मंजरी भाव: सेवा की सर्वोच्च पराकाष्ठा
संसार चक्र के दुःस्वप्न से जागकर, श्री राधा रानी के नित्य निकुंज में मंजरी स्वरूप से प्रवेश कर दिव्य सेवा प्राप्त करने की गहन साधना प्रक्रिया का विस्तृत विवेचन।
यह सत्संग जीवात्मा के अनादि संसार चक्र के दुःस्वप्न से मुक्ति की यात्रा का मार्गदर्शन करता है। सद्गुरुदेव समझाते हैं कि मानव जन्म और गुरु कृपा का सौभाग्य पाकर साधक को माया के आकर्षण से मुँह मोड़कर, भरत महाराज के दृष्टांत से सीखते हुए, भजन में दृढ़ रहना चाहिए। सत्संग में सात्विक, राजसिक, तामसिक और निर्गुण इच्छाओं का भेद स्पष्ट करते हुए, श्री राधा रानी की सेवा की 'निर्गुण इच्छा' को ही परम लक्ष्य बताया गया है। प्रेम की अवस्था में सूक्ष्म शरीर के नाश के उपरांत, जीव भौम लीला में प्रवेश कर 'हायर एजुकेशन' की तरह स्नेह, मान, प्रणय से महाभाव तक की यात्रा करता है। अंततः, सत्संग मंजरी स्वरूप के रहस्य, राधा रानी के साथ उनके अभेद संबंध और निकुंज में दिव्य सेवा के सर्वोच्च पुरस्कारों का मार्मिक वर्णन करता है।
📖 आज की शिक्षाएं 📖 आज की विस्तृत शिक्षाएं
- मानव जन्म की प्राप्ति
- सद्गुरु की कृपा का मिलना
- श्री राधा रानी के दिव्य धाम (ब्रज) में वास
- साधु-संग का अवसर
- सांसारिक सुखों या संबंधों की ओर वापस मुड़कर देखें।
- कष्ट या निराशा आने पर भजन का मार्ग छोड़ें।
- जानबूझकर मूक रहना।
- सांसारिक कार्यों में कोई रुचि न दिखाना।
- पिता के सिखाने पर भी गायत्री मंत्र का सही उच्चारण न करना।
- सांसारिक दृष्टि से हर काम को बिगाड़ देना ताकि कोई और काम न सौंपे।
- साधना द्वारा प्रेम की अवस्था तक पहुँचना।
- प्रेम रूपी सूर्य का हृदय में उदय होना।
- अविद्या ग्रंथि (सूक्ष्म/लिंग शरीर) का ढीला पड़ना और नष्ट हो जाना।
- संसार चक्र से पूर्ण मुक्ति और निरापद भूमि की प्राप्ति।
- सात्विक: मंदिर, धर्मशाला बनाना, यश-कीर्ति की इच्छा। (पुण्य लोक)
- राजसिक: घर, परिवार, गाड़ी, सांसारिक सुख की इच्छा। (पुनः मनुष्य लोक)
- तामसिक: अतृप्त इंद्रिय भोग की लालसा। (पशु आदि नीच योनि)
- निर्गुण: श्री राधा-कृष्ण की सेवा की इच्छा। (भगवद्धाम)
- साधना द्वारा प्राप्य (भौतिक शरीर से): श्रद्धा, साधु-संग, भजन-क्रिया, अनर्थ-निवृत्ति, निष्ठा, रुचि, आसक्ति, भाव, प्रेम।
- कृपा द्वारा प्राप्य (चिन्मय शरीर से): स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग, भाव, महाभाव।
रासेश्वरि नमस्तेऽस्तु कृष्णप्राणाधिकप्रिये ॥
नमस्त्रैलोक्यजननि प्रसीद करुणार्णवे ।
ब्रह्माविष्णुशिवादिभिर्वन्दितपदाम्बुजे ॥
नमः सरस्वती रूपे नमो सावित्री शङ्करि ।
गंगा पद्मावतीरूपे षष्ठी मङ्गलचण्डिके ॥
नमस्ते तुलसीरूपे नमो लक्ष्मीस्वरूपिणी ।
नमो दुर्गे भगवति नमस्ते सर्वस्वरूपिणी ॥
मूलप्रकृतिरूपां त्वां भजामि करुणार्णवाम् ।
संसारसागरादस्मादुद्धराम्ब दयां कुरु ॥
हे सरस्वती, सावित्री और शंकरी (पार्वती) रूपिणी! हे गंगा, पद्मावती, षष्ठी और मंगलचण्डिका रूपिणी! हे तुलसी और लक्ष्मी स्वरूपा! हे भगवती दुर्गे! हे सर्वस्वरूपिणी! आपको नमस्कार है।
हे करुणा की सागर! आप जो मूल प्रकृति स्वरूपा हैं, मैं आपका भजन करता हूँ। हे माँ! मुझ पर दया करें और इस संसार सागर से मेरा उद्धार करें।
हिमाद्रिजापुलोमजाविरञ्चिजावरप्रदे।
अपारसिद्धिऋद्धिदिग्धसत्पदाङ्गुलीनखे
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम्॥
- स्वभाव में समानता
- केवल देह का भेद
- एक ही प्राण, एक ही आत्मा
- राधा रानी का सुख ही मंजरी का सुख है
- श्री राधा रानी का आलिंगन।
- अपनी ओढ़नी (चुंदरी) प्रदान करना।
- गजमोती का हार पहनाना।
- स्नेहपूर्ण चुंबन।
- सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार: अपने मुख का चर्बित तांबूल प्रदान करना।
यह सारांश AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग गुरु सेवा में करके तैयार किया गया है। इसमें त्रुटि हो सकती है। कृपया पूर्ण लाभ के लिए पूरा वीडियो अवश्य देखें।
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