आध्यात्मिक ग्रंथियों से मंजरी भाव तक
तीन आध्यात्मिक ग्रंथियों (जड़-चेतन, दाम्पत्य, अभिमान) के स्वरूप का विश्लेषण और विशुद्ध सत्व की अवस्था 'मंजरी भाव' की अंतरंग सेवा का दिव्य निरूपण।
यह सत्संग जीव के आध्यात्मिक बंधनों के मूल कारणों का गहन विश्लेषण करता है। सद्गुरुदेव तीन प्रमुख ग्रंथियों - जड़-चेतन ग्रंथि, दाम्पत्य ग्रंथि, और अभिमान ग्रंथि - की व्याख्या करते हैं, जो जीव को संसार चक्र में बांधे रखती हैं। इन ग्रंथियों से मुक्ति के उपरांत 'शुद्ध सत्व' की अवस्था और उससे भी परे, श्री राधारानी की कृपा से प्राप्त 'विशुद्ध सत्व' अर्थात 'मंजरी स्वरूप' की महिमा का वर्णन किया गया है। सत्संग का उत्तरार्ध मंजरी भाव की अंतरंग और निभृत निकुंज लीलाओं के रसमाधुर्य का विस्तृत वर्णन करता है, जिसमें उनकी सेवा की निपुणता, श्री राधारानी से उनका तादात्म्य और श्री कृष्ण को भी चकित कर देने वाली उनकी सेवा कुशलता का दिव्य चित्रण है।
📖 आज की शिक्षाएं 📖 आज की विस्तृत शिक्षाएं
- स्वरूप की विस्मृति होना।
- स्वयं को शरीर मानना।
- लिंग शरीर का निर्माण।
- 84 लाख योनियों में भ्रमण।
- जन्म-मृत्यु के चक्र में फंसना।
- एकांत में भाई-बहन को भी संभाषण (बातचीत) नहीं करना चाहिए। (सावधानी)
- ब्रह्मा द्वारा अपहृत ग्वाल-बाल 'शुद्ध सत्व' थे।
- श्री कृष्ण द्वारा सृजित ग्वाल-बाल 'विशुद्ध सत्व' थे।
- विशुद्ध सत्व के स्पर्श से वात्सल्य और प्रेम कई गुना बढ़ गया।
- यह लीला विशुद्ध सत्व की आनंददायिनी शक्ति का प्रमाण है।
- केवल उन्हें ही निभृत निकुंज में प्रवेश है।
- वे श्री राधारानी का ही स्वरूप हैं।
- उनकी सेवा में कोई संकोच या मर्यादा नहीं होती।
- वे 24 घंटे श्री राधारानी के साथ रहती हैं।
- मंजरी भाव की उपासना में श्री राधारानी से तादात्म्य का चिंतन करें।
- सेवा मंजरी की इच्छा से होती है, श्रीजी के निर्देश से नहीं।
- वस्त्र और आभूषण कल्पवृक्ष से प्राप्त होते हैं।
- सेवा और श्रृंगार नित्य नवीनतम और अद्वितीय होता है।
- उनकी कला-निपुणता श्री कृष्ण को भी चकित कर देती है।
- मंजरी की कला के सामने लाखों का 'ब्यूटी पार्लर' भी फेल है।
- इन दिव्य लीलाओं का नित्य चिंतन करें ताकि भजन में रुचि और उल्लास बढ़े।
यह सारांश AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग गुरु सेवा में करके तैयार किया गया है। इसमें त्रुटि हो सकती है। कृपया पूर्ण लाभ के लिए पूरा वीडियो अवश्य देखें।
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