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श्री भगवत चर्चा
14 February 2026

श्री ईश्वरपुरी पाद का दिव्य जीवन चरित — गुरु सेवा, वैराग्य, एवं महाप्रभु दीक्षा लीला

श्री ईश्वरपुरी पाद का दिव्य जीवन चरित — गुरु सेवा, वैराग्य, एवं महाप्रभु दीक्षा लीला

Sri Sri 108 Sri Vinod Baba ji Maharaj
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हमारे प्रिय सद्गुरुदेव बताते हैं:
" मुक्ति तुम्हारा हाथ में है, तुम्हारे भीतर है मुक्ति, बंधन भी तुम्हारे भीतर है। बाहर कुछ नहीं है। "

" गुरु सेवा ही उत्तम भजन है। गुरु सेवा सर्वोत्तम साधना है। "

" माया बाहर नहीं है, तुम्हारे मन में ही माया है। मन ही माया का घर है। "
श्री ईश्वरपुरी पाद (25)वैराग्य (12)गुरु सेवा (10)श्री माधवेन्द्रपुरी पाद (8)मुक्ति (10)अनाशक्ति (8)दैवी सम्पत्ति (5)महाप्रभु (18)श्री अद्वैत आचार्य प्रभु (7)एकांत भजन (5)द्वन्द्वातीत (4)दीक्षा (6)नवद्वीप (6)उन्मत्त दशा (4)अष्ट सात्विक विकार (2)
🔍 सत्संग सार (Executive Summary)

सद्गुरुदेव इस सत्संग में श्री ईश्वरपुरी पाद के सम्पूर्ण जीवन चरित का वर्णन करते हैं। पूर्वजन्म अर्जित दैवी सम्पत्ति लेकर जन्म लेने वाले श्री ईश्वरपुरी पाद ने श्री माधवेन्द्रपुरी पाद से दीक्षा प्राप्त कर तीव्र वैराग्य धारण किया और कठोर एकांत साधना की। गुरु सेवा को सर्वोत्तम साधना बताते हुए सद्गुरुदेव वैराग्य, मुक्ति एवं बन्धन की गहन दार्शनिक विवेचना करते हैं कि मुक्ति हृदय में ही है, बाहर नहीं। तत्पश्चात् श्री ईश्वरपुरी पाद का नवद्वीप आगमन, गुरुभाई श्री अद्वैत आचार्य प्रभु से मिलन एवं निमाई पंडित के दिव्य स्वरूप का प्रथम दर्शन वर्णित है। गया धाम में महाप्रभु को दशाक्षर मंत्र दीक्षा प्रदान करने के पश्चात् महाप्रभु का भावान्तर, उन्मत्त दशा, श्रीवास पंडित द्वारा दिव्य भाव की पहचान एवं सबको स्वरूप प्रदर्शन का वर्णन है। अन्त में श्री माधवेन्द्रपुरी पाद के तिरोभाव एवं श्री ईश्वरपुरी पाद के नित्य लीला प्रवेश का उल्लेख करते हुए सत्संग का उपसंहार किया गया है।

🧱 ज्ञान प्रवाह
graph TD subgraph SG1["प्रस्तावना"] A["महाप्रभु के पार्षदों की लीला तल्लीनता"] end subgraph SG2["जन्म एवं दैवी संस्कार"] B["श्री ईश्वरपुरी पाद का जन्म"] --> C["दैवी शक्ति सम्पन्न - गीता 16.3"] C --> D["पूर्वजन्म सुकृति - गीता 7.28"] end subgraph SG3["गुरु दीक्षा एवं वैराग्य"] E["श्री माधवेन्द्रपुरी से दीक्षा"] --> F["वैराग्य = अनाशक्ति"] F --> G["नित्य संन्यासी - गीता 5.3"] G --> H["द्वन्द्वातीत - अहंकार परीक्षण"] end subgraph SG4["साधना एवं दर्शन"] I["एकांत कठोर साधना - गीता 4.22"] --> J["मुनि लक्षण - गीता 5.27-28"] J --> K["मुक्ति हृदय में है बाहर नहीं"] K --> L["माया मन में है जगत में नहीं"] end subgraph SG5["गुरु सेवा - सर्वोत्तम साधना"] M["खीरचोरा गोपीनाथ में गुरु सेवा"] --> N["श्री माधवेन्द्रपुरी का आशीर्वाद"] N --> O["रामचन्द्रपुरी - गुरु निन्दक का पतन"] end subgraph SG6["नवद्वीप आगमन"] P["अष्ट सात्विक विकार - प्रेम प्रकाशना"] --> Q["नवद्वीप का संकेत"] Q --> R["श्री अद्वैत आचार्य प्रभु से मिलन"] R --> S["गुरुभाई प्रेम"] end subgraph SG7["निमाई पंडित से भेंट"] T["श्री अद्वैत प्रभु का वर्णन"] --> U["निमाई पंडित का दिव्य स्वरूप"] U --> V["प्रथम भेंट - दिव्य अंगस्पर्श"] V --> W["शची माता का स्वागत"] end subgraph SG8["गया धाम - दीक्षा लीला"] X["महाप्रभु गया गमन"] --> Y["ईश्वरपुरी से भेंट"] Y --> Z["दशाक्षर मंत्र दीक्षा"] Z --> AA["महाप्रभु का भावान्तर"] end subgraph SG9["स्वरूप प्रकाश"] AB["उन्मत्त दशा"] --> AC["श्रीवास पंडित - दिव्य भाव पहचान"] AC --> AD["सबको स्वरूप प्रदर्शन"] end subgraph SG10["उपसंहार"] AE["श्री माधवेन्द्रपुरी का तिरोभाव"] --> AF["श्री ईश्वरपुरी पाद का नित्य लीला प्रवेश"] end A --> B D --> E H --> I L --> M O --> P S --> T W --> X AA --> AB AD --> AE
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📌 विषय सूची (Table of Contents)

📖 आज की शिक्षाएं 📖 आज की विस्तृत शिक्षाएं

प्रस्तावना एवं श्री ईश्वरपुरी पाद का जन्म — दैवी सम्पत्ति का प्रकाश
श्री ईश्वरपुरी पाद के जन्म, पूर्वजन्म अर्जित दैवी गुण सम्पत्ति एवं श्री माधवेन्द्रपुरी पाद से प्रथम भेंट का वर्णन
🙏
महाप्रभु के पार्षदों की लीला तल्लीनता
महाप्रभु के प्रकट काल में पार्षदों की लीला तन्मयता एवं अप्रकट काल की वेदना
▶ देखें (0:00) ▶ Watch (0:00)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि महाप्रभु के आविर्भाव काल में जितने भी पार्षद आए थे, वे सभी अपनी लीला में ऐसी तल्लीनता एवं तन्मयता के साथ आनन्द में निमग्न रहते थे। परन्तु महाप्रभु के अप्रकट काल में सभी पार्षद ऐसे अंतर्मुख हो गए जैसे संवर्णन (पुनर्मिलन) के समय की प्रतीक्षा में समय व्यतीत कर रहे हों। सद्गुरुदेव समझाते हैं कि महाप्रभु के प्रकट काल के पार्षदों ने कैसी-कैसी लीला प्रदर्शन की, इसका कुछ अनुमान सत्प्रमाणों से — श्री स्वरूप दामोदर के कर्चा (नोट्स) आदि से तथा चैतन्य चरित आदि ग्रन्थों से प्राप्त होता है। आज के सत्संग में सद्गुरुदेव श्री ईश्वरपुरी पाद के जीवन चरित का आस्वादन कराते हैं।
🔗 सत्संग का मंगलाचरण — महाप्रभु के पार्षदों की लीला का प्रसंग प्रारम्भ
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श्री ईश्वरपुरी पाद का जन्म — दैवी शक्ति सम्पन्न
श्री ईश्वरपुरी पाद का जन्म — पूर्वजन्म अर्जित दैवी गुण सम्पत्ति एवं पारदर्शी शास्त्र ज्ञान
▶ देखें (1:25) ▶ Watch (1:25)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि श्री ईश्वरपुरी पाद पूर्वजन्म अर्जित सुकृति से प्राप्त अशेष विशेष गुण सम्पन्न संस्कार लेकर जन्म लिए हैं। बचपन में ही अत्यन्त धीशक्ति सम्पन्न थे। उनके पिता का नाम श्री श्यामसुन्दर आचार्य जी था, जो स्वयं परम पंडित थे। बचपन से ही जब से ज्ञान हुआ, अल्प समय में ही समस्त शास्त्रों का अध्ययन करके परम पारदर्शिता प्राप्त कर ली। सद्गुरुदेव समझाते हैं कि दैवी शक्ति सम्पन्न महापुरुषों का जीवन शैली, क्रिया-कर्म सब कुछ अलग होता है — उनके अंदर अभय, सत्य, शौच, ज्ञान, दान, दम, यज्ञ, अहिंसा, त्याग, शान्ति आदि समस्त दैवी गुण प्रकाशित होते हैं। सद्गुरुदेव इसी प्रसंग में भगवद्गीता का श्लोक उच्चारित करते हैं।
🔗 दैवी सम्पत्ति के गुणों का प्रकाश श्री ईश्वरपुरी पाद के जीवन में कैसे दिखा
दैवी सम्पत्ति के लक्षण— भगवद् गीता Bhagavad Gita 16.1-3
▶ 2:51
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः। दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥ अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्। दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्॥ तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता। भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत॥
abhayaṁ sattva-saṁśuddhir jñāna-yoga-vyavasthitiḥ | dānaṁ damaś ca yajñaś ca svādhyāyas tapa ārjavam || ahiṁsā satyam akrodhas tyāgaḥ śāntir apaiśunam | dayā bhūteṣv aloluptvaṁ mārdavaṁ hrīr acāpalam || tejaḥ kṣamā dhṛtiḥ śaucam adroho nāti-mānitā | bhavanti sampadaṁ daivīm abhijātasya bhārata ||
हे भारत! अभय, अन्तःकरण की शुद्धि, ज्ञानयोग में स्थिति, दान, इन्द्रिय-दमन, यज्ञ, स्वाध्याय, तप, सरलता, अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, शान्ति, चुगली न करना, भूतों में दया, अलोलुपता, कोमलता, लज्जा, अचंचलता, तेज, क्षमा, धैर्य, शौच, अद्रोह, अभिमानहीनता — ये सब दैवी सम्पत्ति वाले पुरुष के लक्षण हैं।
📌 श्री ईश्वरपुरी पाद का परिचय:
  • पिता — श्री श्यामसुन्दर आचार्य जी (परम पंडित)
  • पूर्वजन्म अर्जित दैवी शक्ति सम्पन्न
  • बचपन में ही अल्प समय में समस्त शास्त्र अध्ययन
  • परम पारदर्शिता प्राप्त
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दैवी गुण सम्पन्न साधक ही मंगल साधन कर सकते हैं
दैवी गुण सम्पन्न साधक का विशेष सामर्थ्य — पूर्वजन्म सुकृति से पापमुक्ति
▶ देखें (3:12) ▶ Watch (3:12)
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि दैवी गुण सम्पत्ति का प्रकाश सब में दिखता नहीं है। ऐसे दैवी शक्ति सम्पन्न साधक ही अपना एवं जगत का परम मंगल साधन कर सकते हैं। साधारण मनुष्य द्वारा ऐसा परम मंगल साधन करना सम्भव नहीं है — चेष्टा करके भी यह सम्भव नहीं। गीता कहती है कि जो पूर्वजन्म के संस्कार लेकर आते हैं, उनके पाप (काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, मोह, तन्द्रा आदि अवगुण) पूर्वजन्म की सुकृति द्वारा नष्ट हो जाते हैं। तब वे दृढ़ व्रत धारण करके भगवद् भजन में समर्थ होते हैं। सद्गुरुदेव इसी सिद्धान्त की पुष्टि हेतु गीता के श्लोक का उच्चारण करते हैं।
🔗 दैवी सम्पत्ति से ही भजन में दृढ़ता आती है — श्री ईश्वरपुरी पाद इसके प्रत्यक्ष उदाहरण
पुण्यकर्म से पापमुक्ति एवं दृढ़ भजन— भगवद् गीता Bhagavad Gita 7.28
▶ 3:55
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्। ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः॥
yeṣāṁ tv anta-gataṁ pāpaṁ janānāṁ puṇya-karmaṇām | te dvandva-moha-nirmuktā bhajante māṁ dṛḍha-vratāḥ ||
जिन पुण्यकर्मी पुरुषों का पाप नष्ट हो गया है, वे द्वन्द्व-मोह से मुक्त होकर दृढ़ व्रत से मेरा भजन करते हैं।
📌 पापमुक्ति के अवगुण:
  • काम
  • क्रोध
  • लोभ
  • ईर्ष्या
  • मोह
  • तन्द्रा
  • अहंकार
वैराग्य का स्वरूप — अनाशक्ति, नित्य संन्यास एवं द्वन्द्वातीत अवस्था
वैराग्य की सही परिभाषा, नित्य संन्यासी के लक्षण एवं अहंकार परीक्षण की शिक्षा
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श्री माधवेन्द्रपुरी से दीक्षा एवं तीव्र वैराग्य का प्रकाश
श्री माधवेन्द्रपुरी पाद से दीक्षा प्राप्ति — वैराग्य का सच्चा स्वरूप 'अनाशक्ति'
▶ देखें (5:04) ▶ Watch (5:04)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि श्री ईश्वरपुरी पाद के जीवन में समस्त सद्गुणों का समाहार दिखता है। जब श्री माधवेन्द्रपुरी पाद भ्रमण करते-करते बंगाल में हलीशहर में पधारे, तो श्री ईश्वरपुरी पाद को देखकर बड़े प्रसन्न हुए। दो-चार दिन उनके घर में रहकर उनके सानिध्य प्राप्त करके श्री ईश्वरपुरी पाद के भीतर तीव्र वैराग्य प्रकट हो गया। सद्गुरुदेव वैराग्य की वास्तविक परिभाषा समझाते हैं — वैराग्य का अर्थ है अनाशक्ति। 'वै' नावाचक शब्द है, 'राग' का अर्थ अनुराग — अर्थात् भोग्य पदार्थ के प्रति अनुराग का अभाव। वैराग्य का अर्थ घर छोड़कर जंगल जाना नहीं, बल्कि देह-दैहिक भोग्य पदार्थ के प्रति अनाशक्ति का नाम वैराग्य है। यह पूर्वजन्म अर्जित संस्कार है। जिसके मन में भगवत् चरण प्राप्ति ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य हो और दृश्यमान कोई भी वस्तु पदार्थ के प्रति आसक्ति रहित जो अन्तःकरण वृत्ति हो — वही सच्चा वैरागी है।
🔗 श्री ईश्वरपुरी पाद के जीवन में दीक्षा के पश्चात् प्रकट हुई तीव्र अनाशक्ति वैराग्य का प्रत्यक्ष स्वरूप
❓ प्रश्न: वैराग्य का सच्चा अर्थ क्या है? ▶ 5:35
💡 उत्तर: सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि वैराग्य का अर्थ घर छोड़कर जंगल जाना नहीं है। वैराग्य अनाशक्ति का नाम है — देह, दैहिक सम्बन्ध एवं भोग्य पदार्थ के प्रति जो आसक्ति का अभाव, वही सच्चा वैराग्य है। वेश परिवर्तन (बाह्य वेशभूषा बदलना) तो एक बाह्य लक्षण मात्र है, मूल वैराग्य तो अन्तःकरण की अनाशक्ति है। घर में रहकर भी यदि सांसारिक वस्तु पदार्थ के प्रति कोई आसक्ति नहीं तो वही सच्चा वैरागी है।
⚖️ वैराग्य — बाह्य बनाम आन्तरिक
बाह्य वैराग्य (वेश परिवर्तन): घर छोड़ना, जंगल जाना, वेशभूषा बदलना — यह केवल बाह्य लक्षण है, मूल वैराग्य नहीं
आन्तरिक वैराग्य (अनाशक्ति): देह-दैहिक भोग्य पदार्थ के प्रति अन्तःकरण में आसक्ति का अभाव — यही सच्चा वैराग्य
⚖️
नित्य संन्यासी एवं द्वन्द्वातीत — गीता का सिद्धान्त
नित्य संन्यासी कौन? — द्वन्द्वातीत अवस्था एवं अहंकार की परीक्षा
▶ देखें (7:08) ▶ Watch (7:08)
सद्गुरुदेव गीता के श्लोक द्वारा नित्य संन्यासी की परिभाषा समझाते हैं। भगवान अर्जुन से कहते हैं कि उसको नित्य संन्यासी जानो जो न किसी से द्वेष करता है और न किसी से कांक्षा रखता है — जिसके मन में भगवत् चरण छोड़कर दृश्यमान कोई भी वस्तु पदार्थ के प्रति प्राप्ति की आकांक्षा नहीं, वही संन्यासी है — चाहे वह धोती पहने या कुर्ता, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। सद्गुरुदेव 'द्वन्द्व' की व्याख्या करते हैं — हर्ष-विषाद, मान-अपमान, शीत-उष्ण, सुख-दुख, लाभ-हानि — ये सब द्वन्द्व हैं जिनका सामना प्रत्येक प्राणी को करना पड़ता है। जिसके जीवन में भगवत् प्राप्ति ही एकमात्र उद्देश्य हो गया, वह इन द्वन्द्वों से विचलित नहीं होता। सद्गुरुदेव अहंकार की परीक्षा का उपाय भी बताते हैं — यदि सम्मान में अत्यधिक हर्ष होता है और अपमान में अत्यधिक कष्ट, तो समझ लो अभी अहंकार विद्यमान है।
🔗 नित्य संन्यासी का यह लक्षण श्री ईश्वरपुरी पाद में पूर्णत: विद्यमान था
नित्य संन्यासी का लक्षण— भगवद् गीता Bhagavad Gita 5.3
▶ 7:08
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति। निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥
jñeyaḥ sa nitya-sannyāsī yo na dveṣṭi na kāṅkṣati | nirdvandvo hi mahā-bāho sukhaṁ bandhāt pramucyate ||
हे महाबाहो! जो न किसी से द्वेष करता है और न किसी की कामना करता है, उसको नित्य संन्यासी जानना चाहिए। क्योंकि द्वन्द्वों से रहित पुरुष सुखपूर्वक संसार बन्धन से मुक्त हो जाता है।
❓ प्रश्न: अपने अन्दर अहंकार कितना है, यह कैसे जाना जाए? ▶ 9:02
💡 उत्तर: सद्गुरुदेव एक सरल परीक्षण बताते हैं — यदि किसी के सम्मान करने पर अत्यधिक हर्ष एवं आनन्द होता है, और किसी के अपमान या निन्दा करने पर अत्यधिक कष्ट महसूस होता है, तो समझ लेना चाहिए कि अहंकार अभी विद्यमान है। मान और अपमान दोनों झूठे हैं — ये अहंकार से उत्पन्न होते हैं। इसलिए अपने अन्तःकरण का परीक्षण करते रहना चाहिए कि हमारे अन्दर कितना अहंकार शेष है।
📌 द्वन्द्व (जीवन के विपरीत युग्म):
  • हर्ष — विषाद
  • मान — अपमान
  • शीत — उष्ण
  • सुख — दुख
  • लाभ — हानि
कठोर साधना एवं मुक्ति का दर्शन — हृदयस्थ मुक्ति एवं माया का स्वरूप
गीता के श्लोकों द्वारा साधक के लक्षण, मुक्ति एवं बन्धन हृदय में ही है — इस गहन सिद्धान्त का प्रतिपादन
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श्री ईश्वरपुरी पाद की एकांत साधना एवं यदृच्छालाभ संतुष्ट की स्थिति
दीक्षा प्राप्ति के पश्चात् कठोर तपस्या — यदृच्छालाभ संतुष्ट, द्वन्द्वातीत, विमत्सर
▶ देखें (9:44) ▶ Watch (9:44)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि श्री ईश्वरपुरी पाद जन्म से ही वैरागी थे — पूर्वजन्म की सुकृतिजात अनाशक्ति लेकर जन्म लिए। श्री माधवेन्द्रपुरी पाद से दीक्षा प्राप्त करने के बाद वे एकला ही चलते थे, किसी को साथ नहीं रखते थे। गुरु दीक्षा पाने के बाद उनके भीतर तीव्र वैराग्य, संसार की समस्त वस्तु पदार्थ के प्रति तीव्र अनाशक्ति प्रकट हो गई और वे संसार छोड़कर सीधा चल दिए। समस्त तीर्थ भ्रमण करते हुए वन-वनान्तर जाकर कठोर तपस्या की। सद्गुरुदेव गीता के श्लोक द्वारा ऐसे साधक के लक्षण बताते हैं — जो जैसा भी मिल जाए उसी में सन्तुष्ट, सिद्धि हुई या नहीं हुई इसमें कोई फर्क नहीं, ऐसे समचित्त पुरुष के लिए कोई बन्धन नहीं।
🔗 श्री ईश्वरपुरी पाद की एकांत साधना गीता 4.22 के यदृच्छालाभ सन्तुष्ट लक्षण का प्रत्यक्ष उदाहरण
यदृच्छालाभ सन्तुष्ट — कर्मबन्धन से मुक्ति— भगवद् गीता Bhagavad Gita 4.22
▶ 10:36
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः। समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते॥
yadṛcchā-lābha-santuṣṭo dvandvātīto vimatsaraḥ | samaḥ siddhāv asiddhau ca kṛtvāpi na nibadhyate ||
जो बिना इच्छा के जो कुछ प्राप्त हो उसमें सन्तुष्ट है, द्वन्द्वों से अतीत है, मत्सररहित है, और सिद्धि-असिद्धि में सम है — वह कर्म करता हुआ भी बँधता नहीं।
🕉️
मुनि, मोक्षपरायण एवं विगत इच्छा-भय-क्रोध — सदा मुक्त पुरुष
मुनि लक्षण — यतेन्द्रिय, मननशील, भगवत् चिन्तन में तल्लीन एवं विगत इच्छा-भय-क्रोध
▶ देखें (11:28) ▶ Watch (11:28)
सद्गुरुदेव गीता के श्लोक द्वारा मुनि के लक्षण स्पष्ट करते हैं। 'यतेन्द्रिय मनोबुद्धि' — जिनकी इन्द्रियाँ, मन एवं बुद्धि संयमित हैं, दृश्यमान जगत की वस्तु पदार्थ के प्रति कोई आसक्ति नहीं। 'मुनि' का अर्थ है मननशील — जो हर समय भगवत् चिन्तन में तल्लीन रहते हैं, किसी अन्य विषय या वस्तु पदार्थ के प्रति उनके हृदय में कोई आग्रह नहीं। 'मोक्षपरायण' — हरिभक्ति, श्री राधानन्द के चरण कमलों में शुद्ध भक्ति प्राप्ति ही एकमात्र उद्देश्य। 'विगत इच्छा' — देह-दैहिक पदार्थ के प्रति किंचित मात्र भी इच्छा नहीं। 'भय' — वस्तु नष्ट होने का भय, शरीर नष्ट होने का भय — यह भय 'द्वितीय अभिनिवेश' अर्थात् भगवत् चरण छोड़कर अन्य पदार्थ में मन की आसक्ति के कारण उत्पन्न होता है। 'क्रोध' भी नष्ट हो गया। ऐसे जो पुरुष हैं — विगत इच्छा, भय एवं क्रोध से मुक्त — वे सदा के लिए मुक्त हैं।
🔗 गीता के इन लक्षणों का प्रत्यक्ष स्वरूप श्री ईश्वरपुरी पाद के एकांत भजन में दिखता है
मुनि एवं मोक्षपरायण के लक्षण— भगवद् गीता Bhagavad Gita 5.27-28
▶ 11:28
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः। प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ॥ यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः। विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः॥
sparśān kṛtvā bahir bāhyāṁś cakṣuś caivāntare bhruvoḥ | prāṇāpānau samau kṛtvā nāsābhyantara-cāriṇau || yatendriya-mano-buddhir munir mokṣa-parāyaṇaḥ | vigatecchā-bhaya-krodho yaḥ sadā mukta eva saḥ ||
बाह्य विषयों को बाहर ही रखकर, दृष्टि को भ्रूमध्य में स्थिर कर, प्राण-अपान को समान करके — जो यतेन्द्रिय, संयमित मन-बुद्धि वाला मुनि, मोक्ष-परायण, इच्छा-भय-क्रोध से रहित है — वह सदा मुक्त ही है।
❓ प्रश्न: भय का मूल कारण क्या है? ▶ 13:11
💡 उत्तर: सद्गुरुदेव समझाते हैं कि भय का कारण 'द्वितीय अभिनिवेश' है — अर्थात् कृष्ण से भिन्न वस्तु में आसक्ति। भगवत् चरण छोड़कर जब मन दूसरे पदार्थ में आसक्त होता है, तब उस पदार्थ के नष्ट होने का भय उत्पन्न होता है — शरीर नष्ट होने का भय, सम्पत्ति नष्ट होने का भय। यदि कृष्ण से भिन्न किसी वस्तु में आसक्ति ही न हो, तो भय का कोई कारण ही नहीं रहता।
📌 मुनि के लक्षण:
  • यतेन्द्रिय — इन्द्रियाँ संयमित
  • मनोबुद्धि — मन एवं बुद्धि नियन्त्रित
  • मननशील — हर समय भगवत् चिन्तन में तल्लीन
  • मोक्षपरायण — भगवत् भक्ति ही एकमात्र उद्देश्य
  • विगत इच्छा — देह-दैहिक पदार्थ की इच्छा शून्य
  • विगत भय — द्वितीय अभिनिवेश से मुक्त
  • विगत क्रोध — क्रोध का पूर्ण नाश
💎
मुक्ति एवं बन्धन दोनों हृदय में हैं — बाहर कुछ नहीं
मुक्ति हृदय में है, बाहर नहीं — बन्धन आसक्ति है, मुक्ति अनाशक्ति है
▶ देखें (13:54) ▶ Watch (13:54)
सद्गुरुदेव अत्यन्त गम्भीर सिद्धान्त प्रतिपादित करते हैं कि मुक्ति कोई बाहर का स्थान नहीं है। मरने के बाद मुक्ति नहीं होती, किसी साधन करके अलग से मुक्ति नहीं मिलती। बन्धन क्या है? — देह-दैहिक, कृष्ण से भिन्न वस्तु में आसक्ति। मुक्ति क्या है? — देह-दैहिक वस्तु पदार्थ के प्रति अनाशक्ति, भगवत् चरण प्राप्ति ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य। जो इस उद्देश्य को लेकर जीवन धारण करता है, वह मुक्त है। बन्धन भी आपके हृदय में है, मुक्ति भी आपके हृदय में, भक्ति भी, आसक्ति भी, अन्धकार भी यहीं, रोशनी भी यहीं, वैराग भी यहीं, अनुराग भी यहीं — सब कुछ हृदय में ही है। बाहर जाने से कुछ नहीं होता। सद्गुरुदेव कहते हैं कि जो सोचता है 'घर छोड़कर चले जाएँगे, खूब भजन करेंगे' — वह सबसे बड़ा मूर्ख है, क्योंकि सब जगह माया है। शरीर को मिट्टी की गुफा में रखने से मुक्ति नहीं — मनरूपी गुफा में, हृदयरूपी गुफा में अनुप्रवेश होना चाहिए।
🔗 मुक्ति बाहर नहीं भीतर है — यही शिक्षा श्री ईश्वरपुरी पाद के अन्तर्मुखी साधन जीवन से प्रमाणित होती है
❓ प्रश्न: क्या भजन अधिक करने से मुक्ति मिलती है? ▶ 16:27
💡 उत्तर: सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि भजन कम हो लेकिन यदि मन में कृष्ण से भिन्न वस्तु की आसक्ति नहीं है, तो वह मुक्त है। और जो तीन लाख, चार लाख, पाँच लाख नाम जपता है, लेकिन मन विषय-कामना में रमता है — घर चाहिए, मकान चाहिए, यह चाहिए — साधु होकर भी आश्रम बनाने की कामना, बाह्य कार्यों की चिंता, भक्ति के प्रति कोई चिंता नहीं — तो यह ढोंग-ढंग से काम नहीं चलेगा। अन्तःकरण की स्थिति होनी चाहिए।
✅ करें:
  • मनरूपी गुफा में अनुप्रवेश करो — अन्तःकरण में भगवत् चिन्तन करो
❌ न करें:
  • बाहर जंगल-पहाड़ में मुक्ति मत ढूँढो — शरीर की गुफा से मुक्ति नहीं
  • ढोंग-ढंग से लाखों नाम जपकर मन में कामना रखना व्यर्थ है
⚖️ बन्धन बनाम मुक्ति
बन्धन: देह-दैहिक, कृष्ण से भिन्न वस्तु में आसक्ति — यही बन्धन है
मुक्ति: देह-दैहिक वस्तु पदार्थ के प्रति अनाशक्ति, भगवत् चरण प्राप्ति ही एकमात्र उद्देश्य — यही मुक्ति है
📌 हृदय में ही सब कुछ विद्यमान:
  • बन्धन — हृदय में
  • मुक्ति — हृदय में
  • भक्ति — हृदय में
  • आसक्ति — हृदय में
  • अन्धकार — हृदय में
  • रोशनी — हृदय में
  • वैराग्य — हृदय में
  • अनुराग — हृदय में
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माया मन में है, जगत में नहीं — शरीर में आत्मबुद्धि ही माया
माया का घर मन है — कामिनी-कांचन माया नहीं, काया में आत्मबुद्धि ही माया
▶ देखें (17:19) ▶ Watch (17:19)
सद्गुरुदेव अत्यन्त सूक्ष्म विवेचन करते हैं कि माया बाहर नहीं है, माया तो मन में है। मन ही माया का घर है। जिसके हृदय में माया है, वह जगत में माया देखता है। परन्तु जिसके हृदय में भगवत् भक्ति ही एकमात्र उद्देश्य है, उसको सब में प्रभु दिखते हैं — सब उनका ही प्रकाश दिखता है। सद्गुरुदेव एक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त स्थापित करते हैं — दृश्यमान जगत माया नहीं है, कामिनी-कांचन माया नहीं, काया अर्थात् शरीर में आत्मबुद्धि ही माया का घर है। 'शरीर मैं हूँ', 'शरीर सम्बन्धी वस्तु मेरा है' — यही माया है।
🔗 माया के स्वरूप का यह सूक्ष्म विवेचन साधक के अन्तर्मुखी भजन का आधार है
⚖️ माया कहाँ है?
लोक प्रचलित धारणा: जगत माया है, कामिनी-कांचन माया है, बाहर माया है
सद्गुरुदेव का सिद्धान्त: माया मन में है। शरीर में आत्मबुद्धि ही माया का घर है — 'शरीर मैं हूँ, शरीर सम्बन्धी वस्तु मेरा है' यही माया
गुरु सेवा — सर्वोत्तम साधना एवं श्री माधवेन्द्रपुरी पाद का आशीर्वाद
गुरु सेवा को सर्वोत्तम साधना के रूप में प्रतिपादित करना, श्री माधवेन्द्रपुरी का आशीर्वाद एवं रामचन्द्रपुरी का पतन
🙇
गुरु सेवा सर्वोत्तम साधना — गुरु प्रसन्नता ही भजन
गुरु सेवा ही उत्तम भजन — खीरचोरा गोपीनाथ में गुरु सानिध्य एवं सेवा
▶ देखें (18:15) ▶ Watch (18:15)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि श्री ईश्वरपुरी पाद दक्षिण भारत जाकर श्री माधवेन्द्रपुरी पाद का गुरु सानिध्य प्राप्त किए। भगवत् प्राप्ति के उद्देश्य से जितनी भी साधन भक्ति की प्रक्रियाएँ हैं, उनमें सर्वोत्तम साधना है गुरु सेवा। गुरु सेवा का अर्थ केवल गुरु के पास रहना नहीं — गुरु की प्रसन्नता, गुरु को खुशी करना, बस गुरु खुशी हैं तो और कुछ नहीं चाहिए। कैसे प्रसन्न करो — यह शिष्य को जानना है। यह जानकर कि गुरु सेवा ही उत्तम भजन है, श्री ईश्वरपुरी पाद गुरु के सानिध्य में रहने लगे। श्री माधवेन्द्रपुरी पाद खीरचोरा गोपीनाथ में बहुत दिन रहे और उस समय श्री ईश्वरपुरी पाद ने उनकी खूब सेवा की। गुरु की उम्र अधिक हो जाने से शारीरिक सेवा के लिए सेवक की आवश्यकता थी — श्री ईश्वरपुरी पाद ने यह सेवा पूर्ण समर्पण से की।
🔗 श्री ईश्वरपुरी पाद के जीवन का केन्द्रीय सिद्धान्त — गुरु सेवा द्वारा भगवत् कृपा प्राप्ति
✅ करें:
  • गुरु प्रसन्नता सम्पादन को सर्वोत्तम भजन जानो
📌 गुरु सेवा का सिद्धान्त:
  • गुरु सेवा = सर्वोत्तम साधना
  • गुरु सेवा = गुरु के पास रहना मात्र नहीं
  • गुरु सेवा = गुरु की प्रसन्नता सम्पादन
  • गुरु सेवा = गुरु को खुशी करना, बस और कुछ नहीं चाहिए
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श्री माधवेन्द्रपुरी का आशीर्वाद — भगवत् सानिध्य की प्राप्ति
श्री माधवेन्द्रपुरी पाद का आशीर्वाद — 'तुमको भगवत् सानिध्य मिल जाएगा' एवं रामचन्द्रपुरी का गुरु निन्दा से पतन
▶ देखें (20:09) ▶ Watch (20:09)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि श्री ईश्वरपुरी पाद की गुरु सेवा से अत्यन्त प्रसन्न होकर श्री माधवेन्द्रपुरी पाद ने उन्हें बुलाकर कहा — 'ईश्वर! तुमने हमारी बहुत सेवा की। मैं आशीर्वाद करता हूँ — तुमको भगवत् सानिध्य मिल जाएगा। भगवान प्रकाश कर रहे हैं और उनका प्रेम सानिध्य तुमको मिल जाएगा। तुम बहुत भाग्यशाली हो।' तत्पश्चात् गुरुदेव ने विदा किया — 'जाओ, कुछ दिन तीर्थ भ्रमण करो, हम फिर मिलेंगे।' ऐसे त्यागी गुरु शिष्य को ज्यादा दिन अपने पास नहीं रखते। इसके विपरीत सद्गुरुदेव एक अन्य शिष्य रामचन्द्रपुरी का प्रसंग सुनाते हैं — वह गुरु निन्दक था, साधु-सन्तों की निन्दा करता था, गुरु को भी ज्ञान देता था। वह श्री माधवेन्द्रपुरी पाद से कहता — 'अरे तुम ब्रह्म हो, चित् ब्रह्म का चिन्तन करो। कहाँ कृष्ण-कृष्ण करते हो? उसमें रोते हो? यह भावुकता है। ब्रह्मज्ञानी आत्मा कभी रोते हैं?' तब श्री माधवेन्द्रपुरी पाद ने क्रुद्ध होकर कहा — 'जा पाखण्डी कहीं के! भ्रष्ट हो जा!' इस प्रकार रामचन्द्रपुरी भ्रष्ट हो गया, जबकि श्री ईश्वरपुरी पाद गुरु सेवा के प्रताप से कृतार्थ हुए।
🔗 गुरु सेवा एवं गुरु निन्दा के विपरीत फलों का प्रत्यक्ष उदाहरण
❌ न करें:
  • गुरु को ज्ञान देना अर्थात् गुरु निन्दा — इससे भ्रष्ट हो जाता है
⚖️ दो गुरुभाई — सेवा बनाम निन्दा का फल
श्री ईश्वरपुरी पाद (गुरु सेवक): गुरु की तन-मन-प्राण से सेवा → गुरु प्रसन्नता → आशीर्वाद → भगवत् सानिध्य प्राप्ति → साक्षात् महाप्रभु के गुरु बने
रामचन्द्रपुरी (गुरु निन्दक): गुरु को ब्रह्मज्ञान का उपदेश → गुरु निन्दा → गुरु ने शाप दिया 'जा पाखण्डी! भ्रष्ट हो जा!' → भ्रष्ट हो गया
नवद्वीप आगमन — अष्ट सात्विक विकार, श्री अद्वैत आचार्य प्रभु से मिलन एवं गुरुभाई प्रेम
श्री ईश्वरपुरी पाद की प्रेम प्रकाशना, नवद्वीप संकेत, श्री अद्वैत आचार्य प्रभु से मिलन एवं नेत्र द्वारा साधु पहचान
एकांत साधना में प्रेम प्रकाशना — अष्ट सात्विक विकार एवं नवद्वीप का संकेत
कठोर एकांत साधना से प्रेम प्रकाशना — अष्ट सात्विक विकार एवं ध्यान में नवद्वीप का ज्योतिपुंज संकेत
▶ देखें (22:27) ▶ Watch (22:27)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि गुरुदेव के आदेशानुसार श्री ईश्वरपुरी पाद तीर्थ भ्रमण करते-करते चले गए। गुरु ने जो उपदेश किया था कि भगवान प्रकाश करेंगे — वह मन में निरन्तर चिन्तन करते रहे। ऐसी ऊँची स्थिति में एकांत भाव से गुरु कृपा का अवलम्बन लेकर, गुरु चरण शरण में रहकर भगवत् चिन्तन में एकाग्र तल्लीनता एवं तन्मयता के साथ कठोर साधना करते-करते उनके भीतर प्रेम प्रकाशना प्रारम्भ हो गई। अश्रु, कम्प, पुलक, वैवर्ण, सर्वांग स्तम्भ, मूर्च्छा, प्रलय आदि अष्ट सात्विक विकारों से उनका शरीर विकारित होने लगा — बड़ा दिव्य प्रकाश। ध्यान में बैठकर देखते हैं तो जैसे नवद्वीप का संकेत मिल रहा है — नवद्वीप नामक स्थान पर कोई अलौकिक घटना की सम्भावना दिखती है, जैसे वहाँ ज्योतिपुंज का प्रकाश दिखता है। तब उन्होंने निश्चय किया कि नवद्वीप चलकर देखना चाहिए।
🔗 गुरु कृपा से प्रेम प्रकाशना एवं नवद्वीप संकेत — महाप्रभु मिलन की पूर्व पीठिका
📌 अष्ट सात्विक विकार:
  • अश्रु (आँसू)
  • कम्प (काँपना)
  • स्वेद (पसीना)
  • पुलक (रोमांच)
  • वैवर्ण (वर्ण परिवर्तन)
  • सर्वांग स्तम्भ (शरीर का जड़ होना)
  • मूर्च्छा (मूर्छित होना)
  • प्रलय (चेतना का लोप)
🤝
नवद्वीप आगमन — श्री अद्वैत आचार्य प्रभु का सत्संग एवं गुरुभाई का मिलन
नवद्वीप में श्री अद्वैत आचार्य प्रभु से भेंट — गुरुभाई प्रेम का अद्भुत दृश्य
▶ देखें (23:51) ▶ Watch (23:51)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि नवद्वीप पहुँचकर श्री ईश्वरपुरी पाद ने पूछा — यहाँ बड़े वैष्णव सन्त कौन हैं? उन्हें बताया गया कि श्री अद्वैत आचार्य प्रभु यहाँ गंगा किनारे सबको भक्ति धर्म की शिक्षा देते हैं, सत्संग करते हैं। उनके सानिध्य में श्री मुकुन्द, श्री गदाधर पंडित आदि सब बड़े-बड़े भक्त आकर परम तृप्त होते थे — उनके मुख से निःसृत कथामृत सुधारस में निमग्न हो जाते थे। सद्गुरुदेव यहाँ अपना व्यक्तिगत अनुभव भी सुनाते हैं कि जब वे स्वयं ब्रज में आए तो राधाकुण्ड पहुँचकर किसी से पूछा कि यहाँ अच्छे सन्त कौन हैं — तो उन्हें श्री प्रभुपाद बाबा (मनोहर बाबा के प्रशिष्य) के दर्शन का सुअवसर मिला। श्री अद्वैत आचार्य प्रभु जो साक्षात् सदाशिव एवं महाविष्णु के मिलित स्वरूप हैं, उन्होंने श्री ईश्वरपुरी पाद का सत्संग सुनकर पहचान लिया कि ये एक परम वैष्णव हैं। मुकुन्द ने जब हरिभजन का ऐसा सुर गाया तो श्री ईश्वरपुरी पाद अश्रु-कम्प-पुलक से विकारित होकर 'हाँ कृष्ण! हाँ कृष्ण!' बोलकर लोटपोट खाने लगे। भाव शान्त होने पर श्री अद्वैत आचार्य प्रभु ने पूछा — 'ऐसा प्रेम तो एकमात्र हमारे गुरु घर में ही दिखता है, आपके गुरु कौन हैं?' जब उत्तर मिला कि गुरुदेव श्री माधवेन्द्रपुरी पाद हैं — तो दोनों गुरुभाइयों ने एक-दूसरे को छाती से लगा लिया, दोनों रो रहे हैं, कम्प, पुलक, अश्रु, वैवर्ण — अद्भुत गुरुभाई प्रेम का दृश्य।
🔗 गुरुभाई प्रेम — एक ही गुरु कुल (श्री माधवेन्द्रपुरी) के दो शिष्यों का अलौकिक मिलन
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नेत्र से साधु की पहचान — भजन की गहराई नेत्र में झलकती है
नेत्र ही सच्चे साधु की पहचान — भजन की गहराई एवं दुष्टता दोनों नेत्र से प्रकट होती हैं
▶ देखें (26:08) ▶ Watch (26:08)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि श्री अद्वैत आचार्य प्रभु ने श्री ईश्वरपुरी पाद को देखते ही पहचान लिया — उनके शरीर के लक्षण, क्रियाकलाप एवं चेहरे से। सद्गुरुदेव समझाते हैं कि मनुष्य का मुख उसकी मानसिकता को प्रकट करता है — चेहरे से ही पता चल जाता है कि यह सज्जन है या दुर्जन। लेकिन सबसे प्रधान हैं नेत्र — नेत्र ही पहचान है। सन्त चेहरा नहीं देखते, नेत्र देखते हैं। नेत्र से पता चलता है कि कितना भजन करता है, क्या भजन करता है। नेत्र को छुपाया नहीं जा सकता। सद्गुरुदेव बताते हैं कि जितना भजन बढ़ेगा, आँखें उतनी छोटी हो जाएँगी — सिद्ध महापुरुषों की आँखें बहुत छोटी हो जाती हैं, अन्त में तो नेत्र खुलता ही नहीं। इसके विपरीत जो संदेहशील, दुष्ट बुद्धि वाला होता है — वह टेढ़ी नज़र से देखता है, सीधा नहीं देख पाता। साधु कभी टेढ़ी नज़र से नहीं देखते, सीधा मस्त होकर देखते हैं, और आँख फाड़कर कभी नहीं देखते।
🔗 नेत्र से साधु की पहचान — श्री ईश्वरपुरी पाद को श्री अद्वैत आचार्य प्रभु ने इसी प्रकार पहचाना
⚖️ नेत्र से पहचान — साधु बनाम दुष्ट
साधु के नेत्र: सीधी दृष्टि, मस्त भाव, आँखें छोटी (भजन से), कभी टेढ़ी नज़र नहीं, आँख फाड़कर नहीं देखते
दुष्ट/संदेहशील के नेत्र: टेढ़ी नज़र, सीधा नहीं देख पाता, संदेही दृष्टि — ऐसे व्यक्ति पर कभी विश्वास नहीं करना
📌 नेत्र से भजन की पहचान के लक्षण:
  • जितना भजन बढ़ता है, नेत्र उतने छोटे होते जाते हैं
  • सिद्ध महापुरुषों के नेत्र बहुत छोटे हो जाते हैं
  • अन्तिम स्थिति में नेत्र खुलता ही नहीं
  • साधु सीधी दृष्टि से देखते हैं, टेढ़ी नज़र कभी नहीं
  • आँख फाड़कर कभी नहीं देखते
निमाई पंडित से प्रथम भेंट — दिव्य स्वरूप दर्शन एवं अलौकिक आकर्षण
श्री अद्वैत आचार्य प्रभु द्वारा निमाई पंडित का वर्णन, प्रथम भेंट का अलौकिक अनुभव एवं शची माता का स्वागत
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श्री अद्वैत आचार्य प्रभु का निमाई पंडित के विषय में वर्णन
श्री अद्वैत आचार्य प्रभु का वर्णन — नवद्वीप के अद्भुत किशोर विद्वान निमाई पंडित
▶ देखें (31:56) ▶ Watch (31:56)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि श्री ईश्वरपुरी पाद की नज़र एक विशेष पुरुष पर थी — गुरुदेव ने जो छटा बताई थी, जो प्रकाश का संकेत दिया था, उसकी खोज जारी थी। एक दिन श्री अद्वैत आचार्य प्रभु ने बताया कि यहाँ एक नवीन किशोर अवस्था का विद्वान आया है नवद्वीप में — अद्भुत विद्वत्ता है, किशोर अवस्था लेकिन बड़े-बड़े पंडित भी उनके सामने फेल हो जाते हैं। उनमें एक ऐसी आकर्षण शक्ति है कि जो एक बार उन्हें दर्शन कर ले, वह उनके प्रेम में फँस जाता है। व्याकरण अध्ययन करते हैं, समस्त शास्त्र का अध्ययन औपचारिक रूप से नहीं किया लेकिन विद्वत्ता के खान हैं — कोई भी शास्त्र सम्बन्धी आलोचना करो, समस्त शास्त्र कण्ठस्थ जैसे। उनका नाम है निमाई पंडित — 16-17 वर्ष की आयु। श्री अद्वैत आचार्य प्रभु ने कहा — 'तुम एक बार जाकर देखो, यह दिव्य है।'
🔗 निमाई पंडित के दिव्य स्वरूप का वर्णन — श्री ईश्वरपुरी पाद के प्रथम दर्शन की पूर्वपीठिका
📌 निमाई पंडित (महाप्रभु) का अंग वर्णन:
  • प्रथम यौवन छटा — 16-17 वर्ष
  • उन्नत वक्षस्थल
  • चन्द्रकान्ति जैसी अंगप्रभा
  • आकर्ण नेत्र — कान तक विस्तृत नेत्र
  • घुंघराली केश — स्कन्ध तक
  • गजस्कन्ध — हाथी जैसे कन्धे
  • क्षीण कटि प्रदेश — पतली कमर
  • विस्तृत नितम्ब प्रदेश
  • दन्तपंक्ति — मुक्तादाम जैसी
  • ओष्ठाधर — बिम्बफल जैसे लाल
💫
श्री ईश्वरपुरी पाद एवं निमाई पंडित की प्रथम भेंट — अलौकिक अंगस्पर्श
प्रथम भेंट का अलौकिक अनुभव — प्रेम पुरुषोत्तम का अंगस्पर्श एवं अचिन्त्य आनन्द
▶ देखें (35:03) ▶ Watch (35:03)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि जब श्री ईश्वरपुरी पाद ने निमाई पंडित को देखा तो स्तम्भित हो गए — अद्भुत छटा, अद्भुत अंगकान्ति, अद्भुत सुन्दरता और एक दैवी आकर्षण शक्ति जैसे अन्तःकरण को खींचकर अपने पास ले जा रही हो। महाप्रभु भी साक्षात् पूर्ण ब्रह्म सनातन, अखिल रसामृत सिन्धु, प्रेम पुरुषोत्तम हैं — उन्होंने श्री ईश्वरपुरी पाद को पहचान लिया कि ये वह दिव्य पुरुष हैं जिनसे उनका बहुत सम्बन्ध है। नज़दीक आते ही महाप्रभु ने श्री ईश्वरपुरी पाद के चरण स्पर्श करके प्रणाम किया। श्री ईश्वरपुरी पाद ने पूछा — 'क्या तुम्हारा नाम निमाई पंडित है?' 'हाँ' सुनकर उन्हें छाती से लगा लिया। साक्षात् प्रेम पुरुषोत्तम के अंगस्पर्श से उनके रोम-रोम प्रेम में रोमांचित हो गया, एक अद्भुत आनन्दसिन्धु में अन्तःकरण जैसे प्रवाहित होकर डूब रहा है — ऐसा अचिन्त्य आनन्द जीवन में कभी मिला नहीं था। बहुत समय तक स्तब्ध रह गए और मन में अनुभव हुआ कि यह पुरुष कोई साधारण मनुष्य नहीं है।
🔗 साक्षात् भगवान का पहचान — गुरुदेव का आशीर्वाद फलीभूत हो रहा है
🏠
शची माता का स्वागत एवं श्री ईश्वरपुरी पाद का निमाई पंडित के गृह में निवास
महाप्रभु के गृह में श्री ईश्वरपुरी पाद — शची माता का दर्शन, आदर सत्कार एवं मन का रम जाना
▶ देखें (37:30) ▶ Watch (37:30)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि महाप्रभु ने श्री ईश्वरपुरी पाद का हाथ पकड़कर कहा — 'चलिए, हमारे घर आज अतिथि स्वीकार कीजिए।' घर ले आकर माँ शची माता को बताया — 'देखो, एक ऐसे सन्त लाए हैं।' शची माता ने जब देखा — अद्भुत सुन्दर, दिव्य छटा, अंगकान्ति — उनका चेहरा देखते ही मन विगलित हो गया। वैष्णव प्रधान की पहचान का सिद्धान्त बताते हुए सद्गुरुदेव कहते हैं — 'जिसके दर्शन मात्र से मुख में नाम आ जाए, उसको तुम वैष्णव प्रधान जानो।' शची माता नाम में डूब गईं और बड़े आदर से भीतर ले गईं। कुछ दिन वहाँ रहकर आदर-सत्कार प्राप्त किया। माँ एवं प्रभु दोनों उन्हें छोड़ना नहीं चाहते। श्री ईश्वरपुरी पाद का मन भी निमाई पंडित को छोड़कर जाने का नहीं है — वे जान गए हैं कि यह कोई साधारण मनुष्य नहीं, ईश्वर शक्ति है। सद्गुरुदेव एक सुभाषित भी सुनाते हैं — 'मित्र के घर कम जाओ, उससे आदर रहता है।'
🔗 निमाई पंडित के गृह में श्री ईश्वरपुरी पाद — भावी दीक्षा लीला की तैयारी
एकांत भजन की वर्तमान चुनौतियाँ एवं व्यावहारिक मार्गदर्शन
वर्तमान काल में एकांत भजन की कठिनाइयाँ एवं घर में ही एकांत साधन का व्यावहारिक उपाय
🏡
सामाजिक कटाक्ष: वर्तमान में एकांत भजन की चुनौती — घर में ही एकांत सर्वोत्तम
वर्तमान काल में एकांत भजन असम्भव — घर में ही एकांत सर्वोत्तम साधना
▶ देखें (40:25) ▶ Watch (40:25)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि श्री ईश्वरपुरी पाद के समय साधु एक स्थान में ज्यादा दिन नहीं रहते थे। लेकिन अभी समय का बहुत परिवर्तन हो गया — कोई एकांत स्थान नहीं है, जंगल नहीं, निरापद भूमि नहीं जहाँ एकांत भजन किया जा सके। सब जगह नाना प्रकार की बाधा-विपत्ति, बहिर्मुख लोगों का संग, साधन-भजन में नाना प्रकार की बाधाएँ हैं। सद्गुरुदेव कहते हैं कि उनका स्वयं 47 वर्ष ब्रजमण्डल में हो रहा है, बहुत एकांत स्थान घूमे हैं, जंगल-मंगल — एकांत किसको कहते हैं, यह पता है। अभी तो एकांत घर में ही सर्वोत्तम है — ऐसा स्थान चुनो जहाँ कोई डिस्टर्ब न करे, बहिर्मुख लोगों का संग न हो, संगदोष से मुक्त रहो। सद्गुरुदेव एक दृष्टान्त सुनाते हैं — पहाड़ी बाबा जो हिमालय में कठोर तपस्या करके सिद्धि प्राप्त किए, वे एकांत में भजन करते थे। रात को सट्टेबाज़ आकर उन्हें सट्टा नम्बर बताने के लिए परेशान करने लगे — 'कुछ भी एक नम्बर बता दे!' बाबा ने कहा 'हम जानते नहीं सट्टा-पट्टा क्या है'। लेकिन उन लोगों ने बाबा के हाथ-पैर बाँधकर ट्रैक्टर में डालकर ले गए, मारने की धमकी दी। जान बचने के बाद बाबा ने फुल पैंट-कमीज़ पहनना शुरू कर दिया ताकि कोई उन्हें साधु न पहचाने। सद्गुरुदेव कहते हैं — 'एकांत' का अर्थ है अकेला रहना, बहिर्मुख संग से दूर, और यह अभी घर में ही सम्भव है।
🔗 श्री ईश्वरपुरी पाद जैसी एकांत साधना वर्तमान में कैसे सम्भव — व्यावहारिक मार्गदर्शन
✅ करें:
  • घर में ऐसा स्थान चुनो जहाँ बहिर्मुख संग न हो — यही एकांत है
  • संगदोष से बचकर एकांत भजन करो
❌ न करें:
  • जंगल-पहाड़ में एकांत की खोज मत करो — अभी वह सम्भव नहीं
गया धाम लीला — महाप्रभु का स्वरूप प्रकाश एवं दशाक्षर मंत्र दीक्षा
महाप्रभु का गया गमन, श्री ईश्वरपुरी पाद से भेंट, दीक्षा ग्रहण एवं महाप्रभु का भावान्तर
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महाप्रभु का स्वरूप प्रकाश का निर्णय — गया धाम गमन
महाप्रभु का स्वयं प्रकाश करने का निर्णय — योगमाया से आवृत लीला एवं गया धाम गमन
▶ देखें (44:45) ▶ Watch (44:45)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि श्री ईश्वरपुरी पाद के चले जाने के बाद महाप्रभु अपना विद्या अध्ययन करते रहे। अब तक भगवान अपनी योगमाया को आश्रय करके अपने प्रकाश को आवृत करके प्राकृत मनुष्यवत् व्यवहार कर रहे थे — एक साधारण मनुष्य जैसे लीला करते हुए सबको भ्रमित करके। सब निमाई पंडित को एक दाम्भिक पंडित के रूप में जानते थे — वैष्णवता से बहुत दूर, अभिमानी। अब महाप्रभु ने निर्णय किया कि जगत जीव के उद्धार के लिए अब स्वयं को प्रकाश करना है। इसके बहाने पितृ श्राद्ध (पिंडदान) के लिए माँ से विदाई लेकर कुछ भक्तमण्डली के साथ गया धाम चले गए। वास्तव में इच्छा थी स्वयं को प्रकाश करने की।
🔗 महाप्रभु के आत्म-प्रकाश की पूर्वपीठिका — गया धाम लीला का प्रारम्भ
योगमाया से भगवान का आवृत रहना— भगवद् गीता Bhagavad Gita 7.25
▶ 45:16
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः। मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्॥
nāhaṁ prakāśaḥ sarvasya yoga-māyā-samāvṛtaḥ | mūḍho 'yaṁ nābhijānāti loko mām ajam avyayam ||
मैं सबके लिए प्रकट नहीं होता, योगमाया से आवृत रहता हूँ। यह मूढ़ लोक मुझ अजन्मा, अव्यय परमेश्वर को नहीं जानता।
🎯
गया धाम में श्री ईश्वरपुरी पाद से पुनर्मिलन एवं प्रसाद लीला
गया धाम में अलौकिक पुनर्मिलन — वैष्णव दर्शन ही तीर्थ का फल एवं प्रसाद की दिव्य लीला
▶ देखें (47:09) ▶ Watch (47:09)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि गया धाम में विष्णुपाद में पिंडदान करने के पश्चात् महाप्रभु रास्ते में श्री ईश्वरपुरी पाद से मिले। देखते ही एकदम उनके चरणों में गिर गए। श्री ईश्वरपुरी पाद ने कहा — 'तुम कहाँ रहते हो?' महाप्रभु ने बताया। तो श्री ईश्वरपुरी पाद ने कहा — 'मैं आ रहा हूँ तुमसे मिलूँगा।' महाप्रभु ने कहा — 'बहुत अच्छा हुआ, मेरी तीर्थयात्रा सफल हो गई। आपके चरण दर्शन हो गए — ऐसे वैष्णव दर्शन, ऐसे महापुरुष के दर्शन से समस्त तीर्थों का फल मिल गया।' जब श्री ईश्वरपुरी पाद उनके निवास पर पधारे, महाप्रभु ने अपनी बनी रसोई उन्हें खिला दी। फिर अचानक एक नई रसोई तैयार हो गई — पत्ते पर प्रसाद लगा था। श्री ईश्वरपुरी पाद चकित रह गए — 'भाई, रसोई तो किया नहीं, वह तो हमको खिला दिया, लेकिन यह प्रसाद कहाँ से तैयार हुआ?' सद्गुरुदेव कहते हैं — भगवान जहाँ विद्यमान हैं, वहाँ जगत लक्ष्मी स्वयं विराजमान होकर समस्त सेवा कार्य निर्वाह करती हैं।
🔗 गया धाम में गुरु-शिष्य मिलन — दीक्षा लीला की तात्कालिक पूर्वभूमि
📿
दशाक्षर मंत्र दीक्षा — महाप्रभु का गुरु ग्रहण एवं पारस्परिक समर्पण
गया धाम में दशाक्षर मंत्र दीक्षा — महाप्रभु एवं श्री ईश्वरपुरी पाद का पारस्परिक समर्पण
▶ देखें (49:44) ▶ Watch (49:44)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि प्रसाद पाने के पश्चात् महाप्रभु ने श्री ईश्वरपुरी पाद से प्रार्थना की — 'आप हमको दीक्षा मंत्र दो, हमको संसार बन्धन से मुक्त होने के लिए मंत्र प्रदान करो जिससे कृष्ण प्रेम में उन्मत्त होकर देह-दैहिक समस्त पदार्थ से मुक्त हो जाएँ।' श्री ईश्वरपुरी पाद ने कहा — 'तुमको हम कैसे मंत्र देंगे? इतनी शक्ति हमारी नहीं है।' लेकिन महाप्रभु ने कहा — 'आपको देना ही पड़ेगा।' तब श्री ईश्वरपुरी पाद ने चिन्तन किया — भगवान हैं, भगवान को क्या दें? सब कुछ तो भगवान का ही है। यह तो लीला कर रहे हैं। मन ही मन महाप्रभु के चरणों में अपने आप को समर्पण करके दशाक्षर मंत्र प्रदान किए। जब गुरु दक्षिणा का प्रश्न आया तो श्री ईश्वरपुरी पाद ने कहा — 'दक्षिणा तो हमको देनी चाहिए। निमाई पंडित! तुम्हारे चरणों में हम अपने आप को समर्पण कर चुके हैं। तुमने हमको स्वीकार कर लिया — यही दक्षिणा है।' इस प्रकार गुरु-शिष्य दोनों में पारस्परिक समर्पण का अद्भुत दृश्य प्रस्तुत हुआ।
🔗 दीक्षा लीला — श्री ईश्वरपुरी पाद के जीवन का चरम बिन्दु, महाप्रभु के गुरु बनने का सौभाग्य
❓ प्रश्न: महाप्रभु ने किस मंत्र की दीक्षा ली? ▶ 49:54
💡 उत्तर: सद्गुरुदेव बताते हैं कि श्री ईश्वरपुरी पाद ने महाप्रभु को दशाक्षर मंत्र प्रदान किए। महाप्रभु ने कहा था — 'ऐसा मंत्र दो जिससे कृष्ण प्रेम में उन्मत्त होकर देह-दैहिक पदार्थ से मुक्त हो जाएँ।' श्री ईश्वरपुरी पाद ने मन में महाप्रभु के चरणों में स्वयं को समर्पित करते हुए मंत्र प्रदान किया — क्योंकि वे जानते थे कि यह साक्षात् भगवान हैं, भगवान लीला कर रहे हैं।
महाप्रभु का भावान्तर — उन्मत्त दशा, स्वरूप प्रकाश एवं उपसंहार
दीक्षा के पश्चात् महाप्रभु की उन्मत्त दशा, श्रीवास पंडित द्वारा दिव्य भाव की पहचान, सबको स्वरूप प्रदर्शन एवं श्री ईश्वरपुरी पाद का नित्य लीला प्रवेश
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दीक्षा के पश्चात् महाप्रभु की उन्मत्त दशा — 'कहाँ वृन्दावन, कहाँ वृन्दावन'
महाप्रभु का पूर्ण भावान्तर — उन्मत्त प्राय होकर 'कहाँ वृन्दावन' की पुकार एवं शची माता की चिन्ता
▶ देखें (51:48) ▶ Watch (51:48)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि दीक्षा के तुरन्त बाद निमाई पंडित के भीतर तीव्र वैकल्य उत्पन्न हुआ — पूर्ण परिवर्तन आ गया। उन्मत्तप्राय होकर 'हाँ कृष्ण! हाँ कृष्ण!' करते हुए गंगा किनारे-किनारे चल रहे हैं — 'कहाँ वृन्दावन? कहाँ वृन्दावन?' शिष्यमण्डली ने पकड़कर वापस लाया — 'तुम्हारी माता इन्तज़ार कर रही हैं, रो रही हैं!' रास्ते में कभी उल्टी दिशा में चल देते, कभी इधर — बड़े कष्ट से घर लाए गए। अब निमाई पंडित, निमाई पंडित नहीं रहे — परम वैष्णव, रोते हैं, गाते हैं, चिल्लाते हैं। शची माता समझ नहीं पा रहीं — सोचती हैं कहीं तीर्थ में कोई भूत-ग्रह सवार हो गया। श्री विष्णुप्रिया माता को भेजती हैं शान्त करने — वे भी डरकर भाग आती हैं।
🔗 दीक्षा का तात्कालिक फल — महाप्रभु का दिव्य भावान्तर जो श्री ईश्वरपुरी पाद के मंत्र प्रभाव से प्रकट हुआ
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गुणी-तांत्रिक व्यर्थ — श्रीवास पंडित ने दिव्य भाव पहचाना
तांत्रिकों का प्रयास विफल — श्रीवास पंडित द्वारा महाप्रभु के दिव्य भाव की पहचान
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सद्गुरुदेव बताते हैं कि शची माता ने बड़े-बड़े गुणी (तांत्रिक) बुलाए जो भूत-प्रेत छुड़ाते हैं — बंगाल में तन्त्र-मन्त्र-यन्त्र सिद्धि की प्रथा बहुत है, विशेषकर पूर्व भारत (आसाम, मणिपुर आदि) में। तांत्रिक आकर महाप्रभु पर प्रयोग करते — 'तू कहाँ से आया है? भाग जा यहाँ से!' लेकिन महाप्रभु तो देखकर हँसते हैं। कोई भूत जाने का नाम नहीं लेता — तांत्रिक डरकर भाग जाते, कुछ रकम लेकर विदा होते — 'नारायण तेल मालिश करो, डाब (नारियल) का पानी पिलाओ, पानता भात खिलाओ!' कोई तांत्रिक काम में नहीं आया। एक दिन श्रीवास पंडित आए — महाप्रभु ने कहा 'श्रीवास! तुम क्या देखते हो? सब मुझे बाई (भूत का रोग) कहते हैं।' श्रीवास पंडित ने तुरन्त पहचान लिया — 'अरे! यह तो दिव्य भाव उन्मत्त दशा है, यह शास्त्र में वर्णित दिव्य भाव का लक्षण है, साधारण मनुष्य में यह होता नहीं!' श्रीवास पंडित ने कहा — 'निमाई पंडित! तुम्हारी ये बाई तो हमको चाहिए। यह दुर्लभ बाई रोग हमको कब होगा? तुम धन्य हो!' महाप्रभु ने कहा — 'तुमने हमको बचा लिया! अगर तुम भी कहते बाई है तो हम गंगा में कूदकर शरीर समाप्त कर देते।'
🔗 सच्चे भक्त ही दिव्य भाव पहचान सकते हैं — श्री ईश्वरपुरी पाद की दीक्षा से प्रकट दिव्य उन्मत्तता
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महाप्रभु का सबको स्वरूप प्रदर्शन — उपासना अनुसार दिव्य दर्शन
श्रीवास पंडित गृह में सच्चिदानन्द स्वरूप प्रकाश — जिसकी जैसी उपासना, वैसा स्वरूप दर्शन
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सद्गुरुदेव बताते हैं कि महाप्रभु श्रीवास पंडित के गृह में गए और वहाँ सबको बुला-बुलाकर अपना ईश्वरीय स्वरूप प्रदर्शन कराए। एकमात्र श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु की लीला में ऐसा हुआ कि भगवान ने कभी अपने मुख से नहीं कहा 'मैं भगवान हूँ' — लेकिन सबको बुलाकर दिखाया 'देखो मैं कौन हूँ'। जिसकी जो उपासना, तदनुसार महाप्रभु ने उनको वैसा ही स्वरूप प्रदर्शित किया — श्री मुरारि गुप्त को राम उपासक होने से राम दरबार दिखाया, श्री नृसिंहानन्द स्वामी को नृसिंह स्वरूप दिखाया, श्रीवास पंडित को चतुर्भुज स्वरूप दिखाया। इस प्रकार सबको बुला-बुलाकर — 'बुलाओ श्रीधर को, बुलाओ सबको' — अपना स्वरूप दिखाकर कहा 'देखो मैं कौन हूँ, मन में भ्रम नहीं रखना, संदेह नहीं रखना।' एक बार अष्टप्रहर तक महाप्रभु ने सच्चिदानन्द स्वरूप लीला प्रदर्शन कराई। उसके बाद नवद्वीप लीला समाप्त करके संन्यास लेकर जगन्नाथपुरी चले गए।
🔗 श्री ईश्वरपुरी पाद की दीक्षा से प्रकाशित महाप्रभु का पूर्ण ब्रह्म स्वरूप — सबको दर्शन कराया
📌 उपासना अनुसार स्वरूप प्रदर्शन:
  • श्री मुरारि गुप्त — राम उपासक → रामदरबार दर्शन
  • श्री नृसिंहानन्द स्वामी — नृसिंह उपासक → नृसिंह स्वरूप दर्शन
  • श्रीवास पंडित → चतुर्भुज स्वरूप दर्शन
  • अष्टप्रहर तक सच्चिदानन्द स्वरूप लीला प्रदर्शन
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श्री माधवेन्द्रपुरी का तिरोभाव एवं श्री ईश्वरपुरी पाद का नित्य लीला प्रवेश
उपसंहार — श्री माधवेन्द्रपुरी पाद का कृष्ण विरह श्लोक एवं श्री ईश्वरपुरी पाद का नित्य लीला प्रवेश
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सद्गुरुदेव बताते हैं कि महाप्रभु नवद्वीप लीला समाप्त करके संन्यास लेकर जगन्नाथपुरी चले गए। इधर श्री माधवेन्द्रपुरी पाद अपने नित्य लीला में प्रवेश कर गए। जाते समय एक श्लोक उच्चारण करते हुए उन्होंने शरीर त्याग किया — 'हे दीनदयार्द्रनाथ! हे मथुरानाथ! कदा अवलोक्यसे!' — कृष्ण विरह में यह अन्तिम उच्चारण। सद्गुरुदेव बताते हैं कि श्री माधवेन्द्रपुरी पाद ने कृष्ण प्रेम का उपदेश, कृष्ण विरह, राधा भाव विषय — यह जगत में रोपण कर गए, जैसे प्रेमांकुर। फिर जब महाप्रभु के संन्यास लेने और श्री माधवेन्द्रपुरी पाद के शरीर त्यागने का समाचार मिला, तब श्री ईश्वरपुरी पाद भी 'हाँ कृष्ण चैतन्य! हाँ कृष्ण चैतन्य!' बोलकर गुरु चिन्तन करते-करते कहाँ चले गए, कहाँ शरीर त्यागा — इसका कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इस प्रकार श्री ईश्वरपुरी पाद ने अपने नरतनु (मनुष्य शरीर) को परित्याग करके नित्य लीला में प्रवेश कर गए — जो महाप्रभु के गुरु रूप में प्रकट हुए थे।
🔗 गुरु वंश का पराकाष्ठा — श्री माधवेन्द्रपुरी से श्री ईश्वरपुरी, और श्री ईश्वरपुरी से महाप्रभु तक प्रेम परम्परा
श्री माधवेन्द्रपुरी पाद का अन्तिम विरह श्लोक— Padyavali / चैतन्य चरितामृत Chaitanya Charitamrita Madhya Lila 4.197
▶ 57:48
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
अयि दीनदयार्द्रनाथ हे मथुरानाथ कदावलोक्यसे। हृदयं त्वदलोककातरं दयित भ्राम्यति किं करोम्यहम्॥
ayi dīna-dayārdra-nātha he mathurā-nātha kadāvalokya se | hṛdayaṁ tvad-aloka-kātaraṁ dayita bhrāmyati kiṁ karomy aham ||
हे दीनों पर दया करने वाले नाथ! हे मथुरानाथ! कब तुम्हारे दर्शन होंगे? तुम्हारे दर्शन के बिना हृदय व्याकुल है, हे प्रियतम! मैं भटक रहा हूँ — अब क्या करूँ?
प्रेमांकुर वृक्ष — श्री माधवेन्द्रपुरी पाद का योगदान— चैतन्य चरितामृत Chaitanya Charitamrita Madhya Lila 4.176
▶ 58:09
संदर्भ पूरक संदर्भ
कृष्णप्रेमेर उपदेश, कृष्णबिरहबिशेष। जगते रोपण कर गेला प्रेमाङ्कुर। सेइ प्रेमाङ्कुर बृक्ष चैतन्य ठाकुर॥
kṛṣṇa-premera upadeśa, kṛṣṇa-viraha-viśeṣa | jagete ropaṇa kara gelā premāṅkura | sei premāṅkura vṛkṣa caitanya ṭhākura ||
कृष्ण प्रेम का उपदेश, कृष्ण विरह का विशेष भाव — जगत में प्रेमांकुर का रोपण कर गए। वही प्रेमांकुर वृक्ष श्री चैतन्य ठाकुर हैं।
🧠 आत्म-चिंतन (Self Assessment)
इस सत्संग से आपने क्या सीखा? (Test your understanding)
Core Essence
श्री ईश्वरपुरी पाद का जीवन चरित हमें गुरु सेवा, वैराग्य एवं भगवत् प्राप्ति के विषय में क्या शिक्षा देता है?
उत्तर: श्री ईश्वरपुरी पाद का सम्पूर्ण जीवन गुरु सेवा की सर्वोत्तमता, अनाशक्ति रूप वैराग्य एवं हृदयस्थ मुक्ति का प्रत्यक्ष प्रमाण है। उन्होंने गुरु श्री माधवेन्द्रपुरी की तन-मन-प्राण से सेवा करके उनकी प्रसन्नता प्राप्त की, कठोर एकांत साधना से प्रेम प्रकाशना प्राप्त किया, और अन्ततः स्वयं भगवान श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु के गुरु बनने का सौभाग्य प्राप्त किया।
Multiple Choice
🔢 सत्संग के अनुसार, मुक्ति और बंधन का वास्तविक स्थान कहाँ है?
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
प्रवचन में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि मुक्ति एवं बन्धन दोनों हृदय में हैं, बाहर कुछ नहीं। यह एक गहन दार्शनिक विवेचना है।
Multiple Choice
🔢 प्रवचन में 'माया' का स्वरूप क्या बताया गया है?
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
सत्संग में बताया गया है कि माया मन में है, जगत में नहीं। शरीर को ही आत्मा मान लेना, यही सबसे बड़ी माया है।
Multiple Choice
🔢 सद्गुरुदेव के अनुसार सर्वोत्तम साधना क्या है?
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
सत्संग में स्पष्ट किया गया है कि गुरु सेवा ही सर्वोत्तम साधना है और गुरु की प्रसन्नता ही वास्तविक भजन है।
Multiple Choice
🔢 गीता के सिद्धांत के अनुसार, कौन सा पुरुष 'सदा मुक्त' माना जाता है?
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
प्रवचन में गीता का संदर्भ देते हुए बताया गया है कि जो मुनि मोक्षपरायण एवं इच्छा-भय-क्रोध से रहित (विगत) है, वह सदा मुक्त है।
Multiple Choice
🔢 श्री ईश्वरपुरी पाद ने गया धाम में महाप्रभु को कौन सा मंत्र प्रदान किया?
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
सत्संग में वर्णन है कि गया धाम में श्री ईश्वरपुरी पाद ने महाप्रभु को दशाक्षर (दस अक्षरों वाला) कृष्ण मंत्र की दीक्षा दी।
True/False
🤔 सत्संग के अनुसार, एक साधु के भजन की गहराई का पता उसके वस्त्रों से चलता है।
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
सत्संग में बताया गया है कि साधु की पहचान नेत्रों से होती है, क्योंकि भजन की गहराई नेत्रों में झलकती है, न कि वस्त्रों में।
True/False
🤔 श्री ईश्वरपुरी पाद ने श्री अद्वैत आचार्य प्रभु से दीक्षा प्राप्त की थी।
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
सत्संग के अनुसार, श्री ईश्वरपुरी पाद ने श्री माधवेन्द्रपुरी से दीक्षा प्राप्त की थी। श्री अद्वैत आचार्य उनके गुरुभाई थे।
True/False
🤔 प्रवचन में यह बताया गया है कि वर्तमान समय में सच्चा एकांत घर में ही सर्वोत्तम है।
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
प्रवचन में एक सामाजिक कटाक्ष करते हुए कहा गया है कि वर्तमान में एकांत भजन की चुनौती को देखते हुए घर में ही एकांत साधना करना सर्वोत्तम है।
स्पष्टीकरण (Clarification)

यह सारांश AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग गुरु सेवा में करके तैयार किया गया है। इसमें त्रुटि हो सकती है। कृपया पूर्ण लाभ के लिए पूरा वीडियो अवश्य देखें।

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