श्री भगवत चर्चा
27 December 2025
स्वरूप-विस्मृति और गुरु-कृपा से मुक्ति
जीव के दुःख का कारण स्वरूप-विस्मृति, माया का प्रबल बंधन और गुरु-कृपा से राधा रानी के प्रेम की प्राप्ति।
Sri Sri 108 Sri Vinod Baba ji Maharaj
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हमारे प्रिय सद्गुरुदेव बताते हैं:
"
संसार में जो कार्य कर रहे हो, स्त्री, पुत्र, कुटुंब, परिवार लेके, जैसे रह रहे हो ऐसा ही रहो। सिर्फ ख्याल रखना ये तुम्हारा नहीं, इससे तुम्हारा संबंध था नहीं, है नहीं, होगा नहीं। बस ये जानकर के तुम राधा रानी के हो, राधा रानी तुम्हारी है।
"
🔑 आज के सत्संग के मुख्य शब्द 🔑 Key Words of Today's Satsang
आनंद (40)
शरीर (25)
भगवान (25)
कारण (24)
राधा (22)
पुत्र (20)
स्वरूप (19)
वस्तु (19)
घर (18)
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जीव का मूल दुःख: स्वरूप-विस्मृति
इस खंड में सदगुरुदेव जीव के मूल स्वरूप की चर्चा करते हैं। प्रकृति और पुरुष के भेद को समझाते हुए बताते हैं कि जीवात्मा क्यों भ्रमित होती है। अहंकार के कारण आत्मा अपने श्री चैतन्य स्वरूप को भूल जाती है।
❓
दुःख का एकमात्र कारण: स्वरूप-विस्मृति
दुःख का मूल कारण: स्वरूप को भूलना और संसार को अपना मानना
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सदगुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि जीव के समस्त दुःखों का एकमात्र कारण अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाना है। हम यह भूल गए हैं कि हम भगवान के हैं और भगवान हमारे हैं। संसार से हमारा कोई नित्य संबंध नहीं है, फिर भी हम इसे सत्य और अपना मानकर दुःख भोगते हैं।
सदगुरुदेव बताते हैं कि जीव भगवान का अविच्छेद्य अंश है, फिर भी वह संसार चक्र में दुःखी होकर भटक रहा है। इसका मूल कारण 'स्वरूप-विस्मृति' है। माया ने हमें भुला दिया है कि हम सत-आनंदमय हैं और भगवान से हमारा नित्य संबंध है। इसके विपरीत, जो संसार स्वप्न की तरह मिथ्या है, उसे हम सत्य और अपना मान लेते हैं। यह मान्यता और स्वीकृति ही हमारे सारे दुःखों की जड़ है। हम आनंदमय होते हुए भी बाहरी वस्तुओं में आनंद खोजते हैं, जो संभव नहीं है।
🔗 यह शिक्षा जीव के अस्तित्व के मूल प्रश्न को संबोधित करती है और अज्ञान को दुःख का मूल कारण स्थापित करती है।
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दृष्टांत: माँ की गोद में सोता बालक
दृष्टांत: माँ की गोद और जंगल का स्वप्न
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सदगुरुदेव एक दृष्टांत देते हैं कि जैसे एक बच्चा माँ की गोद में सोकर जंगल में खो जाने का स्वप्न देखता है और रोता है, पर जागने पर पाता है कि वह तो माँ की गोद में ही है। उसी प्रकार, जीव भी भगवान की गोद में ही है, बस माया के स्वप्न में स्वयं को दुःखी मान रहा है।
सदगुरुदेव समझाते हैं कि जीव का भगवान से वियोग वास्तविक नहीं, बल्कि एक स्वप्न जैसा है। वे उदाहरण देते हैं कि एक बालक अपनी माँ की गोद में सुरक्षित सो रहा है, लेकिन स्वप्न में वह एक भयंकर जंगल में खो जाने का दृश्य देखता है और 'माँ-माँ' कहकर रोने लगता है। माँ के जगाने पर उसका भ्रम टूट जाता है। ठीक इसी प्रकार, हम सदा भगवान के साथ ही हैं, हमारा दुःख केवल माया के स्वप्न के कारण है। इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं होना चाहिए कि भगवान से हमारा कोई संबंध नहीं या वे हमारी खबर नहीं लेते।
🔗 यह दृष्टांत संसार के दुःख की अवास्तविकता और भगवान के साथ हमारे नित्य-संबंध की वास्तविकता को दर्शाता है।
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जड़-धर्मी जीव का जड़ में आनंद खोजना
जड़-धर्मी होकर जड़ विषयों में आनंद का व्यर्थ अनुसंधान
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सदगुरुदेव बताते हैं कि जीव का स्वरूप आनंदमय है, इसलिए वह स्वाभाविक रूप से आनंद खोजता है। परंतु, स्वरूप-विस्मृति के कारण वह स्वयं को जड़ शरीर मान लेता है और पंचभूतों से बने जड़ विषयों (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) में आनंद का अनुसंधान करता है, जहाँ आनंद है ही नहीं।
सदगुरुदेव के अनुसार, चूँकि जीव का मूल स्वरूप ही 'सहज सुख राशि' है, उसे आनंद की खोज के लिए किसी प्रेरणा की आवश्यकता नहीं होती। एक कीड़ा भी आनंद के पीछे भागता है। समस्या यह है कि स्वरूप को भूलने के कारण वह स्वयं को जड़ शरीर मान लेता है (जड़-धर्मी)। इसी भ्रम के कारण वह चेतन आत्मा के आनंद को जड़ भौतिक विषयों - शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध - में खोजता है। यह प्रयास वैसा ही व्यर्थ है जैसे रेगिस्तान की मृगतृष्णा में जल खोजना। वह इन इंद्रिय विषयों से कभी तृप्त नहीं होता और अनादि काल से इसी चक्र में भटक रहा है।
🔗 यह शिक्षा बताती है कि दुःख का कारण आनंद की खोज नहीं, बल्कि गलत दिशा में उसकी खोज है।
माया का प्रबल बंधन: आसक्ति की दुर्गति
इस खंड में सदगुरुदेव माया की आसक्ति की प्रबलता को एक मार्मिक कथा के माध्यम से दर्शाते हैं। वे बताते हैं कि जीव इतना मोहित है कि वह बार-बार निम्न योनियों में कष्ट भोगना स्वीकार कर लेता है, परंतु संसार का मोह छोड़ने और भगवान के पास जाने के लिए तैयार नहीं होता।
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जीव भगवान के पास क्यों नहीं जाता?
माया का आश्चर्य: जीव स्वयं ही भगवान के पास आना नहीं चाहता
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सदगुरुदेव भगवान के शब्दों को उद्धृत करते हुए कहते हैं, 'मैं तो चाहता हूँ कि जीव मेरे पास आ जाए, लेकिन वह आना ही नहीं चाहता।' शास्त्र, गुरु और संत सभी कहते हैं कि संसार में सुख नहीं है, फिर भी जीव अनादि काल से यहीं सुख खोज रहा है। यही माया का सबसे बड़ा प्रभाव है।
श्री नारद जी के प्रश्न के उत्तर में भगवान बताते हैं कि वे तो गुरु, शास्त्र, महत और आत्मा के रूप में निरंतर जीव को ज्ञान दे रहे हैं कि संसार में आनंद नहीं है। भगवान कहते हैं, 'यह लोक अनित्य और असुखमय है, मेरा भजन करो।' इसके बावजूद, जीव अपने अनुभव से भी न सीखकर बार-बार इन्हीं विषयों के पीछे भागता रहता है। भगवान कहते हैं, 'मैं तो उसे बुला रहा हूँ, पर वह आना ही नहीं चाहता।' नारद जी को इस पर विश्वास नहीं होता, क्योंकि भगवान का धाम अनंत सुखों से भरा है, जिसकी तुलना संसार के किसी सुख से नहीं हो सकती। फिर भी जीव उधर मुँह मोड़ता ही नहीं।
🔗 यह शिक्षा जीव की स्वतंत्र इच्छा और माया के बंधन की गहराई को उजागर करती है।
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सांसारिक प्रेम की क्षणभंगुरता
सांसारिक प्रेम बनाम भगवत प्रेम: दिखावा और स्वार्थ का भेद
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सदगुरुदेव बताते हैं कि सांसारिक प्रेम केवल दिखावा है और स्वार्थ पर आधारित है। भगवान तो केवल हमारा मन और थोड़ा सा प्रेम चाहते हैं, बदले में अखंड आनंद देने का वचन देते हैं। परंतु, मनुष्य संसार में 'दो, दो, दो' की भावना से प्रेम दिखाता है, जो वास्तविक नहीं है।
सदगुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि भगवान को छप्पन भोग या कोई जागतिक उपहार नहीं चाहिए, वे केवल हमारा मन और थोड़ा सा प्यार चाहते हैं। वे कहते हैं, 'तुम सबको प्यार करते हो, घर में स्त्री, पुत्र, कुटुंब, परिवार, धन, जन आदि सब में तुम्हारी प्रीति है। हमें भी अपने प्रिय जानकर हृदय में स्थान दे दो।' भगवान वचन देते हैं कि ऐसा करने से वे हृदय को अखंड आनंद से भर देंगे और समस्त दुःखों व अभावों को पूर्ण कर देंगे। इसके विपरीत, सदगुरुदेव एक दृष्टांत से समझाते हैं कि सांसारिक प्रेम कितना क्षणभंगुर है। यदि कोई व्यक्ति घर में भजन करने लगे और काम-धाम छोड़ दे, तो कुछ ही दिनों में परिवार का प्रेम समाप्त हो जाता है और वह बोझ बन जाता है। वृद्ध होने पर तो कोई प्रेम करता ही नहीं। संसार से प्रेम करने पर सब कुछ चला जाता है, जबकि भगवान से प्रेम करने पर सब कुछ मिल जाता है और कुछ भी नहीं जाता।
🔗 यह तुलना सांसारिक आसक्ति की व्यर्थता और भगवत प्रेम की शाश्वतता को स्थापित करती है।
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कथा: सेठ की संपत्ति में आसक्ति
कथा: सेठ की दुर्गति - संपत्ति का मोह और भगवद्धाम का तिरस्कार
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सदगुरुदेव एक सेठ की कथा सुनाते हैं, जिसे श्री नारद जी गोलोक धाम ले जाने का प्रस्ताव देते हैं। सेठ अपनी संपत्ति की चिंता में प्रस्ताव टाल देता है। मृत्यु के बाद, वह अपनी संपत्ति की रक्षा के लिए पहले कुत्ता, फिर सर्प और अंत में विष्ठा का कीड़ा बनता है, पर हर योनि में आसक्ति के कारण भगवान के पास जाने से मना कर देता है।
यह सिद्ध करने के लिए कि जीव स्वयं ही संसार नहीं छोड़ना चाहता, सदगुरुदेव दिल्ली के एक वृद्ध सेठ की कथा सुनाते हैं। श्री नारद जी उसे बिना साधना के गोलोक धाम ले जाने का प्रस्ताव देते हैं, पर सेठ अपनी संपत्ति और परिवार की चिंता का बहाना बनाकर टाल देता है। मरने के बाद, अपनी संपत्ति की रक्षा के प्रबल मोह के कारण वह पहले उसी घर में कुत्ता बनता है। नारद जी उसे कुत्ता योनि से भी गोलोक ले जाने का प्रस्ताव देते हैं, पर वह फिर मना कर देता है। बाद में वह गुप्त खजाने की रक्षा के लिए सर्प बनता है, और अंत में विष्ठा का कीड़ा बनता है, फिर भी अपनी आसक्ति नहीं छोड़ता और हर बार भगवद्धाम जाने से इनकार कर देता है। यह जीव की दुर्गति और माया के प्रबल बंधन को दर्शाता है।
🔗 यह कथा अत्यंत प्रभावशाली ढंग से दर्शाती है कि आसक्ति ही पुनर्जन्म और अधोगति का मूल कारण है।
कल्याण का मार्ग: गुरु-कृपा और भाव-परिवर्तन
अंतिम खंड में सदगुरुदेव इस महा-भ्रम से निकलने का एकमात्र उपाय बताते हैं - सद्गुरु की कृपा। गुरु जीव को उसके वास्तविक दिव्य स्वरूप का ज्ञान देते हैं और संसार में रहते हुए भी अनासक्त होकर भगवत-प्रेम प्राप्त करने की व्यावहारिक विधि सिखाते हैं।
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सद्गुरु की भूमिका: स्वरूप का जागरण और चिद-अभिमान का दान
सद्गुरु की कृपा: जड़-अभिमान का परिवर्तन और दिव्य स्वरूप का दान
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सदगुरुदेव बताते हैं कि जीव को इस गहरी निद्रा से केवल सद्गुरु ही जगा सकते हैं। वे कृपा करके जीव के भीतर की चेतन सत्ता को जगाते हैं और उसके जड़-अभिमान को बदलकर उसे उसके वास्तविक चिन्मय स्वरूप का बोध कराते हैं। वे जीव को राधा रानी की नित्य सहचरी के रूप में उसका दिव्य स्वरूप प्रदान करते हैं।
सदगुरुदेव समझाते हैं कि जीव की इस दुर्गति का एकमात्र समाधान सद्गुरु की कृपा है। सद्गुरु जीव के भीतर की चेतन सत्ता को जगाते हैं और उसके अहंकार की वृत्ति को बदल देते हैं। वे 'मैं शरीर हूँ' इस जड़-अभिमान को हटाकर उसे 'मैं राधा रानी की चिन्मय सहचरी हूँ' इस चिद-अभिमान का दान करते हैं। सद्गुरु बताते हैं कि जीव शरीर नहीं है, शरीर संबंधी वस्तुएँ उसकी नहीं हैं, वह चेतन आत्मा है, भगवान का है और उसका नित्य संबंध राधा रानी से है। राधा रानी उसकी आराध्या हैं, अनंत आनंदमयी हैं। उनके चरणाश्रय से बढ़कर कोई उपासना नहीं है। गुरुदेव राधा रानी की उपासना पद्धति देते हैं, जिसमें अपने दिव्य स्वरूप का चिंतन करना होता है।
🔗 यह शिक्षा गुरु-तत्व की महिमा और आध्यात्मिक मार्ग में उनकी अनिवार्य भूमिका को स्थापित करती है।
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संसार में एक 'नौकर' की भाँति रहो
व्यावहारिक साधना: कर्ता नहीं, 'नौकर' बनकर संसार में रहो
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सदगुरुदेव व्यावहारिक सलाह देते हैं कि घर-परिवार को तन से नहीं, बल्कि मन से त्यागना है। संसार में रहो, सभी कर्तव्य करो, लेकिन स्वयं को मालिक नहीं, बल्कि एक नौकर समझो। यह भावना रखने से तुम संसार के कर्म-बंधन से मुक्त रहोगे।
सदगुरुदेव एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्यावहारिक उपदेश देते हैं। वे कहते हैं कि घर छोड़ने की आवश्यकता नहीं है। पति, पत्नी, बच्चों के साथ रहो और अपने सभी कर्तव्य निभाओ। बस अपनी भावना को बदल दो। स्वयं को गृहस्थ का 'मालिक' या 'कर्ता' मानने के बजाय, यह समझो कि तुम भगवान के घर में एक 'नौकर' हो। जैसे परदेश में नौकरी करने वाला व्यक्ति जानता है कि यह घर उसका नहीं, उसे तो केवल काम करके पैसा कमाना है, वैसे ही संसार को समझो। जब तुम कर्तृत्वपन का अभिमान त्याग दोगे और प्रभु को कर्ता बना दोगे, तो संसार का कोई भी कर्म तुम्हें बाँध नहीं पाएगा। यह अनासक्त भाव ही परम कल्याणकारी है।
🔗 यह उपदेश कर्मयोग का सार है, जो बताता है कि भावना के परिवर्तन से गृहस्थ जीवन भी एक साधना बन सकता है।
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कथा: श्री विजय कृष्ण गोस्वामी और उनकी पुत्री
चरित्र: श्री विजय कृष्ण गोस्वामी का अनासक्त कर्तव्य-पालन
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सदगुरुदेव श्री विजय कृष्ण गोस्वामी का चरित्र सुनाते हैं। उन्हें अपनी दिव्य दृष्टि से पता था कि उनकी बीमार पुत्री की मृत्यु निश्चित है, फिर भी उन्होंने एक साधारण पिता की तरह उसकी सेवा और चिकित्सा में कोई कमी नहीं छोड़ी। उन्होंने समझाया कि यह सब सांसारिक दिखावा करना पड़ता है, ताकि लोग लापरवाही का आरोप न लगाएँ, परंतु भीतर से वे पूर्णतः शांत और अनासक्त थे।
सदगुरुदेव एक दृष्टांत देते हैं कि श्री विजय कृष्ण गोस्वामी जी को अपनी दिव्य दृष्टि से ज्ञात था कि उनकी बीमार पुत्री 'कुतुबुरी' अल्पायु में ही शरीर छोड़ देगी। यह जानते हुए भी, उन्होंने एक साधारण पिता की तरह उसकी चिकित्सा और सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी। वे वैद्य बुलाते रहे, रात भर जागकर पंखा करते रहे और पुत्री की मृत्यु पर रोए भी। शिष्यों के आश्चर्यचकित होने पर उन्होंने समझाया कि यह सब संसार में 'दिखावा' करना पड़ता है, ताकि लोग यह न कहें कि पिता ने अपनी पुत्री की देखभाल नहीं की। भीतर से वे पूर्णतः शांत, समाहित चित्त और अनासक्त थे। यह कथा सिखाती है कि संसार में रहते हुए भी अपने कर्तव्यों का पालन अनासक्त भाव से कैसे करना चाहिए, ताकि बाहरी क्रियाएँ बंधन का कारण न बनें।
🔗 यह कथा संसार में रहते हुए भी अनासक्त भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करने का एक आदर्श उदाहरण प्रस्तुत करती है।
✨ विशेष उल्लेख
📋 पंचमहाभूत और उनके गुण
▶ 05:28
▶ देखें (05:28)
- आकाश: शब्द (१ गुण)
- वायु: शब्द, स्पर्श (२ गुण)
- अग्नि: शब्द, स्पर्श, रूप (३ गुण)
- जल: शब्द, स्पर्श, रूप, रस (४ गुण)
- पृथ्वी: शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध (५ गुण)
💸 सांसारिक प्रेम
इसमें सब कुछ देना पड़ता है, पर मिलता कुछ नहीं। यह दिखावे का प्रेम है और स्वार्थ पर आधारित है। अंततः सब कुछ चला जाता है।
बनाम
💖 भगवत-प्रेम
इसमें केवल अपना मन देना होता है। बदले में भगवान अपना सर्वस्व दे देते हैं और सब कुछ मिल जाता है।
🚶♂️ क्रियात्मक त्याग (तन से)
घर-परिवार और कर्तव्यों को शारीरिक रूप से छोड़ देना। सदगुरुदेव के अनुसार यह अनावश्यक है और इससे कुछ सिद्ध नहीं होता।
बनाम
🧘♂️ भावात्मक त्याग (मन से)
संसार में रहते हुए, सभी कर्तव्यों का पालन करते हुए, मन से यह जानना कि कुछ भी हमारा नहीं है। यही वास्तविक और कल्याणकारी त्याग है।
✅ करें (Do's)
- स्वयं को राधा रानी की नित्य सहचरी मानकर चिंतन करें।
- संसार में सभी कर्तव्यों का पालन करें, पर मन से अनासक्त रहें।
- स्वयं को मालिक नहीं, बल्कि भगवान का 'नौकर' समझें।
- अपने हृदय में भगवान के लिए एक प्रिय स्थान बनाएँ।
- सद्गुरु की कृपा और उनके दिए उपदेशों पर पूर्ण विश्वास रखें।
❌ न करें (Don'ts)
- स्वयं को यह नश्वर शरीर न मानें।
- सांसारिक वस्तुओं और संबंधों को अपना न समझें।
- जड़ विषयों (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) में आनंद खोजने का प्रयास न करें।
- कर्मों का कर्ता स्वयं को न मानें।
- घर-परिवार को शारीरिक रूप से त्यागने की अनावश्यक चेष्टा न करें।
शास्त्र प्रमाण (Scriptural References)
इस खंड में वे श्लोक व कथा-प्रसंग सम्मिलित हैं जो सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित किए गए हैं या सत्संग के भाव को समझने में सहायक संदर्भ के रूप में दिए गए हैं।
मंगलाचरण
मंगलाचरण
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सदगुरुदेव ने सत्संग का आरंभ इस पारंपरिक मंगलाचरण से किया, जिसमें गुरु-परंपरा और आराध्य को प्रणाम किया जाता है।
गुरवे गौरचन्द्राय राधिकायै तदालये।
कृष्णाय कृष्णभक्ताय तद्भक्ताय नमो नमः॥
Gurave Gauracandrāya Rādhikāyai Tadālaye,
Kṛṣṇāya Kṛṣṇabhaktāya Tadbhaktāya Namo Namaḥ.
मैं श्री गुरुदेव, श्री गौरचन्द्र, श्रीमती राधिका और उनके धाम, श्री कृष्ण, कृष्ण-भक्त और उनके भक्तों को बारंबार प्रणाम करता हूँ।
श्रीरामचरितमानस उत्तरकाण्ड 117 (ख)
श्रीरामचरितमानस उत्तरकाण्ड 117 (ख)
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सदगुरुदेव ने इस चौपाई का उल्लेख जीव के वास्तविक स्वरूप का वर्णन करने के लिए किया, यह बताने के लिए कि जीव स्वभाव से ही आनंदमय है, लेकिन अपने इस स्वरूप को भूल गया है।
ईश्वर अंश जीव अबिनासी, चेतन अमल सहज सुखरासी॥
Īsvara ansa jīva abināsī, cētana amala sahaja sukha rāsī.
जीव ईश्वर का ही अंश है, इसलिए वह अविनाशी, चेतन, निर्मल और स्वभाव से ही आनंद का भंडार है।
श्रीमद्भगवद्गीता 9.33
श्रीमद्भगवद्गीता 9.33
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सदगुरुदेव ने इस श्लोक को उद्धृत कर यह समझाया कि स्वयं भगवान भी शास्त्रों के माध्यम से कह रहे हैं कि यह संसार दुःखों का घर है और यहाँ सुख खोजना व्यर्थ है।
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्॥
kiṁ punarbrāhmaṇāḥ puṇyā bhaktā rājarṣayastathā।
anityamasukhaṁ lokamimaṁ prāpya bhajasva mām॥
फिर पवित्र ब्राह्मणों तथा भक्त राजर्षियों का तो कहना ही क्या? अतः इस अनित्य और सुखरहित लोक (मनुष्य शरीर) को प्राप्त करके तू मेरा भजन कर।
श्रीमद्भगवद्गीता 18.65
श्रीमद्भगवद्गीता 18.65
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सदगुरुदेव इस श्लोक के माध्यम से भगवान की पुकार को व्यक्त करते हैं, कि भगवान जीव से केवल उसका मन और प्रेम चाहते हैं और बदले में उसे अपनी प्राप्ति का वचन देते हैं।
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥
manmanā bhava madbhakto madyājī māṁ namaskuru।
māmevaiṣyasi satyaṁ te pratijāne priyo'si me॥
अपना मन मुझमें लगा, मेरा भक्त बन, मेरी पूजा कर और मुझे नमस्कार कर। ऐसा करने से तू निश्चित रूप से मुझे ही प्राप्त करेगा, मैं तुझसे यह सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ, क्योंकि तू मेरा अत्यंत प्रिय है।
प्रेम-भक्ति-चंद्रिका श्री नरोत्तम दास ठाकुर
प्रेम-भक्ति-चंद्रिका श्री नरोत्तम दास ठाकुर
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव ने इस पद का उल्लेख यह समझाने के लिए किया कि गुरु द्वारा प्रदत्त अपने सिद्ध स्वरूप (जैसे राधा रानी की सहचरी) का चिंतन करना ही साधना है। यही चिंतन जब परिपक्व होता है तो जीव को अपना वास्तविक दिव्य स्वरूप प्राप्त हो जाता है।
साधने भाविबे जाहा, सिद्ध-देहे पाबे ताहा।
पक्कापक्क-मात्र सेइ विचार॥
अपक्के साधने रीति, पाकिले से प्रेम-भक्ति।
भकति-लक्षण-तत्त्व-सार॥
sādhane bāvibe jāhā, siddha-dehe pābe tāhā।
pakkāpakka-mātra sei bicāra॥
apakke sādhane rīti, pākile se prema-bhakti।
bhakati-lakṣaṇa-tattva-sāra॥
साधना अवस्था में जिस स्वरूप की भावना की जाती है, वही स्वरूप सिद्ध देह में प्राप्त होता है। बस कच्ची और पक्की अवस्था का ही भेद है। कच्ची अवस्था में यह साधन-रीति कहलाती है और जब वही भावना परिपक्व हो जाती है तो उसे प्रेम-भक्ति कहते हैं। यही भक्ति-तत्व का सार-लक्षण है।
श्रीमद्भगवद्गीता 8.6
श्रीमद्भगवद्गीता 8.6
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सदगुरुदेव ने सेठ की कथा में इस श्लोक का उल्लेख यह समझाने के लिए किया कि अंत समय में संपत्ति की आसक्ति के कारण ही सेठ को कुत्ते की योनि प्राप्त हुई।
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥
yaṁ yaṁ vāpi smaranbhāvaṁ tyajatyante kalevaram।
taṁ tamevaiti kaunteya sadā tadbhāvabhāvitaḥ॥
हे कुंतीपुत्र! मनुष्य अंतकाल में जिस-जिस भी भाव का स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग करता है, वह सदा उसी भाव से भावित होने के कारण उसी को प्राप्त होता है।
श्रीमद्भगवद्गीता 4.22
श्रीमद्भगवद्गीता 4.22
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सदगुरुदेव ने इस श्लोक का उल्लेख करते हुए समझाया कि जब व्यक्ति स्वयं को 'नौकर' मानकर अनासक्त भाव से कर्म करता है, तो वह कर्म के बंधन से मुक्त हो जाता है।
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते॥
yadṛcchālābhasantuṣṭo dvandvātīto vimatsaraḥ।
samaḥ siddhāvasiddhau ca kṛtvāpi na nibadhyate॥
जो बिना किसी प्रयास के स्वतः प्राप्त हुए लाभ में संतुष्ट रहता है, जो हर्ष-शोक आदि द्वंद्वों से परे है, जिसमें ईर्ष्या का भाव नहीं है, और जो सफलता तथा असफलता में समान रहता है, वह कर्म करते हुए भी उससे नहीं बँधता।
श्रीमद्भगवद्गीता 15.7
श्रीमद्भगवद्गीता 15.7
पूरक संदर्भ (Siddhant)
पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव जीव के दुःख का मूल कारण समझाते हुए कहते हैं कि जीव ईश्वर का सनातन अंश होते हुए भी, स्वयं को शरीर मानकर सांसारिक विषयों में आनंद खोजता है और जन्म-मृत्यु के चक्र में भटकता है।
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः। मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥
इस संसार में जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है। वह प्रकृति में स्थित मन तथा पाँचों इन्द्रियों को आकर्षित करता है।
श्रीमद्भगवद्गीता 2.14
श्रीमद्भगवद्गीता 2.14
पूरक संदर्भ (Siddhant)
पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव बताते हैं कि जीव जड़धर्मी होकर शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध जैसे जड़ विषयों में आनंद ढूंढता है, जबकि इनमें वास्तविक आनंद नहीं है क्योंकि ये अनित्य और असुखमय हैं।
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः। आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥
हे कुन्तीपुत्र! इन्द्रियों और विषयों के संयोग से सर्दी-गर्मी तथा सुख-दुःख आदि होते हैं। ये अनित्य हैं, आने-जाने वाले हैं; अतः हे भारत! इनको तुम सहन करो।
ऋग्वेद पुरुष सूक्त 10.90.3
ऋग्वेद पुरुष सूक्त 10.90.3
पूरक संदर्भ (Siddhant)
पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव भगवान की अनंत विभूति का वर्णन करते हुए कहते हैं कि वे त्रिपाद विभूति हैं और यह माया लोक उनकी एक पाद विभूति है, जहाँ अनंत कोटि ब्रह्मांड उनके एक कण में समाए हुए हैं।
एतावानस्य महिमातो ज्यायांश्च पूरुषः। पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि॥
पुरुष की महिमा इतनी ही है, परन्तु पुरुष इससे भी महान् है। समस्त भूत (प्राणी) उसका एक पाद हैं और उसका तीन पाद अविनाशी स्वर्ग में (परमधाम में) है।
श्रीमद्भगवद्गीता 2.20
श्रीमद्भगवद्गीता 2.20
पूरक संदर्भ (Siddhant)
पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव जीव को उसके वास्तविक स्वरूप का बोध कराते हुए कहते हैं कि 'देखो तुम इस शरीर नहीं हो, शरीर संबंधी वस्तु तुम्हारा नहीं हो, तुम चेतन हो, तुम आत्मा हो, तुम भगवान के हो'।
न जायते म्रियते वा कदाचिन् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
आत्मा का कभी जन्म नहीं होता और न यह कभी मरता ही है; न यह होकर फिर होने वाला ही है। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है; शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता।
श्रीमद्भगवद्गीता 3.27
श्रीमद्भगवद्गीता 3.27
पूरक संदर्भ (Siddhant)
पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि जड़ वृत्ति और अहंकार के कारण जीव स्वयं को शरीर मानता है और शरीर संबंधी विषयों में सुख ढूंढता है, जिससे वह धन कमाने और इंद्रिय तृप्ति के लिए छल-कपट जैसे गलत उपाय अपनाता है।
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥
प्रकृति के गुणों द्वारा ही सब कर्म सब प्रकार से किए जाते हैं। जिस मनुष्य का अन्तःकरण अहंकार से मोहित हो रहा है, वह 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा मानता है।
श्रीमद्भगवद्गीता 5.8
श्रीमद्भगवद्गीता 5.8
पूरक संदर्भ (Siddhant)
पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव कहते हैं कि साधक को मन से यह जानना चाहिए कि वह गृहस्थी नहीं है और संसार में एक नाटक कर रहा है, जैसे कोई नौकर काम करता है, ताकि वह बंधन का कारण न बने।
नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्। पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन्॥
तत्व को जानने वाला योगी तो देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूँघता हुआ, खाता हुआ, चलता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ भी यही समझे कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ।
स्पष्टीकरण (Clarification)
यह सारांश AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग गुरु सेवा में करके तैयार किया गया है। इसमें त्रुटि हो सकती है। कृपया पूर्ण लाभ के लिए पूरा वीडियो अवश्य देखें।
स्वरूप-विस्मृति और गुरु-कृपा से मुक्ति, जीव के दुःख का कारण स्वरूप-विस्मृति, माया का प्रबल बंधन और गुरु-कृपा से राधा रानी के प्रेम की प्राप्ति।
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