[Study Guide Draft : Feb 18, 2026] सिद्ध श्री जगन्नाथ दास बाबा का पावन जीवन चरित्र — कठोर तपस्या, सिद्धि एवं अलौकिक लीलाएँ

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श्री भगवत चर्चा
18 February 2026

सिद्ध श्री जगन्नाथ दास बाबा का पावन जीवन चरित्र — कठोर तपस्या, सिद्धि एवं अलौकिक लीलाएँ

सिद्ध श्री जगन्नाथ दास बाबा का पावन जीवन चरित्र — कठोर तपस्या, सिद्धि एवं अलौकिक लीलाएँ

Sri Sri 108 Sri Vinod Baba ji Maharaj
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हमारे प्रिय सद्गुरुदेव बताते हैं:
" गुरु अगर दृष्टा गुरु होते हैं तो गुरु शक्ति के प्रभाव से शिष्य अल्प साधना में भी बहुत आगे निकल जाते हैं। "

" महत् पुरुष की क्रिया-मुद्रा मनुष्य के बोध के अगम्य है, उनकी बुद्धि-विचार वहाँ प्रवेश करना सम्भव नहीं है। "

" ये सिद्धाई साधक के पीछे-पीछे अनुगमन करती है, सिद्धाई साधना का विषय नहीं है। "
सिद्ध जगन्नाथ दास बाबा (18)दृष्टा गुरु (8)पुरश्चरण (7)बिहारी दास (12)सिद्धि/सिद्धाई (9)भगवत प्राप्ति (6)कठोर तपस्या (5)स्वर्ग लोक (5)निष्काम कर्म (4)मानव शरीर (4)क्रमोह्रासमान उपयोग विधि (3)गुरु कृपा (5)सिद्ध कृष्णदास बाबा (3)ब्रजमण्डल (4)नवद्वीप (5)
🔍 सत्संग सार (Executive Summary)

इस सत्संग में सद्गुरुदेव सिद्ध श्री जगन्नाथ दास बाबा के पावन जीवन चरित्र का आस्वादन कराते हैं, जो सिद्ध श्री कृष्णदास बाबा के कृपापात्र थे और जिन्होंने पुरश्चरण विधि द्वारा भगवत प्राप्ति की। सद्गुरुदेव दृष्टा गुरु के महत्त्व को समझाते हुए बताते हैं कि जहाज से बँधी नाव के समान, सामर्थ्यवान गुरु शिष्य को द्रुत गति से आगे ले जाते हैं। स्वर्ग-नरक के भोग, क्रमोह्रासमान उपयोग विधि एवं मानव शरीर की दुर्लभता पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए निष्काम भक्ति की श्रेष्ठता प्रतिपादित की गई है। ब्रज में बाबा की अलौकिक लीलाएँ — भंगी मैया से प्रसाद ग्रहण, शेर प्रसंग, गोविन्द मंदिर की तुलसी रक्षा, कीर्तन में अलौकिक नृत्य — इन सबका वर्णन सिद्ध पुरुष की अगम्य क्रिया-मुद्रा को दर्शाता है। अन्त में बिहारी दास को मृत्यु से बचाने तथा स्वयं उन्हें आशीर्वाद देकर नित्य धाम प्रस्थान करने की हृदयस्पर्शी कथा से सत्संग का उपसंहार होता है।

🧱 ज्ञान प्रवाह
graph TD A["🙏 मंगलाचरण एवं विषय प्रवेश"] --> B["📜 गुरु परम्परा — दीक्षा गुरु एवं वेशाश्रय"] B --> C["⚓ दृष्टा गुरु का महत्त्व"] C --> D["🚢 दृष्टांत — नाव एवं जहाज"] D --> E["🔥 पुरश्चरण विधि एवं कठिनाइयाँ"] E --> F["😈 देवताओं द्वारा बाधा"] F --> G["🌍 स्वर्ग-नरक का भोग विज्ञान"] G --> H["📉 क्रमोह्रासमान उपयोग विधि"] H --> I["🧑‍🌾 मानव शरीर — क्षेत्र एवं क्षेत्रज्ञ"] I --> J["🙏 निष्काम कर्म एवं भगवत प्राप्ति"] J --> K["🏔️ जगन्नाथ दास बाबा की तपस्या"] K --> L["🐅 शेर प्रसंग — नवद्वीप यात्रा"] L --> M["🧹 भंगी मैया प्रसंग — सिद्ध पुरुष का आचरण"] M --> N["🏛️ गोविन्द मंदिर — तुलसी रक्षा"] N --> O["💃 कीर्तन में अलौकिक नृत्य"] O --> P["✨ सिद्धि का स्वरूप — भक्त की उदासीनता"] P --> Q["💊 बिहारी दास को जीवनदान"] Q --> R["🙏 अन्तिम आशीर्वाद एवं तिरोभाव"]
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📌 विषय सूची (Table of Contents)

📖 आज की शिक्षाएं 📖 आज की विस्तृत शिक्षाएं

मंगलाचरण एवं विषय प्रवेश — श्री जगन्नाथ दास बाबा की गुरु परम्परा
सत्संग का शुभारम्भ, आलोच्य विषय की प्रस्तावना एवं श्री जगन्नाथ दास बाबा की दीक्षा एवं वेशाश्रय गुरु परम्परा का परिचय
🙏
मंगलाचरण एवं विषय प्रवेश
मंगलाचरण एवं सिद्ध श्री जगन्नाथ दास बाबा के जीवन चरित्र का विषय प्रवेश
▶ देखें (0:10) ▶ Watch (0:10)
सद्गुरुदेव मंगलाचरण करते हुए 'गुरु गौरचन्द्राय राधिका' एवं 'कृष्णाय कृष्णभक्ताय तद्भक्ताय नमो नमः' का उच्चारण करते हैं। तत्पश्चात् आज के आलोच्य विषय की घोषणा करते हुए बताते हैं कि आज सिद्ध श्री जगन्नाथ दास बाबा की पावन तिथि के उपलक्ष्य में उनके जीवन चरित्र सुधा का आस्वादन किया जाएगा। सद्गुरुदेव कहते हैं कि इस कथा श्रवण का उद्देश्य वाणी को पवित्र करना एवं अन्तःकरण को सुधारना है। श्री जगन्नाथ दास बाबा छः मास नवद्वीप धाम में एवं छः मास वृन्दावन में निवास करते थे। सद्गुरुदेव बताते हैं कि बाबा के पूर्व जीवन इतिहास के सम्बन्ध में विशेष सामग्री उपलब्ध नहीं है।
🔗 सत्संग के आरम्भ में मंगलाचरण एवं विषय प्रवेश से श्रोताओं की चित्तवृत्ति को पावन कथा के लिए तैयार किया जाता है।
📜
गुरु परम्परा — दीक्षा गुरु एवं वेशाश्रय
श्री जगन्नाथ दास बाबा की दीक्षा एवं वेशाश्रय गुरु परम्परा
▶ देखें (2:02) ▶ Watch (2:02)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि श्री जगन्नाथ दास बाबा के दीक्षा गुरु श्री शृंगार भट्ट गोस्वामी के वंशज श्री जगदानन्द गोस्वामी हैं, जो श्री नित्यानन्द प्रभु के वंशज हैं। श्री जगदानन्द गोस्वामी प्रभुपाद के कृपापात्र हैं। वेशाश्रय (भेखाश्रय) श्री जगन्नाथ दास बाबा ने सिद्ध श्री कृष्णदास बाबा से ग्रहण किया है। सिद्ध श्री कृष्णदास बाबा वृन्दावन के प्रसिद्ध सिद्ध सन्तों में गिने जाते हैं, जिन्होंने यमुना के तट पर दुमूल वन में कठोर तपस्या करते हुए श्री राधा रानी के साक्षात् दर्शन एवं उनकी कृपा प्राप्त की और तदनन्तर गोवर्धन में जाकर अपने अन्तिम समय तक वहीं निवास किया। ऐसे सामर्थ्यवान् गुरु से वेशाश्रय ग्रहण करके श्री जगन्नाथ दास बाबा ने कठोर तपस्या का मार्ग अपनाया।
🔗 गुरु परम्परा की पवित्रता से यह स्पष्ट होता है कि सिद्ध गुरु की कृपा ही शिष्य की साधना को सफलता प्रदान करती है।
📌 श्री जगन्नाथ दास बाबा की गुरु परम्परा:
  • दीक्षा गुरु — श्री जगदानन्द गोस्वामी (श्री शृंगार भट्ट गोस्वामी वंश, श्री नित्यानन्द प्रभु के वंशज)
  • वेशाश्रय गुरु — सिद्ध श्री कृष्णदास बाबा (दुमूल वन में तपस्या, श्री राधा रानी के दर्शन प्राप्त, गोवर्धन निवासी)
  • निवास — छः मास नवद्वीप धाम, छः मास वृन्दावन
  • आयु — लगभग 150 वर्ष
  • काल — लगभग 100 वर्ष पूर्व
दृष्टा गुरु का महत्त्व — जहाज और नाव का दृष्टान्त
दृष्टा गुरु (तत्त्वदृष्ट गुरु) एवं साधारण गुरु में भेद स्पष्ट करना तथा गुरु कृपा की अनिवार्यता प्रतिपादित करना
दृष्टा गुरु एवं साधारण गुरु में भेद
दृष्टा गुरु की कृपा शक्ति — जहाज और नाव का दृष्टान्त
▶ देखें (3:17) ▶ Watch (3:17)
सद्गुरुदेव दृष्टा गुरु (तत्त्वदृष्ट गुरु) के महत्त्व को विस्तार से समझाते हैं। दृष्टा गुरु वे हैं जो संसार चक्र से मुक्त हो चुके हैं, जिन्होंने भगवत प्रेम प्राप्ति कर ली है, जिनकी जड़-चेतन ग्रन्थि मुक्त हो चुकी है और जो भगवत प्रेम सान्निध्य प्राप्त कर चुके हैं। ऐसे गुरु के हृदय से कृपा शक्ति शिष्य में संचारित होती है। सद्गुरुदेव इसे एक सुन्दर दृष्टान्त से समझाते हैं — जैसे एक साधक अपनी छोटी नाव से स्वयं कष्ट उठाकर नदी पार करने का प्रयत्न करता है, किन्तु यदि उसी नाव को किसी विशाल जहाज से बाँध दिया जाए, तो जहाज उस नाव को सहज ही खींचकर पार ले जाता है। ठीक इसी प्रकार जो गुरु दृष्टा नहीं हैं, वैष्णव हैं, साधन करते हैं, किन्तु दृष्टा नहीं हैं — उनके शिष्य को अपने बल पर ही बड़े कष्ट से साधन मार्ग में आगे बढ़ना पड़ता है, और वह भी गुरु में एकान्तिक निष्ठा रहे तभी सम्भव है। परन्तु दृष्टा गुरु अपनी कृपा शक्ति के बल पर शिष्य को अल्प साधना में भी द्रुत गति से आगे ले जाने में समर्थ होते हैं। सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि गुरु में निष्ठा न रहने से साधन चेष्टा भी निष्क्रिय हो जाती है और सफल नहीं हो पाती।
🔗 श्री जगन्नाथ दास बाबा की सिद्धि का मूल कारण उनके दृष्टा गुरु सिद्ध श्री कृष्णदास बाबा की कृपा शक्ति है।
❓ प्रश्न: दृष्टा गुरु एवं साधारण गुरु में क्या मूल अन्तर है? ▶ 3:27
💡 उत्तर: सद्गुरुदेव समझाते हैं कि साधारण गुरु वैष्णव हैं, साधन करते हैं, किन्तु संसार चक्र से मुक्त नहीं हुए हैं। दृष्टा गुरु वे हैं जिन्होंने भगवत प्रेम प्राप्ति कर ली है, जड़-चेतन ग्रन्थि से मुक्त हो चुके हैं और भगवत कृपा के आविर्भाव योग्य हृदय प्राप्त कर चुके हैं। ऐसे गुरु की कृपा शक्ति शिष्य के भीतर संचारित होती है और शिष्य अल्प साधना में भी बहुत आगे निकल जाता है। जैसे जहाज से बँधी नाव सहज ही पार हो जाती है, वैसे ही दृष्टा गुरु का शिष्य द्रुत गति से साधन मार्ग में अग्रसर होता है।
✅ करें:
  • गुरु में एकान्तिक निष्ठा रखें, यही साधन की सफलता का आधार है।
❌ न करें:
  • गुरु में निष्ठा के बिना साधन चेष्टा निष्क्रिय हो जाती है।
⚖️ दृष्टा गुरु बनाम साधारण गुरु
दृष्टा गुरु (तत्त्वदृष्ट): संसार चक्र से मुक्त, भगवत प्रेम प्राप्त, जड़-चेतन ग्रन्थि मुक्त — कृपा शक्ति शिष्य में संचारित करने में समर्थ। शिष्य अल्प साधना में भी द्रुत गति से आग...
साधारण गुरु (वैष्णव): वैष्णव हैं, साधन करते हैं, किन्तु दृष्टा नहीं। शिष्य को अपने कष्ट से ही बड़े परिश्रम से साधन मार्ग में आगे बढ़ना पड़ता है, वह भी गुरु-निष्ठा रहे तभी स...
पुरश्चरण विधि — भगवत प्राप्ति का तीव्र मार्ग एवं उसकी कठिनाइयाँ
पुरश्चरण साधना की विधि, उसके नियम, देवताओं द्वारा बाधा, एवं श्री जगन्नाथ दास बाबा की पुरश्चरण साधना का वर्णन
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पुरश्चरण विधि — एक मास में भगवत प्राप्ति का मार्ग
पुरश्चरण विधि — विधि-विधान, कठिनाइयाँ एवं देवताओं द्वारा बाधा
▶ देखें (7:04) ▶ Watch (7:04)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि श्री जगन्नाथ दास बाबा ने हरिद्वार एवं ऋषिकेश में जाकर पुरश्चरण किया। पुरश्चरण एक ऐसी विधि है जिसमें विधि-विधान अनुसार साधना करने से एक मास में भगवत प्राप्ति सम्भव है — इतनी शक्ति इस विधि में है। किन्तु यह अत्यन्त कठिन है। इसके विधि-विधान में दिग्बन्धन करना, आसन सिद्ध करना, कूर्म चक्र स्थापन करना, आसन की दिशा का निर्णय करना — ये सब गुरु कृपा सापेक्ष हैं, स्वतन्त्र नहीं। दृष्टा गुरु के निर्देश पर ही यह विधि सम्पन्न होनी चाहिए। एकान्त भाव से विधि-नियम का पालन अनिवार्य है — शरीर शुद्ध होना चाहिए, मन विषय-वासना मुक्त होकर भगवत चिन्तन में तल्लीन होना चाहिए, कम से कम 18,000 बीज मन्त्रों का जप करना चाहिए, शुद्ध आहार-विहार का पालन करना चाहिए, एवं अखण्ड गाय के घी का प्रदीप प्रज्वलन करना पड़ता है। सद्गुरुदेव बताते हैं कि देवता लोग भी इस साधना में ईर्ष्यावश बाधा प्रदान करते हैं क्योंकि वे देखते हैं कि मनुष्य अल्प समय में संसार चक्र से मुक्त होकर भगवत धाम प्राप्त कर रहा है, जबकि वे स्वयं सकाम कर्मानुष्ठान के कारण मात्र स्वर्ग भोग में फँसे हैं। सद्गुरुदेव एक दृष्टान्त सुनाते हैं — गोविन्द कुण्ड में एक बाबा पुरश्चरण कर रहे थे, घी का प्रदीप प्रज्वलित करके बीज मन्त्र साधन कर रहे थे, द्वार बन्द था। अचानक देखते हैं कि एक कुत्ता आकर उस प्रज्वलित प्रदीप का घी चाटने लगा। बाबा ने सोचा यह अपवित्र हो गया, पुरश्चरण नष्ट हो गया — उन्होंने पत्थर उठाकर मारा, किन्तु न कोई कुत्ता था, न कुछ — सब अदृश्य हो गया, और उनका पुरश्चरण नष्ट हो गया। ये देवताओं द्वारा प्रदत्त बाधाएँ हैं जो नाना प्रकार के भय, अपशकुन इत्यादि दिखाकर साधक को विचलित करती हैं।
🔗 श्री जगन्नाथ दास बाबा ने इसी पुरश्चरण विधि द्वारा सिद्धि प्राप्त की, जो दृष्टा गुरु की कृपा से ही सम्भव हुई।
❓ प्रश्न: पुरश्चरण में विधि-विधान में भूल होने पर क्या होता है? ▶ 20:01
💡 उत्तर: सद्गुरुदेव बताते हैं कि पुरश्चरण में विधि-विधान में यदि कहीं भूल हो जाए तो उल्टा एक्शन (विपरीत प्रभाव) भी हो सकता है। इसीलिए यह साधना दृष्टा गुरु के निर्देश पर ही करनी चाहिए, स्वतन्त्र रूप से करना अत्यन्त खतरनाक है। कलियुग में यह और भी कठिन है क्योंकि मन को संयमित करना एवं निरोग काया बनाए रखना सहज नहीं।
❌ न करें:
  • पुरश्चरण कभी गुरु के निर्देश के बिना स्वतन्त्र रूप से न करें।
📌 पुरश्चरण विधि के मुख्य नियम:
  • दिग्बन्धन करना
  • आसन सिद्ध करना
  • कूर्म चक्र स्थापन करना
  • आसन की दिशा का निर्णय करना
  • कम से कम 18,000 बीज मन्त्रों का जप
  • शुद्ध आहार-विहार
  • अखण्ड गाय के घी द्वारा प्रदीप प्रज्वलन
  • एकान्त भाव से साधना
  • गुरु कृपा सापेक्ष — स्वतन्त्र नहीं
स्वर्ग-नरक का भोग विज्ञान एवं क्रमोह्रासमान उपयोग विधि
सकाम कर्म से स्वर्ग प्राप्ति, भौतिक भोग की सीमितता, क्रमोह्रासमान उपयोग विधि, एवं देवताओं की मनुष्य तनु की अभिलाषा
🌍
स्वर्ग-नरक का भोग विज्ञान — सकाम कर्म एवं दिव्य शरीर
स्वर्ग-नरक का भोग विज्ञान — भौतिक भोग की सीमितता एवं दैव शरीर का स्वरूप
▶ देखें (9:21) ▶ Watch (9:21)
सद्गुरुदेव स्वर्ग एवं नरक के भोग विज्ञान को विस्तार से समझाते हैं। जब मनुष्य सकाम शुभ-मंगल कर्मानुष्ठान करता है तो बहुत पुण्य संचित हो जाता है। यदि यह पुण्य इस शरीर में भोगने योग्य हो तो धन-सम्पत्ति, वित्त-वैभव, मान-प्रतिष्ठा इत्यादि प्राप्त होते हैं। किन्तु जब पुण्य इतना अधिक संचित हो जाता है कि इस शरीर द्वारा भोग सम्भव नहीं, तो स्वर्ग लोक में भोगने का अवसर मिलता है। सद्गुरुदेव बताते हैं कि भौतिक शरीर में इन्द्रिय भोग अत्यन्त सीमित है — अधिक खाओगे तो अपच, अधिक देखोगे तो आँखें खराब, अधिक सुनोगे तो कान खराब — इन्द्रियाँ निष्क्रिय एवं व्याधिग्रस्त हो जाती हैं। स्वर्ग लोक में दैव शरीर मिलता है जो कितना भी भोग करने पर नष्ट नहीं होता — यहाँ से शतगुणा भोग सम्भव है। जब तक संचित पुण्य राशि है, तब तक स्वर्ग में दिव्य भोग सुख प्राप्त होता रहता है। किन्तु पुण्य क्षय होने पर मर्त्यलोक में पुनः आकर पशु-पक्षी नाना योनि भ्रमण करना पड़ता है। इसी प्रकार नारकीय शरीर भी होता है — जब अधिक पाप होता है तो नारकीय शरीर मिलता है जो कितना भी जलाओ, मरता नहीं — अनन्त यातना सहन करता है।
🔗 स्वर्ग भोग की क्षणिकता एवं मर्त्यलोक में पुनरागमन से यह स्पष्ट होता है कि सकाम कर्म से परम कल्याण सम्भव नहीं — केवल निष्काम भक्ति ही उपाय है।
पुण्य क्षय होने पर मर्त्यलोक में पुनरागमन— भगवद् गीता Bhagavad Gita 9.21
▶ 14:40
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति। एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते॥
te taṁ bhuktvā svargalokaṁ viśālaṁ kṣīṇe puṇye martyalokaṁ viśanti | evaṁ trayīdharmam anuprapannā gatāgataṁ kāmakāmā labhante ||
वे उस विशाल स्वर्ग लोक का भोग करके, पुण्य क्षीण होने पर मर्त्यलोक में लौट आते हैं। इस प्रकार तीनों वेदों के धर्म का अनुसरण करने वाले, काम-कामना से युक्त, आवागमन को प्राप्त होते हैं।
⚖️ भौतिक शरीर बनाम दैव शरीर का भोग
भौतिक शरीर (मर्त्यलोक): इन्द्रिय भोग अत्यन्त सीमित — अधिक भोग से इन्द्रियाँ निष्क्रिय एवं व्याधिग्रस्त हो जाती हैं। क्रमोह्रासमान — भोग की स्पृहा क्रमशः कम होती जाती है।
दैव शरीर (स्वर्ग लोक): शतगुणा भोग सम्भव — कितना भी भोग करो, शरीर नष्ट नहीं होता। ह्रासमान नहीं — जब तक पुण्य संचित है, तब तक दिव्य भोग सुख अक्षुण्ण रहता है।
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क्रमोह्रासमान उपयोग विधि — भोग की स्पृहा का क्रमिक ह्रास
क्रमोह्रासमान उपयोग विधि — भौतिक भोग में आनन्द का क्रमिक क्षय
▶ देखें (12:28) ▶ Watch (12:28)
सद्गुरुदेव एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त बताते हैं — क्रमोह्रासमान उपयोग विधि। इसे रसगुल्ले के दृष्टान्त से समझाते हैं — प्रथम रसगुल्ला खाने पर जितना आनन्द आता है, दूसरे में उससे कम, तीसरे में और भी कम, चौथे में विरक्ति, पाँचवें में उबकाई और छठे में उल्टी आ जाती है। यही क्रमोह्रासमान उपयोग विधि है — हमारी समस्त भोग क्रिया में आनन्द क्रमशः क्षीण होता जाता है। प्रियजन के मिलन में भी प्रथम बहुत आनन्द, दो-चार दिन पश्चात् वह प्रीति नष्ट हो जाती है, फिर वह प्रियजन कितने शीघ्र चले जाए तो अच्छा — ऐसा अनुभव होता है। यह हमारे भौतिक जीवन का नियम है। किन्तु स्वर्ग लोक में ऐसा ह्रासमान नहीं है — खूब भोगो, वह नष्ट नहीं होगा, जब तक पुण्य राशि है तब तक दिव्य भोग प्राप्त होता रहता है।
🔗 भौतिक भोग की क्षणभंगुरता एवं ह्रासमान प्रकृति को समझकर साधक निष्काम भक्ति की ओर प्रवृत्त होता है।
मानव शरीर की दुर्लभता — क्षेत्र एवं क्षेत्रज्ञ का विवेचन
मानव शरीर रूपी क्षेत्र की दुर्लभता, निष्काम भक्ति की श्रेष्ठता, एवं देवताओं की मनुष्य तनु की अभिलाषा
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निष्काम कर्म एवं मानव शरीर रूपी क्षेत्र
मानव शरीर — क्षेत्र एवं क्षेत्रज्ञ: भोग में जहर, योग में अमृत
▶ देखें (15:23) ▶ Watch (15:23)
सद्गुरुदेव निष्काम कर्म की श्रेष्ठता प्रतिपादित करते हैं। जहाँ सकाम कर्म से मात्र स्वर्ग प्राप्त होता है, वहीं निष्काम कर्म — जिसमें एकमात्र भगवत प्रसन्नता उद्देश्य हो, कर्तृत्व अभिमान वर्जित हो, स्वयं को दास एवं प्रभु को कर्ता मानकर कर्म किया जाए — उसका फल भगवत चरण प्राप्ति है। सद्गुरुदेव श्री रामप्रसाद (मातृ साधक) का एक सुन्दर पद उद्धृत करते हैं — 'मनरे कृषिकाज जानो ना' — अर्थात् हे मन, तुझे खेती करना आता नहीं! यह शरीर एक क्षेत्र है और जीवात्मा क्षेत्रज्ञ है — इस क्षेत्र का स्वामी। यदि इस शरीर रूपी क्षेत्र में भगवत भजन की खेती करते तो अमृत फल फलता, किन्तु भोग जीवन व्यतीत किया तो जहर उगा। यह शरीर भोग में ले जाएगा तो संसार चक्र में बन्धन दशा, और योग में ले जाएगा तो भगवत धाम। सद्गुरुदेव बताते हैं कि यह पंचभौतिक शरीर सप्त धातु (रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र), कृमि-कीट, विष्ठा-मूत्र इत्यादि गन्दगी से परिपूर्ण है, किन्तु यदि इसे भगवत चरण में समर्पित करें तो अमृत फल फलता है। देवता लोग भी मनुष्य तनु की अभिलाषा करते हैं — 'हमको एक बार भारत भूमि में मनुष्य शरीर मिल जाए, फिर हम भजन करके संसार से मुक्त हो जाएँ।' किन्तु ईर्ष्यावश वे साधकों को बाधा पहुँचाते हैं।
🔗 मानव शरीर की दुर्लभता का बोध होने पर ही साधक पुरश्चरण जैसी कठोर तपस्या में प्रवृत्त होता है — जैसा कि श्री जगन्नाथ दास बाबा ने किया।
✅ करें:
  • मानव शरीर रूपी क्षेत्र में भगवत भजन की खेती करें — अमृत फल फलेगा।
❌ न करें:
  • भोग जीवन व्यतीत करने से इस क्षेत्र में जहर उगता है।
⚖️ मानव शरीर रूपी क्षेत्र का उपयोग
भोग मार्ग (जहर): भोग जीवन व्यतीत करने से जीवात्मा बन्धन दशा को प्राप्त करता है, संसार चक्र में 84 लाख योनियों में भ्रमण करता है।
योग मार्ग (अमृत): भगवत चरण में समर्पण करके भजन करने से संसार चक्र से मुक्ति एवं भगवत धाम प्राप्ति होती है।
📌 पंचभौतिक शरीर की सप्त धातु:
  • रस
  • रक्त
  • मांस
  • मेद
  • अस्थि
  • मज्जा
  • शुक्र
श्री जगन्नाथ दास बाबा की कठोर तपस्या एवं सिद्धि
बाबा के चतुर्मास पुरश्चरण, कठोर उपवास एवं सिद्धि प्राप्ति का वर्णन तथा बिहारी दास के साथ ब्रज जीवन
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बाबा का चतुर्मास पुरश्चरण एवं सिद्धि
श्री जगन्नाथ दास बाबा का चतुर्मास पुरश्चरण — कठोर उपवास से सिद्धि प्राप्ति
▶ देखें (21:15) ▶ Watch (21:15)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि श्री जगन्नाथ दास बाबा ने चतुर्मास (चार मास) का कठोर पुरश्चरण करके भगवत प्राप्ति की एवं सिद्ध हुए। प्रथम मास में वे प्रतिदिन संध्या के समय केवल चार केले खाते थे। द्वितीय मास में केवल एक अमरूद। तृतीय मास में केले का फूल उबालकर अत्यल्प मात्रा में ग्रहण करते थे। इस प्रकार चार मास के चतुर्वश्च पुरश्चरण से उन्होंने सिद्धि प्राप्त की। सिद्ध होने के पश्चात् बाबा ब्रजमण्डल में इधर-उधर विचरण करते थे, एक स्थान पर नहीं रहते थे। उनके प्रधान शिष्य श्री बिहारी दास ब्रजवासी थे — सुन्दर नवयौवन शरीर, बड़ा सुन्दर आधार। बाबा वृद्धावस्था में आ गए थे, चलना-फिरना असम्भव हो गया था। अतः बिहारी दास एक बड़ी टोकरी में कम्बल बिछाकर, नीचे कुछ कूटा-फूटा रखकर, बाबा को मस्तक पर उठाकर स्थानान्तरित करते थे — कभी सूर्यकुण्ड, कभी अन्यत्र।
🔗 बाबा की कठोर तपस्या दृष्टा गुरु की कृपा एवं पुरश्चरण विधि की शक्ति का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
📌 चतुर्मास पुरश्चरण का आहार क्रम:
  • प्रथम मास — प्रतिदिन संध्या काल में केवल 4 केले
  • द्वितीय मास — केवल 1 अमरूद
  • तृतीय मास — केले का फूल उबालकर अत्यल्प मात्रा में
  • चतुर्थ मास — इसी प्रकार क्रमशः न्यूनतम आहार
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सूर्यकुण्ड निवास, सोने का गौरांग विग्रह एवं चोर प्रसंग
सूर्यकुण्ड में निवास — सोने के गौरांग विग्रह की चोरी का प्रयास
▶ देखें (23:20) ▶ Watch (23:20)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि बाबा ने बिहारी दास से कहा — 'चल बिहारी, अब सूर्यकुण्ड में निवास करेंगे।' सूर्यकुण्ड में इधर-उधर से कुछ पैसा संग्रह करके एक छोटी झोपड़ी बनाई एवं ठाकुर जी का विग्रह स्थापित किया — सोने का गौरांग (श्री चैतन्य महाप्रभु) विग्रह। एक दिन एक चोर आया, सोने का विग्रह चुराकर ले जाने के लिए। किन्तु जाते समय उसके माथे पर इतना ज़ोर से धक्का लगा कि वह अचेत होकर गिर गया। प्रभात होने पर जब उसे चेतना आई तो डर के मारे विग्रह छोड़कर भाग गया। तब श्री जगन्नाथ दास बाबा ने कहा — 'ले बिहारी, अब यहाँ बहुत उत्पात हो रहा है, चल यहाँ से चलेंगे — नवद्वीप चलेंगे।'
🔗 सिद्ध पुरुष के विग्रह की रक्षा स्वयं अलौकिक शक्ति करती है — यह बाबा की सिद्धि का एक प्रमाण है।
शेर प्रसंग — नवद्वीप यात्रा एवं सिद्ध पुरुष की निर्भयता
नवद्वीप की पैदल यात्रा में शेर के साथ अलौकिक प्रसंग का वर्णन
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शेर प्रसंग — महाप्रभु के पार्षद
नवद्वीप यात्रा में शेर प्रसंग — सिद्ध पुरुष की निर्भयता एवं दिव्य दृष्टि
▶ देखें (24:31) ▶ Watch (24:31)
सद्गुरुदेव एक अत्यन्त रोमांचक प्रसंग सुनाते हैं। बिहारी दास टोकरी में बाबा को मस्तक पर उठाकर नवद्वीप की ओर पैदल चल रहे हैं। झाड़ीखण्ड (जंगल) के रास्ते में एक शेर बैठा हुआ है। बिहारी दास शेर देखकर भयभीत होकर पीछे मुड़कर चलने लगे। बाबा ने पूछा — 'क्या रे बिहारी, उल्टा क्यों चल रहा है?' बिहारी बोले — 'बाबा, एक शेर बैठा है!' बाबा ने कहा — 'अरे पागल, ये महाप्रभु के पार्षद हैं! ये सन्त दर्शन करने के लिए यहाँ बैठे हैं। वो कुछ नहीं कहेगा, चल चल आगे चल!' बिहारी दास ने बाबा की आज्ञा मानकर आगे बढ़ना आरम्भ किया। शेर ने उन्हें देखकर रास्ता छोड़ दिया और जंगल में चला गया। इस प्रकार नौ दिनों में पैदल चलकर वे नवद्वीप पहुँचे। नवद्वीप में सिद्ध श्री भगवान दास बाबा के सान्निध्य में कुछ दिन रहे, अन्य स्थानों पर भी रहकर बहुत भजन किया। फिर कुछ दिनों पश्चात् बाबा ने कहा — 'चल रे, वृन्दावन जाएँगे, यहाँ अच्छा नहीं लगता।' पुनः बिहारी दास ने बाबा को मस्तक पर टोकरी में उठाकर पैदल वृन्दावन की यात्रा की।
🔗 सिद्ध पुरुष की दिव्य दृष्टि में पशु भी महाप्रभु के पार्षद हैं — यह दृष्टान्त सिद्ध पुरुष की सर्वव्यापी भगवत दृष्टि को प्रकट करता है।
ब्रज में रूखा-सूखा जीवन — सन्तों की तपस्या बनाम आधुनिक सुख-सुविधा
सन्तों का अत्यल्प आहार में भजन एवं दीर्घायु, तथा आधुनिक सुख-सुविधाओं में भी भजन न होने की विडम्बना
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सन्तों का रूखा-सूखा जीवन बनाम आधुनिक सुख-सुविधा
सामाजिक कटाक्ष: अत्यल्प आहार में दीर्घ भजन बनाम समस्त सुविधाओं में भजनहीनता
▶ देखें (26:15) ▶ Watch (26:15)
सद्गुरुदेव वृन्दावन में बाबा के जीवन का वर्णन करते हुए बताते हैं कि बाबा तीन-तीन, चार-चार दिन भूखे रहते थे, कोई फर्क नहीं पड़ता था। बिहारी दास कहते — 'बाबा, आपने तो कुछ खाया नहीं, तो हम कैसे खाएँ?' बाबा कहते — 'अरे पागल, ऐसा थोड़ी होता है! जा, चुन भिक्षा करके रोटी बना!' बिहारी दास ब्रजवासियों के घर से आटा लेकर नमक से रोटी बनाते, ठाकुर जी को अर्पित करते, बाबा नाममात्र लेते — किस प्रकार शरीर धारण करते थे, भगवान ही जानें। सद्गुरुदेव अपने स्वयं के गुरुदेव का भी स्मरण करते हैं — सारा दिन कुछ नहीं, संध्या के समय थोड़ा-सा कोटू-चून के आटे की दो छोटी-छोटी रोटी (पूरी के आकार की), उसमें भी एक रोटी का आधा पड़ा रहता, थोड़ी उबली सब्जी — ऐसा शाकाहार। सद्गुरुदेव कटाक्ष करते हैं कि आज हम लोग इतना खाकर भी व्याधिग्रस्त हो जाते हैं — तीन-चार बार भोजन, सुबह कलेवा, दोपहर राजभोग, शाम को फलाहार, रात को फिर भोजन, दूध भी चाहिए — विटामिन, प्रोटीन, काजू, पिस्ता, किशमिश, मेवा खाते हैं, फिर भी भजन नहीं होता। समस्त सुख-सुविधाओं के भीतर रहकर भी भजन नहीं होता, जबकि पूर्वकाल के सन्त रूखा-सूखा, कभी अनाहार, कभी निराहार रहकर निश्चिन्त होकर भजन करते थे और दीर्घायु होते थे। श्री जगन्नाथ दास बाबा 150 वर्ष तक जीवित रहे। सद्गुरुदेव बताते हैं कि ब्रज में अभी भी ऐसे अनेक सन्त हैं — उनके पास एक वैरागी बाबा रहते थे जिनकी आयु 112 वर्ष हो गई।
🔗 सन्तों के कठोर जीवन का वर्णन साधकों को प्रेरित करता है कि भजन के लिए भौतिक सुख-सुविधाओं की नहीं, गुरु कृपा एवं निष्ठा की आवश्यकता है।
⚖️ पूर्वकाल के सन्तों का भजन बनाम आधुनिक साधक
पूर्वकाल के सन्त: रूखा-सूखा, कभी अनाहार, कभी निराहार — निश्चिन्त होकर तीव्र भजन, दीर्घायु (100-150 वर्ष), निरोग काया।
आधुनिक साधक: समस्त सुख-सुविधा, विटामिन-प्रोटीन, काजू-पिस्ता-किशमिश — फिर भी भजन नहीं होता, शरीर अपटु, इन्द्रियाँ निष्क्रिय, व्याधिग्रस्त।
भंगी मैया प्रसंग — सिद्ध पुरुष के अगम्य आचरण
राधाकुण्ड में भंगी मैया से प्रसाद ग्रहण एवं साधु समाज की समालोचना पर बाबा का उत्तर — सिद्ध पुरुष शुद्धि-अशुद्धि से परे हैं
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भंगी मैया प्रसंग — सिद्ध पुरुष विधि-निषेध से परे
राधाकुण्ड में भंगी मैया प्रसंग — सिद्ध पुरुष शुद्धि-अशुद्धि से अतीत हैं
▶ देखें (30:27) ▶ Watch (30:27)
सद्गुरुदेव एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रसंग सुनाते हैं। श्री जगन्नाथ दास बाबा एक बार राधाकुण्ड में थे। वहाँ भण्डारा हुआ था और जो पूरी-कचौड़ी-पुआ इत्यादि बच जाता या फेंक दिया जाता, वह सफाई कर्मी (भंगी) लोग एकत्र करके खाते थे। बाबा ने एक भंगी मैया से पूछा — 'मैया, तेरी टोकरी में क्या है?' मैया बोलीं — 'बाबा, ये तो भिक्षा है।' बाबा बोले — 'हमको थोड़ा दे!' और उनकी टोकरी से लेकर एक पूरी खा ली। यह सब सन्तों एवं साधुओं ने देख लिया। उस समय समाज जीवन में शुद्धाचार का बहुत कठोर पालन होता था। एक सन्त का भंगी मैया के हाथ की जूठी टोकरी से खाना — यह आहार शुद्धि के विरुद्ध था। साधु समाज में समालोचना का कारण बन गया। श्री नीलमुनि गोस्वामी सहित बड़े-बड़े सन्तों ने राधाकुण्ड में पंचायत बुलाई और बाबा को बुलाया। बाबा ने आकर कहा — 'बोलिए, क्या आदेश है?' सन्तों ने कहा — 'आप सामर्थ्य महापुरुष हैं, सब कुछ कर सकते हैं, किन्तु यह तो साधक जीवन में स्वीकृत नहीं — अपवित्र वस्तु ग्रहण करना। आपको देखकर भ्रष्टाचार फैलेगा।' बाबा ने उत्तर दिया — 'ये भंगी लोग तो ब्रज के सफाई कर्मी हैं, ब्रज को पवित्र रखते हैं, ये ब्रज के सेवक हैं। ये कोई साधारण नहीं — ये मुनि-ऋषि हैं जो ब्रज में निम्न कुल में जन्म लेकर ब्रज की पवित्रता की रक्षा करते हैं। ये तो हमारे लिए प्रणम्य हैं, मातृ-स्थानीय हैं। और आप लोग तख्त पर बैठकर भजन करते हैं, उच्च कोटि हो गए, और ये निम्न कोटि?' तब सब सन्तों ने समझा कि बाबा जहाँ से बात करते हैं, वहाँ हमारी पहुँच नहीं। सद्गुरुदेव बताते हैं कि भगवत प्राप्ति कर लेने पर सिद्ध पुरुष विधि-निषेध के ऊपर उठ जाते हैं, विधि-निषेध से उनका कोई मतलब नहीं रहता। सद्गुरुदेव इस सन्दर्भ में श्रीमद्भागवत का श्लोक उद्धृत करते हैं तथा सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं कि महत्पुरुष की क्रिया-मुद्रा मनुष्य के बोध के अगम्य है।
🔗 भंगी मैया प्रसंग सिद्ध पुरुष की दिव्य दृष्टि को दर्शाता है — वे सबमें भगवत अंश देखते हैं और विधि-निषेध से अतीत हैं।
उत्तम भक्त विधि-निषेध से अतीत— श्रीमद् भागवतम् Srimad Bhagavatam 11.11.32
▶ 33:00
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
आज्ञायैवं गुणान् दोषान् मयादिष्टानपि स्वकान्। धर्मान् सन्त्यज्य यः सर्वान् मां भजेत् स च सत्तमः॥
ājñāyaivaṁ guṇān doṣān mayādiṣṭān api svakān | dharmān santyajya yaḥ sarvān māṁ bhajet sa ca sattamaḥ ||
जो मेरे द्वारा आदिष्ट गुण-दोष सहित समस्त धर्मों को भी त्यागकर केवल मेरा भजन करता है, वही सत्तम (उत्तम भक्त) है।
❓ प्रश्न: सिद्ध पुरुष के आचरण में दोषदर्शन करने का क्या परिणाम है? ▶ 34:53
💡 उत्तर: सद्गुरुदेव कहते हैं कि महत्पुरुष की क्रिया-मुद्रा विज्ञ (विद्वान, प्रवीण) भी कभी-कभी समझ नहीं पाते। जो उनकी क्रिया-मुद्रा में दोषदर्शन करते हैं, वे अपना ही अमंगल साधन करते हैं। 'महत् क्रिया मुद्रा विज्ञ ना बुझाए' — अर्थात् महत्पुरुष का आचरण कभी देखना नहीं चाहिए, उनके कार्यों में दोष खोजने का प्रयत्न करना अपराध है।
✅ करें:
  • महत्पुरुष की क्रिया-मुद्रा में कभी दोषदर्शन न करें।
❌ न करें:
  • सिद्ध पुरुष के आचरण को सामान्य मनुष्य के मानदण्ड से न आँकें।
अलौकिक सिद्धियों के दृष्टान्त — गोविन्द मन्दिर, धनाढ्य व्यक्ति एवं कीर्तन नृत्य
सिद्ध पुरुष की अलौकिक शक्तियों के दृष्टान्त, सन्त-सेवा की विधि, एवं सिद्धाई (अष्ट सिद्धि) के प्रति भक्तों की उदासीनता
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गोविन्द मन्दिर की तुलसी रक्षा — त्रिकालदृष्ट महापुरुष
धनाढ्य व्यक्ति का आगमन एवं गोविन्द मन्दिर में तुलसी रक्षा — बाबा की त्रिकालदर्शी सिद्धि
▶ देखें (35:24) ▶ Watch (35:24)
सद्गुरुदेव एक और अलौकिक प्रसंग सुनाते हैं। एक धनाढ्य व्यक्ति ने सुना कि श्री जगन्नाथ दास बाबा बड़े सिद्ध महात्मा हैं, त्रिकालदृष्ट महापुरुष हैं — वे उनके दर्शन लेने आए। आकर पूछा — 'यहाँ जगन्नाथ दास सिद्ध बाबा कौन हैं?' बाबा ने कहा — 'सिद्ध बाबा-फिद्ध बाबा तो हम जानते नहीं, जगन्नाथ दास तो ये शरीर का नाम है — आप कहाँ से आए हैं?' और ऐसा कहकर भीतर जाकर लाठी (सापी) लेकर ज़ोर-ज़ोर से मिट्टी पर प्रहार करने लगे — 'ए भाग, भाग यहाँ से!' वह व्यक्ति समझे कि बाबा नाराज़ हो गए, कोई अपराध हो गया। दूसरे दिन आकर क्षमा माँगी। बाबा बोले — 'क्यों, क्या हुआ?' बोले — 'आपने डण्डे से प्रहार किया!' बाबा ने कहा — 'ना ना, ऐसा नहीं — उस समय हम देखते हैं कि गोविन्द मन्दिर में एक तुलसी है, उस तुलसी को बकरियाँ आकर खा रही थीं — हम उन बकरियों को भगा रहे थे!' बाबा तो यहाँ हैं, और गोविन्द मन्दिर दूसरे स्थान पर — यह त्रिकालदर्शी शक्ति का प्रमाण है। धनाढ्य व्यक्ति ने तुरन्त टेलीग्राम (उस समय ₹20 लगते थे) भेजकर वृन्दावन के गोविन्द मन्दिर में पता कराया — पता चला कि ठीक उसी समय (दोपहर) बकरियाँ तुलसी खा रही थीं, तो एक वृद्ध बाबा ने आकर डण्डा दिखाकर उन्हें भगा दिया! तब धनाढ्य व्यक्ति को बाबा की सिद्धि का प्रत्यक्ष प्रमाण मिला।
🔗 गोविन्द मन्दिर की तुलसी रक्षा बाबा की त्रिकालदर्शी सिद्धि का अकाट्य प्रमाण है।
तत्त्वदर्शी गुरु से ज्ञान प्राप्ति— भगवद् गीता Bhagavad Gita 4.34
▶ 37:49
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥
tad viddhi praṇipātena paripraśnena sevayā | upadekṣyanti te jñānaṁ jñāninas tattva-darśinaḥ ||
उस ज्ञान को तुम प्रणिपात, परिप्रश्न एवं सेवा द्वारा जानो — तत्त्वदर्शी ज्ञानी पुरुष तुम्हें ज्ञान का उपदेश करेंगे।
❓ प्रश्न: सन्त के सान्निध्य में जाते समय क्या सावधानी रखनी चाहिए? ▶ 36:37
💡 उत्तर: सद्गुरुदेव बताते हैं कि साधु-सन्त के पास जाने से पहले उनके मूड एवं इच्छा को देखना चाहिए। यदि वे बात करने के मनोभाव में हैं तो बात करें, अन्यथा न करें। उनके सान्निध्य में अधिक समय न लें, अधिक बात न करें — उनके भजन में कोई विघ्न न डालें। यह कभी-कभी अपराध बन जाता है। सन्त उद्विग्न हो जाते हैं किन्तु कह नहीं पाते। कोई जिज्ञासा या प्रश्न हो तो उनकी इच्छा जानकर, मूड देखकर ही प्रश्न करना चाहिए।
✅ करें:
  • सन्त के मूड एवं इच्छा देखकर ही उनके सान्निध्य में जाएँ।
  • कोई जिज्ञासा हो तो प्रणिपात, सेवा एवं विनम्रता से प्रश्न करें।
❌ न करें:
  • सन्तों के भजन में विघ्न न डालें — यह अपराध बन सकता है।
  • सन्तों के सान्निध्य में अधिक समय लेना एवं अधिक बातें करना उचित नहीं।
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सिद्धाई का स्वरूप — भक्तों की उदासीनता
सिद्धाई (अलौकिक शक्ति) का स्वरूप — साधक के पीछे-पीछे चलती है, पकड़ने से प्रेम प्राप्ति में बाधा
▶ देखें (40:02) ▶ Watch (40:02)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि ये सिद्धाई (अलौकिक शक्ति) कोई बड़ी बात नहीं है। ये साधक के पीछे-पीछे अनुगमन करती है — जब साधक भगवत चरण में समर्पित होकर भजन करता है, तो सिद्धाई उसकी सेवा करने के लिए पीछे-पीछे चलती है। सिद्धाई साधना का विषय नहीं है, वह साधक को स्वयं ही प्राप्त होती है — साधक जान भी नहीं पाते कि सिद्धाई आकर सेवा कर रही है। किन्तु सद्गुरुदेव श्रीमद्भागवत पुराण का सन्दर्भ देते हुए सावधान करते हैं कि जो भक्त एक भी सिद्धाई को पकड़ लेता है, वह प्रेम प्राप्ति नहीं कर पाएगा। इसीलिए माधुर्य रस के उपासक, जुगल किशोर की प्रेम उपासना करने वाले साधक सिद्धाई को दूर से दण्डवत करते हैं — भय पाते हैं कि यह हमारे मन को मोहित न कर ले, इसमें हम चमत्कृत होकर रम न जाएँ। सद्गुरुदेव स्वयं का अनुभव भी साझा करते हैं कि ब्रज में ऐसी बहुत अलौकिक घटनाएँ देखी हैं — बिना चिन्ता किए कहाँ से अदृश्य शक्ति आकर अघटन-घटन करती है, अलौकिक शक्ति का प्रकाश दिखाती है।
🔗 सिद्ध पुरुष की अलौकिक शक्तियाँ उनकी भजन-सिद्धि का स्वाभाविक परिणाम हैं, लक्ष्य नहीं — लक्ष्य तो प्रेम प्राप्ति है।
❓ प्रश्न: सिद्धाई (अलौकिक शक्ति) को पकड़ने से क्या हानि है? ▶ 41:03
💡 उत्तर: सद्गुरुदेव श्रीमद्भागवत पुराण का सन्दर्भ देते हुए बताते हैं कि जो भक्त एक भी सिद्धाई को पकड़ लेता है — अर्थात् उसमें रम जाता है, उसका प्रदर्शन या उपयोग करता है — वह प्रेम प्राप्ति नहीं कर पाएगा। प्रेम उपासक साधक सिद्धाई से भय रखते हैं और दूर से दण्डवत करते हैं कि यह हमारे मन को मोहित न कर ले। सिद्धाई साधना का लक्ष्य नहीं है — वह भजन की उपोत्पत्ति (बाय-प्रॉडक्ट) है।
❌ न करें:
  • सिद्धाई को कभी न पकड़ें — इससे प्रेम प्राप्ति में बाधा होती है।
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कीर्तन में अलौकिक नृत्य — शारीरिक धर्म से अतीत
कीर्तन में बाबा का अलौकिक नृत्य — वृद्ध शरीर की सीमाओं से परे अलौकिक शक्ति
▶ देखें (42:38) ▶ Watch (42:38)
सद्गुरुदेव एक और अद्भुत लीला सुनाते हैं। एक बार बिहारी दास टोकरी में बाबा को मस्तक पर लेकर जा रहे थे। मार्ग में बड़े साज-बाजा के साथ हरिनाम सङ्कीर्तन समारोह चल रहा था। बाबा ने उस अतिशय सुन्दर कीर्तन को सुनकर टोकरी से छलाँग लगाकर नीचे आ गए और अद्भुत नृत्य करने लगे — दो-तीन फीट ऊँचा उछलकर फिर नीचे गिरते, कंकड़-पत्थर पर उठते-गिरते। सब लोग आश्चर्यचकित हो गए — बाबा तो खड़े भी नहीं हो सकते, इन्हें टोकरी में उठाकर ले जाते हैं, और ये यहाँ इस प्रकार नृत्य कर रहे हैं! सद्गुरुदेव समझाते हैं कि वास्तव में ये महापुरुष भौतिक शारीरिक धर्म से अतीत हैं — अलौकिक शक्ति-सम्पन्न हैं। उनका वृद्ध, झुका हुआ, निष्क्रिय दिखने वाला शरीर एक नाटक मात्र है — वे देखने में ऐसे प्रतीत होते हैं, किन्तु उनकी शक्ति अपरिमित है। जब नृत्य शान्त हुआ, तब पुनः टोकरी में बैठकर पहले जैसे ही झुके हुए बैठ गए। सद्गुरुदेव इसकी पुष्टि में श्री चैतन्य दास बाबा (नवद्वीप) का भी प्रसंग सुनाते हैं — जो चल नहीं पाते थे, गाड़ी में ले जाते थे, किन्तु जब सद्गुरुदेव ने प्रेम सरोवर में उन्हें दण्डवत किया, तो तुरन्त उठकर सीधे जवान लड़के जैसे चल दिए — गाड़ी छोड़कर भीतर चले गए।
🔗 कीर्तन में अलौकिक नृत्य यह प्रमाणित करता है कि सिद्ध पुरुष शारीरिक धर्म से अतीत हैं — उनकी शक्ति भगवत शक्ति का ही प्रकाश है।
सद्गुरुदेव का व्यक्तिगत अनुभव — श्री चैतन्य दास बाबा का आगमन
भगवत शक्ति का संयोग — तीव्र इच्छा होने पर महापुरुष स्वयं आ जाते हैं
▶ देखें (44:01) ▶ Watch (44:01)
सद्गुरुदेव अपना व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हैं। वे प्रेम सरोवर में रहते थे, कहीं जा नहीं पाते थे, किसी महापुरुष का दर्शन नहीं होता था। मन में बड़ी खिन्नता थी — 'सन्त का दर्शन, सन्त का चरण-रस प्राप्ति, ये हमारे भाग्य में है नहीं, हम बहुत वंचित हैं।' एक दिन श्री चैतन्य दास बाबा (नवद्वीप के सिद्ध महात्मा, जो चल नहीं पाते थे, गाड़ी में ले जाये जाते थे) उनके गुरुदेव (सम्भवतः श्री सचिनन्दन बाबा) उन्हें लेकर प्रेम सरोवर में सद्गुरुदेव की कुटिया के सामने ले आए। सद्गुरुदेव ने देखा और साष्टाङ्ग प्रणिपात किया। बाबा तुरन्त उठकर सीधे खड़े हो गए — 'चलो, तुम्हारे घर चलो!' सीधे जवान लड़के की भाँति गाड़ी छोड़कर भीतर चल दिए। सद्गुरुदेव कहते हैं — यदि हृदय में तीव्र इच्छा, लालसा हो — 'ऐसे सन्त के चरण दर्शन का मौका मिलता!' — तो महापुरुष या भगवान स्वयं संयोग साधन करते हैं, आपके द्वार पर सन्त आ जाते हैं। यह भगवत शक्ति है — स्वतः क्रियाशील होकर साधक को कृतार्थ करने के लिए करुणार्द्र चित्त होकर कोई महापुरुष भेज देती है।
🔗 सद्गुरुदेव का व्यक्तिगत अनुभव इस सिद्धान्त की पुष्टि करता है कि भगवत शक्ति एवं महापुरुष की कृपा साधक की तीव्र इच्छा पर निर्भर है।
❓ प्रश्न: क्या तीव्र इच्छा से सन्त दर्शन सम्भव है? ▶ 46:04
💡 उत्तर: सद्गुरुदेव कहते हैं — हाँ, यदि हृदय में तीव्र स्पृहा एवं लालसा हो कि 'ऐसे सन्त के चरण दर्शन हों' तो भगवत शक्ति स्वतः क्रियाशील होकर संयोग साधन करती है। आपके द्वार पर सन्त अवश्य आ जाएँगे — यह भगवत करुणा है। सद्गुरुदेव स्वयं इसके साक्षी हैं — प्रेम सरोवर में रहते हुए तीव्र इच्छा करने पर श्री चैतन्य दास बाबा स्वयं उनकी कुटिया के सामने आ गए।
बिहारी दास को जीवनदान — भगवत शक्ति का प्रकाश
बिहारी दास की मृत्यु-तुल्य बीमारी, बाबा का अचिन्त्य शक्ति से जीवनदान, एवं जीवात्मा में निहित महाशक्ति का सिद्धान्त
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बिहारी दास की बीमारी — बाबा का अचिन्त्य शक्ति से जीवनदान
बिहारी दास को मृत्यु से बचाना — अचिन्त्य शक्ति एवं जीवात्मा में निहित महाशक्ति
▶ देखें (48:18) ▶ Watch (48:18)
सद्गुरुदेव एक अत्यन्त हृदयस्पर्शी प्रसंग सुनाते हैं। ब्रज में बिहारी दास गम्भीर रूप से बीमार हो गए, 21 दिन बीत गए, स्वस्थ नहीं हो रहे। बिहारी दास बाबा के एकमात्र सेवक थे — उनके अतिरिक्त कोई बाबा के प्रसाद की व्यवस्था नहीं करता था। परिणामस्वरूप 21 दिन बाबा निराहार रहे — जल तक ग्रहण नहीं किया। बहुत वैद्य बुलाए गए, सबने कहा — 'इनका जीवन धारण करना सम्भव नहीं, इनका समय हो गया।' यह सुनकर बाबा ने कहा — 'क्या! हम रहते हुए हमारा चेला चल जाएगा? ऐसा तो होना नहीं चाहिए! हमने भजन नहीं किया है? देखता हूँ कौन आता है इसको लेने के लिए — कौन काल आता है!' ऐसा कहकर बाबा बिहारी दास के मस्तक के पास बैठ गए, सारी रात जप करते रहे। प्रातः काल होते ही बिहारी दास ने आँखें खोलीं! बाबा ने कहा — 'ए बिहारी, उठ रे उठ! स्नान कर, रसोई बना — 21 दिन हो गए, हमने खाया नहीं, तेरे हाथ का खाना न खाने से हमारे भजन की स्पृहा नहीं होती!' बिहारी दास उठकर बैठ गए, स्नान-ध्यान करके रसोई बनाना आरम्भ कर दिया — एकदम स्वस्थ! सद्गुरुदेव इसका दार्शनिक विवेचन करते हैं — यह शक्ति सबके भीतर है, जीवात्मा उस महाशक्ति का ही अंश है। जब साधन एवं भगवत कृपा से अविद्या जनित आवरण उन्मोचित हो जाता है, तो उस महाशक्ति के साथ तदात्मता हो जाती है। तब कर्तुम-अकर्तुम — जो असम्भव कर्म हैं, वे भी सम्भव हो जाते हैं। यह भगवत शक्ति है।
🔗 बिहारी दास को जीवनदान अचिन्त्य शक्ति का प्रकाश है — यह शक्ति गुरु कृपा एवं साधन से प्राप्त भगवत तदात्मता का परिणाम है।
जीवात्मा भगवान का अविनाशी अंश— भगवद् गीता Bhagavad Gita 15.7
▶ 50:32
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः। मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥
mamaivāṁśo jīvaloke jīvabhūtaḥ sanātanaḥ | manaḥṣaṣṭhānīndriyāṇi prakṛtisthāni karṣati ||
इस जीवलोक में जीवभूत सनातन मेरा ही अंश है, जो प्रकृति में स्थित मन सहित छहों इन्द्रियों को आकर्षित करता है।
📌 अचिन्त्य शक्ति का दार्शनिक आधार:
  • जीवात्मा महाशक्ति (भगवान) का अंश है
  • अविद्या जनित आवरण के कारण यह शक्ति आच्छादित रहती है
  • साधन एवं भगवत कृपा से आवरण उन्मोचित होने पर महाशक्ति से तदात्मता होती है
  • तदात्मता होने पर कर्तुम-अकर्तुम शक्ति प्रकट होती है — असम्भव भी सम्भव हो जाता है
उपसंहार — अन्तिम आशीर्वाद एवं नित्य धाम प्रस्थान
बाबा का बिहारी दास को अन्तिम आशीर्वाद एवं नित्य धाम गमन — सत्संग का उपसंहार
🙏
बाबा का अन्तिम आशीर्वाद एवं नित्य धाम गमन
श्री जगन्नाथ दास बाबा का बिहारी दास को अन्तिम आशीर्वाद एवं सज्ञान तिरोभाव
▶ देखें (51:13) ▶ Watch (51:13)
सद्गुरुदेव सत्संग का उपसंहार करते हुए बाबा के तिरोभाव की कथा सुनाते हैं। जब बाबा की आयु 150 वर्ष हो गई, तो एक दिन बिहारी दास से कहा — 'बिहारी, अब तो हम चलेंगे। बता, तू क्या चाहता है? कुछ रुपया दे दूँ, दो-चार गाड़ी रुपया तेरे को दे दूँ?' बिहारी दास ने कहा — 'आप देंगे कहाँ से, आपके पास तो पैसा-कौड़ी कुछ है नहीं!' बाबा बोले — 'अरे, हमारे महाप्रभु हैं जगतपति जगन्नाथ! उनके पास माँगेंगे — बिहारी जी के लिए कहिए तो खूब देंगे! कितने रुपये चाहिए, बता!' बिहारी दास ने कहा — 'हमको रुपया नहीं चाहिए, तुम्हारा रुपया तुम रखो — हमको तो नाम चाहिए!' बाबा बोले — 'बढ़िया हुआ, अच्छा हुआ! जा, तेरे को मैं आशीर्वाद करता हूँ — तेरा मानव जीवन अब सफल हो जाएगा, तेरी साधना अब सफलकाम हो जाएगा, तू भगवत दृष्टा बन जाएगा, तेरे भीतर समस्त कृपा शक्ति आकर तेरे को कृतार्थ करेगी।' ऐसा आशीर्वाद देकर, बिहारी दास के मस्तक पर हस्त रखकर, सज्ञान श्री जगन्नाथ दास बाबा नित्य धाम चले गए। सद्गुरुदेव बताते हैं कि बाबा का स्थान नवद्वीप में श्री चैतन्य महाप्रभु के बिल्कुल बगल में है। ऐसे महापुरुष की कृपा प्राप्ति, उनका शिष्यत्व ग्रहण — यह पूर्व जन्मार्जित अति सौभाग्य का सूचक है, यह केवल चेष्टा से प्राप्त नहीं होता — भगवत कृपा से ही ऐसी सेवा प्राप्ति होती है।
🔗 बाबा का सज्ञान तिरोभाव एवं बिहारी दास को आशीर्वाद — यह सिद्ध पुरुष की कृपा शक्ति का चरमोत्कर्ष है, जिससे सम्पूर्ण सत्संग का सार प्रकट होता है।
❓ प्रश्न: ऐसे सामर्थ्यवान महापुरुष का सान्निध्य प्राप्त करने का उपाय क्या है? ▶ 47:36
💡 उत्तर: सद्गुरुदेव बताते हैं कि ऐसे महापुरुष का सान्निध्य प्राप्त करना, उनकी कृपा प्राप्त करना, उनका शिष्यत्व ग्रहण करना — यह सबके भाग्य में नहीं होता। यह पूर्व जन्मार्जित सुकृति (पुण्य) का सूचक है। केवल चेष्टा से ऐसे महापुरुष का सान्निध्य प्राप्त नहीं होगा, और प्राप्त होने पर भी बिना सौभाग्य के कुछ होगा नहीं। भगवत कृपा से ही ऐसी सेवा प्राप्ति होती है।
📌 बाबा का बिहारी दास को अन्तिम आशीर्वाद:
  • तेरा मानव जीवन अब सफल हो जाएगा
  • तेरी साधना अब सफलकाम हो जाएगा
  • तू भगवत दृष्टा बन जाएगा
  • तेरे भीतर समस्त कृपा शक्ति आकर तेरे को कृतार्थ करेगी
🧠 आत्म-चिंतन (Self Assessment)
इस सत्संग से आपने क्या सीखा? (Test your understanding)
Core Essence
सिद्ध श्री जगन्नाथ दास बाबा के जीवन चरित्र से साधक को क्या मूल शिक्षा प्राप्त होती है?
उत्तर: दृष्टा गुरु की कृपा, कठोर तपस्या, एवं भगवत चरण में एकान्तिक निष्ठा — इन तीनों के संयोग से साधक संसार चक्र से मुक्त होकर भगवत प्राप्ति करने में समर्थ होता है। सिद्ध पुरुष की अलौकिक क्रिया-मुद्रा सामान्य बुद्धि से अगम्य है, अतः उनके आचरण में दोषदर्शन कभी नहीं करना चाहिए। सिद्धि साधक के पीछे स्वयं आती है, उसे पकड़ने का प्रयत्न करने से प्रेम-प्राप्ति में बाधा होती है।
Multiple Choice
🔢 सत्संग के अनुसार, 'दृष्टा गुरु' शिष्य की आध्यात्मिक प्रगति में किस प्रकार सहायक होते हैं?
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
सत्संग में दृष्टा गुरु की तुलना उस जहाज से की गई है जिससे नाव बंधी हो, जो यह दर्शाता है कि सामर्थ्यवान गुरु शिष्य को शीघ्रता से आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ाते हैं।
Multiple Choice
🔢 स्वर्ग-नरक के भोग विज्ञान के संबंध में सत्संग का मुख्य प्रतिपादन क्या है?
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
सत्संग में स्पष्ट किया गया है कि स्वर्ग-नरक सकाम कर्मों के फलों को भोगने के स्थान हैं, जिसके लिए एक विशेष दिव्य शरीर प्राप्त होता है और भोग समाप्त होने पर जीव को पुनः कर्मयोनि में आना पड़ता है।
Multiple Choice
🔢 'क्रमोह्रासमान उपयोग विधि' का आध्यात्मिक संदर्भ में क्या अर्थ है?
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
यह सिद्धांत बताता है कि जैसे-जैसे कर्मों के फल भोगे जाते हैं, उन फलों को भोगने की स्पृहा या इच्छा क्रमशः कम होती जाती है।
Multiple Choice
🔢 भंगी मैया से प्रसाद ग्रहण करने का प्रसंग सिद्ध पुरुष के किस आचरण को प्रमुखता से दर्शाता है?
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
यह प्रसंग दर्शाता है कि एक सिद्ध पुरुष समदर्शी होता है और सामाजिक मान्यताओं, जैसे जाति-भेद या शुद्धि-अशुद्धि, के बंधनों से पूर्णतः मुक्त होता है।
Multiple Choice
🔢 श्री जगन्नाथ दास बाबा ने अपने सेवक बिहारी दास को मृत्यु से कैसे बचाया?
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
सत्संग में वर्णित है कि बाबा ने अपनी अलौकिक शक्ति से बिहारी दास को मृत्यु के मुख से वापस खींच लिया और उन्हें जीवनदान दिया, जो उनकी अचिन्त्य सामर्थ्य का प्रमाण है।
True/False
🤔 सत्संग के अनुसार, मानव शरीर केवल स्वर्ग-नरक के भोगों को भोगने के लिए ही श्रेष्ठ है।
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
सत्संग में मानव शरीर को निष्काम कर्म करने और भगवत प्राप्ति के लिए एक दुर्लभ क्षेत्र बताया गया है, न कि केवल भोग के लिए। भोग के लिए तो दिव्य शरीर मिलते हैं।
True/False
🤔 श्री जगन्नाथ दास बाबा द्वारा 'पुरश्चरण विधि' का अनुष्ठान अलौकिक सिद्धियाँ प्राप्त करने के मुख्य उद्देश्य से किया गया था।
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
सत्संग में स्पष्ट है कि बाबा ने पुरश्चरण विधि का अनुष्ठान भगवत प्राप्ति के परम लक्ष्य के लिए किया था, न कि सिद्धियों के लिए। सिद्धियाँ तो भक्ति की दासी बनकर स्वतः आ जाती हैं।
True/False
🤔 कीर्तन में श्री जगन्नाथ दास बाबा का अलौकिक नृत्य यह प्रमाणित करता है कि सिद्ध पुरुष शारीरिक धर्मों और सीमाओं से अतीत होते हैं।
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
सत्संग में वर्णित उनका वृद्ध और झुके हुए शरीर में भी घंटों तक अलौकिक नृत्य करना यह दर्शाता है कि वे शारीरिक अवस्थाओं और सीमाओं से परे, दिव्य भाव में स्थित थे।
स्पष्टीकरण (Clarification)

यह सारांश AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग गुरु सेवा में करके तैयार किया गया है। इसमें त्रुटि हो सकती है। कृपया पूर्ण लाभ के लिए पूरा वीडियो अवश्य देखें।

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