श्री भगवत चर्चा
13 January 2026
स्वरूप विस्मृति: जीव के बंधन का मूल कारण
स्वरूप विस्मृति: जीव के बंधन का मूल कारण
Sri Sri 108 Sri Vinod Baba ji Maharaj
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संक्षेप
विस्तार
हमारे प्रिय सद्गुरुदेव बताते हैं:
"
संसार क्या है? एक भूल। मुक्ति क्या है? ये भूल को मिटाना। साधना क्या है? भूल को मिटाना है, और कुछ नहीं।
"
"
हमने 'अपना' (भगवान) को पराया कर दिया, और 'पराया' (शरीर) को अपना मान लिया। बस यही एक भूल संसार है।
"
स्वरूप विस्मृति (4)भूल (12)तादात्मता (6)आगंतुक (2)ब्रजवास (5)माधुर्य उपासना (2)संत कृपा (3)
🔍 सत्संग सार (Executive Summary)
यह सत्संग जीव के वास्तविक स्वरूप (भगवदंश, चेतन, आनंदमय) और उसके संसार-बंधन के मूल कारण 'स्वरूप विस्मृति' पर केंद्रित है। सद्गुरुदेव समझाते हैं कि शरीर से तादात्म्य ही समस्त दुखों की जड़ है, जिसे केवल संत कृपा से प्राप्त ज्ञान और विवेक द्वारा मिटाया जा सकता है। सत्संग में श्री इंद्रेश उपाध्याय जी ने ब्रज-उपासना का सार प्रस्तुत करते हुए बताया कि प्रिया-प्रियतम से कुछ मांगना नहीं चाहिए, अपितु उनके सुख में ही सुखी रहना चाहिए। अंत में, हरिद्वार से पधारे संत ने राधिका जी की अनन्य निष्ठा का वर्णन कर सभी को आशीर्वाद प्रदान किया।
🧱 ज्ञान प्रवाह
graph TD;
subgraph "सद्गुरुदेव का उपदेश"
A["🎙️ सद्गुरुदेव"] --> B["जीव का वास्तविक स्वरूप (भगवदंश)"];
B --> C["बंधन का कारण: स्वरूप विस्मृति"];
C --> D["दो मौलिक भूलें: अपना को पराया, पराया को अपना"];
D --> E["दृष्टांत: स्वप्न, बबूल का पेड़"];
C --> F["अहंकार की दो वृत्तियाँ: जड़-वृत्ति vs चित्-वृत्ति"];
F --> G["साधना का लक्ष्य: भूल को मिटाना"];
G --> H["भगवत् स्वरूप के त्रिविध प्रकाश"];
H --> I["सर्वोच्च उपासना: माधुर्य भाव (मंजरी भाव)"];
end
subgraph "श्री इंद्रेश उपाध्याय जी का उद्बोधन"
J["🎙️ श्री इंद्रेश उपाध्याय जी"] --> K["बरसाना-नंदगाँव की महिमा"];
K --> L["मुख्य सिद्धांत: प्रिया-प्रियतम से मांगना नहीं"];
L --> M["दृष्टांत: श्री कोकिल साईं की कथा"];
L --> N["दृष्टांत: स्वरूप सरकार और संत की कथा"];
N --> O["ब्रजवास की शर्त: 'स्व' का त्याग"];
end
subgraph "हरिद्वार के संत का आशीर्वचन"
P["🎙️ हरिद्वार के संत"] --> Q["आशीर्वचन एवं प्रणाम"];
Q --> R["दृष्टांत: श्रीकृष्ण के पत्र और राधिका जी का उत्तर"];
end
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भाग १: बंधन का तात्विक विश्लेषण (सद्गुरुदेव)
जीव के वास्तविक स्वरूप, संसार बंधन के मूल कारण (स्वरूप विस्मृति), और संत कृपा की अनिवार्यता को तात्विक रूप से समझाना।
🕉️
जीव का वास्तविक स्वरूप और बंधन
जीवात्मा का सच्चिदानंद स्वरूप और माया से तादात्म्य
▶ देखें (1:16)
▶ Watch (1:16)
सद्गुरुदेव सत्संग का आरंभ जीव के वास्तविक स्वरूप का वर्णन करते हुए करते हैं। जीव वस्तुतः भगवान का अविनाशी अंश, चेतन, निर्मल और सहज सुख की राशि है। परन्तु माया के साथ तादात्म्य के कारण वह स्वयं को पंचभौतिक शरीर मानकर 84 लाख योनियों में भ्रमण कर रहा है।
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि जीवात्मा का मूल स्वरूप सत्, चित् और आनंदमय है। वह माया, गुण और इंद्रियों से परे है। तथापि, माया के प्रभाव में आकर और गुणों से संक्रमित होकर वह इस पंचभौतिक शरीर से तादात्म्य स्थापित कर लेता है। यही तादात्म्य उसे शरीरधारी बनाकर अनादि काल से संसार चक्र में घुमा रहा है। इस चक्र से मुक्ति तब तक संभव नहीं जब तक किसी महापुरुष की कृपा प्राप्त न हो।
🔗 यह विषय सत्संग की आधारशिला रखता है, जिसमें जीव के पतन का मूल कारण और उसके उद्धार की दिशा का संकेत दिया गया है।
भगवद् गीता 15.7भगवद् गीता 15.7
▶ 1:46
पूरक संदर्भ (Siddhant)
पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव जीव के स्वरूप का वर्णन करते हैं कि वह भगवान का अंश, अविनाशी, चेतन, शुद्ध, स्वाभाविक रूप से आनंदमय, मायातीत, गुणातीत और इंद्रियातीत आत्मा है।
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः। मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥
इस संसार में जीव मेरा ही सनातन अंश है। वह मन सहित छह इंद्रियों को प्रकृति में स्थित होकर आकर्षित करता है।
भगवद् गीता 2.20भगवद् गीता 2.20
▶ 1:46
पूरक संदर्भ (Siddhant)
पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव जीव के स्वरूप का वर्णन करते हैं कि वह भगवान का अंश, अविनाशी, चेतन, शुद्ध, स्वाभाविक रूप से आनंदमय, मायातीत, गुणातीत और इंद्रियातीत आत्मा है।
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
आत्मा न कभी जन्म लेती है और न मरती है; न यह होकर फिर न होने वाली है। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है; शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारी जाती।
भगवद् गीता 13.22सद्गुरुदेव द्वारा उच्चारित
▶ 2:08
सद्गुरुदेव द्वारा उच्चारित
सद्गुरुदेव द्वारा उच्चारित
सद्गुरुदेव बताते हैं कि जीव शरीरधारी बनकर चौरासी लाख योनियों में बार-बार जन्म लेता है, जो उसके कर्मों और प्रकृति के गुणों के संग के कारण होता है।
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्। कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु॥
प्रकृति में स्थित पुरुष प्रकृति से उत्पन्न गुणों को भोगता है। गुणों का संग ही इसके अच्छी-बुरी योनियों में जन्म का कारण है।
श्रीमद् भागवतम् 10.51.53सद्गुरुदेव द्वारा उच्चारित
सद्गुरुदेव सत्संग महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि जब जीव के भव-बंधन से मुक्त होने का समय आता है, तभी उसे महापुरुषों का संग प्राप्त होता है।
भवापवर्गो भ्रमतो यदा भवेज्जनस्य तर्ह्यच्युत सत्समागमः। सत्सङ्गमो यर्हि तदैव सद्गतौ परावरेशे त्वयि जायते मतिः॥
bhavāpavargo bhramato yadā bhavej janasya tarhy acyuta sat-samāgamaḥ
हे अच्युत! संसार चक्र में भटकते हुए जीव का जब भव-बंधन से छूटने का समय आता है, तभी उसे संतों का समागम प्राप्त होता है। और जब सत्संग प्राप्त होता है, तभी आप में (ईश्वर में) उसकी मति लगती है।
🔗
स्वप्न का दृष्टांत: संसार की मिथ्या प्रतीति
जाग्रत अवस्था का स्वप्न: शरीर से तादात्म्य
▶ देखें (5:12)
▶ Watch (5:12)
सद्गुरुदेव संसार की प्रतीति को समझाने के लिए स्वप्न का दृष्टांत देते हैं। जैसे स्वप्न में एक काल्पनिक शरीर द्वारा काल्पनिक संसार का भोग होता है, वैसे ही जाग्रत अवस्था में यह शरीर और संसार भी स्वप्नवत ही हैं।
सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि स्वप्न और जाग्रत अवस्था में एक सूक्ष्म भेद है। स्वप्न में शरीर और संसार दोनों ही नहीं होते, जबकि जाग्रत अवस्था में शरीर और संसार तो हैं, परन्तु 'यह शरीर मैं हूँ' यह भाव स्वप्न के समान ही मिथ्या है। यह शरीर न मैं हूँ, न मेरा है, और न ही इससे हमारा कोई नित्य सम्बन्ध है। इसी मिथ्या तादात्म्य के कारण जीव अपने वास्तविक स्वरूप को भूल गया है।
🔗 यह दृष्टांत 'शरीर मैं नहीं हूँ' इस साधना के मूल सिद्धांत को बहुत सरलता से स्पष्ट करता है।
❗
बंधन का मूल: स्वरूप विस्मृति
कर्मानुसार शरीर प्राप्ति और स्वरूप विस्मृति का चक्र
▶ देखें (6:33)
▶ Watch (6:33)
सद्गुरुदेव बंधन का मूल कारण 'स्वरूप विस्मृति' को बताते हैं। जब तक जीव अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित नहीं होता, तब तक वह विकारों और संसार चक्र से मुक्त नहीं हो सकता। कर्मानुसार उसे विभिन्न शरीर प्राप्त होते रहते हैं।
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि संसार बंधन का मूल कारण अपने सच्चिदानंद स्वरूप को भूल जाना है। यह विस्मृति ही संसार है। जब तक हम अपने स्वरूप में पुनः स्थित नहीं हो जाते, तब तक इस चक्र से मुक्ति असंभव है। जीव अपने शुभ-अशुभ कर्मों और मृत्यु के समय की भावना के अनुसार अगला शरीर प्राप्त करता है, इसमें भगवान का सीधा हस्तक्षेप नहीं होता। सद्गुरुदेव इस सिद्धांत की पुष्टि हेतु श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक का उल्लेख करते हैं।
🔗 यह कार्ड सीधे तौर पर सत्संग के केंद्रीय विषय को परिभाषित करता है और कर्म के सिद्धांत को स्पष्ट करता है।
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सद्गुरुदेव बताते हैं कि संसार एक भूल है, और यह भूल दो प्रकार की है: हमने अपने (भगवान) को पराया कर दिया और पराए (शरीर-संसार) को अपना मान लिया।
सद्गुरुदेव साधना का सार बताते हुए कहते हैं कि हमें केवल एक भूल को सुधारना है। पहली भूल यह है कि हमने अपने सबसे प्रियतम, नित्य संबंधी भगवान को भुलाकर पराया मान लिया है। दूसरी भूल यह है कि जिस पंचभौतिक, आगंतुक शरीर और संसार से हमारा कभी कोई संबंध था ही नहीं, उसे हमने 'मैं' और 'मेरा' मान लिया है। इन्हीं दो भूलों के कारण हम संसार चक्र में फंसे हुए हैं।
🔗 यह विश्लेषण साधक को अपनी साधना की दिशा स्पष्ट करता है कि उसे बाहरी क्रियाओं से अधिक अपनी आंतरिक मान्यता को बदलना है।
भगवद् गीता 7.14भगवद् गीता 7.14
▶ 10:08
पूरक संदर्भ (Siddhant)
पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव संसार को स्वप्नवत और मिथ्या बताते हुए कहते हैं कि माया के कारण ही जीव अपने वास्तविक स्वरूप और भगवान से अपने संबंध को भूल जाता है।
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥
मेरी यह दैवी, गुणमयी माया दुस्तर है। जो मुझको ही भजते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं।
भगवद् गीता 2.27सद्गुरुदेव द्वारा उच्चारित
▶ 11:12
सद्गुरुदेव द्वारा उच्चारित
सद्गुरुदेव द्वारा उच्चारित
सद्गुरुदेव शरीर की नश्वरता का वर्णन करते हैं कि यह पंचभौतिक शरीर गर्भ में उत्पन्न होता है और श्मशान में समाप्त हो जाता है, यह केवल एक आगंतुक है।
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च। तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥
क्योंकि जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है। अतः इस अपरिहार्य विषय में तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।
भगवद् गीता 2.13सद्गुरुदेव द्वारा उच्चारित
▶ 13:27
सद्गुरुदेव द्वारा उच्चारित
सद्गुरुदेव द्वारा उच्चारित
सद्गुरुदेव यह समझाने के लिए कि आत्मा शरीर से भिन्न है, तर्क देते हैं कि यदि 'मैं' शरीर होता, तो शरीर के साथ बदल जाता, लेकिन 'मैं' तो बालकपन, जवानी आदि के बदलने पर भी वही रहता हूँ।
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा। तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥
जिस प्रकार देहधारी आत्मा इस देह में बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था को प्राप्त करती है, उसी प्रकार वह अन्य शरीर को भी प्राप्त करती है। धीर पुरुष इसमें मोहित नहीं होता।
⚖️ दो मौलिक भूलें
अपना को पराया करना: भगवान, जो हमारे नित्य संबंधी, सबसे निकटतम और प्रियतम हैं, उन्हें भूलकर उनसे विमुख हो जाना।
पराया को अपनाना: यह शरीर और सांसारिक संबंध, जो आगंतुक और नश्वर हैं, उन्हें सत्य और अपना मान लेना।
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सद्गुरुदेव बबूल और बरसाना के सूखे पेड़ों का दृष्टांत देकर समझाते हैं कि जब तक अज्ञानता रूपी बीज नष्ट नहीं होता, तब तक वासनाएं पुनः अंकुरित हो जाती हैं।
सद्गुरुदेव उपमा देते हैं कि जैसे बबूल के पेड़ को ऊपर से काटने पर भी जड़ रहने के कारण वह वर्षा का जल पाते ही फिर से हरा-भरा हो जाता है, उसी प्रकार साधन-भजन द्वारा वासनाओं को दबाने पर भी अज्ञानता ('मैं शरीर हूँ') रूपी बीज अंतःकरण में पड़ा रहता है। जब इस बीज को विषय रूपी वर्षा का संपर्क मिलता है, तो कामना-वासनाएं पुनः प्रबल हो उठती हैं। इसलिए, साधना का लक्ष्य इस बीज को ही नष्ट करना है।
🔗 यह दृष्टांत सतही भजन और तात्विक भजन के अंतर को स्पष्ट करता है, और जड़ से काम करने की आवश्यकता पर बल देता है।
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सद्गुरुदेव अहंकार की दो वृत्तियों का वर्णन करते हैं: 'जड़-वृत्ति' जो कहती है 'मैं शरीर हूँ' और 'चित्-वृत्ति' जो कहती है 'मैं राधारानी का हूँ'।
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि अहंकार की दो प्रवृत्तियाँ हैं। पहली है जड़-वृत्ति या जड़-अभिमान, जो शरीर में 'मैं'-पन का भाव है और यही बंधन का कारण है। दूसरी है चित्-वृत्ति या चिद-अभिमान, जो यह बोध है कि 'मैं शरीर नहीं, मैं चिन्मय, दिव्य, आनंदमय आत्मा हूँ और मैं श्री राधारानी का नित्य दास हूँ'। गुरु कृपा से जब साधक इस चिद-अभिमान में स्थित होता है, तभी उसकी साधना सही अर्थों में प्रारंभ होती है।
🔗 यह वर्गीकरण साधक को अहंकार को शत्रु मानने के बजाय उसे सही दिशा में मोड़ने की कला सिखाता है, जो भक्ति मार्ग का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है।
⚖️ अहंकार की दो वृत्तियाँ
जड़-वृत्ति (जड़-अभिमान): मैं यह पंचभौतिक शरीर हूँ। यह संसार और इसके पदार्थ मेरे हैं। यह बंधन का कारण है।
चित्-वृत्ति (चिद-अभिमान): मैं चिन्मय आत्मा, श्री राधा रानी का नित्य किंकर हूँ। यह मुक्ति और प्रेम का मार्ग है।
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सद्गुरुदेव क्रियात्मक और वास्तविक भजन के बीच अंतर स्पष्ट करते हैं। जब तक 'मैं शरीर नहीं हूँ' इस बोध की जागृति नहीं होती, तब तक भजन केवल एक बाहरी क्रिया बनकर रह जाता है।
सद्गुरुदेव बल देकर कहते हैं कि यदि हमारी चेतना का जागरण नहीं हुआ और संसार के दुःखों से निवृत्ति का आग्रह नहीं है, तो हमारा भजन 'क्रियात्मक' है, जिसमें प्राण नहीं है। भजन का प्राण है 'जानना' और 'मानना'। यह जान लो कि भगवान हमारे अपने थे, हैं और रहेंगे। और यह मान लो कि संसार हमारा कभी था नहीं, है नहीं और हो नहीं सकता। जब यह जानना और मानना एक हो जाता है, तब भजन सिद्ध होता है।
🔗 यह उपदेश साधकों को आत्म-निरीक्षण करने के लिए प्रेरित करता है कि उनका भजन केवल शारीरिक क्रिया है या उसमें तात्विक बोध भी सम्मिलित है।
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भगवत् स्वरूप के त्रिविध प्रकाश और माधुर्य उपासना
वृन्दावन उपासना की विशिष्टता: माधुर्य और प्रेम
▶ देखें (23:46)
▶ Watch (23:46)
सद्गुरुदेव भगवान के स्वरूप के तीन प्रकाशों - ज्ञानमय, ऐश्वर्यमय और माधुर्यमय - का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि माधुर्यमय प्रकाश का केंद्र वृन्दावन है, जहाँ भगवान और भक्त के बीच परम आत्मीयता का प्रेममय संबंध है।
सद्गुरुदेव विभिन्न उपासना मार्गों का उल्लेख करते हुए भगवत् स्वरूप के तीन मुख्य प्रकाशों को स्पष्ट करते हैं: ब्रह्म (ज्ञानमय प्रकाश), परमात्मा (ऐश्वर्यमय प्रकाश), और भगवान (माधुर्यमय प्रकाश)। माधुर्यमय प्रकाश का पूर्ण प्राकट्य वृन्दावन में होता है, जहाँ द्विभुज मुरलीधर श्रीकृष्ण अपने भक्तों के प्रेम के अधीन होकर उनके पीछे-पीछे अनुगमन करते हैं। यह वृन्दावन उपासना की अद्वितीय विशेषता है, जहाँ प्रेम ही एकमात्र साध्य और साधन है।
🔗 यह खंड विभिन्न उपासना पद्धतियों के बीच वृन्दावन की माधुर्य उपासना की सर्वोच्चता और विशिष्टता को स्थापित करता है।
श्रीमद् भागवतम् 9.4.63श्रीमद् भागवतम् 9.4.63
▶ 24:48
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव वृंदावन उपासना की विशेषता बताते हुए कहते हैं कि यहाँ भगवान अपने भक्तों के प्रेम में मोहित होकर उनके पीछे-पीछे चलते हैं, वे स्वयं को भक्तों के अधीन मानते हैं।
अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतंत्र इव द्विज। साधुभिर्ग्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः॥
हे द्विज! मैं भक्तों के अधीन हूँ, मानो मैं स्वतंत्र नहीं हूँ। साधुओं ने मेरे हृदय को अपने वश में कर लिया है, और मैं भक्तों का प्रिय हूँ।
📌 भगवत् स्वरूप के तीन प्रकाश:
- ज्ञानमय प्रकाश (ब्रह्म)
- ऐश्वर्यमय प्रकाश (परमात्मा)
- माधुर्यमय प्रकाश (भगवान - वृन्दावन)
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मंजरी भाव: माधुर्य उपासना की पराकाष्ठा
प्रेम की उन्नत दशाएं और पंचविधा सखी
▶ देखें (25:51)
▶ Watch (25:51)
सद्गुरुदेव माधुर्य उपासना की चरम स्थिति 'मंजरी भाव उपासना' का परिचय देते हैं, जहाँ साधक श्री राधा रानी की सहचरी के रूप में युगल-लीला माधुरी का आस्वादन करता है।
सद्गुरुदेव बताते हैं कि प्रेम प्राप्ति के बाद भी कई उन्नत अवस्थाएं हैं जैसे स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग, भाव और महाभाव। माधुर्य उपासना की पराकाष्ठा 'मंजरी भाव' है, जिसमें साधक श्री राधा रानी के भाव से पुष्ट होकर उनकी सखी या मंजरी के रूप में युगल सेवा का अधिकार प्राप्त करता है। यह कृपा साध्य अवस्था है। सद्गुरुदेव पंचविधा सखियों (सखी, प्रिय सखी, प्रियनर्म सखी, प्राण सखी, नित्य सखी) का भी संक्षिप्त उल्लेख करते हैं।
🔗 यह विषय गौड़ीय वैष्णव दर्शन के गूढ़तम सिद्धांतों में से एक का परिचय देता है, जो वृन्दावन उपासना का अंतिम लक्ष्य है।
भाग २: ब्रज-रस का मर्म (श्री इंद्रेश उपाध्याय जी)
ब्रज में निवास और उपासना के सही भाव को कथाओं और दृष्टांतों के माध्यम से प्रकट करना, विशेष रूप से 'मांगने' के भाव का निषेध करते हुए।
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बरसाना और नंदगाँव की अचल महिमा
ब्रजभूमि का चिन्मय स्वरूप
🎙️ Shri Indresh Ji
▶ देखें (36:18)
▶ Watch (36:18)
श्री इंद्रेश उपाध्याय जी बताते हैं कि बरसाना धाम साक्षात श्री किशोरी जी का अचल स्वरूप है और नंदगाँव श्री ठाकुर जी का। यहाँ प्रवेश मात्र से जीव सहचरी स्वरूप को प्राप्त कर लेता है।
श्री इंद्रेश जी अपने उद्बोधन का आरंभ बरसाना और नंदगाँव की महिमा से करते हैं। वे कहते हैं कि यह भूमि जड़ नहीं, अपितु साक्षात श्री प्रिया-प्रियतम का ही विग्रह स्वरूप है। वृन्दावन शतक का प्रमाण देते हुए वे बताते हैं कि ब्रजमंडल में प्रवेश करने वाला एक कीट-पतंग भी सच्चिदानंद स्वरूप हो जाता है। उसी प्रकार, बरसाना में प्रवेश करने वाला जीव सहचरी-स्वरूप को प्राप्त कर लेता है, क्योंकि यह भूमि स्वयं श्री लाड़ली जी हैं।
🔗 यह खंड ब्रजभूमि के प्रति जड़-बुद्धि का त्याग कर चिन्मय-बुद्धि धारण करने का महत्व स्थापित करता है, जो ब्रज-उपासना का प्रथम सोपान है।
Vrindavana Shataka Verse 1Vrindavana Shataka Verse 1
▶ 36:50
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव बरसाना और नंदगाँव की महिमा का वर्णन करते हुए वृंदावन शतक के इस श्लोक का पाठ करते हैं, जिसका अर्थ है कि वृंदावन में प्रवेश करने वाला हर जीव आनंद सच्चिदानंद स्वरूप हो जाता है।
यत्र प्रविष्टः सकलोऽपि जन्तुरानन्दसच्चिद्घनतामुपैति। तं प्रेमधामानमहो विचित्रं वृन्दावनं नौमि परं पवित्रम्॥
जहाँ प्रवेश करने पर समस्त जीव आनंद और सच्चिदानंद स्वरूप को प्राप्त कर लेते हैं, उस अद्भुत प्रेमधाम, परम पवित्र वृन्दावन को मैं प्रणाम करता हूँ।
🙏
सिद्धांत: किशोरी जी से मांगना नहीं
लाड़ली-लाला से याचना का निषेध
🎙️ Shri Indresh Ji
▶ देखें (39:04)
▶ Watch (39:04)
श्री इंद्रेश जी ब्रज-उपासना का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत बताते हैं: श्री राधा-कृष्ण देवी-देवता नहीं, बल्कि हमारे लाड़ली-लाला हैं। उनसे कुछ मांगा नहीं जाता, बल्कि उन्हें दिया जाता है।
श्री इंद्रेश जी स्पष्ट करते हैं कि सांसारिक वस्तुएं मांगने के लिए अनेक देवी-देवता हैं, परन्तु श्री किशोरी जी और ठाकुर जी हमारे आराध्य होने के साथ-साथ हमारे प्रियजन हैं - 'लाली' और 'लाला'। उनसे कुछ मांगना उन्हें संकोच में डालना है। वे तो अपने नित्य विहार में मग्न हैं। हमारा भाव उन्हें कुछ देने का, उनके सुख की कामना करने का होना चाहिए, न कि उनसे याचना करने का।
🔗 यह सिद्धांत भक्त के भाव को याचक से बदलकर सेवक और प्रियजन का बनाता है, जो माधुर्य भक्ति का सार है।
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श्री कोकिल साईं और स्वरूप सरकार की कथा
दृष्टांतों द्वारा भाव की पुष्टि
🎙️ Shri Indresh Ji
▶ देखें (39:34)
▶ Watch (39:34)
श्री इंद्रेश जी दो कथाओं के माध्यम से 'मांगने नहीं' के सिद्धांत को पुष्ट करते हैं। पहली कथा श्री कोकिल साईं की है जो अपने ठाकुर जी को भक्तों की याचना से बचाते थे। दूसरी कथा एक संत की है जिनकी निष्ठा से प्रसन्न होकर साक्षात प्रिया-प्रियतम प्रकट हुए।
पहली कथा में, संत श्री कोकिल साईं अपने आश्रम में आने वाले हर व्यक्ति की सभी भौतिक आवश्यकताएं स्वयं पूरी कर देते थे, परन्तु उन्हें अपने ठाकुर जी के दर्शन नहीं करने देते थे, ताकि कोई उनसे कुछ मांगकर उन्हें संकोच में न डाल दे। दूसरी कथा में, एक संत 'स्वरूप सरकार' (बालकों में प्रिया-प्रियतम का स्वरूप) की सेवा करते थे। जब ठाकुर जी का स्वरूप बने बालक ने रूठकर जाने की जिद की, तो संत ने कुएं में कूदने की धमकी दी और वास्तव में कूद गए। उनकी इस व्याकुलता और श्री जी के प्रति कोमल भाव को देखकर साक्षात प्रिया-प्रियतम प्रकट हो गए।
🔗 ये कथाएं शुष्क सिद्धांत को भावपूर्ण आख्यानों में बदलकर श्रोताओं के हृदय में अंकित कर देती हैं।
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ब्रजवास की शर्त: 'स्व' का त्याग
ब्रजवास का अधिकार: आत्म-सुख का विसर्जन
🎙️ Shri Indresh Ji
▶ देखें (46:10)
▶ Watch (46:10)
श्री इंद्रेश जी बताते हैं कि ब्रज में बसने की एक ही शर्त है - अपने सुख, अपनी इच्छा और अपने 'स्व' का पूर्ण त्याग। यहाँ केवल प्रिया जी और ठाकुर जी के सुख का ही विचार किया जाता है।
श्री इंद्रेश जी चेतावनी देते हैं कि ब्रजवास देखने-सुनने में सरल लगता है, पर निभाने में अत्यंत कठिन है। यहाँ बसने का अधिकार उसे ही मिलता है जो अपने व्यक्तिगत सुख, इच्छाओं और अहंकार ('स्व') का त्याग करने को तैयार हो। ब्रजवासी का जीवन केवल प्रिया-प्रियतम के सुख के चिंतन और उनकी सेवा के लिए होता है। अपने कष्टों को उनके सम्मुख कहना भी उनके विहार में बाधा डालना है।
🔗 यह उपदेश ब्रजवास के प्रति रोमांटिक धारणाओं को तोड़कर उसके वास्तविक वैराग्य और समर्पण युक्त स्वरूप को उजागर करता है।
Sri Shikshashtakam Verse 4Sri Shikshashtakam Verse 4
▶ 47:22
पूरक संदर्भ (Siddhant)
पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव और इंद्रेश उपाध्याय जी दोनों इस बात पर जोर देते हैं कि प्रिया-प्रियतम से कुछ मांगना नहीं चाहिए, बल्कि केवल उनकी प्रसन्नता और सुख की कामना करनी चाहिए। यह अहैतुकी भक्ति और निष्काम प्रेम का भाव है।
न धनं न जनं न सुन्दरीं कवितां वा जगदीश कामये। मम जन्मनि जन्मनीश्वरे भवताद् भक्तिरहैतुकी त्वयि॥
हे जगदीश्वर! मुझे न धन की, न अनुयायियों की, न सुंदर स्त्री की और न ही काव्य-प्रतिभा की कामना है। मेरी तो बस यही इच्छा है कि जन्म-जन्मांतर तक आप में मेरी अहैतुकी भक्ति बनी रहे।
😭
सूरदास और ठाकुर जी की कथा
प्रिया जी की अहैतुकी करुणा
🎙️ Shri Indresh Ji
▶ देखें (49:26)
▶ Watch (49:26)
श्री इंद्रेश जी एक अन्य सूरदास (अष्टसखा से भिन्न) की कथा सुनाते हैं, जिससे श्री प्रिया जी की करुणा और ठाकुर जी के बीच का मधुर संवाद प्रकट होता है।
एक नेत्रहीन संत सूरदास के भजन से प्रसन्न होकर ठाकुर जी प्रकट हुए। संत ने पूछा कि आप अकेले क्यों आए, प्रिया जी कहाँ हैं? ठाकुर जी ने कहा कि वे साथ हैं, तो संत बोले, 'आप झूठ बोल रहे हैं, क्योंकि यदि प्रिया जी आई होतीं तो वे इतनी करुणामयी हैं कि मुझसे बात करने से पहले मुझे नेत्र प्रदान करतीं।' ठाकुर जी के स्मरण करने पर जैसे ही प्रिया जी प्रकट हुईं, उन्होंने भक्त की दशा देखकर तुरंत उसे दृष्टि प्रदान कर दी। यह कथा दर्शाती है कि प्रिया जी कितनी सहज करुणामयी हैं, फिर भी भक्त को उनसे कुछ मांगना नहीं चाहिए।
🔗 यह कथा प्रिया जी के करुणामयी स्वभाव को स्थापित करती है, और साथ ही यह भी सिखाती है कि उनकी कृपा मांगने से नहीं, बल्कि निस्वार्थ भजन से स्वतः प्राप्त होती है।
भाग ३: संत वाणी एवं आशीर्वचन
हरिद्वार से पधारे एक वरिष्ठ संत द्वारा आशीर्वचन प्रदान करना और श्री राधिका जी की अनन्य निष्ठा को एक कथा के माध्यम से दर्शाना।
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हरिद्वार के संत का आशीर्वचन
ब्रजवासियों का सौभाग्य और विनम्रता
🎙️ A Saint from Haridwar
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हरिद्वार से पधारे एक पूज्य संत ने सभी को प्रणाम करते हुए ब्रज में निवास करने वालों के सौभाग्य की सराहना की और अपनी विनम्रता प्रकट की।
हरिद्वार से पधारे संत ने मंगलाचरण के उपरांत पूज्य महाराज श्री और श्री इंद्रेश जी को प्रणाम किया। उन्होंने कहा कि जो ब्रज क्षेत्र में निवास करते हैं, और विशेषकर जिनका जन्म ही ब्रज में हुआ है, वे परम भाग्यशाली हैं। उन्होंने अपनी वाणी को सूर्य के सामने दीपक दिखाने जैसा बताते हुए अपनी विनम्रता व्यक्त की और आज्ञा का पालन करने हेतु कुछ शब्द कहे।
🔗 यह एक अतिथि वक्ता द्वारा दिया गया आशीर्वचन है, जो सत्संग की महिमा और ब्रज के गौरव को बढ़ाता है।
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श्रीकृष्ण के पत्र और राधिका जी का उत्तर
ऐक्य और अनन्यता की पराकाष्ठा
🎙️ A Saint from Haridwar
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संत ने एक कथा सुनाई जिसमें श्रीकृष्ण ने सभी पटरानियों को पत्र भेजे, पर राधिका जी को नहीं। राधिका जी ने कहा कि पत्र तो उसे लिखा जाता है जो दूर हो, कृष्ण तो मेरे तन-मन-प्राण में बसे हैं।
संत एक प्रसंग सुनाते हैं कि एक बार भगवान कृष्ण ने अपनी सभी पटरानियों को पत्र भेजे, लेकिन श्री राधिका जी को कोई पत्र नहीं भेजा। जब गोपियों ने पूछा तो राधिका जी ने उत्तर दिया, 'पत्र तो उसको लिखा जाता है जो अपने से दूर हो। मेरे तो तन में, मन में, प्राण में कृष्ण बसे हुए हैं। मुझे पत्र लिखने की आवश्यकता ही क्या है?' यह कथा श्री राधिका जी की भगवान के साथ अनन्य निष्ठा और ऐक्य भाव की पराकाष्ठा को दर्शाती है।
🔗 यह कथा सत्संग के आरंभ में सद्गुरुदेव द्वारा बताए गए 'नित्य संबंध' और 'अखंड संबंध' के सिद्धांत का भावनात्मक और सर्वोच्च उदाहरण प्रस्तुत करती है।
स्पष्टीकरण (Clarification)
यह सारांश AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग गुरु सेवा में करके तैयार किया गया है। इसमें त्रुटि हो सकती है। कृपया पूर्ण लाभ के लिए पूरा वीडियो अवश्य देखें।
स्वरूप विस्मृति: बंधन का मूल, जीव के बंधन का मूल कारण 'स्वरूप विस्मृति' है, और संत कृपा से ही इस अज्ञानता रूपी बीज का नाश होकर भगवत् प्रेम की प्राप्ति संभव है।
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