प्रेम की पुकार और प्रभु का प्राकट्य: श्री अद्वैत आचार्य का महा-आह्वान
प्रेम की पुकार और प्रभु का प्राकट्य: श्री अद्वैत आचार्य का महा-आह्वान
यह सत्संग श्री चैतन्य महाप्रभु के अवतरण की पृष्ठभूमि पर केंद्रित है, जिसमें श्री अद्वैत आचार्य की प्रमुख भूमिका को उजागर किया गया है। सद्गुरुदेव बताते हैं कि कैसे तत्कालीन भारत की पतित अवस्था को देखकर सदाशिव (महाविष्णु से एकीकृत होकर) श्री अद्वैत आचार्य के रूप में अवतरित हुए। उन्होंने गंगाजल और तुलसी दल से भगवान का आह्वान किया, जिसके फलस्वरूप श्री चैतन्य महाप्रभु का प्राकट्य हुआ। सत्संग में महाप्रभु की बाल्य लीला, विद्या लीला (मुरारी गुप्त प्रसंग), गया में उनका परिवर्तन, श्रीवास आंगन में स्वरूप-प्रकटन, और पार्षदों के लीला-संवरण का मार्मिक वर्णन है। अंत में, यह समझाया गया है कि भगवान का दर्शन भक्त के भाव पर निर्भर करता है और उनकी भौम लीला योगमाया द्वारा आवृत रहती है।
📖 आज की शिक्षाएं 📖 आज की विस्तृत शिक्षाएं
- सनातन धर्म की गति का अवरुद्ध होना।
- बौद्ध और ब्रह्म धर्म आदि का प्रभाव विस्तार।
- नाना प्रकार के उपधर्म और अपधर्म का प्रादुर्भाव।
- लोगों का धर्म के सही मार्ग से विभ्रांत होना।
- जो भी वस्तु खाएं, पहले भगवान को निवेदन करें।
- रसोई करते समय चिंतन करें कि यह ठाकुरजी के भोग के लिए बन रहा है।
- मुख से हरिनाम करते हुए प्रेमपूर्वक रसोई बनाएं।
- अद्वैत आचार्य द्वारा गंगा में तुलसी-पुष्प अर्पण।
- पुष्प और तुलसी का स्रोत (धारा) के विरुद्ध बहना।
- उनका सीधे शची माता के कंठ से जाकर चिपक जाना।
- अद्वैत आचार्य द्वारा इसे महाप्रभु के आगमन का संकेत समझना।
- सबके हृदय स्तंभित हो गए, वाणी अवरुद्ध हो गई।
- अद्वैत आचार्य खुशी से अश्रु बहाने लगे।
- सबको लगा जैसे प्राणवायु (कुंभक) रुक गई हो।
- मुरारी गुप्त का निमाई पंडित से बचने का प्रयास।
- निमाई द्वारा उन्हें शास्त्रार्थ के लिए चुनौती देना।
- अलंकार शास्त्र पर तर्क, जिसे निमाई ने पढ़ा नहीं था।
- निमाई की अद्भुत तर्क शक्ति से मुरारी गुप्त का चकित होना।
- मुरारी गुप्त को निमाई की दिव्यता का आभास होना।
- महाप्रभु के स्वरूप-प्रकटन की खबर सुनना।
- यह सोचकर शांतिपुर चले जाना कि 'अगर वो भगवान हैं तो मुझे बुलाएंगे'।
- महाप्रभु का अंतर्यामी भाव से सब जान लेना।
- भक्तों को भेजकर उन्हें नंदन आचार्य के घर से बुलवाना।
- विश्वरूप दर्शन: केवल श्री अद्वैत आचार्य को।
- षड्भुज मूर्ति दर्शन: श्री सार्वभौम भट्टाचार्य श्री प्रतापरुद्र राजा को|
- दिव्य स्वरूप (राधा-कृष्ण मिलित): केवल श्री राय रामानंद को।
- अद्वैत आचार्य द्वारा महाप्रभु के चरण मस्तक पर धारण करना।
- महाप्रभु का अपनी भक्ति 'चोरी' हो जाने की शिकायत करना।
- अद्वैत आचार्य का तर्क: 'अभाव के कारण ही चोरी की जाती है'।
- महाप्रभु को छूते ही वह 'कृष्ण-नाम' में उन्मत्त हो गया।
- वह कभी हंसता, कभी रोता, और कभी नाचने लगता।
- उसने स्वरूप दामोदर से कहा: 'एक भूत ने मुझे छू लिया है, अब मैं बस कृष्ण-कृष्ण कर रहा हूँ।'
- श्री नित्यानंद प्रभु: खड़दा में कीर्तन के बाद श्यामसुंदर विग्रह में विलीन हुए।
- श्री अद्वैत आचार्य: शांतिपुर में कीर्तन के बाद अपने विग्रह में विलीन हुए।
- कारण: उनका शरीर पंचभौतिक न होकर चिन्मय (दिव्य) था।
यह सारांश AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग गुरु सेवा में करके तैयार किया गया है। इसमें त्रुटि हो सकती है। कृपया पूर्ण लाभ के लिए पूरा वीडियो अवश्य देखें।
Comments