श्री भगवत चर्चा
01 January 2026
जड़-अभिमान से चिद-अभिमान की ओर: नाम-साधना का मार्ग
आत्मा की परम प्रियता, जड़-अभिमान का त्याग, चिद-अभिमान की जागृति और नाम-साधना से भगवत्-प्रेम की प्राप्ति।
Sri Sri 108 Sri Vinod Baba ji Maharaj
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हमारे प्रिय सद्गुरुदेव बताते हैं:
"
भजन क्या है? रोना है और खोना है। माने राधे-राधे बोल के रोना है, और ये संसार में कोई भी वस्तु मेरा नहीं है, ये सब खोना है।
"
🔑 आज के सत्संग के मुख्य शब्द 🔑 Key Words of Today's Satsang
नाम (118)
शरीर (64)
संसार (41)
कारण (38)
आत्मा (37)
राजा (34)
साधन (32)
रोना (28)
📖 आज की शिक्षाएं 📖 आज की विस्तृत शिक्षाएं
आत्मा का मूल्य और जीव का भ्रम
इस खंड में सदगुरुदेव आत्मा की परम प्रियता और शरीर के नश्वर स्वभाव का भेद स्पष्ट करते हैं। वे समझाते हैं कि जीव का दुःख शरीर में आत्म-बुद्धि रखने के कारण है, जो कि एक गहरा भ्रम है।
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सदगुरुदेव समझाते हैं कि हमें यह शरीर इसलिए प्रिय है क्योंकि इसमें आत्मा का वास है। मरने के बाद कोई उस शरीर को प्रेम नहीं करता, बल्कि उसे शीघ्र अति शीघ्र जला देना चाहता है। इससे सिद्ध होता है कि वास्तव में प्रिय वस्तु आत्मा ही है।
सदगुरुदेव दृष्टांत देते हैं कि हम संसार की हर वस्तु का त्याग कर सकते हैं, लेकिन अपने शरीर का नहीं, क्योंकि इसमें 'मैं' यानी आत्मा का निवास है। किसी प्रियजन की मृत्यु पर हम मृतक शरीर के लिए नहीं, बल्कि उस आत्मा के लिए रोते हैं जो शरीर छोड़कर चली गई है। यह सिद्ध करता है कि हमारी वास्तविक प्रियता आत्मा से है। उस आत्मा की भी आत्मा परमात्मा श्रीकृष्ण हैं, और श्रीकृष्ण की भी प्राणप्रिया श्री राधा रानी हैं, जो हमारी परम प्रियतमा हैं। यह प्रियता का संबंध कोई बनावटी नहीं, बल्कि नित्य है।
🔗 यह शिक्षा जीव को अपने वास्तविक स्वरूप की महत्ता का बोध कराती है, जो भौतिक शरीर से परे है।
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नित्य संबंध और मिथ्या संबंध
भगवान से नित्य संबंध, संसार से मिथ्या संबंध
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सदगुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि भगवान से हमारा संबंध नित्य और जुड़ा-जुड़ाया है, उसे जोड़ने की आवश्यकता नहीं। इसके विपरीत, संसार से हमारा संबंध मिथ्या और टूटा-टुटाया है, उसे तोड़ने की आवश्यकता नहीं, केवल 'यह मेरा नहीं है' इस मान्यता को छोड़ना है।
सदगुरुदेव एक महत्वपूर्ण सिद्धांत बताते हैं कि 'भगवान से संबंध जोड़ना है और संसार से संबंध तोड़ना है' यह कहना भी गलत है। सत्य तो यह है कि परमात्मा से हमारा संबंध नित्य और अखंड है, वह पहले से ही जुड़ा हुआ है। वहीं, इस जड़ जगत से हमारा संबंध कभी था नहीं, है नहीं और होगा भी नहीं। यह सर्वथा मिथ्या है, स्वप्नवत है, जिसे हमने केवल अपनी मान्यता से स्वीकार कर लिया है। जड़ और चेतन का कभी संबंध हो ही नहीं सकता। चेतन की उपस्थिति के कारण ही शरीर सक्रिय दिखता है, आत्मा के जाते ही वह निष्क्रिय होकर सड़ने लगता है।
🔗 यह सिद्धांत साधक को संसार के प्रति अनासक्ति और भगवान के प्रति सहज आकर्षण का बोध कराता है।
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सदगुरुदेव के अनुसार, हमारे संसार चक्र में बार-बार जन्म-मृत्यु का मूल कारण जड़-अभिमान है। 'मैं यह शरीर हूँ और शरीर संबंधी वस्तुएँ मेरी हैं' - यही अज्ञानता आत्मा की सबसे बड़ी शत्रु है।
सदगुरुदेव बताते हैं कि अज्ञानता का स्वरूप है - शरीर में आत्म-बुद्धि। यह जड़-अभिमान ही हमें 84 लाख योनियों में भटकाता है और सभी दुःखों को जन्म देता है। जब तक यह भाव रहता है कि 'मैं शरीर हूँ', तब तक हम संसार चक्र में फँसे रहते हैं। यह अनात्म वस्तु (शरीर) में आत्म-भाव रखना ही आत्मा का सबसे बड़ा दुश्मन है। शुद्ध आत्मा तो भगवत्-अंश, अविनाशी, चेतन, अमल और सहज सुख राशि है, लेकिन जड़-अभिमान उसे अपने स्वरूप से विमुख कर देता है।
🔗 यह शिक्षा जीव को उसके बंधन के मूल कारण से अवगत कराती है और मुक्ति की दिशा में पहला कदम उठाने को प्रेरित करती है।
मिथ्या मान्यता से मुक्ति का मार्ग
यह खंड दिखाता है कि हमारा सुख-दुःख बाहरी घटनाओं पर नहीं, बल्कि हमारी आंतरिक 'मान्यता' या स्वीकृति पर निर्भर करता है। संतों के चरित्रों और दृष्टांतों के माध्यम से इस मिथ्या मान्यता को तोड़ने की प्रेरणा दी गई है।
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सदगुरुदेव समझाते हैं कि संसार से हमारा संबंध कभी था नहीं, है नहीं और होगा भी नहीं। यह सर्वथा मिथ्या है, स्वप्न के समान है, जिसे हमने केवल अपनी मान्यता से स्वीकार कर लिया है। हमारी जागृत अवस्था के सुख-दुःख भी इसी मान्यता पर आधारित हैं।
सदगुरुदेव बताते हैं कि जड़ से चेतन का कभी संबंध नहीं होता। चेतन अलग है और जड़ अलग है। शरीर की सक्रियता चेतन की उपस्थिति के कारण है। आत्मा के चले जाने पर शरीर निष्क्रिय हो जाता है और सड़ने लगता है। संसार से हमारा संबंध भी इसी प्रकार मिथ्या है, जैसे स्वप्न में देखी गई वस्तुएँ जागने पर असत्य हो जाती हैं। हम जागृत अवस्था में भी जो सुख-दुःख प्राप्त करते हैं, वह केवल हमारी मान्यता या स्वीकृति के कारण है। इस मान्यता को हटाते ही संसार का बंधन समाप्त हो जाता है।
🔗 यह दृष्टांत संसार की क्षणभंगुरता और मिथ्यात्व को उजागर करता है, जिससे साधक को वैराग्य की प्रेरणा मिलती है।
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कथा: मृत पुत्र का शोक और मान्यता का खेल
कथा: मान्यता के कारण उत्पन्न हुआ शोक
▶ देखें (11:20)
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सदगुरुदेव एक स्त्री की कथा सुनाते हैं जो किसी के कहने पर अपने पुत्र को मृत मानकर विलाप करने लगती है। जब उसे पता चलता है कि उसका पुत्र जीवित है, तो उसका रोना तुरंत बंद हो जाता है। यह कथा दर्शाती है कि दुःख घटना में नहीं, बल्कि हमारी मान्यता में है।
सदगुरुदेव एक मार्मिक कथा सुनाते हैं। एक स्त्री को कोई आकर सूचना देता है कि उसका बेटा मर गया है। वह स्त्री बिना देखे ही, केवल सूचना को सत्य मानकर छाती पीट-पीटकर रोने लगती है। कुछ देर बाद दूसरा व्यक्ति आकर बताता है कि उसका बेटा नहीं, बल्कि उसके हमनाम पड़ोसी का बेटा मरा है और उसका बेटा तो खेल रहा है। यह सुनते ही उसका रोना तुरंत बंद हो जाता है। सदगुरुदेव समझाते हैं कि उसने न पहले शव देखा, न बीच में, न अंत में; उसका सारा दुःख और शोक केवल एक मिथ्या स्वीकृति या मान्यता पर आधारित था। इसी प्रकार हमारा सांसारिक सुख-दुःख भी केवल मान्यता मात्र है।
🔗 यह कथा स्पष्ट करती है कि संसार का बंधन और दुःख वास्तविक नहीं, बल्कि हमारी मानसिक स्वीकृति का परिणाम है।
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चरित्र: श्री रघुनाथ दास गोस्वामी का तीव्र वैराग्य
चरित्र: श्री रघुनाथ दास गोस्वामी का अतुलनीय त्याग
▶ देखें (15:27)
▶ Watch (15:27)
सदगुरुदेव श्री रघुनाथ दास गोस्वामी का उदाहरण देते हैं, जिन्होंने कुबेर के समान ऐश्वर्य और अप्सरा जैसी पत्नी को विष्ठा के समान त्याग दिया। यह दर्शाता है कि जब आत्म-बोध जाग्रत होता है, तो सांसारिक मान्यताएँ स्वतः समाप्त हो जाती हैं।
सदगुरुदेव श्री रघुनाथ दास गोस्वामी के तीव्र वैराग्य का वर्णन करते हैं। वे अरबों-खरबों की संपत्ति के एकमात्र उत्तराधिकारी थे, उनकी पत्नी अप्सरा के समान सुंदर थी, फिर भी उनका मन संसार में नहीं लगा। उनके पिता ने उन्हें रोकने के लिए 11 नौकर रखे थे, लेकिन वे सब कुछ विष्ठा की तरह त्याग कर, रात्रि के अंधकार में श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणों की ओर भाग निकले। वे बंगाल से जगन्नाथ पुरी तक लगभग 550 किलोमीटर की यात्रा में केवल तीन बार भोजन करके उन्मत्त की तरह भागते रहे। यह चरित्र दर्शाता है कि जब 'यह संसार मेरा नहीं है' यह स्वीकृति दृढ़ हो जाती है, तो बड़े से बड़ा आकर्षण भी तुच्छ लगने लगता है।
🔗 यह चरित्र दिखाता है कि सच्चा वैराग्य बाहरी वस्तुओं को छोड़ने से नहीं, बल्कि आंतरिक मान्यता के टूटने से आता है।
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सदगुरुदेव बताते हैं कि गुरु कृपा से साधक को अपने वास्तविक स्वरूप का बोध होता है, जिसे 'चिद-अभिमान' कहते हैं। यह चिंतन कि 'मैं शरीर नहीं, बल्कि नित्य, शुद्ध, आनंदमय आत्मा हूँ' ही भजन का प्राण केंद्र है।
सदगुरुदेव समझाते हैं कि जब गुरुदेव यह बोध कराते हैं कि 'तुम यह शरीर नहीं हो, शरीर संबंधी वस्तुएँ तुम्हारी नहीं हैं। तुम इससे संपूर्ण अलग हो, तुम चिन्मय, दिव्य, गुणातीत, इंद्रियातीत, नित्य शुद्ध सनातन और आनंदमय हो', तब साधक के भीतर 'चिद-अभिमान' जाग्रत होता है। यह चिंतन कि शरीर हमारे बंधन का कारण है, संसार चक्र में आवर्तन का कारण है, और शरीर में मोह ही 84 लाख योनियों में भटकने का कारण है, साधक को अपने स्वरूप की ओर मोड़ता है। यह चिंतन ही साधन का प्राण केंद्र है, जो साधक को संसार से मुक्त करा सकता है, भले ही क्रियात्मक भजन (नाम जप, ध्यान, पूजा) कम हो।
🔗 यह शिक्षा क्रियात्मक भजन से अधिक भावात्मक चिंतन और आत्म-बोध की महत्ता पर बल देती है।
नाम-साधना का रहस्य और कृपा
इस खंड में, सदगुरुदेव श्री हरिनाम को ही परम साधन और परम साध्य बताते हैं। वे एक दृष्टांत के माध्यम से समझाते हैं कि कैसे नाम, जो प्रारंभ में केवल एक साधन प्रतीत होता है, अंत में स्वयं भगवान के रूप में प्रकट हो जाता है।
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दृष्टांत: राजा और अंधा व्यक्ति
दृष्टांत: वेश बदले राजा और अंधे भक्त की कथा
▶ देखें (23:21)
▶ Watch (23:21)
सदगुरुदेव एक राजा की कथा सुनाते हैं जो वेश बदलकर एक अंधे व्यक्ति को अपनी उंगली पकड़कर राजमहल तक ले जाता है। प्रारंभ में अंधा व्यक्ति उसे केवल एक सहायक मानता है, पर अंत में वही व्यक्ति राजा निकलता है। इसी प्रकार, नाम प्रारंभ में साधन लगता है, पर अंत में वही नामी (भगवान) के रूप में प्रकट होता है।
एक प्रजावत्सल राजा रात्रि में वेश बदलकर अपनी प्रजा का हाल जानने निकलते हैं। उन्हें एक अंधा व्यक्ति मिलता है जो राजा के दरबार जाना चाहता है, पर रास्ता नहीं जानता। राजा उसे अपनी उंगली पकड़कर राजमहल तक ले जाते हैं। अंधा व्यक्ति उन्हें केवल एक सहायक मानता है। राजमहल पहुँचने पर राजा अपना परिचय देते हैं। अंधा पूछता है कि आपने पहले क्यों नहीं बताया? राजा कहते हैं कि यदि मैं पहले बताता तो तुम विश्वास नहीं करते कि एक राजा फटे-पुराने कपड़े पहनकर रास्ते में घूम रहा है। सदगुरुदेव इस दृष्टांत से समझाते हैं कि इसी प्रकार गुरुदेव हमें 'नाम' रूपी उंगली पकड़ाते हैं। प्रारंभ में हमें नाम केवल एक साधन लगता है, लेकिन निरंतर आश्रय लेने पर वही नाम साक्षात नामी (भगवान) के रूप में हमारे समक्ष प्रकट हो जाता है। नाम ही साधन है और नाम ही साध्य है।
🔗 यह दृष्टांत नाम और नामी की अभिन्नता के सिद्धांत को सरलता से स्पष्ट करता है।
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सदगुरुदेव नाम की शक्ति को एक बीज के समान बताते हैं। जैसे एक छोटे से बीज में एक विशाल वृक्ष छिपा होता है, उसी प्रकार श्री नाम में भगवान की समस्त शक्तियाँ, प्रेम और स्वरूप निहित होता है, जो सही समय पर प्रकट होता है।
सदगुरुदेव समझाते हैं कि श्री हरिनाम एक बीज की तरह है। बीज को देखने पर या उसे पीसकर देखने पर भी उसमें वृक्ष नहीं दिखता, लेकिन उसे मिट्टी में बोकर पानी सींचने पर वही बीज फूटकर पौधा बनता है और धीरे-धीरे विशाल वृक्ष बन जाता है। बीज के अंदर समस्त शक्ति छिपी होती है। ठीक इसी प्रकार, नाम रूपी बीज में भगवान की समस्त शक्तियाँ, उनका प्रेम और उनका सच्चिदानंदमय स्वरूप निहित है। श्रद्धा और निरंतरता से जब इस नाम का जप किया जाता है, तो यह अपने पूर्ण प्रभाव को प्रकट करता है।
🔗 यह दृष्टांत नाम की आंतरिक शक्ति और उसके क्रमिक विकास को दर्शाता है।
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नाम ही प्रेम है
नाम प्रेम प्रकट नहीं करता, नाम ही प्रेम रूप में प्रकट होता है
▶ देखें (31:20)
▶ Watch (31:20)
सदगुरुदेव इस धारणा का खंडन करते हैं कि नाम प्रेम को 'प्रकट' करता है। वे दृढ़ता से कहते हैं कि नाम ही स्वयं प्रेम है। साधना की परिपक्व अवस्था में नाम ही प्रेम के रूप में और फिर साक्षात युगल किशोर के रूप में प्रकट हो जाता है।
सदगुरुदेव एक गहन सिद्धांत बताते हैं कि यह कहना भूल है कि नाम-जप से प्रेम प्रकट होता है। सत्य यह है कि नाम ही साक्षात प्रेम है। जब साधक का चित्त शुद्ध हो जाता है, तो वही नाम अष्ट सात्विक विकारों (अश्रु, कंप, रोमांच आदि) के रूप में अनुभव होने लगता है। और आगे चलकर, वही नाम साक्षात युगल किशोर श्री राधा-कृष्ण के रूप में साधक के समक्ष प्रकट हो जाता है। नाम, प्रेम और नामी (भगवान) में कोई भेद नहीं है। हमारे भीतर विश्वास और शुद्धता की कमी के कारण ही नाम का प्रेम प्रकट नहीं हो पाता, और हम उसे केवल एक साधन मानते हैं। वास्तव में, नाम ही साधन है और नाम ही साध्य है।
🔗 यह शिक्षा सिद्धांत 'नाम नामिनोरभिन्नत्वम्' (नाम और नामी में भेद नहीं है) की पुष्टि करती है।
नाम-कृपा की क्रमिक अनुभूति
यह अंतिम खंड नाम-साधना की व्यावहारिक प्रक्रिया और उसके प्रभावों का वर्णन करता है। सदगुरुदेव बताते हैं कि कैसे अखंड नाम-जप साधक के जीवन को रूपांतरित कर उसे भगवत्-प्रेम की सर्वोच्च अवस्था तक ले जाता है।
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सदगुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि 'संसार नाश' का अर्थ परिवार या धन-संपत्ति का नाश नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ हृदय से भोग-वृत्ति, कामना और वासना का समूल नाश हो जाना है।
सदगुरुदेव समझाते हैं कि जब शास्त्र कहते हैं कि नाम 'संसार का नाश' करता है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि आपके परिवारजन मर जाएँगे या धन-संपत्ति नष्ट हो जाएगी। संसार का वास्तविक अर्थ है हमारे भीतर की भोग-वृत्ति, कामना और वासना। जो संसारी है, वह भोगी है, चाहे वह जंगल में रहे। और जो त्यागी है, वह योगी है, चाहे वह घर-संसार में रहे। संसार नाश का अर्थ है राधा रानी के चरण छोड़कर किसी भी अन्य वस्तु या पदार्थ के प्रति आसक्ति का समूल नष्ट हो जाना। नाम इसी आंतरिक संसार का नाश करता है, जिससे साधक वासना मुक्त होकर भगवत्-चरणों में अनुरक्त हो जाता है।
🔗 यह शिक्षा साधक को आंतरिक शुद्धि की ओर प्रेरित करती है, न कि केवल बाहरी त्याग की ओर।
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सदगुरुदेव कहते हैं कि नाम-जप केवल सुबह-शाम की क्रिया नहीं है। सच्चा भजन तो उठते-बैठते, खाते-सोते, चलते-फिरते, यानी अखंड रूप से नाम का स्मरण करते रहना है। महाप्रभु के अनुसार, इसमें देश-काल का कोई नियम नहीं और इसी से सर्व-सिद्धि प्राप्त होती है।
सदगुरुदेव साधकों को चेतावनी देते हैं कि भजन केवल सुबह एक माला और रात में एक माला करने की क्रिया नहीं है। यह क्रियात्मक भजन है, जिसमें मन संसार में भटकता रहता है। वास्तविक भजन तो अखंड है, जो उठते-बैठते, खाते-सोते, चलते-फिरते निरंतर चलता रहे। श्री चैतन्य महाप्रभु कहते हैं: 'उठते बैठते खाते सोई, जथा नाम लय देश काल नियम नहीं सर्व सिद्धि होय।' जब नाम इस प्रकार जीवन का अभिन्न अंग बन जाता है, तभी वह अपनी पूरी कृपा प्रकट करता है और चित्त शुद्धि होकर समस्त भक्ति-साधनों का उदय होता है, जिससे साधक अतींद्रिय जगत में तल्लीन हो जाता है।
🔗 यह शिक्षा साधक को निरंतर नाम-स्मरण के महत्व और उसकी व्यावहारिक विधि का मार्गदर्शन करती है।
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चरित्र: श्री जगतबंधु सुंदर जी महाराज
चरित्र: नाम-प्रेम के प्रत्यक्ष प्रमाण - सिद्ध महापुरुष
▶ देखें (29:19)
▶ Watch (29:19)
सदगुरुदेव श्री जगतबंधु सुंदर जैसे सिद्ध महापुरुष का उदाहरण देते है, जो 'राधा' नाम सुनते ही घंटों तक भाव-समाधि में अचेत हो जाते थे। यह नाम के प्रेम-स्वरूप होने का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
सदगुरुदेव नाम के प्रेम-स्वरूप होने का प्रमाण देते हुए बताते हैं कि श्री जगतबंधु सुंदर नामक महापुरुष 'राधा' नाम का उच्चारण नहीं कर पाते थे, क्योंकि नाम सुनते ही वे घंटों तक अचेत हो जाते थे। एक बार नाव में जाते हुए किसी ने 'राधे' पुकारा तो वे तुरंत नदी में कूद पड़े। इसी प्रकार, श्री रामदास बाबाजी महाराज जिनका बचपन का नाम 'राधिका' था उनको वे 'सारिका' कहकर पुकारते थे, क्योंकि 'राधिका' नाम बोलने पर वे आठ-आठ घंटे तक भाव-समाधि में पड़े रहते थे। ये घटनाएँ सिद्ध करती हैं कि नाम ही साक्षात प्रेम है, जो शुद्ध अंतःकरण में अष्ट सात्विक विकारों के रूप में प्रकट होता है और अंततः युगल किशोर के रूप में दर्शन देता है।
🔗 यह चरित्र नाम-जप की शक्ति और उसकी अंतिम परिणति का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करता है।
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सदगुरुदेव भजन का सार दो शब्दों में बताते हैं - 'रोना' और 'खोना'। 'रोना' का अर्थ है भगवान के विरह में आर्त होकर पुकारना, और 'खोना' का अर्थ है इस संसार में भगवान के अतिरिक्त किसी भी वस्तु को अपना न मानना।
सदगुरुदेव भजन का एक बहुत ही गहरा और मार्मिक सूत्र देते हैं। वे कहते हैं, भजन का अर्थ है 'रोना और खोना'। 'रोना' अर्थात् श्री राधा रानी के लिए, उनके चरणों की प्राप्ति के लिए आर्त भाव से रोना। यह संसार का दुःख भरा रोना नहीं, बल्कि आनंदमय प्रेम का रुदन है, जिससे शरीर निरोग होता है और भीतर आनंद की लहर चलती है। 'खोना' अर्थात् इस दृश्यमान जगत में किसी भी वस्तु या व्यक्ति को अपना न मानना, यह स्वीकार कर लेना कि मेरा सब कुछ खो चुका है। सदगुरुदेव कहते हैं कि जिस दिन साधक 'खोना' सीख जाता है, उसी दिन उसे सही अर्थों में 'रोना' आ जाता है, क्योंकि तब उसे अनुभव होता है कि राधा रानी के अतिरिक्त उसका कोई नहीं है।
🔗 यह शिक्षा भजन के क्रियात्मक पक्ष से ऊपर उठकर उसके भावात्मक और वैराग्यपूर्ण पक्ष पर जोर देती है।
✨ विशेष उल्लेख
📋 श्री नाम संकीर्तन के फल (श्री चैतन्य चरितामृत के अनुसार)
▶ 32:55
▶ देखें (32:55)
- सर्व पाप एवं संसार का नाश (पाप प्रवृत्ति और भोग वासना का नाश)
- चित्त की शुद्धि
- समस्त भक्ति साधनों का उद्गम (ध्यान-धारणा में सहज प्रवृत्ति)
- कृष्ण प्रेम का उद्गम (अष्ट सात्विक भावों का प्राकट्य)
- प्रेमामृत का आस्वादन
- कृष्ण प्राप्ति एवं सेवानंद समुद्र में निमज्जन
⛓️ जड़-अभिमान (Jad-Abhimaan)
यह 'मैं शरीर हूँ' की मिथ्या धारणा है। यह अज्ञानता का स्वरूप है और जीव को संसार चक्र, 84 लाख योनियों और त्रिविध ताप में फँसाता है। यह आत्मा का सबसे बड़ा शत्रु है।
बनाम
🕊️ चिद-अभिमान (Chid-Abhimaan)
यह 'मैं शरीर नहीं, अपितु भगवान का नित्य, शुद्ध, आनंदमय अंश (आत्मा) हूँ' का सत्य बोध है। यह गुरु कृपा से जाग्रत होता है और भजन का प्राण है। यह आत्मा का सच्चा मित्र और मुक्ति का द्वार है।
🔥 भोगी (संसारी)
जिसके अंतःकरण में कामना, वासना और भोग-वृत्ति है, वह भोगी है। ऐसा व्यक्ति यदि जंगल में भी रहे, तब भी वह संसारी ही कहलाता है क्योंकि उसका मन विषयों में आसक्त है।
बनाम
🧘 योगी (त्यागी)
जिसके अंतःकरण से भोग-वृत्ति का नाश हो गया है और जिसका मन केवल भगवत्-चरणों में अनुरक्त है, वह योगी है। ऐसा व्यक्ति यदि घर-संसार में भी रहे, तब भी वह सच्चा त्यागी है।
जिज्ञासा (Q&A)
प्रश्न: पवित्र नाम एक ही समय में 'साधन' (उपाय) और 'साध्य' (लक्ष्य) और प्रयोजन कैसे हो सकता है?
▶ देखें (21:11)
▶ देखें (21:11)
उत्तर: सदगुरुदेव बताते हैं कि नाम और नामी (भगवान) अभिन्न हैं। प्रारंभ में हम इसे साधन मानकर जपते हैं, किंतु जप करते-करते वही नाम स्वयं प्रेम और भगवान के रूप में प्रकट हो जाता है, जो हमारा साध्य भी है और प्रयोजन (प्रेम) भी।
उत्तर: सदगुरुदेव इस गहन प्रश्न का उत्तर देते हुए समझाते हैं कि तत्वतः नाम ही साधन है और नाम ही साध्य है। चूँकि हमारे भीतर अविश्वास और भौतिक अशुद्धियाँ होती हैं, हम प्रारंभ में नाम को लक्ष्य तक पहुँचने का एक 'साधन' मात्र समझते हैं। परंतु जैसे राजा ने स्वयं अंधे का हाथ पकड़कर उसे दरबार तक पहुँचाया, वैसे ही नाम का आश्रय लेने पर नाम स्वयं कृपा करके हमारे पाप, वासना और अज्ञान को नष्ट करता है। जब चित्त शुद्ध हो जाता है, तो वही नाम जो पहले साधन प्रतीत होता था, अब अपने वास्तविक स्वरूप में, यानी प्रेम और साक्षात युगल किशोर के रूप में प्रकट हो जाता है। अतः, साधन ही साध्य और प्रयोजन (प्रेम) बन जाता है।
प्रश्न: भक्ति की उच्च अवस्था प्राप्त करने के लिए क्या काम-वासना की तरह ही जिह्वा के स्वाद (जैसे रसगुल्ला खाने की इच्छा) को भी छोड़ना आवश्यक है? क्या यह भी उतना ही बड़ा बाधक है?
▶ देखें (43:10)
▶ देखें (43:10)
उत्तर: सदगुरुदेव समझाते हैं कि जिह्वा के स्वाद को जबरदस्ती छोड़ने की आवश्यकता नहीं है। जब साधक को नाम-रस और प्रेम-रस का आस्वादन होने लगता है, तो सांसारिक वस्तुओं का स्वाद स्वतः ही फीका और नीरस लगने लगता है। यह छोड़ा नहीं जाता, स्वतः छूट जाता है।
उत्तर: सदगुरुदेव श्री तुलसीदास जी का दोहा उद्धृत करते हुए समझाते हैं कि जैसे तीव्र ज्वर में अमृत जैसा भोजन भी बेस्वाद लगता है, उसी प्रकार हमारे अंदर 'भव-व्याधि' (संसार रोग) होने के कारण दिव्य नाम-रस में रुचि नहीं होती। नाम-जप करते-करते जब यह भव-व्याधि नष्ट हो जाती है, तब नाम में स्वाभाविक रुचि उत्पन्न होती है। जब साधक को उस दिव्य प्रेम-रस का किंचित भी आस्वादन मिल जाता है, तो उसके सामने राजभोग, रसगुल्ले और गुलाब जामुन का स्वाद अत्यंत तुच्छ और फीका पड़ जाता है। उसे जबरदस्ती छोड़ने का प्रयास नहीं करना पड़ता, बल्कि वह स्वतः ही छूट जाता है, क्योंकि उसे उससे श्रेष्ठ रस की प्राप्ति हो चुकी होती है।
✅ करें (Do's)
- अखंड नाम-जप करें (उठते-बैठते, चलते-फिरते, खाते-सोते)।
- अपने चिन्मय स्वरूप ('मैं आत्मा हूँ') का निरंतर चिंतन करें।
- भगवान से अपने नित्य संबंध का स्मरण करें।
- यह मानें कि संसार में भगवान के अतिरिक्त कोई अपना नहीं है ('खोना' सीखें)।
- भगवान के प्रेम के लिए आर्त होकर पुकारें ('रोना' सीखें)।
❌ न करें (Don'ts)
- शरीर में आत्म-बुद्धि न रखें ('मैं शरीर हूँ' यह न मानें)।
- सांसारिक वस्तुओं और संबंधों को अपना न मानें।
- भजन को केवल एक नियत समय की क्रिया न समझें।
- कामना, वासना और भोग-वृत्ति को हृदय में स्थान न दें।
- नाम में स्वाद न आने पर साधना को न छोड़ें, इसे भव-व्याधि का लक्षण समझें।
शास्त्र प्रमाण (Scriptural References)
इस खंड में वे श्लोक व कथा-प्रसंग सम्मिलित हैं जो सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित किए गए हैं या सत्संग के भाव को समझने में सहायक संदर्भ के रूप में दिए गए हैं।
भगवद् गीता 6.6
Bhagavad Gita 6.6
पूरक संदर्भ (Siddhant)
पूरक संदर्भ
सदगुरुदेव इस श्लोक के भाव को समझाते हुए कहते हैं कि जब जीव जड़-अभिमान ('मैं शरीर हूँ') में रहता है, तो उसका अपना ही स्वरूप (अनात्म-भाव) शत्रु के समान आचरण करता है। और जब वह चिद-अभिमान ('मैं आत्मा हूँ') को प्राप्त कर लेता है, तो वही आत्मा उसका बंधु बन जाती है।
बन्धुरात्मैवात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः। अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्॥
bandhur ātmā 'tmanas tasya yenā 'tmai 'vā 'tmanā jitaḥ। anātmanas tu śatrutve vartetā 'tmai 'va śatru-vat॥
जिसने अपने मन को जीत लिया है, उसके लिए मन सबसे अच्छा मित्र है; लेकिन जो ऐसा नहीं कर पाया, उसके लिए उसका मन ही सबसे बड़ा शत्रु बना रहेगा।
Prem Bhakti Chandrika Verse 58
Prem Bhakti Chandrika Verse 58
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सदगुरुदेव इस पयार को उद्धृत करते हुए समझाते हैं कि भजन का प्राण 'चिंतन' या 'स्मरण' है। साधक को अपने चिन्मय स्वरूप (चिद-अभिमान) का चिंतन करना चाहिए, क्योंकि यही चिंतन परिपक्व होकर उसे उसके नित्य सिद्ध-स्वरूप की प्राप्ति कराएगा।
साधने भाविबे जाहा, सिद्धदेहे पाबे ताहा। पक्कापक्कि मात्र से विचार॥
sādhane bhāvibe jāhā, siddhadehe pābe tāhā। pakkāpakki mātra se vicāra॥
साधक अपने साधन-देह से जिस भाव की भावना करता है, अपने सिद्ध-देह में उसे वही प्राप्त होता है। इसमें केवल पक्का (परिपक्व) और अपरिपक्व अवस्था का ही भेद है।
चैतन्य चरितामृत, Antya-lila 4.70
Chaitanya Charitamrita, Antya-lila 4.70
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सदगुरुदेव इस श्लोक के माध्यम से नाम-साधना की क्रमिक प्रक्रिया का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि कैसे केवल नाम का आश्रय लेने से साधक को पाप-नाश से लेकर प्रेम-प्राप्ति तक के सभी फल स्वतः ही प्राप्त हो जाते हैं।
नाम सर्व-पाप-संसार-नाशन। चित्त-शुद्धि, सर्व-भक्ति-साधनोद्गम॥ कृष्ण-प्रेमोद्गम, प्रेमामृतास्वादन। कृष्ण-प्राप्ति, सेवानन्द-समुद्रे मज्जन॥
nāma sarva-pāpa-saṃsāra-nāśana। citta-śuddhi, sarva-bhakti-sādhanodgama॥ kṛṣṇa-premodgama, premāmṛtāsvādana। kṛṣṇa-prāpti, sevānanda-samudre majjana॥
श्री हरिनाम समस्त पापों और संसार (बंधन) का नाश करने वाला है। यह चित्त को शुद्ध करता है और समस्त भक्ति-साधनों को उत्पन्न करता है। यह कृष्ण-प्रेम को उद्गमित करता है, प्रेमामृत का आस्वादन कराता है, कृष्ण की प्राप्ति कराता है और अंत में सेवानंद के समुद्र में डुबो देता है।
Sant Vani (Shri Tulsidas) Doha
Sant Vani (Shri Tulsidas) Doha
पूरक संदर्भ (Siddhant)
पूरक संदर्भ
सदगुरुदेव इस दोहे का उपयोग यह समझाने के लिए करते हैं कि हमें नाम में स्वाद या आनंद क्यों नहीं आता। इसका कारण नाम में कमी नहीं, बल्कि हमारे भीतर 'भव-व्याधि' यानी सांसारिक रोगों का होना है। जैसे-जैसे नाम-जप से यह रोग मिटता है, वैसे-वैसे नाम में स्वाभाविक रुचि और स्वाद आने लगता है।
तुलसी पिछले पाप से, हरि चर्चा ना सुहाय। जैसे ज्वर के बेग से, भूख विदा हो जाय॥
Tulsī pichle pāp se, hari charchā nā suhāya। Jaise jwar ke veg se, bhūkh vidā ho jāya॥
श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि पूर्व जन्मों के पापों के कारण जीव को हरि-चर्चा अच्छी नहीं लगती। ठीक वैसे ही, जैसे तेज बुखार होने पर व्यक्ति की भूख समाप्त हो जाती है और उसे स्वादिष्ट भोजन भी अच्छा नहीं लगता।
भगवद् गीता 15.7
Bhagavad Gita 15.7
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि जीव भगवान का ही सनातन अंश है, और भगवान से हमारा अटूट संबंध है। वे इस बात पर जोर देते हैं कि जीव इस लोक में भगवान का ही अंश है।
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः। मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥
जीवलोक में मेरा ही सनातन अंश जीवात्मा है, जो मन सहित छह इंद्रियों को प्रकृति में स्थित होकर आकर्षित करता है।
भगवद् गीता 6.5
Bhagavad Gita 6.5
पूरक संदर्भ (Siddhant)
पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव बताते हैं कि जड़ी अहंकार (शरीर को 'मैं' मानना) आत्मा का दुश्मन बन जाता है, जबकि आत्मा पर विजय प्राप्त करने वाला (चिद अहंकार) आत्मा का मित्र होता है। यह अवधारणा कि मन ही आत्मा का मित्र या शत्रु है, इस श्लोक से ली गई है।
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
मनुष्य को अपने आप से अपना उद्धार करना चाहिए, अपने को नीचे नहीं गिराना चाहिए। क्योंकि यह मन ही आत्मा का मित्र है और यह मन ही आत्मा का शत्रु भी है।
श्रीमद् भागवतम् 11.2.40
Srimad Bhagavatam 11.2.40
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव प्रेम के लक्षणों का वर्णन करते हुए इस श्लोक को उद्धृत करते हैं, जिसमें गद्गद वाणी, द्रवित चित्त, और आनंद के आँसुओं का उल्लेख है, जो प्रेम के प्रकाश के रूप में प्रकट होते हैं।
वाग्गद्गदा द्रवते यस्य चित्तं रुदत्यभीक्ष्णं हसति क्वचिच्च। विलज्ज उद्गायति नृत्यते च मद्भक्तियुक्तो भुवनं पुनाति॥
जिसका हृदय प्रेम से द्रवित हो जाता है, वाणी गद्गद हो जाती है, जो बार-बार रोता है, कभी-कभी हँसता है, लज्जा छोड़कर ऊँचे स्वर में गाता है और नाचता है, ऐसा मेरा भक्त समस्त संसार को पवित्र करता है।
चैतन्य चरितामृत, Antya-lila 4.71
Chaitanya Charitamrita, Antya-lila 4.71
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव अखंड नाम जप के महत्व पर जोर देते हुए कहते हैं कि उठते-बैठते, खाते-सोते, चलते-फिरते नाम जप करने से कोई देश-काल का नियम नहीं होता और सभी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।
खाइते शुइते यथा तथा नाम लय। देश-काल-नियम नाहि, सर्व-सिद्धि हय॥
खाते-पीते, सोते-जागते, कहीं भी और किसी भी समय नाम जप करने से देश और काल का कोई नियम नहीं होता, सभी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।
स्पष्टीकरण (Clarification)
यह सारांश AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग गुरु सेवा में करके तैयार किया गया है। इसमें त्रुटि हो सकती है। कृपया पूर्ण लाभ के लिए पूरा वीडियो अवश्य देखें।
जड़-अभिमान से चिद-अभिमान की ओर: नाम-साधना का मार्ग, आत्मा की परम प्रियता, जड़-अभिमान का त्याग, चिद-अभिमान की जागृति और नाम-साधना से भगवत्-प्रेम की प्राप्ति।
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