श्री राधा रमण चरण दास देव का दिव्य जीवन चरित्र
श्री राधा रमण चरण दास देव का दिव्य जीवन चरित्र
सद्गुरुदेव श्री राधा रमण चरण दास देव की तिरोभाव तिथि पर उनके दिव्य जीवन चरित का वर्णन करते हैं। सर्वप्रथम जीव कोटि, सिद्ध कोटि एवं ईश्वर कोटि के महापुरुषों का भेद बताते हुए श्री राधा रमण चरण दास देव को ईश्वर कोटि के महापुरुष बताते हैं। पूर्व बंगाल में जन्मे रायचरण ने जमींदार की नौकरी त्यागकर, देवी माँ की कृपा से अयोध्या में सरयू तट पर सद्गुरु प्राप्त किए और दीक्षा ग्रहण की। नवद्वीप, नीलाचल एवं वृन्दावन की यात्रा कर वेश ग्रहण के पश्चात् राधा रमण चरण दास देव नाम से प्रसिद्ध हुए और व्यापक हरिनाम प्रचार किया। श्री रामदास बाबाजी महाराज जैसे गुरुनिष्ठ शिष्यों की कथा, कुत्तों के अद्भुत भण्डारे की लीला, तथा कोलकाता में हरिनाम संकीर्तन द्वारा प्लेग रोग निवारण जैसी अलौकिक लीलाओं का रोमांचकारी वर्णन किया गया है।
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- 🔹 तान्त्रिक गुरु से प्रारम्भिक दीक्षा एवं सूर्यग्रहण में पुरश्चरण का महत्त्व (18:51)
- 🔹 भारत के विभिन्न प्रदेशों में उपासना पद्धतियों की विविधता (19:12)
- 🔹 देवी माँ का साक्षात दर्शन — अयोध्या में सरयू तट पर सद्गुरु की प्रतीक्षा (22:18)
- 🔹 सरयू नदी के तट पर दिव्य गुरु-शिष्य मिलन — साध्य-साधन तत्व का उपदेश (29:30)
📖 आज की शिक्षाएं 📖 आज की विस्तृत शिक्षाएं
- जीव कोटि — बद्ध जीवात्मा जो संसार चक्र में आवर्तन करते-करते मुक्ति के समय महत् कृपा से भजन साधन करते हैं
- सिद्ध कोटि — पूर्व जन्म में साधन सम्पन्न, भगवत इच्छा से शेष कर्म संपादन हेतु पुनः आते हैं
- पार्षद कोटि — भगवान के नित्य पार्षद, भगवत इच्छा से प्रकट होते हैं
- ईश्वर कोटि — लोक कल्याण एवं भक्ति धर्म के उत्थान के लिए भगवत इच्छा से प्रकट होते हैं
- प्राकृत बुद्धि से साधु-सन्तों का परिमाप न करें — अपराध होता है
- श्री रूप गोस्वामी — रूप मंजरी
- श्री सनातन गोस्वामी — लवंग मंजरी
- दोनों राधा रानी की अन्तरंगा सहचरी
- पितृप्रदत्त नाम — रायचरण
- जन्मस्थान — यशोहर जिला, नरायल (वर्तमान बांग्लादेश)
- पिता — मोहनचन्द्र घोष
- माता — कनक सुन्दरी
- विवाह — 17 वर्ष की आयु में, तीन बार दार परिग्रह
- एक पुत्र जन्मा, किन्तु अल्पायु में शरीर त्याग
- जमींदार के सुपरिण्टेण्डेण्ट पद पर नियुक्त
- गरीबों को दुखी करके हीन वृत्ति की नौकरी कदापि न करें
- नरतनु को भगवत चरण में समर्पित कर भवसागर पार करें
- सत्संग रूपी अनुकूल वायु का सदैव सेवन करें
- शरीर को केवल भोग में न लगाएँ — रोग, शोक एवं 84 लाख योनि बन्धन होगा
- प्लव (नाव) — नरतनु (मनुष्य शरीर)
- कर्णधार (नाविक) — सद्गुरु
- अनुकूल वायु — सत्संग एवं भगवत कृपा
- ग्रहण काल में भजन-उपासना अवश्य करें — अल्प समय में भगवत कृपा प्राप्ति का उत्तम अवसर है
- पूर्व भारत (बंगाल) — तन्त्र उपासना, काली पूजा, देवी उपासना
- उत्तर भारत (हिमालय) — निर्गुण निर्विशेष ब्रह्म उपासना (ॐ)
- दक्षिण भारत — शिवजी की उपासना
- मध्य भारत — राधा-कृष्ण एवं रामजी की उपासना
- पूर्व भारत (ओडिशा) — जगन्नाथ जी की उपासना
- अश्रु (आँसू)
- कम्प (काँपना)
- पुलक (रोमांच)
- स्वेद (पसीना)
- वैवर्ण (वर्ण परिवर्तन)
- सर्वांग स्तम्भ (शरीर जड़ होना)
- मूर्छा (मूर्छित होना)
- प्रलय (चेतना लुप्त होना)
- गुरु में अटूट निष्ठा रखें — यही भगवत प्राप्ति का अपरिहार्य साधन है
- नवद्वीप (प्रथम बार) — मणिपुर घाट, राजेन दादा नाम से प्रसिद्धि
- नीलाचल (पुरी) — दिव्य लीला, शिष्य मण्डली का विस्तार
- कोलकाता — गंगा स्नान, अचानक अदृश्य
- अयोध्या — सरयू तट पर पुनः गुरु दर्शन
- वृन्दावन — लीलास्थली दर्शन, वन परिक्रमा
- नवद्वीप (द्वितीय बार) — श्री गौर हरिदास महन्त से वेश ग्रहण, नामकरण — राधा रमण चरण दास देव
- प्रसाद को सदैव भगवत प्रसाद मानें — प्रसाद कभी दूषित नहीं होता
- हरिनाम संकीर्तन — समस्त अमंगल निवारण का अमोघ उपाय
- प्लेग रोग — असाध्य संक्रामक रोग, लाखों लोगों की मृत्यु
- श्री राधा रमण चरण दास देव एवं श्री रामदास बाबाजी महाराज ने हरिनाम संकीर्तन का आह्वान किया
- लाखों भक्त मण्डली लेकर मोहल्ले-मोहल्ले कीर्तन
- जिस मोहल्ले से कीर्तन गया — वहाँ दूसरे दिन कोई नहीं मरा
- मुसलमान भी मृत्युभय से शामिल हुए — 'हिन्दू भाई जे ही बोल, ओ ही बोल'
- श्री जगत बन्धु सुन्दर भी उसी समय हरिनाम संकीर्तन लेकर निकले थे
- हरिनाम संकीर्तन के प्रभाव से प्लेग रोग उपशान्त हुआ
- ईश्वर कोटि के महापुरुष
- आयु — लगभग 52 वर्ष
- प्रमुख शिष्य — श्री रामदास बाबाजी महाराज
- प्रमुख अवदान — व्यापक हरिनाम प्रचार, भक्ति धर्म का उत्थान
- समाधि — नवद्वीप धाम में विद्यमान
- सम्प्रदाय में महाप्रभु के अवतार रूप में पूजित
सारांश में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि सद्गुरुदेव ने श्री राधा रमण चरण दास देव को ईश्वर कोटि का महापुरुष बताया है।
सारांश के अनुसार, देवी माँ की कृपा से रायचरण को अयोध्या में सरयू तट पर सद्गुरु प्राप्त हुए और उन्होंने दीक्षा ग्रहण की।
सारांश में वर्णित है कि श्री राधा रमण चरण दास देव ने हरिनाम संकीर्तन के माध्यम से कोलकाता में प्लेग रोग का निवारण किया था।
सत्संग में नरतनु की सार्थकता एवं मनुष्य जीवन का मुख्य उद्देश्य हरि भजन करना बताया गया है।
जमींदार की नौकरी के दौरान प्रजा पर होने वाले दमन को देखकर उनके मन में वैराग्य उत्पन्न हुआ और उन्होंने नौकरी त्याग दी।
सारांश के अनुसार, श्री रामदास बाबाजी महाराज उनके गुरुनिष्ठ शिष्य थे, गुरु नहीं।
सारांश में फूल-फल के दृष्टांत द्वारा समझाया गया है कि सिद्ध महापुरुषों को साधन की आवश्यकता नहीं होती, वे जन्म से ही सिद्ध होते हैं।
सारांश में उनकी 'कुत्तों के अद्भुत भण्डारे की लीला' का रोमांचकारी वर्णन किया गया है।
यह सारांश AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग गुरु सेवा में करके तैयार किया गया है। इसमें त्रुटि हो सकती है। कृपया पूर्ण लाभ के लिए पूरा वीडियो अवश्य देखें।
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