श्री भगवत चर्चा
05 January 2026
भजन-पथ के सूक्ष्म विघ्न: कषाय
स्वरूप-विस्मृति, भक्ति के सोपान, कषाय-विश्लेषण, भरत महाराज का दृष्टांत
Sri Sri 108 Sri Vinod Baba ji Maharaj
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विस्तार
हमारे प्रिय सद्गुरुदेव बताते हैं:
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स्नेह ममता भी बंधन का कारण कैसे बन जाता है, यह पहचान में नहीं आता। देखने में लगता है यह निर्दोष है, लेकिन वह भी भजन को चौपट करने में समर्थ है।
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कषाय (15)भरत महाराज (12)भजन (25)स्नेह-ममता (10)स्वरूप-विस्मृति (8)भाव दशा (7)सत्संग (6)निरापद भूमि (5)
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जीव का भ्रम और दुःख का मूल कारण
इस खंड में सद्गुरुदेव जीव के दुःखों के मूल कारण का विश्लेषण करते हैं। वे बताते हैं कि जीव स्वयं आनंदमय होते हुए भी, अपने स्वरूप को भूलकर जड़ जगत में आनंद की खोज करता है, जो मृगतृष्णा के समान है।
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सद्गुरुदेव बताते हैं कि जीव भगवान का अविनाशी अंश और सदानंदमय होते हुए भी अनंत दुःख के सागर में डूबा हुआ है। वह अपने भीतर आनंद का भंडार होते हुए भी, भिखारी बनकर बाहर की मिथ्या वस्तुओं में आनंद खोज रहा है। यह खोज जन्म-जन्मांतर से चल रही है, फिर भी उसे चेतना नहीं आती।
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि जीव का मूल दुःख उसके भ्रम में निहित है। वह स्वयं आनंद का स्वरूप है, उसे आनंद के लिए किसी बाहरी वस्तु की आवश्यकता नहीं है, ठीक वैसे ही जैसे किसी के घर में खजाना गड़ा हो और वह बाहर भीख मांग रहा हो। जीव यह भूल गया है कि आनंद आत्मधर्मी है, जड़धर्मी नहीं। इसलिए वह बार-बार संसार के नाम-रूपात्मक जड़ पदार्थों में सुख खोजने की कोशिश करता है और हर बार वंचित होता है। यह वंचना जन्मों से चल रही है, फिर भी उसका यह विश्वास नहीं टूटता कि संसार से सुख मिलेगा।
🔗 यह शिक्षा जीव के मूल अज्ञान और दुःख के कारण को स्पष्ट करती है, जो स्वरूप-विस्मृति है।
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दृष्टांत: राजा का भिखारी बनने का स्वप्न
दृष्टांत: स्वप्न का दुःख और जाग्रत का सत्य
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सद्गुरुदेव एक दृष्टांत देते हैं कि जैसे कोई राजा स्वप्न में देखे कि उसका राज-पाट लुट गया है और वह भिखारी बनकर घूम रहा है। वह स्वप्न में दुखी होता है, जबकि वास्तविकता में वह अभी भी राजा ही है। इसी प्रकार, जीव आनंदमय होते हुए भी, माया के स्वप्न में स्वयं को दुखी और अभावग्रस्त मान बैठा है।
सद्गुरुदेव जीव की वर्तमान स्थिति को एक स्वप्न के माध्यम से स्पष्ट करते हैं। जैसे एक राजा वास्तव में अपने महल में सुरक्षित सो रहा है, लेकिन स्वप्न में वह देखता है कि सब कुछ लुट गया और वह दर-दर की ठोकरें खा रहा है। स्वप्न में उसका दुःख वास्तविक प्रतीत होता है, पर है वह मिथ्या। ठीक इसी तरह, जीव अपने सच्चिदानंद स्वरूप में स्थित होते हुए भी, देहाभिमान के स्वप्न के कारण स्वयं को दुखी, अपूर्ण और संसारी मानकर कष्ट भोग रहा है। यह दुःख केवल एक भ्रम है, जो स्वरूप की जागृति से ही मिट सकता है।
🔗 यह दृष्टांत संसार के दुःख की मिथ्या प्रकृति और आत्म-विस्मृति के परिणाम को दर्शाता है।
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सद्गुरुदेव कस्तूरी मृग का उदाहरण देते हैं, जिसकी नाभि में ही कस्तूरी होती है, पर वह उसकी सुगंध से उन्मत्त होकर उसे खोजने के लिए पूरे जंगल में भागता फिरता है। वह बाहर खोजते-खोजते प्राण त्याग देता है, पर यह नहीं जान पाता कि सुगंध का स्रोत उसी के भीतर है। इसी प्रकार जीव आनंद को बाहर खोज रहा है।
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि जीव की दशा उस कस्तूरी मृग जैसी है, जिसकी अपनी ही नाभि में दिव्य सुगंध वाली कस्तूरी होती है। वह उस सुगंध से आकर्षित होकर उसके स्रोत को खोजने के लिए वनों में भटकता रहता है। वह यह नहीं समझ पाता कि जिसे वह बाहर खोज रहा है, वह उसी के भीतर है। इसी अज्ञान में भागते-भागते वह थककर प्राण दे देता है। ठीक इसी प्रकार, आनंद का अखंड स्रोत स्वयं आत्मा है, लेकिन जीव उसे बाहरी विषयों और व्यक्तियों में खोजता फिरता है और अंततः निराश होता है।
🔗 यह दृष्टांत आत्म-अज्ञान और आनंद के स्रोत के बारे में जीव के भ्रम को उजागर करता है।
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संसार में सुख की खोज मृगमरीचिका के समान है। सद्गुरुदेव बताते हैं कि जैसे रेगिस्तान में प्यासा हिरण दूर से सूर्य की किरणों से बनी चमक को पानी समझकर उसकी ओर भागता है। वह भागते-भागते प्राण दे देता है, पर उसे पानी नहीं मिलता क्योंकि वहाँ पानी था ही नहीं। इसी तरह सांसारिक सुख एक छलावा है।
सद्गुरुदेव सांसारिक आनंद की निरर्थकता को मृगमरीचिका के दृष्टांत से समझाते हैं। रेगिस्तान में जब सूर्य की किरणें रेत पर पड़ती हैं, तो दूर से जल का भ्रम उत्पन्न होता है। एक प्यासा मृग उसे सचमुच का जलाशय समझकर अपनी प्यास बुझाने के लिए उसकी ओर दौड़ता है। जैसे-जैसे वह निकट जाता है, वह भ्रम दूर होता जाता है, और अंत में वह थककर प्राण त्याग देता है। इसी प्रकार, संसार के विषय भोग देखने में सुखद लगते हैं, पर वे केवल सुख का आभास हैं, वास्तविक सुख नहीं। जीव इनके पीछे भागकर अपना अनमोल जीवन व्यर्थ कर देता है।
🔗 यह दृष्टांत जागतिक सुख की भ्रामक और असार प्रकृति को दर्शाता है।
भक्ति-पथ के सोपान और भाव-दशा
इस खंड में, सद्गुरुदेव दुःख से निवृत्ति का मार्ग बताते हैं, जो गुरु कृपा से आरम्भ होता है। वे भक्ति के क्रमिक विकास, जैसे श्रद्धा, साधु-संग से लेकर भाव-दशा तक की यात्रा का वर्णन करते हैं, और बताते हैं कि यह अवस्था भी पूरी तरह निरापद नहीं है।
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गुरु की भूमिका: सोई चेतना को जगाना
गुरुदेव का कार्य: आत्म-स्मृति का जागरण
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▶ Watch (7:11)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि इस स्वरूप-विस्मृति के स्वप्न से जीव को केवल गुरु ही जगा सकते हैं। गुरु आकर जीव की सोई हुई चेतन सत्ता को झकझोरते हैं और उसे उसके वास्तविक स्वरूप का बोध कराते हैं। वे बताते हैं, 'तुम यह शरीर नहीं, तुम आनंदमय आत्मा हो, तुम श्री राधा रानी के हो'।
सद्गुरुदेव के अनुसार, जीव जब तक माया की निद्रा में सोया है, तब तक उसके दुःख का अंत नहीं हो सकता। इस निद्रा से उसे केवल सद्गुरुदेव ही जगा सकते हैं। गुरुदेव आकर उसके कान में महामंत्र देते हैं और उसकी सोई हुई चेतना को जाग्रत करते हैं। वे उसे स्मरण दिलाते हैं कि वह यह जड़ शरीर नहीं, बल्कि सच्चिदानंदमय आत्मा है और उसका नित्य संबंध भगवान से है। गुरु की इसी कृपा से साधक को अपनी भूल का एहसास होता है और वह अपने वास्तविक स्वरूप के चिंतन में प्रवृत्त होता है।
🔗 यह शिक्षा आध्यात्मिक यात्रा में गुरु की अनिवार्य और transformative भूमिका को स्थापित करती है।
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सद्गुरुदेव भक्ति-पथ की क्रमिक उन्नति का वर्णन करते हैं। यह यात्रा श्रद्धा से शुरू होती है, फिर साधु-संग, भजन-क्रिया, (अनर्थ निवृति), निष्ठा, रुचि और आसक्ति (अंत में भाव और प्रेम) तक पहुँचती है। आसक्ति की दशा में साधक का मन भगवान में ऐसा लग जाता है कि संसार के प्रति उसकी रुचि लगभग समाप्त हो जाती है।
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि भजन का मार्ग एक क्रमिक प्रक्रिया है। सबसे पहले श्रद्धा उत्पन्न होती है, जिससे साधक साधुओं का संग करता है। फिर गुरु से दीक्षा लेकर भजन-क्रिया आरम्भ होती है। निरंतर अभ्यास से भजन में निष्ठा आती है, फिर रुचि उत्पन्न होती है। रुचि के बाद आसक्ति की अवस्था आती है, जो साधन भक्ति का अंतिम सोपान है। इस अवस्था में भगवान के प्रति इतना गहरा लगाव हो जाता है कि संसार के विषयों से मन स्वतः ही हट जाता है और उन्हें हटाने का प्रयास भी असफल होता है।
🔗 यह शिक्षा भक्ति के व्यवस्थित और मनोवैज्ञानिक विकास को दर्शाती है, जो साधक को धीरे-धीरे उन्नत करती है।
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सद्गुरुदेव बताते हैं कि आसक्ति के बाद भाव दशा आती है, जहाँ भगवत्-प्रीति अत्यंत प्रबल हो जाती है और शरीर के प्रति प्रीति गंध मात्र रह जाती है। इस अवस्था में साधक का मन एक पल के लिए भी भगवान से नहीं हटता, यहाँ तक कि निद्रा में भी भगवत्-चिंतन का आवेश बना रहता है।
सद्गुरुदेव भाव दशा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि यह साधन भक्ति को पार करने के बाद की स्थिति है। इस अवस्था में, साधक की संसार और शरीर के प्रति आसक्ति लगभग शून्य हो जाती है, केवल एक संस्कार मात्र शेष रहता है। वहीं, भगवान के प्रति प्रीति इतनी तीव्र और अखंड हो जाती है कि एक पलक के लिए भी मन उनके चरणों से नहीं हटता। साधक की निद्रा भी सामान्य नहीं रहती; उसमें भी भगवद्-आवेश बना रहता है। यह एक अत्यंत दुर्लभ और उच्च आध्यात्मिक अवस्था है।
🔗 यह शिक्षा भक्ति की एक उन्नत अवस्था का परिचय देती है, जहाँ प्रेम की प्रधानता होती है।
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जड़-चेतन ग्रंथि: बंधन का मूल
बंधन का सूक्ष्म स्वरूप: जड़-चेतन ग्रंथि
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▶ Watch (12:43)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि साधक का मूल बंधन 'जड़-चेतन ग्रंथि' है - यानी जड़ शरीर और चेतन आत्मा का एक हो जाना। जब तक यह ग्रंथि, जो सूक्ष्म शरीर या अविद्या के रूप में है, नष्ट नहीं होती, तब तक साधक पूरी तरह मुक्त नहीं होता और उसके पतन का खतरा बना रहता है।
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि हमारा बंधन केवल इस स्थूल शरीर से नहीं है, बल्कि एक सूक्ष्म 'जड़-चेतन ग्रंथि' से है। यह ग्रंथि जड़ प्रकृति (सूक्ष्म शरीर, लिंग शरीर, अविद्या) और चेतन आत्मा के तादात्म्य से बनती है। यह गुणमयी और बीज-स्वरूपा है। जब तक यह ग्रंथि पूरी तरह से खुल नहीं जाती, तब तक साधक 'निरापद भूमि' में नहीं पहुँचता। भाव दशा में भी यह ग्रंथि बीज रूप में विद्यमान रहती है, इसीलिए वहाँ से भी कभी-कभी पतन की संभावना बनी रहती है।
🔗 यह शिक्षा बंधन के सूक्ष्म और तात्विक कारण पर प्रकाश डालती है, जिसे काटे बिना पूर्ण मुक्ति संभव नहीं है।
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भाव दशा भी निरापद भूमि नहीं
निरापद भूमि की परिभाषा और भाव दशा का खतरा
▶ देखें (11:42)
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सद्गुरुदेव एक महत्वपूर्ण चेतावनी देते हैं कि भाव दशा जैसी उच्च अवस्था भी पूरी तरह सुरक्षित ('निरापद भूमि') नहीं है। इस अवस्था में भी भीतर बीज रूप में आसक्तियाँ छिपी रहती हैं, जो प्रबल विषय-संसर्ग मिलने पर साधक को नीचे गिरा सकती हैं। पूर्ण सुरक्षा तभी मिलती है जब जड़-चेतन ग्रंथि पूरी तरह नष्ट हो जाती है।
सद्गुरुदेव 'निरापद भूमि' की व्याख्या करते हुए बताते हैं कि यह वह अवस्था है जहाँ पहुँचने पर साधक का मन किसी भी परिस्थिति में सांसारिक भोग्य पदार्थों की ओर किंचित मात्र भी आकर्षित नहीं होता। अनंत कोटि ब्रह्मांड का सुख भी उसे विचलित नहीं कर सकता। वे स्पष्ट करते हैं कि भाव-दशा यह निरापद भूमि नहीं है। यद्यपि इस अवस्था में साधक का पतन सामान्यतः नहीं होता, फिर भी कभी-कभी, प्रबल संसर्ग या प्रारब्ध के कारण, भीतर छिपी वासनाएं पुनः उभर सकती हैं और उसे एक-आध जन्म के लिए चक्र में फंसा सकती हैं।
🔗 यह शिक्षा साधक को आध्यात्मिक पथ पर अंतिम लक्ष्य तक पहुँचने तक सावधान रहने की प्रेरणा देती है।
भजन में बाधा: 'कषाय' का स्वरूप
यह खंड भजन-पथ के सबसे सूक्ष्म और खतरनाक शत्रुओं - 'कषाय' - पर केंद्रित है। सद्गुरुदेव बताते हैं कि ये आंतरिक वृत्तियाँ (काम, क्रोध, मोह, ममता) कसाई की तरह भजन-जीवन को काट देती हैं और इनकी चार अवस्थाएं होती हैं।
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सद्गुरुदेव काम, क्रोध, लोभ, मोह, ममता और स्नेह जैसी वृत्तियों को 'कषाय' कहते हैं, जो भीतर बैठे कसाई के समान हैं। जैसे कसाई निर्दयता से पशु की हत्या करता है, वैसे ही ये वृत्तियाँ साधक के भजन-जीवन को नष्ट कर देती हैं। ये देखने में हानिरहित लग सकती हैं, पर अत्यंत घातक हैं।
सद्गुरुदेव एक शक्तिशाली रूपक का प्रयोग करते हुए बताते हैं कि हमारे भीतर 'कषाय' हैं। कषाय का अर्थ है कसाई, जो गो-हत्या करता है। जिस प्रकार कसाई बिना किसी दया-माया के जीव की हत्या कर देता है, उसी प्रकार हमारे भीतर बैठे काम, क्रोध, लोभ, मोह, और विशेषकर सांसारिक स्नेह और ममता, हमारे भजन-जीवन को काट डालते हैं। सद्गुरुदेव चेतावनी देते हैं कि ये वृत्तियाँ, विशेषकर प्रियजनों के प्रति ममता, भजन को चौपट करने में पूर्णतः समर्थ हैं, भले ही वे बाहर से निर्दोष प्रतीत हों।
🔗 यह दृष्टांत आंतरिक शत्रुओं की घातक प्रकृति और भजन में उनकी विनाशकारी भूमिका को उजागर करता है।
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सबसे बड़ा दुःसंग: अपना परिवार
दुःसंग का वास्तविक स्वरूप: बाहरी बनाम भीतरी
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सद्गुरुदेव एक कठोर सत्य बताते हैं कि बाहरी दुःसंग से भी अधिक प्रभावशाली और खतरनाक दुःसंग हमारे घर में ही होता है। अपने स्त्री, पुत्र, और प्रियजनों के प्रति जो ममता और स्नेह है, वही हमारे भजन-जीवन को आगे बढ़ने से रोकता है। एक छोटा सा बच्चा भी हमारे समस्त भजन को चौपट करने की शक्ति रखता है।
सद्गुरुदेव दुःसंग की প্রচলিত धारणा को चुनौती देते हैं। वे कहते हैं कि बाहरी लोगों का संग उतना प्रभावशाली नहीं है, जितना कि अपने प्रियजनों का संग। हम जिन्हें 'अपना' मानते हैं - जैसे स्त्री, पुत्र, परिवार - उनके प्रति हमारा मोह और ममता ही सबसे बड़ा दुःसंग है। वे भले ही हमें भजन करने से न रोकें, लेकिन उनके सुख-दुःख से हमारा मन विचलित हो जाता है और हमारा भजन छूट जाता है। सद्गुरुदेव के अनुसार, यही 'निजी जन' का मोह हमारे भजन-जीवन को चौपट कर रहा है।
🔗 यह शिक्षा साधक को आसक्ति के सबसे सूक्ष्म और अप्रत्याशित रूप के प्रति सचेत करती है।
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कषाय की चार अवस्थाएं
आंतरिक शत्रुओं का विज्ञान: कषाय की चार अवस्थाएं
▶ देखें (19:18)
▶ Watch (19:18)
सद्गुरुदेव भजन की प्रगति के अनुसार कषाय की चार अवस्थाओं का वैज्ञानिक विश्लेषण करते हैं: जाग्रत (सक्रिय), सुप्त (सोया हुआ), मूर्छित (अचेत), और निर्धूत (जड़ से नष्ट)। जब तक कषाय 'निर्धूत' नहीं हो जाता, तब तक खतरा बना रहता है।
सद्गुरुदेव इसे परा-विज्ञान बताते हुए कषाय की चार क्रमिक अवस्थाओं का वर्णन करते हैं। पहली है 'जाग्रत कषाय', जिसमें छोटी-छोटी बातों पर विक्षेप आ जाता है। भजन के अभ्यास से यह 'सुप्त कषाय' बन जाता है, जहाँ वासनाएं सो जाती हैं पर नष्ट नहीं होतीं। और अधिक उन्नति पर, भाव दशा में, यह 'मूर्छित कषाय' हो जाता है, जहाँ वासनाएं अचेत हो जाती हैं और सहसा नहीं जागतीं। अंतिम अवस्था 'निर्धूत कषाय' है, जो प्रेम दशा में प्राप्त होती है, जहाँ वासनाएं समूल नष्ट हो जाती हैं और साधक निरापद हो जाता है।
🔗 यह शिक्षा साधक को अपनी आध्यात्मिक प्रगति का सटीक मूल्यांकन करने और आत्म-संतुष्ट न होने के लिए एक रूपरेखा प्रदान करती है।
दृष्टांत-कथा: भरत महाराज का मोह
यह खंड 'मूर्छित कषाय' के सिद्धांत को समझाने के लिए भरत महाराज की विस्तृत कथा प्रस्तुत करता है। यह दिखाता है कि कैसे एक महान योगी भी, भाव-दशा में स्थित होने के बावजूद, एक छोटी सी ममता के कारण पथ से विचलित हो सकता है।
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कथा: भरत महाराज और हिरण का बच्चा
कथा: राजर्षि भरत का पतन और मोह का जाल
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सद्गुरुदेव चक्रवर्ती राजा भरत की कथा सुनाते हैं, जिन्होंने सब कुछ त्याग कर हिमालय में भजन किया और भाव-दशा तक पहुँचे। एक दिन उन्होंने एक असहाय हिरण के बच्चे को बचाया और उसका पालन-पोषण करने लगे। धीरे-धीरे उस बच्चे के प्रति उनका स्नेह और ममता इतनी बढ़ गई कि उनका भजन छूट गया।
सद्गुरुदेव 'मूर्छित कषाय' का उदाहरण देने के लिए राजर्षि भरत की कथा का वर्णन करते हैं। भरत महाराज एक चक्रवर्ती राजा थे, जिन्होंने भगवत्-प्राप्ति के लिए सब कुछ त्याग दिया और गंडकी नदी के किनारे एकांत में भजन करते हुए भाव-दशा को प्राप्त कर लिया। एक दिन, उन्होंने एक सिंह से भयभीत हरिणी के गर्भ से गिरे शावक को बचाया। करुणावश वे उसका पालन-पोषण करने लगे, लेकिन धीरे-धीरे यह करुणा ममता और गहरे स्नेह में बदल गई। उनका चित्त हर समय उस हिरण में ही लगा रहने लगा, जिससे उनका भजन बाधित हो गया और वे अपने लक्ष्य से भटक गए।
🔗 यह कथा दर्शाती है कि आध्यात्मिक पथ पर उच्चतम अवस्था में भी ममता और स्नेह का कषाय कितना प्रबल और विनाशकारी हो सकता है।
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कथा: अंत समय की स्मृति और अगला जन्म
कथा: अंत मति सो गति - भरत महाराज का हिरण जन्म
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उस हिरण के प्रति आसक्ति इतनी गहरी हो गई कि मृत्यु के समय भी भरत महाराज उसी का चिंतन कर रहे थे। 'अंतकाले च मामेव' के सिद्धांत के अनुसार, अंतिम समय में हिरण का चिंतन करने के कारण उन्हें अगला जन्म हिरण का ही मिला। यह दर्शाता है कि अंत समय की स्मृति कितनी निर्णायक होती है।
सद्गुरुदेव बताते हैं कि भरत महाराज का उस हिरण-शावक के प्रति मोह इतना प्रबल हो गया कि उनका जीवन उसी के इर्द-गिर्द घूमने लगा। जब उनका अंत समय आया, तो वे व्याकुल होकर उसी हिरण का चिंतन कर रहे थे। भगवद्गीता के सिद्धांत के अनुसार, मृत्यु के समय जीव जिस भाव का स्मरण करता है, उसे वही गति प्राप्त होती है। इसी कारण, हिरण का चिंतन करते-करते शरीर छोड़ने से एक महान योगी को अगले जन्म में हिरण की देह प्राप्त हुई। यह 'मूर्छित कषाय' के जाग्रत होने का भयावह परिणाम था।
🔗 यह प्रसंग भगवद्गीता के 'यं यं वापि स्मरन् भावं' श्लोक के व्यावहारिक प्रमाण को दर्शाता है।
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भरत का हिरण जन्म: पतन नहीं, शोधन
भगवत् कृपा: भरत महाराज का पतन या शुद्धि?
▶ देखें (39:32)
▶ Watch (39:32)
सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि भरत महाराज का हिरण बनना उनका पतन नहीं, बल्कि एक शोधन प्रक्रिया थी। भगवान की कृपा से उन्हें 'जातिस्मर' (पूर्व जन्म का ज्ञान) के रूप में जन्म मिला। उस जन्म में उन्होंने अपनी भूल को समझा और मुनियों के संग में रहकर अपने कषाय को पूरी तरह समाप्त कर दिया, जिससे अगले जन्म में वे 'जड़ भरत' के रूप में मुक्त हो गए।
सद्गुरुदेव एक महत्वपूर्ण रहस्योद्घाटन करते हैं कि भरत महाराज का हिरण योनि में जाना वास्तव में उनका पतन नहीं था, बल्कि भगवान की विशेष कृपा से एक तीव्र शोधन प्रक्रिया थी। उन्हें हिरण के रूप में भी अपने पूर्व जन्म की स्मृति बनी रही, जिसे 'जातिस्मर' कहते हैं। इस स्मृति के कारण वे अपनी भूल को समझ पाए। वे मुनियों के आश्रम में रहते, हरि-कथा सुनते और उनका प्रसाद पाते। इस एक जन्म में ही उनके भीतर के समस्त कषाय 'निर्धूत' हो गए। यह पतन नहीं, बल्कि तीव्र गति से शुद्धि थी, ताकि वे अगले जन्म में पूर्ण मुक्त हो सकें।
🔗 यह शिक्षा भगवान की अहैतुकी कृपा और भक्त के प्रति उनकी रक्षा की प्रतिज्ञा को दर्शाती है।
युद्ध और विजय: प्रवृत्ति-निवृत्ति का संग्राम
अंतिम खंड में, सद्गुरुदेव साधक के भीतर चलने वाले निरंतर संघर्ष का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि यह प्रवृत्ति (संसार) और निवृत्ति (भक्ति) के बीच एक युद्ध है, जिसमें विजय के लिए निरंतर अभ्यास और सत्संग आवश्यक है।
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भीतर का युद्ध: प्रवृत्ति बनाम निवृत्ति
आंतरिक कुरुक्षेत्र: प्रवृत्ति और निवृत्ति का संग्राम
▶ देखें (31:27)
▶ Watch (31:27)
सद्गुरुदेव गीता के 'युद्धस्व' का आध्यात्मिक अर्थ समझाते हैं। यह बाहरी युद्ध नहीं, बल्कि साधक के भीतर दैवी शक्ति (निवृत्ति) और आसुरी शक्ति (प्रवृत्ति) के बीच चल रहा निरंतर संग्राम है। एक शक्ति भोग की ओर खींचती है, दूसरी योग की ओर। साधक को विवेक के साथ यह युद्ध लड़ना पड़ता है।
सद्गुरुदेव भगवद्गीता के 'युद्ध च' (और युद्ध कर) का गूढ़ अर्थ स्पष्ट करते हैं। वे बताते हैं कि यह युद्ध कुरुक्षेत्र का बाहरी युद्ध नहीं, बल्कि हर साधक के हृदय में चलने वाला आंतरिक संग्राम है। यह युद्ध दो शक्तियों के बीच है: प्रवृत्ति (भोग की ओर खींचने वाली आसुरी शक्ति) और निवृत्ति (योग की ओर ले जाने वाली दैवी शक्ति)। एक तरफ माया और भोग की वृत्ति हमें संसार में खींचती है, तो दूसरी तरफ विवेक और सत्संग का प्रभाव हमें भजन में लगाना चाहता है। साधक को इस युद्ध में दैवी शक्ति को प्रबल करने के लिए निरंतर संघर्ष करना पड़ता है।
🔗 यह शिक्षा साधना के संघर्षपूर्ण स्वरूप को स्वीकार करती है और साधक को निरंतर प्रयास के लिए प्रोत्साहित करती है।
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सत्संग का महत्व: दैवी शक्ति का स्रोत
विजय का उपाय: सत्संग से दैवी शक्ति का वर्धन
▶ देखें (33:29)
▶ Watch (33:29)
इस आंतरिक युद्ध में विजय पाने का सबसे उत्तम माध्यम सत्संग है। सद्गुरुदेव बताते हैं कि सत्संग और साधु-संग से साधक की दैवी शक्ति (विवेक) प्रबल होती है। इसके विपरीत, बहिर्मुख लोगों के संग से आसुरी शक्ति (भोग-वृत्ति) को खुराक मिलती है और वह प्रबल हो जाती है।
सद्गुरुदेव इस आंतरिक संग्राम में विजय का अचूक उपाय बताते हैं - सत्संग। जब साधक सत्संग और साधु-संग में रहता है, तो उसकी विवेक-शक्ति और दैवी-गुण प्रबल होते हैं। सत्संग से उसे आध्यात्मिक बल मिलता है, जिससे वह माया की आसुरी शक्तियों का सामना कर पाता है। इसके विपरीत, यदि वह संसारी और भोग-मुखी लोगों का संग करता है, तो उसकी आसुरी वृत्तियों को पोषण मिलता है और उसकी दैवी शक्ति क्षीण हो जाती है। अतः, साधक के लिए सत्संग जीवन का उत्तम माध्यम है।
🔗 यह शिक्षा आध्यात्मिक उन्नति के लिए सत्संग की अपरिहार्य भूमिका को रेखांकित करती है।
✨ विशेष उल्लेख
📋 कषाय के चार प्रकार
▶ 19:18
▶ देखें (19:18)
- जाग्रत कषाय: भजन करते हुए भी छोटी-छोटी बातों पर क्रोध, विक्षेप और इन्द्रिय चंचलता का आ जाना।
- सुप्त कषाय: भजन में उन्नति होने पर कषायों का शांत हो जाना, जैसे सोया हुआ दुष्ट बालक। यह आसक्ति दशा में होता है।
- मूर्छित कषाय: कषायों का अचेत अवस्था में चले जाना, जिन्हें सहसा जाग्रत नहीं किया जा सकता। यह भाव दशा में होता है।
- निर्धूत कषाय: प्रेम दशा में कषायों का जड़ से समाप्त हो जाना, जब साधक निरापद भूमि में पहुँच जाता है।
📋 भक्ति के सोपान (संक्षेप में)
▶ 9:12
▶ देखें (9:12)
- श्रद्धा
- साधु-संग
- भजन-क्रिया
- (अनर्थ निवृति)
- निष्ठा
- रुचि
- आसक्ति
- भाव
- प्रेम
✨ चरित्र: भरत महाराज
▶ 22:20
▶ देखें (22:20)
"चक्रवर्ती राजा भरत, जिन्होंने सब कुछ त्यागकर भजन किया, परन्तु एक हिरण के बच्चे के प्रति मोह के कारण उन्हें अगला जन्म हिरण का लेना पड़ा। यह कथा 'मूर्छित कषाय' का सबसे बड़ा उदाहरण है।"
जिज्ञासा (Q&A)
प्रश्न: दुःख से निवृत्ति का उपाय क्या है?
▶ देखें (6:41)
▶ देखें (6:41)
उत्तर: सद्गुरुदेव बताते हैं कि दुःख से निवृत्ति का एकमात्र उपाय गुरु कृपा से अपनी सोई हुई चेतन सत्ता को जगाना है। गुरु ही हमें हमारे वास्तविक आनंदमय स्वरूप का बोध कराते हैं, जिससे बाहरी खोज समाप्त होती है और आंतरिक यात्रा आरंभ होती है।
उत्तर: सद्गुरुदेव के अनुसार, जब तक जीव स्वरूप-विस्मृति की निद्रा में सोया है, तब तक दुःख से निवृत्ति का कोई उपाय नहीं है। गुरुदेव ही उस सोई हुई चेतना को जगाते हैं और उसे बताते हैं कि 'तुम यह शरीर नहीं, तुम आनंदमय आत्मा हो, तुम श्री राधा रानी के नित्य संबंधी हो।' जब साधक इस सत्य को स्वीकार कर उपासना पद्धति को अपनाता है और अपने स्वरूप का चिंतन करता है, तब धीरे-धीरे उसकी जड़ बुद्धि और सांसारिक रुचि समाप्त होने लगती है और वह दुःख से मुक्त होने लगता है।
प्रश्न: भरत महाराज की वास्तविक भूल क्या थी? क्या एक प्राणी को बचाना भूल है?
▶ देखें (36:31)
▶ देखें (36:31)
उत्तर: सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि हिरण शावक को बचाना भूल नहीं थी, वह तो धर्म था। भूल थी उसे बचाने के बाद उसका 'पालन-पोषण' करना और उससे ममता जोड़ लेना। एक त्यागी के लिए किसी भी वस्तु या प्राणी का पालन-पोषण करना और उससे स्नेह करना निषिद्ध है, क्योंकि यह आसक्ति को जन्म देता है जो भजन में बाधक है।
उत्तर: सद्गुरुदेव के अनुसार, भरत महाराज की भूल करुणा में नहीं थी, बल्कि करुणा के बाद उत्पन्न हुई ममता में थी। एक मरते हुए प्राणी को बचाना साधु का कर्तव्य है, लेकिन एक विरक्त त्यागी के लिए उसे अपने पास रखकर उसका पालन-पोषण करना वर्जित है। ऐसा करने से धीरे-धीरे उसके प्रति स्नेह और ममता का बंधन उत्पन्न हो जाता है, जो चित्त को भगवान से हटाकर उस प्राणी में लगा देता है। भरत महाराज को उसे बड़ा करके जंगल में छोड़ देना चाहिए था, लेकिन उन्होंने उसे पाला, यही उनकी भूल थी जो उनके पतन का कारण बनी।
प्रश्न: जड़ वस्तु क्या है?
▶ देखें (2:36)
▶ देखें (2:36)
उत्तर: सद्गुरुदेव के अनुसार, आँख खोलकर जो भी नाम-रूपात्मक वस्तु या पदार्थ हम देखते हैं, जिसका कोई नाम और रूप है, उसे ही जड़ वस्तु कहते हैं। यह संसार जड़ है, जबकि आत्मा चेतन-धर्मी है।
उत्तर: सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि जड़ और चेतन में मौलिक भेद है। जो कुछ भी हमारी इन्द्रियों द्वारा देखा, सुना या अनुभव किया जा सकता है, जिसका एक निश्चित नाम और एक निश्चित रूप है, वह सब जड़ की श्रेणी में आता है। यह सम्पूर्ण दृश्यमान संसार नाम-रूपात्मक होने के कारण जड़ है। इसके विपरीत, आत्मा चेतन-धर्मी है, उसका कोई भौतिक नाम या रूप नहीं है, और वह स्वयं आनंद का स्वरूप है। जीव की समस्या यह है कि वह चेतन होते हुए भी जड़ में आनंद खोजता है, जहाँ आनंद है ही नहीं।
प्रश्न: जागतिक आनंद समय के साथ कम क्यों हो जाता है?
▶ देखें (6:41)
▶ देखें (6:41)
उत्तर: सद्गुरुदेव बताते हैं कि जागतिक आनंद 'क्रोम ह्रास मान' होता है, यानी समय के साथ घटता जाता है। इसका कारण यह है कि जड़ वस्तु में स्थायी आनंद है ही नहीं। जो आनंद पहले अनुभव होता है, वह केवल एक मानसिक आरोप या भावना है, वास्तविक नहीं।
उत्तर: सद्गुरुदेव एक व्यावहारिक उदाहरण से समझाते हैं कि जागतिक आनंद स्थायी क्यों नहीं है। जैसे पहला रसगुल्ला खाने में बहुत आनंद आता है, दूसरे में कम, तीसरे में और कम, और पाँचवें-छठे तक वह ज़हर जैसा लगने लगता है। सद्गुरुदेव प्रश्न करते हैं कि यदि वस्तु में आनंद होता, तो वह हर बार मिलना चाहिए था। आनंद का घटना यह सिद्ध करता है कि वह वस्तु में नहीं, बल्कि हमारे मन के एक अस्थायी आरोप में था। यह 'क्रोम ह्रास मान उपयोग विधि' यह दर्शाती है कि जड़ पदार्थों से मिलने वाला सुख मिथ्या और क्षणिक है।
✅ करें (Do's)
- अपने आनंदमय स्वरूप का चिंतन करें।
- गुरुदेव के उपदेशों पर श्रद्धा रखें।
- निरंतर भजन का अभ्यास करें।
- सत्संग और साधु-संग में रहकर अपनी दैवी शक्ति को बढ़ाएं।
- अपने भीतर प्रवृत्ति और निवृत्ति के युद्ध में विवेक का साथ दें।
❌ न करें (Don'ts)
- जड़ वस्तुओं में स्थायी आनंद खोजने का भ्रम न पालें।
- पारिवारिक स्नेह और ममता को भजन से ऊपर न रखें।
- बहिर्मुख और संसारी लोगों का अधिक संग न करें।
- भजन में थोड़ी उन्नति होने पर आत्म-संतुष्ट न हो जाएं।
- त्यागी होने पर किसी प्राणी के पालन-पोषण के मोह में न पड़ें।
शास्त्र प्रमाण (Scriptural References)
इस खंड में वे श्लोक व कथा-प्रसंग सम्मिलित हैं जो सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित किए गए हैं या सत्संग के भाव को समझने में सहायक संदर्भ के रूप में दिए गए हैं।
मंगलाचरण वैष्णव प्रणाम
मंगलाचरण वैष्णव प्रणाम
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव ने सत्संग का आरम्भ इस पारंपरिक मंगलाचरण से किया, जिसमें गुरु, गौर, राधा-कृष्ण और उनके भक्तों को प्रणाम करके कृपा की याचना की जाती है।
गुरुवे गौरचन्द्राय राधिकायै तदालये। कृष्णाय कृष्णभक्ताय तद्भक्ताय नमो नमः॥
guruve gauracandrāya rādhikāyai tadālaye। kṛṣṇāya kṛṣṇabhaktāya tadbhaktāya namo namaḥ॥
मैं श्री गुरुदेव, श्री गौरचंद्र, श्रीमती राधिका और उनके धाम, श्रीकृष्ण, कृष्ण-भक्तों और उनके भक्तों को नमस्कार करता हूँ।
भगवद् गीता 15.6
Bhagavad Gita 15.6
पूरक संदर्भ (Siddhant)
पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव ने 'निरापद भूमि' का वर्णन करते हुए इस श्लोक के भाव ('यद्गत्वा न निवर्तन्ते') का उल्लेख किया, यह समझाने के लिए कि निरापद भूमि वही है जहाँ पहुँचकर साधक का फिर कभी संसार में पतन नहीं होता।
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः। यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥
na tad bhāsayate sūryo na śaśāṅko na pāvakaḥ। yad gatvā na nivartante tad dhāma paramaṁ mama॥
उस परम पद को न सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चन्द्रमा और न ही अग्नि। जहाँ जाकर कोई वापस नहीं लौटता, वही मेरा परम धाम है।
भगवद् गीता 8.5
Bhagavad Gita 8.5
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
भरत महाराज की कथा के संदर्भ में, सद्गुरुदेव ने इस श्लोक को उद्धृत करते हुए समझाया कि अंत समय की स्मृति कितनी महत्वपूर्ण है। चूँकि भरत महाराज ने अंत समय में हिरण का स्मरण किया, इसलिए उन्हें हिरण का जन्म मिला।
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्। यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥
antakāle ca mām eva smaran muktvā kalevaram। yaḥ prayāti sa madbhāvaṁ yāti nāsty atra saṁśayaḥ॥
जो व्यक्ति अंतकाल में भी मेरा ही स्मरण करते हुए शरीर का त्याग करता है, वह मेरे ही भाव (स्वरूप) को प्राप्त होता है, इसमें कोई संशय नहीं है।
भगवद् गीता 8.7
Bhagavad Gita 8.7
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
इस श्लोक के माध्यम से सद्गुरुदेव ने अंत समय में भगवत्-स्मरण का उपाय बताया। वे कहते हैं कि भगवान अर्जुन को निर्देश दे रहे हैं कि अंत समय में स्मरण बना रहे, इसके लिए अभी से, हर समय मेरा स्मरण करने का अभ्यास करो और साथ ही अपने कर्तव्य का (आंतरिक प्रवृत्ति-निवृत्ति का) युद्ध भी करो।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च। मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥
tasmāt sarveṣu kāleṣu mām anusmara yudhya ca। mayy arpita-mano-buddhir mām evaiṣyasy asaṁśayam॥
इसलिए, हे अर्जुन! तुम सब समय मेरा स्मरण करो और युद्ध भी करो। इस प्रकार मुझमें अर्पित मन-बुद्धि से युक्त होकर तुम निःसंदेह मुझे ही प्राप्त करोगे।
भगवद् गीता 15.7
Bhagavad Gita 15.7
पूरक संदर्भ (Siddhant)
पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि जीव भगवान का अविनाशी अंश है, जो सनातन रूप से भगवान से जुड़ा हुआ है।
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः। मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥
इस संसार में जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है। वह प्रकृति में स्थित मन सहित छह इंद्रियों को आकर्षित करता है।
Taittiriya उपनिषद 2.5.1
Taittiriya Upanishad 2.5.1
पूरक संदर्भ (Siddhant)
पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि आत्मा का स्वभाव ही आनंदमय है, और आत्मा तथा आनंद एक ही पदार्थ हैं, जड़ वस्तुओं में आनंद नहीं है।
आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्। आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। आनन्देन जातानि जीवन्ति। आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति॥
उसने जाना कि आनंद ही ब्रह्म है। क्योंकि आनंद से ही ये सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं, आनंद से ही जीवित रहते हैं, और आनंद में ही प्रवेश करते हैं।
भगवद् गीता 13.22
Bhagavad Gita 13.22
पूरक संदर्भ (Siddhant)
पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव बताते हैं कि जीव की भौतिक वस्तुओं के प्रति आसक्ति ही उसे बार-बार जन्म-मृत्यु के चक्र में फंसाती है और आनंद से वंचित करती है।
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्। कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु॥
प्रकृति में स्थित पुरुष प्रकृति से उत्पन्न गुणों को भोगता है। इन गुणों का संग ही उसे अच्छी-बुरी योनियों में जन्म लेने का कारण बनता है।
भगवद् गीता 2.16
Bhagavad Gita 2.16
पूरक संदर्भ (Siddhant)
पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव गुरु के उपदेश का सार बताते हैं कि जीव शरीर नहीं है और न ही शरीर से संबंधित वस्तुएँ हैं, बल्कि वह आनंदमय आत्मा है।
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः। उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः॥
असत् (अस्थायी) का कोई अस्तित्व नहीं है और सत् (शाश्वत) का कभी अभाव नहीं होता। इन दोनों का तत्वदर्शी ज्ञानियों द्वारा देखा गया है।
भगवद् गीता 16.21
Bhagavad Gita 16.21
पूरक संदर्भ (Siddhant)
पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव काम, क्रोध, लोभ आदि को 'कषाय' (अशुद्धियाँ) बताते हैं जो भजन जीवन को नष्ट कर देते हैं, जैसा कि गीता में वर्णित है।
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥
नरक के ये तीन द्वार हैं, जो आत्मा का नाश करते हैं: काम, क्रोध और लोभ। इसलिए इन तीनों का त्याग करना चाहिए।
भगवद् गीता 8.6
Bhagavad Gita 8.6
पूरक संदर्भ (Siddhant)
पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव बताते हैं कि मृत्यु के समय जीव जिस भाव का चिंतन करता है, उसी के अनुसार उसे अगला शरीर प्राप्त होता है, जैसा कि महाराज भरत के उदाहरण में देखा गया।
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्। तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥
हे कुंतीपुत्र! मनुष्य अंतकाल में जिस-जिस भी भाव का स्मरण करता हुआ शरीर त्यागता है, वह सदा उसी भाव से भावित होने के कारण उसी को प्राप्त होता है।
भगवद् गीता 3.36
Bhagavad Gita 3.36
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव बताते हैं कि कैसे माया और भोगवृत्ति जीव को बलपूर्वक पाप कर्मों की ओर खींच लेती है, जैसा कि अर्जुन के प्रश्न में वर्णित है।
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः। अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः॥
अर्जुन ने कहा: हे वृष्णिवंशी! मनुष्य न चाहते हुए भी, बलपूर्वक लगाए गए के समान, किससे प्रेरित होकर पाप करता है?
श्रीमद् भागवतम् 5.8.27
Srimad Bhagavatam 5.8.27
पूरक संदर्भ (Siddhant)
पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव बताते हैं कि महाराज भरत ने हिरण के रूप में जन्म लेने के बाद भी अपने पूर्व जन्मों की स्मृति (जातिस्मरत्व) को बनाए रखा, जिससे उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ।
स वै भगवत्पार्श्वचरानुभावेन जातिस्मरत्वं लब्ध्वापि देहकेन हरिणेन व्यवहितमप्यव्यवहितमिव स्वपूर्वजन्मादि सानुभवं स्मरति स्म॥
भगवान के पार्षदों के प्रभाव से उसने जातिस्मरत्व प्राप्त कर लिया था, और यद्यपि वह हिरण के शरीर में था, फिर भी उसे अपने पूर्व जन्मों का अनुभव सहित स्मरण हो रहा था।
स्पष्टीकरण (Clarification)
यह सारांश AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग गुरु सेवा में करके तैयार किया गया है। इसमें त्रुटि हो सकती है। कृपया पूर्ण लाभ के लिए पूरा वीडियो अवश्य देखें।
भजन-पथ के सूक्ष्म विघ्न: कषाय, स्वरूप-विस्मृति, भक्ति के सोपान, कषाय-विश्लेषण, भरत महाराज का दृष्टांत
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