[Study Guide : Jan 24, 2026] भक्त श्री जयदेव: भगवत कृपा की गाथा

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श्री भगवत चर्चा
24 January 2026

भक्त जयदेव: भगवत कृपा की गाथा

भक्त जयदेव: भगवत कृपा की गाथा

Sri Sri 108 Sri Vinod Baba ji Maharaj
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हमारे प्रिय सद्गुरुदेव बताते हैं:
" जिस हृदय में विषय के प्रति लालसा है, भोग पदार्थ के प्रति आसक्ति है, ऐसी चित्त वृत्ति में भगवत् प्रेम का आस्वादन करना कदापि संभव नहीं है "

" अश्रद्धा के साथ कोई भी मंगल कार्य किया जाए, तो न इस लोक में, न परलोक में कोई मंगल होता है। "

" सेवा माने संत का प्रसन्नता संपादन। केवल धन देने से या रसगुल्ला-राजभोग खिलाने से सेवा नहीं होती। "

" यदि तुम्हारा धन दो नंबरी है और तुम साधु सेवा करते हो... तो वो साधु जो भोजन करते हैं, उनका भी अकल्याण होता है और तुम्हारा भी। "
जयदेव गोस्वामी (20)गृहस्थ आश्रम (12)साधु सेवा (18)स्वोपार्जित धन (8)गीत गोविंदम् (15)जगन्नाथ जी (25)
🔍 सत्संग सार (Executive Summary)

यह सत्संग महाकवि श्री जयदेव गोस्वामी के पावन जीवन पर केंद्रित है। सद्गुरुदेव उनके जन्म, तीव्र वैराग्य, श्री जगन्नाथ जी के आदेश से पद्मावती जी से विवाह, और 'गीत गोविंदम्' की रचना की दिव्य कथा का वर्णन करते हैं। सत्संग का सार यह है कि सच्चा गृहस्थ आश्रम भोग के लिए नहीं, बल्कि भगवत् उपासना, संत सेवा और धर्म के निर्वहन के लिए है। धन, बल और विद्या का धर्म के साथ संयोग ही मंगलकारी है। सत्संग में भगवान की भक्त-वात्सल्यता का अद्भुत दृष्टांत प्रस्तुत किया गया है, जहाँ स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने श्री जयदेव का रूप धरकर 'देहि पद पल्लव मुदारम्' श्लोक को पूर्ण किया और उनकी पत्नी पद्मावती के हाथ से प्रसाद ग्रहण किया। अंत में संत सेवा की मर्यादा और विधि पर विशेष प्रकाश डाला गया है।

🧱 ज्ञान प्रवाह
graph TD A["📜 श्री जयदेव गोस्वामी का परिचय"] --> B["🌱 प्रारंभिक जीवन और वैराग्य"]; B --> C["🔥 निरंजन का दृष्टांत और विषय-त्याग"]; C --> D["🛤️ श्री जगन्नाथ पुरी की यात्रा"]; D --> E["🙏 सुदेव ब्राह्मण की प्रतिज्ञा"]; E --> F["💍 श्री जगन्नाथ जी के आदेश से विवाह"]; F --> G["🏡 गृहस्थ आश्रम का यथार्थ स्वरूप"]; G --> H["💡 सिद्धांत: धर्म, धन, बल और विद्या"]; H --> I["⚖️ सदुपयोग vs दुरुपयोग"]; G --> J["🙌 साधु सेवा का माहात्म्य"]; J --> K["🌳 फल तोड़ने का दृष्टांत"]; J --> S["⚠️ सेवा के नियम: स्वोपार्जित धन व कायिक सेवा"]; F --> L["🎶 'गीत गोविंदम्' की रचना और महिमा"]; L --> M["👑 राजा का दावा: 'मेरा ग्रंथ असली है'"]; L --> N["✍️ 'देहि पद पल्लव मुदारम्' प्रसंग"]; N --> O["✨ स्वयं भगवान द्वारा श्लोक पूर्ति"]; O --> P["🍚 भगवान का पद्मावती के हाथ से प्रसाद ग्रहण"]; P --> Q["😭 श्री जयदेव का भाव-विभोर होना"]; J --> R["❤️ भक्त सेवा ही उत्तम भक्ति"];
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📖 आज की शिक्षाएं 📖 आज की विस्तृत शिक्षाएं

प्रारंभिक जीवन: वैराग्य की ज्वाला
श्री जयदेव गोस्वामी के बाल्यकाल, माता-पिता के देहावसान के पश्चात उत्पन्न तीव्र वैराग्य और सांसारिक विषयों से उनकी सहज उदासीनता का वर्णन करना।
📜
महाकवि श्री जयदेव गोस्वामी का परिचय
श्री जयदेव गोस्वामी: एक भुवन-पावन चरित्र
▶ देखें (0:01) ▶ Watch (0:01)
सद्गुरुदेव सत्संग का आरंभ महाकवि श्री जयदेव गोस्वामी के अद्भुत जीवन चरित्र के स्मरण से करते हैं। उनका जन्म पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के किंदुबिल्व नामक स्थान पर हुआ था। वे वैष्णव जगत, विशेषकर माधुर्य लीला रस उपासकों के लिए एक प्रकाश स्तंभ के समान हैं। उनकी महान रचना 'गीत गोविंदम्' का काव्य-माधुर्य इतना विलक्षण है कि संस्कृत न जानने वाला भी श्रवण मात्र से भाव-विभोर हो जाता है। यह ग्रंथ राधा-कृष्ण की निभृत विलास माधुरी का ऐसा रस-निर्झर है जिसका आस्वादन स्वयं श्री चैतन्य महाप्रभु भी किया करते थे।
🔗 यह परिचय सत्संग की नींव रखता है, जिसमें श्री जयदेव गोस्वामी को एक आदर्श भक्त और कवि के रूप में स्थापित किया गया है।
🔥
तीव्र वैराग्य और संपत्ति का त्याग
पड़ोसी द्वारा संपत्ति हरण और श्री जयदेव की उदासीनता
▶ देखें (3:17) ▶ Watch (3:17)
माता-पिता के नित्य लीला में प्रवेश के बाद श्री जयदेव गोस्वामी के हृदय में संसार से तीव्र विरक्ति हो गई। भजन को ही उन्होंने जीवन का एकमात्र लक्ष्य बना लिया। उनकी इस उदासीनता को देखकर निरंजन नामक पड़ोसी ने उनकी सारी संपत्ति हड़प ली। परंतु श्री जयदेव पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा क्योंकि वे जानते थे कि विषय-वस्तु ही बंधन का कारण है। बाद में जब निरंजन के घर में आग लगी, तो श्री जयदेव ने अपने घर की तरह ही व्याकुल होकर उसे बुझाया। इस घटना से निरंजन लज्जित हुआ और संपत्ति लौटाने आया, पर श्री जयदेव सब कुछ त्याग कर श्री जगन्नाथ पुरी चले गए।
🔗 यह प्रसंग वैराग्य की पराकाष्ठा को दर्शाता है।
दैवी विधान: श्री पद्मावती से परिणय
श्री जगन्नाथ जी की प्रेरणा से सुदेव ब्राह्मण द्वारा अपनी कन्या पद्मावती का श्री जयदेव गोस्वामी को समर्पण।
🙏
सुदेव ब्राह्मण की प्रतिज्ञा
श्री जगन्नाथ जी का आदेश: कन्या का जयदेव को संप्रदान
▶ देखें (8:56) ▶ Watch (8:56)
जगन्नाथ पुरी में सुदेव नामक एक धर्मनिष्ठ ब्राह्मण ने श्री जगन्नाथ जी से संतान प्राप्ति पर उसे उनकी सेवा में समर्पित करने का संकल्प लिया था। कालांतर में एक कन्या का जन्म हुआ, जिसका नाम पद्मावती रखा गया। जब कन्या विवाह योग्य हुई, तो ब्राह्मण उसे लेकर मंदिर गए। वहाँ भगवान ने उन्हें (स्वप्न या साक्षात) आदेश दिया कि वे इस कन्या को जंगल में तपस्यारत उनके परम भक्त जयदेव को संप्रदान करें, क्योंकि वही इसके योग्य वर हैं।
🔗 यह प्रसंग भगवान की अपनी लीला और अपने भक्तों के योग-क्षेम की व्यवस्था को दर्शाता है।
💍
श्री जयदेव का विवाह से इनकार
पद्मावती का दृढ़ निश्चय और विवाह
▶ देखें (11:57) ▶ Watch (11:57)
जब सुदेव ब्राह्मण ने श्री जयदेव को जगन्नाथ जी का आदेश सुनाकर कन्या स्वीकार करने को कहा, तो जयदेव जी ने स्पष्ट मना कर दिया कि वे भजन में बाधा नहीं चाहते और न ही उनका गृहस्थी बसाने का विचार है। परंतु ब्राह्मण जगन्नाथ जी का आदेश बताकर पद्मावती को वहीं छोड़कर चले गए। जब श्री जयदेव ने पद्मावती से उनकी इच्छा पूछी, तो उन्होंने दृढ़ता से कहा, 'जगन्नाथ जी ने आदेश किया है, आप मानें या न मानें, मैं आपको पति रूप में वरण कर चुकी हूँ।' इस अनन्य निष्ठा के आगे जयदेव जी को झुकना पड़ा।
🔗 यह घटना भक्त की परीक्षा और दैवी विधान की प्रबलता को दर्शाती है।
गृहस्थ धर्म का यथार्थ स्वरूप
गृहस्थ आश्रम की आध्यात्मिक परिभाषा, उसके कर्तव्यों और धन, बल व विद्या के धर्मसम्मत उपयोग के महत्व को समझाना।
🏡
गृहस्थ आश्रम क्या है?
गृहस्थ धर्म: संतान, कर्म और 'दशांश' का विज्ञान
▶ देखें (19:03) ▶ Watch (19:03)
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि गृहस्थ का घर केवल भोग का स्थान नहीं, बल्कि 'आश्रम' (उपासना केंद्र) होना चाहिए, जहाँ संतानों को 'भगवती शिक्षा' मिले और आजीविका 'हरितोषणं' (भगवान की प्रसन्नता) के लिए हो। धन की शुद्धि के लिए उन्होंने 'फल और कंधे' का सुंदर दृष्टांत देकर समझाया कि जैसे एक व्यक्ति दूसरे के कंधे पर चढ़कर फल तोड़ता है, तो फल दोनों में बँटता है; वैसे ही जब गृहस्थ अपने धन से साधु-सेवा करता है, तो साधु के भजन का 'आध्यात्मिक फल' गृहस्थ को स्वतः मिल जाता है। इस 'आध्यात्मिक साझेदारी' को निभाने और अपने धन को पवित्र करने के लिए, महाराज जी निर्देश देते हैं कि हर गृहस्थ को अपनी कमाई का कम से कम **10% (दशांश)** हिस्सा परमार्थ में लगाना चाहिए। यदि यह हिस्सा नहीं निकाला जाता, तो धन में 'वित्त शाठ्य दोष' (कंजूसी/अशुद्धि) रह जाता है, जिससे व्यक्ति अगले जन्म में दरिद्र हो सकता है। अतः यह दान नहीं, बल्कि अपनी कमाई की शुद्धि और भगवत्-कृपा में हिस्सेदारी है।
🔗 यह शिक्षण स्पष्ट करता है कि सेवा 'मांग' नहीं, बल्कि गृहस्थ के स्वयं के कल्याण और धन-शुद्धि की अनिवार्य शर्त है।
श्रीमद् भागवतम् Srimad Bhagavatam 4.29.49
▶ 21:07
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
तत्कर्म हरितोषणं यत्सा विद्या तन्मतिर्यया।
कर्म वही है जिससे भगवान श्रीहरि प्रसन्न हों और विद्या वही है जिससे उन्हीं में मति लगे।
Skanda Purana Skanda Purana (Kumari Khanda)
▶ 35:01
संदर्भ पूरक संदर्भ
न्यायोपार्जितवित्तस्य दशमांशांशं समर्पयेत्। कर्तव्यं विनियोगं च ईश्वरप्रीत्यर्थमेव च॥
न्यायपूर्वक अर्जित धन का दसवां हिस्सा (10%) ईश्वर की प्रसन्नता और धर्म कार्यों के लिए समर्पित करना चाहिए।
Bhakti Rasamrita Sindhu 1.2.47 (Ref. Padma Purana)
▶ 35:50
संदर्भ पूरक संदर्भ
यथा विभवासार-संग्रहः... न कुर्यात् वित्तशाठ्यम्।
अपनी सामर्थ्य के अनुसार उपचारों का संग्रह करे... भगवान की सेवा में 'वित्त शाठ्य' (धन खर्च करने में कंजूसी/छल) न करे।
✅ करें:
  • घर को 'आश्रम' बनाएं और बच्चों को भक्त बनने का प्रोत्साहन दें।
  • धन को शुद्ध करने के लिए कमाई का 10% (दशांश) परमार्थ में लगाएं।
  • साधु के भजन में सहयोग देकर उसके पुण्य-फल के भागीदार बनें।
❌ न करें:
  • बच्चों को केवल भौतिक शिक्षा देकर आध्यात्मिक रूप से पंगु न बनाएं।
  • अपने हिस्से का धर्म (दान) न करके स्वयं को 'वित्त शाठ्य दोष' का भागी न बनाएं।
⚖️
धन, बल और विद्या का धर्म से संयोग
त्रिशक्ति का सदुपयोग और दुरुपयोग
▶ देखें (26:53) ▶ Watch (26:53)
सद्गुरुदेव एक महत्वपूर्ण सिद्धांत समझाते हैं कि मनुष्य को तीन शक्तियाँ चाहिए: धन, बल और विद्या। यदि इनका संबंध धर्म (भगवत् उपासना और परोपकार) से है, तो ये कल्याणकारी हैं - धन से सेवा, बल से रक्षा, और विद्या से समाज का उत्थान होता है। लेकिन यदि इनका संयोग अधर्म से हो जाए, तो ये महाविनाशकारी बन जाते हैं; धन विलास में, बल अत्याचार में, और विद्या शोषण (जैसे डॉक्टर द्वारा किडनी निकालना) में लग जाती है। धर्म ही वह तत्व है जो पशुता और मनुष्यता में भेद करता है।
🔗 यह विश्लेषण साधक को आत्म-निरीक्षण करने के लिए प्रेरित करता है।
⚖️ धन, बल और विद्या: धर्म के साथ vs धर्म के बिना
धर्म के साथ (मंगलकारी): धन: सेवा में। बल: रक्षा में। विद्या: समाज कल्याण में।
धर्म के बिना (विनाशकारी): धन: विलास में। बल: अत्याचार में। विद्या: शोषण और घोटाले में।
सेवा और साहित्य की महिमा
श्री जयदेव और पद्मावती के सेवामय गृहस्थ जीवन, साधु सेवा के महत्व और 'गीत गोविंदम्' की अलौकिक प्रसिद्धि का वर्णन करना।
🤝
साधु सेवा: भगवान को भोजन कराने का माध्यम
अदृश्य सत्य: संत के मुख से भगवान का भोजन
▶ देखें (33:09) ▶ Watch (33:09)
सद्गुरुदेव सेवा का एक अत्यंत गूढ़ रहस्य उजागर करते हैं। वे कहते हैं कि गृहस्थ अक्सर सोचता है कि वह साधु पर उपकार कर रहा है, लेकिन सत्य इसके विपरीत है। शास्त्रों (पद्म पुराण) के अनुसार, जिस गृहस्थ के घर में भगवत् भक्त भोजन करते हैं, वहाँ उस भक्त के मुख से स्वयं भगवान श्री हरि भोजन ग्रहण करते हैं। भक्त के तृप्त होने पर तीनों लोक तृप्त हो जाते हैं। अतः साधु सेवा केवल पुण्य कमाना नहीं, बल्कि साक्षात भगवान को अपने घर में भोजन कराने का सुलभ उपाय है।
🔗 यह कार्ड सेवा को 'कर्तव्य' (Duty) से ऊपर उठाकर 'दिव्य अवसर' (Divine Opportunity) के रूप में स्थापित करता है।
Padma Purana
▶ 33:09
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
यस्य गृहे भगवद्भक्ताः तस्य गृहे हरिर्भुङ्क्ते स्वयं तृप्यति जगत्त्रयम्।
जिसके घर में भक्त भोजन करते हैं, वहाँ स्वयं भगवान खाते हैं और तीनों लोक तृप्त हो जाते हैं।
Adi Purana
▶ 36:36
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
मद्भक्तानां च ये भक्तास्ते मे भक्ततमा मताः॥
जो मेरे भक्तों के भक्त हैं (उनकी सेवा करते हैं), वे ही मेरे परम श्रेष्ठ भक्त हैं।
🙏
संत सेवा के कड़े नियम और विधि
सेवा की मर्यादा: स्वोपार्जित धन और कायिक सेवा
▶ देखें (53:00) ▶ Watch (53:00)
महाराज जी सेवा के अत्यंत गूढ़ और कड़े नियम बताते हैं। 1. भगवान कैसे खाते हैं: जिस घर में संत का आदर नहीं, वहाँ भगवान झांकते भी नहीं। भगवान संत के मुख से ही भोजन का रसास्वादन करते हैं। 2. धन की शुद्धता: सेवा केवल 'स्वोपार्जित अर्थ' (Hard-earned money) से होनी चाहिए। यदि दूषित धन है, तो ऐसी सेवा से साधु का भी अकल्याण होता है और दाता का भी। 3. धन न हो तो: यदि धन नहीं है, तो 'तन' (कायिक) और 'मन/वचन' (वाचिक) से सेवा करनी चाहिए। राधा रानी ने भेजा है, तो किसी न किसी रूप में सेवा अनिवार्य है। 4. सेवा का अर्थ: केवल राजभोग खिलाना या धन देना सेवा नहीं है। सेवा का अर्थ है 'प्रीति संपादन'—संत के हृदय को प्रसन्न करना और उनके भजन में सहयोग देना।
🔗 यह खंड सेवा की 'शुद्धता' पर जोर देता है, न कि 'मात्रा' पर।
✅ करें:
  • यदि धन नहीं है, तो शरीर से सेवा करें।
  • केवल ईमानदारी की कमाई (स्वोपार्जित धन) ही सेवा में लगाएं।
  • संतों को भगवान का स्वरूप मानकर आदर दें।
❌ न करें:
  • अधर्म या दो नंबरी कमाई से साधु सेवा न करें (यह पाप है)।
  • बिना श्रद्धा के केवल दिखावे के लिए दान न करें।
📌 सेवा के प्रकार:
  • कायिक सेवा (शरीर से श्रम)
  • वाचिक/मानसिक सेवा (आदर और प्रीति)
  • आर्थिक सेवा (केवल शुद्ध कमाई से)
🎶
'गीत गोविंदम्' की अलौकिक प्रसिद्धि
भगवान को मोहित करने वाला काव्य
▶ देखें (38:19) ▶ Watch (38:19)
'गीत गोविंदम्' की महिमा का वर्णन करते हुए सद्गुरुदेव बताते हैं कि इसकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई थी। एक बार एक लड़की बैंगन के खेत में काम करते हुए 'गीत गोविंदम्' गा रही थी। उसकी मधुर और भावपूर्ण ध्वनि सुनकर साक्षात श्री जगन्नाथ देव इतने मंत्रमुग्ध हो गए कि वे उसके पीछे-पीछे खेत में चले गए, जिससे काँटों में उलझकर उनके वस्त्र तक फट गए। सद्गुरुदेव यह भी बताते हैं कि 'गीत गोविंदम्' का महात्म्य इतना है कि उनके स्वयं के आश्रम में भी उनके गुरुदेव के समय से ही प्रतिदिन 'गीत गोविंद' का गायन (कीर्तन) नियमित रूप से होता आ रहा है।
🔗 यह कथा भक्त की भावपूर्ण रचना की शक्ति को दर्शाती है।
👑
राजा और जयदेव: भगवान की पसंद
राजा का दावा और असली 'गीत गोविंद' का निर्णय
▶ देखें (41:20) ▶ Watch (41:20)
महाराज जी बताते हैं कि उड़ीसा के तत्कालीन राजा, जो स्वयं भी एक भक्त थे, ने भी एक 'गीत गोविंद' की रचना की। राजा ने चारों ओर यह प्रचार करवा दिया कि 'मेरा लिखा हुआ ग्रंथ ही असली (Original) गीत गोविंद है'। असली और नकली का निर्णय करने के लिए दोनों पोथियाँ जगन्नाथ जी के मंदिर में रख दी गईं। जब पट खुले, तो जयदेव जी का ग्रंथ भगवान की गोद में था और राजा का ग्रंथ दूर फेंका हुआ था। यह सिद्ध हुआ कि भगवान को राजा का वैभव नहीं, बल्कि जयदेव जी की 'रसपूर्ण' भक्ति प्रिय है।
🔗 यह प्रसंग सिद्ध करता है कि भगवान केवल प्रेम और 'रस' के वश में हैं।
दिव्य हस्तक्षेप: कृपा की पराकाष्ठा
उस अद्भुत लीला का वर्णन करना जहाँ स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने श्री जयदेव का रूप धरकर 'गीत गोविंदम्' का एक विवादास्पद श्लोक पूरा किया।
✍️
'देहि पद पल्लव मुदारम्' प्रसंग
कवि का संकोच और भगवान का आगमन
▶ देखें (44:26) ▶ Watch (44:26)
श्री जयदेव 'स्मरगरलखण्डनं मम शिरसि मण्डनम्' पंक्ति तक लिखकर अटक गए। उनके मन में भाव आया कि भगवान कृष्ण राधा जी से कह रहे हैं: 'देहि पद पल्लव मुदारम्' (अपने चरण मेरे मस्तक पर रख दो)। इसे मर्यादा विरुद्ध मानकर वे स्नान करने चले गए। उनके जाने के बाद, स्वयं भगवान श्री कृष्ण, श्री जयदेव का रूप धारण करके आए और अपनी पुस्तिका में वही पंक्ति लिखकर श्लोक पूरा कर दिया।
🔗 यह प्रसंग भक्त और भगवान के बीच के गहरे संबंध को उजागर करता है।
Sri Git Govindam Sri Git Govindam 10.8
▶ 48:06
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
स्मरगरलखण्डनं मम शिरसि मण्डनम् । देहि पदपल्लवमुदारम् ॥
smaragaralakhaṇḍanaṁ mama śirasi maṇḍanam | dehi padapallavamudāram ||
तुम्हारे विरह रूपी (कामदेव के) विष का नाश करने वाले और मेरे मस्तक के आभूषण स्वरूप, अपने इन उदार चरण-कमलों को (मेरे मस्तक पर) रख दो।
🍚
भगवान द्वारा श्लोक पूर्ति और प्रसाद ग्रहण
पद्मावती के हाथ से प्रसाद और जयदेव का आश्चर्य
▶ देखें (47:35) ▶ Watch (47:35)
श्लोक लिखने के बाद, भगवान ने पद्मावती जी से भोजन माँगा और उनके हाथ से प्रेमपूर्वक प्रसाद ग्रहण किया। जब खुद श्री जयदेव स्नान करके लौटे, तो उन्होंने पद्मावती को अपने (भगवान के) जूठे पत्तल में खाते देखा। जयदेव जी के पूछने पर पद्मावती ने चकित होकर कहा, 'आप ही तो अभी लिखकर और खाकर गए हैं!' ग्रंथ में भगवान के हस्तलिखित अक्षर देखकर जयदेव जी को पूरी लीला समझ आ गई।
🔗 यह लीला भगवान की भक्त-वात्सल्यता की पराकाष्ठा है।
😭
श्री जयदेव का भाव-विभोर होना
भक्त का अद्भुत भाव: पत्नी के सौभाग्य पर आनंद के आँसू
▶ देखें (51:23) ▶ Watch (51:23)
लीला का रहस्य जानकर श्री जयदेव फूट-फूट कर रोने लगे। उन्होंने कहा, 'पद्मावती, मैं इसलिए रो रहा हूँ कि तुम मुझसे भी अधिक भाग्यशालिनी हो। देखो, साक्षात भगवान गोविंद तुम्हारा हाथ का खाना खाकर गए और मुझे उनके दर्शन भी नहीं मिले।' अपनी पत्नी के इस परम सौभाग्य को देखकर वे ईर्ष्या नहीं, बल्कि अहोभाग्य मानते हुए उन्हें बार-बार दंडवत प्रणाम करने लगे।
🔗 यह एक भक्त के हृदय की निर्मलता और निश्छलता का सर्वोच्च उदाहरण है।
❓ प्रश्न: जयदेव जी क्यों रोए? ▶ 52:00
💡 उत्तर: 💡 उत्तर: जयदेव जी इसलिए रोए क्योंकि वे अपनी पत्नी के महान भाग्य को देखकर गदगद हो गए कि साक्षात गोविंद ने उनके हाथ से भोजन स्वीकार किया। वे ईर्ष्यावश नहीं, बल्कि 'वैष्णव दैन्य' (विनम्रता) के कारण रोए और 'अहोभाग्यम' कहते हुए अपनी पत्नी को ही दंडवत प्रणाम करने लगे। उन्होंने माना कि पद्मावती की भक्ति उनसे श्रेष्ठ है।
स्पष्टीकरण (Clarification)

यह सारांश AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग गुरु सेवा में करके तैयार किया गया है। इसमें त्रुटि हो सकती है। कृपया पूर्ण लाभ के लिए पूरा वीडियो अवश्य देखें।

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