भक्त जयदेव: भगवत कृपा की गाथा
भक्त जयदेव: भगवत कृपा की गाथा
यह सत्संग महाकवि श्री जयदेव गोस्वामी के पावन जीवन पर केंद्रित है। सद्गुरुदेव उनके जन्म, तीव्र वैराग्य, श्री जगन्नाथ जी के आदेश से पद्मावती जी से विवाह, और 'गीत गोविंदम्' की रचना की दिव्य कथा का वर्णन करते हैं। सत्संग का सार यह है कि सच्चा गृहस्थ आश्रम भोग के लिए नहीं, बल्कि भगवत् उपासना, संत सेवा और धर्म के निर्वहन के लिए है। धन, बल और विद्या का धर्म के साथ संयोग ही मंगलकारी है। सत्संग में भगवान की भक्त-वात्सल्यता का अद्भुत दृष्टांत प्रस्तुत किया गया है, जहाँ स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने श्री जयदेव का रूप धरकर 'देहि पद पल्लव मुदारम्' श्लोक को पूर्ण किया और उनकी पत्नी पद्मावती के हाथ से प्रसाद ग्रहण किया। अंत में संत सेवा की मर्यादा और विधि पर विशेष प्रकाश डाला गया है।
📖 आज की शिक्षाएं 📖 आज की विस्तृत शिक्षाएं
- घर को 'आश्रम' बनाएं और बच्चों को भक्त बनने का प्रोत्साहन दें।
- धन को शुद्ध करने के लिए कमाई का 10% (दशांश) परमार्थ में लगाएं।
- साधु के भजन में सहयोग देकर उसके पुण्य-फल के भागीदार बनें।
- बच्चों को केवल भौतिक शिक्षा देकर आध्यात्मिक रूप से पंगु न बनाएं।
- अपने हिस्से का धर्म (दान) न करके स्वयं को 'वित्त शाठ्य दोष' का भागी न बनाएं।
- यदि धन नहीं है, तो शरीर से सेवा करें।
- केवल ईमानदारी की कमाई (स्वोपार्जित धन) ही सेवा में लगाएं।
- संतों को भगवान का स्वरूप मानकर आदर दें।
- अधर्म या दो नंबरी कमाई से साधु सेवा न करें (यह पाप है)।
- बिना श्रद्धा के केवल दिखावे के लिए दान न करें।
- कायिक सेवा (शरीर से श्रम)
- वाचिक/मानसिक सेवा (आदर और प्रीति)
- आर्थिक सेवा (केवल शुद्ध कमाई से)
यह सारांश AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग गुरु सेवा में करके तैयार किया गया है। इसमें त्रुटि हो सकती है। कृपया पूर्ण लाभ के लिए पूरा वीडियो अवश्य देखें।
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