पुरुष अभिमान का त्याग और मंजरी भाव की साधना
पुरुष अभिमान का त्याग और मंजरी भाव की साधना
यह सत्संग श्री जयदेव गोस्वामी के माधुर्य-रस से आरम्भ होकर निकुंज लीला की अचिन्त्य प्रकृति को स्पष्ट करता है। सद्गुरुदेव ने स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर के भेद को समझाते हुए बताया कि कैसे भजन द्वारा सूक्ष्म शरीर का नाश होता है। उन्होंने ब्रह्म-सायुज्य और ईश्वर-सायुज्य मुक्ति के अंतर को स्पष्ट किया। सत्संग का मुख्य केंद्रबिंदु 'पुरुष अभिमान' का त्याग था, जिसे मंजरी भाव की साधना के लिए अनिवार्य बताया गया है। श्री मीराबाई के दृष्टांत द्वारा यह समझाया गया कि ब्रज में एकमात्र पुरुष श्रीकृष्ण हैं। साधकों को, चाहे वे स्त्री हों या पुरुष, अपने देह-अभिमान से ऊपर उठकर, निष्ठापूर्वक राधा-कृपा पर आश्रित होकर भजन करने का निर्देश दिया गया है।
📖 आज की शिक्षाएं 📖 आज की विस्तृत शिक्षाएं
- स्थूल शरीर: पंच महाभूतों (अग्नि, जल, आकाश, वायु, पृथ्वी) से निर्मित।
- सूक्ष्म शरीर (लिंग शरीर): गुणमय, अविद्या का स्वरूप, जन्म-मृत्यु का बीज।
- कारण शरीर: मूल इच्छा का स्वरूप, जो अंतिम गति का कारण बनता है।
- बालिका अवस्था: साधक की प्रारंभिक अवस्था
- पित्रालय में रहना: गुरु के सानिध्य में रहकर भजन और शिक्षा ग्रहण करना
- सयानी होना: भजन द्वारा प्रेम में परिपक्व होना, देह-अभिमान का नाश
- ससुराल जाना: निकुंज लीला में प्रवेश की योग्यता प्राप्त करना।
- साधक जीवन में स्त्री-पुरुष के बीच दूरी (Distance) बनाए रखने को 'औचित्य' (उचित/अनिवार्य) मानना。
- मीराबाई के कथन को 'व्यंग्य' या 'उपदेश' समझने की भूल करना。
- प्रातः काल शयनागार से उठाना。
- स्नानागार तक ले जाना。
- सर्वांग में उबटन, तेल आदि लगाना。
- सुगंधित जल से स्नान कराना。
- शुभ्र वस्त्र से सर्वांग का मार्जन करना。
- श्रीकृष्ण के आकर्षण में उलझकर मूल लक्ष्य (श्री राधा की सेवा) को भूल जाना
- बाधाएं आने पर भी साधना पथ पर दृढ़ रहना。
- विफलताओं से निराश होकर साधना छोड़ देना。
यह सारांश AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग गुरु सेवा में करके तैयार किया गया है। इसमें त्रुटि हो सकती है। कृपया पूर्ण लाभ के लिए पूरा वीडियो अवश्य देखें।
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