Draft 1 : no change in model, no change in transcript

0
Thumbnail
श्री भगवत चर्चा
14 February 2026

श्री ईश्वरपुरी पाद का दिव्य जीवन चरित्र — गुरु सेवा से भगवत् प्राप्ति तक

श्री ईश्वरपुरी पाद का दिव्य जीवन चरित्र — गुरु सेवा से भगवत् प्राप्ति तक

Sri Sri 108 Sri Vinod Baba ji Maharaj
पूरा सत्संग देखें
पढ़ने का तरीका चुनें:
संक्षेप विस्तार
Quote Decor
हमारे प्रिय सद्गुरुदेव बताते हैं:
" वैराग्य माने अनाशक्ति — देह-दैहिक भोग्य पदार्थ के प्रति अनाशक्ति का नाम है वैराग्य। घर छोड़कर जंगल जाने से वैरागी नहीं होता। "

" बंधन आपके हृदय में, मुक्ति भी आपके हृदय में, भक्ति भी आपके हृदय में, आसक्ति भी आपके हृदय में — बाहर कुछ नहीं है। "

" गुरु सेवा ही उत्तम भजन है — गुरु के पास रहना नहीं, गुरु की प्रसन्नता ही गुरु सेवा है। "
ईश्वरपुरी (18)वैराग्य (12)माधवेंद्रपुरी (10)दीक्षा (8)महाप्रभु (15)गुरु सेवा (6)मुक्ति (8)द्वंद्वातीत (4)नवद्वीप (7)प्रेमोन्मत्त (5)
🔍 सत्संग सार (Executive Summary)

सद्गुरुदेव श्री ईश्वरपुरी पाद के पावन जीवन चरित्र का वर्णन करते हैं, जो पूर्वजन्म अर्जित दैवी संस्कारों के साथ जन्म लेकर बाल्यकाल में ही समस्त शास्त्रों में पारंगत हो गए। श्री माधवेंद्रपुरी से दीक्षा प्राप्त कर तीव्र वैराग्य धारण किया और खीरचोरा गोपीनाथ में गुरु सेवा द्वारा उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। नवद्वीप में श्री अद्वैत आचार्य प्रभु के सत्संग में गुरुभाई के रूप में मिलन हुआ और किशोर निमाई पंडित के दिव्य स्वरूप का अनुभव किया। गया तीर्थ में विष्णुपाद पर महाप्रभु को दशाक्षर मंत्र प्रदान कर दीक्षा दी, जिसके बाद महाप्रभु में तीव्र प्रेमोन्मत्त दशा का प्रकाश हुआ। महाप्रभु ने श्रीवास पंडित के गृह में सबको अपना सच्चिदानंद स्वरूप दिखाया और सन्यास लेकर जगन्नाथपुरी चले गए, जबकि ईश्वरपुरी पाद गुरु चिंतन करते हुए नित्य लीला में प्रविष्ट हो गए।

🧱 ज्ञान प्रवाह
graph TD A[दैवी शक्ति संपन्न जन्म] --> B[बाल्यकाल में शास्त्र पारंगतता] B --> C[माधवेंद्रपुरी से दीक्षा प्राप्ति] C --> D[तीव्र वैराग्य का प्रकाश] D --> E[एकांत वास एवं कठोर तपस्या] E --> F[खीरचोरा गोपीनाथ में गुरु सेवा] F --> G[गुरु का आशीर्वाद] G --> H[नवद्वीप आगमन] H --> I[अद्वैत आचार्य प्रभु से मिलन] I --> J[गुरुभाई का प्रेममय मिलन] J --> K[निमाई पंडित का प्रथम दर्शन] K --> L[गया तीर्थ में पुनर्मिलन] L --> M[दशाक्षर मंत्र दीक्षा] M --> N[महाप्रभु में प्रेमोन्मत्त दशा] N --> O[श्रीवास पंडित का गृह] O --> P[सच्चिदानंद स्वरूप दर्शन] P --> Q[उपासना अनुसार स्वरूप प्रदर्शन] Q --> R[माधवेंद्रपुरी का तिरोभाव] R --> S[ईश्वरपुरी का नित्य लीला प्रवेश]
graph TD A[दैवी शक्ति संपन्न जन्म] --> B[बाल्यकाल में शास्त्र पारंगतता] B --> C[माधवेंद्रपुरी से दीक्षा प्राप्ति] C --> D[तीव्र वैराग्य का प्रकाश] D --> E[एकांत वास एवं कठोर तपस्या] E --> F[खीरचोरा गोपीनाथ में गुरु सेवा] F --> G[गुरु का आशीर्वाद] G --> H[नवद्वीप आगमन] H --> I[अद्वैत आचार्य प्रभु से मिलन] I --> J[गुरुभाई का प्रेममय मिलन] J --> K[निमाई पंडित का प्रथम दर्शन] K --> L[गया तीर्थ में पुनर्मिलन] L --> M[दशाक्षर मंत्र दीक्षा] M --> N[महाप्रभु में प्रेमोन्मत्त दशा] N --> O[श्रीवास पंडित का गृह] O --> P[सच्चिदानंद स्वरूप दर्शन] P --> Q[उपासना अनुसार स्वरूप प्रदर्शन] Q --> R[माधवेंद्रपुरी का तिरोभाव] R --> S[ईश्वरपुरी का नित्य लीला प्रवेश]
📌 विषय सूची (Table of Contents)

📖 आज की शिक्षाएं 📖 आज की विस्तृत शिक्षाएं

दैवी जन्म एवं प्रारंभिक जीवन
श्री ईश्वरपुरी पाद के दैवी संस्कारों से युक्त जन्म और बाल्यकाल की विशेषताओं का वर्णन
🌟
महाप्रभु के पार्षदों की दिव्य स्थिति
महाप्रभु के आविर्भाव काल में पार्षदों की लीला-तल्लीनता
▶ देखें (0:00) ▶ Watch (0:00)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रकट काल में जो भी पार्षद आए थे, वे सभी अपनी लीला में ऐसी तल्लीनता और तन्मयता के साथ आनंद में निमग्न रहते थे। महाप्रभु के अप्रकट होने के बाद सभी पार्षद संवर्णन के समय की प्रतीक्षा में समय व्यतीत कर रहे थे। महाप्रभु के प्रवृत्ति काल में उनके पार्षदों ने कैसी-कैसी लीलाएं प्रदर्शित की हैं, इसका वर्णन चैतन्य चरितामृत आदि ग्रंथों में स्वरूप दामोदर की कर्चा से प्राप्त होता है। इन्हीं पार्षदों में से एक हैं श्री ईश्वरपुरी पाद, जिनके जीवन चरित्र का सद्गुरुदेव आज वर्णन करते हैं।
🔗 महाप्रभु के पार्षदों की परिचय भूमिका
ईश्वरपुरी का दैवी शक्ति संपन्न जन्म
श्री ईश्वरपुरी पाद का दैवी शक्ति संपन्न जन्म और बाल्यकाल
▶ देखें (1:25) ▶ Watch (1:25)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि श्री ईश्वरपुरी पाद ने बंगाल के हलीशहर में जन्म लिया। उनके पिता श्री श्यामसुंदर आचार्य परम पंडित थे। बचपन में ही ज्ञान होते ही अल्प समय में समस्त शास्त्रों का अध्ययन करके परम पारदर्शिता प्राप्त कर ली। वे पूर्वजन्म अर्जित सुकृति से प्राप्त अशेष विशेष गुण संपन्न संस्कारों के साथ जन्मे थे। दैवी शक्ति संपन्न महापुरुष जब जन्म लेते हैं तो उनके क्रिया-कर्म और जीवन शैली कुछ अलग होती है — उनमें अभय, सत्य, शुद्धि, ज्ञान, दान, दम, अहिंसा, त्याग, शांति जैसे सद्गुण स्वाभाविक रूप से प्रकाशित होते हैं। यह दैवी संपद गीता में वर्णित है जो दैवी जाति वालों में प्रकट होती है।
🔗 ईश्वरपुरी के जन्म की दिव्यता स्थापित करना
दैवी संपद के लक्षण— भगवद् गीता Bhagavad Gita 16.1-3
▶ 2:51
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः। दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥ अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्। दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्॥ तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता। भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत॥
abhayaṁ sattva-saṁśuddhir jñāna-yoga-vyavasthitiḥ dānaṁ damaś ca yajñaś ca svādhyāyas tapa ārjavam ahiṁsā satyam akrodhas tyāgaḥ śāntir apaiśunam dayā bhūteṣv aloluptvaṁ mārdavaṁ hrīr acāpalam tejaḥ kṣamā dhṛtiḥ śaucam adroho nāti-mānitā bhavanti sampadaṁ daivīm abhijātasya bhārata
हे भारत! निर्भयता, अंतःकरण की शुद्धि, ज्ञान-योग में स्थिति, दान, इन्द्रिय-संयम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप, सरलता, अहिंसा, सत्य, क्रोधहीनता, त्याग, शांति, निंदा न करना, प्राणियों पर दया, लोलुपता का अभाव, कोमलता, लज्जा, चंचलता का अभाव, तेज, क्षमा, धैर्य, शुद्धि, द्रोह-रहितता और अभिमान-रहितता — ये सब दैवी संपद वाले पुरुष के लक्षण हैं।
📌 दैवी शक्ति संपन्न जन्म के लक्षण:
  • पूर्वजन्म अर्जित सुकृति से विशेष संस्कार
  • बाल्यकाल में ही अद्भुत धी-शक्ति (बुद्धि)
  • अल्प समय में समस्त शास्त्रों में पारदर्शिता
  • क्रिया-कर्म और जीवन शैली सामान्य से भिन्न
  • अभय, सत्य, दान, दम आदि दैवी गुण स्वाभाविक रूप से विद्यमान
🎯
दैवी शक्ति संपन्न साधक की विशेषता
दैवी शक्ति संपन्न साधक ही परम मंगल साधन कर सकते हैं
▶ देखें (3:33) ▶ Watch (3:33)
सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि ऐसे दैवी शक्ति संपन्न साधक ही परवर्ती काल में विशेष मंगल साधन कर सकते हैं। वे अपना भी मंगल करते हैं और जगत का भी मंगल साधन करने में समर्थ होते हैं। साधारण मनुष्य के द्वारा ऐसा परम मंगल साधन करना संभव नहीं है — चाहे कितनी भी चेष्टा करें। गीता में भगवान कहते हैं कि जो पूर्वजन्म के संस्कार लेकर आते हैं, जिनके पाप अंतर्गत हो गए हैं (काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, मोह आदि अवगुण क्षीण हो गए हैं), पुण्य कर्म के द्वारा वही दृढ़ व्रत धारण करके भगवान का भजन कर सकते हैं। सबके द्वारा यह संभव नहीं है।
🔗 दैवी संस्कारों की अनिवार्यता
पाप-मुक्त साधक का भजन— भगवद् गीता Bhagavad Gita 7.28
▶ 3:55
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्। ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः॥
yeṣāṁ tv anta-gataṁ pāpaṁ janānāṁ puṇya-karmaṇām te dvandva-moha-nirmuktā bhajante māṁ dṛḍha-vratāḥ
जो पुण्य कर्म करने वाले मनुष्य हैं, जिनके पाप नष्ट हो गए हैं, वे द्वंद्व-मोह से मुक्त होकर दृढ़ व्रत से मेरा भजन करते हैं।
वैराग्य का स्वरूप और गुरु दीक्षा
वैराग्य की वास्तविक परिभाषा और माधवेंद्रपुरी से दीक्षा प्राप्ति का वर्णन
🔥
माधवेंद्रपुरी से मिलन और तीव्र वैराग्य
श्री माधवेंद्रपुरी से दीक्षा प्राप्ति और वैराग्य का प्रकाश
▶ देखें (5:04) ▶ Watch (5:04)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि श्री माधवेंद्रपुरी भ्रमण करते हुए बंगाल में हलीशहर आए। ईश्वरपुरी को देखकर ही पहचान गए कि ये अद्भुत शक्ति संपन्न, पूर्वजन्म अर्जित सुकृति से युक्त हैं। दो-चार दिन उनके घर रहकर उनके सानिध्य में ईश्वरपुरी के भीतर तीव्र वैराग्य का प्रकाश हुआ। सद्गुरुदेव वैराग्य की व्याख्या करते हैं — वैराग्य का अर्थ है अनाशक्ति, घर छोड़कर जंगल जाना वैराग्य नहीं है। 'वै' नकारवाचक शब्द है, 'राग' अर्थात अनुराग — भोग्य पदार्थ के प्रति अनुराग का अभाव ही वैराग्य है। यह पूर्वजन्म अर्जित संस्कार है। जिसके मन में भगवत् चरण प्राप्ति ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य है और दृश्यमान किसी भी वस्तु पदार्थ के प्रति आसक्ति नहीं है — वही वास्तविक वैरागी है।
🔗 वैराग्य की शास्त्रीय परिभाषा स्थापित करना
❓ प्रश्न: वैराग्य का वास्तविक अर्थ क्या है? ▶ 5:35
💡 उत्तर: वैराग्य का अर्थ है अनाशक्ति — देह-दैहिक भोग्य पदार्थ के प्रति अनाशक्ति। 'वै' नकारवाचक शब्द है और 'राग' का अर्थ है अनुराग। अतः वैराग्य का अर्थ है भोग्य पदार्थ के प्रति अनुराग का अभाव। यह घर छोड़कर जंगल जाने से नहीं होता, वेश परिवर्तन से नहीं होता। यह पूर्वजन्म अर्जित संस्कार है। जिसके मन में भगवत् चरण प्राप्ति ही जीवन का उद्देश्य है और दृश्यमान वस्तुओं के प्रति किंचित मात्र आसक्ति नहीं — वही वास्तविक वैरागी है, चाहे वह गृहस्थ हो या संन्यासी।
⚖️ वैराग्य की दो धारणाएं
लौकिक धारणा (भ्रामक): घर छोड़ना, जंगल जाना, वेश परिवर्तन करना — बाह्य त्याग को वैराग्य मानना
शास्त्रीय धारणा (सत्य): देह-दैहिक भोग्य पदार्थ के प्रति अनाशक्ति — अंतःकरण में अनुराग का अभाव। घर में रहकर भी हो सकता है।
📖
नित्य संन्यासी का लक्षण
गीता अनुसार नित्य संन्यासी की पहचान
▶ देखें (7:08) ▶ Watch (7:08)
सद्गुरुदेव गीता का श्लोक उद्धृत करते हैं जहां भगवान अर्जुन को बताते हैं कि जो न द्वेष करता है, न कांक्षा करता है — उसे नित्य संन्यासी जानना। जिसके मन में भगवत् चरण के अतिरिक्त दृश्यमान किसी भी वस्तु-पदार्थ की प्राप्ति की आकांक्षा नहीं — वह संन्यासी है, चाहे धोती पहने या कुर्ता। निर्द्वंद्व — हर्ष-विषाद, मान-अपमान, शीत-उष्ण, सुख-दुख, लाभ-हानि — इस द्वंद्व का सामना प्रत्येक मनुष्य को करना पड़ता है। जो भगवत् प्राप्ति को जीवन का उद्देश्य बना लेता है, वह द्वंद्वातीत हो जाता है — इन द्वंद्वों में विचलित नहीं होता।
🔗 वैराग्य और संन्यास का आंतरिक स्वरूप
नित्य संन्यासी का लक्षण— भगवद् गीता Bhagavad Gita 5.3
▶ 7:08
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति। निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥
jñeyaḥ sa nitya-sannyāsī yo na dveṣṭi na kāṅkṣati nirdvandvo hi mahā-bāho sukhaṁ bandhāt pramucyate
हे महाबाहो! जो न द्वेष करता है, न कांक्षा करता है — उसे नित्य संन्यासी जानना। क्योंकि द्वंद्व-रहित पुरुष सुखपूर्वक बंधन से मुक्त हो जाता है।
📌 जीवन के द्वंद्व (विपरीत युग्म):
  • हर्ष — विषाद
  • मान — अपमान
  • शीत — उष्ण
  • सुख — दुख
  • लाभ — हानि
⚖️
अहंकार की पहचान का उपाय
मान-अपमान से अहंकार की परीक्षा
▶ देखें (9:02) ▶ Watch (9:02)
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि सामान्य मनुष्य शुभ समागम में आनंद प्राप्त करते हैं और अशुभ समागम में दुखी हो जाते हैं। सम्मान मिलने पर अहंकार से फूल जाते हैं, अपमान होने पर मुर्झा जाते हैं। लेकिन वास्तव में मान और अपमान दोनों झूठे हैं — ये अहंकार से पैदा होते हैं। आप स्वयं पहचान सकते हैं कि आपके अंदर कितना अहंकार है — यदि सम्मान में बहुत हर्ष होता है और अपमान में बहुत कष्ट होता है, तो समझ लीजिए अभी अहंकार विद्यमान है। इस प्रकार अपने को परीक्षण करना चाहिए।
🔗 आत्म-परीक्षण का व्यावहारिक मार्ग
❓ प्रश्न: अपने अहंकार को कैसे पहचानें? ▶ 9:02
💡 उत्तर: सद्गुरुदेव बताते हैं कि अहंकार की परीक्षा मान-अपमान से होती है। यदि सम्मान मिलने पर बहुत हर्ष होता है, अहंकार में फूल जाते हैं, और अपमान होने पर बहुत कष्ट होता है, मुर्झा जाते हैं — तो समझ लें कि अहंकार विद्यमान है। वास्तव में मान और अपमान दोनों झूठे हैं, ये अहंकार से ही उत्पन्न होते हैं। जितना अहंकार होगा, उतना ही मान-अपमान का प्रभाव पड़ेगा।
गुरु सेवा और कठोर साधना
गुरु सेवा की महत्ता, एकांत साधना और मुक्ति के स्वरूप का वर्णन
🙏
दीक्षा प्राप्ति और तीर्थाटन
माधवेंद्रपुरी से दीक्षा और तीर्थाटन का प्रारंभ
▶ देखें (9:55) ▶ Watch (9:55)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि ईश्वरपुरी जन्म से ही वैरागी थे — पूर्वजन्म की सुकृति से अनाशक्ति लेकर जन्म लिए थे। दीक्षा प्राप्त करने के बाद माधवेंद्रपुरी तो चले गए क्योंकि वे किसी को साथ नहीं रखते थे, एकाकी ही भ्रमण करना पसंद करते थे। ईश्वरपुरी भी एकाकी ही तीर्थाटन पर निकल गए — समस्त तीर्थ भ्रमण करते हुए वन-वनांतर में जाकर कठोर तपस्या की। गीता कहती है कि जो यदृच्छा-लाभ से संतुष्ट है, द्वंद्वातीत है, मत्सररहित है — वह सिद्धि हो या असिद्धि, किसी में भी बंधता नहीं है।
🔗 साधक की आदर्श स्थिति
यदृच्छा-लाभ संतुष्ट साधक— भगवद् गीता Bhagavad Gita 4.22
▶ 10:46
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः। समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते॥
yadṛcchā-lābha-santuṣṭo dvandvātīto vimatsaraḥ samaḥ siddhāv asiddhau ca kṛtvāpi na nibadhyate
जो अपने आप प्राप्त होने वाले लाभ से संतुष्ट है, द्वंद्वों से अतीत है, मत्सर-रहित है, सिद्धि और असिद्धि में समभाव रखता है — वह कर्म करते हुए भी बंधता नहीं है।
🧘
मोक्ष परायण मुनि का स्वरूप
यतेन्द्रिय मुनि की विशेषताएं और मुक्ति का स्वरूप
▶ देखें (11:28) ▶ Watch (11:28)
सद्गुरुदेव गीता के श्लोक द्वारा समझाते हैं कि जिसकी इंद्रियां, मन और बुद्धि संयमित है, जो दृश्यमान जागतिक वस्तु-पदार्थ के प्रति आसक्ति-रहित है — वही मुनि है। मुनि का अर्थ है मननशील — हर समय भगवत् चिंतन में तल्लीन, और किसी विषय-वस्तु के प्रति हृदय में आग्रह नहीं। दुनिया से कोई लेना-देना नहीं, मगन रहना भगवत् चिंतन में। मोक्ष परायण अर्थात हरि-भक्ति ही एकमात्र जीवन का उद्देश्य, राधा-नंद के चरणकमल में शुद्ध भक्ति प्राप्ति ही लक्ष्य। विगत-इच्छा — मन में देह-दैहिक वस्तु-पदार्थ की किंचित मात्र भी इच्छा नहीं। विगत-भय — वस्तु नष्ट होने का भय नहीं। विगत-क्रोध — क्रोध भी नष्ट हो गया। ऐसा साधक सदा के लिए मुक्त है।
🔗 साधक की उच्चतम स्थिति का वर्णन
मोक्ष परायण मुनि— भगवद् गीता Bhagavad Gita 5.28
▶ 11:28
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः। विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः॥
yatendriya-mano-buddhir munir mokṣa-parāyaṇaḥ vigatecchā-bhaya-krodho yaḥ sadā mukta eva saḥ
जिसकी इंद्रियां, मन और बुद्धि संयमित हैं, जो मोक्ष परायण मुनि है, जिसकी इच्छा, भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं — वह सदा मुक्त ही है।
📌 मुनि (मननशील) की विशेषताएं:
  • यतेन्द्रिय — इंद्रियां संयमित
  • यत-मनो-बुद्धि — मन और बुद्धि संयमित
  • मोक्ष परायण — हरि-भक्ति ही एकमात्र उद्देश्य
  • विगत-इच्छा — देह-दैहिक वस्तु की इच्छा नहीं
  • विगत-भय — वस्तु/शरीर नष्ट होने का भय नहीं
  • विगत-क्रोध — क्रोध का सर्वथा अभाव
💡
मुक्ति का वास्तविक स्वरूप
मुक्ति बाहर नहीं, हृदय में है — बंधन और मुक्ति का रहस्य
▶ देखें (13:54) ▶ Watch (13:54)
सद्गुरुदेव अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रकट करते हैं — मुक्ति कोई बाहर नहीं है, तुम्हारे भीतर है। अभी तुम मुक्त हो सकते हो। तुम्हारा बंधन तुम्हारी अज्ञानता है, तुम्हारा मोह-ममता ही बंधन है। वास्तव में कोई बंधन है नहीं — तुमने बंधन को स्वीकार कर लिया, यही स्वीकृति बंधन का कारण है। स्वीकृति हटा दो, अभी मुक्त हो। बंधन क्या है? देह-दैहिक, कृष्णेतर वस्तु में आसक्ति। मुक्ति क्या है? देह-दैहिक वस्तु-पदार्थ के प्रति अनाशक्ति — बस भगवत् चरण प्राप्ति ही एकमात्र उद्देश्य। जो इस उद्देश्य को लेकर जीवन धारण करता है, वह मुक्त है। मुक्ति के लिए कोई अलग मुक्ति-लोक बना नहीं गया जहां जाकर मुक्ति होगी — तुम्हारे हृदय में ही मुक्ति है, बंधन भी तुम्हारे हृदय में, भक्ति भी तुम्हारे हृदय में, आसक्ति भी तुम्हारे हृदय में, अंधकार भी यहां, रोशनी भी यहां, वैराग्य भी यहां, अनुराग भी यहां।
🔗 मुक्ति की आंतरिक प्रकृति का उद्घाटन
❓ प्रश्न: मुक्ति कहां है और कैसे प्राप्त होती है? ▶ 13:54
💡 उत्तर: सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि मुक्ति बाहर कहीं नहीं है, तुम्हारे हृदय में ही है। मरने के बाद मुक्ति नहीं होती, किसी साधन से मुक्ति नहीं होती। मुक्ति अंतःकरण की भावना है। बंधन है — देह-दैहिक कृष्णेतर वस्तु में आसक्ति। मुक्ति है — देह-दैहिक वस्तु-पदार्थ के प्रति अनाशक्ति, बस भगवत् चरण प्राप्ति ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य। जो इस उद्देश्य को लेकर जीता है, वह मुक्त है। मुक्ति-लोक कोई अलग स्थान नहीं है — सब कुछ हृदय में ही है।
⚖️ बंधन और मुक्ति
बंधन: देह-दैहिक, कृष्णेतर वस्तु में आसक्ति। बंधन को स्वीकार करना ही बंधन का कारण।
मुक्ति: देह-दैहिक वस्तु-पदार्थ के प्रति अनाशक्ति। भगवत् चरण प्राप्ति ही एकमात्र उद्देश्य।
📌 हृदय में विद्यमान द्वंद्व:
  • बंधन भी यहां — मुक्ति भी यहां
  • भक्ति भी यहां — आसक्ति भी यहां
  • अंधकार भी यहां — रोशनी भी यहां
  • वैराग्य भी यहां — अनुराग भी यहां
🚫
बाह्य एकांत की व्यर्थता
घर छोड़कर जंगल जाने से मुक्ति नहीं — मनोगुहा में प्रवेश आवश्यक
▶ देखें (15:16) ▶ Watch (15:16)
सद्गुरुदेव कहते हैं कि बाहर ढूंढने से कुछ नहीं मिलता। कुछ लोग सोचते हैं 'हम घर छोड़कर चले जाएंगे, खूब भजन करेंगे' — यह सबसे बड़ी मूर्खता है। कहां जाओगे? सब जगह माया है। शरीर को मिट्टी के नीचे गुहा में घुसाने से कुछ नहीं होता — मनरूपी गुहा में प्रवेश होना चाहिए, हृदय-रूप गुहा में अनुप्रवेश होना चाहिए, जहां जगत की किसी वस्तु-पदार्थ के प्रति किंचित आसक्ति नहीं, एकदम अंधकार। शरीर की गुहा में तो चींटी, कीड़े-मकोड़े मिट्टी के नीचे रहते हैं — क्या वे मुक्त हो गए? जंगल में शेर, भालू, कितने जंतु-जानवर रहते हैं — क्या वे मुक्त हैं? मुक्ति यहां है, तुम्हारे हृदय में। राधारानी के चरण छोड़कर किसी वस्तु-पदार्थ की किंचित मात्र स्पृहा नहीं — बस मान लो, मुक्ति तुम्हारे हाथ में है।
🔗 बाह्य त्याग की व्यर्थता का प्रकाशन
❌ न करें:
  • घर छोड़कर जंगल जाना मुक्ति का मार्ग नहीं
  • बाहर एकांत स्थान ढूंढने से भजन सिद्ध नहीं होता
🔍
भजन की मात्रा से नहीं, भाव से सिद्धि
संख्या-बहुल भजन बनाम हृदय की अनाशक्ति
▶ देखें (16:38) ▶ Watch (16:38)
सद्गुरुदेव एक अत्यंत महत्वपूर्ण विभेद स्पष्ट करते हैं — भजन कम हो, अच्छा है, लेकिन यदि तुम मुक्त हो (आसक्ति-रहित हो) तो भजन सफल है। कोई तीन लाख, चार लाख, पांच लाख नाम करता है, लेकिन मन विषय-कानन में रम रहा है — घर चाहिए, मकान चाहिए, यह चाहिए, वह चाहिए। साधु होकर भी कामना का अंत नहीं आता — एक आश्रम बनाना है, यह करना है, वह करना है, कितना कुछ करना है। एक भक्ति के लिए कोई चिंता नहीं, और बाहरी विषय-वस्तु प्राप्ति के लिए भीतर कितनी कामना-वासना! यह ढोंग-ढंग से काम नहीं चलेगा — अंतःकरण की वह स्थिति होनी चाहिए।
🔗 भजन की गुणवत्ता बनाम मात्रा
⚖️ भजन का मूल्यांकन
संख्या-प्रधान भजन (अपूर्ण): तीन-चार-पांच लाख नाम जप, लेकिन मन विषय-कानन में रमण। साधु होकर भी कामना — आश्रम, प्रतिष्ठा, सुविधाएं।
भाव-प्रधान भजन (पूर्ण): कम भजन भी पर्याप्त यदि मन में कृष्णेतर वस्तु की आसक्ति नहीं। अंतःकरण में अनाशक्ति ही वास्तविक भजन।
🌀
माया का वास्तविक स्थान
माया बाहर नहीं, मन में है — भगवन्मय दृष्टि का रहस्य
▶ देखें (17:30) ▶ Watch (17:30)
सद्गुरुदेव एक गहन सिद्धांत प्रकट करते हैं — माया बाहर नहीं है, तुम्हारे मन में ही माया है। मन ही माया का घर है। हमारे मन में माया है इसलिए हम जगत को माया देखते हैं। और जिसके हृदय में भगवत् भक्ति ही एकमात्र उद्देश्य है, वह भगवन्मय देखता है — सब में प्रभु हैं, सब उनका ही प्रकाश है। दृश्यमान जगत माया नहीं है, कामिनी-कांचन माया नहीं है — काया ही माया है। शरीर में आत्मबुद्धि ही माया का घर है — 'शरीर मैं हूं, शरीर-संबंधी वस्तु मेरी है' — यही देहात्मबुद्धि माया है।
🔗 माया के वास्तविक स्वरूप का उद्घाटन
❓ प्रश्न: माया कहां है और क्या है? ▶ 17:30
💡 उत्तर: सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि माया बाहर नहीं है — मन ही माया का घर है। दृश्यमान जगत माया नहीं, कामिनी-कांचन माया नहीं — काया ही माया है। शरीर में आत्मबुद्धि (देहात्मबुद्धि) — 'शरीर मैं हूं, शरीर-संबंधी वस्तु मेरी है' — यही माया का वास्तविक स्वरूप है। जिसके मन में माया है वह जगत को माया देखता है, जिसके हृदय में भक्ति है वह सब में भगवान देखता है।
⚖️ दो प्रकार की दृष्टि
माया-दृष्टि: मन में माया होने से जगत को माया देखना। देहात्मबुद्धि — शरीर को 'मैं' और शरीर-संबंधी वस्तु को 'मेरा' मानना।
भगवन्मय दृष्टि: हृदय में भक्ति होने से सब में प्रभु का दर्शन। सब उनका ही प्रकाश है — भगवन्मय जगत।
गुरु सेवा सर्वोत्तम साधना
खीरचोरा गोपीनाथ में गुरु सेवा और आशीर्वाद प्राप्ति
▶ देखें (18:15) ▶ Watch (18:15)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि ईश्वरपुरी तीव्र भजन करते-करते दक्षिण भारत गए और वहां गुरु माधवेंद्रपुरी का सानिध्य प्राप्त किया। सद्गुरुदेव समझाते हैं कि गुरु सेवा सर्वोत्तम साधना है — भगवत् प्राप्ति के उद्देश्य से जितनी भी साधन-भक्ति की क्रम है, उनमें सर्वोत्तम है गुरु सेवा, गुरु सानिध्य वास, गुरु प्रसन्नता संपादन। गुरु सेवा का अर्थ गुरु के पास रहना नहीं है — गुरु की प्रसन्नता ही गुरु सेवा है। गुरु को खुश करना है, बस गुरु खुश हैं तो और कुछ नहीं चाहिए। कैसे प्रसन्न करें — यह शिष्य को समझना है। यह जानकर ईश्वरपुरी खीरचोरा गोपीनाथ में गुरु के सानिध्य में रहने लगे। माधवेंद्रपुरी की उम्र हो गई थी, शरीर से सेवा-कार्य करने में असमर्थ थे, सेवक की आवश्यकता थी — ईश्वरपुरी ने खूब सेवा की।
🔗 गुरु सेवा की महत्ता का प्रतिपादन
❓ प्रश्न: गुरु सेवा का वास्तविक अर्थ क्या है? ▶ 18:46
💡 उत्तर: सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि गुरु सेवा का अर्थ गुरु के पास रहना नहीं है। गुरु की प्रसन्नता ही गुरु सेवा है — गुरु को खुश करना है, बस। गुरु खुश हैं तो और कुछ नहीं चाहिए। कैसे प्रसन्न करें, यह शिष्य को समझना है। गुरु सेवा भगवत् प्राप्ति के उद्देश्य से सर्वोत्तम साधना है।
✅ करें:
  • गुरु प्रसन्नता संपादन ही सर्वोत्तम साधना है
  • गुरु सानिध्य में रहकर सेवा करनी चाहिए
🎁
गुरु का आशीर्वाद — भगवत् सानिध्य
माधवेंद्रपुरी का आशीर्वाद — भगवान के प्रेम-सानिध्य की प्राप्ति
▶ देखें (20:09) ▶ Watch (20:09)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि ईश्वरपुरी की गुरु सेवा से माधवेंद्रपुरी अत्यंत प्रसन्न हो गए। उन्होंने ईश्वरपुरी को बुलाकर कहा — 'ईश्वर! तुमने हमारी बहुत सेवा की। मैं आशीर्वाद देता हूं — तुमको भगवत् सानिध्य मिल जाएगा, उनके प्रेम-सानिध्य मिल जाएगा। भगवान अवतार ले रहे हैं और उनका सानिध्य तुमको मिल जाएगा। तुम बहुत भाग्यशाली हो। मैं आशीर्वाद देता हूं — तुम ऐसे भगवत् प्रेम-सानिध्य प्राप्त करके कृतकृत्य हो जाओ।' फिर कहा — 'जाओ, बहुत दिन हमारी सेवा की, कुछ दिन तुम भ्रमण करो।' ऐसे त्यागी गुरु ज्यादा दिन शिष्य को अपने पास नहीं रखते।
🔗 गुरु सेवा का फल
⚠️
रामचंद्रपुरी — गुरु निंदक का पतन
रामचंद्रपुरी का दृष्टांत — गुरु को ज्ञान देने का दुष्परिणाम
▶ देखें (21:04) ▶ Watch (21:04)
सद्गुरुदेव एक चेतावनी के रूप में रामचंद्रपुरी का उदाहरण देते हैं। वे भी माधवेंद्रपुरी के शिष्य थे, गुरु सानिध्य में रहते थे, लेकिन साधु-संत की निंदा करते थे और गुरु को भी ज्ञान देने लगे — 'अरे! तुम ब्रह्म हो, चित्त ब्रह्म हो, ब्रह्म का चिंतन करो। कहां तुम कृष्ण-कृष्ण करते हो, उसमें रोते हो, ना पीटना — यह तो भावुकता है। ब्रह्मज्ञानी आत्मा कभी रोता है? आत्मा तो आनंदमय है।' माधवेंद्रपुरी ने कहा — 'अरे दुष्ट! मुझको गुरु के ऊपर ज्ञान देना शुरू कर दिया? मैं कृष्ण-विरह में रो रहा हूं और यह मुझको ब्रह्मज्ञान दे रहा है! जा दुष्ट! भ्रष्ट हो जा, निंदुक हो जा!' तो रामचंद्रपुरी भ्रष्ट हो गया, पतित हो गया। जबकि ईश्वरपुरी सीधे मार्ग पर चलते रहे।
🔗 गुरु सेवा में सावधानी की शिक्षा
❌ न करें:
  • गुरु को ज्ञान देना महापाप है
  • साधु-संत की निंदा करने से भ्रष्टता आती है
⚖️ दो गुरुभाइयों का मार्ग
ईश्वरपुरी: गुरु सेवा में समर्पित, विनम्र, गुरु आज्ञा का पालन। फल — भगवत् सानिध्य का आशीर्वाद।
रामचंद्रपुरी: गुरु को ज्ञान देना, साधु-निंदा, अहंकार। फल — गुरु का शाप, भ्रष्टता।
नवद्वीप में दिव्य मिलन
ईश्वरपुरी का नवद्वीप आगमन, अद्वैत प्रभु से मिलन और निमाई पंडित का प्रथम दर्शन
🌟
ध्यान में नवद्वीप का संकेत
ईश्वरपुरी को ध्यान में नवद्वीप का दिव्य संकेत
▶ देखें (22:27) ▶ Watch (22:27)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि गुरु आदेश पाकर ईश्वरपुरी भ्रमण पर निकल गए। मन में गुरु का उपदेश था कि भगवान मिलेंगे, अवतार लेंगे — लेकिन कहां? एकांत में गुरु कृपा का अवलंबन लेकर भगवत् चिंतन में तल्लीन होकर कठोर साधना करते-करते उनके भीतर प्रेम का प्रकाश होने लगा — अश्रु, कंप, पुलक, वैवर्ण्य, सर्वांग-स्तंभ, मूर्छा, प्रलय आदि अष्ट सात्विक विकार से विकारित होने लगे। ध्यान में बैठकर देखते हैं — जैसे नवद्वीप का संकेत हो रहा है। नवद्वीप नामक स्थान में कुछ अलौकिक घटना की संभावना दिखती है। जैसे मन कह रहा है — वहां कुछ प्रकाश उद्गार दिखता है, कोई ज्योतिपुंज जैसे गंगा किनारे प्रकाश। चलो, नवद्वीप चलो — यदि प्रभु का प्रकाश मिल जाए, गुरुदेव ने कहा था तो सत्य होना ही है।
🔗 ईश्वरपुरी की साधना-सिद्धि का प्रकाश
📌 अष्ट सात्विक विकार:
  • अश्रु (tears)
  • कंप (trembling)
  • पुलक (horripilation)
  • वैवर्ण्य (discolouration)
  • स्वेद (perspiration)
  • सर्वांग-स्तंभ (stunned paralysis)
  • मूर्छा (fainting)
  • प्रलय (devastation)
🙏
अद्वैत आचार्य प्रभु से मिलन
श्री अद्वैत आचार्य प्रभु के सत्संग में गुरुभाई का मिलन
▶ देखें (23:51) ▶ Watch (23:51)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि ईश्वरपुरी नवद्वीप पहुंचकर पूछते हैं — यहां बड़े वैष्णव संत कौन हैं? उत्तर मिला — श्री अद्वैत आचार्य प्रभु, जो साक्षात् सदाशिव और महाविष्णु के मिलित स्वरूप हैं। श्री अद्वैत प्रभु वहां सबको शिक्षा देते हैं, सत्संग करते हैं, भक्ति धर्म का शिक्षा देते हैं। उनके सानिध्य में मुकुंद, गदाधर पंडित आदि सब आकर परम तृप्त होते। उनके मुख से निस्सृत कथामृत-सुधा में सब निमग्न हो जाते। अद्भुत प्रेम-रस का वर्षण उनके मुख से होता। सद्गुरुदेव अपना अनुभव भी बताते हैं — जैसे हम भी ब्रज आकर राधाकुंड पहुंचे, किसी ने प्रभुपाद बाबा का नाम बताया, उनके दर्शन से ही मन में शांति मिली, जैसे जो वस्तु ढूंढ रहे थे वह मिल गई।
🔗 सद्गुरु की खोज
💕
गुरुभाइयों का प्रेममय मिलन
श्री अद्वैत प्रभु और ईश्वरपुरी का गुरुभाई के रूप में मिलन
▶ देखें (26:08) ▶ Watch (26:08)
सद्गुरुदेव वर्णन करते हैं कि श्री अद्वैत आचार्य प्रभु ने देखा — ये परम वैष्णव हैं, उनके शरीर में ऐसे लक्षण, क्रियाकलाप, चेहरा जो उनकी मानसिकता को इंगित करता है। अद्वैत प्रभु का सत्संग सुनकर ईश्वरपुरी की आंखों से अश्रुधारा बह रही है। मुकुंद ने एक हरि-भजन का सुर गाया, उनके कंठ से सुनते ही ईश्वरपुरी एकदम अश्रु-कंप-पुलक से भरकर लोटपोट खाने लगे — 'हां कृष्ण! हां कृष्ण!' करते हुए। उनके चेहरे में, दृष्टि में, भाव में, क्रिया में अद्भुत अलौकिक छटा। श्री अद्वैत प्रभु ने पहचान लिया — ऐसा प्रेम तो एकमात्र हमारे गुरु-घर में ही दिखता है! अश्रु-कंप-पुलक का प्रेम यह हमारे गुरु-घर का ही लगता है। आपके गुरु कौन हैं? ईश्वरपुरी ने कहा — हमारे गुरुदेव श्री माधवेंद्रपुरी। तो एकदम आत्मीयता से — 'अरे गुरुभाई! गुरुभाई!' कहकर छाती से लगा लिया। दोनों रो रहे हैं, दोनों कंप-पुलक से विकारित — गुरुभाइयों का प्रेममय मिलन।
🔗 गुरु-परंपरा का प्रेम-बंधन
👁️
नेत्र से साधक की पहचान
नेत्र से भजन और चरित्र की पहचान — संत-दर्शन का रहस्य
▶ देखें (26:29) ▶ Watch (26:29)
सद्गुरुदेव एक महत्वपूर्ण विषय पर प्रकाश डालते हैं — मनुष्य का मुख उसकी मानसिकता को इंगित करता है। चेहरे से पता चलता है कि यह सज्जन है या दुर्जन — साधारणतः एक आइडिया मिल ही जाता है। और सबसे प्रधान है नेत्र — नेत्र ही पहचान है। नेत्र देखकर कहा जा सकता है कि कितना भजन करता है। संत चेहरा नहीं देखते, नेत्र देखते हैं। नेत्र से पता चलता है — कितना भजन करता है, क्या भजन करता है। नेत्र को छुपा नहीं सकते। जितना भजन करेंगे, आंख उतनी छोटी हो जाएगी — सिद्ध महापुरुषों की आंखें बहुत छोटी हो जाती हैं, अंत में तो बुझ ही जाती है, खुलती ही नहीं। जो संदेहशील मनुष्य होता है, वह टेढ़ी नजर से देखता है — ऐसे व्यक्ति से मित्रता नहीं करनी चाहिए। साधु कभी टेढ़ी नजर से नहीं देखते, सीधा मुख घुमाकर देखते हैं, आंख फाड़कर नहीं देखते।
🔗 साधक की बाह्य पहचान
📌 नेत्र से पहचान के लक्षण:
  • जितना भजन, उतनी छोटी आंखें
  • सिद्ध महापुरुषों की आंखें अंत में बुझ जाती हैं
  • साधु टेढ़ी नजर से नहीं देखते
  • साधु आंख फाड़कर नहीं देखते
  • संदेहशील व्यक्ति टेढ़ी नजर से देखता है
निमाई पंडित का प्रथम परिचय
श्री अद्वैत प्रभु द्वारा निमाई पंडित का वर्णन
▶ देखें (32:48) ▶ Watch (32:48)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि कुछ दिन अद्वैत प्रभु के सानिध्य में रहने के बाद, एक दिन अद्वैत प्रभु ने कहा — यहां एक नवीन किशोर अवस्था के विद्वान नवद्वीप में आए हैं, नाम है निमाई पंडित। अद्भुत उनकी विद्वत्ता — किशोर अवस्था लेकिन उनकी विद्वत्ता का कोई ठिकाना नहीं। उनके सामने बड़े-बड़े पंडित भी फेल हो जाते हैं। लेकिन उनमें एक ऐसी आकर्षण शक्ति है कि जो एक बार उस किशोर को दर्शन करता है, वह उनके प्रेम में फंस जाता है। व्याकरण अध्ययन करते हैं, समस्त शास्त्र का अध्ययन नहीं किया, लेकिन विद्वत्ता के खान हैं — कोई भी शास्त्र-संबंध में आलोचना करो, समस्त शास्त्र कंठस्थ जैसे। कहां से अध्ययन किया, भगवान जाने! दिव्य तनु है — तुम छोटे गुरुभाई हो, एक बार जाकर देखना।
🔗 महाप्रभु के प्रथम परिचय की भूमिका
🌺
निमाई पंडित की दिव्य देहकांति
श्री चैतन्य महाप्रभु की अद्भुत शारीरिक सुंदरता का वर्णन
▶ देखें (33:49) ▶ Watch (33:49)
सद्गुरुदेव महाप्रभु के दिव्य स्वरूप का वर्णन करते हैं — सोलह-सत्रह वर्ष की उम्र, प्रथम यौवन की छटा। उन्नत वक्षस्थल, चंद्रकांति जैसी अंगप्रभा, आयत नेत्र जैसे आकारण नेत्र (कमलनयन), घुंघराले केश स्कंध तक लटकते हुए, गजस्कंध (हाथी के कंधे जैसे चौड़े कंधे), उन्नत वक्षस्थल, क्षीण कटि-देश (पतली कमर), विस्तृत नितंब प्रदेश। जैसे सुंदरता का मूर्तिमान विग्रह। हंसते हैं तो दंतपंक्ति जैसे मुक्ताहार (मोतियों की माला), ओष्ठाधर बिंबफल जैसे लाल। जैसे विधाता ने एक अद्भुत सृजन-शक्ति के द्वारा समस्त सृष्टि-कौशल समर्पण करके ऐसी सुंदर रचना की हो — मनुष्य शरीर में ऐसा अद्भुत स्वरूप तो देखने में आता नहीं है।
🔗 महाप्रभु के दिव्य स्वरूप का दर्शन
📌 महाप्रभु की दिव्य देहकांति के लक्षण:
  • चंद्रकांति जैसी अंगप्रभा
  • आयत (कमल-समान) नेत्र
  • घुंघराले केश स्कंध तक
  • गजस्कंध (चौड़े कंधे)
  • उन्नत वक्षस्थल, क्षीण कटि
  • दंतपंक्ति मुक्ताहार समान
  • ओष्ठाधर बिंबफल समान लाल
💫
ईश्वरपुरी और निमाई पंडित का प्रथम मिलन
ईश्वरपुरी और महाप्रभु का प्रथम दर्शन और अद्भुत अनुभव
▶ देखें (35:14) ▶ Watch (35:14)
सद्गुरुदेव वर्णन करते हैं कि ईश्वरपुरी निमाई पंडित को देखने गए। निमाई पंडित अपने विद्यार्थियों के साथ हंसते-खेलते आ रहे थे, लेकिन ईश्वरपुरी को देखते ही स्तंभित हो गए, एकदम गंभीर और शांत हो गए। ईश्वरपुरी भी देख रहे हैं — कौन है यह पुरुष? अद्भुत छटा, अद्भुत अंगकांति, अद्भुत सुंदरता और अद्भुत दैवी आकर्षण शक्ति जैसे अंतःकरण को खींचकर ले जा रही है। महाप्रभु भी साक्षात् पूर्ण ब्रह्म सनातन अखिल-रसामृत-सिंधु प्रेम-पुरुषोत्तम हैं — ईश्वरपुरी को देखकर पहचान लिया कि ये दिव्य पुरुष हैं जिनसे हमारा बहुत संबंध है। नजदीक आते ही ईश्वरपुरी के चरण स्पर्श करके प्रणाम किया। ईश्वरपुरी ने पूछा — क्या तुम्हारा नाम निमाई पंडित है? तब महाप्रभु ने छाती से लगा लिया।
🔗 गुरु-शिष्य का दिव्य मिलन
🌊
प्रेम-पुरुषोत्तम का अंग स्पर्श
महाप्रभु के अंग स्पर्श से ईश्वरपुरी का अद्भुत आनंद-अनुभव
▶ देखें (36:36) ▶ Watch (36:36)
सद्गुरुदेव वर्णन करते हैं कि साक्षात् पूर्ण ब्रह्म सनातन अखिल-रसामृत-सिंधु प्रेम-पुरुषोत्तम महाप्रभु के अंग स्पर्श से ईश्वरपुरी के रोम-रोम जैसे प्रेम में एकदम रोमांचित हो गए। एक अद्भुत आनंद-सिंधु में जैसे अंतःकरण प्रवाहित हो रहा है — एक अचिंत्य शक्ति जैसे किसी अचिंत्य आनंद-सिंधु में वे डूब रहे हैं। ऐसे प्रेम-पुरुषोत्तम का अंग स्पर्श पाकर जीवन में ऐसा आनंद, ऐसी शांति कभी मिली नहीं थी। बहुत समय तक स्तब्ध रह गए। ऐसा स्पर्श तो किसी मनुष्य से संभव नहीं — मनुष्य स्पर्श से ऐसा अद्भुत अचिंत्य आनंद का अनुभव संभव नहीं है। तब मन में अनुभव हुआ कि यह पुरुष साधारण नहीं, कोई मनुष्य नहीं है।
🔗 भगवान के स्पर्श का अनुभव
🏠
शची माता के गृह में सत्कार
महाप्रभु द्वारा ईश्वरपुरी का गृह में आदर-सत्कार
▶ देखें (37:41) ▶ Watch (37:41)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि महाप्रभु ने हाथ पकड़कर कहा — चलिए हमारे घर, आज अतिथि स्वीकार कीजिएगा। ईश्वरपुरी को लेकर आए और कहा — मां! देखो, तुम्हारे घर एक संत आए हैं, ऐसे संत लाया हूं! शची माता बाहर आकर देखती हैं — अद्भुत सुंदर दिव्य छटा, अंगकांति, ऐसा दिव्य प्रकाश, उनके चेहरा देखते ही मन जैसे विगलित हो रहा है। 'जिस जाके देखिले मुख आइसे कृष्ण नाम, ताह के जानियो तुम्ही वैष्णव प्रधान' — उनके दर्शन मात्र से मुख में नाम-गुणानुवाद जैसे स्वतः आ जाता है। शची माता नाम में डूब गईं। बड़े आदर से भीतर ले गए, कुछ दिन वहां रहे, खूब आदर-सत्कार मिला। मां-प्रभु उनको छोड़ना नहीं चाहते थे।
🔗 वैष्णव के दर्शन का प्रभाव
गया में दीक्षा प्रदान
महाप्रभु के स्वरूप प्रकाश का निर्णय और गया में ईश्वरपुरी द्वारा दीक्षा प्रदान
🌅
महाप्रभु का स्वरूप प्रकाश का निर्णय
योगमाया से आवृत महाप्रभु का स्वरूप प्रकाश का निर्णय
▶ देखें (44:56) ▶ Watch (44:56)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि महाप्रभु विद्या अध्ययन करके देखते हैं — अब अपने को प्रकाश करना है। इतने दिन तो भगवान अपनी योगमाया को आश्रय करके अपने प्रकाश को आवरित करके प्राकृत मनुष्यवत जैसे व्यवहार करते हुए सबको भ्रमित करके एक साधारण मनुष्य जैसे लीला कर रहे थे। गीता में भगवान कहते हैं — 'नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः' — मैं अपने को प्रकाश नहीं करता, योगमाया से समावृत रहता हूं। ऐसे ही महाप्रभु योगमाया-समावृत होकर नवद्वीप में एक पंडित बनकर, निमाई पंडित बनकर साधारण प्राकृत मनुष्यवत लीला कर रहे थे। अब देखते हैं — जगत-जीव के उद्धार के लिए अब हमको प्रकाश करना है। तो क्या करें? चलो, पहले पितृ-श्राद्ध के लिए गया जाना है, पिंड-दान करने के लिए। विष्णुपाद-पद्म में पिंड-दान करने से पितृगण का उद्धार होता है। यह बहाना लेकर मां से विदाई ली और कुछ भक्त-मंडली के साथ गया चले गए।
🔗 महाप्रभु के प्रकाश की पूर्व-भूमिका
भगवान का योगमाया-आवरण— भगवद् गीता Bhagavad Gita 7.25
▶ 45:16
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः। मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्॥
nāhaṁ prakāśaḥ sarvasya yoga-māyā-samāvṛtaḥ mūḍho 'yaṁ nābhijānāti loko mām ajam avyayam
मैं योगमाया से आवृत होने के कारण सबके लिए प्रकाशित नहीं होता। यह मूढ़ जगत मुझे अजन्मा और अविनाशी नहीं जानता।
📌 महाप्रभु की लौकिक छवि (प्रकाश से पूर्व):
  • निमाई पंडित — विद्वान किशोर
  • वैष्णवता से बहुत दूर की प्रतीति
  • घमंडी, दांभिक पंडित की छवि
  • भक्ति-भावना रहित दिखना
  • चतुरी बहुत, लेकिन आकर्षण शक्ति अद्भुत
🙏
गया में ईश्वरपुरी से पुनर्मिलन
गया तीर्थ में ईश्वरपुरी से महाप्रभु का पुनर्मिलन
▶ देखें (47:19) ▶ Watch (47:19)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि गया पहुंचकर विष्णुपाद-पद्म में पिंड-दान करने के बाद ही महाप्रभु के भीतर भावांतर आ गया। रास्ते में एक मकान किराए पर लिया, वहां कुछ दिन रहने का विचार था। रास्ते में ईश्वरपुरी से मिले! देखकर ही महाप्रभु एकदम चरणों में पड़ गए। ईश्वरपुरी ने पूछा — तुम कहां रहते हो? महाप्रभु ने बताया — फलाने जगह रहता हूं, किराए में। ईश्वरपुरी बोले — मैं आ रहा हूं, तुमसे मिलूंगा। महाप्रभु ने कहा — कब मिलेंगे? आप कहां रहते हैं? ईश्वरपुरी ने कहा — मैं यहीं भजन करता हूं। महाप्रभु ने कहा — बहुत अच्छा हुआ, मेरी तीर्थ-यात्रा सफल हो गई, आपके चरण-दर्शन हो गए। ऐसे वैष्णव-दर्शन से, ऐसे महापुरुष के दर्शन से हमारे तीर्थ आने का फल मिल गया, हमारे पितृगण ऐसे ही उद्धार हो जाएंगे।
🔗 तीर्थ में संत-दर्शन का महत्व
🍚
अद्भुत रसोई की लीला
जगत्लक्ष्मी द्वारा अद्भुत रसोई — भगवान जहां, वहां लक्ष्मी
▶ देखें (48:01) ▶ Watch (48:01)
सद्गुरुदेव एक अद्भुत लीला का वर्णन करते हैं। महाप्रभु रसोई बना रहे थे, तभी ईश्वरपुरी वहां आ गए। महाप्रभु ने कहा — आइए, प्रसाद पाइए। ईश्वरपुरी बोले — आपने तो अपने लिए रसोई की है, मुझे निमंत्रण कर रहे हैं तो आप भूखे रहेंगे। वे साधु हैं, अपने लिए कोई व्यवस्था नहीं है। महाप्रभु ने कहा — नहीं-नहीं, आप पाते रहिए, फिर अभी रसोई हो जाएगी। फिर खूब तृप्ति से उन्हें भोजन कराया। इतने में देखा — रसोई तैयार! ईश्वरपुरी आश्चर्यचकित — रसोई तो की नहीं, जितनी थी वह तो खिला दी, लेकिन पत्तों पर प्रसाद सजा हुआ है! भगवान जहां विद्यमान हैं, वहां जगत्लक्ष्मी स्वयं विराजमान आकर समस्त सेवा-कार्य निर्वाह करती हैं। ईश्वरपुरी जानते हैं — ये ईश्वर हैं!
🔗 महाप्रभु की ईश्वरता का संकेत
🔔
महाप्रभु को दशाक्षर मंत्र दीक्षा
ईश्वरपुरी द्वारा महाप्रभु को दशाक्षर मंत्र दीक्षा प्रदान
▶ देखें (49:44) ▶ Watch (49:44)
सद्गुरुदेव वर्णन करते हैं कि प्रसाद पाने के बाद महाप्रभु ने निवेदन किया — आपसे हमारी एक प्रार्थना है। ईश्वरपुरी बोले — मेरी जान देने के लिए तैयार हूं तुम्हें, क्या चाहिए? हमारे प्राण भी देने के लिए तैयार हूं। (ईश्वरपुरी जानते हैं कि ये साक्षात् भगवान हैं।) महाप्रभु ने कहा — आप हमको दीक्षा-मंत्र दो, हमको संसार-बंधन से मुक्त होने के लिए ऐसा मंत्र प्रदान करो जिससे कृष्ण-प्रेम में उन्मत्त होकर देह-दैहिक समस्त वस्तु-पदार्थ से मुक्त हो जाएं। ईश्वरपुरी बोले — तुमको हम कैसे मंत्र देंगे? इतनी शक्ति तो हमारी नहीं है। महाप्रभु बोले — आप हमको भ्रमित मत करो, आपको देना ही पड़ेगा। ईश्वरपुरी ने चिंतन किया — भगवान हैं, भगवान को क्या दूं? सब तो भगवान का है। लीला कर रहे हैं — चलो, हम अपने आप को समर्पण कर रहे हैं। मन में महाप्रभु के चरणों में अपने आप को समर्पण करके दशाक्षर मंत्र प्रदान किया।
🔗 गुरु-शिष्य परंपरा की स्थापना
❓ प्रश्न: महाप्रभु ने दीक्षा क्यों मांगी जबकि वे स्वयं भगवान हैं? ▶ 50:35
💡 उत्तर: सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि यह महाप्रभु की लीला है। भगवान होकर भी गुरु से दीक्षा लेकर उन्होंने गुरु-शिष्य परंपरा की महत्ता स्थापित की। ईश्वरपुरी जानते थे कि ये भगवान हैं, फिर भी महाप्रभु की इच्छा से उन्होंने अपने आप को समर्पण करके मंत्र प्रदान किया। वास्तव में गुरु-दक्षिणा ईश्वरपुरी को देनी थी, क्योंकि उन्होंने भगवान को शिष्य-रूप में स्वीकार किया।
💫
महाप्रभु में प्रेमोन्मत्त दशा का प्रकाश
दीक्षा के बाद महाप्रभु में तीव्र प्रेमोन्मत्त दशा का प्रकाश
▶ देखें (51:48) ▶ Watch (51:48)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि दीक्षा के तुरंत बाद निमाई पंडित के भीतर तीव्र व्याकुलता का प्रकाश हुआ — पूरा परिवर्तन आ गया। उन्मत्त प्राय होकर 'हां कृष्ण! हां कृष्ण!' करते हुए गंगा किनारे-किनारे चल रहे हैं — 'कहां वृंदावन? कहां वृंदावन? कहां वृंदावन?' शिष्य मंडली उन्हें पकड़कर ले आई — 'निमाई पंडित! तुम कहां भ्रमित हो रहे हो? तुम्हारी माता तुम्हारे लिए इंतजार कर रही हैं, रो रही हैं। तुम ऐसे उन्मत्त होकर वृंदावन जाओगे तो मां रोते-रोते शरीर त्याग देंगी।' बड़े कष्ट से, कभी रास्ते में भ्रमित होकर कहीं उल्टा चल देते, कभी इधर — समझा-बुझाकर शिष्यगण लाए।
🔗 प्रेमोन्माद का प्रकाश
स्वरूप प्रकाश और उपसंहार
महाप्रभु का सच्चिदानंद स्वरूप प्रकाश और ईश्वरपुरी का नित्य लीला प्रवेश
🏠
नवद्वीप में महाप्रभु की उन्मत्त दशा
घर आकर महाप्रभु की प्रेमोन्मत्त दशा — परिजनों की चिंता
▶ देखें (52:50) ▶ Watch (52:50)
सद्गुरुदेव वर्णन करते हैं कि घर में जब महाप्रभु आए तो उन्मत्त दशा में थे — अब निमाई पंडित निमाई पंडित न रहे, परम वैष्णव हो गए। 'हां कृष्ण! हां कृष्ण!' रोते हैं, कभी गाते हैं, कभी चिल्लाते हैं — ऐसी उन्मत्त दशा। शची माता देखती हैं — हमारे निमाई पंडित को क्या हो गया? यह भाव-दशा तो साधारण मनुष्य में देखने में आती नहीं, यह तो दिव्य भाव है! माता सोचती हैं — कहीं तीर्थ में कोई भूत-ग्रह इनके ऊपर सवार हो गया। माता सामने जाती हैं — शांत नहीं होते। विष्णुप्रिया माता को भेजती हैं — वे डरकर भाग आती हैं। गुनी (तांत्रिक) बुलाए गए — बंगाल में तंत्र-मंत्र प्रसिद्ध है, बड़े-बड़े तांत्रिक आए, मंत्र पढ़ा — 'तू कहां से आया है? भाग जा!' महाप्रभु तो देखकर हंसते रहे। कोई भूत जाने का नाम नहीं, तांत्रिक डरकर भाग गए।
🔗 प्रेमोन्माद की लौकिक व्याख्या का प्रयास
💕
श्रीवास पंडित द्वारा दिव्य भाव की पहचान
श्रीवास पंडित द्वारा महाप्रभु की प्रेमोन्मत्त दशा की पहचान
▶ देखें (54:53) ▶ Watch (54:53)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि एक दिन श्रीवास पंडित आए। महाप्रभु ने कहा — 'श्रीवास! क्या देखते हो? मां-मां कहते हैं मेरे बाई है, बाई!' श्रीवास पंडित ने देखा — 'अरे! यह तो दिव्य भाव है, उन्मत्त दशा है! यह तो शास्त्र में दिव्य भाव का लक्षण है, साधारण मनुष्य में होता नहीं!' उन्होंने कहा — 'निमाई पंडित! तुम्हारी जो बाई, ताहा हामी चाई! तुम्हारी यह बाई हमको कब होगी? ऐसी बाई हमको होनी चाहिए। यह बाई-रोग तुमको कहां से हुआ? यह बाई-रोग हमको कब होगा? यह तो दुर्लभ बाई-रोग है! अरे निमाई पंडित! तुम धन्य हो, धन्य हो, धन्य हो!' महाप्रभु बोले — 'तुमने हमको बचा लिया! तुम भी कहते अगर तुम्हारी बाई है तो हम गंगा में कूदकर शरीर समाप्त कर देते!' फिर कहा — 'तुम आ जाना हमारे यहां, फिर हम लोग आनंद-नित्य-कीर्तन करेंगे।'
🔗 भक्त द्वारा दिव्य भाव की पहचान
महाप्रभु का सच्चिदानंद स्वरूप प्रकाश
श्रीवास पंडित के गृह में महाप्रभु का सबको स्वरूप-दर्शन
▶ देखें (55:55) ▶ Watch (55:55)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि महाप्रभु श्रीवास पंडित के गृह गए और वहां अपने स्वरूप का प्रदर्शन किया — सबको बुला-बुलाकर दिखाया 'देखो मैं कौन हूं।' जिसकी जो उपासना, उसको वैसा ही स्वरूप दिखाया। मुरारी गुप्त राम के उपासक थे — उनको राम-दरबार दिखाया। नृसिंहानंद स्वामी नृसिंह के उपासक थे — उनको नृसिंह स्वरूप दिखाया। श्रीवास पंडित को चतुर्भुज स्वरूप दिखाया। ऐसे अपनी-अपनी उपासना अनुसार महाप्रभु ने बुलाओ-बुलाओ कर सबको अपना स्वरूप दिखाया — 'देखो मैं कौन हूं, मन में भ्रम नहीं रखना, संदेह नहीं रखना।' एक बार तो अष्टप्रहर तक महाप्रभु ने सच्चिदानंद स्वरूप का लीला-प्रदर्शन किया। एकमात्र श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु की लीला है जहां उन्होंने कभी मुख से नहीं कहा 'मैं भगवान हूं' — लेकिन सबको बुलाकर स्वरूप दिखाया।
🔗 महाप्रभु का ईश्वर-स्वरूप प्रकाश
📌 उपासना अनुसार स्वरूप-दर्शन:
  • मुरारी गुप्त (राम उपासक) — राम-दरबार
  • नृसिंहानंद स्वामी (नृसिंह उपासक) — नृसिंह स्वरूप
  • श्रीवास पंडित — चतुर्भुज स्वरूप
  • श्रीधर आदि को भी स्वरूप-दर्शन
🌸
माधवेंद्रपुरी और ईश्वरपुरी का तिरोभाव
माधवेंद्रपुरी का अंतिम श्लोक और ईश्वरपुरी का नित्य लीला प्रवेश
▶ देखें (57:27) ▶ Watch (57:27)
सद्गुरुदेव उपसंहार करते हैं — महाप्रभु नवद्वीप लीला समाप्त करके संन्यास लेकर सीधे जगन्नाथपुरी चले गए। इधर माधवेंद्रपुरी अपनी नित्य लीला में प्रवेश कर गए। जाते समय उन्होंने एक श्लोक उच्चारण करते-करते शरीर त्याग किया — 'अयि दीन-दयार्द्र नाथ हे मथुरानाथ कदावलोक्यसे, हृदयं त्वदलोक-कातरं दयित भ्राम्यति किं करोम्यहम्।' यह श्लोक कृष्ण-प्रेम का उपदेश है, कृष्ण-विरह-राधा-भाव विषयक। इसी ने जगत में प्रेमांकुर का बीज बोया — 'सेई प्रेमांकुर बृक्ष चैतन्य ठाकुर।' यह खबर पाते ही ईश्वरपुरी भी एकदम उन्मत्त होकर 'हां कृष्ण चैतन्य! हां कृष्ण चैतन्य!' बोलते हुए गुरु-चिंतन करते-करते कहां चले गए, कहां शरीर त्यागा — इसका कोई प्रमाण नहीं है। वे नित्य लीला में प्रवेश कर गए — महाप्रभु के गुरु-रूप में प्रकट होकर।
🔗 गुरु-परंपरा का उपसंहार
माधवेंद्रपुरी का अंतिम श्लोक— Padyavali Padyavali 334 (Rupa Goswami)
▶ 57:58
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
अयि दीनदयार्द्रनाथ हे मथुरानाथ कदावलोक्यसे। हृदयं त्वदलोककातरं दयित भ्राम्यति किं करोम्यहम्॥
ayi dīna-dayārdra-nātha he mathurā-nātha kadāvalokya-se hṛdayaṁ tvad-aloka-kātaraṁ dayita bhrāmyati kiṁ karomy aham
हे दीनों पर दया करने वाले नाथ! हे मथुरानाथ! कब दर्शन दोगे? हे दयित! तुम्हारे दर्शन के बिना व्याकुल हृदय भ्रमित हो रहा है — मैं क्या करूं?
🙏
सत्संग का उपसंहार
भक्त-कथामृत-सुधा में अवगाहन — सत्संग का उपसंहार
▶ देखें (59:22) ▶ Watch (59:22)
सद्गुरुदेव उपसंहार करते हैं — यह है ईश्वरपुरी पाद का संक्षिप्त जीवन-चरित्र लीला। हमारा अनुप्रवेश इससे आगे नहीं है, जहां तक उनके पावन जीवन-चरित्र कथा संबंध में किंचित दिग्दर्शन करके अपनी वाणी को पवित्र तथा हृदय को पवित्र करने का प्रयत्न किया है। आज की कथा विश्राम। फिर कल नई लीला लेकर, राधारानी की कृपा से जैसे स्फुरण करेगा वैसे ही आस्वादन करेंगे। भक्त-कथामृत-सुधा — उस सुधा-सिंधु में अवगाहन करेंगे, हरि-कथामृत-सुधा में निमग्न हो जाएंगे, अपने अंतःकरण को पवित्र करने के लिए। जय जय श्री राधे श्याम, नीताई गौर हरी बोल।
🔗 सत्संग की समाप्ति
🧠 आत्म-चिंतन (Self Assessment)
इस सत्संग से आपने क्या सीखा? (Test your understanding)
Core Essence
श्री ईश्वरपुरी पाद के जीवन से भगवत् प्राप्ति का मार्ग क्या सिखाता है?
उत्तर: दैवी संस्कारों से युक्त जन्म, सद्गुरु से दीक्षा प्राप्ति, तीव्र वैराग्य (जगत के प्रति अनाशक्ति), गुरु सेवा द्वारा कृपा प्राप्ति — यही भगवत् प्राप्ति का क्रम है। मुक्ति बाहर नहीं, हृदय में है। जब हृदय में भगवत् चरण छोड़कर किसी वस्तु की आकांक्षा नहीं रहती, तभी वास्तविक मुक्ति है।
Multiple Choice
🔢 ईश्वरपुरी पाद के गुरु कौन थे?
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
ईश्वरपुरी पाद ने श्री माधवेंद्रपुरी से दीक्षा प्राप्त की और उनकी अनन्य सेवा करके उनका विशेष आशीर्वाद प्राप्त किया।
Multiple Choice
🔢 ईश्वरपुरी पाद का जन्म कहां हुआ था?
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
ईश्वरपुरी पाद का जन्म बंगाल के हल्लीशहर (जिसे कुमारहट्ट भी कहा जाता है) में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।
Multiple Choice
🔢 सद्गुरुदेव के अनुसार 'वैराग्य' का वास्तविक अर्थ क्या है?
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि केवल घर छोड़ने या वेश बदलने से वैराग्य नहीं होता। 'वि' (विशेष) रूप से 'राग' (अनुराग) का अभाव ही वैराग्य है, अर्थात भोग्य पदार्थों में आसक्ति न होना।
Multiple Choice
🔢 ईश्वरपुरी पाद ने महाप्रभु को दीक्षा मंत्र कहां प्रदान किया?
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
महाप्रभु पितृ-कार्य के लिए गया गए थे, वहीं ईश्वरपुरी पाद से मिलन हुआ और महाप्रभु ने उनसे दशाक्षर मंत्र की दीक्षा ग्रहण की।
Multiple Choice
🔢 साधु की पहचान का मुख्य लक्षण क्या बताया गया है?
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
सद्गुरुदेव बताते हैं कि नेत्र ही पहचान है। जितना भजन होगा, नेत्रों में उतनी गंभीरता और विकार-शून्यता होगी। साधु कभी टेढ़ी नजर से नहीं देखते।
स्पष्टीकरण (Clarification)

यह सारांश AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग गुरु सेवा में करके तैयार किया गया है। इसमें त्रुटि हो सकती है। कृपया पूर्ण लाभ के लिए पूरा वीडियो अवश्य देखें।

Comments

Replying to a comment. Cancel
100%

Select Language

Home
Widgets
Top
Text
Lang