श्री ईश्वरपुरी पाद का दिव्य जीवन चरित्र — गुरु सेवा से भगवत् प्राप्ति तक
श्री ईश्वरपुरी पाद का दिव्य जीवन चरित्र — गुरु सेवा से भगवत् प्राप्ति तक
सद्गुरुदेव श्री ईश्वरपुरी पाद के पावन जीवन चरित्र का वर्णन करते हैं, जो पूर्वजन्म अर्जित दैवी संस्कारों के साथ जन्म लेकर बाल्यकाल में ही समस्त शास्त्रों में पारंगत हो गए। श्री माधवेंद्रपुरी से दीक्षा प्राप्त कर तीव्र वैराग्य धारण किया और खीरचोरा गोपीनाथ में गुरु सेवा द्वारा उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। नवद्वीप में श्री अद्वैत आचार्य प्रभु के सत्संग में गुरुभाई के रूप में मिलन हुआ और किशोर निमाई पंडित के दिव्य स्वरूप का अनुभव किया। गया तीर्थ में विष्णुपाद पर महाप्रभु को दशाक्षर मंत्र प्रदान कर दीक्षा दी, जिसके बाद महाप्रभु में तीव्र प्रेमोन्मत्त दशा का प्रकाश हुआ। महाप्रभु ने श्रीवास पंडित के गृह में सबको अपना सच्चिदानंद स्वरूप दिखाया और सन्यास लेकर जगन्नाथपुरी चले गए, जबकि ईश्वरपुरी पाद गुरु चिंतन करते हुए नित्य लीला में प्रविष्ट हो गए।
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- 🔹 माधवेंद्रपुरी से दीक्षा और तीर्थाटन का प्रारंभ (9:55)
- 🔹 यतेन्द्रिय मुनि की विशेषताएं और मुक्ति का स्वरूप (11:28)
- 🔹 मुक्ति बाहर नहीं, हृदय में है — बंधन और मुक्ति का रहस्य (13:54)
- 🔹 घर छोड़कर जंगल जाने से मुक्ति नहीं — मनोगुहा में प्रवेश आवश्यक (15:16)
- 🔹 संख्या-बहुल भजन बनाम हृदय की अनाशक्ति (16:38)
- 🔹 माया बाहर नहीं, मन में है — भगवन्मय दृष्टि का रहस्य (17:30)
- 🔹 खीरचोरा गोपीनाथ में गुरु सेवा और आशीर्वाद प्राप्ति (18:15)
- 🔹 माधवेंद्रपुरी का आशीर्वाद — भगवान के प्रेम-सानिध्य की प्राप्ति (20:09)
- 🔹 रामचंद्रपुरी का दृष्टांत — गुरु को ज्ञान देने का दुष्परिणाम (21:04)
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- 🔹 ईश्वरपुरी को ध्यान में नवद्वीप का दिव्य संकेत (22:27)
- 🔹 श्री अद्वैत आचार्य प्रभु के सत्संग में गुरुभाई का मिलन (23:51)
- 🔹 श्री अद्वैत प्रभु और ईश्वरपुरी का गुरुभाई के रूप में मिलन (26:08)
- 🔹 नेत्र से भजन और चरित्र की पहचान — संत-दर्शन का रहस्य (26:29)
- 🔹 श्री अद्वैत प्रभु द्वारा निमाई पंडित का वर्णन (32:48)
- 🔹 श्री चैतन्य महाप्रभु की अद्भुत शारीरिक सुंदरता का वर्णन (33:49)
- 🔹 ईश्वरपुरी और महाप्रभु का प्रथम दर्शन और अद्भुत अनुभव (35:14)
- 🔹 महाप्रभु के अंग स्पर्श से ईश्वरपुरी का अद्भुत आनंद-अनुभव (36:36)
- 🔹 महाप्रभु द्वारा ईश्वरपुरी का गृह में आदर-सत्कार (37:41)
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- 🔹 योगमाया से आवृत महाप्रभु का स्वरूप प्रकाश का निर्णय (44:56)
- 🔹 गया तीर्थ में ईश्वरपुरी से महाप्रभु का पुनर्मिलन (47:19)
- 🔹 जगत्लक्ष्मी द्वारा अद्भुत रसोई — भगवान जहां, वहां लक्ष्मी (48:01)
- 🔹 ईश्वरपुरी द्वारा महाप्रभु को दशाक्षर मंत्र दीक्षा प्रदान (49:44)
- 🔹 दीक्षा के बाद महाप्रभु में तीव्र प्रेमोन्मत्त दशा का प्रकाश (51:48)
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- 🔹 घर आकर महाप्रभु की प्रेमोन्मत्त दशा — परिजनों की चिंता (52:50)
- 🔹 श्रीवास पंडित द्वारा महाप्रभु की प्रेमोन्मत्त दशा की पहचान (54:53)
- 🔹 श्रीवास पंडित के गृह में महाप्रभु का सबको स्वरूप-दर्शन (55:55)
- 🔹 माधवेंद्रपुरी का अंतिम श्लोक और ईश्वरपुरी का नित्य लीला प्रवेश (57:27)
- 🔹 भक्त-कथामृत-सुधा में अवगाहन — सत्संग का उपसंहार (59:22)
📖 आज की शिक्षाएं 📖 आज की विस्तृत शिक्षाएं
- पूर्वजन्म अर्जित सुकृति से विशेष संस्कार
- बाल्यकाल में ही अद्भुत धी-शक्ति (बुद्धि)
- अल्प समय में समस्त शास्त्रों में पारदर्शिता
- क्रिया-कर्म और जीवन शैली सामान्य से भिन्न
- अभय, सत्य, दान, दम आदि दैवी गुण स्वाभाविक रूप से विद्यमान
- हर्ष — विषाद
- मान — अपमान
- शीत — उष्ण
- सुख — दुख
- लाभ — हानि
- यतेन्द्रिय — इंद्रियां संयमित
- यत-मनो-बुद्धि — मन और बुद्धि संयमित
- मोक्ष परायण — हरि-भक्ति ही एकमात्र उद्देश्य
- विगत-इच्छा — देह-दैहिक वस्तु की इच्छा नहीं
- विगत-भय — वस्तु/शरीर नष्ट होने का भय नहीं
- विगत-क्रोध — क्रोध का सर्वथा अभाव
- बंधन भी यहां — मुक्ति भी यहां
- भक्ति भी यहां — आसक्ति भी यहां
- अंधकार भी यहां — रोशनी भी यहां
- वैराग्य भी यहां — अनुराग भी यहां
- घर छोड़कर जंगल जाना मुक्ति का मार्ग नहीं
- बाहर एकांत स्थान ढूंढने से भजन सिद्ध नहीं होता
- गुरु प्रसन्नता संपादन ही सर्वोत्तम साधना है
- गुरु सानिध्य में रहकर सेवा करनी चाहिए
- गुरु को ज्ञान देना महापाप है
- साधु-संत की निंदा करने से भ्रष्टता आती है
- अश्रु (tears)
- कंप (trembling)
- पुलक (horripilation)
- वैवर्ण्य (discolouration)
- स्वेद (perspiration)
- सर्वांग-स्तंभ (stunned paralysis)
- मूर्छा (fainting)
- प्रलय (devastation)
- जितना भजन, उतनी छोटी आंखें
- सिद्ध महापुरुषों की आंखें अंत में बुझ जाती हैं
- साधु टेढ़ी नजर से नहीं देखते
- साधु आंख फाड़कर नहीं देखते
- संदेहशील व्यक्ति टेढ़ी नजर से देखता है
- चंद्रकांति जैसी अंगप्रभा
- आयत (कमल-समान) नेत्र
- घुंघराले केश स्कंध तक
- गजस्कंध (चौड़े कंधे)
- उन्नत वक्षस्थल, क्षीण कटि
- दंतपंक्ति मुक्ताहार समान
- ओष्ठाधर बिंबफल समान लाल
- निमाई पंडित — विद्वान किशोर
- वैष्णवता से बहुत दूर की प्रतीति
- घमंडी, दांभिक पंडित की छवि
- भक्ति-भावना रहित दिखना
- चतुरी बहुत, लेकिन आकर्षण शक्ति अद्भुत
- मुरारी गुप्त (राम उपासक) — राम-दरबार
- नृसिंहानंद स्वामी (नृसिंह उपासक) — नृसिंह स्वरूप
- श्रीवास पंडित — चतुर्भुज स्वरूप
- श्रीधर आदि को भी स्वरूप-दर्शन
ईश्वरपुरी पाद ने श्री माधवेंद्रपुरी से दीक्षा प्राप्त की और उनकी अनन्य सेवा करके उनका विशेष आशीर्वाद प्राप्त किया।
ईश्वरपुरी पाद का जन्म बंगाल के हल्लीशहर (जिसे कुमारहट्ट भी कहा जाता है) में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि केवल घर छोड़ने या वेश बदलने से वैराग्य नहीं होता। 'वि' (विशेष) रूप से 'राग' (अनुराग) का अभाव ही वैराग्य है, अर्थात भोग्य पदार्थों में आसक्ति न होना।
महाप्रभु पितृ-कार्य के लिए गया गए थे, वहीं ईश्वरपुरी पाद से मिलन हुआ और महाप्रभु ने उनसे दशाक्षर मंत्र की दीक्षा ग्रहण की।
सद्गुरुदेव बताते हैं कि नेत्र ही पहचान है। जितना भजन होगा, नेत्रों में उतनी गंभीरता और विकार-शून्यता होगी। साधु कभी टेढ़ी नजर से नहीं देखते।
यह सारांश AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग गुरु सेवा में करके तैयार किया गया है। इसमें त्रुटि हो सकती है। कृपया पूर्ण लाभ के लिए पूरा वीडियो अवश्य देखें।
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