[Study Guide : Jan 10, 2026] अहंकार का विलय और शरणागति का स्वरूप

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श्री भगवत चर्चा
11 January 2026

अहंकार का विलय और शरणागति का स्वरूप

अहंकार का विलय और शरणागति का स्वरूप

Sri Sri 108 Sri Vinod Baba ji Maharaj
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हमारे प्रिय सद्गुरुदेव बताते हैं:
" समर्पण के लक्षण क्या है? एक शब्द में निश्चिंतता। (भगवान की शरणागति के बाद) आपके अगर कोई विषय कोई वस्तु नष्ट हो गया, कोई विपत्ति आ गई, कोई विपर्यय आ गया, आपको चिंता करने का अधिकार है नहीं। "
" भक्ति मार्ग में किसी भी प्रकार की योग्यता की आवश्यकता नहीं है। पापी, तापी, दुराचारी, व्यभिचारी, कोई भी हो, यदि वह एक बार भगवान की शरण में आ जाता है, तो भगवान उसे स्वीकार कर लेते हैं। "
अहंकार (12)समर्पण (10)भक्ति मार्ग (8)शरणागति (7)श्यामाचरण लाहिरी (6)अर्जुन (15)बरसाना (20)निश्चिंतता (3)
🔍 सत्संग सार (Executive Summary)

सद्गुरुदेव समझाते हैं कि जीव के दुःख का मूल कारण स्वरूप-विस्मृति है। भगवत् प्राप्ति के अनेक मार्गों में भक्ति मार्ग सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि यह योग्यता नहीं, केवल शरणागति की मांग करता है। अर्जुन के दृष्टांत से अहंकार को समर्पण में सबसे बड़ी बाधा के रूप में दर्शाया गया है। सच्ची शरणागति का लक्षण 'निश्चिंतता' है, जहाँ भक्त अपनी चिंता छोड़कर भगवान की चिंता में मग्न हो जाता है। सत्संग के उत्तरार्ध में, अतिथि वक्ता श्री इंद्रेश जी ने बरसाना वास की महिमा और श्री राधा रानी की करुणा को कृष्ण दास बाबा की कथा और मधुर भजनों के माध्यम से प्रस्तुत किया।

🧱 ज्ञान प्रवाह
graph TD subgraph Sadgurudev Vinod Baba A["🎙️ सद्गुरुदेव श्री विनोद बाबा"] --> B["दुःख का मूल: स्वरूप विस्मृति"]; B --> C["भगवत् प्राप्ति के उपाय"]; C --> D["योग मार्ग vs भक्ति मार्ग"]; D --> E["योग मार्ग: कठिन, ब्रह्मचर्य अनिवार्य"]; D --> F["भक्ति मार्ग: सरल, शरणागति मात्र"]; F --> G["📖 गीता 9.30: सुदुराचारी भी साधु है"]; C --> H["अहंकार: समर्पण में मुख्य बाधा"]; H --> I["दृष्टांत: अर्जुन का अहंकार"]; I --> J["1. ब्राह्मण पुत्र की रक्षा का वचन"]; I --> K["2. भीलों द्वारा मान-मर्दन"]; H --> L["समर्पण का लक्षण: निश्चिंतता"]; L --> M["📖 गीता 18.66: मैं तुम्हें पापों से मुक्त करूँगा"]; C --> N["सिद्धियों का रहस्य"]; N --> O["दृष्टांत: श्यामाचरण लाहिरी"]; O --> P["अहंकार की दो वृत्तियाँ: जड़-अभिमान & चिद-अभिमान"]; end subgraph Guest Speaker Indresh Ji Q["🎙️ अतिथि वक्ता: श्री इंद्रेश जी"] --> R["बरसाना वास की महिमा"]; R --> S["कथा: नंदगाम के कृष्ण दास बाबा"]; S --> T["सार: बरसाने की ओर देखने मात्र से श्याम सुंदर प्रकट"]; Q --> U["भजन रस"]; U --> V["🎶 मोहे तो भरोसो है तेरो"]; U --> W["🎶 मेरो मन लाग्यो बरसाने में"]; end A --> Q

📖 आज की शिक्षाएं 📖 आज की विस्तृत शिक्षाएं

साधना का आधार: स्वरूप विस्मृति और भगवत् प्राप्ति
जीव के दुखों के मूल कारण को समझना और भगवत् प्राप्ति के विभिन्न मार्गों का परिचय प्राप्त करना।
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मंगलाचरण एवं सत्संग का आरंभ
मंगलाचरण एवं जीव के दुःख का मूल कारण: स्वरूप विस्मृति
▶ देखें (0:04) ▶ Watch (0:04)
सद्गुरुदेव मंगलाचरण श्लोक के साथ सत्संग का आरंभ करते हैं। वे बताते हैं कि जीव माया से मुक्त होकर भी, अपने वास्तविक स्वरूप को भूलने के कारण इस स्वप्नवत संसार चक्र में भटक रहा है। सद्गुरुदेव मंगलाचरण द्वारा श्री कृष्ण और उनके भक्तों को नमन करते हुए सत्संग प्रारंभ करते हैं। वे समझाते हैं कि जीव का इस दुःखमय संसार सागर में भटकने का मूल कारण 'स्वरूप विस्मृति' है। जीव अपने आनंदमय स्वरूप, अपने इष्ट, और अपने प्रियतम भगवान को भूल गया है, जिसके कारण वह निरंतर कष्ट भोग रहा है। इस foundational teaching की पुष्टि हेतु सद्गुरुदेव मंगलाचरण का पाठ करते हैं।
🔗 यह कार्ड सत्संग की आधारशिला रखता है, जिसमें जीव की मूल समस्या को परिभाषित किया गया है, जिसके समाधान की चर्चा आगे की जाएगी।
भगवद् गीता 15.7भगवद् गीता 15.7
▶ 1:02
पूरक संदर्भ (Siddhant) पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि जीव माया के कारण अपने स्वरूप को भूलकर संसार चक्र में भटक रहा है। आत्मा भगवान का ही अंश है, जो प्रकृति में स्थित होकर मन और इंद्रियों के साथ संघर्ष करता है।
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः। मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥
इस संसार में जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है। वह प्रकृति में स्थित मन और पाँचों इन्द्रियों को आकर्षित करता है।
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भगवत् प्राप्ति के अनंत मार्ग
भगवान की अनंतता और उपासना के विविध मार्ग
▶ देखें (1:43) ▶ Watch (1:43)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि भगवान अनंत हैं, इसलिए उन तक पहुंचने के मार्ग भी अनंत हैं। जैसे एक ही दूध से अनेक मिष्ठान्न बनते हैं, वैसे ही एक ही सच्चिदानंद भगवान की लीलाएं भी अनंत हैं। सद्गुरुदेव समझाते हैं कि भगवत् प्राप्ति का कोई एक निश्चित मार्ग नहीं है। चूँकि भगवान के नाम, रूप, लीला और धाम अनंत हैं, साधक जिस भाव से उनकी उपासना करता है, उसे तदनुसार ही धाम की प्राप्ति होती है। इस सिद्धांत को स्पष्ट करने के लिए सद्गुरुदेव दूध का दृष्टांत देते हैं। जैसे एक ही दूध से घी, मक्खन, पनीर, रबड़ी आदि अनेक वस्तुएं बनती हैं, उसी प्रकार एक ही सच्चिदानंद भगवान की लीलाएं भी अनंत और विविध हैं, जो सभी आनंदमयी हैं।
🔗 यह कार्ड उपासना की विविधता को स्थापित करता है, जो आगे चलकर भक्ति मार्ग की विशिष्टता को उजागर करने के लिए एक पृष्ठभूमि तैयार करता है।
⚖️ भगवान की लीला और दूध के विकार
एक ही दूध: इससे पनीर, मक्खन, घी, खीर, रबड़ी आदि अनेक पदार्थ बनते हैं।
एक ही सच्चिदानंद भगवान: उनकी लीलाएं भी अनंत हैं, जो सभी सच्चिदानंदमय हैं। उपासक अपनी रुचि के अनुसार लीला का आस्वादन करता है।
🎭
भगवान की लीला और योगमाया की भूमिका
लीला में भगवान की मुग्धता और सिद्ध जीव की सर्वज्ञता
▶ देखें (3:00) ▶ Watch (3:00)
भगवान अपनी स्वरूप शक्ति 'योगमाया' के द्वारा लीला की रचना करते हैं और स्वयं उसमें एक साधारण मनुष्य की भांति मुग्ध हो जाते हैं। इसके विपरीत, जीव साधन द्वारा अपने स्वरूप में स्थित होकर सर्वज्ञ बन सकता है। सद्गुरुदेव लीला के रहस्य को समझाते हैं। भगवान अपनी स्वरूप-शक्ति योगमाया का आश्रय लेकर लीला की रचना करते हैं और स्वयं एक प्राकृत मनुष्य की तरह मुग्धता स्वीकार करते हैं, मानो वे भूत-भविष्य-वर्तमान से अनभिज्ञ हों। यह उनकी लीला का एक अंग है। इसके विपरीत, जो मुग्ध जीवात्मा है, वह जब साधन करके अपने स्वरूप में स्थित होता है, तो वह सर्वज्ञ हो जाता है और उसमें अनंत शक्तियों का स्रोत प्रवाहित होने लगता है। वह सब कुछ जानने और समझने में सक्षम हो जाता है।
🔗 यह कार्ड भगवान की लीला-शक्ति और जीव की潛在 शक्ति के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर को स्पष्ट करता है, जो श्यामाचरण लाहिरी की आगामी कथा के लिए मंच तैयार करता है।
भगवद् गीता 7.25भगवद् गीता 7.25
▶ 3:00
पूरक संदर्भ (Siddhant) पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव बताते हैं कि भगवान अपनी स्वरूप शक्ति (योगमाया) के आश्रय से लीला करते हैं और उसमें मुग्धवत प्रतीत होते हैं, जैसे प्राकृत मनुष्य। यह उनकी योगमाया के कारण होता है कि मूढ़ लोग उन्हें नहीं पहचान पाते।
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः। मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्॥
मैं मूर्खों और अल्पज्ञों के लिए कभी प्रकट नहीं होता। उनके लिए मैं अपनी योगमाया से ढका रहता हूँ, और इसलिए वे मुझे अजन्मा और अविनाशी नहीं जानते।
सिद्धियों का रहस्य और भक्त का मार्ग
योग मार्ग से प्राप्त होने वाली सिद्धियों और भक्ति मार्ग की सहजता के बीच के अंतर को समझना।
🧘
योगी श्यामाचरण लाहिरी की कथा: पूर्व जन्म का स्मरण
श्यामाचरण लाहिरी की कथा: गुरु कृपा से पूर्व जन्म की स्मृति जागृति
▶ देखें (5:07) ▶ Watch (5:07)
सद्गुरुदेव एक योगी श्यामाचरण लाहिरी का दृष्टांत देते हैं, जो एक साधारण क्लर्क थे। रानीखेत में एक रहस्यमयी सन्यासी ने उन्हें स्पर्श मात्र से उनके पूर्व जन्म का स्मरण करा दिया, जहाँ वे एक साधक थे। सद्गुरुदेव बताते हैं कि आत्मा में अनंत शक्तियां निहित हैं, जिसे भौतिक विज्ञान कल्पना मानता है। इसका प्रमाण वे योगी श्यामाचरण लाहिरी की कथा से देते हैं। वे फूड डिपार्टमेंट में एक क्लर्क थे और उनका ट्रांसफर रानीखेत हुआ। वहां जंगल में घूमते हुए एक जटाजूटधारी सन्यासी ने उन्हें नाम से पुकारा और एक गुफा दिखाई। सन्यासी के मेरुदंड पर स्पर्श करते ही श्यामाचरण को अपने पूर्व जन्म की स्मृति हो आई कि वे इसी गुफा में भजन करते थे और ये सन्यासी उनके गुरु हैं। गुरु ने बताया कि उनकी अधूरी साधना को पूरा कराने के लिए ही उन्होंने ट्रांसफर कराकर उन्हें यहाँ बुलाया है।
🔗 यह कथा सिद्ध करती है कि जीव में अलौकिक शक्तियां छिपी हैं और भजन-साधन कभी व्यर्थ नहीं जाता, वह अगले जन्म में भी फल देता है।
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योग मार्ग बनाम भक्ति मार्ग
योग मार्ग की कठोरता और भक्ति मार्ग की परम उदारता
▶ देखें (10:55) ▶ Watch (10:55)
सद्गुरुदेव योग मार्ग की कठोरता (जैसे अटूट ब्रह्मचर्य) की तुलना भक्ति मार्ग की उदारता से करते हैं। भक्ति मार्ग में दुराचारी से दुराचारी व्यक्ति का भी स्वागत है, यदि वह शरणागत हो जाए। श्यामाचरण लाहिरी की कथा के संदर्भ में सद्गुरुदेव योग मार्ग की कठिनाइयों पर प्रकाश डालते हैं, जिसमें अटूट ब्रह्मचर्य जैसी कठोर शर्तों का पालन आवश्यक है। इसके विपरीत, वे भक्ति मार्ग की विशेषता बताते हैं, जहाँ किसी भी प्रकार की योग्यता की आवश्यकता नहीं है। पापी, तापी, दुराचारी, व्यभिचारी, कोई भी हो, यदि वह एक बार भगवान की शरण में आ जाता है, तो भगवान उसे स्वीकार कर लेते हैं। इस सिद्धांत की पुष्टि हेतु सद्गुरुदेव श्रीमद्भगवद्गीता के एक अत्यंत महत्वपूर्ण श्लोक का उल्लेख करते हैं।
🔗 यह कार्ड सत्संग के केंद्रीय विषय - भक्ति मार्ग की सर्वोच्चता - को स्थापित करता है और भगवान की अहैतुकी कृपा को उजागर करता है।
भगवद् गीता 9.31भगवद् गीता 9.31
▶ 11:26
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव भगवद गीता के श्लोक का अनुवाद करते हुए कहते हैं कि अति दुराचारी व्यक्ति भी भगवान की शरण में आने पर शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और भगवान अपने भक्त को कभी नष्ट नहीं होने देते।
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति। कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥
वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और शाश्वत शांति प्राप्त करता है। हे कुंतीपुत्र, तुम यह प्रतिज्ञा कर दो कि मेरे भक्त का कभी विनाश नहीं होता।
⚖️ साधना के दो मार्ग
योग मार्ग: कठोर नियम, अटूट ब्रह्मचर्य अनिवार्य, सिद्धि प्राप्ति में लंबा समय लग सकता है।
भक्ति मार्ग: सरल, कोई पूर्व-योग्यता आवश्यक नहीं, केवल शरणागति, भगवान की कृपा से शीघ्र धर्मात्मा बन जाता है।
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भगवान का आश्वासन: 'मेरी चिंता (चिंतन) करो'
शरणागति का सार: भगवान की चिंता (चिंतन) करना
▶ देखें (12:25) ▶ Watch (12:25)
सद्गुरुदेव भगवान का आश्वासन दोहराते हैं: 'तुम मेरी चिंता (चिंतन) करो, मैं तुम्हारी चिंता करूंगा।' भक्त को अपने पापों या कमियों के बारे में चिंता करने की आवश्यकता नहीं है, केवल अपने मन को भगवान में लगाना है। सद्गुरुदेव भक्ति मार्ग के सबसे सरल और गहरे सिद्धांत को समझाते हैं। भगवान भक्त से केवल एक ही चीज मांगते हैं - 'तुम मेरी चिंता (चिंतन) करो'। भक्त को अपने अतीत के पापों, दुराचारों या भविष्य की अनिश्चितताओं के बारे में चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है। उसे केवल अपने मन को दिन-रात भगवान के चिंतन में लगाना है। यदि वह ऐसा करता है, तो उसकी समस्त चिंताएं, उसकी कमियां, और उसके कल्याण का भार स्वयं भगवान उठा लेते हैं। यह शरणागति का मूल तत्व है।
🔗 यह कार्ड शरणागति की व्यावहारिक परिभाषा प्रस्तुत करता है, जो 'अहंकार' के विषय की ओर ले जाता है, क्योंकि अपनी चिंता करना अहंकार का ही एक रूप है।
भगवद् गीता 18.58भगवद् गीता 18.58
▶ 13:16
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव अर्जुन के अहंकार का वर्णन करते हुए कहते हैं कि भगवान की कृपा से ही सभी दुर्गम बाधाओं को पार किया जा सकता है, क्योंकि मनुष्य के हाथ में कुछ नहीं है।
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि। अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥
यदि तुम मुझमें चित्त लगाओगे, तो मेरी कृपा से सभी बाधाओं को पार कर जाओगे। परन्तु यदि अहंकारवश मेरी बात नहीं सुनोगे, तो नष्ट हो जाओगे।
भगवद् गीता 9.22भगवद् गीता 9.22
▶ 12:25
पूरक संदर्भ (Siddhant) पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव कहते हैं कि यदि भक्त भगवान की चिंता करता है, तो भगवान उसकी चिंता करते हैं और उसके योगक्षेम का वहन करते हैं, जिससे भक्त निश्चिंत और निर्भय हो जाता है।
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
जो अनन्य भाव से मेरा चिंतन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, उन नित्य-युक्त भक्तों का योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ।
अहंकार: समर्पण में सबसे बड़ी बाधा
अर्जुन के दृष्टांतों के माध्यम से यह समझना कि अहंकार किस प्रकार सच्ची शरणागति में बाधक बनता है और वास्तविक समर्पण के क्या लक्षण हैं।
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अर्जुन का अहंकार: ब्राह्मण पुत्र की कथा
कर्तृत्व अभिमान का दृष्टांत: अर्जुन और ब्राह्मण पुत्र
▶ देखें (14:07) ▶ Watch (14:07)
सद्गुरुदेव अर्जुन के अहंकार का पहला दृष्टांत देते हैं। जब द्वारका में एक ब्राह्मण के पुत्रों की मृत्यु हो रही थी, तो अर्जुन ने अहंकारवश श्री कृष्ण से भी बढ़कर, उन पुत्रों की रक्षा करने की प्रतिज्ञा कर ली। सद्गुरुदेव बताते हैं कि गीता का इतना ज्ञान प्राप्त करने के बाद भी अर्जुन का अहंकार पूरी तरह नष्ट नहीं हुआ था। इसका उदाहरण वे द्वारका की एक घटना से देते हैं। एक ब्राह्मण अपने पुत्रों की अकाल मृत्यु पर श्री कृष्ण को दोष दे रहा था। यह सुनकर अर्जुन को क्रोध आया और उन्होंने अहंकार में भरकर उस ब्राह्मण को वचन दे दिया कि वे उसके अगले पुत्र की रक्षा करेंगे, और यदि न कर पाए तो अग्नि में आत्मदाह कर लेंगे। यह 'मैं गांडीवधारी अर्जुन हूँ', 'मैं कर सकता हूँ' का भाव ही कर्तृत्व अभिमान है, जो समर्पण में बाधक है।
🔗 यह कथा अहंकार के सूक्ष्म रूप को उजागर करती है, जो महान भक्तों में भी रह सकता है और उन्हें भगवान पर पूर्ण निर्भर होने से रोकता है।
भगवद् गीता 18.65भगवद् गीता 18.65
▶ 17:48
पूरक संदर्भ (Siddhant) पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव भक्ति साधना का प्राण केंद्र बताते हुए कहते हैं कि भगवान को अपना मन समर्पित कर देना चाहिए और उनकी चिंता करनी चाहिए, जिससे वे भक्त की चिंता करते हैं और उसे निर्भय बना देते हैं।
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥
मुझमें मन लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो और मुझे नमस्कार करो। तुम निश्चित रूप से मुझे प्राप्त करोगे, मैं तुमसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ, क्योंकि तुम मेरे प्रिय हो।
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अर्जुन का मान-मर्दन: भीलों द्वारा पराजय
अहंकार का मर्दन: जब भीलों ने अर्जुन को परास्त किया
▶ देखें (19:08) ▶ Watch (19:08)
श्री कृष्ण के स्वधाम गमन के बाद, वही अर्जुन, जो स्वयं को अजेय समझते थे, साधारण भीलों द्वारा पराजित हो गए। वे अपना गांडीव धनुष तक नहीं उठा पाए और भील यादव-महिषियों को हर ले गए। सद्गुरुदेव अर्जुन के अहंकार के टूटने की कथा सुनाते हैं। श्री कृष्ण के लीला संवरण के पश्चात, जब अर्जुन उनकी महिषियों को हस्तिनापुर ले जा रहे थे, तो रास्ते में साधारण भीलों ने उन पर आक्रमण कर दिया। जिस अर्जुन के टंकार से पृथ्वी कांप जाती थी, वह अपना गांडीव धनुष तक नहीं उठा सका। भीलों ने थप्पड़ मारकर अर्जुन को भगा दिया और बहुत सी महिषियों को अपने साथ ले गए। तब अर्जुन को यह ज्ञान हुआ कि उनकी शक्ति अपनी नहीं, बल्कि उनके सारथी, श्री कृष्ण की ही थी।
🔗 यह मार्मिक कथा इस सत्य को स्थापित करती है कि जीव की समस्त शक्ति और सामर्थ्य का स्रोत केवल भगवान हैं। अहंकारवश उसे अपना मानना ही भ्रम है।
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समर्पण का लक्षण: निश्चिंतता
वास्तविक समर्पण का स्वरूप और उसका एकमात्र लक्षण
▶ देखें (21:43) ▶ Watch (21:43)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि सच्चे समर्पण का एक ही लक्षण है - 'निश्चिंतता'। जब तक व्यक्ति अपने हानि-लाभ, मान-अपमान की चिंता करता है, तब तक वह समर्पित नहीं है। सद्गुरुदेव अहंकार को समर्पण में सबसे बड़ी बाधा बताते हैं। जब तक व्यक्ति के पास अपना सामर्थ्य, धन, और विद्वत्ता का अभिमान है, वह समर्पित नहीं हो सकता। समर्पण मजबूरी का नाम नहीं है, जैसे आतंकवादी का आत्मसमर्पण। सच्चा समर्पण तो गाय बेचने के दृष्टांत जैसा है; एक बार बेचने के बाद मालिक को उसके भरण-पोषण की चिंता करने का अधिकार नहीं रहता। इसी प्रकार, जो भगवान को समर्पित हो गया है, उसे अपने जीवन में आने वाले किसी भी सुख-दुःख या विपत्ति की चिंता करने का अधिकार नहीं है। इसलिए समर्पण का एक शब्द में लक्षण है - 'निश्चिंतता'।
🔗 यह कार्ड शरणागति के सिद्धांत को उसकी पराकाष्ठा पर ले जाता है, जहाँ भक्त का 'स्व' पूरी तरह से भगवान की इच्छा में विलीन हो जाता है।
भगवद् गीता 18.66भगवद् गीता 18.66
▶ 25:26
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव शरणागति के महत्व पर जोर देते हुए कहते हैं कि समस्त पापों से मुक्ति पाने के लिए काय, मन, वचन से भगवान की शरण में आना चाहिए और पापों की चिंता नहीं करनी चाहिए।
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
सभी प्रकार के धर्मों का परित्याग करके केवल मेरी शरण में आओ। मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो।
श्यामाचरण लाहिरी की सिद्धि: दूर-दर्शन
आत्म-शक्ति का प्रदर्शन: श्यामाचरण लाहिरी और ब्रिटिश अफसर
▶ देखें (27:03) ▶ Watch (27:03)
सद्गुरुदेव श्यामाचरण लाहिरी की कथा को समाप्त करते हुए बताते हैं कि कैसे उन्होंने योग-सिद्धि से दानापुर में बैठे-बैठे लंदन में अपने ब्रिटिश अफसर की बीमार पत्नी को देख लिया और स्वस्थ कर दिया। साधना पूर्ण करके श्यामाचरण लाहिरी दानापुर लौट आए और नौकरी करने लगे। एक दिन उन्होंने अपने ब्रिटिश अफसर को बहुत चिंतित देखा। पूछने पर पता चला कि अफसर की पत्नी लंदन में बहुत बीमार है। श्यामाचरण ने घर जाकर ध्यान लगाया और सूक्ष्म शरीर से लंदन पहुँच गए। लौटकर उन्होंने अफसर को बताया कि उनकी पत्नी अब स्वस्थ है और जल्द ही पत्र लिखेगी। कुछ दिनों बाद जब पत्नी दानापुर आई, तो उसने श्यामाचरण को पहचान लिया और बताया कि जब वह मृत्यु-शय्या पर थी, तब इसी व्यक्ति ने आकर उसके मस्तक पर हाथ रखा और वह ठीक हो गई। यह कथा आत्मा की अनंत शक्ति को प्रमाणित करती है।
🔗 यह कथा सिद्ध करती है कि आत्मा में अनंत शक्तियां हैं, जो साधन से प्रकट होती हैं। लेकिन भक्त इन सिद्धियों का प्रदर्शन नहीं करते क्योंकि वे भक्ति में बाधक हैं।
श्रीमद् भागवतम् 9.4.68श्रीमद् भागवतम् 9.4.68
▶ 29:42
पूरक संदर्भ (Siddhant) पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव बताते हैं कि भगवान साक्षात नहीं आते, लेकिन वैष्णवों के हृदय में निवास करते हैं। इसलिए किसी भक्त के आगमन को भगवान की कृपा का संकेत समझना चाहिए।
साधवो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयं त्वहम्। मदन्यत् ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपि॥
साधु मेरा हृदय हैं और मैं साधुओं का हृदय हूँ। वे मेरे अतिरिक्त कुछ नहीं जानते और मैं उनसे किंचित् भी भिन्न नहीं हूँ।
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अहंकार की दो वृत्तियाँ: जड़ और चिद
अहंकार का तात्विक विश्लेषण: जड़-अभिमान और चिद-अभिमान
▶ देखें (33:02) ▶ Watch (33:02)
सद्गुरुदेव अहंकार के दो रूपों की व्याख्या करते हैं: 'जड़-वृत्ति' (मैं शरीर हूँ) जो बंधन का कारण है, और 'चिद-वृत्ति' (मैं भगवान का हूँ) जो मुक्ति का मार्ग है। सद्गुरुदेव अहंकार का सूक्ष्म विश्लेषण करते हुए उसकी दो वृत्तियों के बारे में बताते हैं। पहली है 'जड़-वृत्ति' या 'जड़-अभिमान', जो अविद्या से उत्पन्न होती है। इसमें जीव सोचता है 'मैं यह शरीर हूँ और शरीर से संबंधित वस्तुएं मेरी हैं'। यह वृत्ति ही उसे संसार चक्र में बांधती है। दूसरी है 'चिद-वृत्ति' या 'चिद-अभिमान', जो गुरु कृपा से प्राप्त होती है। इसमें जीव को यह बोध होता है कि 'मैं शरीर नहीं, मैं भगवान का नित्य अंश हूँ और भगवान मेरे हैं'। यह चेतन वृत्ति ही उसे मुक्ति की ओर ले जाती है।
🔗 यह एक महत्वपूर्ण दार्शनिक बिंदु है जो अहंकार के नकारात्मक और सकारात्मक, दोनों पहलुओं को स्पष्ट करता है, और दिखाता है कि भक्ति 'चिद-अभिमान' को पोषित करती है।
चैतन्य चरितामृत Madhya-lila 20.108चैतन्य चरितामृत Madhya-lila 20.108
▶ 33:13
पूरक संदर्भ (Siddhant) पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव अहंकार की दो वृत्तियों (जड़ वृत्ति और चित्त वृत्ति) का वर्णन करते हैं। जड़ वृत्ति (शरीर को 'मैं' और शरीर संबंधी वस्तुओं को 'मेरा' मानना) बंधन का कारण है, जबकि चित्त वृत्ति (मैं भगवान का हूँ, भगवान मेरे हैं) मुक्ति का मार्ग है, जो जीव के वास्तविक स्वरूप को प्रकट करती है।
जीवेर 'स्वरूप' हय—कृष्णेर 'नित्य-दास'। कृष्णेर 'तटस्था-शक्ति' 'भेदाभेद-प्रकाश'॥
जीव का वास्तविक स्वरूप कृष्ण का नित्य दास होना है। जीव कृष्ण की तटस्था शक्ति है, जो भेदाभेद-प्रकाश है।
श्रीमद् भागवतम् 11.15.33श्रीमद् भागवतम् 11.15.33
▶ 34:36
पूरक संदर्भ (Siddhant) पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव बताते हैं कि सच्चे भक्त अपनी शक्तियों का प्रदर्शन नहीं करते और अष्ट सिद्धियों तथा नवनिधियों को भक्ति के मार्ग में बाधक मानते हैं, इसलिए वे उन्हें स्वीकार नहीं करते।
सिद्धय ईशा न भजन्ति मय्यथा। ये चेतसो वृत्तिमपोहितुं मम॥
हे ईश्वर! जो भक्त अपने चित्त की वृत्तियों को मुझमें लीन करने के लिए मेरा भजन करते हैं, वे सिद्धियों की इच्छा नहीं करते।
⚖️ अहंकार के दो स्वरूप
जड़-अभिमान (बंधनकारी): मैं शरीर हूँ। शरीर संबंधी वस्तुएं (धन, परिवार, पद) मेरी हैं। यह अविद्या-जनित है।
चिद-अभिमान (मुक्तिदायक): मैं भगवान का हूँ। भगवान मेरे हैं। यह गुरु-कृपा से प्राप्त होता है।
अतिथि वैष्णव का भावपूर्ण उद्बोधन (श्री इंद्रेश जी)
अतिथि वक्ता के माध्यम से बरसाना वास की महिमा, श्री जी की कृपा और ब्रज के संतों के प्रति भाव को समझना।
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श्री इंद्रेश जी का मंगलाचरण एवं प्रणाम
अतिथि वक्ता श्री इंद्रेश जी द्वारा मंगलाचरण एवं सद्गुरुदेव की महिमा
🎙️ Shri Indresh Ji
▶ देखें (38:58) ▶ Watch (38:58)
अतिथि वक्ता श्री इंद्रेश जी मंगलाचरण श्लोकों के साथ अपना उद्बोधन आरंभ करते हैं और पूज्य सद्गुरुदेव के चरणों में प्रणाम निवेदित करते हैं। वे कहते हैं कि ब्रजवासी जिससे प्रेम करें, समझना चाहिए कि श्री जी स्वयं उससे प्रेम कर रही हैं। सद्गुरुदेव के बाद, अतिथि वक्ता श्री इंद्रेश जी मंच पर आते हैं। वे सुंदर संस्कृत श्लोकों द्वारा मंगलाचरण करते हुए श्री राधा-कृष्ण की स्तुति करते हैं। इसके पश्चात वे पूज्य सद्गुरुदेव के चरणों में बारंबार प्रणाम करते हैं और उनकी महिमा का गान करते हैं। वे कहते हैं कि ब्रजवासियों का प्रेम ही इस बात का प्रमाण है कि श्री जी और ठाकुर जी की उन पर कितनी कृपा है, क्योंकि ब्रजवासी हर किसी से इतनी सहजता से प्रीति नहीं करते।
🔗 यह कार्ड सत्संग के प्रवाह में एक सुंदर मोड़ लाता है, जहाँ एक अन्य वैष्णव की दृष्टि से सद्गुरुदेव और ब्रज-रस की महिमा का वर्णन होता है।
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नंदगाम के कृष्ण दास बाबा की कथा
बरसाना की महिमा: कृष्ण दास बाबा और श्याम सुंदर का प्राकट्य
🎙️ Shri Indresh Ji
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श्री इंद्रेश जी नंदगाम के एक बाबा की कथा सुनाते हैं जिन्होंने 12 वर्ष तक ठाकुर जी को माला पहनाने का नियम लिया और अंत में केवल बरसाने की ओर चलने मात्र से उन्हें श्याम सुंदर के प्रत्यक्ष दर्शन हो गए। बरसाना वास के महत्व को दर्शाने के लिए श्री इंद्रेश जी नंदगाम के कृष्ण दास बाबा की एक अद्भुत कथा सुनाते हैं। बाबा ने 12 वर्ष तक नंदभवन में ठाकुर जी को माला पहनाने का नियम लिया, इस प्रार्थना के साथ कि 13वें वर्ष के पहले दिन ठाकुर जी उनकी कुटिया पर आएं। जब 12 वर्ष पूर्ण होने पर ठाकुर जी नहीं आए, तो बाबा क्रोधित होकर सब कुछ उजाड़ कर बरसाने की ओर चल दिए। जैसे ही वे बरसाने की ओर मुड़े, श्याम सुंदर स्वयं असंख्य गायों के साथ उनके सामने प्रकट हो गए। तब बाबा को ज्ञात हुआ कि बरसाने की ओर देखने मात्र से जब श्याम सुंदर प्रकट हो गए, तो श्री जी की शरण में रहने से कैसी कृपा होगी।
🔗 यह कथा बरसाना धाम और श्री राधा रानी की सर्वोच्चता को स्थापित करती है, यह दर्शाती है कि श्री जी की कृपा से ठाकुर जी सहज ही प्राप्त हो जाते हैं।
भजन रस माधुरी
भजनों के माध्यम से श्री राधा रानी के प्रति शरणागति और बरसाना धाम के प्रति प्रेम के भावों में डूबना।
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भजन: मोहे तो भरोसो है तेरो री किशोरी राधे
शरणागति का भजन: मोहे तो भरोसो है तेरो री किशोरी राधे
🎙️ Shri Indresh Ji
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श्री इंद्रेश जी श्री किशोरी जी के प्रति पूर्ण भरोसे और शरणागति का भाव व्यक्त करते हुए यह सुंदर भजन गाते हैं। कथा के भाव को आगे बढ़ाते हुए, श्री इंद्रेश जी यह प्रसिद्ध भजन प्रस्तुत करते हैं। इस भजन में, भक्त स्वयं को 'साधन हीन' और 'दीन' मानते हुए श्री किशोरी जी की करुणा और प्रेम पर अपना एकमात्र भरोसा व्यक्त करता है। वह भुक्ति-मुक्ति कुछ नहीं मांगता, केवल यही प्रार्थना करता है कि किशोरी जी उसे अपना जानकर संभाल लें। यह भजन सद्गुरुदेव द्वारा वर्णित शरणागति के सिद्धांत का संगीतमय रूप है।
🔗 यह भजन सत्संग के मुख्य विषय 'शरणागति' को भक्तिरस से सराबोर कर देता है, जहाँ साधक अपनी अयोग्यता को स्वीकार कर केवल श्री जी की कृपा पर निर्भर रहता है।
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भजन: चल बरसाने जहां प्यारी बसो
धाम महिमा का भजन: चल बरसाने जहां प्यारी बसो
🎙️ Shri Indresh Ji
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अष्टछाप के कवि कृष्णदास जी का यह पद गाते हुए श्री इंद्रेश जी श्रोताओं को मन से बरसाना चलने का आह्वान करते हैं, जहाँ श्री राधारानी अपनी सखियों संग विहार करती हैं। श्री इंद्रेश जी अष्टछाप के महान कवि श्री कृष्णदास जी द्वारा रचित एक पद का गायन करते हैं। इस पद में बरसाना धाम की शोभा का वर्णन है, जहाँ श्री वृषभानु दुलारी अपनी प्रिय सखियों ललिता आदि के साथ केलि-विलास करती हैं। ऊँचे पर्वत पर बने मनोहर महल और संतों को सुख देने वाली किशोरी जी के वास का वर्णन करते हुए, यह भजन मन को बरसाना धाम की ओर आकर्षित करता है।
🔗 यह भजन बरसाना धाम के प्रति प्रेम और आकर्षण को बढ़ाता है, जो श्री राधा रानी की उपासना का एक महत्वपूर्ण अंग है।
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भजन: मेरो मन लाग्यो बरसाने में
अनन्यता का भजन: मेरो मन लाग्यो बरसाने में
🎙️ Shri Indresh Ji
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यह सदगुरुदेव का प्रिय और लोकप्रिय भजन गाते हुए श्री इंद्रेश जी व्यक्त करते हैं कि उनका मन अब बरसाने में ही रम गया है, जहाँ श्री राधा रानी विराजती हैं, और उन्हें इस दुनिया से कोई लेना-देना नहीं है। सत्संग के समापन की ओर, श्री इंद्रेश जी यह सदगुरुदेव का प्रिय अत्यंत भावपूर्ण भजन प्रस्तुत करते हैं। इसमें भक्त की अनन्य निष्ठा व्यक्त होती है, जिसका मन अब केवल बरसाना धाम में लगता है, क्योंकि वही ब्रज की राजधानी है जहाँ साक्षात् श्री राधा रानी विराजती हैं। भक्त कहता है कि उसे इस दुनिया से कोई काम नहीं, यह जगत एक सपने जैसा है, और उसकी अपनी तो केवल वृषभानु नंदिनी ही हैं। यह भजन संसार से वैराग्य और श्री जी के चरणों में अनुराग का सुंदर समन्वय है।
🔗 यह भजन सत्संग के सार को एक संगीतमय निष्कर्ष प्रदान करता है - मन को संसार से हटाकर श्री राधा रानी के धाम और उनके चरणों में लगाना ही जीवन का परम लक्ष्य है।
स्पष्टीकरण (Clarification)

यह सारांश AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग गुरु सेवा में करके तैयार किया गया है। इसमें त्रुटि हो सकती है। कृपया पूर्ण लाभ के लिए पूरा वीडियो अवश्य देखें।

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