श्री ईश्वरपुरी पाद का दिव्य जीवन चरित — गुरु सेवा, वैराग्य, एवं महाप्रभु दीक्षा लीला
श्री ईश्वरपुरी पाद का दिव्य जीवन चरित — गुरु सेवा, वैराग्य, एवं महाप्रभु दीक्षा लीला
सद्गुरुदेव इस सत्संग में श्री ईश्वरपुरी पाद के सम्पूर्ण जीवन चरित का वर्णन करते हैं। पूर्वजन्म अर्जित दैवी सम्पत्ति लेकर जन्म लेने वाले श्री ईश्वरपुरी पाद ने श्री माधवेन्द्रपुरी पाद से दीक्षा प्राप्त कर तीव्र वैराग्य धारण किया और कठोर एकांत साधना की। गुरु सेवा को सर्वोत्तम साधना बताते हुए सद्गुरुदेव वैराग्य, मुक्ति एवं बन्धन की गहन दार्शनिक विवेचना करते हैं कि मुक्ति हृदय में ही है, बाहर नहीं। तत्पश्चात् श्री ईश्वरपुरी पाद का नवद्वीप आगमन, गुरुभाई श्री अद्वैत आचार्य प्रभु से मिलन एवं निमाई पंडित के दिव्य स्वरूप का प्रथम दर्शन वर्णित है। गया धाम में महाप्रभु को दशाक्षर मंत्र दीक्षा प्रदान करने के पश्चात् महाप्रभु का भावान्तर, उन्मत्त दशा, श्रीवास पंडित द्वारा दिव्य भाव की पहचान एवं सबको स्वरूप प्रदर्शन का वर्णन है। अन्त में श्री माधवेन्द्रपुरी पाद के तिरोभाव एवं श्री ईश्वरपुरी पाद के नित्य लीला प्रवेश का उल्लेख करते हुए सत्संग का उपसंहार किया गया है।
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- 🔹 दीक्षा प्राप्ति के पश्चात् कठोर तपस्या — यदृच्छालाभ संतुष्ट, द्वन्द्वातीत, विमत्सर (9:44)
- 🔹 मुनि लक्षण — यतेन्द्रिय, मननशील, भगवत् चिन्तन में तल्लीन एवं विगत इच्छा-भय-क्रोध (11:28)
- 🔹 मुक्ति हृदय में है, बाहर नहीं — बन्धन आसक्ति है, मुक्ति अनाशक्ति है (13:54)
- 🔹 माया का घर मन है — कामिनी-कांचन माया नहीं, काया में आत्मबुद्धि ही माया (17:19)
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- 🔹 महाप्रभु का पूर्ण भावान्तर — उन्मत्त प्राय होकर 'कहाँ वृन्दावन' की पुकार एवं शची माता की चिन्ता (51:48)
- 🔹 तांत्रिकों का प्रयास विफल — श्रीवास पंडित द्वारा महाप्रभु के दिव्य भाव की पहचान (53:21)
- 🔹 श्रीवास पंडित गृह में सच्चिदानन्द स्वरूप प्रकाश — जिसकी जैसी उपासना, वैसा स्वरूप दर्शन (55:55)
- 🔹 उपसंहार — श्री माधवेन्द्रपुरी पाद का कृष्ण विरह श्लोक एवं श्री ईश्वरपुरी पाद का नित्य लीला प्रवेश (57:27)
📖 आज की शिक्षाएं 📖 आज की विस्तृत शिक्षाएं
- पिता — श्री श्यामसुन्दर आचार्य जी (परम पंडित)
- पूर्वजन्म अर्जित दैवी शक्ति सम्पन्न
- बचपन में ही अल्प समय में समस्त शास्त्र अध्ययन
- परम पारदर्शिता प्राप्त
- काम
- क्रोध
- लोभ
- ईर्ष्या
- मोह
- तन्द्रा
- अहंकार
- हर्ष — विषाद
- मान — अपमान
- शीत — उष्ण
- सुख — दुख
- लाभ — हानि
- यतेन्द्रिय — इन्द्रियाँ संयमित
- मनोबुद्धि — मन एवं बुद्धि नियन्त्रित
- मननशील — हर समय भगवत् चिन्तन में तल्लीन
- मोक्षपरायण — भगवत् भक्ति ही एकमात्र उद्देश्य
- विगत इच्छा — देह-दैहिक पदार्थ की इच्छा शून्य
- विगत भय — द्वितीय अभिनिवेश से मुक्त
- विगत क्रोध — क्रोध का पूर्ण नाश
- मनरूपी गुफा में अनुप्रवेश करो — अन्तःकरण में भगवत् चिन्तन करो
- बाहर जंगल-पहाड़ में मुक्ति मत ढूँढो — शरीर की गुफा से मुक्ति नहीं
- ढोंग-ढंग से लाखों नाम जपकर मन में कामना रखना व्यर्थ है
- बन्धन — हृदय में
- मुक्ति — हृदय में
- भक्ति — हृदय में
- आसक्ति — हृदय में
- अन्धकार — हृदय में
- रोशनी — हृदय में
- वैराग्य — हृदय में
- अनुराग — हृदय में
- गुरु प्रसन्नता सम्पादन को सर्वोत्तम भजन जानो
- गुरु सेवा = सर्वोत्तम साधना
- गुरु सेवा = गुरु के पास रहना मात्र नहीं
- गुरु सेवा = गुरु की प्रसन्नता सम्पादन
- गुरु सेवा = गुरु को खुशी करना, बस और कुछ नहीं चाहिए
- गुरु को ज्ञान देना अर्थात् गुरु निन्दा — इससे भ्रष्ट हो जाता है
- अश्रु (आँसू)
- कम्प (काँपना)
- स्वेद (पसीना)
- पुलक (रोमांच)
- वैवर्ण (वर्ण परिवर्तन)
- सर्वांग स्तम्भ (शरीर का जड़ होना)
- मूर्च्छा (मूर्छित होना)
- प्रलय (चेतना का लोप)
- जितना भजन बढ़ता है, नेत्र उतने छोटे होते जाते हैं
- सिद्ध महापुरुषों के नेत्र बहुत छोटे हो जाते हैं
- अन्तिम स्थिति में नेत्र खुलता ही नहीं
- साधु सीधी दृष्टि से देखते हैं, टेढ़ी नज़र कभी नहीं
- आँख फाड़कर कभी नहीं देखते
- प्रथम यौवन छटा — 16-17 वर्ष
- उन्नत वक्षस्थल
- चन्द्रकान्ति जैसी अंगप्रभा
- आकर्ण नेत्र — कान तक विस्तृत नेत्र
- घुंघराली केश — स्कन्ध तक
- गजस्कन्ध — हाथी जैसे कन्धे
- क्षीण कटि प्रदेश — पतली कमर
- विस्तृत नितम्ब प्रदेश
- दन्तपंक्ति — मुक्तादाम जैसी
- ओष्ठाधर — बिम्बफल जैसे लाल
- घर में ऐसा स्थान चुनो जहाँ बहिर्मुख संग न हो — यही एकांत है
- संगदोष से बचकर एकांत भजन करो
- जंगल-पहाड़ में एकांत की खोज मत करो — अभी वह सम्भव नहीं
- श्री मुरारि गुप्त — राम उपासक → रामदरबार दर्शन
- श्री नृसिंहानन्द स्वामी — नृसिंह उपासक → नृसिंह स्वरूप दर्शन
- श्रीवास पंडित → चतुर्भुज स्वरूप दर्शन
- अष्टप्रहर तक सच्चिदानन्द स्वरूप लीला प्रदर्शन
प्रवचन में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि मुक्ति एवं बन्धन दोनों हृदय में हैं, बाहर कुछ नहीं। यह एक गहन दार्शनिक विवेचना है।
सत्संग में बताया गया है कि माया मन में है, जगत में नहीं। शरीर को ही आत्मा मान लेना, यही सबसे बड़ी माया है।
सत्संग में स्पष्ट किया गया है कि गुरु सेवा ही सर्वोत्तम साधना है और गुरु की प्रसन्नता ही वास्तविक भजन है।
प्रवचन में गीता का संदर्भ देते हुए बताया गया है कि जो मुनि मोक्षपरायण एवं इच्छा-भय-क्रोध से रहित (विगत) है, वह सदा मुक्त है।
सत्संग में वर्णन है कि गया धाम में श्री ईश्वरपुरी पाद ने महाप्रभु को दशाक्षर (दस अक्षरों वाला) कृष्ण मंत्र की दीक्षा दी।
सत्संग में बताया गया है कि साधु की पहचान नेत्रों से होती है, क्योंकि भजन की गहराई नेत्रों में झलकती है, न कि वस्त्रों में।
सत्संग के अनुसार, श्री ईश्वरपुरी पाद ने श्री माधवेन्द्रपुरी से दीक्षा प्राप्त की थी। श्री अद्वैत आचार्य उनके गुरुभाई थे।
प्रवचन में एक सामाजिक कटाक्ष करते हुए कहा गया है कि वर्तमान में एकांत भजन की चुनौती को देखते हुए घर में ही एकांत साधना करना सर्वोत्तम है।
यह सारांश AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग गुरु सेवा में करके तैयार किया गया है। इसमें त्रुटि हो सकती है। कृपया पूर्ण लाभ के लिए पूरा वीडियो अवश्य देखें।
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