[Study Guide : Jan 9, 2026] तीन आध्यात्मिक ग्रंथियों (जड़-चेतन, दाम्पत्य, अभिमान) से मंजरी भाव तक

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श्री भगवत चर्चा
09 January 2026

आध्यात्मिक ग्रंथियों से मंजरी भाव तक

तीन आध्यात्मिक ग्रंथियों (जड़-चेतन, दाम्पत्य, अभिमान) के स्वरूप का विश्लेषण और विशुद्ध सत्व की अवस्था 'मंजरी भाव' की अंतरंग सेवा का दिव्य निरूपण।

Sri Sri 108 Sri Vinod Baba ji Maharaj
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हमारे प्रिय सद्गुरुदेव बताते हैं:
" प्रेम जगत में चलना है तो मिट्टी में मिलना पड़ेगा, सबके पांव के नीचे आना पड़ेगा। नहीं तो अपना अभिमान लेकर संसार में घूमते रहो। "
" चिंतन ही सबसे खतरनाक है। भगवत-चिंतन से मन भगवान के रंग में रंगता है, और विषय-चिंतन से मन विषयों में फंस जाता है। "
मंजरी (25)ग्रंथि (18)राधारानी (20)विशुद्ध सत्व (8)सेवा (12)अभिमान (9)लीला (15)दाम्पत्य ग्रंथि (5)जड़-चेतन ग्रंथि (5)
🔍 सत्संग सार (Executive Summary)

यह सत्संग जीव के आध्यात्मिक बंधनों के मूल कारणों का गहन विश्लेषण करता है। सद्गुरुदेव तीन प्रमुख ग्रंथियों - जड़-चेतन ग्रंथि, दाम्पत्य ग्रंथि, और अभिमान ग्रंथि - की व्याख्या करते हैं, जो जीव को संसार चक्र में बांधे रखती हैं। इन ग्रंथियों से मुक्ति के उपरांत 'शुद्ध सत्व' की अवस्था और उससे भी परे, श्री राधारानी की कृपा से प्राप्त 'विशुद्ध सत्व' अर्थात 'मंजरी स्वरूप' की महिमा का वर्णन किया गया है। सत्संग का उत्तरार्ध मंजरी भाव की अंतरंग और निभृत निकुंज लीलाओं के रसमाधुर्य का विस्तृत वर्णन करता है, जिसमें उनकी सेवा की निपुणता, श्री राधारानी से उनका तादात्म्य और श्री कृष्ण को भी चकित कर देने वाली उनकी सेवा कुशलता का दिव्य चित्रण है।

🧱 ज्ञान प्रवाह (Concept Map)
graph TD A[भगवान की नरोचित लीला का रहस्य] --> B(योगमाया का आश्रय); B --> C{जीव के बंधन: तीन ग्रंथियाँ}; C --> D[1. जड़-चेतन ग्रंथि: स्वरूप विस्मृति]; C --> E[2. दाम्पत्य ग्रंथि: दैहिक आकर्षण]; C --> F[3. अभिमान ग्रंथि: 'मैं' का भाव]; D & E & F --> G[ग्रंथि मुक्ति: निरापद भूमि]; G --> H{चेतना की अवस्थाएँ}; H --> I[शुद्ध सत्व: मुक्त आत्मा]; H --> J[विशुद्ध सत्व: मंजरी स्वरूप]; J --> K[मंजरी भाव की अंतरंग सेवा]; K --> L[निकुंज लीला में प्रवेश]; K --> M[श्री राधारानी से तादात्म्य]; K --> N[सेवा में सर्वोच्च निपुणता];

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आध्यात्मिक बंधन की तीन ग्रंथियाँ
जीव को संसार चक्र में बांधने वाली तीन प्रमुख आध्यात्मिक गांठों (जड़-चेतन, दाम्पत्य, अभिमान) के स्वरूप और उनके प्रभाव का विश्लेषण करना।
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भगवान की नरोचित लीला का रहस्य
भगवान की लीला का प्रयोजन: योगमाया का आश्रय
▶ देखें (0:00) ▶ Watch (0:00)
भगवान पूर्णकाम और पूर्णानंदमय हैं, उनमें भूख-प्यास जैसी कोई कमी नहीं होती। वे अपनी योगमाया का आश्रय लेकर मनुष्यों जैसी लीलाएं करते हैं ताकि प्रेम-रस का आस्वादन कर सकें। यह लीलाएं मायिक जगत के विकारों से परे, चिन्मय और गुणातीत होती हैं। सद्गुरुदेव समझाते हैं कि भगवान में भूख, प्यास, निद्रा जैसे प्राकृत गुण नहीं होते क्योंकि वे आप्तकाम और पूर्णकाम हैं। उनकी लीलाओं में जो यह सब प्रतीत होता है, वह उनका नरोचित लीला-विलास है। यह लीलाएं भगवान के सच्चिदानंद सागर में उठने वाली प्रेममयी तरंगों के समान हैं, जो मायिक जगत के क्रोध, लोभ, मोह जैसे विकारों से सर्वथा भिन्न हैं। भगवान अपनी योगमाया शक्ति को आश्रय करके इन चिन्मय, मायातीत और गुणातीत लीलाओं को प्रकट करते हैं। सद्गुरुदेव इस सिद्धांत की पुष्टि हेतु श्रीमद्भगवद्गीता के एक दिव्य श्लोक का उल्लेख करते हैं।
🔗 यह विषय सत्संग की आधारशिला रखता है, यह समझाते हुए कि भगवान की लीलाएं दिव्य हैं, जबकि जीव का बंधन वास्तविक है, जो ग्रंथियों के कारण होता है।
📖 भगवान की लीला का योगमाया-आवरण
▶ 2:08
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव इस श्लोक के माध्यम से स्पष्ट करते हैं कि भगवान अपनी योगमाया शक्ति के द्वारा ही नरोचित लीलाएं करते हैं, जो उनके वास्तविक, अविनाशी स्वरूप को साधारण दृष्टि से छिपाए रखती है।
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः। मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्॥
मैं अपनी योगमाया से आवृत्त (ढका) होने के कारण सबके समक्ष प्रकट नहीं होता। यह मूर्ख जगत मुझ अजन्मा और अविनाशी परमेश्वर को नहीं जानता।
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प्रथम ग्रंथि: जड़-चेतन ग्रंथि
बंधन का मूल: जड़ और चेतन की गांठ
▶ देखें (2:51) ▶ Watch (2:51)
जीव के बंधन की सबसे पहली और मूल गांठ 'जड़-चेतन ग्रंथि' है। यह परा प्रकृति (आत्मा) का अपरा प्रकृति (शरीर) के साथ तादात्म्य है। इसी ग्रंथि के कारण जीव अपने चेतन स्वरूप को भूलकर स्वयं को शरीर मान लेता है और जन्म-मृत्यु के चक्र में घूमता रहता है। सद्गुरुदेव बताते हैं कि जब तक जीव की जड़-चेतन ग्रंथि नहीं खुलती, तब तक वह निरापद भूमि (मुक्ति) को प्राप्त नहीं कर सकता। यह ग्रंथि ही लिंग शरीर का निर्माण करती है, जिसके कारण आत्मा अपने को 'मैं मनुष्य हूँ', 'मैं कुत्ता हूँ' इत्यादि शरीरधारी मानने लगता है। यह स्वरूप-विस्मृति ही 84 लाख योनियों में भ्रमण का मूल कारण है। साधन के द्वारा जब यह ग्रंथि खुल जाती है, तब चेतन सत्ता अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित होती है।
🔗 यह कार्ड बंधन के सबसे आधारभूत कारण का परिचय देता है, जिस पर अन्य सभी बंधन टिके हुए हैं।
📌 जड़-चेतन ग्रंथि के परिणाम:
  • स्वरूप की विस्मृति होना।
  • स्वयं को शरीर मानना।
  • लिंग शरीर का निर्माण।
  • 84 लाख योनियों में भ्रमण।
  • जन्म-मृत्यु के चक्र में फंसना।
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द्वितीय ग्रंथि: दाम्पत्य ग्रंथि
विवेक का हरण करने वाली दाम्पत्य ग्रंथि
▶ देखें (8:34) ▶ Watch (8:34)
जड़-चेतन ग्रंथि के ऊपर एक और बड़ी गांठ है 'दाम्पत्य ग्रंथि'। यह स्त्री और पुरुष के बीच का शारीरिक आकर्षण है, जो आत्मा के स्तर पर कोई भेद न होते हुए भी दैहिक अभिमान के कारण उत्पन्न होता है। यह ग्रंथि बड़े-बड़े ज्ञानियों और विद्वानों के विवेक को भी हर लेती है। सद्गुरुदेव इस ग्रंथि को अत्यंत खतरनाक बताते हैं। आत्मा के स्तर पर स्त्री-पुरुष का कोई भेद नहीं है, किंतु शरीर का अभिमान होने से परस्पर आकर्षण उत्पन्न होता है। यह आकर्षण इतना प्रबल है कि यह बड़े-बड़े बुद्धिमानों की बुद्धि और विद्वानों की विद्वता का अपहरण कर लेता है। भोगी लोगों का संग और भोग के उपकरणों की निकटता इस ग्रंथि को और भी मजबूत करती है। इस ग्रंथि की प्रबलता को समझाने के लिए सद्गुरुदेव श्री वेदव्यास जी और उनके शिष्य श्री जैमिनी की कथा का वर्णन करते हैं।
🔗 यह दूसरी ग्रंथि सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन में बंधन का एक प्रमुख रूप है, जो साधक की प्रगति में बड़ी बाधा बनती है।
❌ न करें (Don't):
  • एकांत में भाई-बहन को भी संभाषण (बातचीत) नहीं करना चाहिए। (सावधानी)
📖 मन के पतन का क्रम
▶ 15:22
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
श्री जैमिनी की कथा के प्रसंग में सद्गुरुदेव इस श्लोक को उद्धृत करते हुए समझाते हैं कि कैसे केवल विषय का चिंतन करने मात्र से ही मन का पतन शुरू हो जाता है, जो अंततः बुद्धि-नाश तक ले जाता है।
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
विषयों का चिंतन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है। आसक्ति से कामना उत्पन्न होती है और कामना (में विघ्न पड़ने) से क्रोध उत्पन्न होता है।
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तृतीय ग्रंथि: अभिमान
साधक का पतन: 'मैं' का अभिमान
▶ देखें (19:39) ▶ Watch (19:39)
तीसरी बड़ी ग्रंथि अभिमान की है। 'मैं विद्वान हूँ', 'मैं ज्ञानी हूँ', 'मैं भजनानंदी हूँ', 'मैं उच्च कुल का हूँ' - यह अभिमान साधक को भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ने से रोक देता है। प्रेम के जगत में प्रवेश के लिए साधक को स्वयं को सबसे छोटा और सबका सेवक समझना आवश्यक है। सद्गुरुदेव चेतावनी देते हैं कि दाम्पत्य ग्रंथि के बाद अभिमान की ग्रंथि भी साधक को फंसा लेती है। यह अभिमान उसे स्वयं को पूजनीय और दूसरों को कृपा का पात्र समझने पर विवश करता है। जबकि प्रेम के राज्य में प्रवेश की शर्त है - स्वयं को धूलि में मिलाना, सबसे छोटा बनना। जब तक साधक सबके पांव के नीचे जाने को तैयार नहीं होता, तब तक उसका कल्याण संभव नहीं। इस अभिमान को नष्ट करने के लिए श्री विजय कृष्ण गोस्वामी जी के जीवन का एक प्रेरक प्रसंग सुनाया गया है।
🔗 यह अंतिम ग्रंथि भक्ति मार्ग की सबसे सूक्ष्म बाधा है, जो अच्छे-अच्छे साधकों को भी उनके लक्ष्य तक पहुँचने से रोक देती है।
📜 दृष्टांत: विजय कृष्ण गोस्वामी जी को जब भजन का अभिमान हुआ, तो उनका मन मलिन हो गया। जब उन्होंने एक भंगी मैया (सफाई कर्मी) के चरणों में गिरकर अपने को सबसे नीच मानकर क्षमा मांगी, तब तत्काल उनका मन निर्मल हो गया।
📖 दीनता का भाव
▶ 24:59
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव इस चौपाई के माध्यम से साधक के लिए आवश्यक दीनता के भाव को दर्शाते हैं। ऐसी भावना रखने से साधक जीवन में बहुत शीघ्र प्रगति करता है।
मो सम कौन कुटिल खल कामी। जेहिं तनु दियउ ताहि बिसरायो ऐसो निमकहरामी॥
मेरे समान कुटिल, दुष्ट और कामी कौन होगा? जिसने यह शरीर दिया, उसी को भुला दिया, मैं ऐसा नमकहराम हूँ।
शुद्ध सत्व से विशुद्ध सत्व की यात्रा
ग्रंथियों से मुक्त होने के बाद की अवस्थाओं - 'शुद्ध सत्व' (मुक्त आत्मा) और 'विशुद्ध सत्व' (मंजरी स्वरूप) - के बीच के तात्विक भेद को स्पष्ट करना।
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शुद्ध सत्व और विशुद्ध सत्व का भेद
चेतना के दो सोपान: शुद्ध सत्व बनाम विशुद्ध सत्व
▶ देखें (26:34) ▶ Watch (26:34)
ग्रंथियों से मुक्त आत्मा 'शुद्ध सत्व' है - यह निर्मल, गुणातीत और भगवान का अंश है। किंतु 'विशुद्ध सत्व' उससे भी श्रेष्ठ अवस्था है, जो श्री राधारानी की कृपा से प्राप्त 'मंजरी स्वरूप' है। यह भगवान की आह्लादिनी शक्ति का सार है। सद्गुरुदेव चेतना की दो उन्नत अवस्थाओं में भेद करते हैं। 'शुद्ध सत्व' वह अवस्था है जहाँ आत्मा प्रकृति के बंधनों से मुक्त होकर अपने निर्मल, मायातीत स्वरूप में स्थित हो जाती है। यह मुक्ति की अवस्था है। परन्तु, 'विशुद्ध सत्व' इससे भी ऊपर की अवस्था है, जो श्री राधारानी की कृपा से ही प्राप्त होती है। यह मंजरी स्वरूप है, जो महाभाव स्वरूपिणी श्री राधारानी की कृपा-शक्ति से ही सिद्ध होता है। सद्गुरुदेव इसे रिफाइंड और डबल-रिफाइंड तेल के दृष्टांत से समझाते हैं।
🔗 यह कार्ड मुक्ति और प्रेम-सेवा के बीच के अंतर को स्पष्ट करता है, जो सत्संग के अगले चरण, यानी मंजरी भाव की उपासना, की भूमिका तैयार करता है।
⚖️ चेतना की अवस्थाएं
शुद्ध सत्व: ग्रंथि-मुक्त आत्मा, भगवान का अंश, निर्मल, गुणातीत, मुक्ति की अवस्था।
विशुद्ध सत्व: मंजरी स्वरूप, श्री राधारानी की कृपा-प्रदत्त, आह्लादिनी शक्ति का सार, प्रेम-सेवा की सर्वोच्च अवस्था।
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ब्रह्मा विमोहन लीला का दृष्टांत
ब्रह्मा विमोहन लीला: शुद्ध और विशुद्ध सत्व का प्रत्यक्ष प्रमाण
▶ देखें (28:21) ▶ Watch (28:21)
ब्रह्मा जी द्वारा हरण किये गए ग्वाल-बाल और बछड़े 'शुद्ध सत्व' थे। जब भगवान ने स्वयं अपने स्वरूप से नए ग्वाल-बाल और बछड़े प्रकट किये, तो वे 'विशुद्ध सत्व' थे। इसी कारण उनके घर लौटने पर माता-पिताओं और गायों ने पहले से कई गुना अधिक वात्सल्य और आनंद का अनुभव किया। सद्गुरुदेव ब्रह्मा विमोहन लीला का प्रसंग सुनाकर शुद्ध और विशुद्ध सत्व के भेद को और स्पष्ट करते हैं। ब्रह्मा जी ने जिन ग्वाल-बालों और बछड़ों का हरण किया था, वे 'शुद्ध सत्व' थे। भगवान ने जब अपने सच्चिदानंद स्वरूप से नए ग्वाल-बालों का सृजन किया, तो वे 'विशुद्ध सत्व' के प्रकाश थे। यही कारण था कि जब ये बालक घर गए, तो उनकी माताओं ने उन्हें गोद में लेकर असीम आनंद का अनुभव किया, जो उन्हें अपने वास्तविक पुत्रों से भी नहीं मिलता था। गायों का वात्सल्य भी उमड़ पड़ा। यह लीला दर्शाती है कि विशुद्ध सत्व में आकर्षण और आनंद की शक्ति असीम होती है।
🔗 यह कथा एक शास्त्रीय प्रमाण के रूप में प्रस्तुत की गई है, जो 'विशुद्ध सत्व' की श्रेष्ठता और उसकी अद्वितीय आनंद प्रदान करने की क्षमता को सिद्ध करती है।
📌 लीला से प्राप्त शिक्षा:
  • ब्रह्मा द्वारा अपहृत ग्वाल-बाल 'शुद्ध सत्व' थे।
  • श्री कृष्ण द्वारा सृजित ग्वाल-बाल 'विशुद्ध सत्व' थे।
  • विशुद्ध सत्व के स्पर्श से वात्सल्य और प्रेम कई गुना बढ़ गया।
  • यह लीला विशुद्ध सत्व की आनंददायिनी शक्ति का प्रमाण है।
मंजरी भाव की अंतरंग सेवा
मंजरी स्वरूप की अद्वितीय महिमा, श्री राधारानी के साथ उनके तादात्म्य और निभृत निकुंज की अंतरंग लीलाओं में उनकी सेवा-निपुणता का रसपूर्ण वर्णन करना।
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निभृत निकुंज में केवल मंजरी का प्रवेश
मंजरी: निकुंज लीला की एकमात्र अधिकारिणी
▶ देखें (32:15) ▶ Watch (32:15)
श्री राधा-कृष्ण की जो अत्यंत गोपनीय शयन और विश्राम की लीलाएं निभृत निकुंज में होती हैं, वहां केवल मंजरियों का ही प्रवेश है। वे श्री राधारानी का ही स्वरूप होने के कारण वहां निःसंकोच सेवा करती हैं। वे सारी रात जागकर पंखा झलने जैसी सेवाएं करती हैं। सद्गुरुदेव बताते हैं कि साधारण सखियाँ भोजन लीला और चौसर खेलने जैसी लीलाओं में साथ रहती हैं, परंतु जहाँ श्री युगल किशोर की अत्यंत अंतरंग केलि-कथा और शयन लीला होती है, उस निभृत निकुंज में केवल मंजरियों को ही प्रवेश का अधिकार है। इसका कारण यह है कि वे श्री राधारानी से अभिन्न, उनका ही एक स्वरूप हैं। वे सारी रात जागकर युगल की सेवा करती हैं, और उनकी निद्रा भी एक दिव्य रसमाधुरी की अवस्था होती है, न कि भौतिक थकान मिटाने वाली नींद।
🔗 यह कार्ड मंजरी भाव की सर्वोच्चता को स्थापित करता है, उन्हें लीला के उस स्तर का अधिकारी बताता है जहाँ अन्य किसी का प्रवेश संभव नहीं।
📌 मंजरी की अद्वितीय स्थिति:
  • केवल उन्हें ही निभृत निकुंज में प्रवेश है।
  • वे श्री राधारानी का ही स्वरूप हैं।
  • उनकी सेवा में कोई संकोच या मर्यादा नहीं होती।
  • वे 24 घंटे श्री राधारानी के साथ रहती हैं।
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श्री राधारानी और मंजरी की शयन लीला
कृष्ण-भ्रम में मंजरी को मिला दिव्य रस
▶ देखें (35:56) ▶ Watch (35:56)
एक बार सेवा करते-करते मंजरी को नींद आने लगी तो श्री राधारानी ने उन्हें अपने पास अपनी ही तकिया पर सुला लिया। निद्रा में श्री राधारानी ने मंजरी को ही कृष्ण समझकर आलिंगन किया और उन्हें उस दिव्य विलास-माधुर्य का आस्वादन कराया जो किसी अन्य के लिए दुर्लभ है। सद्गुरुदेव एक अत्यंत गोपनीय लीला का वर्णन करते हैं। एक दिन श्री राधारानी के चरण-संवाहन करते हुए एक मंजरी को निद्रा आने लगी। श्रीजी ने उन्हें प्रेमपूर्वक अपने पास, अपनी ही शय्या और तकिया पर सुला लिया और छाती से लगा लिया। निद्रावस्था में, जो स्वयं कृष्णमयी हैं, श्री राधारानी को भ्रम हुआ कि उनके साथ श्री कृष्ण ही लेटे हैं। इस कृष्ण-भ्रम में उन्होंने मंजरी के साथ उसी प्रकार विलास किया जैसे वे कृष्ण के साथ करती हैं, और इस प्रकार मंजरी को उस रस-माधुर्य का आस्वादन कराया जो जोगेंद्र, मुनींद्र के लिए भी अगम्य है। यह मंजरी उपासना का सार है।
🔗 यह लीला मंजरी और श्री राधारानी के बीच के तादात्म्य और अभेद को दर्शाती है, और यह स्पष्ट करती है कि मंजरी को कृपापूर्वक वह रस भी प्राप्त होता है जिसकी वे कामना भी नहीं करतीं।
✅ करें:
  • मंजरी भाव की उपासना में श्री राधारानी से तादात्म्य का चिंतन करें।
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श्री कृष्ण और मंजरी की आलता लीला
सेवा में मंजरी का अधिकार: आलता रंजन लीला
▶ देखें (42:51) ▶ Watch (42:51)
एक बार एक मंजरी श्री राधारानी के चरणों में आलता लगा रही थी। उसकी कला-निपुणता देखकर श्री कृष्ण ने भी आलता लगाने की इच्छा प्रकट की। मंजरी ने उन्हें डांटकर मना कर दिया कि यह तुम्हारा काम नहीं है। यह प्रसंग मंजरी की सेवा में निडरता और अधिकार को दर्शाता है। सद्गुरुदेव मंजरी की सेवा-निपुणता और उनके अधिकार का एक और अद्भुत प्रसंग सुनाते हैं। एक मंजरी अपनी जांघ पर श्री राधारानी के चरण कमल रखकर अत्यंत तन्मयता से आलता द्वारा पुष्प रचना कर रही थी। श्री कृष्ण ने जब यह देखा तो उन्होंने भी सेवा करने की इच्छा जताई। इस पर मंजरी ने उन्हें झिड़क दिया, 'यह गोचारण करने जैसा काम नहीं है, यह तुमसे नहीं होगा, तुम जाओ यहाँ से।' यह लीला दर्शाती है कि सेवा के क्षेत्र में मंजरी का कितना अधिकार है कि वे श्री कृष्ण को भी डांट सकती हैं। बाद में श्री राधारानी के कहने पर कृष्ण ने सेवा की और महाभाव का अनुभव किया।
🔗 यह लीला मंजरी भाव के एक महत्वपूर्ण पहलू को उजागर करती है - सेवा में उनका पूर्ण अधिकार और निर्भीकता, जो उनके श्री राधारानी से तादात्म्य के कारण है।
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मंजरी की नित्य नवीन सेवा
कल्पवृक्ष से वस्त्र और कृष्ण को भ्रमित करने वाला श्रृंगार
▶ देखें (47:23) ▶ Watch (47:23)
मंजरी श्री राधारानी की स्नान, वस्त्र और श्रृंगार की सेवा करती हैं। यह सब उनकी अपनी इच्छा और कल्पना के अनुसार होता है, श्री राधारानी निर्देश नहीं देतीं। वस्त्र कल्पवृक्ष से प्राप्त होते हैं और श्रृंगार इतना अद्भुत होता है कि स्वयं श्री कृष्ण भी श्री राधारानी को पहचान नहीं पाते। सद्गुरुदेव मंजरी की सेवा के विस्तार का वर्णन करते हैं। वे श्री राधारानी को स्नान कराती हैं, वस्त्र धारण कराती हैं और उनका श्रृंगार करती हैं। विशेष बात यह है कि क्या पहनना है और कैसा श्रृंगार करना है, यह मंजरी की इच्छा पर निर्भर करता है, श्री राधारानी की नहीं। वस्त्र किसी दर्जी द्वारा नहीं बनाए जाते, बल्कि मंजरी कल्पवृक्ष से अपनी कल्पना के अनुसार नित्य नवीन वस्त्र और आभूषण प्राप्त करती हैं। वे ऐसा अद्भुत केश-विन्यास और श्रृंगार करती हैं कि जब श्री राधारानी कृष्ण के सम्मुख जाती हैं, तो वे भी भ्रमित हो जाते हैं और अपनी ही प्रियतमा को पहचान नहीं पाते, यह सोचकर कि यह कौन नई आनंददायिनी शक्ति आ गई है।
🔗 यह वर्णन मंजरी की सेवा-कुशलता की पराकाष्ठा को दर्शाता है, जहाँ उनकी कला नित्य नवीन होती है और स्वयं रसराज श्री कृष्ण को भी आश्चर्य में डाल देती है।
📌 मंजरी की सेवा की विशेषताएं:
  • सेवा मंजरी की इच्छा से होती है, श्रीजी के निर्देश से नहीं।
  • वस्त्र और आभूषण कल्पवृक्ष से प्राप्त होते हैं।
  • सेवा और श्रृंगार नित्य नवीनतम और अद्वितीय होता है।
  • उनकी कला-निपुणता श्री कृष्ण को भी चकित कर देती है।
  • मंजरी की कला के सामने लाखों का 'ब्यूटी पार्लर' भी फेल है।
🙏
कथा वर्णन का प्रयोजन
चिंतन की प्रेरणा हेतु लीला वर्णन
▶ देखें (58:33) ▶ Watch (58:33)
यह लीलाएं अनंत और अचिंत्य हैं। इनका वर्णन करने का एकमात्र प्रयोजन यह है कि साधक इनसे प्रेरित होकर इन लीलाओं का चिंतन करे। इस चिंतन से साधक के भीतर भजन के प्रति उल्लास और प्रेरणा जागृत होती है। सत्संग के अंत में सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि इन अनंत, नित्य-नवीन और अचिंत्य लीलाओं का वर्णन करना किसी के लिए भी संभव नहीं है। वे कहते हैं कि हम मूर्ख इसका क्या वर्णन करेंगे। इस कथा को कहने का एकमात्र उद्देश्य साधक को एक दिग्दर्शन देना है, जिससे प्रेरित होकर वह इन लीलाओं का चिंतन करने का प्रयास करे। इस चिंतन के माध्यम से साधक के हृदय में एक विशेष उल्लास और भजन में रुचि बढ़ती है, जो उसे साधना पथ पर आगे बढ़ने में सहायता करती है।
🔗 यह अंतिम कार्ड सत्संग के उद्देश्य को स्पष्ट करता है - यह केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि साधक को भक्तिपूर्ण चिंतन और साधना के लिए प्रेरित करना है।
✅ करें:
  • इन दिव्य लीलाओं का नित्य चिंतन करें ताकि भजन में रुचि और उल्लास बढ़े।
स्पष्टीकरण (Clarification)

यह सारांश AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग गुरु सेवा में करके तैयार किया गया है। इसमें त्रुटि हो सकती है। कृपया पूर्ण लाभ के लिए पूरा वीडियो अवश्य देखें।

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