[Study Guide Draft : Feb 19, 2026] श्री राधा रमण चरण दास देव का दिव्य जीवन चरित्र

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श्री भगवत चर्चा
19 February 2026

श्री राधा रमण चरण दास देव का दिव्य जीवन चरित्र

श्री राधा रमण चरण दास देव का दिव्य जीवन चरित्र

Sri Sri 108 Sri Vinod Baba ji Maharaj
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हमारे प्रिय सद्गुरुदेव बताते हैं:
" भक्त कथामृत में ऐसी संजीवनी सुधा है, ऐसी शक्ति है कि माया कलुषित चित्तवृत्ति शोधित होकर दिव्य प्रेम प्राप्ति की योग्यता प्राप्त हो जाती है। "

" ये नश्वर शरीर को भगवत चरण में समर्पण करके भगवत कृपा प्राप्त करना — उससे बड़ा बुद्धिमान संसार में कोई नहीं है, क्योंकि हमारा कुछ गया नहीं। "

" जैसे तुम्हारे इष्ट में तुम्हारी निष्ठा है, ऐसे ही निष्ठा अगर गुरु चरण में है, तो उनके भीतर समस्त शक्ति का प्रकाश स्वाभाविक होना शुरू हो जाता है। "
श्री राधा रमण चरण दास देव (15)गुरुनिष्ठा (8)हरिनाम संकीर्तन (7)ईश्वर कोटि (5)भक्त कथामृत (4)श्री रामदास बाबाजी महाराज (5)नवद्वीप (6)वैराग्य (4)नरतनु (3)सद्गुरु प्राप्ति (4)प्रेम विकार (3)प्लेग रोग (3)भवसागर (2)
🔍 सत्संग सार (Executive Summary)

सद्गुरुदेव श्री राधा रमण चरण दास देव की तिरोभाव तिथि पर उनके दिव्य जीवन चरित का वर्णन करते हैं। सर्वप्रथम जीव कोटि, सिद्ध कोटि एवं ईश्वर कोटि के महापुरुषों का भेद बताते हुए श्री राधा रमण चरण दास देव को ईश्वर कोटि के महापुरुष बताते हैं। पूर्व बंगाल में जन्मे रायचरण ने जमींदार की नौकरी त्यागकर, देवी माँ की कृपा से अयोध्या में सरयू तट पर सद्गुरु प्राप्त किए और दीक्षा ग्रहण की। नवद्वीप, नीलाचल एवं वृन्दावन की यात्रा कर वेश ग्रहण के पश्चात् राधा रमण चरण दास देव नाम से प्रसिद्ध हुए और व्यापक हरिनाम प्रचार किया। श्री रामदास बाबाजी महाराज जैसे गुरुनिष्ठ शिष्यों की कथा, कुत्तों के अद्भुत भण्डारे की लीला, तथा कोलकाता में हरिनाम संकीर्तन द्वारा प्लेग रोग निवारण जैसी अलौकिक लीलाओं का रोमांचकारी वर्णन किया गया है।

🧱 ज्ञान प्रवाह
graph TD subgraph sg_01["भूमिका: भक्त कथामृत की महिमा"] A["भक्त कथामृत सुधा"] --> B["माया कलुषित चित्तवृत्ति का शोधन"] B --> C["दिव्य प्रेम प्राप्ति की योग्यता"] end subgraph sg_02["तीन कोटियों का वर्गीकरण"] D["जीव कोटि - बद्ध जीवात्मा"] --> G["ईश्वर कोटि के महापुरुष"] E["सिद्ध कोटि - पूर्व जन्म सिद्ध"] --> G F["पार्षद कोटि"] --> G end subgraph sg_03["श्री राधा रमण चरण दास देव का जीवन"] G --> H["पूर्व बंगाल में जन्म - रायचरण"] H --> I["जमींदार की नौकरी"] I --> J["प्रजा दमन से वैराग्य"] J --> K["तांत्रिक दीक्षा"] K --> L["देवी माँ का साक्षात दर्शन"] L --> M["अयोध्या में सद्गुरु प्राप्ति"] end subgraph sg_04["तीर्थयात्रा एवं प्रचार"] M --> N["नवद्वीप - राजेन दादा"] N --> O["नीलाचल धाम"] O --> P["वृन्दावन दर्शन"] P --> Q["वेश ग्रहण - राधा रमण चरण दास देव"] end subgraph sg_05["अलौकिक लीलाएँ"] Q --> R["श्री रामदास बाबाजी की गुरुनिष्ठा"] Q --> S["कुत्तों का अद्भुत भण्डारा"] Q --> T["वृक्ष शाखा नृत्य"] Q --> U["प्लेग निवारण हरिनाम संकीर्तन"] end subgraph sg_06["उपसंहार"] R --> V["गुरुनिष्ठा अपरिहार्य"] S --> V T --> V U --> V V --> W["52 वर्ष में नित्य लीला प्रवेश"] end C --> D भूमिका --> कोटि_भेद कोटि_भेद --> जीवन_चरित जीवन_चरित --> तीर्थयात्रा तीर्थयात्रा --> अलौकिक_लीला अलौकिक_लीला --> उपसंहार
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📌 विषय सूची (Table of Contents)

📖 आज की शिक्षाएं 📖 आज की विस्तृत शिक्षाएं

भक्त कथामृत की संजीवनी शक्ति एवं कोटि-भेद विवेचन
भक्त कथामृत सुधा की महिमा तथा जीव कोटि, सिद्ध कोटि एवं ईश्वर कोटि के महापुरुषों का भेद स्पष्ट करना
🪷
भक्त कथामृत सुधा की संजीवनी शक्ति
भक्त कथामृत सुधा — माया कलुषित चित्तवृत्ति के शोधन का अमृतमय साधन
▶ देखें (0:21) ▶ Watch (0:21)
सद्गुरुदेव सत्संग का शुभारम्भ करते हुए बताते हैं कि आज का आलोच्य विषय 'भक्त कथामृत सुधा' है। इस सुधा-सिन्धु में अवगाहन करने से माया से कलुषित चित्तवृत्ति शोधित होकर दिव्य प्रेम प्राप्ति की योग्यता प्राप्त होती है। भक्त कथामृत में ऐसी संजीवनी सुधा है, ऐसी शक्ति है कि महापुरुषों के पावन जीवन चरित का आस्वादन करने मात्र से वाणी पवित्र हो जाती है और भक्ति प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। आज के आलोच्य महापुरुष श्री श्री राधा रमण चरण दास देव हैं, जिनकी पावन तिरोभाव तिथि के उपलक्ष्य में उनके जीवन कथामृत सुधा का किंचित आस्वादन किया जाएगा।
🔗 भक्त कथामृत की महिमा सम्पूर्ण सत्संग की आधारशिला है — इसी संजीवनी शक्ति के कारण महापुरुषों के जीवन चरित सुनना भक्ति प्राप्ति का अमोघ साधन है।
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जीव कोटि, सिद्ध कोटि, पार्षद कोटि एवं ईश्वर कोटि — चार प्रकार के साधक
चार कोटि के महापुरुष — जीव कोटि, सिद्ध कोटि, पार्षद कोटि एवं ईश्वर कोटि का विवेचन
▶ देखें (2:25) ▶ Watch (2:25)
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि संसार में चार प्रकार के साधक एवं महापुरुष देखे जाते हैं। प्रथम है जीव कोटि के साधक — ये बद्ध जीवात्मा हैं जो संसार चक्र में आवर्तन करते-करते जब उनकी मुक्ति का समय आता है, तभी महत् कृपा प्राप्त कर भजन साधन करके दिव्य प्रेम प्राप्ति की योग्यता लाभ करते हैं। द्वितीय है सिद्ध कोटि — ये पूर्व जन्म में साधन समाप्त कर चुके होते हैं, किन्तु भगवत इच्छा से कुछ कर्म शेष रहने के कारण उस कर्म के संपादन हेतु पुनः आते हैं। तृतीय है पार्षद कोटि — ये भगवान के नित्य पार्षद हैं। चतुर्थ एवं सर्वोच्च है ईश्वर कोटि — ये भगवत इच्छा से लोक कल्याण एवं भक्ति धर्म के उत्थान हेतु प्रकट होते हैं। सद्गुरुदेव बताते हैं कि श्री राधा रमण चरण दास देव ईश्वर कोटि के ऐसे ही महापुरुष थे जो लगभग डेढ़ सौ वर्ष पूर्व प्रकट हुए।
🔗 कोटि-भेद का यह विवेचन श्री राधा रमण चरण दास देव के ईश्वर कोटि के स्वरूप को समझने की आधारभूमि है।
📌 चार कोटि के महापुरुषों का वर्गीकरण:
  • जीव कोटि — बद्ध जीवात्मा जो संसार चक्र में आवर्तन करते-करते मुक्ति के समय महत् कृपा से भजन साधन करते हैं
  • सिद्ध कोटि — पूर्व जन्म में साधन सम्पन्न, भगवत इच्छा से शेष कर्म संपादन हेतु पुनः आते हैं
  • पार्षद कोटि — भगवान के नित्य पार्षद, भगवत इच्छा से प्रकट होते हैं
  • ईश्वर कोटि — लोक कल्याण एवं भक्ति धर्म के उत्थान के लिए भगवत इच्छा से प्रकट होते हैं
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फूल-फल का दृष्टांत — सिद्ध महापुरुषों को साधन की आवश्यकता नहीं
फल लेकर जन्म लेने का दृष्टांत — ईश्वर कोटि के महापुरुषों की स्वतःसिद्धता
▶ देखें (4:01) ▶ Watch (4:01)
सद्गुरुदेव एक अत्यन्त सुन्दर दृष्टांत प्रस्तुत करते हैं। साधारणतः पेड़ में पहले फूल होता है, फिर फूल से फल लगता है — यह सामान्य नियम है। किन्तु कुछ लताएँ ऐसी होती हैं जो फल लेकर ही जन्म लेती हैं — जैसे लौकी, घिया, तरोई, खीरा — इनमें फल पहले होता है और ऊपर में एक दिखावटी फूल होता है। फूल के कारण फल नहीं, बल्कि फल के कारण फूल है। ठीक इसी प्रकार ईश्वर कोटि के महापुरुष सिद्धि लेकर ही जन्म लेते हैं, उनके साधन की कोई आवश्यकता नहीं होती। उनका साधन केवल दिखावा है, लोक शिक्षा हेतु है। जैसे बद्ध जीवात्मा अपने कर्म संस्कारानुसार कर्म चक्र में आवर्तन करते हैं, वैसे ही सिद्ध महापुरुषों अथवा ईश्वर कोटि के महापुरुषों का जीवन भी प्रारम्भ में बद्ध जीवात्मा जैसा ही दिखता है — एकदम प्राकृत, मायामुग्ध, जैसे भजन का कोई संस्कार ही नहीं।
🔗 यह दृष्टांत श्री राधा रमण चरण दास देव की स्वतःसिद्धता को समझाने हेतु प्रस्तुत किया गया — वे फल लेकर जन्म लेने वाले ईश्वर कोटि के महापुरुष थे।
⚖️ साधारण नियम बनाम व्यतिक्रम — फूल-फल दृष्टांत
साधारण नियम (जीव कोटि): पहले फूल लगता है, फिर फल — अर्थात् पहले साधन करना पड़ता है, तब सिद्धि प्राप्त होती है
व्यतिक्रम (ईश्वर कोटि): फल लेकर ही जन्म लेते हैं (जैसे लौकी, खीरा) — अर्थात् सिद्धि लेकर ही प्रकट होते हैं, साधन केवल दिखावा है
महापुरुषों की अप्रकट लीला — श्री रूप-सनातन का दृष्टांत
महापुरुषों को प्राकृत बुद्धि से पहचानना असम्भव है — यह सिद्धान्त श्री सनातन गोस्वामी की लीला से स्पष्ट करना
🎭
श्री सनातन गोस्वामी का दृष्टांत — महापुरुषों को पहचानना असम्भव
श्री सनातन गोस्वामी की लीला — प्राकृत बुद्धि से महापुरुषों की पहचान असम्भव
▶ देखें (6:23) ▶ Watch (6:23)
सद्गुरुदेव श्री रूप-सनातन गोस्वामी का दृष्टांत देते हैं। श्री सनातन गोस्वामी — जो राधा रानी की अन्तरंगा सहचरी लवंग मंजरी हैं — वे हुसैनशाह के राजमन्त्री थे। वे मुसलमानी पोशाक पहनते थे — चुस्त पाजामा, चुस्त जूता, टोपी, अलखल्ला, दाढ़ी रखते थे। घोड़े पर चढ़कर जाते थे। देखकर ऐसे लगता था जैसे कोई फारसी नवाब का अनुचर हो। कोई हिन्दू भी नहीं जानते थे कि ये हिन्दू हैं और इतने बड़े महापुरुष हैं। फिर जब श्री सनातन गोस्वामी तीव्र वैराग्य लेकर काशीपुरी आए — बिना दाढ़ी बनाए, मुसलमान जैसे चेहरे के साथ — तो महाप्रभु ने भीतर से जान लिया और एक सेवक से कहा कि बाहर एक वैष्णव बैठे हैं, उनको बुला लाओ। सेवक बाहर आकर देखते हैं — कोई वैष्णव नहीं, एक मुसलमान दरवेश बैठे हैं। सेवक ने कहा — प्रभु, कोई वैष्णव तो नहीं है, एक दरवेश बैठे हैं। महाप्रभु ने कहा — उस दरवेश को ही बुला लाओ। सद्गुरुदेव बताते हैं कि ये लीला है — नर लीलावत्। कोई पहचान कैसे पाएगा? महाप्रभु एवं उनके पार्षद जानते थे कि ये पूर्ण ब्रह्म, सनातन, अखिल रसामृत सिन्धु, प्रेम पुरुषोत्तम लोक कल्याण के लिए आए हैं — किन्तु जब तक भगवान कृपा करके विदित नहीं कराते, तब तक जानना सम्भव नहीं।
🔗 श्री सनातन गोस्वामी की लीला के माध्यम से यह सिद्धान्त स्थापित किया गया कि श्री राधा रमण चरण दास देव भी ईश्वर कोटि के ऐसे ही छिपे हुए महापुरुष थे।
❓ प्रश्न: महापुरुषों को पहचानने में हम क्या भूल करते हैं? ▶ 10:02
💡 उत्तर: सद्गुरुदेव बताते हैं कि हम प्राकृत बुद्धि लेकर अपनी बुद्धिमत्ता के द्वारा साधु-सन्तों को परिमाप करते हैं — उनकी विद्वत्ता, उनकी परिस्थिति देखकर अनुमान लगाते हैं। ऐसे करके कभी-कभी गलत अनुमान कर बैठते हैं और अपराध कर बैठते हैं। जब तक महापुरुष स्वयं अपने को विदित नहीं कराते, तब तक उनको पहचानना सम्भव नहीं है।
❌ न करें:
  • प्राकृत बुद्धि से साधु-सन्तों का परिमाप न करें — अपराध होता है
📌 श्री सनातन गोस्वामी की मंजरी स्वरूप पहचान:
  • श्री रूप गोस्वामी — रूप मंजरी
  • श्री सनातन गोस्वामी — लवंग मंजरी
  • दोनों राधा रानी की अन्तरंगा सहचरी
श्री राधा रमण चरण दास देव का पूर्वाश्रम जीवन एवं वैराग्य
रायचरण के जन्म, जमींदारी नौकरी, प्रजा-दमन से उत्पन्न वैराग्य एवं नरतनु की सार्थकता का बोध
👶
रायचरण का जन्म एवं पूर्वाश्रम — पूर्व बंगाल से जमींदार सेवा तक
श्री राधा रमण चरण दास देव का जन्म एवं पूर्वाश्रम जीवन
▶ देखें (10:43) ▶ Watch (10:43)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि श्री राधा रमण चरण दास देव का जन्म पूर्व बंगाल (वर्तमान बांग्लादेश) में यशोहर जिले के नरायल नामक सब-डिवीज़न में हुआ। स्वाधीनता से पूर्व भारत विभाजन नहीं हुआ था। उनके पिता का नाम मोहनचन्द्र घोष तथा माता का नाम कनक सुन्दरी था। उनका पितृप्रदत्त नाम रायचरण था। बचपन से ही वे अत्यन्त सुन्दर, समस्त सद्गुणों से अलंकृत तथा अद्भुत प्रतिभा सम्पन्न बालक थे। उनमें एक दैवी शक्ति का प्रकाश दिखता था और अल्प समय में विविध विषयों में विशेष पारदर्शिता प्राप्त कर ली। सत्रह वर्ष की अल्पायु में ही उनका विवाह हो गया। उनके एक पुत्र का जन्म हुआ, किन्तु पुत्र ने शरीर त्याग कर नित्यधाम प्रस्थान किया। इस प्रकार तीन बार दार परिग्रह किया। उनकी विद्वत्ता एवं बुद्धिमत्ता देखकर तत्कालीन बड़े जमींदार ने उनको अपना सुपरिण्टेण्डेण्ट नियुक्त किया। जमींदारी के सभी कार्य उनके ही आदेश-निर्देश पर सम्पन्न होते थे।
🔗 रायचरण का पूर्वाश्रम जीवन उस फल-लता के दृष्टांत की पुष्टि करता है — बाहर से साधारण गृहस्थी दिखने पर भी भीतर दैवी शक्ति का प्रकाश विद्यमान था।
📌 श्री राधा रमण चरण दास देव — पूर्वाश्रम परिचय:
  • पितृप्रदत्त नाम — रायचरण
  • जन्मस्थान — यशोहर जिला, नरायल (वर्तमान बांग्लादेश)
  • पिता — मोहनचन्द्र घोष
  • माता — कनक सुन्दरी
  • विवाह — 17 वर्ष की आयु में, तीन बार दार परिग्रह
  • एक पुत्र जन्मा, किन्तु अल्पायु में शरीर त्याग
  • जमींदार के सुपरिण्टेण्डेण्ट पद पर नियुक्त
💔
प्रजा-दमन से उत्पन्न वैराग्य — जमींदार की नौकरी का त्याग
प्रजा की फसल कटवाने का आदेश एवं रायचरण का तीव्र वैराग्य
▶ देखें (13:59) ▶ Watch (13:59)
सद्गुरुदेव वर्णन करते हैं कि एक बार जमींदार और प्रजा के मध्य कलह हो गया। जमींदार ने रायचरण बाबू को आदेश दिया कि लाठियाल लेकर जाओ और प्रजा की फसल काटकर ले आओ। उस समय कृषि व्यवस्था अत्यन्त कठिन थी — केवल वर्षा पर निर्भर एकमात्र फसल होती थी। यदि वह फसल नष्ट हो जाए तो देश में दुर्भिक्ष आ जाता था। रायचरण ने इच्छा न होते हुए भी जमींदार के आदेश पर किसानों की फसल कटवा दी। इसके पश्चात् दीन-दुखी प्रजा रोती हुई उनके चरणों में आकर गिरी। रायचरण के हृदय में गहन वैराग्य उत्पन्न हुआ — उन्होंने सोचा कि दो रोटी के लिए गरीब मनुष्यों को दुखी करके ऐसी हीन वृत्ति की नौकरी करना उचित नहीं, इससे तो भिक्षा करके दिन व्यतीत करना श्रेष्ठ है। अतः उन्होंने नौकरी त्याग दी और हरि भजन का संकल्प किया।
🔗 प्रजा के दुःख से उत्पन्न वैराग्य ही रायचरण के भजन मार्ग में प्रवृत्ति का प्रथम सोपान बना।
❌ न करें:
  • गरीबों को दुखी करके हीन वृत्ति की नौकरी कदापि न करें
मनुष्य जीवन का प्रधान उद्देश्य — हरि भजन एवं नरतनु की सार्थकता
नरतनुरूप नाव — भवसागर पार करने का एकमात्र माध्यम
▶ देखें (17:49) ▶ Watch (17:49)
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि मनुष्य जीवन का प्रधान उद्देश्य हरि भजन है। मनुष्य तनु पाकर जो हरि भजन नहीं करते, भगवत प्राप्ति के लिए कोई चेष्टा नहीं करते, वे आत्महत्याकारी हैं। यह शरीर पंचभौतिक है, सप्तधातु (रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र) से बना है, चतुर्विंशति तत्व प्रधान है — किन्तु यही शरीर भगवत प्राप्ति का एकमात्र माध्यम है। सद्गुरुदेव श्रीमद्भागवत पुराण के श्लोक का उल्लेख करते हुए इसे 'प्लव' (नाव विशेष) कहते हैं — जैसे नदी पार करने के लिए नाव चाहिए, वैसे ही भवसागर पार करने के लिए यह नरतनुरूप नाव है। गुरु इस नाव के कर्णधार (नाविक) हैं और सत्संग अनुकूल वायु है। यह शरीर यदि भोग में लगे तो रोग, शोक एवं चौरासी लाख योनियों का बन्धन बनता है; किन्तु यदि योग (भगवत उपासना) में लगे तो शोक नष्ट होता है, रोग नष्ट होता है और अन्त में भगवत चरण प्राप्ति होती है। सर्वोत्तम बुद्धिमत्ता यही है कि इस नश्वर शरीर को भगवत चरण में समर्पित कर भगवत कृपा प्राप्त की जाए — क्योंकि हमारा कुछ गया नहीं, शरीर तो हमारा है ही नहीं, किन्तु चरम परम वस्तु (भगवत कृपा) प्राप्त हो गई। सद्गुरुदेव श्री तुलसीदास जी की चौपाई का भी उल्लेख करते हैं — 'बिनु सत्संग ना हरि कथा, तेहि बिनु मोह न भाग।'
🔗 नरतनु की सार्थकता का यह बोध ही रायचरण के वैराग्य की प्रेरणा बना — अब संसार नहीं, हरि भजन ही एकमात्र लक्ष्य है।
नरतनुरूप प्लव — भवसागर पार करने का साधन— श्रीमद् भागवतम् Srimad Bhagavatam 11.20.17
▶ 18:20
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारम्। मयानुकूलेन नभस्वतेरितं पुमान् भवाब्धिं न तरेत् स आत्महा॥
nṛ-deham ādyaṁ su-labhaṁ su-durlabhaṁ plavaṁ su-kalpaṁ guru-karṇa-dhāram | mayānukūlena nabhasvatēritaṁ pumān bhavābdhiṁ na tarēt sa ātma-hā ||
यह आद्य नरतनु सुलभ होते हुए भी अत्यन्त दुर्लभ है, यह भवसागर पार करने का सुकल्प प्लव (नाव) है जिसका कर्णधार (नाविक) गुरु हैं और मेरी (भगवान की) अनुकूल कृपारूपी वायु से प्रेरित है। ऐसा नरतनु पाकर भी जो भवसागर पार नहीं करता, वह आत्मघाती है।
सत्संग के बिना मोह भंग असम्भव— रामचरितमानस श्री रामचरितमानस सुन्दरकाण्ड
▶ 26:45
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
बिनु सत्संग न हरि कथा तेहि बिनु मोह न भाग। मोह गए बिनु राम पद होइ न दृढ़ अनुराग॥
binu satsaṅga na hari kathā tēhi binu mōha na bhāga | mōha gayē binu rāma pada hōi na dṛḍha anurāga ||
बिना सत्संग के हरि कथा नहीं मिलती, बिना हरि कथा के मोह नहीं भागता, और मोह गए बिना श्री राम के चरणों में दृढ़ अनुराग नहीं होता।
❓ प्रश्न: सर्वोत्तम बुद्धिमत्ता क्या है? ▶ 24:10
💡 उत्तर: सद्गुरुदेव बताते हैं कि करोड़ों रुपया कमाना, बड़े मकान-गाड़ी बनाना — ये बुद्धिमत्ता नहीं, ये माया है, बन्धनकारी है, इसमें आत्मा के मंगल का कोई काम नहीं। सर्वोत्तम बुद्धिमत्ता यह है कि इस नश्वर पंचभौतिक शरीर को — जो सप्तधातु, गन्दगी एवं चतुर्विंशति तत्व से भरा है — भगवत चरण में समर्पित करके भगवत कृपा प्राप्त की जाए। उससे बड़ा बुद्धिमान संसार में कोई नहीं, क्योंकि हमारा कुछ गया नहीं — शरीर तो मेरा है ही नहीं — किन्तु चरम परम वस्तु मिल गई।
✅ करें:
  • नरतनु को भगवत चरण में समर्पित कर भवसागर पार करें
  • सत्संग रूपी अनुकूल वायु का सदैव सेवन करें
❌ न करें:
  • शरीर को केवल भोग में न लगाएँ — रोग, शोक एवं 84 लाख योनि बन्धन होगा
⚖️ शरीर भोग में बनाम शरीर योग में
भोग में शरीर: रोग बनेगा, शोक बनेगा, अन्तिम काल में 84 लाख योनि में आत्मा को बाँधकर खींच ले जाएगा
योग में शरीर: शोक नष्ट होता है, रोग नष्ट होता है, भगवत चरण प्राप्ति होती है — संसार चक्र से मुक्ति मिलती है
📌 भवसागर पार करने के तीन अनिवार्य तत्व (श्रीमद्भागवत अनुसार):
  • प्लव (नाव) — नरतनु (मनुष्य शरीर)
  • कर्णधार (नाविक) — सद्गुरु
  • अनुकूल वायु — सत्संग एवं भगवत कृपा
देवी कृपा से सद्गुरु प्राप्ति — सरयू तट का दिव्य मिलन
तान्त्रिक दीक्षा, देवी माँ का साक्षात दर्शन, तथा अयोध्या में सरयू तट पर सद्गुरु प्राप्ति का वर्णन
🔮
तान्त्रिक दीक्षा एवं ग्रहण काल में पुरश्चरण
तान्त्रिक गुरु से प्रारम्भिक दीक्षा एवं सूर्यग्रहण में पुरश्चरण का महत्त्व
▶ देखें (18:51) ▶ Watch (18:51)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि उस समय ठीक-ठीक सद्गुरु प्राप्त होना सहज नहीं था। रायचरण ने जोगेन्द्र भट्टाचार्य नामक एक तान्त्रिक गुरु से प्रारम्भिक तान्त्रिक उपासना की दीक्षा ग्रहण की। सद्गुरुदेव एक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त बताते हैं कि पूर्व भारत (बंगाल) में तन्त्र उपासना की विशेष श्रेष्ठता है — वहाँ काली पूजा, देवी उपासना प्रधान है; उत्तर भारत में निर्गुण निर्विशेष ब्रह्म उपासना, दक्षिण भारत में शिवजी की उपासना, एवं मध्य भारत में राधा-कृष्ण तथा रामजी की उपासना की श्रेष्ठता है। सद्गुरुदेव यह भी बताते हैं कि जो गुरु सिद्ध नहीं, तत्वदृष्टा नहीं, प्राकृत बुद्धि सम्पन्न हैं, उनके मन्त्र से मन्त्र सिद्ध होना सम्भव नहीं। किन्तु यदि कोई गुरु में एकनिष्ठ होकर, गुरु में भगवत बुद्धि लेकर उपासना करे, तो कदाचित भगवत कृपा से भगवत प्राप्ति में समर्थ हो जाते हैं। रायचरण के पूर्वजन्म के संस्कार जागृत हो गए — सूर्यग्रहण के शुभ अवसर पर एक भवानी मन्दिर में पुरश्चरण हेतु बैठ गए। सद्गुरुदेव बताते हैं कि ग्रहण का काल उपासना के लिए अत्यन्त उत्तम है — साढ़े तीन-चार घण्टे का भी पूर्णग्रास ग्रहण हो, उसमें उपासना करने से एक पुरश्चरण का फल मिलता है।
🔗 तान्त्रिक दीक्षा एवं ग्रहण काल की उपासना रायचरण के पूर्वजन्म संस्कारों को जागृत करने का माध्यम बनी।
✅ करें:
  • ग्रहण काल में भजन-उपासना अवश्य करें — अल्प समय में भगवत कृपा प्राप्ति का उत्तम अवसर है
📌 भारत के विभिन्न प्रदेशों में उपासना पद्धति की श्रेष्ठता:
  • पूर्व भारत (बंगाल) — तन्त्र उपासना, काली पूजा, देवी उपासना
  • उत्तर भारत (हिमालय) — निर्गुण निर्विशेष ब्रह्म उपासना (ॐ)
  • दक्षिण भारत — शिवजी की उपासना
  • मध्य भारत — राधा-कृष्ण एवं रामजी की उपासना
  • पूर्व भारत (ओडिशा) — जगन्नाथ जी की उपासना
🗺️
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में उपासना पद्धतियों का भेद
भारत के विभिन्न प्रदेशों में उपासना पद्धतियों की विविधता
▶ देखें (19:12) ▶ Watch (19:12)
पूर्व भारत में तंत्र व काली उपासना, उत्तर भारत में निर्गुण ब्रह्म उपासना, दक्षिण में शिव उपासना, और मध्य भारत में राधा-कृष्ण व राम उपासना की प्रधानता बताई गई। सद्गुरुदेव ने बताया कि भारत के विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न उपासना पद्धतियों की श्रेष्ठता है। पूर्व भारत (बंगाल, असम आदि) में तंत्र उपासना और देवी काली पूजा की प्रधानता है — वहाँ घर-घर में तंत्र-मंत्र-यंत्र और वशीकरण आदि प्रचलित है। उत्तर भारत, विशेषकर हिमालय क्षेत्र में निर्गुण-निर्विशेष ब्रह्म की उपासना होती है, वहाँ 'ओम' का उच्चारण सुनने को मिलता है। दक्षिण भारत में शिव जी (भोले बाबा) की उपासना की श्रेष्ठता है। पूर्व भारत में जगन्नाथ जी की उपासना प्रसिद्ध है। मध्य भारत में राधा-कृष्ण और श्री राम जी की उपासना प्रधान है। इस प्रकार भारत के प्रत्येक प्रदेश में एक-एक उपासना पद्धति की विशेष श्रेष्ठता है। यह वर्णन राधा रमण चरण दास देव जी के जीवन प्रसंग में आया, जब बताया गया कि उन्होंने पूर्व भारत की तंत्र उपासना परंपरा में प्रारंभ में दीक्षा ली थी।
🙏
देवी माँ का साक्षात दर्शन एवं सद्गुरु प्राप्ति का मार्गदर्शन
देवी माँ का साक्षात दर्शन — अयोध्या में सरयू तट पर सद्गुरु की प्रतीक्षा
▶ देखें (22:18) ▶ Watch (22:18)
सद्गुरुदेव वर्णन करते हैं कि पुरश्चरण के फलस्वरूप रायचरण के पूर्वजन्म के शुभ मंगलमय संस्कार जागृत हो गए और देवी माँ साक्षात आविर्भूत हो गईं। देवी ने कहा — बोलो बेटा, क्या चाहिए? रायचरण ने प्रार्थना की कि अभी तो भगवत साक्षात्कार नहीं हुआ, और सद्गुरु की कृपा बिना भगवत प्राप्ति सम्भव नहीं — कृपया बताइए कि मेरे गुरु कौन हैं? देवी माँ ने आदेश दिया — तुम यहाँ से सीधे अयोध्या जाओ, सरयू नदी के किनारे तुम्हारे गुरु तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। रायचरण ने पूछा — मैं कैसे पहचानूँगा? देवी ने कहा — गुरुदेव तुमको स्वयं बुला लेंगे और तुम भी पहचान लोगे। माँ का यह आदेश प्राप्त होते ही रायचरण के मन में तीव्र वैराग्य आ गया — जगतिक देह-दैहिक वस्तु-पदार्थ के प्रति गहन अनासक्ति उत्पन्न हो गई। अब एकमात्र लक्ष्य रहा — सद्गुरु चरण सान्निध्य में जाकर, उनकी कृपा प्राप्त कर, हरि भजन करके इस मायामय संसार से मुक्त होना।
🔗 देवी कृपा से सद्गुरु का पता मिलना — यह दर्शाता है कि ईश्वर कोटि के जीवों के लिए भी गुरु प्राप्ति भगवत कृपा पर निर्भर है।
सरयू तट पर दिव्य गुरु-शिष्य मिलन एवं दीक्षा
सरयू नदी के तट पर दिव्य गुरु-शिष्य मिलन — साध्य-साधन तत्व का उपदेश
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सद्गुरुदेव वर्णन करते हैं कि रायचरण चलते-चलते सरयू नदी के किनारे पहुँचे। वहाँ एक वृक्ष के नीचे एक दिव्य पुरुष बैठे थे — जैसे अमृत लोक से आए हों। उनमें ऐसी आकर्षण शक्ति थी कि देखते ही अन्तःकरण को खींच ले जा रही थी। उन्होंने रायचरण को नाम लेकर पुकारा — 'रायचरण, इधर आओ! हम तुम्हारे लिए प्रतीक्षा कर रहे हैं।' सरयू में स्नान कराकर उनको मन्त्र प्रदान किए। तीन दिन तक अपने सान्निध्य में रखकर साध्य-साधन तत्व का विस्तृत उपदेश दिया। रायचरण तो पूर्वजन्म अर्जित संस्कार लेकर ही आए थे — गुरु कृपा मिलते ही उनके भीतर भक्तिलता बीज प्रस्फुटित हो गया और दिव्य अनुभव होने लगे। इसके पश्चात गुरुदेव ने कहा — तुम अब जाओ, तीव्र साधन करो और लोक कल्याण के लिए आगे बढ़ो। भगवत कृपा अवलम्बन करके तुम लोक कल्याण के लिए प्रयत्न करो। इसके पश्चात गुरुदेव अन्तर्धान हो गए। सद्गुरुदेव बताते हैं कि उनके गुरु के सम्प्रदाय के विषय में विशेष प्रामाण्य उपलब्ध नहीं है — 'शंकरारण्य' नाम का उल्लेख चरित्र सुधा में मिलता है, किन्तु स्पष्ट परम्परागत वर्णन उपलब्ध नहीं।
🔗 गुरु-शिष्य का यह अलौकिक मिलन रायचरण के भक्ति मार्ग के वास्तविक प्रारम्भ का सूचक है।
नवद्वीप, नीलाचल, वृन्दावन — तीर्थयात्रा एवं वेश ग्रहण
रायचरण की नवद्वीप, नीलाचल एवं वृन्दावन की यात्रा, राजेन दादा नाम से प्रसिद्धि, तथा वेश ग्रहण का वर्णन
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नवद्वीप आगमन — राजेन दादा नाम से प्रसिद्धि
नवद्वीप में राजेन दादा — गुरुगिरी से दूर, परम आत्मीयता का व्यवहार
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सद्गुरुदेव बताते हैं कि गुरुदेव के अन्तर्धान होने के पश्चात रायचरण वृन्दावन होते हुए सीधे नवद्वीप चले आए। मणिपुर घाट रोड पर एक धनाढ्य व्यक्ति ने उनके दिव्य स्वरूप से प्रभावित होकर रहने का स्थान दे दिया। एक रोचक प्रसंग है — जब उनसे नाम पूछा गया तो उन्होंने कहा 'रायचरण', किन्तु सुनने वाले ने 'राजेन्द्र' सुन लिया। इस प्रकार 'राजेन्द्र बाबू' अर्थात 'राजेन दादा' नाम से नवद्वीप में प्रसिद्धि हो गई। महाप्रभु मन्दिर में दर्शन के समय उनके दिव्य स्वरूप देखकर तथा अश्रु, कम्प, पुलक, स्वेद, वैवर्ण आदि अष्ट सात्विक विकार देखकर बहुत मनुष्य प्रभावित हो गए। यद्यपि उनके पास जटाजूट आदि साधु चिह्न नहीं थे — गृहस्थी जैसे धोती-कमीज पहनी हुई थी — किन्तु उनके प्रेम विकार, भाव चेष्टा देखकर लोग अभिभूत हो गए। रायचरण बाबा गुरुगिरी बिलकुल पसन्द नहीं करते थे। 'गुरुदेव', 'प्रभु' कहने पर असन्तुष्ट हो जाते थे — 'दादा' कहो, 'दादा' बोलने से प्रसन्न होते थे। सब भाई हैं, छोटे भाई-बड़े भाई — ऐसी परम आत्मीयता का व्यवहार सबके साथ करते थे। नवद्वीपदास नामक एक व्यक्ति उनके सान्निध्य में आकर ऐसे परिवर्तित हो गए कि घर जाने का नाम ही भूल गए।
🔗 नवद्वीप में राजेन दादा की विनम्रता एवं गुरुगिरी से विरक्ति उनके ईश्वर कोटि स्वरूप की सहजता को दर्शाती है।
📌 अष्ट सात्विक विकार (महाप्रभु मन्दिर दर्शन के समय प्रकट):
  • अश्रु (आँसू)
  • कम्प (काँपना)
  • पुलक (रोमांच)
  • स्वेद (पसीना)
  • वैवर्ण (वर्ण परिवर्तन)
  • सर्वांग स्तम्भ (शरीर जड़ होना)
  • मूर्छा (मूर्छित होना)
  • प्रलय (चेतना लुप्त होना)
🏛️
नीलाचल-वृन्दावन यात्रा, पुनः गुरु मिलन एवं वेश ग्रहण
नीलाचल से वृन्दावन, गुरु का पुनर्दर्शन एवं राधा रमण चरण दास देव नामकरण
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सद्गुरुदेव बताते हैं कि गुरुदेव की प्रेरणा से रायचरण कुछ भक्तमण्डली लेकर नीलाचल (पुरी) चले गए। वहाँ भी उनके अद्भुत प्रेम विकार एवं भाव चेष्टा देखकर बहुत लोग प्रभावित हुए और शिष्यत्व ग्रहण करने लगे। नीलाचल में बहुत दिन रहकर दिव्य लीला किए। फिर एक दिन कोलकाता आकर गंगा स्नान के समय अचानक एक गाड़ी में चढ़कर अदृश्य हो गए — भक्तों को पता ही नहीं चला कहाँ गए। वस्तुतः उनके मन में गुरुदर्शन की तीव्र व्याकुलता उत्पन्न हो गई थी। सद्गुरुदेव श्वेताश्वतर उपनिषद के वचन का उल्लेख करते हुए कहते हैं — 'यस्य देवे पराभक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ' — गुरुभक्ति एवं गुरुनिष्ठा भगवत प्राप्ति के लिए अपरिहार्य है। गुरु में निष्ठा नहीं तो भजन आगे नहीं बढ़ेगा, उस भजन में शक्ति नहीं, प्रकाश नहीं। घूमते-घूमते पुनः सरयू तट पर गुरु से भेंट हुई। गुरुदेव ने आशीर्वाद देकर कहा — अब बहुत मत घूमो, लोक कल्याण के लिए घर-घर जाकर भक्ति रूप प्रदीप प्रज्वलित करो। फिर वृन्दावन में समस्त लीलास्थली दर्शन कर, वन परिक्रमा कर नवद्वीप लौटे। वहाँ श्री गौर हरिदास महन्त से वेश ग्रहण किया और उनका नाम रायचरण से परिवर्तित होकर 'राधा रमण चरण दास देव' हो गया। इसके पश्चात व्यापक रूप से दीक्षा देना प्रारम्भ किया।
🔗 गुरुनिष्ठा का यह उपदेश सम्पूर्ण सत्संग का केन्द्रीय सिद्धान्त है — आगे श्री रामदास बाबाजी की कथा में इसकी व्यावहारिक पुष्टि होगी।
गुरुनिष्ठा अपरिहार्य — गुरु एवं ईश्वर में समान भक्ति— श्वेताश्वतर उपनिषद Shvetashvatara Upanishad 6.23
▶ 39:16
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥
yasya dēvē parā bhaktir yathā dēvē tathā gurau | tasyaitē kathitā hy arthāḥ prakāśantē mahātmanaḥ ||
जिसकी भगवान में परा भक्ति है और जैसी भगवान में भक्ति है वैसी ही गुरु में भी है — उसी महात्मा के हृदय में ये समस्त कथित अर्थ (वेदान्त के रहस्य) स्वयं प्रकाशित हो जाते हैं।
❓ प्रश्न: गुरु में निष्ठा के बिना भजन क्यों आगे नहीं बढ़ता? ▶ 39:27
💡 उत्तर: सद्गुरुदेव बताते हैं कि जैसे इष्ट में निष्ठा होती है वैसे ही गुरु चरण में निष्ठा होनी चाहिए। यदि गुरु में निष्ठा नहीं, तो भजन में शक्ति नहीं आती, प्रकाश नहीं आता। भजन ज़्यादा दूर आगे ले जा नहीं सकता। किन्तु जब गुरु में अटूट निष्ठा होती है, तो साधक के भीतर समस्त शक्ति का प्रकाश स्वाभाविक होना शुरू हो जाता है। जो भी महापुरुष भगवत प्राप्ति किए हैं — सब गुरुनिष्ठ थे, गुरु वाणी में अटूट विश्वास रखते थे। ऐसा कभी देखा नहीं गया कि गुरु में निष्ठा न हो, गुरु सान्निध्य में न रहे, और फिर भी परम सिद्ध हो गए।
✅ करें:
  • गुरु में अटूट निष्ठा रखें — यही भगवत प्राप्ति का अपरिहार्य साधन है
📌 श्री राधा रमण चरण दास देव की तीर्थयात्रा क्रम:
  • नवद्वीप (प्रथम बार) — मणिपुर घाट, राजेन दादा नाम से प्रसिद्धि
  • नीलाचल (पुरी) — दिव्य लीला, शिष्य मण्डली का विस्तार
  • कोलकाता — गंगा स्नान, अचानक अदृश्य
  • अयोध्या — सरयू तट पर पुनः गुरु दर्शन
  • वृन्दावन — लीलास्थली दर्शन, वन परिक्रमा
  • नवद्वीप (द्वितीय बार) — श्री गौर हरिदास महन्त से वेश ग्रहण, नामकरण — राधा रमण चरण दास देव
गुरुनिष्ठा की पराकाष्ठा — श्री रामदास बाबाजी महाराज एवं प्रसाद लीला
श्री रामदास बाबाजी महाराज की अद्भुत गुरुनिष्ठा तथा प्रसाद की मर्यादा सम्बन्धी शिक्षा
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श्री रामदास बाबाजी महाराज — वैष्णव कुलतिलक की गुरुनिष्ठा
श्री रामदास बाबाजी महाराज की प्रसाद लीला — गुरुनिष्ठा एवं प्रसाद मर्यादा की शिक्षा
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सद्गुरुदेव बताते हैं कि श्री रामदास बाबाजी महाराज वैष्णव कुलतिलक एवं वैष्णवाग्रगण्य थे — जब-जब वैष्णव जगत में चिन्तन होता है, श्री रामदास बाबाजी महाराज सर्वाग्रे आ जाते हैं। उन्होंने श्री राधा रमण चरण दास देव से दीक्षा ग्रहण की थी। उनकी गुरुनिष्ठा की पराकाष्ठा का एक अद्भुत प्रसंग है। श्री रामदास बाबाजी महाराज का नियम था कि रसोई करके भोग लगाकर गुरुदेव की सेवा के पश्चात ही उनके शेष प्रसाद ग्रहण करते थे। एक दिन गुरुदेव कहीं चले गए — उस समय न टेलीफोन था, न कोई सूचना का साधन। बहुत प्रतीक्षा के पश्चात सोचा कि शायद आज नहीं आएँगे, चलो प्रसाद पा लें। जैसे ही एक थाली में प्रसाद पाना आरम्भ किया, उसी समय श्री राधा रमण चरण दास देव प्रकट हो गए — 'रामदास! बहुत भूख लगी है, कुछ खाने दो!' किन्तु एक ही थाली थी और वह उच्छिष्ट (जूठी) हो चुकी थी। श्री रामदास बाबाजी महाराज ने क्या किया — जहाँ से प्रसाद ग्रहण किए थे, वहाँ से काटकर अलग किया, हाथ धोकर शेष भाग गुरुदेव को अर्पित कर दिया। उनका विश्वास था कि यह भगवान का प्रसाद है — प्रसाद कभी झूठा नहीं होता। शास्त्र कहते हैं — दूर से आगत, बासी, उच्छिष्ट, प्रसाद कभी अस्पृश्य नहीं होता। श्री राधा रमण चरण दास देव बहुत प्रसन्न हो गए और आशीर्वाद दिया — 'तुमने प्रसाद की मर्यादा जान ली है, ठीक-ठीक है।' सद्गुरुदेव बताते हैं कि गुरुदेव कभी-कभी ऐसी परीक्षा लेते हैं।
🔗 श्री रामदास बाबाजी की प्रसाद लीला गुरुनिष्ठा एवं प्रसाद मर्यादा — दोनों सिद्धान्तों की जीवन्त शिक्षा है।
✅ करें:
  • प्रसाद को सदैव भगवत प्रसाद मानें — प्रसाद कभी दूषित नहीं होता
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श्रीनिवास आचार्य प्रभु की एक थाली लीला — गुरु परीक्षा
श्रीनिवास आचार्य प्रभु, श्री रामचन्द्र कविराज एवं श्री नरोत्तम ठाकुर — एक थाली में प्रसाद
▶ देखें (48:26) ▶ Watch (48:26)
सद्गुरुदेव एक और अद्भुत प्रसंग सुनाते हैं। एक दिन श्रीनिवास आचार्य प्रभु प्रसाद पा रहे थे। उन्होंने अपने शिष्य श्री रामचन्द्र कविराज तथा शिष्य स्थानीय श्री नरोत्तम ठाकुर को बुलाया — 'आओ, आज हम सब एक थाली में प्रसाद पाएँगे।' श्री रामचन्द्र कविराज गुरुदेव की ओर देख रहे हैं — हम गुरुदेव के साथ एक थाली में कैसे खा सकते हैं? किन्तु गुरुदेव की आज्ञा है, विचार करने का अधिकार नहीं। श्री नरोत्तम ठाकुर भी ऐसे ही — गुरुदेव की आज्ञा शिरोधार्य। तीनों ने एक थाली में प्रसाद ग्रहण किया। सद्गुरुदेव बताते हैं कि ये सभी दृष्टा पुरुष थे — श्री रामचन्द्र कविराज भी दृष्टा, श्री नरोत्तम ठाकुर भी दृष्टा। ऐसे सिद्ध पुरुषों की क्रिया-मुद्रा कौन जान सकता है! यह भी गुरु की परीक्षा का एक अद्भुत उदाहरण है।
🔗 श्रीनिवास आचार्य प्रभु की यह लीला पूर्व कथा (रामदास बाबाजी) के गुरुनिष्ठा सिद्धान्त की ऐतिहासिक पुष्टि है।
अलौकिक लीलाएँ — कुत्तों का भण्डारा, वृक्ष नृत्य एवं प्लेग निवारण
श्री राधा रमण चरण दास देव की अलौकिक दैवी शक्ति सम्पन्न लीलाओं का वर्णन
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भक्तिमा कुतिया एवं कुत्तों का अद्भुत भण्डारा
भक्तिमा कुतिया की कथा एवं सैकड़ों कुत्तों का अलौकिक भण्डारा — नवद्वीप की ऐतिहासिक लीला
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सद्गुरुदेव एक अत्यन्त अद्भुत लीला का वर्णन करते हैं। श्री राधा रमण चरण दास देव प्रतिदिन कीर्तन मण्डली लेकर नवद्वीप के ग्रामों में हरिनाम प्रचार करते थे। एक कुतिया सदैव उनके पीछे-पीछे चलती थी — जहाँ कीर्तन मण्डली जाती, वहीं जाती; कीर्तन छोड़कर कहीं नहीं जाती; राधा रमण चरण दास देव के चरण प्रान्त में बैठी रहती। वे उसे 'भक्तिमा' कहते थे। जब भक्तिमा ने शरीर त्याग किया, तो उन्होंने कहा — भक्तिमा चली गईं, इनकी अन्त्येष्टि क्रिया एवं आत्म कल्याण हेतु साधु सेवा (भण्डारा) होनी चाहिए। नवद्वीप के समस्त सन्तों को निमन्त्रण भेजा गया। किन्तु संध्या तक खबर फैल गई कि यह कुत्ते का भण्डारा है — सन्त समाज क्रोधित हो गया कि कुत्ते का झूठा खिलाएँगे, कोई नहीं जाएगा। प्रातः 10 बजे, 10:30, 11 बजे — एक भी सन्त नहीं आया। तब श्री राधा रमण चरण दास देव ने एक मोटे-ताज़े कुत्ते से कहा — 'महाराज! कृपा करके अपनी समस्त बिरादरी को निमन्त्रण दे दीजिए।' कुत्ता चल दिया। दोपहर बाद झुण्ड के झुण्ड कुत्ते आने लगे — कोई पतला, कोई मोटा, कोई लँगड़ा, कोई काला, कोई लाल — किन्तु कोई लड़ाई-झगड़ा नहीं। सब लाइन से बैठ गए। पत्तल सजाकर प्रसाद परोसा गया — सब शान्ति से, प्रेम से खाते रहे। खाने के बाद गिलास में पानी दिया गया, सबने पानी पीकर एक-एक करके लाइन से चले गए। यह देखकर नवद्वीप के सन्त बहुत लज्जित एवं भयभीत हो गए — एक महापुरुष के चरणों में विशेष अपराध हो गया! सब आकर क्षमा याचना किए और प्रायश्चित स्वरूप कुत्तों के जूठे पत्तलों में प्रसाद ग्रहण किया।
🔗 कुत्तों के भण्डारे की यह अलौकिक लीला श्री राधा रमण चरण दास देव की दैवी शक्ति एवं समदर्शिता का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
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कीर्तन के छन्द में वटवृक्ष की शाखाओं का नृत्य
वटवृक्ष शाखा नृत्य लीला — नास्तिकों एवं मुसलमानों को दिव्य शक्ति का प्रदर्शन
▶ देखें (59:14) ▶ Watch (59:14)
सद्गुरुदेव एक और अद्भुत लीला का वर्णन करते हैं। एक बार कुछ नास्तिक लोग एवं मुसलमान जो हरिनाम कीर्तन में विश्वास नहीं करते थे, उनको बुलाकर ले गए। एक विशाल वटवृक्ष के नीचे कीर्तन हो रहा था। कीर्तन के छन्द में उस वटवृक्ष की शाखा-प्रशाखाएँ नृत्य करने लगीं! सबने यह अलौकिक दृश्य साक्षात दर्शन किया। इससे श्री राधा रमण चरण दास देव की और अधिक ख्याति हो गई।
🔗 वृक्ष शाखाओं का कीर्तन पर नृत्य करना उनकी अलौकिक दैवी शक्ति का एक और प्रमाण है।
🎵
कोलकाता में प्लेग रोग निवारण — हरिनाम संकीर्तन का अमोघ प्रभाव
हरिनाम संकीर्तन द्वारा प्लेग रोग निवारण — कोलकाता की ऐतिहासिक लीला
▶ देखें (60:05) ▶ Watch (60:05)
सद्गुरुदेव कोलकाता की एक ऐतिहासिक घटना का वर्णन करते हैं। प्लेग नामक एक भयंकर संक्रामक रोग फैला — जैसे हाल में कोरोना वायरस आया, वैसे ही यह असाध्य रोग था जो एक से दूसरे को हो जाता था। लाखों-लाखों लोग मर गए, बहुत अंग्रेज भय से भारत छोड़कर लन्दन भाग गए। कोई उपाय नहीं था। तब श्री राधा रमण चरण दास देव एवं श्री रामदास बाबाजी महाराज ने कहा — एकमात्र हरिनाम संकीर्तन ही इस अमंगल से मुक्त कर सकता है, यही पवित्र वातावरण ला सकता है। लाखों भक्त मण्डली लेकर मोहल्ले-मोहल्ले कीर्तन समारोह निकाला। जिस मोहल्ले से कीर्तन लेकर जाते, दूसरे दिन वहाँ कोई नहीं मरता! मुसलमान भी मृत्युभय से भयभीत होकर शामिल हो गए — किन्तु 'हरि बोल' कहने में संकोच था, अतः वे बांग्ला में कहते थे — 'हिन्दू भाई जे ही बोल, ओ ही बोल, ओ ही बोल!' अर्थात् 'हिन्दू भाई का जो बोल है, मेरा भी वही बोल!' इस प्रकार हरिनाम संकीर्तन के प्रभाव से प्लेग रोग उपशान्त हो गया। सद्गुरुदेव कहते हैं कि यह सत्य है, कोई किंवदन्ती नहीं, न कोई अतिरंजित कथन। श्री जगत बन्धु सुन्दर भी उस समय हरिनाम संकीर्तन समारोह लेकर कोलकाता में निकले थे।
🔗 हरिनाम संकीर्तन द्वारा प्लेग निवारण श्री राधा रमण चरण दास देव की सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं ऐतिहासिक लीला है।
✅ करें:
  • हरिनाम संकीर्तन — समस्त अमंगल निवारण का अमोघ उपाय
📌 प्लेग निवारण हरिनाम संकीर्तन — मुख्य तथ्य:
  • प्लेग रोग — असाध्य संक्रामक रोग, लाखों लोगों की मृत्यु
  • श्री राधा रमण चरण दास देव एवं श्री रामदास बाबाजी महाराज ने हरिनाम संकीर्तन का आह्वान किया
  • लाखों भक्त मण्डली लेकर मोहल्ले-मोहल्ले कीर्तन
  • जिस मोहल्ले से कीर्तन गया — वहाँ दूसरे दिन कोई नहीं मरा
  • मुसलमान भी मृत्युभय से शामिल हुए — 'हिन्दू भाई जे ही बोल, ओ ही बोल'
  • श्री जगत बन्धु सुन्दर भी उसी समय हरिनाम संकीर्तन लेकर निकले थे
  • हरिनाम संकीर्तन के प्रभाव से प्लेग रोग उपशान्त हुआ
उपसंहार — नित्य लीला प्रवेश एवं वैष्णव जगत में अवदान
श्री राधा रमण चरण दास देव के नित्य लीला प्रवेश एवं वैष्णव जगत में उनके चिरस्थायी अवदान का सारांश
🙏
उपसंहार — 52 वर्ष की आयु में नित्य लीला प्रवेश
श्री राधा रमण चरण दास देव का नित्य लीला प्रवेश एवं वैष्णव जगत में चिरस्थायी अवदान
▶ देखें (64:31) ▶ Watch (64:31)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि श्री राधा रमण चरण दास देव ने व्यापक हरिनाम प्रचार किया, महाप्रभु का प्रेम धर्म प्रचार किया और भक्ति धर्म के उत्थान में अपूर्व अवदान दिया। वैष्णव धर्म उनके इस अवदान को कभी नहीं भूलेगा — अभी भी वैष्णवाग्रगण्य के रूप में उनकी पूजा होती है। उनके सम्प्रदाय में श्री रामदास बाबाजी महाराज के गण उन्हें महाप्रभु का ही एक अवतार मानकर पूजा करते हैं। ऐसे अद्भुत शक्ति सम्पन्न महापुरुष ने अधिक दिन शरीर धारण नहीं किया — लगभग 52 वर्ष की आयु में शरीर त्यागकर नित्य लीला में प्रवेश कर गए। उनकी समाधि नवद्वीप में विद्यमान है।
🔗 यह उपसंहार सम्पूर्ण सत्संग के मूल सन्देश की पुष्टि करता है — ईश्वर कोटि के महापुरुष लोक कल्याण हेतु प्रकट होकर भक्ति धर्म का प्रकाश फैलाते हैं।
📌 श्री राधा रमण चरण दास देव — जीवन सारांश:
  • ईश्वर कोटि के महापुरुष
  • आयु — लगभग 52 वर्ष
  • प्रमुख शिष्य — श्री रामदास बाबाजी महाराज
  • प्रमुख अवदान — व्यापक हरिनाम प्रचार, भक्ति धर्म का उत्थान
  • समाधि — नवद्वीप धाम में विद्यमान
  • सम्प्रदाय में महाप्रभु के अवतार रूप में पूजित
🧠 आत्म-चिंतन (Self Assessment)
इस सत्संग से आपने क्या सीखा? (Test your understanding)
Core Essence
ईश्वर कोटि के महापुरुष किस प्रकार लोक कल्याण करते हैं और उनकी कृपा प्राप्ति का मार्ग क्या है?
उत्तर: ईश्वर कोटि के महापुरुष जैसे श्री राधा रमण चरण दास देव भगवत इच्छा से प्रकट होकर हरिनाम संकीर्तन एवं भक्ति प्रचार द्वारा असंख्य जीवों का कल्याण करते हैं। उनकी कृपा प्राप्ति का एकमात्र मार्ग अनन्य गुरुनिष्ठा एवं हरि भजन है।
Multiple Choice
🔢 सत्संग सारांश के अनुसार, श्री राधा रमण चरण दास देव किस कोटि के महापुरुष थे?
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
सारांश में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि सद्गुरुदेव ने श्री राधा रमण चरण दास देव को ईश्वर कोटि का महापुरुष बताया है।
Multiple Choice
🔢 रायचरण (श्री राधा रमण चरण दास देव का पूर्वाश्रम का नाम) को सद्गुरु की प्राप्ति कहाँ हुई थी?
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
सारांश के अनुसार, देवी माँ की कृपा से रायचरण को अयोध्या में सरयू तट पर सद्गुरु प्राप्त हुए और उन्होंने दीक्षा ग्रहण की।
Multiple Choice
🔢 कोलकाता में प्लेग जैसी महामारी का निवारण किस अलौकिक लीला द्वारा किया गया?
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
सारांश में वर्णित है कि श्री राधा रमण चरण दास देव ने हरिनाम संकीर्तन के माध्यम से कोलकाता में प्लेग रोग का निवारण किया था।
Multiple Choice
🔢 मनुष्य जीवन का प्रधान उद्देश्य क्या बताया गया है?
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
सत्संग में नरतनु की सार्थकता एवं मनुष्य जीवन का मुख्य उद्देश्य हरि भजन करना बताया गया है।
Multiple Choice
🔢 रायचरण के मन में वैराग्य उत्पन्न होने का मुख्य कारण क्या था?
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
जमींदार की नौकरी के दौरान प्रजा पर होने वाले दमन को देखकर उनके मन में वैराग्य उत्पन्न हुआ और उन्होंने नौकरी त्याग दी।
True/False
🤔 श्री रामदास बाबाजी महाराज, श्री राधा रमण चरण दास देव के गुरु थे।
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
सारांश के अनुसार, श्री रामदास बाबाजी महाराज उनके गुरुनिष्ठ शिष्य थे, गुरु नहीं।
True/False
🤔 सारांश के अनुसार, सिद्ध कोटि के महापुरुषों को ईश्वर प्राप्ति के लिए साधन की आवश्यकता नहीं होती।
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
सारांश में फूल-फल के दृष्टांत द्वारा समझाया गया है कि सिद्ध महापुरुषों को साधन की आवश्यकता नहीं होती, वे जन्म से ही सिद्ध होते हैं।
True/False
🤔 श्री राधा रमण चरण दास देव ने कुत्तों के लिए एक अद्भुत भण्डारे का आयोजन किया था।
💡 स्पष्टीकरण (Explanation):
सारांश में उनकी 'कुत्तों के अद्भुत भण्डारे की लीला' का रोमांचकारी वर्णन किया गया है।
स्पष्टीकरण (Clarification)

यह सारांश AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग गुरु सेवा में करके तैयार किया गया है। इसमें त्रुटि हो सकती है। कृपया पूर्ण लाभ के लिए पूरा वीडियो अवश्य देखें।

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