत व्यवस्था
  • रसगुल्ला, गुलाब जामुन आदि पकवान
वास्तविक सिद्धि का रहस्य एवं उपपंथों की चेतावनी
सद्गुरुदेव द्वारा वास्तविक सिद्धि की व्याख्या, नेड़ा-नेड़ी उपपंथों के विषय में चेतावनी एवं निरभिमान भजन का महत्व
वास्तविक सिद्धि का स्वरूप
वास्तविक सिद्धि: चमत्कार नहीं, निरभिमान भजन है
▶ देखें (34:22) ▶ Watch (34:22)
सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि यह कोई 'सिद्धाई' (चमत्कारिक शक्ति प्रदर्शन) नहीं है। जो साधक निरभिमान भाव से भगवत् चरणों में समर्पित होकर भजन करते हैं, उनके पीछे-पीछे सभी शक्तियाँ उनकी सेवा में तत्पर रहती हैं। यह स्वाभाविक है, कोई विशेष सिद्धि नहीं। वैष्णव तो विनम्रता में ही रहते हैं - वे अपने को सदा हीन मानते हैं, अयोग्यता बुद्धि रखते हैं। इसी भाव में प्रेम है, इसी में सर्व सिद्धि है। वैष्णव कभी अपने को बड़ा नहीं मानते, बल्कि दूसरों को प्रभु मानकर सम्मान करते हैं।
🔗 सिद्धि की वास्तविक परिभाषा समर्पण और विनम्रता में है
❓ प्रश्न: वास्तविक सिद्धि क्या है? ▶ 34:22
💡 उत्तर: 💡 उत्तर: वास्तविक सिद्धि चमत्कार प्रदर्शन नहीं है। जो भक्त निरभिमान होकर, अभिमान शून्य होकर, भगवत् प्रसन्नता को ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य मानकर भजन करते हैं - उनकी सेवा में सभी शक्तियाँ स्वतः तत्पर रहती हैं। यही वास्तविक सिद्धि है।
✅ करें:
  • निरभिमान भाव से भगवत् भजन करें
  • स्वयं को सदा हीन एवं अयोग्य मानें
  • दूसरों को प्रभु मानकर सम्मान करें
❌ न करें:
  • चमत्कारों को सिद्धि न समझें
  • अपने को बड़ा न मानें
⚠️
नेड़ा-नेड़ी उपपंथों की चेतावनी
बंगाल के उपपंथ एवं शुद्ध भक्ति मार्ग से विचलन
▶ देखें (34:43) ▶ Watch (34:43)
सद्गुरुदेव एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं कि परवर्ती काल में इस नेड़ा-नेड़ी सृष्टि से एक उपधर्म/अपधर्म का प्रारंभ हुआ। गौड़ीय वैष्णव धर्म की शुद्ध धारा को संसार में बनाए रखना कठिन था। कलियुग के जीव भोगोन्मुखी वृत्ति वाले, देह धर्मी हैं। माधुर्य उपासना, युगल प्रेम विलास माधुरी की गूढ़ उपासना को समझने में असमर्थ होने के कारण इसका विकृत रूप उत्पन्न हुआ। परवर्तिका ग्रंथ में उल्लेख है कि बंगाल में अनेक पंथ-उपपंथ उत्पन्न हुए जो शास्त्र वैदिक मार्ग से हटकर तांत्रिक मार्ग पर चलते हैं - नेड़ा-नेड़ी, साईं धर्म, कर्तव्य जा, कला सन्धी, जात गोसाई आदि। पूर्व बंगाल में आज भी ये प्रचलित हैं। इनका खान-पान भी अशुद्ध है - मछली आदि खाते हैं और इसे ही वैष्णव सेवा मानते हैं। सद्गुरुदेव कहते हैं - 'सुनने से तो कान में उँगली देनी पड़ेगी।' परंतु अब बहुत सुधार आया है, कई लोग वृंदावन आकर अपना मत बदलकर महाप्रभु की शुद्ध धारा में आ गए हैं।
🔗 शुद्ध भक्ति मार्ग की पहचान एवं विकृत मार्गों से सावधानी
❌ न करें:
  • तांत्रिक उपपंथों को शुद्ध भक्ति न समझें
  • अशुद्धाचार वाले मार्गों का अनुसरण न करें
📌 बंगाल के उपपंथ (अशुद्ध धाराएँ):
  • नेड़ा-नेड़ी
  • साईं धर्म
  • दरवेश
  • कर्त्ताभजा
  • कला सन्धी
  • जात गोसाई
  • इनमें शास्त्रीय वैदिक मार्ग का अभाव है
भगवान का योगक्षेम वहन
श्री गुरुदेव की कथा द्वारा योगक्षेम सिद्धांत की प्रामाणिकता एवं शरणागत भक्त के प्रति भगवान की प्रतिज्ञा
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गुरुदेव की तपोवन कथा
श्री गुरुदेव की तपोवन कथा: भगवान का योगक्षेम वहन
▶ देखें (37:17) ▶ Watch (37:17)
सद्गुरुदेव अपने गुरुदेव की एक कथा सुनाते हैं जो योगक्षेम सिद्धांत का साक्षात् प्रमाण है। गुरुदेव तपोवन में रहते थे, उस समय ब्रजमंडल में उनकी बड़ी प्रसिद्धि थी और समस्त संप्रदाय उन्हें मानते थे। एक बार कुछ रामानंदी संत 'सीताराम' बोलकर आए। गुरुदेव ने कहा - 'यमुना स्नान करके आइए, प्रसाद पाइए।' उन्होंने कहा - 'हम तो तुम्हारे हाथ की रसोई नहीं खाते। हम फलाहारी हैं।' और ऐसे-ऐसे फलों की माँग की जो उस समय मिलना असंभव था - आम, संतरा इत्यादि। 'ऐसे-ऐसे हो तो फलाहार कर सकते हैं, नहीं तो राधे श्याम, हम लोग चलते हैं।' गुरुदेव ने विनम्रता से कहा - 'ठीक है, आप स्नान करके आइए।' जब वे संत यमुना स्नान कर रहे थे, तभी दो सेठ टोकरी में वही-वही फल लेकर आए जो माँगे गए थे - बाबा को प्रणाम करके चले गए। सेवकों ने देखा - आम और सभी माँगे हुए फल! भोग लगाकर जब संतों को परोसा गया, वे बड़े प्रसन्न हुए।
🔗 निरभिमान भक्त के लिए भगवान स्वयं व्यवस्था करते हैं
📌 कथा का सार:
  • वैष्णव सदा विनम्र रहता है, अपना दोष देखता है
  • असंभव माँग पर भी भगवान व्यवस्था करते हैं
  • यह चमत्कार नहीं, भगवान की प्रतिज्ञा का पालन है
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योगक्षेम वहन का सिद्धांत
भगवान का वचन: योगक्षेम वहाम्यहम्
▶ देखें (39:40) ▶ Watch (39:40)
सद्गुरुदेव गीता के योगक्षेम सिद्धांत की व्याख्या करते हैं। जो साधक भगवत् चरणों में समर्पित होकर, भगवत् प्रसन्नता को ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य मानकर, निरभिमान चित्तवृत्ति से भगवान के चरणों में शरणागत होकर भजन करते हैं - भगवान कहते हैं 'योगक्षेमं वहाम्यहम्' - मैं उनका योगक्षेम वहन करता हूँ। 'योग' का अर्थ है अलब्ध वस्तु की प्राप्ति (जो नहीं मिला उसे प्राप्त कराना) और 'क्षेम' का अर्थ है लब्ध वस्तु का संरक्षण (जो मिला है उसकी रक्षा करना)। सद्गुरुदेव दृढ़ता से कहते हैं - 'यह सत्य है, यह कोई कल्पना नहीं है। आप भी यदि इस प्रकार समर्पित होकर भगवत् भजन करें, भगवत् प्रसन्नता ही आपके साधन का प्राण केंद्र हो, दीन-हीन होकर शरणागत होकर भजन करें - तो भगवान इसी प्रकार आपका भी योगक्षेम वहन करेंगे।'
🔗 शरणागति का फल - भगवान स्वयं रक्षक बनते हैं
भगवान की योगक्षेम प्रतिज्ञा— भगवद् गीता Bhagavad Gita 9.22
▶ 40:01
संदर्भ पूरक संदर्भ
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते | तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ||
ananyāś cintayanto māṁ ye janāḥ paryupāsate | teṣāṁ nityābhiyuktānāṁ yoga-kṣemaṁ vahāmy aham ||
जो भक्त अनन्य भाव से मुझे चिंतन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, उन नित्य युक्त भक्तों का योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ।
❓ प्रश्न: योग और क्षेम का क्या अर्थ है? ▶ 40:11
💡 उत्तर: 💡 उत्तर: योग का अर्थ है 'अलब्ध वस्तु की प्राप्ति' - जो वस्तु अभी तक प्राप्त नहीं हुई, उसे प्राप्त कराना। क्षेम का अर्थ है 'लब्ध वस्तु का संरक्षण' - जो वस्तु पहले से प्राप्त है, उसकी रक्षा करना। भगवान अपने शरणागत भक्त के लिए दोनों कार्य स्वयं करते हैं।
✅ करें:
  • भगवत् प्रसन्नता को साधन का प्राण केंद्र बनाएँ
  • दीन-हीन भाव से शरणागत होकर भजन करें
📌 योगक्षेम की परिभाषा:
  • योग = अलब्ध वस्तु की प्राप्ति (अप्राप्त को प्राप्त कराना)
  • क्षेम = लब्ध वस्तु का संरक्षण (प्राप्त की रक्षा करना)
श्री रामाई ठाकुर का लीला संवरण
दोनों भाइयों का मिलन एवं श्री रामाई ठाकुर का कृष्णकर्णामृत श्लोक उच्चारण करते हुए नित्य लीला प्रवेश
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दो भाइयों का दिव्य मिलन
श्री वीरचंद्र प्रभु एवं श्री रामाई ठाकुर का आनंदमय मिलन
▶ देखें (41:03) ▶ Watch (41:03)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि श्री वीरचंद्र प्रभु अपने हजारों शिष्यों को लेकर अपने भाई श्री रामाई ठाकुर से मिलने आए। उस समय पूरे पूर्व बंगाल में श्री वीरचंद्र प्रभु की बड़ी प्रसिद्धि थी। दोनों सामर्थ्यवान महापुरुषों का मिलन अत्यंत अद्भुत था। दोनों ही महाप्रभु के प्रेम से पुष्ट थे, दोनों ही अलौकिक शक्ति संपन्न थे, दोनों ही राधारानी के प्रेम को प्राप्त करके कृतकृत्य-धन्य हो चुके थे। वे उस प्रेम धारा को जगत के जीवों में इसी प्रकार वितरण कर रहे थे। सद्गुरुदेव कहते हैं कि श्री वीरचंद्र प्रभु के जीवन चरित्र की भी आलोचना करने की इच्छा है - 'मिला नहीं अभी, ढूँढ रहे हैं।'
🔗 भगवत् प्रेम से परिपूर्ण महापुरुषों का मिलन जगत के कल्याण के लिए होता है
📌 दोनों भाइयों की समानता:
  • दोनों महाप्रभु के प्रेम से पुष्ट
  • दोनों अलौकिक शक्ति संपन्न
  • दोनों राधा प्रेम प्राप्त करके कृतकृत्य
  • दोनों प्रेम धारा के वितरणकर्ता
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लीला संवरण की तैयारी
श्री रामाई ठाकुर की लीला संवरण की तैयारी
▶ देखें (42:27) ▶ Watch (42:27)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि बहुत दिन बीत गए। कानाई-बलाई की सेवा में छोटे भाई श्री सचिनंदन तल्लीन थे। श्री रामाई ठाकुर ने निश्चय किया - 'अब हम लीला संवरण करेंगे।' उन्होंने तत्कालीन सभी महान संतों को, जो भी भगवत् प्रेमी भक्त थे, महाप्रभु के परम प्रेमी जो उस प्रेम को प्राप्त करके कृतकृत्य हो गए थे - सबको बुलाया। मंदिर प्रांगण में साधु सेवा, संत सेवा हुई। कीर्तन समारोह, हरिकथा - इस प्रकार कई दिन व्यतीत हुए। श्री सचिनंदन ने बहुत अनुरोध किया - 'ताऊजी, आप कुछ दिन और रह जाइए।' परंतु श्री रामाई ठाकुर ने कहा - 'ना, अब हो गया। बहुत दिन हो गए। माँ भी चले गईं, सब चले गए। अब रहकर क्या करेंगे? महाप्रभु ने प्रेम धर्म प्रचार के लिए जो शक्ति संचार की थी, वह सेवा हमने अपनी सामर्थ्य अनुसार की।' उन्होंने यह भी बताया कि बड़े भैया श्री वीरचंद्र प्रभु का परिवार है, परंतु श्री रामाई ठाकुर ने दार परिग्रह नहीं किया था। माता जाह्नवी ने प्रयास किया था कि वे गृहस्थ आश्रम में रहें, परंतु उन्होंने मना कर दिया। अखंड ब्रह्मचर्य धारण करके ही धर्म प्रचार किया।
🔗 कार्य पूर्ण होने पर संत स्वधाम गमन करते हैं
❓ प्रश्न: श्री रामाई ठाकुर ने गृहस्थ आश्रम क्यों नहीं लिया? ▶ 43:59
💡 उत्तर: 💡 उत्तर: माता जाह्नवी ठाकुरानी ने प्रयास किया था कि श्री रामाई ठाकुर दार परिग्रह करके गृहस्थ आश्रम में रहें और सांसारिक जीवन धारण करके धर्म प्रचार करें। परंतु उन्होंने मना कर दिया और अखंड ब्रह्मचर्य धारण करके ही महाप्रभु के प्रेम धर्म का प्रचार किया।
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कृष्णकर्णामृत श्लोक से नित्य लीला प्रवेश
श्री रामाई ठाकुर का कृष्णकर्णामृत श्लोक उच्चारण करते हुए नित्य लीला प्रवेश
▶ देखें (44:41) ▶ Watch (44:41)
सद्गुरुदेव श्री रामाई ठाकुर के लीला संवरण का अत्यंत मार्मिक वर्णन करते हैं। एक दिन सबको बुलाकर कीर्तन समारोह में श्री रामाई ठाकुर ने श्री बिल्वमंगल ठाकुर रचित कृष्णकर्णामृत के एक श्लोक का उच्चारण आरंभ किया। वह श्लोक उच्चारण करते-करते वे ध्यानस्थ होते गए और धीरे-धीरे इस नश्वर शरीर से निष्क्रान्त होकर नित्य लीला में प्रवेश कर गए। पद्मासन में बैठकर, अश्रुधारा से वक्षस्थल को अभिषिक्त करते हुए, भगवत् चिंतन में तल्लीनता के साथ उन्होंने देह त्याग किया। सद्गुरुदेव कहते हैं कि इस पावन जीवन गाथा की आलोचना करके हम अपनी वाणी को पवित्र करते हैं और स्वयं को धन्य मानते हैं।
🔗 भक्त का देह त्याग भी भगवत् स्मरण में ही होता है
लीला संवरण के समय उच्चारित श्लोक— Krishna Karnamritam Sri Krishna Karnamritam 2.41
▶ 44:41
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
हे देव हे दयित हे भवनैकबन्धो हे कृष्ण हे चपल हे करुणैकसिन्धो | हे नाथ हे रमण हे नयनाभिराम हा हा कदानु भवितासि पदं दृशोर्मे ||
he deva he dayita he bhavanaika-bandho he kṛṣṇa he capala he karuṇaika-sindho | he nātha he ramaṇa he nayanābhirāma hā hā kadānu bhavitāsi padaṁ dṛśor me ||
हे देव! हे प्रियतम! हे सबके एकमात्र बंधु! हे कृष्ण! हे चंचल! हे करुणा के एकमात्र सागर! हे नाथ! हे रमण! हे नयनाभिराम! हा हा! कब तुम मेरे नेत्रों के विषय बनोगे?
📌 लीला संवरण का स्वरूप:
  • पद्मासन में बैठकर
  • कृष्णकर्णामृत श्लोक का उच्चारण करते हुए
  • अश्रुधारा से वक्षस्थल अभिषिक्त
  • भगवत् चिंतन में तल्लीनता के साथ
  • सज्ञान देह त्याग
उपसंहार एवं गुरुदेव जीवनी की भूमिका
सत्संग का समापन एवं आगामी दिनों में श्री गुरुदेव के जीवन चरित्र की आलोचना की घोषणा
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गुरुदेव जीवनी की भूमिका
श्री गुरुदेव के जीवन चरित्र सुधा आस्वादन की घोषणा
▶ देखें (46:26) ▶ Watch (46:26)
सद्गुरुदेव सत्संग का समापन करते हुए बताते हैं कि श्री रामाई ठाकुर की जीवन गाथा यहीं पूर्ण होती है। श्रोताओं के आग्रह पर वे अपने गुरुदेव के जीवन चरित्र की आलोचना करने का संकल्प लेते हैं। सद्गुरुदेव बताते हैं कि गुरुदेव की आविर्भाव तिथि माघी पूर्णिमा संपन्न हो गई है और तिरोभाव तिथि कृष्ण नवमी (11 फरवरी) है। उस उत्सव का अनुष्ठान चल रहा है। गुरुदेव का जीवन चरित्र अत्यंत अलौकिक एवं सुंदर है। नवमी तिथि तक इस जीवन चरित्र सुधा का आस्वादन करने का प्रयास किया जाएगा।
🔗 भक्त कथा से भक्त कथा की ओर - यही सत्संग परम्परा है
📌 श्री गुरुदेव की तिथियाँ:
  • आविर्भाव तिथि - माघी पूर्णिमा
  • तिरोभाव तिथि - कृष्ण नवमी (11 फरवरी)
गुरुदेव जीवनी आलोचना की घोषणा
गुरुदेव के आविर्भाव एवं तिरोभाव तिथि के संदर्भ में जीवन चरित्र सुधा आस्वादन का संकल्प
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गुरुदेव जीवनी प्रस्ताव
गुरुदेव के जीवन चरित्र सुधा आस्वादन की घोषणा
▶ देखें (46:26) ▶ Watch (46:26)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि श्रोतागण का आग्रह है कि गुरुदेव की जीवनी पर कुछ आलोचना की जाए, चाहे पाँच दिन ही क्यों न लगें। गुरुदेव के आविर्भाव तिथि का उत्सव (माघी पूर्णिमा) संपन्न हो चुका है। अब तिरोभाव तिथि (कृष्ण नवमी, 11 फरवरी) का उत्सव आ रहा है और इसके लिए अनुष्ठान चल रहा है। सद्गुरुदेव कहते हैं कि उत्सव को सुचारू रूप में संपन्न करने हेतु सभी प्रयासरत हैं। वे संकल्प लेते हैं कि नवमी तिथि तक गुरुदेव के अलौकिक जीवन चरित्र सुधा का आस्वादन किया जाएगा। सद्गुरुदेव कहते हैं कि गुरुदेव के जीवन चरित्र बड़े अद्भुत और सुंदर हैं। श्रोतागण के आग्रह पर वे इस कथा को अगले दिन से प्रारंभ करने की बात कहते हैं।
🔗 यह घोषणा गुरु-शिष्य परम्परा के महत्व को दर्शाती है जहाँ गुरुदेव के जीवन चरित्र का श्रवण भक्तों के लिए आध्यात्मिक पोषण का स्रोत है।
📌 गुरुदेव की महत्वपूर्ण तिथियाँ:
  • आविर्भाव तिथि: माघी पूर्णिमा (संपन्न)
  • तिरोभाव तिथि: कृष्ण नवमी (11 फरवरी)
🧠 आत्म-चिंतन (Self Assessment)
इस सत्संग से आपने क्या सीखा? (Test your understanding)
Core Essence
श्री रामाई ठाकुर का गौड़ीय वैष्णव परंपरा में क्या स्थान है और उन्होंने यह पद कैसे प्राप्त किया?
उत्तर: श्री रामाई ठाकुर महाप्रभु के अंतर्धान के पश्चात गौड़ीय वैष्णव धर्म के प्रमुख धारक-वाहक बने। उन्हें माता जाह्नवी ठाकुरानी ने पुत्र रूप में स्वीकार किया और मंजरी भाव उपासना पद्धति के प्रचार हेतु दीक्षित किया।
Multiple Choice
🔢 श्री वंशीवदनानंद ठाकुर ने देहत्याग से पूर्व अपनी पुत्रवधू को क्या दिव्य आशीर्वाद दिया था?
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
सत्संग के अनुसार, वंशीवदनानंद ठाकुर ने वचन दिया था कि वे अपनी पुत्रवधू के पुत्र के रूप में पुनर्जन्म लेंगे, जो बाद में श्री रामाई ठाकुर के रूप में प्रकट हुए।
Multiple Choice
🔢 वृंदावन यात्रा के दौरान, माता जाह्नवी ठाकुरानी ने ब्रजमंडल में कौन सा अलौकिक कार्य किया था?
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
सत्संग में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि माता जाह्नवी ने अपनी दिव्य शक्ति से ब्रजमंडल में एक मृत बालक को पुनः जीवित कर दिया था।
Multiple Choice
🔢 माता जाह्नवी के तिरोभाव (विग्रह में विलीन होने) के पश्चात श्री रामाई ठाकुर को कौन से विग्रह प्राप्त हुए?
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
सत्संग के अनुसार, माता जाह्नवी के कामा में गोपीनाथ विग्रह में विलीन होने के बाद, रामाई ठाकुर को यमुना स्नान के दौरान कानाई-बलाई विग्रह मिले।
Multiple Choice
🔢 किसने श्री रामाई ठाकुर को पुत्र रूप में स्वीकार किया और गौड़ीय वैष्णव धर्म के प्रचार हेतु दीक्षित किया?
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
सारांश के अनुसार, माता जाह्नवी ठाकुरानी ने रामाई ठाकुर को अपने पुत्र के रूप में स्वीकार किया और उन्हें धर्म प्रचार के लिए दीक्षित किया।
Multiple Choice
🔢 श्री रामाई ठाकुर के प्रपितामह (great-grandfather) का क्या नाम था?
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
सत्संग के सारांश में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि रामाई ठाकुर के प्रपितामह श्री माधवदास (चकारि गोस्वामी) थे।
True/False
🤔 श्री वंशीवदनानंद ठाकुर, श्री रामाई ठाकुर के पिता थे।
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
सत्संग के अनुसार, श्री वंशीवदनानंद ठाकुर रामाई ठाकुर के पितामह (grandfather) थे, पिता नहीं।
True/False
🤔 माता जाह्नवी ठाकुरानी वृंदावन में यमुना नदी में विलीन हो गईं।
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
सत्संग के सारांश में बताया गया है कि माता जाह्नवी कामा में गोपीनाथ विग्रह में विलीन हुई थीं, यमुना नदी में नहीं।
True/False
🤔 श्री रामाई ठाकुर को कानाई-बलाई विग्रह की प्राप्ति माता जाह्नवी के तिरोभाव के पश्चात हुई।
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
सारांश में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि माता जाह्नवी के विग्रह में विलीन होने के बाद रामाई ठाकुर को यमुना स्नान में कानाई-बलाई विग्रह मिले।

✨ विशेष उल्लेख

📋 रामाई ठाकुर का वंश वृक्ष
  • प्रपितामह: श्री माधवदास (चकारि गोस्वामी / माधव चट्टोपाध्याय)
  • प्रपितामही: श्रीमती सुनीता देवी
  • पितामह: श्री वंशीवदनानंद ठाकुर (माधवदास के पुत्र)
  • पिता: श्री चैतन्य (वंशीवदनानंद ठाकुर के बड़े पुत्र)
  • चाचा: श्री निताई (वंशीवदनानंद ठाकुर के छोटे पुत्र)
  • श्री रामाई ठाकुर (चैतन्य के प्रथम पुत्र)
  • छोटे भाई: श्री सचिनंदन (रामाई से 10 वर्ष छोटे)
📋 नित्यानंद प्रभु परिवार
  • वसुधा माता = नित्य लीला में रेवती माता (बलराम की पत्नी)
  • वसुधा माता के पुत्र: श्री वीरचंद्र प्रभु
  • जाह्नवी माता = नित्य लीला में अनंग मंजरी (राधा रानी की बहन)
  • जाह्नवी माता की कोई संतान नहीं - रामाई ठाकुर को पुत्र रूप में स्वीकार किया
📋 भगवती तनुओं का तिरोभाव
  • श्री चैतन्य महाप्रभु - जगन्नाथपुरी में जगन्नाथ जी में विलीन
  • श्री नित्यानंद प्रभु - खरधाम में श्यामसुंदर विग्रह में विलीन
  • श्री अद्वैत आचार्य प्रभु - बाबला में मदनगोपाल विग्रह में विलीन
  • श्री अभिराम ठाकुर - खानाकुल कृष्णनगर में कृष्ण विग्रह बनकर विलीन
  • माता जाह्नवी ठाकुरानी - कामा में गोपीनाथ विग्रह में विलीन
🔹 शरीर (आगंतुक)
मातृ जठर में आरंभ, श्मशान में परिसमाप्ति। पहले था नहीं, पीछे रहेगा नहीं। मिथ्या माया, स्वप्नवत।
बनाम
🔸 आत्मा (नित्य)
जीव चेतन सत्ता शाश्वत है। शरीर से तादात्म्य के कारण संसार चक्र में आवर्तन करता है। हरिभजन से मुक्ति संभव।
स्पष्टीकरण (Clarification)

यह सारांश AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग गुरु सेवा में करके तैयार किया गया है। इसमें त्रुटि हो सकती है। कृपया पूर्ण लाभ के लिए पूरा वीडियो अवश्य देखें।

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