स्वरूप जागरण: प्रेम साधना का पथ
स्वरूप विस्मृति से स्वरूप जागरण तक: प्रेम साधना का मर्म
यह सत्संग जीव के मूल स्वरूप, जो कि आनंदमय और भगवान का नित्य अंश है, के विस्मरण पर केंद्रित है। सद्गुरुदेव समझाते हैं कि माया के प्रभाव से जीव स्वयं को शरीर मानकर जड़-अभिमान में फँस जाता है। इस आध्यात्मिक रोग का निदान 'स्वरूप जागरण' है। साधना का पथ क्रियात्मक भजन से आरंभ होकर भावात्मक भजन तक पहुँचता है। साधना का परम लक्ष्य सिद्धियाँ नहीं, बल्कि अनन्य प्रेम प्राप्त करना है, क्योंकि प्रेम ही भगवान को वशीभूत करने वाली एकमात्र शक्ति है। अंत में, प्रेम के विभिन्न भावों (दास, सख्य, वात्सल्य) की चर्चा करते हुए, वृंदावन के माधुर्य भाव और 'समर्था रति' को सर्वोच्च साधना के रूप में स्थापित किया गया है।
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- अणिमा: अणु समान सूक्ष्म होना।
- लघिमा: अत्यंत हल्का होना।
- गरिमा: अत्यंत भारी होना।
- प्राप्ति: किसी भी वस्तु को प्राप्त करना।
- प्राकाम्य: इच्छा को तत्काल पूर्ण करना।
- ईशित्व: सब पर शासन/स्वामित्व।
- वशित्व: किसी को भी वश में करना।
- यत्रकामावसायिता: संकल्प मात्र से सब कुछ करना (जैसे परकाया प्रवेश)।
- बालकों की शिकायत पर माता यशोदा ने कृष्ण को डांटकर मुख खोलने को कहा।
- मुख में 'अनंत कोटि ब्रह्मांड' और स्वयं को देखकर भी उनका वात्सल्य कम नहीं हुआ।
- योगमाया ने ऐश्वर्य को ढक लिया, जिससे प्रेम बना रहा।
यह सारांश AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग गुरु सेवा में करके तैयार किया गया है। इसमें त्रुटि हो सकती है। कृपया पूर्ण लाभ के लिए पूरा वीडियो अवश्य देखें।
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