[Study Guide : Jan 17, 2026] बंधन का मूल: एक स्वीकृति

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श्री भगवत चर्चा
18 January 2026

बंधन का मूल: एक स्वीकृति

बंधन का मूल: एक स्वीकृति

Sri Sri 108 Sri Vinod Baba ji Maharaj
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हमारे प्रिय सद्गुरुदेव बताते हैं:
" कर्ता बनोगे तो फंस जाओगे। प्रभु को कर्ता बना दो और तुम अकर्ता बनकर, नौकर बनकर काम करो, तो फिर कोई बंधन नहीं। "

" शरणागति माने निश्चिंतता। मृत्यु आने से भी घबराते नहीं हैं। (राधारानी) तुम जानो, हम तो समर्पित हैं... अब चिंता करने का अधिकार हमारा नहीं। "
स्वीकृति (15)बंधन (18)चेतन सत्ता (8)कर्ता/अकर्ता (10)शरणागति (5)भक्तमाल (1)
🔍 सत्संग सार (Executive Summary)

सद्गुरुदेव इस सत्संग में समझाते हैं कि जीव और भगवान का संबंध नित्य, अभिन्न और प्रियतम है। संसार का बंधन किसी बाहरी वस्तु या परिस्थिति के कारण नहीं, बल्कि हमारी आंतरिक 'स्वीकृति' के कारण है। हम स्वयं को संसारी, गृहस्थ या कर्ता मान लेते हैं, यही मूल भ्रम है। दृष्टांतों के माध्यम से सद्गुरुदेव सिखाते हैं कि इस मिथ्या स्वीकृति को त्यागकर और स्वयं को अकर्ता मानकर, भगवान को कर्ता स्वीकार करने से ही वास्तविक भजन और मुक्ति संभव है। शरणागति का अर्थ है निश्चिंतता, जहाँ भक्त अपनी चिंता छोड़कर भगवान की चिंता करता है, और भगवान उसकी समस्त ज़िम्मेदारी ले लेते हैं।

🧱 ज्ञान प्रवाह
graph TD A["🕉️ जीव-भगवान का नित्य संबंध"] --> B["🔗 विस्मृति: संबंध का भूल जाना"]; B --> C["⛓️ बंधन का मूल कारण: 'स्वीकृति'"]; C --> D["🎭 मिथ्या अभिमान (मैं गृहस्थ/त्यागी हूँ)"]; C --> E["🐒 बंदर और लड्डू (आसक्ति का दृष्टांत)"]; C --> F["🐴 धोबी का गधा (आदत का बंधन)"]; G["💡 समाधान: स्वीकृति का त्याग"]; G --> H["🙌 अकर्ता भाव: 'प्रभु ही कर्ता हैं'"]; H --> I["👶 बच्चे का दृष्टांत (अकर्ता का आनंद)"]; H --> J["👩‍🍳 नौकरानी का दृष्टांत (अनासक्त कर्म)"]; G --> K["🏳️ शरणागति: पूर्ण समर्पण"]; K --> L["📜 भगवद्गीता का आश्वासन"]; L --> M["🎯 परम लक्ष्य: भगवत् प्रेम की प्राप्ति"]; subgraph "चेतन सत्ता का विश्लेषण" N["🧬 चेतन सत्ता के 4 प्रकार"] --- O["📜 आत्मा के 5 कोष"] end A --> N; A --> O;
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📖 आज की शिक्षाएं 📖 आज की विस्तृत शिक्षाएं

प्रथम चरण: तात्विक आधार - जीव, जगत् और ईश्वर
जीव और भगवान के नित्य, अभिन्न एवं प्रियतम संबंध का बोध कराना तथा बंधन के मूल कारण (विस्मृति) को स्थापित करना।
🔗
जीव-भगवान का अविच्छेद्य संबंध
जीव-भगवान का नित्य, अविच्छेद्य एवं अखंड संबंध
▶ देखें (0:46) ▶ Watch (0:46)
सद्गुरुदेव सत्संग का आरंभ इस मूल सिद्धांत से करते हैं कि जीव भगवान का ही अभिन्न अंश है। भगवान से दूरी या संसार में फँसे होने का विचार एक महान अज्ञानता है, क्योंकि हमारा उनसे नित्य, अखंड और अविच्छेद्य संबंध है। सद्गुरुदेव समझाते हैं कि समस्त सृष्टि की सत्ता भगवान की ही सत्ता है और उनके बाहर कुछ भी नहीं है। हम जो स्वयं को संसारी या माया में फँसा हुआ मानते हैं, यह केवल एक भ्रम है। वास्तव में, भगवान से हमारा संबंध नित्य, अविच्छेद्य और अखंड है। इसी संबंध की विस्मृति ही संसार बंधन का मूल कारण है। यह बोध कि 'मैं भगवान का हूँ और भगवान मेरे हैं' ही सत्य है, और इसे भूल जाना ही हमें 84 लाख योनियों के चक्र में डालता है।
🔗 यह कार्ड सत्संग की नींव रखता है, जिसमें जीव के वास्तविक स्वरूप और उसके शाश्वत संबंध को उजागर किया गया है, जो बाद में बंधन और मुक्ति की चर्चा का आधार बनता है।
भगवद् गीता 15.7
▶ 0:46
संदर्भ पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि जीव भगवान का अभिन्न अंश है, जो सनातन है।
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः। मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥
इस संसार में जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है। वह प्रकृति में स्थित मन और पाँचों इंद्रियों को आकर्षित करता है।
भगवद् गीता 7.7
▶ 0:57
संदर्भ पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव बताते हैं कि भगवान के अतिरिक्त कोई अन्य सत्ता या वस्तु नहीं है, सब कुछ भगवान में ही समाहित है।
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय। मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥
हे धनंजय! मुझसे श्रेष्ठ कोई और नहीं है। यह सब कुछ मुझमें ही पिरोया हुआ है, जैसे धागे में मोती।
भगवद् गीता 15.8
▶ 2:24
संदर्भ पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव बताते हैं कि माया जीव को पंचभौतिक शरीर में आवरित कर देती है, जिससे जीव शरीर से तादात्म्य करके 84 लाख योनियों में भटकता है।
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः। गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्॥
जब जीवात्मा एक शरीर को छोड़ता है और दूसरे शरीर को प्राप्त करता है, तो वह मन और इंद्रियों को अपने साथ ले जाता है, जैसे वायु गंध को ले जाती है।
🧬
चेतन सत्ता के चार प्रकार
चेतन सत्ता का चतुर्विध वर्गीकरण
▶ देखें (2:44) ▶ Watch (2:44)
सद्गुरुदेव चेतन सत्ता के विकास के चार स्तरों का वर्णन करते हैं: आवरित (वृक्ष), संकुचित (कीट), मुकुलित (पशु), और विकसित (मनुष्य)। मनुष्य योनि में चेतन सत्ता का पूर्ण विकास होता है। सद्गुरुदेव चेतन सत्ता के विकास की चार अवस्थाओं का विस्तृत वर्णन करते हैं। यह दर्शाता है कि सभी जीवों में चेतना है, परन्तु उसका विकास भिन्न-भिन्न स्तरों पर हुआ है। मनुष्य योनि को 'विकसित चेतन' कहा गया है क्योंकि इसमें चेतना का पूर्ण विकास होता है, जिससे वह अपने वास्तविक संबंध को जानकर साधन कर सकता है। यह वर्गीकरण मनुष्य जीवन की महत्ता को रेखांकित करता है।
🔗 यह दार्शनिक वर्गीकरण यह समझने में सहायता करता है कि मनुष्य योनि साधन के लिए क्यों सर्वश्रेष्ठ है और इसमें अपने स्वरूप को जानने की पूर्ण क्षमता है।
📌 चेतन सत्ता के चार स्तर:
  • आवरित चेतन: चेतना ढकी हुई है (जैसे - वृक्ष, पाषाण)।
  • संकुचित चेतन: अमीबा (Amoeba), कृमि, कीट, चींटी। शरीर के भीतर के सेल - White Blood Cells, Red Blood Cells, Semen Cells (शुक्राणु) भी जीवात्मा हैं।
  • मुकुलित चेतन: पशु, पक्षी। विशेष उदाहरण: बंदर, उरांग (Orangutan), वनमानुष, और अफ्रीका की 'पिग्मी जाति' (Pygmy Tribe)।
  • विकसित चेतन: चेतना का पूर्ण विकास (जैसे - मनुष्य)।
🗝️
साधन का प्राण: संबंध बोध
साधन का त्रिविध आधार: संबंध, अभिधेय और प्रयोजन
▶ देखें (3:30) ▶ Watch (3:30)
सद्गुरुदेव बल देते हैं कि भजन-साधन से पहले 'संबंध बोध' आवश्यक है। यह जानना कि हम कौन हैं और भगवान से हमारा क्या संबंध है, साधन का प्राण केंद्र है। गौड़ीय उपासना पद्धति में तीन विषय हैं: संबंध, अभिधेय और प्रयोजन। सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि साधन का आरंभ क्रिया से नहीं, बल्कि ज्ञान से होता है। गौड़ीय उपासना पद्धति के अनुसार, साधन के तीन अंग हैं। पहला और सबसे महत्वपूर्ण है 'संबंध बोध' - यह जानना कि भगवान से हमारा क्या संबंध है। दूसरा है 'अभिधेय' - उस संबंध को प्राप्त करने का उपाय, जो कि भक्ति है। तीसरा है 'प्रयोजन' - अंतिम लक्ष्य, जो कि भगवत्-प्रेम है, स्वयं भगवान नहीं। संबंध बोध के बिना किया गया साधन निष्प्राण हो जाता है।
🔗 यह कार्ड साधन की सही प्रक्रिया को स्थापित करता है, जिसमें 'क्यों' (संबंध) 'कैसे' (अभिधेय) से पहले आता है, जो साधक को एक स्पष्ट वैचारिक दिशा प्रदान करता है।
💖
भगवान से संबंध का स्वरूप: प्रियतम और निकटतम
प्रियता की पराकाष्ठा: भगवान से हमारा संबंध
▶ देखें (5:03) ▶ Watch (5:03)
भगवान से हमारा संबंध कैसा है? सद्गुरुदेव इसे सरल भाषा में 'सबसे प्रियतम और सबसे निकटतम' बताते हैं। यह प्रियता इतनी असीम है कि अनंत कोटि ब्रह्मांड का सुख भी उसके एक कण के बराबर नहीं हो सकता। सद्गुरुदेव भगवान से हमारे संबंध की गहनता को समझाने का प्रयास करते हैं, जिसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। वे इसे 'सबसे प्रियतम और सबसे निकटतम' कहकर परिभाषित करते हैं। इसकी तुलना के लिए वे एक दृष्टांत देते हैं: यदि अनंत कोटि ब्रह्मांडों के समस्त सुख-भोग को एकत्रित करके किसी को दिया जाए, तो भी वह भगवान से हमारे प्रेम-संबंध की प्रियता के एक कण के बराबर भी नहीं हो सकता। यह बोध ही भजन में रस और दृढ़ता लाता है।
🔗 यह कार्ड 'संबंध बोध' की अवधारणा को भावनात्मक गहराई प्रदान करता है, जिससे साधक को अपने लक्ष्य की दिव्यता और आकर्षण का अनुभव होता है।
⛓️
भगवान की प्रेम-वश्यता
भगवान की एकमात्र दुर्बलता: प्रेम-वश्यता
▶ देखें (8:12) ▶ Watch (8:12)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि अनंत ब्रह्मांड के नायक भगवान को किसी तप, तपस्या या आराधना से वश में नहीं किया जा सकता। उनकी एकमात्र दुर्बलता है 'प्रेम'। वे केवल प्रेम के वशीभूत होते हैं। सद्गुरुदेव एक महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रस्तुत करते हैं कि जो भगवान किसी भी साधन से वशीभूत नहीं होते, वे स्वेच्छा से प्रेम के बंधन को स्वीकार करते हैं। कोई भी बंधन स्वीकार नहीं करना चाहता, परन्तु भगवान कहते हैं कि उनमें एक दुर्बलता है - वे प्रेम के वशीभूत हो जाते हैं। इसी कारण साधन का प्रयोजन 'प्रेम' है, क्योंकि प्रेम ही वह शक्ति है जो भगवान को भक्त के अधीन कर देती है, और भगवान भक्त के पीछे-पीछे अनुगमन करने लगते हैं।
🔗 यह सिद्धांत भक्ति मार्ग की सर्वोच्चता को स्थापित करता है, क्योंकि यह भगवान को प्राप्त करने का नहीं, बल्कि उन्हें 'बाँधने' का एकमात्र उपाय है।
श्रीमद् भागवतम् 9.4.68
▶ 8:22
संदर्भ पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव बताते हैं कि भगवान की एक दुर्बलता है कि वे प्रेम के वशीभूत हो जाते हैं, भक्तों के प्रेम के कारण वे स्वयं को पराधीन मान लेते हैं।
अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतंत्र इव द्विज। साधुभिर्ग्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः॥
हे द्विज! मैं भक्तों के अधीन हूँ, मानो मैं स्वतंत्र नहीं हूँ। साधु पुरुषों ने मेरे हृदय को जीत लिया है, क्योंकि मैं भक्तों का प्रिय हूँ।
📜
आत्मा के पाँच कोष
आत्मा के पंचकोषीय आवरण का विश्लेषण
▶ देखें (11:46) ▶ Watch (11:46)
सद्गुरुदेव आत्मा को ढकने वाले पाँच कोषों का वर्णन करते हैं: अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय। मनुष्य में मनोमय कोष विकसित होता है, जिससे वह चिंतन-मनन कर सकता है। सद्गुरुदेव आत्मा के ऊपर स्थित पाँच आवरणों या कोषों की व्याख्या करते हैं। ये कोष चेतना के विकास के विभिन्न स्तरों को दर्शाते हैं। साधारण प्राणियों में अन्नमय और प्राणमय कोष ही मुख्य रूप से क्रियाशील होते हैं, परन्तु मनुष्य में 'मनोमय कोष' का विकास हो जाता है, जो उसे चिंतन, मनन और भले-बुरे का विवेक करने की क्षमता प्रदान करता है। साधन के द्वारा 'विज्ञानमय कोष' उन्मोचित होता है, जिससे परतत्व का ज्ञान होता है।
🔗 यह विश्लेषण मनुष्य जीवन की विशिष्टता को और स्पष्ट करता है, क्योंकि केवल मनुष्य ही साधन द्वारा इन कोषों का भेदन कर अपने आत्म-स्वरूप तक पहुँच सकता है।
Taittiriya उपनिषद Brahma-valli
▶ 11:46
संदर्भ पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव आत्मा को ढकने वाले पाँच कोशों - अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय कोशों का वर्णन करते हैं, जो तैत्तिरीय उपनिषद में वर्णित हैं।
तस्माद्वा एतस्मादन्नरसमयात्। अन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः। तेनैष पूर्णः। तस्माद्वा एतस्मात्प्राणमयात्। अन्योऽन्तर आत्मा मनोमयः। तेनैष पूर्णः। तस्माद्वा एतस्मान्मनोमयात्। अन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयः। तेनैष पूर्णः। तस्माद्वा एतस्माद्विज्ञानमयात्। अन्योऽन्तर आत्माऽऽनन्दमयः। तेनैष पूर्णः।
उस अन्नमय से भिन्न, भीतर प्राणमय आत्मा है। उससे यह पूर्ण है। उस प्राणमय से भिन्न, भीतर मनोमय आत्मा है। उससे यह पूर्ण है। उस मनोमय से भिन्न, भीतर विज्ञानमय आत्मा है। उससे यह पूर्ण है। उस विज्ञानमय से भिन्न, भीतर आनंदमय आत्मा है। उससे यह पूर्ण है।
📌 आत्मा के पाँच कोष:
  • अन्नमय कोष: पंचभौतिक शरीर।
  • प्राणमय कोष: प्राण क्रिया।
  • मनोमय कोष: मनन और चिंतन की क्षमता। (मनुष्य में विकसित)
  • विज्ञानमय कोष: परतत्व का विशेष ज्ञान। (साधन से खुलता है)
  • आनंदमय कोष: आनंद का अनुभव।
🙏
भगवान की भक्त-वश्यता पर संत वचन
भगवान की भक्त-अधीनता: संत वाणी के प्रकाश में
▶ देखें (14:28) ▶ Watch (14:28)
सद्गुरुदेव कुछ संत वाणियों का उल्लेख करते हैं जो दर्शाती हैं कि भगवान कैसे भक्त के प्रेम के अधीन हो जाते हैं। जो भक्त स्वयं को बड़ा और भगवान को छोटा मानता है, उसका प्रेम ही भगवान को वशीभूत करता है। सद्गुरुदेव भगवान की प्रेम-वश्यता और भक्त-वश्यता को प्रमाणित करने हेतु कुछ दिव्य संत वाणियों का उल्लेख करते हैं। इन वचनों से स्पष्ट होता है कि भगवान को वेद-स्तुति से भी अधिक प्रिय गोपियों द्वारा प्रेम में दी गई गाली लगती है। जो भक्त दीनता वश स्वयं को भगवान से छोटा मानता है, उसका प्रेम भगवान को वश में नहीं कर पाता, परन्तु जो प्रेम में स्वयं को बड़ा और भगवान को अपने से हीन (छोटा) मानता है , भगवान उसके प्रेम के सतत अधीन हो जाते हैं। सद्गुरुदेव इस सिद्धांत की पुष्टि हेतु निम्नलिखित दिव्य वचनों का उल्लेख करते हैं:
🔗 ये वचन भक्ति के भावात्मक पक्ष को उजागर करते हैं, जहाँ तर्क और ऐश्वर्य के स्थान पर केवल विशुद्ध प्रेम ही सर्वोपरि है।
संत वाणी
▶ 14:37
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
अमाके जो बड़ माने, अपना को हीन। तार प्रेमे कबु आमि ना होई अधीन॥
āmāke jo baḍa māne, āpanā ko hīna, tāra preme kabu āmi nā ha-i adhīna॥
जो मुझ (भगवान को) को बड़ा मानता है और अपने को हीन मानता है, मैं कभी उसके प्रेम के अधीन नहीं होता। (यहाँ सद्गुरुदेव व्याख्या करते हैं कि जो भक्त अपने को भगवान से छोटा मानता है, उसका प्रेम कभीभगवान को वश में नहीं कर पाता।)
संत वाणी
▶ 14:53
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
आपनके बड़ माने, आमाके समहीन। तार प्रेमे हइयामि सतत अधीन॥
āpanake baṛa māne, āmāke samahīna. tāra preme haiyāmi satata adhīna॥
जो अपने को बड़ा मानता है और मुझे (भगवान को) अपने से हीन (छोटा) मानता है, मैं उसके प्रेम के सदैव अधीन हो जाता हूँ।
गोपियों के प्रेम की महिमा
▶ 15:01
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
प्रिया यदि मान करि करे भर्त्सन। वेदस्तुति हुइते हरे मोर मन॥
priyā yadi māna kori karaye bhartsana. vedastuti huite hare mora mana॥
यदि मेरी प्रिया (गोपियाँ) मान करके मेरी भर्त्सना (गाली) करती हैं, तो वह मेरे मन को वेद-स्तुतियों से भी अधिक हर लेती है।
द्वितीय चरण: बंधन का निदान - स्वीकृति का रोग
यह स्पष्ट करना कि संसार का बंधन बाहरी परिस्थितियों में नहीं, बल्कि हमारी आंतरिक 'स्वीकृति' में निहित है, और इस मिथ्या स्वीकृति के स्वरूप को दृष्टांतों द्वारा समझाना।
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बंधन का मूल जड़: 'स्वीकृति'
बंधन का मूल कारण: मिथ्या स्वीकृति का त्याग
▶ देखें (16:55) ▶ Watch (16:55)
सद्गुरुदेव बंधन का सबसे गहरा रहस्य उजागर करते हैं: बंधन का मूल कारण हमारी 'स्वीकृति' है। हम मान लेते हैं कि हम संसारी हैं, गृहस्थी हैं, और इसी मान्यता के कारण हम फँस जाते हैं। भजन से पहले इस स्वीकृति को हटाना आवश्यक है। सद्गुरुदेव एक क्रांतिकारी विचार प्रस्तुत करते हैं कि हमारा बंधन किसी बाहरी माया या परिस्थिति के कारण नहीं है, बल्कि हमारी अपनी मानसिक स्वीकृति के कारण है। हमने यह स्वीकार कर लिया है कि 'मैं गृहस्थी हूँ', 'मैं संसारी हूँ', 'मैं फँसा हुआ हूँ'। यह स्वीकृति ही सबसे बड़ी जंजीर है। सद्गुरुदेव कहते हैं कि भजन करने से भी पहले इस मानसिक स्वीकृति को हटाना होगा। जिस क्षण यह स्वीकृति हट जाती है, उसी क्षण व्यक्ति मुक्त हो जाता है, चाहे वह संसार में ही क्यों न रहे।
🔗 यह कार्ड सत्संग का केंद्रीय बिंदु है, जो समस्या को बाहरी जगत से हटाकर साधक के आंतरिक जगत पर केंद्रित करता है, जिससे समाधान भी आंतरिक हो जाता है।
💨
सांसारिक संबंध: आगंतुक और अनित्य
संबंधों की अनित्यता: सब कुछ आगंतुक है
▶ देखें (18:48) ▶ Watch (18:48)
सद्गुरुदेव याद दिलाते हैं कि हमारे सभी सांसारिक संबंध, यहाँ तक कि यह शरीर भी, 'आगंतुक' हैं। वे पहले नहीं थे और बाद में नहीं रहेंगे। जो आगंतुक है, वह नित्य नहीं हो सकता और उसका वियोग अनिवार्य है। सद्गुरुदेव हमें सांसारिक संबंधों के वास्तविक स्वरूप का बोध कराते हैं। वे कहते हैं कि जन्म के समय हमारा कोई संबंध नहीं था; पत्नी, पुत्र, परिवार सब बाद में संपर्क में आए। ये सभी संबंध 'आगंतुक' हैं, अर्थात् वे आए हैं और एक दिन चले जाएँगे। जहाँ संयोग है, वहाँ वियोग अनिवार्य है। इस सत्य को न समझकर हम इन अनित्य संबंधों में ममता और अपनापन स्थापित करके स्वयं को बाँध लेते हैं। यह शरीर भी प्रकृति का दिया हुआ है, हमारा नहीं। इस आगंतुक स्वरूप को समझना ही वैराग्य का प्रथम सोपान है।
🔗 यह अवधारणा 'स्वीकृति' के भ्रम को तोड़ने में मदद करती है। जब हम जानते हैं कि कुछ भी हमारा नहीं है, तो उसे 'मेरा' मानने की स्वीकृति स्वतः कमजोर पड़ जाती है।
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त्यागी और भोगी का मिथ्या अहंकार
त्यागी और भोगी: दोनों उपाधियाँ झूठी हैं
▶ देखें (21:09) ▶ Watch (21:09)
सद्गुरुदेव कहते हैं कि 'मैं त्यागी हूँ' और 'मैं भोगी हूँ' - दोनों ही कथन झूठे हैं। त्यागी क्या त्याग करता है जब कुछ उसका है ही नहीं? और गृहस्थी का कौन सा घर है? दोनों ही एक मिथ्या उपाधि और अहंकार हैं। सद्गुरुदेव एक साहसिक कथन करते हैं कि जो स्वयं को त्यागी कहता है, वह भी झूठा है और जो स्वयं को गृहस्थी या भोगी कहता है, वह भी झूठा है। वे तर्क देते हैं कि त्याग उसी वस्तु का किया जा सकता है जो अपनी हो। जब इस संसार में शरीर तक हमारा नहीं है, तो हमने क्या त्याग किया? इसी प्रकार, हम कौन सा घर या परिवार लेकर आए थे जो हम गृहस्थी बन गए? ये दोनों ही उपाधियाँ एक सूक्ष्म अहंकार हैं जो हमें हमारे वास्तविक स्वरूप 'जीव' से दूर रखती हैं।
🔗 यह कार्ड साधक को किसी भी प्रकार के आध्यात्मिक या भौतिक अहंकार से सावधान करता है और उसे केवल अपने शुद्ध आत्म-स्वरूप में स्थित होने के लिए प्रेरित करता है।
🐒
दृष्टांत: बंदर और लड्डू
आसक्ति का दृष्टांत: बंदर, कूजा और लड्डू
▶ देखें (23:01) ▶ Watch (23:01)
सद्गुरुदेव बंदर पकड़ने का दृष्टांत देते हैं, जो एक संकरे मुँह वाले बर्तन में हाथ डालकर लड्डू पकड़ लेता है। मुट्ठी बंद होने से हाथ बाहर नहीं निकलता, पर वह लड्डू छोड़ने को तैयार नहीं। यही हमारी स्थिति है। सद्गुरुदेव हमारी सांसारिक आसक्ति को समझाने के लिए एक प्रभावी दृष्टांत सुनाते हैं। एक बंदर को पकड़ने के लिए एक भारी, संकरे मुँह वाले बर्तन (कूजा) में लड्डू रख दिया जाता है। बंदर हाथ डालकर लड्डू तो पकड़ लेता है, लेकिन लड्डू वाली मुट्ठी बर्तन के मुँह से बाहर नहीं निकलती। वह फँस जाता है, परन्तु लड्डू का मोह नहीं छोड़ता। सद्गुरुदेव कहते हैं कि हमारी भी यही दशा है। हम माया, मोह, ममता रूपी लड्डू को पकड़े हुए हैं और मुक्त भी होना चाहते हैं, जो असंभव है। मुक्ति के लिए पहले लड्डू (आसक्ति) छोड़ना होगा।
🔗 यह दृष्टांत 'स्वीकृति' और 'आसक्ति' के व्यावहारिक रूप को दिखाता है, कि कैसे हम स्वयं ही अपने बंधन का कारण हैं।
🐴
दृष्टांत: धोबी और गधा
काल्पनिक बंधन का दृष्टांत: धोबी का गधा
▶ देखें (25:23) ▶ Watch (25:23)
एक धोबी का गधा रस्सी न होने पर केवल गर्दन पर हाथ फेरकर बाँधने का अभिनय करने से ही बँधा मान लेता है और बिना अभिनय के खोले जाने तक खुलता नहीं। हमारा बंधन भी ऐसा ही काल्पनिक है। सद्गुरुदेव एक और मनोरंजक कथा सुनाते हैं। एक धोबी के पास अपने गधे को बाँधने के लिए रस्सी नहीं होती। एक अन्य धोबी की सलाह पर, वह केवल गधे की गर्दन पर हाथ फेरकर और जमीन पर एक खूँटा ठोकने का अभिनय करता है। गधा, जिसे रोज बँधने की आदत है, यह मान लेता है कि वह बँध गया है और वहाँ से हिलता नहीं। शाम को जब धोबी उसे ले जाना चाहता है, तो वह तब तक नहीं चलता जब तक उसे खोलने का अभिनय नहीं किया जाता। सद्गुरुदेव कहते हैं कि हमारा बंधन भी इसी गधे की तरह वास्तविक नहीं, बल्कि केवल एक मानसिक आदत और स्वीकृति है। हम झूठ-मूठ के बँधे हैं और झूठ-मूठ का खोलने से ही मुक्त हो जाएँगे।
🔗 यह दृष्टांत बंधन की निस्सारता और हास्यास्पद प्रकृति को उजागर करता है, जिससे साधक को अपने मानसिक बंधनों को गंभीरता से न लेने की प्रेरणा मिलती है।
भगवद् गीता 9.33
▶ 28:38
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव संसार को अनित्य और असुखमय बताते हुए भगवान के भजन का महत्व समझाते हैं।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्। किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा॥
इस अनित्य और सुखरहित लोक को प्राप्त करके मेरा भजन करो। फिर पवित्र ब्राह्मण और भक्त राजर्षियों की तो बात ही क्या?
तृतीय चरण: मुक्ति का मार्ग - अकर्ता भाव और समर्पण
बंधन से मुक्ति के व्यावहारिक उपाय, जैसे अकर्ता भाव, कर्म समर्पण और शरणागति के वास्तविक अर्थ को समझाना तथा भगवद्गीता के आश्वासनों द्वारा साधक को दृढ़ करना।
🙌
मुक्ति का उपाय: अकर्ता भाव
बंधन मुक्ति का अचूक उपाय: अकर्ता भाव से कर्म
▶ देखें (29:09) ▶ Watch (29:09)
सद्गुरुदेव कहते हैं कि संसार में कर्म करते हुए भी बंधन से बचने का उपाय है 'अकर्ता भाव'। यदि हम स्वयं को कर्ता मानेंगे तो फँस जाएँगे। प्रभु को कर्ता मानकर, स्वयं नौकर बनकर कर्म करने से कोई बंधन नहीं लगता। सद्गुरुदेव बंधन से मुक्ति का व्यावहारिक मार्ग बताते हैं। संसार में नौकरी, व्यापार, परिवार आदि कर्म करना बंधनकारी नहीं है, यदि कर्तापन का भाव न हो। जब हम यह मान लेते हैं कि 'मैं कर रहा हूँ', तभी हम कर्म के फल और बंधन में फँसते हैं। इसका उपाय है कि हम भगवान को कर्ता बना दें और स्वयं को उनका नौकर या उपकरण मानकर कर्म करें। जैसे घर में छोटा बच्चा कोई जिम्मेदारी न होने से आनंद में रहता है, वैसे ही अकर्ता भाव में स्थित साधक संसार के दुःखों से अछूता रहता है। सद्गुरुदेव इस सिद्धांत की पुष्टि हेतु गीता का श्लोक उद्धृत करते हैं।
🔗 यह कार्ड कर्मयोग का सार प्रस्तुत करता है, जो दिखाता है कि कर्म नहीं, बल्कि कर्म में कर्तापन का भाव ही बंधन का कारण है।
भगवद् गीता 3.27
▶ 29:45
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव बताते हैं कि कर्तापन का अहंकार ही बंधन का मूल कारण है, जबकि सभी कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा होते हैं।
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥
सभी कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं, मगर अहंकार से मोहित पुरुष मानता है कि 'मैं कर्ता हूँ'।
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आंतरिक जगत की सुरक्षा
अभ्यास का स्वरूप: आंतरिक जगत की सुरक्षा
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सद्गुरुदेव सलाह देते हैं कि बाहरी दुनिया में सब कर्म करते हुए भी अपने आंतरिक जगत को सुरक्षित रखें। उस हृदय-मंदिर में केवल हम और हमारे इष्ट हों, वहाँ संसार के किसी भी सुख-दुःख, लाभ-हानि को प्रवेश न करने दें। सद्गुरुदेव साधक को एक महत्वपूर्ण अभ्यास बताते हैं। वे कहते हैं कि अपने हृदय को एक किले की तरह बनाओ, जिसके दरवाजे बाहरी दुनिया के लिए बंद हों। बाहर इंद्रियों से सभी कर्म करो, परन्तु अपने अंतर जगत में संसार के किसी भी प्रभाव को प्रवेश मत करने दो। उस आंतरिक मंदिर में केवल तुम और तुम्हारे इष्ट का वास हो। जब बाहरी जगत के लाभ-हानि, मान-अपमान का प्रभाव अंतर जगत पर पड़ना बंद हो जाएगा, तब समझना कि तुम सही मार्ग पर हो। यही 'लेना ना देना, मगन रहना' की अवस्था है।
🔗 यह एक व्यावहारिक साधना है जो साधक को संसार में रहते हुए भी कमल-पत्र की तरह निर्लिप्त रहना सिखाती है।
कर्म समर्पण और भजन का सच्चा स्वरूप
कर्म समर्पण और भजन का वास्तविक अर्थ
▶ देखें (38:57) ▶ Watch (38:57)
कर्म समर्पण का अर्थ कर्म को समर्पित करना नहीं, बल्कि अपनी इच्छा को समर्पित करना है। भजन का अर्थ है 'रोना और खोना' - 'हा राधे' कहकर रोना और संसार से अपनापन खो देना। सद्गुरुदेव कर्म समर्पण और भजन की प्रचलित धारणाओं को सही करते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि हम कर्म क्या समर्पण करेंगे, क्योंकि हम तो कर्ता ही नहीं हैं। कर्म समर्पण का वास्तविक अर्थ है अपनी इच्छा का समर्पण करना - 'प्रभु, जो तुम्हारी इच्छा'। इसी प्रकार, भजन का अर्थ केवल क्रियात्मक जप-तप नहीं है, बल्कि यह एक भावात्मक अवस्था है जिसे सद्गुरुदेव 'रोना और खोना' कहते हैं। 'रोना' अर्थात् भगवान के विरह में 'हा राधे' कहकर पुकारना, और 'खोना' अर्थात् यह मान लेना कि इस संसार में शरीर सहित सब कुछ एक दिन खो जाएगा, कुछ भी हमारा नहीं है। इस जिज्ञासा का समाधान सद्गुरुदेव ने इस प्रकार प्रस्तुत किया है:
🔗 यह कार्ड भजन और समर्पण की गहराई को स्पष्ट करता है, इसे क्रिया से भाव की ओर ले जाता है।
❓ प्रश्न: कर्म समर्पण का क्या अर्थ है? ▶ 38:57
💡 उत्तर: कर्म समर्पण का अर्थ अपनी इच्छा को समाप्त करना है। करने वाले तुम नहीं हो, इसलिए तुम कर्म क्या समर्पण करोगे? समर्पण का अर्थ है यह मानना कि 'जो हो रहा है, वह तुम्हारी (प्रभु की) इच्छा से हो रहा है'। 💡 उत्तर: कर्म समर्पण का अर्थ अपनी इच्छा को समाप्त करना है। करने वाले तुम नहीं हो, इसलिए तुम कर्म क्या समर्पण करोगे? समर्पण का अर्थ है यह मानना कि 'जो हो रहा है, वह तुम्हारी (प्रभु की) इच्छा से हो रहा है'।
❓ प्रश्न: भजन का सच्चा स्वरूप क्या है? ▶ 38:57
💡 उत्तर: भजन का सच्चा स्वरूप है 'रोना और खोना'। भगवान के लिए, जैसे 'हा राधे' कहकर, विरह में रोना और यह स्वीकार कर लेना कि संसार में सब कुछ खोना ही है, कुछ भी अपना नहीं है। 💡 उत्तर: भजन का सच्चा स्वरूप है 'रोना और खोना'। भगवान के लिए, जैसे 'हा राधे' कहकर, विरह में रोना और यह स्वीकार कर लेना कि संसार में सब कुछ खोना ही है, कुछ भी अपना नहीं है।
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शरणागति का लक्षण: निश्चिंतता
शरणागति की कसौटी: पूर्ण निश्चिंतता
▶ देखें (40:49) ▶ Watch (40:49)
शरणागति का सबसे बड़ा लक्षण है 'निश्चिंतता'। यदि शरणागत होने के बाद भी मन में चिंता आती है, तो समझना चाहिए कि शरणागति अभी पूरी नहीं हुई है। शरणागत भक्त अपनी चिंता प्रभु को सौंप देता है। सद्गुरुदेव शरणागति की पहचान का एक अचूक लक्षण बताते हैं - निश्चिंतता। जो व्यक्ति वास्तव में भगवान के शरणागत हो गया है, उसके जीवन में चिंता के लिए कोई स्थान नहीं रहता, यहाँ तक कि मृत्यु का भय भी उसे विचलित नहीं करता। यदि मन में कोई भी चिंता या 'अब क्या होगा' का भाव आता है, तो यह इस बात का संकेत है कि शरणागति अभी कच्ची है। शरणागत होने का अर्थ है अपने आपको भगवान के चरणों में पूरी तरह बेच देना, जैसे कोई अपनी गाय बेच देता है और फिर उसकी चिंता नहीं करता। अब चिंता करने का अधिकार और कर्तव्य भगवान का है, हमारा नहीं। इस जिज्ञासा का समाधान सद्गुरुदेव ने इस प्रकार प्रस्तुत किया है:
🔗 यह कार्ड शरणागति को एक निष्क्रिय अवस्था के बजाय एक सक्रिय विश्वास और निर्भरता के रूप में प्रस्तुत करता है, जो साधक को सभी भयों से मुक्त कर देता है।
❓ प्रश्न: शरणागति का लक्षण क्या है? ▶ 40:49
💡 उत्तर: शरणागति का लक्षण है 'निश्चिंतता'। मृत्यु आने से भी जो घबराता नहीं है, वही शरणागत है। यदि मन में चिंता आ गई, तो समझना अभी शरणागति हुई नहीं। 💡 उत्तर: सद्गुरुदेव समझाते हैं कि शरणागति का अर्थ है स्वयं को पूरी तरह से भगवान को सौंप देना। जैसे कोई व्यक्ति अपनी गाय किसी को बेच देता है, तो फिर उसे यह कहने का अधिकार नहीं रहता कि गाय को चारा-पानी क्यों नहीं दिया। उसी प्रकार, जब हमने स्वयं को भगवान को सौंप दिया, तो अब हमें अपनी चिंता करने का कोई अधिकार नहीं है। अब हमारी चिंता भगवान करेंगे।
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भगवद्गीता का आश्वासन: 'मैं पार लगा दूँगा'
भगवान का परम आश्वासन: गीता के प्रकाश में
▶ देखें (43:40) ▶ Watch (43:40)
सद्गुरुदेव भगवद्गीता के 18वें अध्याय से भगवान के आश्वासनों का उल्लेख करते हैं। भगवान कहते हैं - 'मुझमें चित्त लगाकर तुम मेरी कृपा से सारे संकटों से पार हो जाओगे, किन्तु अहंकारवश नहीं सुनोगे तो नष्ट हो जाओगे'। सत्संग के अंत में, सद्गुरुदेव साधक को दृढ़ करने के लिए भगवद्गीता के 18वें अध्याय से भगवान श्रीकृष्ण के शक्तिशाली आश्वासनों को उद्धृत करते हैं। भगवान अर्जुन को चेतावनी देते हुए कहते हैं कि अहंकार छोड़कर मुझ पर निर्भर हो जाओ। जो मुझमें अपना चित्त लगाता है, वह मेरी कृपा से सभी दुर्गति से पार हो जाता है। परन्तु जो अहंकार के कारण मेरी बात नहीं सुनता, उसका विनाश निश्चित है, क्योंकि सभी प्राणियों को मैं ही अपनी माया से नचा रहा हूँ। सद्गुरुदेव इस सिद्धांत की पुष्टि हेतु निम्नलिखित दिव्य श्लोकों का उल्लेख करते हैं:
🔗 ये श्लोक सत्संग के सार को शास्त्रीय प्रमाण प्रदान करते हैं और साधक के विश्वास को सुदृढ़ करते हैं कि उसका कल्याण केवल भगवत्-कृपा पर निर्भर है।
भगवद् गीता 18.66
▶ 43:40
संदर्भ पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव शरणागति के महत्व को समझाते हुए कहते हैं कि भगवान स्वयं आश्वासन देते हैं कि वे सभी पापों से मुक्त कर देंगे।
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
सभी प्रकार के धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो।
भगवद् गीता 18.58
▶ 45:06
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव भगवान के वचन का उल्लेख करते हैं कि यदि मन भगवान में लगा हो तो उनकी कृपा से सभी दुर्गम बाधाएं पार हो जाती हैं, अन्यथा अहंकार के कारण विनाश होता है।
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि। अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥
मुझमें चित्त लगाने से तुम मेरी कृपा से सभी कठिनाइयों को पार कर जाओगे। यदि तुम अहंकारवश मेरी बात नहीं सुनोगे, तो नष्ट हो जाओगे।
भगवद् गीता 18.61
▶ 45:17
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव बताते हैं कि भगवान सभी के हृदय में स्थित होकर माया के द्वारा सबको नचाते हैं, इसलिए मनुष्य स्वयं कुछ नहीं कर सकता।
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥
हे अर्जुन! ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में स्थित है और अपनी माया से सभी प्राणियों को ऐसे घुमाता है, जैसे वे यंत्र पर चढ़े हों।
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समापन और आगामी विषय
समापन सूचना
▶ देखें (48:34) ▶ Watch (48:34)
घोषणा: 'जीव चैतन्य सत्ता' का विषय आज समाप्त हुआ। कल से 'भक्तमाल' (संतों के चरित्र) का श्रवण करेंगे। सद्गुरुदेव सूचित करते हैं कि कल से भक्तमाल ग्रंथ के आधार पर संतों के जीवन चरित्रों की चर्चा होगी।
स्पष्टीकरण (Clarification)

यह सारांश AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग गुरु सेवा में करके तैयार किया गया है। इसमें त्रुटि हो सकती है। कृपया पूर्ण लाभ के लिए पूरा वीडियो अवश्य देखें।

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