[Study Guide : Jan 8, 2026] संसार चक्र के दुःखों से निवृत्ति, भजन में दृढ़ता, मंजरी भाव सेवा की पराकाष्ठा

0
Thumbnail
श्री भगवत चर्चा
09 January 2026

मंजरी भाव: सेवा की सर्वोच्च पराकाष्ठा

संसार चक्र के दुःस्वप्न से जागकर, श्री राधा रानी के नित्य निकुंज में मंजरी स्वरूप से प्रवेश कर दिव्य सेवा प्राप्त करने की गहन साधना प्रक्रिया का विस्तृत विवेचन।

Sri Sri 108 Sri Vinod Baba ji Maharaj
पूरा सत्संग देखें
पढ़ने का तरीका चुनें:
संक्षेप विस्तार
Quote Decor
हमारे प्रिय सद्गुरुदेव बताते हैं:
" हमारी इच्छा समाप्ति नहीं, हमारी इच्छा है - हम राधारानी की सेवा करेंगे, राधारानी की बनेंगे। यह निर्गुण इच्छा है, यह इच्छा चाहिए। "
मंजरी (25)राधा रानी (30)सेवा (15)इच्छा (12)सूक्ष्म शरीर (6)भौम लीला (5)पुरस्कार (8)
🔍 सत्संग सार (Summary)

यह सत्संग जीवात्मा के अनादि संसार चक्र के दुःस्वप्न से मुक्ति की यात्रा का मार्गदर्शन करता है। सद्गुरुदेव समझाते हैं कि मानव जन्म और गुरु कृपा का सौभाग्य पाकर साधक को माया के आकर्षण से मुँह मोड़कर, भरत महाराज के दृष्टांत से सीखते हुए, भजन में दृढ़ रहना चाहिए। सत्संग में सात्विक, राजसिक, तामसिक और निर्गुण इच्छाओं का भेद स्पष्ट करते हुए, श्री राधा रानी की सेवा की 'निर्गुण इच्छा' को ही परम लक्ष्य बताया गया है। प्रेम की अवस्था में सूक्ष्म शरीर के नाश के उपरांत, जीव भौम लीला में प्रवेश कर 'हायर एजुकेशन' की तरह स्नेह, मान, प्रणय से महाभाव तक की यात्रा करता है। अंततः, सत्संग मंजरी स्वरूप के रहस्य, राधा रानी के साथ उनके अभेद संबंध और निकुंज में दिव्य सेवा के सर्वोच्च पुरस्कारों का मार्मिक वर्णन करता है।

🧱 ज्ञान प्रवाह (Concept Map)
graph TD A[संसार चक्र का दुःस्वप्न] --> B(मानव जन्म का सौभाग्य); B --> C{माया का आकर्षण: पीछे मुड़कर न देखें}; C --> D[भरत महाराज का दृष्टांत]; D --> E(साधक की सावधानी: घोड़े की पट्टी का दृष्टांत); E --> F[ज्ञान की सार्थकता: गीता 7.19]; F --> G(चार प्रकार की इच्छाएं); G --> H[निर्गुण इच्छा: राधा-सेवा]; H --> I(प्रेम अवस्था: सूक्ष्म शरीर का नाश); I --> J[दिव्य लीला में प्रवेश: भौम लीला]; J --> K(मंजरी स्वरूप का रहस्य); K --> L{दिव्य सेवा का आनंद: भूख-प्यास लीला}; L --> M[सेवा प्राप्ति के पुरस्कार];

📖 आज की शिक्षाएं 📖 आज की विस्तृत शिक्षाएं

अध्याय १: संसार का दुःस्वप्न और मानव जीवन का सौभाग्य
जीवात्मा की अनादि कालीन बद्ध अवस्था, संसार की स्वप्नवत प्रकृति और इससे निकलने के लिए मानव जन्म की महत्ता को स्थापित करना।
🕉️
मंगलाचरण एवं सत्संग का आरंभ
गुरु-परंपरा एवं इष्ट को नमन
▶ देखें (0:20) ▶ Watch (0:20)
सद्गुरुदेव श्री गुरु, श्री राधिका और श्री कृष्ण एवं उनके भक्तों को प्रणाम करते हुए सत्संग का आरंभ करते हैं। सत्संग के आरंभ में, सद्गुरुदेव अपनी गुरु-परंपरा को नमन करते हैं। वे श्री गुरु, गुरुदेव श्री गौरचंद्र, श्री राधिका जी, जो उनकी इष्ट हैं, और श्री कृष्ण एवं उनके समस्त भक्तों के प्रति अपना सादर प्रणाम निवेदित करते हैं। यह मंगलाचरण सत्संग की दिव्यता और उसके उद्देश्य की पवित्रता को स्थापित करता है।
🔗 प्रत्येक आध्यात्मिक कार्य का आरंभ मंगलाचरण से होता है, जो कार्य की निर्विघ्न समाप्ति और कृपा प्राप्ति हेतु आवश्यक है।
परंपरागत मंगलाचरण वंदना
▶ 0:20
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सत्संग के आरंभ में सद्गुरुदेव द्वारा अपनी गुरु-परंपरा और इष्टदेव को प्रणाम।
गुरवे गौर चंद्राय राधिकायै तदालये। कृष्णाय कृष्ण भक्ताय तद भक्ताय नमो नमः॥
मैं श्री गुरुदेव, श्री गौरचंद्र, श्री राधिका और उनके धाम को, श्री कृष्ण, उनके भक्तों और उन भक्तों के भी भक्तों को बारंबार नमन करता हूँ।
🌀
जीवात्मा का संसार-चक्र: एक दुःस्वप्न
स्वप्न-दृष्टांत द्वारा संसार की नश्वरता का बोध
▶ देखें (1:31) ▶ Watch (1:31)
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि जीवात्मा अनादिकाल से संसार रूपी दुःख के सागर में भटक रहा है। यह अवस्था एक जागृत स्वप्न की तरह है, जिससे जागने पर ही मुक्ति संभव है। सद्गुरुदेव बताते हैं कि जीवात्मा का भगवान से कभी वियोग नहीं हुआ, फिर भी वह एक स्वप्न की अवस्था में है। जैसे स्वप्न में व्यक्ति भूत देखकर डरता है, जबकि वह मिथ्या है, पर डर तब तक नहीं जाता जब तक नींद न टूटे। उसी प्रकार, यह जागृत अवस्था भी एक मोह-निद्रा है। जब तक जीव अपने स्वरूप में स्थित होकर इस निद्रा से नहीं जागता, तब तक उसे शांति नहीं मिल सकती, चाहे वह अनंत काल तक भटकता रहे।
🔗 यह प्रकरण वैराग्य की नींव रखता है, यह समझाकर कि जिसे हम वास्तविकता समझ रहे हैं, वह स्वयं एक लंबा और दुःखद स्वप्न है।
श्री शिक्षाष्टकम् श्लोक 5 (अयि नन्दतनुज किंकरं)
▶ 1:31
पूरक संदर्भ (Siddhant) पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव जीवात्मा को अनादि काल से दुखमय संसार सागर में भटकता हुआ बताते हैं और शरीर से अपनी पहचान को अहंकार का परिणाम बताते हैं, जो भवसागर में गिरने के समान है।
अयि नन्दतनुज किंकरं पतितं मां विषमे भवाम्बुधौ। कृपया तव पादपङ्कजस्थितधूलीसदृशं विचिन्तय॥
हे नंदनंदन! मैं आपका दास हूँ, जो इस विषम भवसागर में गिर गया हूँ। कृपा करके मुझे अपने चरण-कमलों की धूल के समान मानिए।
🆚 संसार की अवस्था
स्वप्न अवस्था: मिथ्या जगत में विचरण, काल्पनिक भय (जैसे भूत), नींद टूटने पर भय समाप्त।
जागृत अवस्था (मोह-निद्रा): प्राकृत जगत में विचरण, वास्तविक लगने वाले दुःख, आत्म-ज्ञान होने पर मोह समाप्त।
मानव जन्म का परम सौभाग्य
अनुकूल परिस्थितियों के मध्य प्रतिकूल संस्कार
▶ देखें (4:12) ▶ Watch (4:12)
सद्गुरुदेव कहते हैं कि हमें मानव जन्म, सद्गुरु की कृपा, और ब्रजभूमि का वास मिला है, यह परम सौभाग्य है। केवल हमारे पुराने संस्कार ही प्रगति में बाधक हैं। सद्गुरुदेव कृपा की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहते हैं कि हमारा सौभाग्य है कि हमें मानव जन्म मिला, सद्गुरु की कृपा मिली, श्री राधा रानी के दिव्य धाम (ब्रज) में रहने का अवसर मिला और साधु-संग भी प्राप्त हो रहा है। सब कुछ भजन के अनुकूल है। एकमात्र बाधा हमारे अनादि काल के भोग-संस्कार हैं, जो हमें बार-बार पीछे की ओर खींचते हैं और हमें यह भ्रम देते हैं कि संसार में ही सुख है।
🔗 यह साधक को आत्म-निरीक्षण के लिए प्रेरित करता है कि बाहरी अनुकूलता के बावजूद, असली लड़ाई अपने ही भीतर के संस्कारों से है।
📌 भजन हेतु प्राप्त अनुकूल परिस्थितियाँ:
  • मानव जन्म की प्राप्ति
  • सद्गुरु की कृपा का मिलना
  • श्री राधा रानी के दिव्य धाम (ब्रज) में वास
  • साधु-संग का अवसर
अध्याय २: साधक का पथ - सावधानी और दृढ़ता
माया की प्रबलता को दर्शाते हुए साधक को पीछे मुड़कर न देखने और संसार से अत्यंत सावधान रहने की शिक्षा देना, जिसके लिए भरत महाराज और घोड़े की पट्टी के दृष्टांत प्रस्तुत किए गए हैं।
🚫
पीछे मुड़कर मत देखो!
माया की प्रबलता और साधक की दृढ़ता
▶ देखें (6:05) ▶ Watch (6:05)
सद्गुरुदेव चेतावनी देते हैं कि माया बहुत प्रबल है और वह किसी भी क्षण साधक को भ्रमित कर सकती है। इसलिए चाहे कितना भी कष्ट आए, यहाँ तक कि मृत्यु भी, संसार की ओर वापस मुड़कर नहीं देखना चाहिए। सद्गुरुदेव समझाते हैं कि भगवत् प्राप्ति की इच्छा जागृत होने पर भी माया की शक्ति इतनी प्रबल है कि वह साधक को भ्रमित करके वापस संसार चक्र में खींच सकती है। इसकी कोई गारंटी नहीं है कि साधक बचेगा। इसलिए, वे दृढ़तापूर्वक कहते हैं कि चाहे दुःख, कष्ट, निराशा या मृत्यु ही क्यों न आ जाए, साधक को संसार की ओर मुड़कर नहीं देखना चाहिए। संसार का रंग ऐसा है कि कब वापस लग जाए, कहा नहीं जा सकता।
🔗 यह साधक के लिए एक कठोर नियम स्थापित करता है: आध्यात्मिक मार्ग पर प्रगति एक-तरफ़ा होनी चाहिए, वापसी का कोई विकल्प नहीं है।
❌ न करें:
  • सांसारिक सुखों या संबंधों की ओर वापस मुड़कर देखें।
  • कष्ट या निराशा आने पर भजन का मार्ग छोड़ें।
🦌
भरत महाराज का दृष्टांत: एक छोटी सी भूल
आसक्ति के खतरे का जीवंत उदाहरण
▶ देखें (7:07) ▶ Watch (7:07)
एक हिरण के बच्चे के प्रति छोटी सी आसक्ति ने महान राजा भरत महाराज के भजन जीवन को नष्ट कर दिया। यह दिखाता है कि साधक को कितनी सावधानी की आवश्यकता है। सद्गुरुदेव भरत महाराज की कथा का उदाहरण देते हैं, जो एक महान भक्त थे और भाव जगत में स्थित थे। फिर भी, एक छोटे से हिरण के बच्चे के प्रति मोह ने उनके पूरे भजन जीवन को चौपट कर दिया। इस दृष्टांत से सद्गुरुदेव यह शिक्षा देते हैं कि जब भरत महाराज जैसी उन्नत आत्मा एक छोटी सी भूल से पतित हो सकती है, तो हम जैसे साधारण साधकों को संसार में रहते हुए कितनी अधिक सावधानी बरतनी चाहिए।
🔗 यह कथा साधक के मन में भय और सावधानी का भाव जगाती है, यह दर्शाते हुए कि आध्यात्मिक मार्ग पर कोई भी भूल, चाहे कितनी भी छोटी लगे, विनाशकारी हो सकती है।
🤐
जड़ भरत का जन्म और राम जी की चिड़िया
ठोकर खाकर सावधान होने की कला
▶ देखें (8:12) ▶ Watch (8:12)
पिछली भूल से शिक्षा लेकर भरत महाराज ने अगले जन्म में जड़ (मूक और उदासीन) होने का आचरण किया ताकि वे फिर से संसार में न फँसें। सद्गुरुदेव बताते हैं कि हिरण के प्रति आसक्ति के कारण ठोकर खाने के बाद, भरत महाराज ने अगले जन्म में जड़ भरत के रूप में जन्म लिया। वे ज्ञानी होते हुए भी जड़ जैसा आचरण करते थे - बोलते नहीं थे, किसी कार्य में रुचि नहीं दिखाते थे, ताकि संसार के लोग उन्हें अयोग्य समझकर छोड़ दें और वे पुनः आसक्ति में न फँसें। जब उन्हें खेत से चिड़ियों को भगाने का काम दिया गया, तो वे कहते रहे, "राम जी की चिड़िया, राम जी के खेत, खा जाने दे चिड़िया भर-भर पेट," और चिड़ियों को खाने दिया। यह संसार से पूर्ण विरक्ति का प्रतीक है।
🔗 यह दृष्टांत सिखाता है कि आध्यात्मिक ठोकर खाने के बाद साधक को संसार के प्रति अत्यधिक उदासीन और सतर्क हो जाना चाहिए, ताकि दोबारा वही गलती न हो।
वेद / उपनिषद गायत्री मंत्र (ऋग्वेद 3.62.10)
▶ 9:26
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव जड़ भरत की कथा सुनाते हुए गायत्री मंत्र का उच्चारण करते हैं, जिसे जड़ भरत ने संसार से विरक्ति के लिए सीखने से मना कर दिया था।
ॐ भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्॥
हम उस सविता देव के श्रेष्ठ प्रकाश का ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धियों को प्रेरित करे।
📌 जड़ भरत का आचरण:
  • जानबूझकर मूक रहना।
  • सांसारिक कार्यों में कोई रुचि न दिखाना।
  • पिता के सिखाने पर भी गायत्री मंत्र का सही उच्चारण न करना।
  • सांसारिक दृष्टि से हर काम को बिगाड़ देना ताकि कोई और काम न सौंपे।
🐎
घोड़े की पट्टी का दृष्टांत
साधक के लिए इंद्रिय संयम का महत्व
▶ देखें (12:26) ▶ Watch (12:26)
जैसे घोड़े की आँखों पर पट्टी बाँध दी जाती है ताकि वह अगल-बगल देखकर भटके नहीं, वैसे ही साधक को संसार से अपनी दृष्टि हटाकर केवल अपने लक्ष्य पर केंद्रित रहना चाहिए। सद्गुरुदेव एक बहुत ही व्यावहारिक दृष्टांत देते हैं। वे बताते हैं कि पहले तांगे में जुते घोड़े की आँखों के दोनों ओर चमड़े की पट्टी बाँध दी जाती थी। इसका कारण यह था कि यदि घोड़ा अगल-बगल से गुजरती गाड़ियों को देखेगा, तो डरकर छलाँग मार देगा और गाड़ी पलट जाएगी। पट्टी उसे केवल सीधा रास्ता देखने देती है। इसी प्रकार, यदि साधक को इस माया जगत में सुरक्षित चलना है, तो उसे भी अपने मन और इंद्रियों पर ऐसी ही पट्टी बाँध लेनी चाहिए, ताकि वह संसार के आकर्षणों को देखकर अपने मार्ग से विचलित न हो।
🔗 यह दृष्टांत इंद्रिय-निग्रह और एकनिष्ठता के महत्व को रेखांकित करता है। साधक की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह अपनी चेतना को कितनी कुशलता से बाहरी विक्षेपों से बचाता है।
अध्याय ३: ज्ञान, इच्छा और मुक्ति की प्रक्रिया
यह समझाना कि सच्चा ज्ञान अनेक जन्मों के बाद मिलता है, इच्छाओं के विभिन्न प्रकार क्या हैं, और प्रेम की अवस्था में कैसे सूक्ष्म शरीर का नाश होकर जीव मुक्त होता है।
📜
शास्त्र प्रमाण: बहुनां जन्मनामन्ते
ज्ञान की दुर्लभता और अहंकार का त्याग
▶ देखें (13:59) ▶ Watch (13:59)
सद्गुरुदेव गीता का श्लोक उद्धृत करते हुए बताते हैं कि बड़े-बड़े ज्ञानियों को भी सच्चा ज्ञान (वासुदेवः सर्वमिति) प्राप्त करने में अनेक जन्म लग जाते हैं, तो हम जैसे साधारण मनुष्यों की क्या स्थिति है। साधक को अहंकार से बचाने के लिए, सद्गुरुदेव श्रीमद्भगवद्गीता का प्रमाण देते हैं। वे कहते हैं कि जो स्वयं को ज्ञानी समझते हैं, उन्हें भी यह समझने में अनेक जन्म लग जाते हैं कि 'सब कुछ वासुदेव ही हैं'। जब ऐसे ज्ञानियों की यह गति है, तो हम जैसे अज्ञानी जीवों को किस बात का अभिमान है? यह ज्ञान जब परिपक्व होता है, तभी जीव मुक्त होता है। अतः, साधक को छाती ठोक कर नहीं, बल्कि विनम्रता और सावधानी से चलना चाहिए।
🔗 यह श्लोक साधक को विनम्र बनाता है और यह बोध कराता है कि आध्यात्मिक यात्रा अत्यंत लंबी और धैर्य की मांग करने वाली है।
श्रीमद्भगवद्गीता 7.19
▶ 13:59
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
यह समझाने के लिए कि सच्चा आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करना कितना कठिन और समय लेने वाला है, यहाँ तक कि ज्ञानियों के लिए भी।
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते। वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥
बहुत जन्मों के अंत में, ज्ञानवान पुरुष मुझको प्राप्त होता है। 'सब कुछ वासुदेव ही है' - ऐसा महात्मा अत्यंत दुर्लभ है।
🌱
चेतन अवस्था: जड़-अभिमान से चिद-अभिमान की ओर
अहंकार का रूपांतरण
▶ देखें (15:22) ▶ Watch (15:22)
जब गुरु कृपा से साधक को बोध होता है कि 'मैं शरीर नहीं, आत्मा हूँ', तब उसका अहंकार जड़ (भौतिक) से चिद (आध्यात्मिक) में परिवर्तित होने लगता है। वह 'मैं राधा रानी की हूँ' ऐसा मानने लगता है। सद्गुरुदेव बताते हैं कि जब गुरु कृपा से साधक चेतन होता है और यह समझता है कि 'मैं यह शरीर नहीं हूँ और शरीर से संबंधित वस्तुएँ मेरी नहीं हैं', तब उसके अहंकार की वृत्ति बदल जाती है। उसका जड़-अभिमान (मैं शरीर हूँ) धीरे-धीरे चिद-अभिमान (मैं आत्मा हूँ, मैं राधा रानी का सेवक हूँ) में रूपांतरित होने लगता है। जैसे-जैसे यह भाव ('मैं राधा रानी की हूँ, राधा रानी मेरी हैं') दृढ़ होता है, वह अपने गुरु-प्रदत्त सिद्ध स्वरूप (मंजरी स्वरूप) के साथ तदात्म होता जाता है।
🔗 यह भक्ति मार्ग में अहंकार के नाश की प्रक्रिया नहीं, बल्कि उसके शोधन और रूपांतरण की प्रक्रिया को दर्शाता है।
🆚 अहंकार के प्रकार
जड़-अभिमान: मैं शरीर हूँ, यह घर-परिवार मेरा है। यह बंधन का कारण है।
चिद-अभिमान: मैं आत्मा हूँ, मैं श्री राधा रानी की दासी हूँ। यह मुक्ति का साधन है।
🔥
प्रेम की अवस्था और सूक्ष्म शरीर का नाश
अविद्या ग्रंथि का भेदन
▶ देखें (16:25) ▶ Watch (16:25)
जब साधक प्रेम की अवस्था में पहुँचता है, तो प्रेम रूपी सूर्य के उदय होने से अविद्या का अंधकार और सूक्ष्म शरीर (लिंग शरीर) रूपी बीज नष्ट हो जाता है, जिससे पूर्ण मुक्ति मिलती है। सद्गुरुदेव समझाते हैं कि भजन करते-करते जब साधक प्रेम की अवस्था को प्राप्त करता है, तो उसके जीवन में प्रेम रूपी सूर्य का उदय होता है। इस प्रेम के प्रकाश से अविद्या का अंधकार पूरी तरह मिट जाता है। जैसे पका हुआ फल स्वतः ही पेड़ से अलग हो जाता है, वैसे ही प्रेम की परिपक्व अवस्था में साधक संसार रूपी वृक्ष से स्वतः ही अलग हो जाता है। इस अवस्था में उसका सूक्ष्म शरीर (लिंग शरीर या कारण शरीर), जो जन्म-मृत्यु का बीज है, नष्ट हो जाता है। यही निरापद भूमि है, जहाँ से जीव फिर कभी संसार में लौटकर नहीं आता।
🔗 यह मुक्ति की वास्तविक तकनीकी प्रक्रिया को स्पष्ट करता है, जो केवल स्थूल शरीर के छूटने से नहीं, बल्कि कारण-शरीर के नाश से होती है।
श्रीमद्भगवद्गीता 8.6
▶ 21:28
पूरक संदर्भ (Siddhant) पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव बताते हैं कि मृत्यु के समय मन में कोई भी इच्छा (सात्विक, राजसिक, तामसिक) रहने पर पुनर्जन्म होता है, क्योंकि इच्छाएँ ही अगले जन्म का निर्धारण करती हैं।
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्। तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥
हे कुंतीपुत्र! मनुष्य अंतकाल में जिस-जिस भी भाव का स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग करता है, वह सदा उसी भाव से भावित होने के कारण उसी को प्राप्त होता है।
श्री शिक्षाष्टकम् श्लोक 1 (चेतो-दर्पण-मार्जनम्)
▶ 16:46
पूरक संदर्भ (Siddhant) पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव संसार को दुखमय सागर और मोह-निद्रा बताते हैं, जिससे प्रेम रूपी सूर्य के उदय होने पर अंधकार दूर होता है। यह हृदय को शुद्ध करने और भवसागर की अग्नि को बुझाने के समान है।
चेतोदर्पणमार्जनं भवमहादावाग्निनिर्वापणं श्रेयःकैरवचन्द्रिकावितरणं विद्यावधूजीवनम्। आनन्दाम्बुधिवर्धनं प्रतिपदं पूर्णामृतास्वादनं सर्वात्मस्नपनं परं विजयते श्रीकृष्णसंकीर्तनम्॥
श्रीकृष्ण संकीर्तन चित्त रूपी दर्पण को स्वच्छ करने वाला, भवसागर की महादावाग्नि को बुझाने वाला, श्रेय रूपी कुमुद को चाँदनी देने वाला, विद्या रूपी वधू का जीवन, आनंद के सागर को बढ़ाने वाला, प्रतिपल पूर्ण अमृत का आस्वादन कराने वाला और सभी आत्माओं को स्नान कराने वाला है।
श्री शिक्षाष्टकम् श्लोक 4 (न धनं न जनं न सुन्दरीं)
▶ 21:28
पूरक संदर्भ (Siddhant) पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव भौतिक इच्छाओं (सात्विक, राजसिक, तामसिक) को त्यागने और केवल निर्गुण इच्छा (राधा रानी की सेवा) रखने पर जोर देते हैं, क्योंकि भौतिक इच्छाएँ पुनर्जन्म का कारण बनती हैं, चाहे वे कितनी भी अच्छी क्यों न हों।
न धनं न जनं न सुन्दरीं कवितां वा जगदीश कामये। मम जन्मनि जन्मनीश्वरे भवताद् भक्तिरहैतुकी त्वयि॥
हे जगदीश! मुझे न धन की, न अनुयायियों की, न सुंदर स्त्री की और न ही काव्य-प्रतिभा की कामना है। मेरी तो बस यही प्रार्थना है कि जन्म-जन्मांतर में आप में मेरी अहैतुकी भक्ति बनी रहे।
📌 मुक्ति की प्रक्रिया:
  • साधना द्वारा प्रेम की अवस्था तक पहुँचना।
  • प्रेम रूपी सूर्य का हृदय में उदय होना।
  • अविद्या ग्रंथि (सूक्ष्म/लिंग शरीर) का ढीला पड़ना और नष्ट हो जाना।
  • संसार चक्र से पूर्ण मुक्ति और निरापद भूमि की प्राप्ति।
📜
चार प्रकार की इच्छाएँ
इच्छा का स्वरूप और उसके बंधन
▶ देखें (21:38) ▶ Watch (21:38)
सद्गुरुदेव चार प्रकार की इच्छाओं का वर्णन करते हैं: सात्विक (पुण्य कर्म), राजसिक (सांसारिक भोग), तामसिक (निम्न भोग), और निर्गुण (भगवान की सेवा)। केवल निर्गुण इच्छा ही मुक्तिदायक है। सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि मृत्यु के समय मन में बची हुई इच्छा ही अगले जन्म का कारण बनती है। ये इच्छाएँ चार प्रकार की होती हैं। सात्विक इच्छा जैसे मंदिर बनाना, प्रचार करना, यश कमाना, यह भी जन्म का कारण है। राजसिक इच्छा जैसे घर, गाड़ी, परिवार का सुख भोगना, यह भी बंधन है। तामसिक इच्छा इंद्रिय-तृप्ति की अतृप्त लालसा है, जो सूअर जैसी नीच योनियों में ले जाती है। एकमात्र निर्गुण इच्छा, जो माया के गुणों से परे है, वह है 'हम राधा रानी की सेवा करेंगे'। यही इच्छा साधक को भगवद्धाम ले जाती है।
🔗 यह साधक को अपनी इच्छाओं का विश्लेषण करने और उन्हें भौतिक से आध्यात्मिक दिशा में मोड़ने के लिए एक स्पष्ट रूपरेखा प्रदान करता है।
श्री शिक्षाष्टकम् श्लोक 8 (आश्लिष्य वा पादरतां)
▶ 22:40
पूरक संदर्भ (Siddhant) पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव बताते हैं कि एक भक्त को बिना किसी अपेक्षा के भगवान की सेवा करनी चाहिए, स्वयं को उनका कर्मचारी या दास मानते हुए, और परिणाम की चिंता किए बिना।
आश्लिष्य वा पादरतां पिनष्टु मामदर्शनान्मर्महतां करोतु वा। यथा तथा वा विदधातु लम्पटो मत्प्राणनाथस्तु स एव नापरः॥
वह (कृष्ण) मुझे गले लगाएँ या पैरों तले कुचल दें, या दर्शन न देकर मेरे मर्म को आहत करें। वह लंपट जैसे चाहें, वैसा करें, वे ही मेरे प्राणनाथ हैं, कोई और नहीं।
📌 इच्छा के चार प्रकार:
  • सात्विक: मंदिर, धर्मशाला बनाना, यश-कीर्ति की इच्छा। (पुण्य लोक)
  • राजसिक: घर, परिवार, गाड़ी, सांसारिक सुख की इच्छा। (पुनः मनुष्य लोक)
  • तामसिक: अतृप्त इंद्रिय भोग की लालसा। (पशु आदि नीच योनि)
  • निर्गुण: श्री राधा-कृष्ण की सेवा की इच्छा। (भगवद्धाम)
अध्याय ४: दिव्य धाम और लीला में प्रवेश
साधक की प्रेम अवस्था के बाद की यात्रा का वर्णन करना, जिसमें भौम लीला और नित्य लीला का भेद, और सिद्ध जीव का लीला में प्रवेश कैसे होता है, यह समझाया गया है।
🪜
भक्ति के सोपान: प्रेम के आगे की यात्रा
साधना भक्ति से भाव भक्ति तक का सफर
▶ देखें (26:18) ▶ Watch (26:18)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि श्रद्धा से प्रेम तक की यात्रा इस पंचभौतिक शरीर से संभव है। इसके आगे स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग, और महाभाव की अवस्थाएँ चिन्मय शरीर से, राधा रानी की कृपा से ही प्राप्त होती हैं। सद्गुरुदेव भक्ति के क्रमिक विकास को समझाते हैं। वे कहते हैं कि साधक इस भौतिक शरीर के द्वारा श्रद्धा, साधु-संग, भजन-क्रिया, अनर्थ-निवृत्ति, निष्ठा, रुचि, आसक्ति और भाव से होते हुए प्रेम की अवस्था तक पहुँच सकता है। यह साधना की सीमा है। इसके उपरांत की सात उच्च अवस्थाएँ - स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग, भाव, और महाभाव - इस जड़ शरीर से प्राप्त नहीं होतीं। वे चिन्मय विषय हैं और श्री राधा रानी की कृपा से, सिद्ध देह प्राप्त होने पर ही अनुभव में आती हैं।
🔗 यह साधक की अपनी क्षमता और भगवत् कृपा की सीमा को स्पष्ट करता है, जिससे साधक में विनम्रता और कृपा की याचना का भाव बढ़ता है।
📌 भक्ति के सोपान:
  • साधना द्वारा प्राप्य (भौतिक शरीर से): श्रद्धा, साधु-संग, भजन-क्रिया, अनर्थ-निवृत्ति, निष्ठा, रुचि, आसक्ति, भाव, प्रेम।
  • कृपा द्वारा प्राप्य (चिन्मय शरीर से): स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग, भाव, महाभाव।
🌍
भौम लीला और नित्य लीला का भेद
लीला का स्वरूप और उसका उद्देश्य
▶ देखें (27:20) ▶ Watch (27:20)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि सिद्ध जीव पहले किसी ब्रह्मांड में चल रही भौम (प्रकट) लीला में प्रवेश करता है। यह नित्य लीला का ही पृथ्वी पर प्रकाश है, जिसमें भगवान नर-लीला करते हैं। सद्गुरुदेव समझाते हैं कि प्रेम अवस्था प्राप्त सिद्ध जीव किसी ऐसे ब्रह्मांड में प्रवेश करता है जहाँ भगवान की भौम लीला चल रही होती है। यह भौम लीला नित्य लीला का ही एक प्रकट रूप है, जो देखने में मनुष्य लीला जैसी लगती है पर होती दिव्य और मायातीत है। नित्य लीला में श्री राधा-कृष्ण का स्वरूप (नवल किशोर-किशोरी) और आयु अपरिवर्तनीय है, जबकि भौम लीला में जन्म, बाल्यकाल, কৈशोर आदि परिवर्तनशील लीलाएँ होती हैं। भगवान यह नर-लीला भक्तों को आनंद प्रदान करने और स्वयं भी आनंद आस्वादन करने के लिए करते हैं।
🔗 यह भगवान की लीलाओं के बारे में एक आम भ्रम को दूर करता है। उनकी लीलाएँ प्राकृत नहीं, बल्कि दिव्य और आनंदवर्धनकारी होती हैं।
🆚 लीला के प्रकार
भौम लीला (प्रकट): किसी ब्रह्मांड में घटित होती है, परिवर्तनशील (जन्म, वृद्धि), नर-लीला का अनुकरण, मायातीत होते हुए भी माया जैसी प्रतीत होती है।
नित्य लीला (अ-प्रकट): नित्य गोलोक धाम में होती है, अपरिवर्तनीय (नित्य किशोर-किशोरी), शुद्ध चिन्मय विलास।
🎓
उच्च शिक्षा (Higher Education) का दृष्टांत
आध्यात्मिक प्रगति का अगला चरण
▶ देखें (35:31) ▶ Watch (35:31)
जैसे उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाना पड़ता है, वैसे ही प्रेम की सर्वोच्च अवस्था (महाभाव) को प्राप्त करने के लिए सिद्ध जीव को भौम लीला से नित्य गोलोक धाम में जाना पड़ता है। सद्गुरुदेव एक सुंदर दृष्टांत देते हैं। वे कहते हैं कि जैसे इंजीनियरिंग की सामान्य डिग्री अपने देश में मिल जाती है, लेकिन अत्यंत उच्च विशेषज्ञता के लिए (जैसे जर्मनी में 18 साल का कोर्स) विदेश जाना पड़ता है। उसी प्रकार, साधक प्रेम की अवस्था तक की शिक्षा इस भौम जगत की लीला में प्राप्त कर लेता है। लेकिन प्रेम की सर्वोच्च अवस्थाओं, विशेषकर महाभाव तक पहुँचने की 'हायर एजुकेशन' के लिए, उसे नित्य गोलोक धाम में श्री राधा-कृष्ण और उनकी नित्य सखियों के सानिध्य में जाना पड़ता है।
🔗 यह दृष्टांत आध्यात्मिक यात्रा की अनंतता और उसके क्रमिक विकास को बहुत ही सरल और आधुनिक तरीके से समझाता है।
अध्याय ५: मंजरी स्वरूप का रहस्य और श्री राधा-तत्त्व
श्री राधा रानी की सर्वोच्चता, उनके मुग्धा स्वरूप और मंजरी के साथ उनके अभेद संबंध का उद्घाटन करना, तथा दिव्य लीला में भूख-प्यास जैसी क्रियाओं के आध्यात्मिक रहस्य को समझाना।
👑
श्री राधा रानी की स्तुति और महिमा
सर्व-शक्ति-स्वरूपा श्री राधा
▶ देखें (39:28) ▶ Watch (39:28)
सद्गुरुदेव विभिन्न शास्त्रों से श्लोक उद्धृत कर श्री राधा रानी की सर्वोच्चता का वर्णन करते हैं। वे ही पार्वती, सरस्वती, लक्ष्मी, दुर्गा आदि समस्त देवियों की मूल स्रोत और मूल प्रकृति हैं। सद्गुरुदेव श्री राधा रानी के ऐश्वर्य और माधुर्य का वर्णन करते हुए कहते हैं कि वे कोई साधारण देवी नहीं हैं। वे ब्रह्मा और विष्णु द्वारा पूजित हैं। वे ही हिमालय की कन्या पार्वती (हिमाद्रिजा), ब्रह्मा की कन्या सरस्वती (विरिंचिजा) और समस्त शक्तियों की मूल स्रोत हैं। वे ही दुर्गा, लक्ष्मी, सावित्री, गंगा, तुलसी आदि सभी स्वरूपों में प्रकट होती हैं। वे भगवान की मूल चित्-शक्ति, स्वरूप-शक्ति हैं और करुणा की साक्षात मूर्ति हैं।
🔗 यह खंड श्री राधा रानी को सर्वोच्च आराध्या के रूप में स्थापित करता है, जिनके बिना कृष्ण-भक्ति अधूरी है।
श्री राधा स्तुति
▶ 40:12
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव श्री राधा रानी की वंदना करते हैं जो रासमण्डल वासिनी हैं और समस्त देवियों की मूल प्रकृति हैं।
नमस्ते परमेशानि रासमण्डलवासिनि ।
रासेश्वरि नमस्तेऽस्तु कृष्णप्राणाधिकप्रिये ॥
नमस्त्रैलोक्यजननि प्रसीद करुणार्णवे ।
ब्रह्माविष्णुशिवादिभिर्वन्दितपदाम्बुजे ॥

नमः सरस्वती रूपे नमो सावित्री शङ्करि ।
गंगा पद्मावतीरूपे षष्ठी मङ्गलचण्डिके ॥
नमस्ते तुलसीरूपे नमो लक्ष्मीस्वरूपिणी ।
नमो दुर्गे भगवति नमस्ते सर्वस्वरूपिणी ॥

मूलप्रकृतिरूपां त्वां भजामि करुणार्णवाम् ।
संसारसागरादस्मादुद्धराम्ब दयां कुरु ॥
अर्थ: हे परमेश्वरी! हे रासमण्डल में निवास करने वाली, आपको नमस्कार है। हे रासेश्वरी! आप श्री कृष्ण के प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं, आपको नमस्कार है। हे तीनों लोकों की जननी! हे करुणा के सागर! आप मुझ पर प्रसन्न हों। ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवताओं द्वारा आपके चरण-कमलों की वंदना की जाती है।

हे सरस्वती, सावित्री और शंकरी (पार्वती) रूपिणी! हे गंगा, पद्मावती, षष्ठी और मंगलचण्डिका रूपिणी! हे तुलसी और लक्ष्मी स्वरूपा! हे भगवती दुर्गे! हे सर्वस्वरूपिणी! आपको नमस्कार है।

हे करुणा की सागर! आप जो मूल प्रकृति स्वरूपा हैं, मैं आपका भजन करता हूँ। हे माँ! मुझ पर दया करें और इस संसार सागर से मेरा उद्धार करें।
राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्रम् श्लोक 11
▶ 40:00
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
अनंत ब्रह्मांडों के ईश्वर भी जिनकी पूजा करते हैं।
अनन्तकोटिविष्णुलोकनम्रपद्मजार्चिते
हिमाद्रिजापुलोमजाविरञ्चिजावरप्रदे।
अपारसिद्धिऋद्धिदिग्धसत्पदाङ्गुलीनखे
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम्॥
हे देवी! अनंत कोटि विष्णुलोकों के ब्रह्मा भी आपके चरण कमलों की पूजा करते हैं। आप पार्वती, इंद्राणी और सरस्वती को भी वर देने वाली हैं। आपके चरण-कमलों के नख अपार सिद्धियों और ऋद्धियों से युक्त हैं। आप कब मुझे अपनी कृपा-कटाक्ष का पात्र बनाएँगी?
💞
मंजरी स्वरूप का रहस्य: एक प्राण, देह भेद
श्री राधा-तंत्र का अभेद सिद्धांत
▶ देखें (42:01) ▶ Watch (42:01)
मंजरी श्री राधा रानी से अभिन्न है। उनमें केवल शरीर का भेद है, पर प्राण और आत्मा एक ही हैं। राधा रानी को जो आनंद मिलता है, वही आनंद सौ गुना होकर मंजरी में संचरित होता है। सद्गुरुदेव मंजरी-भाव के गूढ़तम रहस्य को खोलते हैं। वे बताते हैं कि मंजरी और श्री राधा रानी में कोई तात्विक भेद नहीं है ('श्रीमती सखीनां समस्वभावे, देह भेद मात्र')। उनका प्राण एक है, आत्मा एक है, केवल देह का भेद है। वे सभी 'राधा-तंत्र' हैं, अर्थात राधा रानी के ही विस्तारित स्वरूप हैं। जब श्री राधा रानी को कोई आनंद या सुख मिलता है, तो वही सुख की तरंग सौ गुना होकर मंजरी के हृदय में अनुभव होती है। मंजरी राधा रानी के सुख में ही सुखी होती है, यही उसकी पहचान है।
🔗 यह गौड़ीय वैष्णव दर्शन के सर्वोच्च सिद्धांत को स्पष्ट करता है, जहाँ साधक का लक्ष्य भगवान के साथ एक होना नहीं, बल्कि उनकी आह्लादिनी शक्ति के विस्तारित स्वरूप बनकर उनकी सेवा करना है।
📌 मंजरी और राधा रानी में अभेदता:
  • स्वभाव में समानता
  • केवल देह का भेद
  • एक ही प्राण, एक ही आत्मा
  • राधा रानी का सुख ही मंजरी का सुख है
प्रश्न: भगवान को भूख-प्यास क्यों लगती है?
लीला में प्राकृत क्रियाओं का आध्यात्मिक प्रयोजन
▶ देखें (43:49) ▶ Watch (43:49)
भगवान तो आत्माराम और पूर्णकाम हैं, फिर उन्हें भूख, प्यास, ठंडी, गर्मी क्यों लगती है? सद्गुरुदेव बताते हैं कि यह सब लीला है, जो परस्पर आनंद बढ़ाने के लिए होती है। सद्गुरुदेव एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाते हैं कि जो भगवान पूर्णकाम हैं, उन्हें भौतिक जगत जैसी भूख-प्यास क्यों लगती है। वे समझाते हैं कि यह कोई अभाव या दुःख नहीं, बल्कि परस्पर आनंद वर्धन की लीला है। यदि भगवान को भूख नहीं लगेगी, तो सखियों को खिलाने की सेवा का आनंद कैसे मिलेगा? यदि उन्हें गर्मी नहीं लगेगी, तो पंखा झलने की सेवा का सुख कैसे प्राप्त होगा? यह सब क्रियाएँ भगवान अपनी सखियों और मंजरियों को सेवा का अवसर और सुख प्रदान करने के लिए करते हैं, जिससे उनका और भक्तों का, दोनों का आनंद बढ़ता है।
🔗 यह भगवान की लीलाओं को मानवीय तर्क से परे, केवल प्रेम और आनंद के आदान-प्रदान के रूप में देखने की दृष्टि प्रदान करता है।
प्रश्न: भगवान तो आत्माराम और पूर्णकाम हैं, फिर उन्हें भूख, प्यास, ठंडी, गर्मी आदि का अनुभव क्यों होता है? ▶ देखें (43:49) ▶ देखें (43:49)
उत्तर: यह भगवान का अभाव नहीं, बल्कि भक्तों को सेवा का सुख देने और परस्पर आनंद बढ़ाने के लिए की गई लीला है। उत्तर: सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि मूर्ख लोग इसका उपहास करते हैं, लेकिन वे तत्व नहीं जानते। भगवान में यह सब क्रियाएँ किसी कमी के कारण नहीं होतीं। वे भक्तों, विशेषकर सखियों और मंजरियों को सेवा का अवसर प्रदान करने के लिए ऐसी लीला करते हैं। जब राधा रानी को पसीना आता है, तभी तो मंजरी को पंखा करने की सेवा का आनंद मिलता है। जब उन्हें प्यास लगती है, तभी तो कोई मंजरी उन्हें जल पिलाकर सेवा का सुख पाती है। यह परस्पर आनंद वर्धन की एक दिव्य व्यवस्था है, क्रिया नहीं, आनंद का ही प्रकाश है।
अध्याय ६: दिव्य सेवा की प्राप्ति और पुरस्कार
यह दर्शाना कि सिद्ध जीव का निकुंज में प्रवेश कैसे होता है, सेवा कैसे प्राप्त होती है, और श्री राधा रानी अपनी प्रिय मंजरियों को किस प्रकार के दिव्य पुरस्कारों से पुरस्कृत करती हैं।
🤝
दिव्य लोक में जीव का आगमन
करुणामयी श्री राधा का अनुग्रह
▶ देखें (50:03) ▶ Watch (50:03)
जब अनंत काल तक दुःख भोगने वाला जीव कठोर साधना के बाद राधा रानी के धाम पहुँचता है, तो राधा रानी की करुणा भरी एक दृष्टि उसके सारे दुःखों को धो देती है। सद्गुरुदेव एक मार्मिक दृश्य का वर्णन करते हैं। जब एक जीव अनंत काल तक संसार सागर में दुःख भोगकर, कठोर साधना करके श्री राधा रानी के सम्मुख पहुँचता है, तो राधा रानी, जो करुणा की मूर्त विग्रह हैं, उसे अपनी करुणापूर्ण दृष्टि से देखती हैं। उनकी वह एक दृष्टि, एक निगाह पड़ते ही उस जीव के अनंत जन्मों के दुःख, वेदना और कष्ट आँसुओं के रूप में बहकर समाप्त हो जाते हैं। राधा रानी भी उस जीव को देखकर रोती हैं, यह उनकी अहैतुकी करुणा का प्रतीक है।
🔗 यह भगवत् कृपा की शक्ति को दर्शाता है, जहाँ एक क्षण की कृपा अनंत काल के पाप और दुःखों को नष्ट करने में समर्थ है।
श्री शिक्षाष्टकम् श्लोक 6 (नयनं गलदश्रुधारया)
▶ 52:45
पूरक संदर्भ (Siddhant) पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव राधा रानी और मंजरी के बीच के दिव्य प्रेम का वर्णन करते हैं, जहाँ मंजरी राधा रानी की करुणा भरी दृष्टि से इतनी भावविभोर हो जाती है कि उसकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगती है।
नयनं गलदश्रुधारया वदनं गद्गदरुद्धया गिरा। पुलकैर्निचितं वपुः कदा तव नामग्रहणे भविष्यति॥
हे प्रभु! आपका नाम लेते ही कब मेरी आँखों से अश्रुधारा बहने लगेगी, मेरा कंठ गद्गद हो जाएगा और मेरा शरीर पुलकित हो उठेगा?
🔗
सेवा प्राप्ति का 'चैनल'
गुरु-परंपरा की अनिवार्यता
▶ देखें (54:26) ▶ Watch (54:26)
निकुंज में सेवा सीधे नहीं मिलती। यह गुरु-परंपरा के 'चैनल' के माध्यम से मिलती है। हमारी परंपरा में गुरु-रूपा सखी (मंजरी) नवीन साधक को श्री रूप मंजरी और फिर श्री ललिता सखी के माध्यम से राधा रानी तक पहुँचाती हैं। सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि निकुंज में प्रवेश और सेवा मनमाने ढंग से नहीं होती। वहाँ सब कुछ परंपरा के अनुसार होता है। प्रत्येक सखी का अपना एक 'यूथ' या 'चैनल' है। जो साधक जिस परंपरा में भजन करता है, वह उसी चैनल से प्रवेश पाता है। सद्गुरुदेव अपनी परंपरा का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि हमारा चैनल श्री ललिता सखी और श्री रूप मंजरी का है। गुरु-रूपा मंजरी, जो नित्य-सिद्धा हैं, इस नवीन सिद्ध जीव को पहले श्री रूप मंजरी को सौंपती हैं, और फिर वे श्री ललिता जी के माध्यम से उसे श्री राधा रानी की सेवा में प्रस्तुत करती हैं।
🔗 यह गुरु-तत्व और परंपरा के महत्व को रेखांकित करता है। भगवत् प्राप्ति केवल व्यक्तिगत साधना से नहीं, बल्कि प्रामाणिक परंपरा के अनुगमन से ही संभव है।
🏆
श्री राधा रानी के दिव्य पुरस्कार
सेवा की पराकाष्ठा और उसकी स्वीकृति
▶ देखें (55:36) ▶ Watch (55:36)
सेवा से प्रसन्न होकर राधा रानी मंजरियों को विभिन्न पुरस्कार देती हैं, जैसे आलिंगन, अपनी ओढ़नी, गजमोती का हार, और सर्वोच्च पुरस्कार है - अपने मुख का चर्वित तांबूल (पान) देना। सद्गुरुदेव निकुंज की आनंदमयी लीलाओं का वर्णन करते हैं। वहाँ कभी-कभी नृत्य, गीत, वादन की कला प्रतियोगिताएँ होती हैं। जो मंजरी सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करती है, उसे राधा रानी पुरस्कृत करती हैं। पुरस्कार कई प्रकार के हैं: किसी को आलिंगन देती हैं, किसी को अपनी ओढ़नी ओढ़ा देती हैं, किसी को अपने गले का गजमोती का हार पहना देती हैं, किसी को चुंबन देती हैं। लेकिन सर्वश्रेष्ठ और चरम पुरस्कार है जब राधा रानी अपने मुख से चबाया हुआ तांबूल निकालकर किसी मंजरी के मुख में दे देती हैं। यह स्वीकृति की पराकाष्ठा है, और उस दिन वह मंजरी सभी के लिए परम आदरणीय और पूजनीय हो जाती है।
🔗 यह दर्शाता है कि भक्ति में सर्वोच्च उपलब्धि भगवान से कुछ पाना नहीं, बल्कि उनके द्वारा पूर्ण रूप से स्वीकृत हो जाना है, जिसका प्रतीक उनका 'उच्छिष्ट' प्रसाद है।
📌 निकुंज में सेवा के पुरस्कार:
  • श्री राधा रानी का आलिंगन।
  • अपनी ओढ़नी (चुंदरी) प्रदान करना।
  • गजमोती का हार पहनाना।
  • स्नेहपूर्ण चुंबन।
  • सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार: अपने मुख का चर्बित तांबूल प्रदान करना।
💔
भौतिक और दिव्य प्रेम में अंतर
ईर्ष्या रहित निर्मल प्रेम
▶ देखें (59:02) ▶ Watch (59:02)
भौतिक जगत में यदि हमारा प्रिय किसी और को अधिक प्रेम करे तो ईर्ष्या होती है। दिव्य जगत में इसका उल्टा है; जब राधा रानी किसी मंजरी को अधिक प्रेम करती हैं, तो अन्य सभी मंजरियाँ उस मंजरी से सौ गुना अधिक प्रेम करने लगती हैं। सद्गुरुदेव भौतिक और दिव्य प्रेम के बीच एक मौलिक अंतर को उजागर करते हैं। वे कहते हैं कि हमारे भौम लोक में, यदि हमारा कोई प्रियजन (जैसे गुरु या मित्र) किसी और को हमसे ज़्यादा स्नेह दे, तो हमारे मन में तुरंत ईर्ष्या और जलन पैदा हो जाती है। वह व्यक्ति हमारा दुश्मन जैसा बन जाता है। लेकिन दिव्य जगत में ठीक इसके विपरीत होता है। वहाँ जब श्री राधा रानी किसी एक मंजरी पर विशेष कृपा करती हैं या उसे कोई पुरस्कार देती हैं, तो बाकी सभी सखियाँ और मंजरियाँ उस भाग्यशाली मंजरी से और भी अधिक प्रेम करने लगती हैं। वे उसे पूजनीय मानती हैं क्योंकि वह राधा रानी की प्रिय है। वहाँ प्रेम में ईर्ष्या का लेशमात्र भी नहीं है।
🔗 यह दिव्य प्रेम के निर्मल और स्वार्थरहित स्वरूप को दर्शाता है, जो साधक के लिए एक आदर्श है कि उसे भी अपने गुरुभाइयों के प्रति ईर्ष्या नहीं, बल्कि प्रेम का भाव रखना चाहिए।
स्पष्टीकरण (Clarification)

यह सारांश AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग गुरु सेवा में करके तैयार किया गया है। इसमें त्रुटि हो सकती है। कृपया पूर्ण लाभ के लिए पूरा वीडियो अवश्य देखें।

Comments

Replying to a comment. Cancel
100%

Select Language

Home
Widgets
Top
Text
Lang