[Study Guide : Feb 8, 2026] श्रीमत् तीनकोड़ी गोस्वामीजी का जन्म, पालन, विद्वत्ता, गृहस्थ जीवन व अन्य प्रसंग

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श्री भगवत चर्चा
8 February 2026

गुरुदेव की जीवन यात्रा: विद्वत्ता से वैराग्य तक, तीर्थाटन में दिव्य अनुभव एवं कर्म बंधन का सिद्धांत

गुरुदेव की जीवन यात्रा: विद्वत्ता से वैराग्य तक, तीर्थाटन में दिव्य अनुभव एवं कर्म बंधन का सिद्धांत

Sri Sri 108 Sri Vinod Baba ji Maharaj
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हमारे प्रिय सद्गुरुदेव बताते हैं:
" भक्ति भक्त भगवंत गुरु चतुर नाम वपु एक - भक्ति रस स्वरूप, भक्त रस पात्र, भगवान रस विग्रह, गुरु रस प्रदाता। "

" वैराग्य कोई क्रिया नहीं है - वस्तु त्याग करने से वैराग्य नहीं होता, आसक्ति शून्य होने का नाम है वैराग्य। "

" भगवत चरण में जब अनुराग होता है, तभी वैराग्य होता है। भगवत चरण में अनुराग नहीं और वैराग्य है, वह मिथ्यावादी है। "

" घर में रोशनी लाओ, अंधकार रहेगा नहीं। ऐसे भगवत स्मृति, भगवत अनुराग बढ़ता जाएगा, ऑटोमेटिक वैराग्य आ जाएगा। "

" महत्पुरुष की सेवा मुक्ति का द्वार है। अगर मुक्ति पाना चाहते हो तो महत्पुरुष की सेवा करो। "

" मनुष्य जीवन का एकमात्र उद्देश्य है भगवत प्राप्ति, भगवत भजन। "

" जो हरिभजन नहीं करते हैं, जो भगवत प्राप्ति के लिए चेष्टा नहीं करते हैं, वह आत्महत्याकारी है। "

" पंचाश के बाद संसार में रहने का उसका अधिकार नहीं है, उसको आत्म कल्याण के लिए चेष्टा करना चाहिए। "
भक्त कथामृत सुधा (8)वैराग्य (12)गुरु कृपा (7)रस स्वरूप (5)निरागी वक्ता (4)आदिबद्री (3)तुरीय अवस्था (2)मर्कट वैराग्य (2)आसक्ति शून्यता (3)भगवत् समर्पण (4)अनुराग (8)काम-क्रोध-लोभ (4)भगवत चरण (6)साधना स्थली (4)तीन कौड़ी (3)कुल-गुरु (3)विद्वत्ता (4)कर्म बंधन (8)महत्पुरुष सेवा (6)पूर्व संस्कार (5)निर्वेद अवस्था (4)तीर्थ यात्रा (4)सिद्ध मनोहर बाबा (3)भगवत प्राप्ति (3)आत्महत्यारी (2)पंचाशूर्ति (2)वृंदावन (3)राधा वल्लभ (2)धर्म (4)राजनीति (3)
🔍 सत्संग सार (Executive Summary)

इस सत्संग में सद्गुरुदेव भक्त कथामृत सुधा की अलौकिक शक्ति का वर्णन करते हैं जो बिना साधन चेष्टा के भक्ति पुष्प प्रस्फुटित करने में समर्थ है। भक्ति रस स्वरूप है, भक्त रस पात्र है, भगवान रस विग्रह हैं और गुरु रस प्रदाता हैं - यह चतुष्टय एक स्वरूप है। निराग भगवत प्रेमी वक्ता की दुर्लभता के कारण आज कथा से वास्तविक लाभ नहीं होता। गुरुदेव के तिरोभाव तिथि के अवसर पर उनके आदिबद्री में कठोर तपस्या जीवन का वर्णन किया गया - जहाँ न निद्रा थी, न भोजन, न सुख-सुविधा। सद्गुरुदेव अपने गुरु सानिध्य के अनुभव साझा करते हैं कि किस प्रकार गुरुजी न स्वयं सोते थे, न शिष्य को सोने देते थे। अंत में यथार्थ वैराग्य का स्वरूप समझाया गया - वैराग्य वस्तु त्याग नहीं, अपितु आसक्ति शून्यता है, जो भगवत् चिंतन में तल्लीनता से स्वतः प्राप्त होती है।

🧱 ज्ञान प्रवाह
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📌 विषय सूची (Table of Contents)

📖 आज की शिक्षाएं 📖 आज की विस्तृत शिक्षाएं

भक्त कथामृत सुधा की महिमा
भक्त कथा की अलौकिक शक्ति और भक्ति-भक्त-भगवंत-गुरु चतुष्टय के रहस्य का प्रतिपादन
🙏
हरिभक्त कथामृत सुधा की शक्ति
हरिभक्त कथामृत सुधा - बिना साधन भक्ति पुष्प प्रस्फुटन की अलौकिक शक्ति
▶ देखें (0:23) ▶ Watch (0:23)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि हरिभक्त कथामृत सुधा वह दिव्य सुधा सिंधु है जिसमें अवगाहन करने से बिना साधन चेष्टा के साधक की कलुषित चित्तवृत्ति शोधित होकर कृष्ण प्रेम प्राप्ति की योग्यता प्राप्त करने में समर्थ हो जाती है। भक्त कथा में इतनी अलौकिक शक्ति है कि यह कर्ण रंध्र से प्रवेश करके अंतर्जगत में पहुँचकर भीतर भक्ति रूप पुष्प को प्रस्फुटित करने में समर्थ है। इसके लिए सतही साधन चेष्टा की आवश्यकता नहीं है - यह कथा स्वयं ही अंतकरण को परिशोधित करके भक्ति पुष्प प्रस्फुटित करती है। यही सर्वोत्तम, सहज, सरल, सुगम और सरस साधना है - केवल कर्ण रंध्र को एकाग्र करके कथा रस का आस्वादन करते जाओ, बस।
🔗 भक्त कथा की शक्ति का प्रतिपादन सत्संग का मूल आधार है
भक्ति-भक्त-भगवंत-गुरु चतुष्टय की एकता— सद्गुरुदेव द्वारा उद्धृत पद्य
▶ 0:56
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
भक्ति भक्त भगवंत गुरु चतुर नाम वपु एक। इनके चरणन बंदे विघ्न नाश अनेक॥
Bhakti bhakta bhagavanta guru chatura nāma eka | Inake charaṇana bande vighna nāśa aneka ||
भक्ति, भक्त, भगवान और गुरु - ये चारों नाम एक ही तत्त्व के हैं। इनके चरणों की वंदना करने से अनेक विघ्नों का नाश होता है।
📌 कथा श्रवण की विशेषताएँ:
  • श्रवण मंगलम् - श्रवण मात्र से मंगल होता है
  • सर्वोत्तम साधना - सबसे श्रेष्ठ साधना मार्ग
  • सहज सरल सुगम - कोई कठिन प्रयास नहीं
  • सरस - रसमय आनंदपूर्ण साधना
  • बैठे-बैठे सिर्फ श्रवण करना है
🔯
भक्ति रस स्वरूप का तत्त्व
भक्ति-भक्त-भगवंत-गुरु चतुष्टय - एक रस तत्त्व के चार स्वरूप
▶ देखें (1:17) ▶ Watch (1:17)
सद्गुरुदेव भक्ति के गूढ़ रहस्य को उद्घाटित करते हुए बताते हैं कि भक्ति रस स्वरूप है - भगवान के प्रेम रस का ही नाम भक्ति है। भक्त वह रस पात्र है जिसमें यह भक्ति प्रेम रूपी रस रहता है। भगवान स्वयं रस स्वरूप हैं - रस के मूर्तिमंत विग्रह। उनका जो चरम निर्यास आनंद रस है, वही भक्ति रस है। और गुरु रस प्रदाता हैं - वे इस रस को प्रदान करते हैं, गुरु बिना यह रस मिलना संभव नहीं। इस प्रकार भक्ति-भक्त-भगवंत-गुरु ये चारों नाम एक ही तत्त्व के रूप हैं।
🔗 भक्ति तत्त्व का यह विवेचन कथा श्रवण की महिमा को और गहरा करता है
⚖️ भक्ति चतुष्टय का रस तत्त्व
तत्त्व: भक्ति / भक्त / भगवान / गुरु
रस स्वरूप: रस स्वरूप / रस पात्र / रस विग्रह / रस प्रदाता
📌 भक्ति चतुष्टय का रहस्य:
  • भक्ति = रस स्वरूप (प्रेम रस)
  • भक्त = रस पात्र (जिसमें रस रहता है)
  • भगवान = रस विग्रह (रस के मूर्तिमंत स्वरूप)
  • गुरु = रस प्रदाता (रस प्रदान करने वाले)
  • ये चारों एक ही तत्त्व के नाम हैं
👂
निरागी वक्ता की दुर्लभता
वक्ता-श्रोता की योग्यता और प्रेमी भक्त की दुर्लभता
▶ देखें (4:26) ▶ Watch (4:26)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि कथा की पूर्ण शक्ति तभी प्रकट होती है जब वह निरागी वक्ता, भगवत् प्रेमी भक्त, निष्प्रिय, निर्लिप्त, भगवत् चरण में समर्पित आत्मा के मुख से निःसृत हो। ऐसे प्रेमी भक्त मुख से निःसृत कथामृत का परिवेशन हो तो उसकी महिमा का वर्णन कौन कर सकता है। उदाहरण स्वरूप, परीक्षित महाराज ने सात दिन में हरि कथा श्रवण करके अमृतत्व प्राप्त किया। वही भागवत कथा आज भी सप्ताह होती है, परन्तु वह अमृतत्व क्यों प्राप्त नहीं होता? क्योंकि वक्ता भी नहीं, श्रोता भी नहीं - वह सरस्वता नहीं, वह अमृत रस धारा का प्रवाह ही नहीं। सरागी वक्ता की कथा से लाभ नहीं होता।
🔗 वक्ता की योग्यता कथा की शक्ति का मूल आधार है
❓ प्रश्न: आज की भागवत सप्ताह में वही अमृतत्व क्यों प्राप्त नहीं होता जो परीक्षित को मिला? ▶ 5:18
💡 उत्तर: सद्गुरुदेव समझाते हैं कि परीक्षित महाराज को श्री शुकदेव जी जैसे निरागी, भगवत् प्रेमी, समर्पित सद्गुरुदेव से कथा मिली। आज के वक्ता सरागी हैं - काम, लालच से युक्त, स्वयं आचरण नहीं करते। ऐसे वक्ता की कथा शब्द तो है, परन्तु उसमें वह शक्ति नहीं जो अंतकरण को परिवर्तित कर सके। कथा कथा है, शब्द है, पर वह शब्द मंगलप्रद नहीं।
⚖️ निरागी वक्ता vs सरागी वक्ता
निरागी वक्ता: भगवत् प्रेमी, निष्प्रिय, निर्लिप्त, समर्पित - कथा अमृतत्व प्रदान करती है
सरागी वक्ता: काम ललुक, आचरण रहित - कथा से कोई लाभ नहीं
📌 निरागी वक्ता के लक्षण:
  • भगवत् प्रेमी भक्त
  • निष्प्रिय - स्वार्थ रहित
  • निर्लिप्त - संसार से अनासक्त
  • भगवत् चरण में समर्पित आत्मा
  • स्वयं आचरण करने वाले
गुरुदेव के साधन जीवन का दिव्य दर्शन
गुरुदेव के आदिबद्री में कठोर तपस्या और गुरु-शिष्य सानिध्य के अनुभवों का वर्णन
🏔️
गुरुदेव के तिरोभाव तिथि पर जीवन चरित्र
गुरुदेव के जीवन चरित्र - आदिबद्री में कठोर तपस्या का संकल्प
▶ देखें (7:00) ▶ Watch (7:00)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि गुरुदेव के तिरोभाव तिथि 11 फरवरी बुधवार के अवसर पर उनके जीवन चरित्र का किंचित दिग्दर्शन करेंगे। उनके जीवन चरित्र संबंध में विशेष कुछ मिलता नहीं, उन्होंने किसी को कह कर भी नहीं छोड़ा। बहुत कोशिश करके इधर-उधर से कथा का उपादान संग्रह किया - कुछ गुरुजी के मुख से सुनकर, कुछ उनके सानिध्य में रहकर देखकर। आदिबद्री नामक स्थान में गुरुदेव ने सब परित्याग करके कठोर तपस्या में प्रवृत्त हुए। भगवत् प्राप्ति ही जीवन का एकमात्र पुरुषार्थ लेकर - या तो मृत्यु स्वीकार, या भगवत् चरण में पूर्ण समर्पण।
🔗 गुरुदेव का जीवन भक्त कथा का जीवंत उदाहरण है
📌 गुरुदेव के साधन संकल्प:
  • भगवत् प्राप्ति ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य
  • या मृत्यु स्वीकार, या भगवत् प्राप्ति
  • संपूर्ण निस्पृह, निर्लिप्त, उदासीन होकर साधना
  • जीवन का भरोसा छोड़कर भगवत् चरण में समर्पण
  • अंतिम समय तक भगवत् प्राप्ति की प्रतीक्षा
🙏
गुरु कृपा से माया तरण
भगवत् प्राप्ति में गुरु समर्पण और कृपा की अनिवार्यता
▶ देखें (9:37) ▶ Watch (9:37)
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि भगवत् प्राप्ति भगवत् कृपा बिना होती नहीं - उनकी कृपा ही सार है। साधक लाख प्रयत्न करे कि हम भगवत् प्राप्ति करेंगे, यह कदापि संभव नहीं। यह माया इतनी प्रबल है। गीता में भगवान कहते हैं कि यह गुणमयी माया अतिक्रमण करके मेरा सानिध्य प्राप्त करना सहज नहीं, परन्तु जो मेरे शरण में आता है, मेरी कृपा से माया पर लांघ सकता है। इसीलिए गुरु पद का आश्रय करके, एकांतिक गुरु निष्ठा लेकर, गुरु प्रसन्नता संपादन करते हुए भगवत् चरण में एकांति भाव से समर्पित होना आवश्यक है।
🔗 गुरु कृपा का सिद्धांत गुरुदेव के साधन जीवन का मूल आधार था
माया तरण में भगवत् शरण की अनिवार्यता— श्रीमद्भगवद्गीता Bhagavad Gita 7.14
▶ 9:58
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥
daivī hyeṣā guṇamayī mama māyā duratyayā | mām eva ye prapadyante māyām etāṃ taranti te ||
यह मेरी दैवी त्रिगुणमयी माया अत्यंत दुस्तर है। परन्तु जो मेरे शरण में आते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं।
✅ करें:
  • गुरु पद का आश्रय करके एकांतिक निष्ठा रखें
  • गुरु प्रसन्नता संपादन में तत्पर रहें
❌ न करें:
  • स्वतंत्र साधन चेष्टा पर भरोसा न करें
🌙
गुरुजी के साथ रात्रि जागरण
गुरु सानिध्य में रात्रि जागरण - गुरुदेव कभी निद्रित नहीं होते थे
▶ देखें (11:21) ▶ Watch (11:21)
सद्गुरुदेव अपने गुरु सानिध्य के अनुभव साझा करते हैं। गुरुजी के साथ जंगल में भी रहते थे। जितना अल्प समय गुरु सानिध्य प्राप्त होने का मौका मिला, उसमें गुरुजी को कभी निद्रित होते नहीं देखा - न दिन में, न रात में। जब तक व्यक्ति सोता नहीं, तब तक लंबा श्वास चलता नहीं - यह स्वाभाविक है। गुरुजी के कान के पास जाकर बहुत छोटी आवाज करके परीक्षण करते थे, परन्तु कभी नहीं देख सके कि वे सोए हों। यह अद्भुत था - दिन में भी नहीं, रात में भी नहीं।
🔗 गुरुजी का निद्रा रहित जीवन उनकी सिद्ध अवस्था का प्रमाण है
📌 गुरुजी की रात्रि चर्या:
  • कभी निद्रित होते नहीं देखा
  • दिन में भी नहीं, रात में भी नहीं
  • परीक्षण करने पर भी सोते नहीं मिले
  • स्वयं नहीं सोते, शिष्य को भी नहीं सोने देते
गुरुजी द्वारा शिष्य की परीक्षा
गुरुजी की लीला - शिष्य को सोने न देने की परीक्षा
▶ देखें (13:06) ▶ Watch (13:06)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि गुरुजी स्वयं तो सोते नहीं थे, शिष्य को भी सोने नहीं देते थे। रात्रि में जब शिष्य को थोड़ी निद्रा आ जाती - लंबा श्वास निकलने लगता - तो गुरुदेव तुरंत 'विनोद' पुकारते। 'बाबा पानी पीएंगे' - पानी पीना कुछ नहीं, सोने नहीं देना है। रात 1 बजे, 2 बजे, 3 बजे - ऐसे करके पूरी रात जागरण। कभी-कभी 'भूख लगी है', फिर इधर-उधर की बातें शुरू, घंटा भर बाद इतना सा लड्डू का टुकड़ा खाकर पानी पीकर - यह कोई भूख है? यह सोने नहीं देने की लीला थी।
🔗 गुरु की कठोर शिक्षा पद्धति शिष्य के आध्यात्मिक उत्थान के लिए थी
📌 गुरुजी की परीक्षा पद्धति:
  • रात्रि में बार-बार पुकारना
  • पानी पीने का बहाना
  • भूख का बहाना - लड्डू मंगवाना
  • इधर-उधर की बातें करके जगाए रखना
  • 15 मिनट की निद्रा भी सहन नहीं
📿
मंत्र स्मरण में निद्रा का प्रकोप
मंत्र स्मरण काल में निद्रा से संघर्ष - दीवार का आश्रय
▶ देखें (18:03) ▶ Watch (18:03)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि उनका एक नियम था - कभी खाली हाथ नहीं रहते, कहीं बैठो तो माला लेकर बैठो, कहीं चलो तो माला लेकर चलो। मंत्र स्मरण के समय दीवार के सामने बैठते थे। पूर्व कुसंस्कार के कारण निद्रा का प्रकोप - एक राउंड माला करते-करते 'धप' और माथा दीवार में लग जाता। 'अरे बाबा, सीधा होके बैठो!' इस तरह से दीवार को सामने रखकर बैठने से 2 मिनट में माथा लगता, फिर उठते - यही निद्रा का थोड़ा सा समय था। 15 मिनट का काम एक घंटा-आधा घंटा लग जाता था। ऐसा कठोर शासन था।
🔗 माया के प्रकोप से संघर्ष साधन जीवन का अंग है
❄️
अति शीत में कठोर साधना
पौष-माघ की कड़कड़ाती ठंड में साधना - बिना बिस्तर, बिना कंबल
▶ देखें (19:47) ▶ Watch (19:47)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि पौष-माघ महीने की कड़कड़ाती ठंड में रहने की व्यवस्था - ऊपर छत है, लेकिन चारों ओर खुला। कोई बिस्तर नहीं, टाट बिछाकर, माथे में तकिया नहीं - एक ईंट और उस पर पतला रुई का चादर और सूती का एक चादर - यही ठंड बिताने का एकमात्र अवलंबन था। सारी रात ऐसे ही पड़े रहते थे। परन्तु भगवत् कृपा से ठंड लगती नहीं थी। रात 2 बजे कुंड में नहाना - चाहे कितनी भी बर्फ हो। वृंदावन में यमुना में, राधाकुंड में, प्रेम सरोवर में, चंद्र सरोवर में गोता लगाना - यही ठंड में साधना थी।
🔗 शारीरिक कष्ट सहन करना साधना का अंग है
📌 कठोर साधना की परिस्थितियाँ:
  • पौष-माघ में खुले में रहना
  • बिस्तर के स्थान पर टाट
  • तकिया के स्थान पर ईंट
  • केवल पतला रुई और सूती चादर
  • रात 2 बजे ठंडे कुंड में स्नान
  • खाने को मिलता नहीं था
  • भूखे-प्यासे आश्रम में रहना
यथार्थ वैराग्य का स्वरूप
वैराग्य की सही परिभाषा और मर्कट वैराग्य के दृष्टांत द्वारा स्पष्टीकरण
🐒
मर्कट वैराग्य का दृष्टांत
मर्कट वैराग्य - बंदर का उदाहरण जो बाह्य त्याग के खोखलेपन को दर्शाता है
▶ देखें (23:55) ▶ Watch (23:55)
सद्गुरुदेव एक अद्भुत दृष्टांत देते हैं - बंदर सबसे बड़ा वैरागी प्रतीत होता है। वह संग्रह-परिग्रह शून्य है, नग्न रहता है, और एकमात्र प्राणी है जो कभी घर नहीं बनाता। सारे जीव अपना रहने का ठौर बनाते हैं - चींटी भी मिट्टी में या दीवार में घर बनाती है - परन्तु बंदर आज यहाँ, कल वहाँ, कोई स्थायी ठिकाना नहीं। उसे अमृत दो, वहीं बैठे खाएगा, जब इच्छा तृप्त हो जाए तो फेंककर चला जाएगा - 'यह बढ़िया वस्तु है, संग्रह करके रख दूं' ऐसा कभी नहीं करता। परन्तु क्या वह सच्चा वैरागी है? नहीं, क्योंकि उसमें आसक्ति तो पूर्ण है - भीतर से त्याग नहीं हुआ।
🔗 मर्कट वैराग्य का दृष्टांत बाह्य त्याग की निरर्थकता दर्शाता है
📌 बंदर के बाह्य वैराग्य लक्षण:
  • संग्रह-परिग्रह शून्य
  • नग्न रहता है
  • घर नहीं बनाता - एकमात्र ऐसा प्राणी
  • आज यहाँ, कल वहाँ - स्थायित्व नहीं
  • इच्छा तृप्ति पश्चात वस्तु फेंक देता है
  • संग्रह की वृत्ति नहीं
वैराग्य तत्व का गहन विवेचन
वैराग्य की यथार्थ परिभाषा एवं मर्कट वैराग्य के दृष्टांत द्वारा मिथ्या वैराग्य का खंडन
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त्रिविध नरक द्वार
काम, क्रोध, लोभ: साधक के लिए तीन नरक द्वार
▶ देखें (25:50) ▶ Watch (25:50)
सद्गुरुदेव भगवद्गीता के श्लोक का उल्लेख करते हुए बताते हैं कि साधक के लिए वैराग्य में अनाशक्ति में भगवद्भजन में काम, क्रोध और लोभ - ये तीन नरक के द्वार हैं। 'काम' के अंतर्गत समस्त भोग्य पदार्थ, भोग्य विषय, भोग्य स्पृहा - सब आ जाते हैं। 'लोभ' का अर्थ है कृष्ण से भिन्न वस्तु में आसक्ति अर्थात् दृश्यमान भोग्य पदार्थों के प्रति चित्त का झुकाव और उनकी प्राप्ति की लालसा। इन तीनों को जिसने त्याग किया वही वास्तविक त्यागी है।
🔗 बंदर में इन तीनों की उपस्थिति से मर्कट वैराग्य मिथ्या सिद्ध होता है।
त्रिविध नरक द्वार— श्रीमद्भगवद्गीता भगवद्गीता 16.21
▶ 25:50
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥
tri-vidhaṁ narakasyedaṁ dvāraṁ nāśanam ātmanaḥ | kāmaḥ krodhas tathā lobhas tasmād etat trayaṁ tyajet ||
काम, क्रोध और लोभ - ये तीन प्रकार के नरक के द्वार हैं जो आत्मा का नाश करते हैं। इसलिए इन तीनों का त्याग करना चाहिए।
📌 त्रिविध नरक द्वार का विस्तार:
  • काम: समस्त भोग्य पदार्थ, विषय, स्पृहा
  • क्रोध: अप्राप्ति पर उत्पन्न आवेश
  • लोभ: कृष्ण से भिन्न वस्तु में आसक्ति, प्राप्ति की लालसा
💡
भगवत अनुराग से वैराग्य
यथार्थ वैराग्य: भगवत-चरण में अनुराग से उत्पन्न
▶ देखें (27:44) ▶ Watch (27:44)
सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि घर छोड़ने से, वस्तु न रहने से, समस्त वस्तु-सानिध्य से दूर रहने से वैरागी नहीं होता। वैरागी वह है जिसके मन में राधा रानी के चरणों को छोड़कर दृश्यमान् किसी भी वस्तु-पदार्थ के प्रति इच्छा नहीं रहती। यह वैराग्य तभी होता है जब भगवत-चरण में अनुराग होता है। जो कहता है 'हम बड़े वैरागी हैं' परन्तु भगवत-चरण में अनुराग नहीं, भगवत-चिंतन में तल्लीनता-तन्मयता नहीं, भगवत-प्राप्ति की तीव्र लालसा नहीं, समय बीतने पर तड़पन नहीं, पश्चाताप नहीं - वह मिथ्यावादी है। सद्गुरुदेव बताते हैं कि यद् यत् परिमाण भगवत-चरण में अनुराग बढ़ेगा, तत-तत परिमाण विषय-वस्तु-पदार्थ से मन स्वतः हटता जाएगा।
🔗 वैराग्य का मूल कारण भगवत-अनुराग सिद्ध करता है।
❓ प्रश्न: भगवत अनुराग के बिना वैराग्य का दावा करने वाला कैसा है? ▶ 28:35
💡 उत्तर: सद्गुरुदेव कहते हैं कि ऐसा व्यक्ति मिथ्यावादी है, बड़ा झूठा है। जिसके भीतर भगवत-प्राप्ति की तीव्र लालसा नहीं, अनमोल मानव जीवन बीतने पर तड़पन नहीं, संकोच नहीं, चिंता नहीं, पश्चाताप नहीं - वह कैसे कह सकता है कि वह बड़ा वैरागी है? यह बेकार मिथ्यावाद है।
✅ करें:
  • भगवत-चरण में अनुराग बढ़ाएँ, वैराग्य स्वतः आएगा
❌ न करें:
  • भगवत-अनुराग के बिना वैरागी होने का दावा न करें
⚖️ वैराग्य का आधार
मिथ्या वैराग्य: बाह्य वस्तु-त्याग, भगवत-अनुराग शून्य, काम-क्रोध-लोभ युक्त
यथार्थ वैराग्य: भगवत-चरण में अनुराग, स्वतः विषय-विरक्ति, आंतरिक शुद्धि
📌 भगवत-अनुराग के अभाव के लक्षण:
  • भगवत-चिंतन में तल्लीनता-तन्मयता नहीं
  • भगवत-प्राप्ति की तीव्र लालसा नहीं
  • समय बीतने पर तड़पन नहीं
  • अनमोल मानव जीवन के व्यतीत होने पर संकोच-चिंता नहीं
  • पश्चाताप नहीं
🔦
प्रकाश-अंधकार दृष्टांत
दृष्टांत: प्रकाश से अंधकार का स्वतः निवारण
▶ देखें (29:17) ▶ Watch (29:17)
सद्गुरुदेव अत्यंत सुंदर दृष्टांत देते हैं - दृश्यमान जागतिक वस्तु-पदार्थ अंधकार-माया हैं और भगवत-चरण में अनुराग माया-अतीत चिन्मय वस्तु है। वह चिन्मय है, यह मृण्मय है; वह मुक्ति है, यह बंधन है; वह आनंद है, यह दुख है; वह रोशनी है, यह अंधकार है - संपूर्ण विपरीत धर्मी हैं। जैसे घर में रोशनी लाओ तो अंधकार स्वतः चला जाएगा - रोशनी नहीं है और चिल्लाते रहो 'हमारा घर अंधकार है' तो चिल्लाने से अंधकार जाएगा नहीं। रोशनी लाओ, अंधकार रहेगा नहीं। वैसे ही भगवत-स्मृति, भगवत-अनुराग बढ़ता जाएगा तो स्वतः वैराग्य आ जाएगा, भोग्य पदार्थ अच्छे लगेंगे ही नहीं।
🔗 दृष्टांत द्वारा भगवत-अनुराग से स्वाभाविक वैराग्य की प्रक्रिया स्पष्ट करता है।
❓ प्रश्न: यदि भगवत-अनुराग नहीं है तो विषयों में आसक्ति क्यों रहती है? ▶ 30:09
💡 उत्तर: सद्गुरुदेव बताते हैं कि यह दोष नहीं है, यह स्वाभाविक है। जीवात्मा का जब तक देहात्म बुद्धि है, तब तक देह और देह-संबंधी वस्तु-पदार्थ में आसक्ति-स्पृहा रहेगी। यह अनादि काल का स्वभाव है। जैसे रोशनी नहीं है तो अंधकार रहेगा ही, वैसे ही भगवत-अनुराग के बिना विषय-आसक्ति रहेगी।
✅ करें:
  • मन को भगवत-रंग में रंगें, विषय से मन स्वतः हट जाएगा
⚖️ चिन्मय vs मृण्मय
भगवत-अनुराग (चिन्मय): माया-अतीत, मुक्ति, आनंद, रोशनी
जागतिक वस्तु (मृण्मय): अंधकार-माया, बंधन, दुख, अंधकार
गुरुदेव की साधना-स्थली: भयंकर वनों में भजन
गुरुदेव की अलौकिक साधना-पद्धति एवं भयावह स्थानों में भजन करने की विशेषता
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आदिबद्री में व्याघ्र प्रसंग
आदिबद्री में शेर से साक्षात्कार
▶ देखें (30:52) ▶ Watch (30:52)
सद्गुरुदेव गुरुजी की साधन-जीवन कथा आगे बढ़ाते हैं। आदिबद्री में जंगल में सब कुछ छोड़कर भगवत-प्राप्ति के उद्देश्य से रह रहे हैं। मध्यरात्रि के बाद स्नान-ध्यान करके भजन में बैठना है। उस समय वह मंदिर टूटा-फूटा था, छोटा सा था। 50 वर्ष पूर्व आदिबद्री जंगल ही जंगल था, संध्या के बाद वहाँ शेर घूमते थे, कोई निकलता नहीं था। गुरुदेव कमंडलु लेकर शौचादिक क्रिया के लिए निकले। अंधकार में सामने दो जलते तारे जैसे दिखे - बहुत समय तक वह जानवर सामने खड़ा रहा। फिर न जाने उसके मन में क्या आया, लंघन (कूद) करके चला गया। तब देखा - एक चीता (शरीर पर दाग वाला शेर) था।
🔗 गुरुदेव की निर्भय साधना का प्रत्यक्ष उदाहरण।
❓ प्रश्न: गुरुजी ने इस प्रसंग को कैसे सुनाया? ▶ 32:15
💡 उत्तर: सद्गुरुदेव बताते हैं कि बाबा हँसते-हँसते यह बात कहते थे - 'जो शेर ना, हमको हमारे भय से वह भाग गया!' ऐसे हँसी में बताते थे कि देखो, शेर हमको देखकर भय पाकर भाग गया। यह गुरुदेव की निर्भयता और भगवत-आश्रय का प्रमाण था।
📌 आदिबद्री का वातावरण (50 वर्ष पूर्व):
  • जंगल ही जंगल था
  • टूटा-फूटा छोटा मंदिर
  • दो-चार लोग ही दर्शन करने जाते थे
  • संध्या के बाद शेर घूमते थे
  • कोई निकलता नहीं था
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गुरुदेव की साधना-स्थली चयन विशेषता
भूत-प्रेत-सर्प युक्त स्थानों में भजन की परम्परा
▶ देखें (32:36) ▶ Watch (32:36)
सद्गुरुदेव गुरुजी की अद्भुत साधना-पद्धति बताते हैं - वे कभी अच्छे, सुंदर, साफ-शुद्ध स्थान में भजन नहीं करते थे। जब भजन करेंगे तो ऐसा स्थान चुनते थे जहाँ भूत, प्रेत, जंतु, जानवर, सर्प आदि रहते हों। ऐसे भयावह स्थान का चयन करते थे। बड़े विचित्र थे - आश्रम में कभी भजन नहीं करते थे। इसीलिए उनके साथ कोई रहता नहीं था - रहने के लिए छाती चाहिए थी। एक स्थान पर भी अधिक समय नहीं रहते थे - एक-दो महीने बाद जब भीड़ होने लगती, अचानक प्रातः उठकर चल देते, किसी को बताते भी नहीं थे।
🔗 गुरुदेव के यथार्थ वैराग्य का प्रत्यक्ष प्रमाण।
📌 गुरुदेव की साधना-स्थली की विशेषताएँ:
  • भूत-प्रेत, जंतु-जानवर, सर्प युक्त स्थान
  • जहाँ मनुष्य रहना मुश्किल हो
  • कभी आश्रम में भजन नहीं
  • एक स्थान पर अधिक समय नहीं
  • भीड़ होने पर अचानक प्रस्थान
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तपोवन में सर्प-स्थली प्रसंग
तपोवन में सर्प-फैक्ट्री स्थान पर भजन
▶ देखें (33:08) ▶ Watch (33:08)
सद्गुरुदेव 1989 (46 वर्ष पूर्व) की घटना सुनाते हैं। बहुत जंगल था, बड़े-बड़े खतरनाक सर्प थे। तपोवन में जंगल ही जंगल था। गुरुजी ने कहा - 'विनोद, हमको उस जंगल की झाड़ी के भीतर एक आसन बना दो, हम भजन करेंगे।' हमको उस जंगल की झाड़ी के भीतर एक आसन बना दो, हम भजन करेंगे।' सद्गुरुदेव बताते हैं कि वह स्थान जो उन्होंने चुना था - सर्प का फैक्ट्री था! बड़े-बड़े नाग, फन वाले साँप वहाँ थे। सद्गुरुदेव बहुत असमंजस में पड़ गए - 'यह जगह कैसे आसन बनाएंगे?' बहुत चिंता-विचार के बाद वह स्थान छोड़कर एक पीलू के पेड़ के नीचे (जो भी जंगल ही था) आसन लगाया, परन्तु बाबा को वह स्थान उतना पसंद नहीं आया।
🔗 गुरुदेव की निर्भय साधना का एक और उदाहरण।
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गिरिराज तरहेटी का गहन वन
गिरिराज सराटी में 50 वर्ष पूर्व की साधना
▶ देखें (35:35) ▶ Watch (35:35)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि 50 वर्ष पूर्व गिरिराज सराटी में इतना गहरा जंगल था कि संध्या के बाद गोवर्धन से राधाकुंड जाना छाती में दम चाहिए था। रास्ता नहीं था, केवल थोड़ी पगडंडी थी। गिरिराज सराटी तक तो अभेद्य जंगल था, वहाँ कहीं जाना संभव नहीं था। और उसी जंगल में बाबा भजन करते थे। सद्गुरुदेव कहते हैं कि इस साधन जीवन का विस्तृत वर्णन आगे करेंगे।
🔗 गुरुदेव की साधना-स्थली की भयावहता का वर्णन।
📌 गिरिराज सराटी का वातावरण (50 वर्ष पूर्व):
  • अत्यंत गहरा जंगल
  • गोवर्धन से राधाकुंड तक दोनों तरफ जंगल
  • संध्या के बाद जाने के लिए साहस चाहिए था
  • केवल पगडंडी, रास्ता नहीं
  • अभेद्य वन, कहीं जाना संभव नहीं
गुरुदेव जन्म वृत्तांत एवं बाल्यकाल
गुरुदेव के जन्म, परिवार, नामकरण एवं बाल्यकाल की अद्भुत लीलाओं का वर्णन
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मनोहरपुर: जन्म स्थान
मनोहरपुर: गुरुदेव का दिव्य जन्म स्थान
▶ देखें (36:29) ▶ Watch (36:29)
सद्गुरुदेव गुरुजी के जीवन चरित्र का वर्णन आरम्भ करते हैं। मनोहरपुर नामक ग्राम, पश्चिम बंगाल के मेदनीपुर जिले में स्थित है। बड़ा सुंदर गाँव - शायद इसीलिये किसी ने नाम दे दिया:-मनोहरपुर। बड़े सुंदर पेड़, लता, गुलमोहर, बड़े-बड़े नारियल वृक्ष आदि - बड़े दिव्य दर्शन उस गाँव का। वहाँ गुरुदेव ने जन्म लिया। पिता का नाम श्री हरिमोहन गोस्वामी और माता का नाम श्रीमती सुरुधनी देवी था। माघी पूर्णिमा के शुभ दिन गुरुदेव ने जन्म लिया।
🔗 गुरुदेव के दिव्य जन्म स्थान का परिचय।
📌 गुरुदेव जन्म विवरण:
  • जन्म स्थान: मनोहरपुर, मेदनीपुर जिला, पश्चिम बंगाल
  • पिता: श्री हरिमोहन गोस्वामी
  • माता: श्रीमती सुरुधनी देवी
  • जन्म तिथि: माघी पूर्णिमा
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सप्त संतान की मृत्यु एवं अष्टम जन्म
सात संतानों की मृत्यु के पश्चात् अष्टम पुत्र का जन्म
▶ देखें (37:31) ▶ Watch (37:31)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि गुरुदेव के जन्म से पूर्व आठ संतानों ने जन्म लिया और सब मर गए - छह पुत्र और एक कन्या। सब जन्म लेते और एक-दो दिन बाद मर जाते। वंश निर्वंश होने की स्थिति थी - एक भी संतान नहीं बची। गुरुदेव अष्टम गर्भजात संतान थे। माघी पूर्णिमा का मंगलमय दिन था, गौड़ीय वैष्णव समाज में बड़ा शुभ दिन, चारों ओर हरिनाम संकीर्तन हो रहा था। ऐसे समय जन्म हुआ, परन्तु माता सुरुधनी देवी रोने लगीं - 'यह पुत्र भी इतना सुंदर है, यह भी तो मरेगा! सातवीं संतान मर गई, इस आठवीं के बचने की क्या गारंटी?'
🔗 गुरुदेव के जन्म की विशेष परिस्थिति।
📌 जन्म से पूर्व की स्थिति:
  • छह पुत्र और एक कन्या - सात संतान मृत
  • सब जन्म लेकर एक-दो दिन में मर जाते
  • वंश निर्वंश होने की स्थिति
  • गुरुदेव अष्टम गर्भजात संतान
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तीन कौड़ी नामकरण
तीन कौड़ी में क्रय: जन्मजात नाम की कथा
▶ देखें (39:04) ▶ Watch (39:04)
सद्गुरुदेव नामकरण की रोचक कथा सुनाते हैं। परम गुरुदेव श्री हरिमोहन गोस्वामी की दूर संपर्क एक विधवा बहन थीं। जब सातवीं संतान भी मर गई, तो उन्होंने आकर कहा - 'यह बच्चा हमको दे दो। तुम्हारा तो बचता नहीं, जब मरता ही है तो यह संतान हमको दे दो।' तीन कौड़ी देकर उन्होंने बच्चे को खरीद लिया - पहले कौड़ी से क्रय-विक्रय होता था। इसीलिए गुरुजी का जन्मजात नाम 'तीन कौड़ी' हो गया - तीन कौड़ी गोस्वामी। और वह बच्चा मरा नहीं! ऐसा करके बच्चा बड़ा होने लगा - बड़ा चंचल, बड़ा सुंदर, अद्भुत सद्गुण संपन्न, अलौकिक शक्ति संपन्न, महापुरुष के लक्षण युक्त।
🔗 गुरुदेव के अलौकिक जीवन का आरम्भ।
📌 तीन कौड़ी नामकरण:
  • विधवा बुआ ने तीन कौड़ी में खरीद लिया
  • पहले कौड़ी से क्रय-विक्रय होता था
  • जन्मजात नाम: तीन कौड़ी गोस्वामी
  • यह बच्चा मरा नहीं, बड़ा होने लगा
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बाल्यकाल में पढ़ाई से विरक्ति
पढ़ाई से भागना: बाल्यकाल की विचित्र लीला
▶ देखें (39:45) ▶ Watch (39:45)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि पाँचवें वर्ष में माता सुरुधनी देवी का देहांत हो गया। अब बच्चे का पालन कौन करे? पिता श्री हरिमोहन गोस्वामी कुल-गुरु परम्परा में थे, शिष्य-मान में जाते थे। विधवा बहन ने पालन का दायित्व लिया - धाईमाँ (बंगला में)। परन्तु बचपन से ही पढ़ने के नाम से बीमारी थी - पढ़ना नहीं, स्कूल जाना नहीं। धाईमाँ स्कूल पहुँचा देतीं, तो पहुँचने से पहले ही भाग जाते, इधर-उधर घूमकर वापस आ जाते। एक दिन स्कूल जाने से पहले ही भाग गए। ढूँढते-ढूँढते देखा - पेड़ के ऊपर चढ़कर बैठे हैं! 'उतरो-उतरो' कहने पर बोले - 'हमको स्कूल नहीं भेजोगे तो उतरेंगे, नहीं तो नहीं उतरेंगे!' रोना-पीटना, स्कूल जाना और पढ़ना - दोनों से अत्यंत विरक्ति थी।
🔗 बाल्यकाल से ही सांसारिक शिक्षा से विरक्ति का लक्षण।
📌 बाल्यकाल की घटनाएँ:
  • पाँचवें वर्ष में माता का देहांत
  • विधवा बुआ (धाईमाँ) ने पालन किया
  • पढ़ाई से अत्यंत विरक्ति
  • स्कूल जाने से पहले भाग जाते
  • पेड़ पर चढ़कर बैठ गए स्कूल न जाने के लिए
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तखत के नीचे छिपना
स्कूल के भय से तखत के नीचे छिपना
▶ देखें (42:44) ▶ Watch (42:44)
सद्गुरुदेव एक और बाल-लीला सुनाते हैं। एक दिन स्कूल भेजने का समय हुआ, बच्चा मिल ही नहीं रहा! इधर-उधर, इस घर, उस घर - कहीं नहीं मिला। सोचा - कहीं नाराज होकर घर से निकल तो नहीं गया? छोटा बच्चा है, शासन करते हैं, पढ़ाई के नाम पर - कहीं भाग तो नहीं गया? सब ढूँढते रहे, दोपहर हो गई। 'तीन कौड़ी तुम्हारे घर आए हैं?' - 'नहीं, हमारे यहाँ नहीं।' बहुत दुखी हो गईं धाईमाँ। फिर किसी काम से घर में तखत (लकड़ी की अलमारी जैसी वस्तु) के नीचे कुछ लेने गईं - देखा, तखत के नीचे चुपचाप बैठा है! स्कूल जाने के डर से तखत के नीचे छिप गया था।
🔗 पढ़ाई से विरक्ति की बाल-लीला का एक और उदाहरण।
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प्रादेशिकता शब्द सुधार प्रसंग
सांप्रदायिकता नहीं, प्रादेशिकता: गुरुदेव का शाब्दिक सुधार
▶ देखें (43:59) ▶ Watch (43:59)
सद्गुरुदेव एक अंतरंग प्रसंग सुनाते हैं जो गुरुदेव की विद्वत्ता का प्रमाण है। एक दिन सद्गुरुदेव बाबा से बात कर रहे थे कि समाज में पंजाबी-बंगाली-उड़िया का भेदभाव है, सभी तो भारतीय हैं, यह 'सांप्रदायिकता' बहुत विघातक है। बाबा ने तुरंत टोका - 'उसको सांप्रदायिकता थोड़ी कहा जाता है, उसको कहते हैं प्रादेशिकता!' प्रदेश-प्रदेश से प्रादेशिकता। सद्गुरुदेव कहते हैं - यह फर्स्ट क्लास का जवाब! यह शाब्दिक भूल एम.ए., पी.एच.डी. वाले भी नहीं पकड़ पाएंगे। यह वास्तविक विद्वत्ता है, कोई साधारण नहीं।
🔗 औपचारिक शिक्षा के बिना भी गहन शाब्दिक विवेक।
❓ प्रश्न: सांप्रदायिकता और प्रादेशिकता में क्या अंतर है? ▶ 45:10
💡 उत्तर: सद्गुरुदेव बताते हैं कि गुरुदेव ने स्पष्ट किया - पंजाबी-बंगाली-उड़िया का भेदभाव 'सांप्रदायिकता' शब्द से नहीं कहा जाता। यह 'प्रादेशिकता' है क्योंकि यह प्रदेश-प्रदेश का भेद है। सांप्रदायिकता सम्प्रदाय से संबंधित है। यह सूक्ष्म शाब्दिक विवेक गुरुदेव की अद्भुत विद्वत्ता का प्रमाण था।
⚖️ शाब्दिक विवेक
सांप्रदायिकता: सम्प्रदाय से संबंधित भेदभाव
प्रादेशिकता: प्रदेश-प्रदेश का भेदभाव (पंजाबी-बंगाली आदि)
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कुल-गुरु परम्परा एवं शिष्य-मान
पिता के अप्रकट होने के बाद कुल-गुरु दायित्व
▶ देखें (47:06) ▶ Watch (47:06)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि पिता श्री हरिमोहन गोस्वामी के अप्रकट होने के बाद गुरुदेव पर संसार चलाने का दायित्व आ गया। वे स्कूल गए नहीं, पढ़ते नहीं थे - तो क्या करेंगे? कुल-गुरु परम्परा थी - जो शिष्य है, उनके पुत्र को दीक्षा देंगे, फिर उनके पुत्र को - ऐसे कुल-गुरु प्रथा। दूसरे से दीक्षा नहीं लेनी, कुल-गुरु से ही लेनी। शिष्य-मान में जाकर भेंट-प्रणामी जो मिलती, थोड़ी जमीन से जो आता, इसी में गुजारा होता था। पिता ने सोचा - गुरुगिरी करके, कान में मंत्र देकर, कुछ तो गुजारा हो जाएगा - इसीलिए उन्हें शिष्य-मान में ले जाना शुरू किया, परिचय कराने के लिए।
🔗 गुरुदेव के परिवार की परम्परा का परिचय।
📌 कुल-गुरु परम्परा:
  • शिष्य परिवार की पीढ़ी-दर-पीढ़ी दीक्षा
  • दूसरे से दीक्षा नहीं, केवल कुल-गुरु से
  • शिष्य-मान यात्रा से भेंट-प्रणामी
  • थोड़ी जमीन की आमदनी से गुजारा
गुरुदेव की असाधारण विद्वत्ता एवं प्रतिष्ठा
गुरुदेव की अल्प शिक्षा के बावजूद उनकी अद्भुत विद्वत्ता एवं बड़े पंडितों के मध्य उनकी प्रतिष्ठा का वर्णन
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गुरुदेव की अद्भुत विद्वत्ता
अल्प शिक्षा में भी महाविद्वानों को मंत्रमुग्ध करने वाली वाक्पटुता
▶ देखें (46:03) ▶ Watch (46:03)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि उनके गुरुदेव केवल पंचवी क्लास तक पढ़े थे, किन्तु उनकी शास्त्र विषयक आलोचना एवं हरि कथा वर्णन इतनी गहन होती थी कि बड़े-बड़े विद्वान पंडित भी चुपचाप बैठकर श्रवण करते थे। तत्कालीन वृंदावन के सिद्ध महात्मा, लब्धप्रतिष्ठ वैष्णव, कुलभूषण पंडित सभी उनके सानिध्य में आकर हरि कथा का श्रवण करते थे। श्री रामकृष्ण पंडित बाबा, श्री गया प्रसाद बाबा जैसे प्रसिद्ध संतों का भी उनसे विशेष परिचय था। यह उनकी दिव्य वाक्पटुता का प्रमाण है कि बिना औपचारिक शिक्षा के भी वे शास्त्र सिद्धांत का ऐसा प्रतिपादन करते थे जैसे कोई एम.ए., पी.एच.डी. का विद्वान करता हो।
🔗 गुरुदेव की विद्वत्ता उनके पूर्वजन्म के संस्कारों का प्रमाण है।
📌 गुरुदेव की विशेषताएँ:
  • केवल पास क्लास तक शिक्षा
  • शास्त्र सिद्धांत में अद्भुत निपुणता
  • धुआंधार संस्कृत उच्चारण की क्षमता
  • बड़े-बड़े पंडितों का सानिध्य प्राप्त
  • श्री गया प्रसाद बाबा से विशेष परिचय
पारिवारिक जीवन एवं वैराग्य का उदय
गुरुदेव के विवाह, पुत्र जन्म, पत्नी की मृत्यु एवं हृदय में वैराग्य के उदय का वर्णन
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पुत्र जन्म एवं पत्नी की मृत्यु
वृंदावन गोस्वामी का जन्म एवं शीतला सुंदरी का देहत्याग
▶ देखें (48:28) ▶ Watch (48:28)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि गुरुदेव के एक पुत्र हुए जिनका नाम वृंदावन गोस्वामी रखा गया - ये ही बाद में नवद्वीप के पिताजी बने। किन्तु अल्प दिनों में ही उनकी पत्नी शीतला सुंदरी ने नश्वर शरीर परित्याग कर दिया। गुरुदेव की धाईमाँ ने कहा कि जैसे तुम्हारा पालन किया, वैसे ही तुम्हारे बच्चे का भी पालन करूँगी। इस प्रकार वृंदावन गोस्वामी का पालन धाईमाँ ने ढाई मास की अवस्था से ही किया। इस प्रकार एक-एक करके माता, पिता, पत्नी - सब चले गए।
🔗 परिवार का बिछोह वैराग्य का कारण बना।
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पूर्वजन्म संस्कार का प्रकटन
समय आने पर पूर्वजन्म के संस्कारों का स्फुरण
▶ देखें (49:09) ▶ Watch (49:09)
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि गुरुदेव के भीतर वैराग्य पूर्वजन्म में अर्जित संस्कार था जो वे लेकर आए थे। जैसे वृक्ष में समय आने पर ही फल फलता है, वैसे ही समय आने पर जाकर पूर्वजन्म के अर्जित संस्कार प्रकट होते हैं। कभी-कभी देखा गया है कि बड़े-बड़े दुर्जन भी बहुत सज्जन हो गए हैं, बड़े-बड़े संत हो गए हैं। सद्गुरुदेव श्री रूप-सनातन गोस्वामी का दृष्टांत देते हैं जो इस सिद्धांत की पुष्टि करता है।
🔗 गुरुदेव का वैराग्य उनके पूर्व जन्मों की साधना का फल था।
📌 पूर्व संस्कार सिद्धांत:
  • वैराग्य पूर्वजन्म का संस्कार है
  • समय आने पर ही संस्कार स्फुरित होते हैं
  • जैसे वृक्ष में समय पर फल आता है
  • दुर्जन भी सज्जन बन सकते हैं
🎭
श्री रूप-सनातन का दृष्टांत
राजमंत्री से परम वैरागी - श्री सनातन गोस्वामी की लीला
▶ देखें (49:29) ▶ Watch (49:29)
सद्गुरुदेव दृष्टांत देते हैं कि कौन जानता था कि श्री रूप-सनातन जो हुसैन शाह के राजमंत्री थे, दाढ़ी-मूंछ रखकर, टोपी पहनकर, घोड़े पर चढ़कर युद्ध के लिए जाते थे - वे वास्तव में ब्राह्मण खानदान के हिन्दू हैं! उर्दू, फारसी, अरबी सहित सात प्रकार की भाषाओं के ज्ञाता थे। कौन जानता था कि वही राजमंत्री सनातन इतने बड़े वैरागी, महाप्रभु के परम प्रिय पार्षद, राधा रानी की परम अंतरंग मंजरी - श्री लवंग मंजरी हैं! यह सब लीला है, नाटक है।
🔗 बाह्य वेश से आंतरिक भाव का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
📌 श्री सनातन गोस्वामी की विशेषताएँ:
  • हुसैन शाह के राजमंत्री
  • बाह्य वेश में मुसलमान जैसे
  • सात भाषाओं के ज्ञाता
  • वास्तव में ब्राह्मण खानदान
  • महाप्रभु के परम प्रिय पार्षद
  • श्री लवंग मंजरी का अवतार
गुरुदेव का ठाट-बाट एवं गरीब शिष्य की कथा
गुरुदेव की प्रतिष्ठा, उनके ठाट-बाट एवं गरीब शिष्य के साथ हुई घटना का वर्णन
👑
गुरुदेव का ठाट-बाट
राजसी ठाट-बाट वाले गोसाईं जी
▶ देखें (50:52) ▶ Watch (50:52)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि उस समय गुरुदेव में बड़ा ठाट-बाट था। अच्छे कपड़े, धोती पहनना, कीर्तन मंडली के साथ शिष्य मान में जाना - कहार पालकी में लेकर जाते थे। आगे-आगे कीर्तन मंडली, पीछे-पीछे गुरुदेव। गड़गड़ा हुक्का (बड़ा हुक्का) भी साथ रखते थे। कीमती-कीमती तंबाकू का उपयोग होता था। जहाँ भी जाते थे, हजारों लोगों की भीड़ लग जाती थी। बहुत नाम था उनका उस समय। लेकिन भीतर में वैराग्य तो आ गया था, किन्तु छोड़ नहीं पा रहे थे।
🔗 बाह्य ठाट-बाट के मध्य भी आंतरिक वैराग्य विद्यमान था।
📌 गुरुदेव के ठाट-बाट:
  • उत्तम वस्त्र धारण
  • कीर्तन मंडली साथ में
  • पालकी में यात्रा
  • गड़गड़ा हुक्का का उपयोग
  • हजारों की भीड़
🐘
गरीब शिष्य की कथा - कुड़े घरे हाथी
झोपड़ी में हाथी - धनी गुरु एवं निर्धन शिष्य का दृष्टांत
▶ देखें (51:45) ▶ Watch (51:45)
सद्गुरुदेव एक हृदयस्पर्शी कथा सुनाते हैं। एक गरीब व्यक्ति गुरुदेव की कथा सुनकर बहुत प्रभावित हुआ और घर जाकर पिता से कहा कि वह गोसाईं जी से दीक्षा लेना चाहता है। पिता आग-बबूला हो गए और बोले - 'हम गरीब लोग ऐसे राजा-महाराजा जैसे गुरु से दीक्षा नहीं लेते! हाथी को झोपड़ी में घुसाओगे तो झोपड़ी तोड़ देगा!' पिता ने कहा कि हमारा गुरु ऐसा होना चाहिए जो आए, मुड़ी (चावल) लेकर खुद खाए, जाते समय दो आना फेंक देंगे और लेकर चला जाएगा यह 'कुड़े घरे हाथी ढुका छे' (झोपड़ी में हाथी घुसा है) का दृष्टांत है।
🔗 सामाजिक वास्तविकता में गुरु-शिष्य संबंध भी आर्थिक परिस्थितियों से प्रभावित होता था।
📌 दृष्टांत: कुड़े घरे हाथी:
  • कुड़े घरे = झोपड़ी में
  • हाथी = बड़े प्रतिष्ठित गुरु
  • झोपड़ी तोड़ देगा = गरीब की सामर्थ्य से बाहर
  • गरीब का गुरु सादा होना चाहिए
तीर्थ यात्रा एवं दिव्य अनुभव
गुरुदेव की हिमालय एवं पूर्व भारत की तीर्थ यात्राओं तथा देवी मैया की अलौकिक कृपा का वर्णन
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तीर्थ यात्रा प्रारंभ
वैराग्य वश तीर्थाटन एवं गृहस्थ से विरक्ति
▶ देखें (54:29) ▶ Watch (54:29)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि सभी लोग गुरुदेव से द्वार परिग्रह (पुनर्विवाह) का आग्रह कर रहे थे - संसार चलाने के लिए, बच्चे को आगे बढ़ाने के लिए। किन्तु गुरुदेव के मन में धीरे-धीरे तीव्र वैराग्य आ गया था। धाईमाँ के ऊपर सब छोड़-छाड़कर वे चले जाते थे - कभी हिमालय, उत्तराखंड, कभी भारत के समस्त तीर्थ घूमकर आ जाते थे। किन्तु लौटकर आने पर गृहस्थ में मन नहीं लगता था। जब मन में वैराग्य आ जाता है, तब संसार के भोग पदार्थ अच्छे नहीं लगते।
🔗 वैराग्य का उदय स्वाभाविक रूप से तीर्थाटन की ओर प्रेरित करता है।
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जंगल में भटकाव
पूर्व भारत के जंगल में रास्ता भूलना
▶ देखें (55:30) ▶ Watch (55:30)
सद्गुरुदेव एक रोमांचक घटना सुनाते हैं। गुरुदेव केदार, बद्री आदि के दर्शन करके पूर्व भारत की ओर जा रहे थे, आसाम की सीमा में परशुराम कुंड की ओर। जंगल के रास्ते में अकेले चल रहे थे। चलते-चलते अंधकार हो गया, रास्ता दिखना बंद हो गया। दिशा का ज्ञान समाप्त हो गया, कुंड कहाँ है, लोकैलिटी कहाँ है - कुछ पता नहीं। जंगल में प्रवेश कर गए और सोचने लगे कि अब मृत्यु अनिवार्य है। तभी सामने एक लालटेन लिए कुछ लोग दिखे। उनके पीछे-पीछे चलने लगे।
🔗 भक्त की रक्षा भगवान स्वयं करते हैं।
🙏
देवी मैया की अलौकिक कृपा
भग्न मंदिर में देवी मैया द्वारा प्रसाद प्रदान
▶ देखें (57:55) ▶ Watch (57:55)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि उस व्यक्ति ने गुरुदेव को एक भग्न(टूटे-फूटे) मंदिर में रात्रि विश्राम के लिए छोड़ दिया और चेतावनी दी कि भयंकर जंतु-जानवर विचरण करते हैं, रात को बाहर मत निकलना। गुरुदेव भूखे-प्यासे थे। रात्रि में 'छुम-छुम' की आवाज आई और एक पहाड़ी असमिया देवी मैया जैसी स्त्री थाली में प्रसाद लेकर आईं। उन्होंने कहा - 'बाबा खा लो, हमारे गाँव में कोई भूखा नहीं रहता। आपके आने का पता चल गया।' थाली रखकर वे अदृश्य हो गईं! प्रसाद का आस्वादन अमृतमय था। प्रातः उठकर देखा तो चारों ओर जंगल था, कोई गाँव नहीं था। साक्षात देवी मैया ने कृपा की थी!
🔗 भक्तों की रक्षा के लिए भगवान एवं देवी-देवता स्वयं प्रकट होते हैं।
📌 देवी मैया की कृपा के लक्षण:
  • भूखे साधु को भोजन पहुँचाना
  • अदृश्य होकर प्रकट होना
  • अमृतमय प्रसाद का आस्वादन
  • प्रातः कोई गाँव न होना - दिव्य लीला का प्रमाण
🍛
भूख का महत्व
भूख ही भोजन की रुचि को बढ़ाती है
▶ देखें (58:58) ▶ Watch (58:58)
सद्गुरुदेव एक व्यावहारिक सिद्धांत बताते हैं कि भूख में हर वस्तु अधिक स्वादिष्ट लगती है। जब भूख नहीं है तो अमृत भी अच्छा नहीं लगता। यदि आपने इतना खा लिया है कि भूख ही नहीं है, तो राजभोग, गुलाब जामुन - कुछ भी बढ़िया दे दो, इच्छा नहीं होगी। भूख ही खाने की रुचि को बढ़ाती है। इसी प्रकार आध्यात्मिक क्षुधा (भगवत प्राप्ति की तीव्र इच्छा) भजन की रुचि को बढ़ाती है।
🔗 जैसे शारीरिक भूख भोजन की रुचि बढ़ाती है, वैसे ही आध्यात्मिक क्षुधा भजन की रुचि बढ़ाती है।
⚖️ भूख का सिद्धांत
तीव्र भूख: साधारण भोजन भी अमृत सा लगता है
भूख का अभाव: अमृत भी अच्छा नहीं लगता
महत्पुरुष सेवा एवं वृंदावन आगमन
हिमालय में सन्यासी सेवा, महत्सेवा का सिद्धांत एवं वृंदावन जाने का आदेश
🙏
हिमालय में सन्यासी सेवा
गिरि-कंदर में सिद्ध सन्यासी की सेवा
▶ देखें (59:51) ▶ Watch (59:51)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि पूर्व भारत के तीर्थ घूमकर गुरुदेव हिमालय गए। वहाँ एक गिरि-कंदर (पहाड़ी गुफा) में एक सिद्ध सन्यासी दिखे - शायद बौद्ध सन्यासी रहे होंगे। गुरुदेव ने सोचा कि ये महापुरुष हैं, इनकी सेवा करने से कुछ कल्याण होगा। महत्पुरुष की सेवा मुक्ति का द्वार है - यही सोचकर उन्होंने उनकी सेवा में बहुत दिन बिताए।
🔗 महापुरुष सेवा भगवत प्राप्ति का सुगम मार्ग है।
महत्सेवा द्वार विमुक्ति - महापुरुष सेवा का महत्व— श्रीमद् भागवत पुराण श्रीमद् भागवतम् 5.5.2
▶ 60:12
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
महत्सेवां द्वारमाहुर्विमुक्तेस्तमोद्वारं योषितां सङ्गिसङ्गम्। महान्तस्ते समचित्ताः प्रशान्ता विमन्यवः सुहृदः साधवो ये॥
mahat-sevāṁ dvāram āhur vimuktes tamo-dvāraṁ yoṣitāṁ saṅgi-saṅgam mahāntas te sama-cittāḥ praśāntā vimanyavaḥ suhṛdaḥ sādhavo ye
महापुरुषों की सेवा मुक्ति का द्वार है और स्त्री-संगी का संग नरक का द्वार है। महापुरुष वे हैं जो समचित्त, प्रशांत, क्रोधरहित, हितैषी और साधु हैं।
⚖️ द्वार का सिद्धांत
मुक्ति का द्वार: महत्पुरुष की सेवा
नरक का द्वार: स्त्री-संगी का संग
🎁
वृंदावन जाने का आदेश
सन्यासी द्वारा दीक्षा से इंकार एवं वृंदावन का मार्गदर्शन
▶ देखें (61:24) ▶ Watch (61:24)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि बहुत दिन सेवा के पश्चात गुरुदेव में तीव्र वैराग्य आ गया। उन्होंने उन सन्यासी से दीक्षा माँगी। किन्तु उन्होंने कहा - 'बाबा, मैं तुम्हारा गुरु नहीं हूँ। तुम यहाँ से जाओ वृंदावन। वहाँ तुम्हारे गुरु तुम्हारे लिए इंतजार कर रहे हैं।' गुरुदेव ने बताया कि वे गोसाईं हैं, शिष्य बनाते हैं, पर विद्वत्ता कुछ है नहीं, ज्ञान कुछ है नहीं - कब तक इस तरह ठगेंगे? यह सुनकर वे रोने लगे। तब उस महात्मा ने आशीर्वाद दिया - 'जाओ, तुम्हारे अंदर समस्त शास्त्र स्फुरित हो जाएँगे। जब तुम कथा प्रवचन करोगे, तुम्हारे भीतर समस्त शास्त्र स्फुरित हो जाएगा।' तब से गुरुदेव अद्भुत वक्ता बन गए!
🔗 महापुरुष का आशीर्वाद शास्त्र ज्ञान प्रदान करने में समर्थ है।
❓ प्रश्न: शास्त्र ज्ञान के बिना हरि कथा वक्ता कैसे बने? ▶ 62:41
💡 उत्तर: महापुरुष की सेवा एवं उनके आशीर्वाद से भीतर शास्त्र ज्ञान स्वयं स्फुरित हो जाता है। गुरुदेव ने औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की थी, किन्तु उस सिद्ध सन्यासी के आशीर्वाद से उनके भीतर समस्त शास्त्र का ज्ञान प्रकट हो गया और वे धुआंधार संस्कृत उच्चारण करने वाले महान वक्ता बन गए।
कर्म बंधन का सिद्धांत
पूर्व कर्म संस्कार, कर्म बंधन एवं निर्वेद अवस्था का दार्शनिक विवेचन
⛓️
कर्म बंधन का सिद्धांत
पूर्व संस्कार एवं कर्म बंधन का अनिवार्य प्रभाव
▶ देखें (63:53) ▶ Watch (63:53)
सद्गुरुदेव गहन दार्शनिक सिद्धांत समझाते हैं कि तीव्र वैराग्य होने से भी कुछ नहीं होता जब तक पूर्व संस्कार एवं कर्म बंधन विद्यमान है। जब तक कर्म बंधन है, तब तक तीव्र वैराग्य की स्थिति प्राप्त करना संभव नहीं है। पूर्वजन्म अर्जित कर्म संस्कार का बंधन एवं कर्म प्रवाह (कर्म आवर्तन) हर जीव को घुमाता रहता है। जोर करके कर्म बंधन छिन्न करके तीव्र वैराग्य लेकर भगवत उपासना करना वास्तव में संभव नहीं है।
🔗 कर्म बंधन का सिद्धांत गुरुदेव के गृहस्थ धर्म में लौटने का कारण स्पष्ट करता है।
निर्वेद अवस्था तक कर्म करने का आदेश— श्रीमद् भागवत पुराण श्रीमद् भागवतम् 11.20.9
▶ 64:44
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
तावत्कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता। मत्कथाश्रवणादौ वा श्रद्धा यावन्न जायते॥
tāvat karmāṇi kurvīta na nirvidyeta yāvatā mat-kathā-śravaṇādau vā śraddhā yāvan na jāyate
जब तक भीतर निर्वेद (अनासक्ति) अवस्था नहीं आती या मेरी कथा श्रवण आदि में श्रद्धा उत्पन्न नहीं होती, तब तक कर्म करते रहना चाहिए।
📌 कर्म बंधन सिद्धांत:
  • कर्म प्रवाह जीव को घुमाता है
  • जोर से कर्म बंधन नहीं तोड़ा जा सकता
  • निर्वेद अवस्था तक कर्म करना चाहिए
📌 निर्वेद अवस्था की परिभाषा:
  • निर्वेद = अनासक्ति
  • कृष्णेतर वस्तु में संपूर्ण स्पृहा शून्यता
  • देह-दैहिक वस्तु के प्रति आशक्ति शून्य होना
  • भोग्य पदार्थ के प्रति विरक्ति
👁️
सिद्ध मनोहर बाबा का मार्गदर्शन
त्रिकालदर्शी सिद्ध मनोहर बाबा एवं द्रष्टा गुरु की आवश्यकता
▶ देखें (65:36) ▶ Watch (65:36)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि वृंदावन में गोविंद कुंड के पास श्री सिद्ध मनोहर बाबा रहते थे जिन्हें सात जन्मों की स्मृति थी। उनके सानिध्य में गुरुदेव बहुत दिन रहे और उनके भीतर वैराग्य और तीव्र हो गया। किन्तु सद्गुरुदेव समझाते हैं कि वास्तव में आध्यात्मिक शक्ति महत्पुरुष की कृपा बिना, द्रष्टा पुरुष की कृपा बिना जड़-चेतन ग्रंथि से मुक्त होना संभव नहीं है। केवल कान फूंकने से मुक्ति हो जाएगी - ऐसी कोई गारंटी नहीं है। इसलिए द्रष्टा पुरुष गुरु की कृपा अनिवार्य है।
🔗 द्रष्टा गुरु की कृपा से ही वास्तविक आध्यात्मिक उन्नति संभव है।
द्रष्टा गुरु की आवश्यकता— श्रीमद् भागवत पुराण श्रीमद् भागवतम् 11.3.21
▶ 66:38
संदर्भ पूरक संदर्भ
तस्माद्गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम्। शाब्दे परे च निष्णातं ब्रह्मण्युपशमाश्रयम्॥
tasmād guruṁ prapadyeta jijñāsuḥ śreya uttamam śābde pare ca niṣṇātaṁ brahmaṇy upaśamāśrayam
इसलिए परम कल्याण का जिज्ञासु व्यक्ति ऐसे गुरु की शरण में जाए जो शब्द ब्रह्म (वेद) एवं परब्रह्म दोनों में निष्णात हो और जो ब्रह्मनिष्ठ तथा शांतचित्त हो।
📌 सिद्ध मनोहर बाबा की विशेषताएँ:
  • गोविंद कुंड निवासी
  • सात जन्मों की स्मृति
  • त्रिकालदर्शी
  • एकांतवासी
📌 द्रष्टा गुरु की आवश्यकता:
  • जड़-चेतन ग्रंथि से मुक्ति हेतु
  • केवल मंत्र दीक्षा पर्याप्त नहीं
  • आध्यात्मिक शक्ति संचार हेतु
  • मुक्ति मार्ग का ज्ञान हेतु
नवद्वीप आगमन एवं राधा वल्लभ विग्रह
गुरुदेव का पुनर्विवाह, नवद्वीप आगमन एवं राधा वल्लभ विग्रह की सेवा स्वीकार करना
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द्वितीय विवाह एवं गृहस्थ धर्म
सरस्वती देवी से विवाह एवं नवद्वीप आगमन
▶ देखें (67:40) ▶ Watch (67:40)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि घर लौटने पर सभी ने गुरुदेव को पकड़ लिया - 'अब तुम्हें छोड़ेंगे नहीं, द्वार परिग्रह (विवाह) करना ही पड़ेगा।' उनके मन में भी सुप्त स्पृहा थी, पूर्वजन्म अर्जित संस्कारों के कारण। भगवत इच्छा से उन्होंने स्वीकृति दे दी। परवर्ती माता श्रीमती सरस्वती देवी से उनका विवाह संपन्न हुआ। इसके पश्चात वे नवद्वीप आए - महाप्रभु की आविर्भाव भूमि, गुप्त वृंदावन। वृंदावन एवं नवद्वीप अभिन्न हैं। वहाँ श्री फलाहारी बाबा ने उन्हें एक मंदिर संप्रदान किया।
🔗 भगवत इच्छा से गृहस्थ धर्म स्वीकार कर नवद्वीप में स्थायी निवास हुआ।
📌 नवद्वीप की महिमा:
  • महाप्रभु की आविर्भाव भूमि
  • गुप्त वृंदावन कहलाता है
  • वृंदावन एवं नवद्वीप अभिन्न
  • पवित्र दिव्य भूमि
राधा वल्लभ विग्रह की दिव्य प्राप्ति
ठाकुर जी के स्वप्नादेश से विग्रह प्राप्ति की अलौकिक कथा
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राधा वल्लभ विग्रह की प्राप्ति
ठाकुर जी का स्वप्नादेश एवं राधा वल्लभ मंदिर स्थापना
▶ देखें (69:04) ▶ Watch (69:04)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि एक भक्त के पास श्री विग्रह थे। जब उनके मालिक नित्य लीला में चले गए तो प्रश्न उठा कि विग्रह की सेवा कौन करेगा। उन्होंने सोचा कि विग्रह को बेच देंगे। तब ठाकुर जी ने स्वयं स्वप्न में आदेश दिया कि हमको किसी और को मत देना, हमको तीन कौड़ी गोसाई के हाथ में समर्पित करो, हम उनकी सेवा लेंगे। वह व्यक्ति ढूंढते-ढूंढते मणिपुर घाट रोड आए और कहा कि ठाकुर जी ने स्वयं आपके पास आने का आग्रह किया है। इस प्रकार वह विग्रह लाए गए और उनका नाम राधा वल्लभ हुआ। यह राधा वल्लभ मंदिर अभी भी विद्यमान है, मणिपुर घाट रोड पर गंगा के किनारे नवद्वीप धाम में, जो अत्यंत सुंदर एवं मनोरम स्थान है।
🔗 भगवान स्वयं अपने सेवक का चयन करते हैं
📌 राधा वल्लभ विग्रह प्राप्ति के मुख्य बिंदु:
  • ठाकुर जी ने स्वयं स्वप्न में आदेश दिया
  • तीन कौड़ी गोसाई को विग्रह सेवा का अधिकार मिला
  • राधा वल्लभ नाम रखा गया
  • मणिपुर घाट रोड, नवद्वीप धाम में मंदिर स्थापित
वैराग्य का उदय एवं वृंदावन गमन संकल्प
गुरुदेव के मन में तीव्र वैराग्य का उदय और पंचाशूर्ति वानप्रस्थ का सिद्धांत
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गुरुदेव का वैराग्य संकल्प
तीव्र वैराग्य एवं भगवत प्राप्ति का दृढ़ संकल्प
▶ देखें (70:06) ▶ Watch (70:06)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि गुरुदेव वहां रहते हुए अनगिनत शिष्य बनाए, परंतु बहुत दिन बीत जाने के बाद उनके मन में विचार आया कि अब तो जाना पड़ेगा। उन्होंने संकल्प किया कि किमत पर इस संसार को स्वीकार नहीं करना है, बहुत हो गया। मनुष्य जीवन का एकमात्र उद्देश्य भगवत प्राप्ति और भगवत भजन है। जो मनुष्य इस शरीर को पाकर हरिभजन नहीं करते, भगवत प्राप्ति के लिए चेष्टा नहीं करते, जड़-चेतन ग्रंथि से मुक्त होने का प्रयत्न नहीं करते, वे आत्महत्यारी हैं। सद्गुरुदेव इस सिद्धांत की पुष्टि हेतु भागवत पुराण का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं:
🔗 मनुष्य जन्म की सार्थकता भगवत प्राप्ति में ही है
मनुष्य जन्म की दुर्लभता एवं आत्महत्या— श्रीमद् भागवतम् Srimad Bhagavatam 11.9.29
▶ 70:59
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभंप्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारम् । मयानुकूलेन नभस्वतेरितं पुमान् भवाब्धिं न तरेत् स आत्महा॥
labdhvā su-durlabham idaṁ bahu-sambhavānte mānuṣyam artha-dam anityam apīha dhīraḥ | tūrṇaṁ yateta na pated anu-mṛtyu yāvan niḥśreyasāya viṣayaḥ khalu sarvataḥ syāt ||
अनेक जन्मों के पश्चात यह अत्यंत दुर्लभ मनुष्य शरीर प्राप्त होता है जो परम पुरुषार्थ का साधन है। बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि मृत्यु आने से पूर्व शीघ्रता से आत्म-कल्याण का प्रयत्न करे क्योंकि विषय-भोग तो सभी योनियों में उपलब्ध हैं।
❓ प्रश्न: आत्महत्यारी कौन है? ▶ 70:49
💡 उत्तर: जो मनुष्य इस दुर्लभ मनुष्य शरीर को पाकर भी हरिभजन नहीं करते, भगवत प्राप्ति के लिए चेष्टा नहीं करते, जड़-चेतन ग्रंथि से मुक्त होने का प्रयत्न नहीं करते, वे आत्मा की हत्या करने वाले आत्महत्यारी हैं। यह भगवत पुराण का सिद्धांत है।
सामाजिक कटाक्ष - धर्म और राजनीति
धर्मयुक्त व अधर्मयुक्त राजनीति का विवेचन
⚖️
सामाजिक कटाक्ष: धर्म और राजनीति
धर्मयुक्त राजनीति बनाम अधर्मयुक्त राजनीति
▶ देखें (72:52) ▶ Watch (72:52)
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि जब राजनीति के साथ धर्म का संयोग होता है तो वह राजनीति समाज, जाति और देश के लिए मंगलप्रद होती है। परंतु जब राजनीति में अधर्म का संयोग होता है तो बड़ा अनर्थ होता है - देश, समाज, जाति और विश्व के लिए अमंगल का कारण बनती है। सद्गुरुदेव वर्तमान स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि अभी अधर्म का संयोग हो रहा है। ऐसे-ऐसे कानून लाए जा रहे हैं जो समाज जीवन का विघटन कर रहे हैं, हिंदू धर्म को नष्ट करने का प्रयास हो रहा है, आपसी भेदभाव और टकराव बढ़ाए जा रहे हैं - केवल वोट बैंक के चक्कर में। सद्गुरुदेव कहते हैं कि हम विवेक-विचार शून्य होकर अंधे बनकर ऐसे लोगों को वोट देते हैं और उनका समर्थन करते हैं।
🔗 धर्म का राजनीति से संयोग आवश्यक है
❓ प्रश्न: जाति कितनी हैं? ▶ 73:53
💡 उत्तर: वास्तव में जाति केवल दो हैं - एक जाति वह है जो भगवत भजन करती है, वही उत्तम जाति है। दूसरी वह जो भोग-वृत्ति लेकर पशु-पक्षी जैसा जीवन व्यतीत करती है, वह निम्न जाति है।
✅ करें:
  • विवेक-विचार से राजनीति का मूल्यांकन करें
❌ न करें:
  • अंधभक्ति से समाज-विरोधी तत्वों को समर्थन न दें
⚖️ राजनीति का स्वरूप
धर्मयुक्त राजनीति: समाज, जाति, देश के लिए मंगलप्रद
अधर्मयुक्त राजनीति: विनाश का कारण, समाज-विरोधी
📌 वर्तमान राजनीति की समस्याएं:
  • समाज जीवन का विघटन करने वाले कानून
  • हिंदू धर्म को नष्ट करने के प्रयास
  • आपसी भेदभाव और टकराव
  • वोट बैंक की राजनीति
  • पार्टियों में समाज-विरोधी तत्वों की उपस्थिति
पंचाशूर्ति वानप्रस्थ एवं वृंदावन प्रस्थान
गुरुदेव का वृंदावन जाने का अंतिम संकल्प
🙏
पंचाशूर्ति वानप्रस्थ का सिद्धांत
पचास वर्ष के पश्चात आत्म-कल्याण का संकल्प
▶ देखें (74:45) ▶ Watch (74:45)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि गुरुदेव मानव जीवन का एकमात्र उद्देश्य हरिभक्ति प्राप्त करना मानते थे। उन्होंने सोचा कि हमको जाना है। एक भक्त ने आकर कहा - 'पंचाशूर्ति वानं व्रजेत' - पचास वर्ष के पश्चात संसार में रहने का अधिकार नहीं है, आत्म-कल्याण के लिए चेष्टा करनी चाहिए। गुरुदेव ने भी विचार किया कि अब उनकी भी पचास वर्ष की आयु हो गई है, अब जाना है। उन्होंने सब संकेत दे दिया। तीव्र वैराग्य आ गया है। अब एकांत भाव से राधा रानी के चरण आश्रय करके वृंदावन के लिए चलने का संकल्प लिया।
🔗 आश्रम व्यवस्था के अनुसार जीवन का उद्देश्य
❓ प्रश्न: पंचाशूर्ति वानप्रस्थ का क्या अर्थ है? ▶ 75:16
💡 उत्तर: पचास वर्ष की आयु के पश्चात व्यक्ति को सांसारिक जीवन में रहने का अधिकार नहीं रहता। उसे आत्म-कल्याण के लिए चेष्टा करनी चाहिए और वन में जाकर भगवत भजन में संलग्न होना चाहिए।
✅ करें:
  • पचास वर्ष के पश्चात आत्म-कल्याण को प्राथमिकता दें
🙏
वृंदावन गमन का दृढ़ संकल्प
समस्त सांसारिक विषयों से निष्प्रिह होकर वृंदावन प्रस्थान
▶ देखें (75:48) ▶ Watch (75:48)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि भगवत प्राप्ति को ही उद्देश्य लेकर, समस्त जागतिक वस्तु-विषयों से निष्प्रिह होकर गुरुदेव ने वृंदावन जाने का संकल्प लिया। उन्होंने निश्चय किया कि जब तक भगवत प्राप्ति नहीं होगी तब तक वे पुनः संसार चक्र में नहीं लौटेंगे। सद्गुरुदेव कहते हैं कि कल हम गुरुदेव के साथ वृंदावन चलेंगे और देखेंगे कि वे कैसे साधना करते हैं। उनके जीवन चरित्र से, उनके आदर्श से अनुप्राणित होकर हम भी उनके पदांकों का अनुसरण करेंगे और भगवत प्राप्ति के उद्देश्य को लेकर आगे बढ़ने का प्रयत्न करेंगे।
🔗 भगवत प्राप्ति हेतु सर्वस्व त्याग
✅ करें:
  • महापुरुषों के जीवन चरित्र से प्रेरणा लें
  • उनके पदांकों का अनुसरण करें
📌 गुरुदेव के वृंदावन गमन की विशेषताएं:
  • तीव्र वैराग्य का उदय
  • एकांत भाव से साधना का संकल्प
  • राधा रानी के चरण आश्रय
  • भगवत प्राप्ति का एकमात्र उद्देश्य
🧠 आत्म-चिंतन (Self Assessment)
इस सत्संग से आपने क्या सीखा? (Test your understanding)
Core Essence
भक्त कथा श्रवण से भक्ति कैसे प्राप्त होती है और यथार्थ वैराग्य का स्वरूप क्या है?
उत्तर: भक्त कथामृत सुधा में ऐसी अलौकिक शक्ति है कि वह बिना साधन चेष्टा के अंतकरण में प्रवेश करके भक्ति पुष्प प्रस्फुटित करती है, और यथार्थ वैराग्य वस्तु त्याग नहीं अपितु भगवत् चिंतन में तल्लीनता से स्वतः प्राप्त आसक्ति शून्यता है।
Topic Review
आज की भागवत सप्ताह में वही अमृतत्व क्यों प्राप्त नहीं होता जो परीक्षित को मिला?
उत्तर: सद्गुरुदेव समझाते हैं कि परीक्षित महाराज को श्री शुकदेव जी जैसे निरागी, भगवत् प्रेमी, समर्पित सद्गुरुदेव से कथा मिली। आज के वक्ता सरागी हैं - काम, लालच से युक्त, स्वयं आचरण नहीं करते। ऐसे वक्ता की कथा शब्द तो है, परन्तु उसमें वह शक्ति नहीं जो अंतकरण को परिवर्तित कर सके। कथा कथा है, शब्द है, पर वह शब्द मंगलप्रद नहीं।
Topic Review
भगवत अनुराग के बिना वैराग्य का दावा करने वाला कैसा है?
उत्तर: सद्गुरुदेव कहते हैं कि ऐसा व्यक्ति मिथ्यावादी है, बड़ा झूठा है। जिसके भीतर भगवत-प्राप्ति की तीव्र लालसा नहीं, अनमोल मानव जीवन बीतने पर तड़पन नहीं, संकोच नहीं, चिंता नहीं, पश्चाताप नहीं - वह कैसे कह सकता है कि वह बड़ा वैरागी है? यह बेकार मिथ्यावाद है।
Topic Review
यदि भगवत-अनुराग नहीं है तो विषयों में आसक्ति क्यों रहती है?
उत्तर: सद्गुरुदेव बताते हैं कि यह दोष नहीं है, यह स्वाभाविक है। जीवात्मा का जब तक देहात्म बुद्धि है, तब तक देह और देह-संबंधी वस्तु-पदार्थ में आसक्ति-स्पृहा रहेगी। यह अनादि काल का स्वभाव है। जैसे रोशनी नहीं है तो अंधकार रहेगा ही, वैसे ही भगवत-अनुराग के बिना विषय-आसक्ति रहेगी।
Topic Review
गुरुजी ने इस प्रसंग को कैसे सुनाया?
उत्तर: सद्गुरुदेव बताते हैं कि बाबा हँसते-हँसते यह बात कहते थे - 'जो शेर ना, हमको हमारे भय से वह भाग गया!' ऐसे हँसी में बताते थे कि देखो, शेर हमको देखकर भय पाकर भाग गया। यह गुरुदेव की निर्भयता और भगवत-आश्रय का प्रमाण था।
Topic Review
सांप्रदायिकता और प्रादेशिकता में क्या अंतर है?
उत्तर: सद्गुरुदेव बताते हैं कि गुरुदेव ने स्पष्ट किया - पंजाबी-बंगाली-उड़िया का भेदभाव 'सांप्रदायिकता' शब्द से नहीं कहा जाता। यह 'प्रादेशिकता' है क्योंकि यह प्रदेश-प्रदेश का भेद है। सांप्रदायिकता सम्प्रदाय से संबंधित है। यह सूक्ष्म शाब्दिक विवेक गुरुदेव की अद्भुत विद्वत्ता का प्रमाण था।
Topic Review
शास्त्र ज्ञान के बिना हरि कथा वक्ता कैसे बने?
उत्तर: महापुरुष की सेवा एवं उनके आशीर्वाद से भीतर शास्त्र ज्ञान स्वयं स्फुरित हो जाता है। गुरुदेव ने औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की थी, किन्तु उस सिद्ध सन्यासी के आशीर्वाद से उनके भीतर समस्त शास्त्र का ज्ञान प्रकट हो गया और वे धुआंधार संस्कृत उच्चारण करने वाले महान वक्ता बन गए।
Topic Review
आत्महत्यारी कौन है?
उत्तर: जो मनुष्य इस दुर्लभ मनुष्य शरीर को पाकर भी हरिभजन नहीं करते, भगवत प्राप्ति के लिए चेष्टा नहीं करते, जड़-चेतन ग्रंथि से मुक्त होने का प्रयत्न नहीं करते, वे आत्मा की हत्या करने वाले आत्महत्यारी हैं। यह भगवत पुराण का सिद्धांत है।
Topic Review
जाति कितनी हैं?
उत्तर: वास्तव में जाति केवल दो हैं - एक जाति वह है जो भगवत भजन करती है, वही उत्तम जाति है। दूसरी वह जो भोग-वृत्ति लेकर पशु-पक्षी जैसा जीवन व्यतीत करती है, वह निम्न जाति है।
Topic Review
पंचाशूर्ति वानप्रस्थ का क्या अर्थ है?
उत्तर: पचास वर्ष की आयु के पश्चात व्यक्ति को सांसारिक जीवन में रहने का अधिकार नहीं रहता। उसे आत्म-कल्याण के लिए चेष्टा करनी चाहिए और वन में जाकर भगवत भजन में संलग्न होना चाहिए।
स्पष्टीकरण (Clarification)

यह सारांश AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग गुरु सेवा में करके तैयार किया गया है। इसमें त्रुटि हो सकती है। कृपया पूर्ण लाभ के लिए पूरा वीडियो अवश्य देखें।

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