[Study Guide : Jan 25, 2026] प्रेम की पुकार और प्रभु का प्राकट्य: श्री अद्वैत आचार्य का महा-आह्वान

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श्री भगवत चर्चा
25 January 2026

प्रेम की पुकार और प्रभु का प्राकट्य: श्री अद्वैत आचार्य का महा-आह्वान

प्रेम की पुकार और प्रभु का प्राकट्य: श्री अद्वैत आचार्य का महा-आह्वान

Sri Sri 108 Sri Vinod Baba ji Maharaj
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हमारे प्रिय सद्गुरुदेव बताते हैं:
" जो राम है वही कृष्ण है, जो कृष्ण है वही शिव है, सब एक ही है। अलग भगवान है नहीं, भगवान एक ही है। "
अद्वैत आचार्य (15)महाप्रभु (30)लीला (12)कीर्तन (10)स्वरूप दर्शन (8)मुरारी गुप्त (6)योगमाया (2)
🔍 सत्संग सार (Executive Summary)

यह सत्संग श्री चैतन्य महाप्रभु के अवतरण की पृष्ठभूमि पर केंद्रित है, जिसमें श्री अद्वैत आचार्य की प्रमुख भूमिका को उजागर किया गया है। सद्गुरुदेव बताते हैं कि कैसे तत्कालीन भारत की पतित अवस्था को देखकर सदाशिव (महाविष्णु से एकीकृत होकर) श्री अद्वैत आचार्य के रूप में अवतरित हुए। उन्होंने गंगाजल और तुलसी दल से भगवान का आह्वान किया, जिसके फलस्वरूप श्री चैतन्य महाप्रभु का प्राकट्य हुआ। सत्संग में महाप्रभु की बाल्य लीला, विद्या लीला (मुरारी गुप्त प्रसंग), गया में उनका परिवर्तन, श्रीवास आंगन में स्वरूप-प्रकटन, और पार्षदों के लीला-संवरण का मार्मिक वर्णन है। अंत में, यह समझाया गया है कि भगवान का दर्शन भक्त के भाव पर निर्भर करता है और उनकी भौम लीला योगमाया द्वारा आवृत रहती है।

🧱 ज्ञान प्रवाह
graph TD A["प्रारंभ: भारत की आध्यात्मिक दुर्दशा"] --> B["🙏 अद्वैत आचार्य का प्राकट्य हेतु तप"] B --> C["🔱 महाविष्णु एवं सदाशिव का एकीकरण"] C --> D["✨ अद्वैत आचार्य के रूप में अवतरण"] D --> E["🌿 महाप्रभु के लिए तुलसी-जल से आह्वान"] E --> F["🌊 चमत्कार: तुलसी का धारा-विपरीत बहना"] F --> G["🌟 श्री चैतन्य महाप्रभु का आविर्भाव"] G --> H["👶 बाल्य लीला: अद्वैत भवन में दिव्य प्रभाव"] H --> I["🎓 विद्या लीला: मुरारी गुप्त से शास्त्रार्थ"] I --> J["💖 गया में दीक्षा एवं प्रेम-भक्ति में परिवर्तन"] J --> K["👑 श्रीवास आंगन में स्वरूप-प्रकटन"] K --> L["🌌 अद्वैत आचार्य की परीक्षा एवं विश्वरूप दर्शन"] L --> M["🕊️ लीला-संवरण: पार्षदों का स्वधाम-गमन"] M --> N["❓ प्रश्नोत्तर: भाव अनुसार भगवद्-दर्शन"] N --> O["🎭 निष्कर्ष: योगमाया द्वारा आवृत भौम लीला"]
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📖 आज की शिक्षाएं 📖 आज की विस्तृत शिक्षाएं

प्रथम चरण: अवतरण की पृष्ठभूमि एवं अद्वैत आचार्य का प्राकट्य
यह समझना कि श्री चैतन्य महाप्रभु के आगमन से पूर्व भारत की आध्यात्मिक स्थिति क्या थी और श्री अद्वैत आचार्य ने उनके अवतरण हेतु क्या भूमिका निभाई।
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महाप्रभु के आगमन पूर्व भारत की दशा
महाप्रभु के आगमन पूर्व भारत की आध्यात्मिक दुर्दशा
▶ देखें (0:31) ▶ Watch (0:31)
सद्गुरुदेव सत्संग का आरंभ करते हुए बताते हैं कि श्री चैतन्य महाप्रभु के अवतरण से पूर्व भारत की आध्यात्मिक स्थिति अत्यंत गंभीर थी। सनातन धर्म की गति अवरुद्ध हो चुकी थी और बौद्ध धर्म, ब्रह्म धर्म आदि के प्रभाव से नाना प्रकार के उपधर्म और अपधर्म फैल गए थे। लोग धर्म के सही मार्ग से विभ्रांत होकर देवताओं की उपासना में लग गए थे, जिससे समाज में धर्म का मूल स्वरूप क्षीण हो गया था। इसी विकट परिस्थिति में भगवान के अवतरण की भूमि तैयार हो रही थी, जिसके लिए महाप्रभु ने अपने पार्षदों को पहले ही भेज दिया था।
🔗 यह खंड महाप्रभु के अवतरण के 'क्यों' का उत्तर देता है, जो धर्म की स्थापना और भक्ति के पुनरुद्धार के लिए आवश्यक था।
📌 तत्कालीन आध्यात्मिक पतन के कारण:
  • सनातन धर्म की गति का अवरुद्ध होना।
  • बौद्ध और ब्रह्म धर्म आदि का प्रभाव विस्तार।
  • नाना प्रकार के उपधर्म और अपधर्म का प्रादुर्भाव।
  • लोगों का धर्म के सही मार्ग से विभ्रांत होना।
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सदाशिव और महाविष्णु का एकीकरण
श्री अद्वैत आचार्य का अवतरण: सदाशिव और महाविष्णु का संयुक्त स्वरूप
▶ देखें (1:34) ▶ Watch (1:34)
चंद्रमा के उदाहरण से ईश्वर की एकता का सिद्धांत। सद्गुरुदेव एक दिव्य लीला का वर्णन करते हैं जिसमें भारत की दुर्दशा देखकर भगवान सदाशिव ने सागर किनारे महाविष्णु की तपस्या की और दोनों एकीभूत होकर श्री अद्वैत आचार्य के रूप में अवतरित हुए। इस प्रसंग के माध्यम से सद्गुरुदेव ईश्वर की एकता को चंद्रमा के उदाहरण से समझाते हैं। वे कहते हैं कि चंद्रमा एक ही है, लेकिन दूज या पूर्णिमा के अनुसार उसके प्रकाश का तारतम्य (मात्रा) अलग-अलग दिखता है। चंद्र-कला में भेद हो सकता है, किंतु चंद्रमा में नहीं। ठीक उसी प्रकार, पूर्ण ब्रह्म सनातन भगवान एक ही हैं; राम, कृष्ण, शिव आदि उनके ही अलग-अलग प्रकाश हैं। अज्ञानता के कारण हम उनमें भेद करते हैं।
🔗 यह प्रसंग श्री अद्वैत आचार्य की दिव्यता और उनके असाधारण सामर्थ्य को स्थापित करता है, जो महाप्रभु जैसे पूर्ण ब्रह्म को बुलाने के लिए आवश्यक था।
⚖️ ईश्वर तत्व की एकता
अज्ञानी दृष्टि: राम, कृष्ण, शिव आदि को अलग-अलग और पृथक मानना। आपस में मतभेद और विवाद करना।
तात्विक दृष्टि: सभी को एक ही ईश्वर के भिन्न-भिन्न प्रकाश समझना। जैसे चंद्रमा एक है पर प्रकाश अलग-अलग। जो राम हैं, वही कृष्ण हैं, वही शिव हैं।
🙏
अद्वैत आचार्य का आह्वान
गंगा किनारे श्री अद्वैत आचार्य का करुण आह्वान
▶ देखें (7:25) ▶ Watch (7:25)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि श्री अद्वैत आचार्य, अल्पायु में ही प्रकांड पंडित बनकर और तीर्थाटन के पश्चात, श्री सीता देवी से विवाह करके शांतिपुर में गंगा किनारे निवास करने लगे। उनका एकमात्र उद्देश्य महाप्रभु के आविर्भाव की प्रतीक्षा करना था। वे प्रतिदिन अश्रुधारा बहाते हुए, गंगाजल और तुलसी दल अर्पित करके भगवान कृष्ण का आह्वान करते थे। वे प्रार्थना करते, 'हे प्रभु, तुम आ जाओ! यह धरती दुखी है और सनातन धर्म की स्थिति दयनीय है। आप आकर धर्म की रक्षा करें और उस दिव्य प्रेम का वितरण करें जो आज तक किसी को प्राप्त नहीं हुआ है।' सद्गुरुदेव इस बिंदु पर एक महत्वपूर्ण शास्त्र वचन का उल्लेख करते हैं।
🔗 यह खंड महाप्रभु के अवतरण के 'कैसे' का उत्तर देता है - एक शुद्ध भक्त के तीव्र और करुण आह्वान के माध्यम से।
वह वस्तु जो कभी नहीं दी गई— Sri चैतन्य चरितामृत Adi Lila 1.4
▶ 11:05
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
अनर्पितचरीं चिरात् करुणयावतीर्णः कलौ, समर्पयितुमुन्नतोज्ज्वलरसां स्वभक्तिश्रियम्। हरिः पुरटसुन्दरद्युतिकदम्बसन्दीपितः, सदा हृदयकन्दरे स्फुरतु वः शचीनन्दनः॥
anarpita-carīṁ cirāt karuṇayāvatīrṇaḥ kalau, samarpayitum unnatojjvala-rasāṁ sva-bhakti-śriyam। hariḥ puraṭa-sundara-dyuti-kadamba-sandīpitaḥ, sadā hṛdaya-kandare sphuratu vaḥ śacī-nandanaḥ॥
जो उन्नत और उज्ज्वल रस से युक्त अपनी भक्ति-संपत्ति (प्रेम) है, जिसे बहुत काल से किसी को प्रदान नहीं किया गया था, उसे प्रदान करने के लिए जो करुणावश इस कलियुग में अवतीर्ण हुए हैं, वे तप्त स्वर्ण के समान सुंदर कांति-समूह से दीप्तिमान श्रीहरि शचीनंदन आपके हृदय-कंदरा में सदा स्फुरित हों।
द्वितीय चरण: आह्वान की शक्ति ,दिव्य संकेत, प्राकट्य और बाल लीला
भक्तिपूर्ण निवेदन की शक्ति को समझना और यह जानना कि भगवान अपने आगमन का संकेत कैसे देते हैं। साथ में उनके प्राकट्य और बाल लीला के प्रसंग।
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तुलसी-जल अर्पण का महत्व
शास्त्र प्रमाण: तुलसी दल और जल मात्र से भगवान का वशीकरण
▶ देखें (11:56) ▶ Watch (11:56)
सद्गुरुदेव श्री अद्वैत आचार्य के आह्वान की विधि को समझाते हुए भक्ति की सरलता और शक्ति पर प्रकाश डालते हैं। वे बताते हैं कि भगवान को प्रसन्न करने के लिए बड़े-बड़े यज्ञों या मंत्रों की आवश्यकता नहीं है। एक भक्त यदि प्रेम से केवल एक तुलसी दल और थोड़ा सा जल भी भगवान को अर्पित करता है, तो भक्तवत्सल भगवान स्वयं को उस भक्त के हाथों बेच देते हैं, अर्थात उसके अधीन हो जाते हैं। इसी सिद्धांत के आधार पर श्री अद्वैत आचार्य भगवान को पुकार रहे थे। सद्गुरुदेव इस सरल क्रिया को दैनिक जीवन में अपनाने की प्रेरणा देते हैं, जैसे रसोई को ही भजन बना लेना और भोजन बनाने के बाद ठाकुरजी को भोग लगाने का भाव रखना। इस सिद्धांत की पुष्टि हेतु सद्गुरुदेव पुराणों का एक दिव्य श्लोक उद्धृत करते हैं。
🔗 यह कार्ड भक्ति के व्यावहारिक पक्ष को दर्शाता है, जहाँ एक छोटी सी क्रिया भी, यदि प्रेम से की जाए, तो भगवान को आकर्षित कर सकती है।
भक्त के प्रति भगवान की अधीनता— मूल श्लोक : गौतमीय तंत्र।
▶ 11:56
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
तुलसीदलमात्रेण जलस्य चुलुकेन वा। विक्रीणीते स्वमात्मानं भक्तेभ्यो भक्तवत्सलः॥
tulasīdalamātreṇa jalasya culukena vā। vikrīṇīte svamātmānaṁ bhaktebhyo bhaktavatsalaḥ॥
भक्तवत्सल भगवान केवल एक तुलसी-दल अथवा एक चुल्लू जल के बदले में अपने-आपको भक्तों के हाथ बेच देते हैं (अर्थात उनके प्रेम के अधीन हो जाते हैं)।
✅ करें:
  • जो भी वस्तु खाएं, पहले भगवान को निवेदन करें।
  • रसोई करते समय चिंतन करें कि यह ठाकुरजी के भोग के लिए बन रहा है।
  • मुख से हरिनाम करते हुए प्रेमपूर्वक रसोई बनाएं।
🕉️
महाप्रभु के जन्मस्थान का संकेत
दिव्य संकेत: गंगा की धारा के विपरीत बहता तुलसी दल
▶ देखें (14:55) ▶ Watch (14:55)
सद्गुरुदेव एक अद्भुत लीला का वर्णन करते हैं। एक दिन जब श्री अद्वैत आचार्य गंगा में तुलसी दल और पुष्प अर्पित कर भगवान का आह्वान कर रहे थे, तब एक चमत्कार हुआ। सामान्यतः अर्पित वस्तुएं गंगा की धारा के साथ बह जाती हैं, किंतु उस दिन वे तुलसी दल और पुष्प धारा के विरुद्ध, उत्तर दिशा की ओर बहने लगे। श्री अद्वैत आचार्य उनके पीछे-पीछे चले। वे पुष्प और तुलसी दल सीधे जाकर श्री शची माता के कंठ से लग गए, जो उस समय गंगा स्नान करने आई थीं। इस दिव्य संकेत से अद्वैत आचार्य, जो स्वयं भगवान के अवतार थे, तुरंत समझ गए कि इसी घर में, इन्हीं के गर्भ से प्रभु का अवतरण होने वाला है। यह जानकर वे आनंद से नृत्य करने लगे कि उनका आह्वान सफल हो गया है।
🔗 यह घटना दिखाती है कि भगवान अपने भक्त के आह्वान का उत्तर केवल आते ही नहीं, बल्कि अपने आगमन का पूर्व-संकेत भी भेजते हैं।
📌 चमत्कार की मुख्य बातें:
  • अद्वैत आचार्य द्वारा गंगा में तुलसी-पुष्प अर्पण।
  • पुष्प और तुलसी का स्रोत (धारा) के विरुद्ध बहना।
  • उनका सीधे शची माता के कंठ से जाकर चिपक जाना।
  • अद्वैत आचार्य द्वारा इसे महाप्रभु के आगमन का संकेत समझना।
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ग्रहण और हरिनाम के साथ प्राकट्य
आविर्भाव: चंद्रग्रहण और हरिनाम संकीर्तन
▶ देखें (17:46) ▶ Watch (17:46)
फाल्गुनी पूर्णिमा के चंद्रग्रहण पर हरिनाम की गूंज। सद्गुरुदेव बताते हैं कि फाल्गुनी पूर्णिमा के दिन चंद्रग्रहण था। उस समय लोग गंगा स्नान कर रहे थे और ग्रहण के कारण 'हरि बोल, हरि बोल' की ध्वनि कर रहे थे। उसी पवित्र कोलाहल के बीच, शशि माता के घर को आलोकित करते हुए महाप्रभु का आविर्भाव हुआ। अद्वैत आचार्य ध्यान में जान गए कि प्रभु आ गए हैं और वे आनंद से नृत्य करने लगे।
🔗 प्रभु ने अपने जन्म के क्षण को ही हरिनाम से युक्त कर दिया।
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शिशु निमाई का अद्वैत सभा में प्रवेश
बाल्य माधुरी: जब नन्हे निमाई भाई को बुलाने आए
▶ देखें (21:00) ▶ Watch (21:00)
3 वर्षीय नग्न बालक को देखकर विद्वान स्तब्ध रह गए। महाप्रभु के बड़े भाई विश्वरूप प्रतिदिन अद्वैत आचार्य की सभा में सत्संग सुनने जाते थे। एक दिन शची माता ने 3 वर्षीय निमाई को उन्हें बुलाने भेजा। धूल से सने, नग्न और घुंघराले बालों वाले उस बालक को सभा में आते देखकर अद्वैत आचार्य और सभी पंडित 'स्तंभित' (Stunned) रह गए। उनकी वाणी रुक गई और वे उस बालक की आकर्षण शक्ति (Attraction Power) में बंधकर एकटक देखते रह गए।
🔗 यह महाप्रभु की नैसर्गिक ईश्वरीय आकर्षण शक्ति का प्रथम सार्वजनिक प्रदर्शन था।
📌 सभा की प्रतिक्रिया:
  • सबके हृदय स्तंभित हो गए, वाणी अवरुद्ध हो गई।
  • अद्वैत आचार्य खुशी से अश्रु बहाने लगे।
  • सबको लगा जैसे प्राणवायु (कुंभक) रुक गई हो।
😭
अद्वैत आचार्य की तृप्ति
प्रतीक्षा पूर्ण: अद्वैत आचार्य की भावावस्था
▶ देखें (23:00) ▶ Watch (23:00)
प्रभु को पहचानकर अश्रुधारा। बालक निमाई को देखकर अद्वैत आचार्य समझ गए कि यह वही प्रभु हैं जिन्हें उन्होंने गंगाजल-तुलसी से बुलाया था। उनके नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगी और उन्होंने अपने वक्षस्थल को भिगो दिया। वे मन ही मन कहने लगे, 'आज हमारी इच्छा पूर्ण हो गई, आज हमारा हृदय शांत हो गया।'
🔗 भक्त और भगवान के मिलन की चरम अवस्था।
तृतीय चरण: विद्या-लीला और हृदय-परिवर्तन
महाप्रभु के प्रकांड पांडित्य (विद्या-अभिमान) के 'स्वांग' से लेकर प्रेम-विह्वल भक्त बनने तक की यात्रा को समझना।
🎓
महाप्रभु और मुरारी गुप्त का शास्त्रार्थ
विद्या-लीला: जब निमाई पंडित ने मुरारी गुप्त को चकित किया
▶ देखें (25:41) ▶ Watch (25:41)
सद्गुरुदेव महाप्रभु की किशोरावस्था की एक लीला सुनाते हैं, जब वे अपनी विद्वत्ता के अभिमान में मत्त रहते थे। एक दिन उन्होंने श्री मुरारी गुप्त को रास्ते में रोक लिया, जो उनसे बचने की कोशिश कर रहे थे। निमाई पंडित ने उन्हें शास्त्रार्थ के लिए चुनौती दी। मुरारी गुप्त ने सोचा कि निमाई ने केवल व्याकरण पढ़ा है, इसलिए उन्होंने अलंकार शास्त्र पर तर्क करने का प्रस्ताव रखा, यह सोचकर कि वे निमाई को परास्त कर देंगे। किंतु आश्चर्य की बात यह हुई कि निमाई पंडित ने अलंकार शास्त्र के ऐसे गूढ़ सिद्धांतों का खंडन-मंडन किया कि मुरारी गुप्त पसीने से लथपथ हो गए। उन्हें विश्वास हो गया कि यह कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि कोई दिव्य पुरुष है, क्योंकि बिना पढ़े इतनी विद्वत्ता संभव नहीं है।
🔗 यह लीला महाप्रभु के अलौकिक ज्ञान और उनकी 'विद्या-लीला' को दर्शाती है, जो उनके भावी स्वरूप-परिवर्तन के लिए एक पृष्ठभूमि तैयार करती है।
📌 घटनाक्रम:
  • मुरारी गुप्त का निमाई पंडित से बचने का प्रयास।
  • निमाई द्वारा उन्हें शास्त्रार्थ के लिए चुनौती देना।
  • अलंकार शास्त्र पर तर्क, जिसे निमाई ने पढ़ा नहीं था।
  • निमाई की अद्भुत तर्क शक्ति से मुरारी गुप्त का चकित होना।
  • मुरारी गुप्त को निमाई की दिव्यता का आभास होना।
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गया में दीक्षा और परिवर्तन
गया में दीक्षा और परिवर्तन
▶ देखें (35:11) ▶ Watch (35:11)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि विद्या-लीला के बाद महाप्रभु ने जगत-कल्याण हेतु हरिनाम संकीर्तन का प्रचार करने का निश्चय किया। इस लीला के लिए वे गया गए, जहाँ उन्होंने श्री ईश्वर पुरी से दीक्षा ग्रहण की। इसके बाद उनके भीतर एक अभूतपूर्व परिवर्तन आ गया। विद्या-लीला के अंतर्गत पांडित्य के अभिमान का स्वांग करने वाले निमाई पंडित अब प्रेम के विकारों से ग्रस्त हो गए। घर लौटने पर उनका स्वरूप बदला हुआ था - वे अत्यंत विनम्र हो गए थे और 'कृष्ण कहाँ हैं?' कहकर दिन-रात रोते रहते थे। उनके इस प्रेम-विह्वल रूप को देखकर घरवाले चिंतित हो गए और इसे कोई ऊपरी चक्कर समझने लगे, जबकि श्रीवास पंडित जैसे भक्त समझ गए कि यह साधारण दशा नहीं, बल्कि दिव्य प्रेम की उच्चतम अवस्था है।
🔗 यह घटना महाप्रभु के जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ है, जहाँ ज्ञान (विद्या) पर प्रेम (भक्ति) की विजय होती है और उनके वास्तविक मिशन का आरंभ होता है।
⚖️ निमाई पंडित का परिवर्तन
दीक्षा से पूर्व (विद्या-लीला का स्वांग): विद्वत्ता का अभिमान, तर्क-वितर्क में रुचि, उद्दंड स्वभाव।
दीक्षा के पश्चात् (प्रेम-लीला): अत्यंत विनम्र, कृष्ण-विरह में निरंतर क्रंदन, प्रेम के अष्टसात्विक विकारों से युक्त।
चतुर्थ चरण: स्वरूप-प्रकटन एवं दिव्य लीलाएं
महाप्रभु द्वारा अपने ऐश्वर्य और दिव्य स्वरूप को प्रकट करने की लीलाओं और उनके पार्षदों के साथ उनके संबंधों को समझना।
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श्रीवास आंगन में स्वरूप प्रकटन
श्रीवास आंगन में ऐश्वर्य-प्रकट: जब महाप्रभु ने अपना भगवत्-स्वरूप दिखाया
▶ देखें (40:11) ▶ Watch (40:11)
सद्गुरुदेव वर्णन करते हैं कि प्रेम में उन्मत्त होकर महाप्रभु श्रीवास पंडित के घर गए और वहाँ उन्होंने अपने वास्तविक स्वरूप को प्रकट किया। उन्होंने अपने शंख-चक्र-गदा-पद्म धारी चतुर्भुज रूप का दर्शन कराया और अपने ऐश्वर्य को प्रकट किया। जब श्री अद्वैत आचार्य को यह ज्ञात हुआ, तो उन्होंने महाप्रभु की परीक्षा लेने का निश्चय किया। वे यह सोचकर शांतिपुर चले गए कि यदि महाप्रभु वही भगवान हैं जिन्हें उन्होंने बुलाया है, तो वे उन्हें स्वयं बुलाकर लाएंगे। महाप्रभु, जो अंतर्यामी थे, तुरंत जान गए और उन्होंने दो भक्तों को भेजकर अद्वैत आचार्य को बुलवाया, जो नंदन आचार्य के घर में छिपे हुए थे।
🔗 यह लीला भक्त और भगवान के बीच के मधुर और गूढ़ संबंध को दर्शाती है, जिसमें परीक्षा और विश्वास दोनों शामिल हैं।
📌 अद्वैत आचार्य की परीक्षा:
  • महाप्रभु के स्वरूप-प्रकटन की खबर सुनना।
  • यह सोचकर शांतिपुर चले जाना कि 'अगर वो भगवान हैं तो मुझे बुलाएंगे'।
  • महाप्रभु का अंतर्यामी भाव से सब जान लेना।
  • भक्तों को भेजकर उन्हें नंदन आचार्य के घर से बुलवाना।
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विश्वरूप एवं अन्य स्वरूप दर्शन
महाप्रभु के विभिन्न स्वरूप दर्शन और उनके पात्र
▶ देखें (43:48) ▶ Watch (43:48)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि जब श्री अद्वैत आचार्य आए, तो महाप्रभु ने उन्हें अपने उस विश्वरूप का दर्शन कराया जो उन्होंने गीता में अर्जुन को दिखाया था। यह विश्वरूप दर्शन महाप्रभु ने अपनी लीला में केवल श्री अद्वैत आचार्य को ही कराया था। सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि महाप्रभु ने अपने विभिन्न स्वरूपों का दर्शन अलग-अलग भक्तों को उनकी पात्रता और लीला के अनुसार कराया। सार्वभौम भट्टाचार्य और राजा प्रतापरुद्रको षड्भुज मूर्ति (राम, कृष्ण और महाप्रभु के संयुक्त हाथ) | उनका जो दिव्य राधा-कृष्ण मिलित तनु स्वरूप था, उसका दर्शन केवल श्री राय रामानंद को ही प्राप्त हुआ। एक प्रसंग में भक्त विजय आखरिया को उन्होंने केवल अपने दिव्य हाथ की एक झलक दिखाई, जिसके तेज से वे सात दिनों तक प्रेमोन्मत्त होकर नग्न अवस्था में घूमते रहे।
🔗 यह खंड भगवद्-दर्शन की दुर्लभता और भक्त की पात्रता के सिद्धांत को स्थापित करता है।
📌 किस भक्त को कौन सा दर्शन हुआ?:
  • विश्वरूप दर्शन: केवल श्री अद्वैत आचार्य को।
  • षड्भुज मूर्ति दर्शन: श्री सार्वभौम भट्टाचार्य श्री प्रतापरुद्र राजा को|
  • दिव्य स्वरूप (राधा-कृष्ण मिलित): केवल श्री राय रामानंद को।
भक्ति की चोरी
अद्वैत आचार्य का चरण स्पर्श और 'भक्ति चोरी' का रहस्य
▶ देखें (47:53) ▶ Watch (47:53)
सद्गुरुदेव एक मार्मिक लीला सुनाते हैं। श्री अद्वैत आचार्य रिश्ते में महाप्रभु के 'चाचा गुरु' (माधवेंद्र पुरी के शिष्य) लगते थे। इस मर्यादा के कारण महाप्रभु उनसे चरण स्पर्श करवाने में बहुत कष्ट (दुःख) अनुभव करते थे। एक दिन कीर्तन में जब महाप्रभु भाव-समाधि में अचेत थे, तब अद्वैत आचार्य ने अवसर पाकर उनके चरण-कमल को अपने मस्तक पर घिस लिया। होश में आने पर महाप्रभु कहने लगे, 'आज हमारी भक्ति किसी ने छीन ली है, किसी ने शोषण कर लिया है!'। जब पता चला कि यह कार्य अद्वैत आचार्य ने किया है, तो अद्वैत आचार्य ने हंसते हुए उत्तर दिया, 'चोरी वही करता है जिसके घर में अभाव होता है। मेरे पास भक्ति का अभाव था, इसलिए मैंने आपके चरणों से थोड़ी चोरी कर ली। इसमें मेरा क्या दोष?'।
🔗 यह लीला भक्त की तीव्र लालसा और भगवान के प्रति उसके अधिकारपूर्ण प्रेम को दर्शाती है, जहाँ भक्त अपनी भक्ति बढ़ाने के लिए भगवान से 'चोरी' करने का भी साहस करता है।
📌 लीला का सार:
  • अद्वैत आचार्य द्वारा महाप्रभु के चरण मस्तक पर धारण करना।
  • महाप्रभु का अपनी भक्ति 'चोरी' हो जाने की शिकायत करना।
  • अद्वैत आचार्य का तर्क: 'अभाव के कारण ही चोरी की जाती है'।
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गंभीरा की दशा और मछुआरा
गंभीरा लीला: कूर्माकृति और मछुआरे का प्रेमोन्माद
▶ देखें (51:00) ▶ Watch (51:00)
शारीरिक विकार और मछुआरे का 'कृष्ण-नाम' में पागलपन। अंतिम 18 वर्षों में महाप्रभु के शरीर में अष्ट-सात्विक विकार चरम पर थे। कभी वे कछुए की तरह हाथ-पैर समेट लेते (कूर्माकृति), तो कभी जोड़ों के ढीले होने से शरीर 7 हाथ लंबा हो जाता। एक बार वे समुद्र में कूद गए और मछुआरे के जाल में फंस गए। मछुआरा उनकी लंबी काया देखकर उन्हें 'भूत' समझ बैठा, लेकिन उन्हें छूते ही वह 'हा कृष्ण, हा कृष्ण' रटते हुए नाचने, रोने और हंसने लगा। उसे लगा कि भूत के असर से वह पागल हो गया है।
🔗 महाभाव और विरह की उच्चतम अवस्था, जहाँ स्पर्श मात्र से कृष्ण-प्रेम का संचार हो जाता है।
📌 मछुआरे की दशा (स्पर्श का प्रभाव):
  • महाप्रभु को छूते ही वह 'कृष्ण-नाम' में उन्मत्त हो गया।
  • वह कभी हंसता, कभी रोता, और कभी नाचने लगता।
  • उसने स्वरूप दामोदर से कहा: 'एक भूत ने मुझे छू लिया है, अब मैं बस कृष्ण-कृष्ण कर रहा हूँ।'
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प्रेम-विकारों की पराकाष्ठा: 18 विकार
महाभाव की तीव्रता: अष्ट-सात्विक से भी परे
▶ देखें (54:12) ▶ Watch (54:12)
महाप्रभु में प्रकट होने वाले असाधारण विकार। सद्गुरुदेव बताते हैं कि शरीर के जोड़ों का अलग हो जाना (दीर्घ काया) जैसा विकार साधारण मनुष्य में संभव नहीं है, यह केवल श्रीमती राधारानी (या उनकी भाव-दशा) में संभव है। जहाँ उच्च कोटि के साधकों में भी मुश्किल से 'अष्ट-सात्विक विकार' (8 लक्षण) दिखते हैं, वहीं महाप्रभु में 18 प्रकार के सात्विक विकार प्रकट होते थे।
🔗 यह दर्शाता है कि महाप्रभु 'राधा-भाव' की उस उच्चतम सीमा पर थे जो जीवों के लिए अगम्य है।
⚖️ सात्विक विकारों का स्तर
उच्च कोटि के साधक: इनमें साधारणतः 2-4 विकार दिखते हैं। पूर्ण 'अष्ट-सात्विक विकार' (8 Symptoms) का प्रकट होना भी अत्यंत दुर्लभ (कदाचित) है।
श्री चैतन्य महाप्रभु: इनमें 18 प्रकार के सात्विक विकार निरंतर प्रकट होते थे, जिनमें 'कूर्माकृति' और 'अस्थि-ग्रंथि शिथिलता' जैसे असाधारण लक्षण शामिल थे।
🕊️
पार्षदों का लीला-संवरण
बिना समाधि के लीला-संवरण: नित्यानंद प्रभु और अद्वैत आचार्य का अंतर्धान
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सद्गुरुदेव महाप्रभु के पार्षदों के लीला-संवरण की अद्भुत प्रक्रिया का वर्णन करते हैं। उन्होंने बताया कि श्री नित्यानंद प्रभु ने खड़दा में एक विशाल कीर्तन समारोह के बाद मंदिर में प्रवेश किया और फिर वे अपने श्यामसुंदर विग्रह में विलीन हो गए। कुछ वर्षों बाद, श्री अद्वैत आचार्य ने भी शांतिपुर में इसी प्रकार कीर्तन के बाद मंदिर में प्रवेश किया और अपने विग्रह में अंतर्धान हो गए। सद्गुरुदेव समझाते हैं कि चूँकि इन पार्षदों का शरीर पंचभौतिक नहीं, बल्कि चिन्मय था, इसलिए उनकी कोई समाधि नहीं है। वे अपनी लीला पूर्ण करके साक्षात अपने विग्रह रूप में ही विलीन हो गए, जो उनकी नित्य-सिद्ध भगवत्-सत्ता का प्रमाण है।
🔗 यह खंड भगवान और उनके नित्य पार्षदों की अप्राकृत प्रकृति को स्पष्ट करता है, जो सामान्य जन्म-मृत्यु के नियमों से परे हैं।
📌 लीला-संवरण की प्रक्रिया:
  • श्री नित्यानंद प्रभु: खड़दा में कीर्तन के बाद श्यामसुंदर विग्रह में विलीन हुए।
  • श्री अद्वैत आचार्य: शांतिपुर में कीर्तन के बाद अपने विग्रह में विलीन हुए।
  • कारण: उनका शरीर पंचभौतिक न होकर चिन्मय (दिव्य) था।
पंचम चरण: प्रश्नोत्तर एवं दार्शनिक सिद्धांत
भगवान के दर्शन, उनकी लीला और योगमाया की भूमिका से संबंधित गूढ़ प्रश्नों का समाधान प्राप्त करना।
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सिद्धांत: भाव अनुसार कृष्ण दर्शन
सिद्धांत: भौम लीला, नित्य लीला और योगमाया
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भौम और नित्य लीला में भेद और योगमाया की भूमिका। सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि भगवान की लीला दो स्तरों पर होती है। नित्य (दिव्य) लीला अपरिवर्तनीय (Unchangeable) है; वहां भगवान का स्वरूप और आयु स्थिर रहती है। इसके विपरीत, **भौम (सांसारिक) लीला** परिवर्तनशील (Changeable) है; यहाँ भगवान जन्म, बाल्य, किशोर आदि अवस्थाओं का अभिनय करते हैं। यह भौम लीला 'योगमाया' द्वारा आवृत रहती है, जिसके कारण मूढ़ व्यक्ति भगवान को साधारण मनुष्य मानते हैं। भगवान का दर्शन केवल भक्त के 'भाव' पर निर्भर करता है।
🔗 यह सत्संग का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण दार्शनिक निष्कर्ष है, जो यह स्थापित करता है कि सच्ची भक्ति और शुद्ध भाव के बिना भगवान के वास्तविक स्वरूप को समझना असंभव है।
योगमाया द्वारा आवृत भगवान— भगवद् गीता Bhagavad Gita 7.25
▶ 64:33
संदर्भ पूरक संदर्भ
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः। मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्॥
nāhaṁ prakāśaḥ sarvasya yogamāyāsamāvṛtaḥ। mūḍho'yaṁ nābhijānāti loko māmajamavyayam॥
मैं अपनी योगमाया से ढका होने के कारण सबके लिए प्रकट नहीं होता। यह मूढ़ संसार मुझ अजन्मा और अविनाशी परमेश्वर को नहीं जानता।
❓ प्रश्न: जैसे विजय आखरिया को जो हाथ दिखाए थे महाप्रभु, तो वो दिव्य हाथ था। तो क्या कृष्ण लीला में भी ऐसा ही विग्रह था? जैसे दुर्योधन, शिशुपाल इत्यादि... उनको भी क्या वही स्वरूप दिखा था? ▶ 58:23
💡 उत्तर: भगवान का विग्रह नित्य और दिव्य ही है, पर दर्शन भाव और योगमाया के आवरण पर निर्भर करता है। 💡 उत्तर: सद्गुरुदेव ने उत्तर में तीन मुख्य बातें समझाईं: 1. लीला का भेद: भगवान की नित्य लीला में कोई परिवर्तन नहीं होता, जबकि भौम लीला में वे परिवर्तनशील (बाल्य, पौगंड, किशोर) दिखते हैं। 2. विजय आखरिया का प्रसंग: महाप्रभु ने उन्हें अपने दिव्य हाथ की केवल एक झलक दिखाई थी, जिसके तेज को वे सहन नहीं कर सके और 7 दिनों तक प्रेमोन्मत्त (पागल) होकर नग्न अवस्था में घूमते रहे। 3. भाव दृष्टि: गोपियाँ उसी कृष्ण को 'आनंद-सिंधु' और 'प्राण-वल्लभ' के रूप में देखती थीं, जबकि शिशुपाल और दुर्योधन जैसे द्वेषी उन्हें 'अग्नि' या 'शत्रु' के रूप में देखते थे।
⚖️ लीला के प्रकार
✨ नित्य (दिव्य) लीला: अपरिवर्तनीय (Unchangeable)। गोलोक/साकेत धाम में निरंतर चलती है। स्वरूप और आयु स्थिर रहती है।
🌍 भौम (प्रकट) लीला: परिवर्तनशील (Changeable)। धरा पर जन्म, बाल्य, किशोर आदि का अभिनय। यह योगमाया द्वारा आवृत रहती है।
⚖️ कृष्ण के प्रति विभिन्न भाव
गोपियों का भाव (प्रेम): कृष्ण को देखकर आनंद सागर में डूब जाना। उनके दर्शन में पलक झपकना भी 'युग' के समान कष्टकारी लगना।
शिशुपाल का भाव (द्वेष): कृष्ण को देखकर हृदय में ईर्ष्या की अग्नि जलना। उन्हें शत्रु मानकर भस्म कर देने की इच्छा रखना।
स्पष्टीकरण (Clarification)

यह सारांश AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग गुरु सेवा में करके तैयार किया गया है। इसमें त्रुटि हो सकती है। कृपया पूर्ण लाभ के लिए पूरा वीडियो अवश्य देखें।

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