सिद्ध श्री जगन्नाथ दास बाबा का पावन जीवन चरित्र — कठोर तपस्या, सिद्धि एवं अलौकिक लीलाएँ
सिद्ध श्री जगन्नाथ दास बाबा का पावन जीवन चरित्र — कठोर तपस्या, सिद्धि एवं अलौकिक लीलाएँ
इस सत्संग में सद्गुरुदेव सिद्ध श्री जगन्नाथ दास बाबा के पावन जीवन चरित्र का आस्वादन कराते हैं, जो सिद्ध श्री कृष्णदास बाबा के कृपापात्र थे और जिन्होंने पुरश्चरण विधि द्वारा भगवत प्राप्ति की। सद्गुरुदेव दृष्टा गुरु के महत्त्व को समझाते हुए बताते हैं कि जहाज से बँधी नाव के समान, सामर्थ्यवान गुरु शिष्य को द्रुत गति से आगे ले जाते हैं। स्वर्ग-नरक के भोग, क्रमोह्रासमान उपयोग विधि एवं मानव शरीर की दुर्लभता पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए निष्काम भक्ति की श्रेष्ठता प्रतिपादित की गई है। ब्रज में बाबा की अलौकिक लीलाएँ — भंगी मैया से प्रसाद ग्रहण, शेर प्रसंग, गोविन्द मंदिर की तुलसी रक्षा, कीर्तन में अलौकिक नृत्य — इन सबका वर्णन सिद्ध पुरुष की अगम्य क्रिया-मुद्रा को दर्शाता है। अन्त में बिहारी दास को मृत्यु से बचाने तथा स्वयं उन्हें आशीर्वाद देकर नित्य धाम प्रस्थान करने की हृदयस्पर्शी कथा से सत्संग का उपसंहार होता है।
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- 🔹 धनाढ्य व्यक्ति का आगमन एवं गोविन्द मन्दिर में तुलसी रक्षा — बाबा की त्रिकालदर्शी सिद्धि (35:24)
- 🔹 सिद्धाई (अलौकिक शक्ति) का स्वरूप — साधक के पीछे-पीछे चलती है, पकड़ने से प्रेम प्राप्ति में बाधा (40:02)
- 🔹 कीर्तन में बाबा का अलौकिक नृत्य — वृद्ध शरीर की सीमाओं से परे अलौकिक शक्ति (42:38)
- 🔹 भगवत शक्ति का संयोग — तीव्र इच्छा होने पर महापुरुष स्वयं आ जाते हैं (44:01)
📖 आज की शिक्षाएं 📖 आज की विस्तृत शिक्षाएं
- दीक्षा गुरु — श्री जगदानन्द गोस्वामी (श्री शृंगार भट्ट गोस्वामी वंश, श्री नित्यानन्द प्रभु के वंशज)
- वेशाश्रय गुरु — सिद्ध श्री कृष्णदास बाबा (दुमूल वन में तपस्या, श्री राधा रानी के दर्शन प्राप्त, गोवर्धन निवासी)
- निवास — छः मास नवद्वीप धाम, छः मास वृन्दावन
- आयु — लगभग 150 वर्ष
- काल — लगभग 100 वर्ष पूर्व
- गुरु में एकान्तिक निष्ठा रखें, यही साधन की सफलता का आधार है।
- गुरु में निष्ठा के बिना साधन चेष्टा निष्क्रिय हो जाती है।
- पुरश्चरण कभी गुरु के निर्देश के बिना स्वतन्त्र रूप से न करें।
- दिग्बन्धन करना
- आसन सिद्ध करना
- कूर्म चक्र स्थापन करना
- आसन की दिशा का निर्णय करना
- कम से कम 18,000 बीज मन्त्रों का जप
- शुद्ध आहार-विहार
- अखण्ड गाय के घी द्वारा प्रदीप प्रज्वलन
- एकान्त भाव से साधना
- गुरु कृपा सापेक्ष — स्वतन्त्र नहीं
- मानव शरीर रूपी क्षेत्र में भगवत भजन की खेती करें — अमृत फल फलेगा।
- भोग जीवन व्यतीत करने से इस क्षेत्र में जहर उगता है।
- रस
- रक्त
- मांस
- मेद
- अस्थि
- मज्जा
- शुक्र
- प्रथम मास — प्रतिदिन संध्या काल में केवल 4 केले
- द्वितीय मास — केवल 1 अमरूद
- तृतीय मास — केले का फूल उबालकर अत्यल्प मात्रा में
- चतुर्थ मास — इसी प्रकार क्रमशः न्यूनतम आहार
- महत्पुरुष की क्रिया-मुद्रा में कभी दोषदर्शन न करें।
- सिद्ध पुरुष के आचरण को सामान्य मनुष्य के मानदण्ड से न आँकें।
- सन्त के मूड एवं इच्छा देखकर ही उनके सान्निध्य में जाएँ।
- कोई जिज्ञासा हो तो प्रणिपात, सेवा एवं विनम्रता से प्रश्न करें।
- सन्तों के भजन में विघ्न न डालें — यह अपराध बन सकता है।
- सन्तों के सान्निध्य में अधिक समय लेना एवं अधिक बातें करना उचित नहीं।
- सिद्धाई को कभी न पकड़ें — इससे प्रेम प्राप्ति में बाधा होती है।
- जीवात्मा महाशक्ति (भगवान) का अंश है
- अविद्या जनित आवरण के कारण यह शक्ति आच्छादित रहती है
- साधन एवं भगवत कृपा से आवरण उन्मोचित होने पर महाशक्ति से तदात्मता होती है
- तदात्मता होने पर कर्तुम-अकर्तुम शक्ति प्रकट होती है — असम्भव भी सम्भव हो जाता है
- तेरा मानव जीवन अब सफल हो जाएगा
- तेरी साधना अब सफलकाम हो जाएगा
- तू भगवत दृष्टा बन जाएगा
- तेरे भीतर समस्त कृपा शक्ति आकर तेरे को कृतार्थ करेगी
सत्संग में दृष्टा गुरु की तुलना उस जहाज से की गई है जिससे नाव बंधी हो, जो यह दर्शाता है कि सामर्थ्यवान गुरु शिष्य को शीघ्रता से आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ाते हैं।
सत्संग में स्पष्ट किया गया है कि स्वर्ग-नरक सकाम कर्मों के फलों को भोगने के स्थान हैं, जिसके लिए एक विशेष दिव्य शरीर प्राप्त होता है और भोग समाप्त होने पर जीव को पुनः कर्मयोनि में आना पड़ता है।
यह सिद्धांत बताता है कि जैसे-जैसे कर्मों के फल भोगे जाते हैं, उन फलों को भोगने की स्पृहा या इच्छा क्रमशः कम होती जाती है।
यह प्रसंग दर्शाता है कि एक सिद्ध पुरुष समदर्शी होता है और सामाजिक मान्यताओं, जैसे जाति-भेद या शुद्धि-अशुद्धि, के बंधनों से पूर्णतः मुक्त होता है।
सत्संग में वर्णित है कि बाबा ने अपनी अलौकिक शक्ति से बिहारी दास को मृत्यु के मुख से वापस खींच लिया और उन्हें जीवनदान दिया, जो उनकी अचिन्त्य सामर्थ्य का प्रमाण है।
सत्संग में मानव शरीर को निष्काम कर्म करने और भगवत प्राप्ति के लिए एक दुर्लभ क्षेत्र बताया गया है, न कि केवल भोग के लिए। भोग के लिए तो दिव्य शरीर मिलते हैं।
सत्संग में स्पष्ट है कि बाबा ने पुरश्चरण विधि का अनुष्ठान भगवत प्राप्ति के परम लक्ष्य के लिए किया था, न कि सिद्धियों के लिए। सिद्धियाँ तो भक्ति की दासी बनकर स्वतः आ जाती हैं।
सत्संग में वर्णित उनका वृद्ध और झुके हुए शरीर में भी घंटों तक अलौकिक नृत्य करना यह दर्शाता है कि वे शारीरिक अवस्थाओं और सीमाओं से परे, दिव्य भाव में स्थित थे।
यह सारांश AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग गुरु सेवा में करके तैयार किया गया है। इसमें त्रुटि हो सकती है। कृपया पूर्ण लाभ के लिए पूरा वीडियो अवश्य देखें।
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