श्री भगवत चर्चा
06 January 2026
अहंकार का त्याग और प्रेम की प्राप्ति
स्वरूप विस्मृति, अहंकार का बंधन, साधना का सोपान, भगवद् दर्शन
Sri Sri 108 Sri Vinod Baba ji Maharaj
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हमारे प्रिय सद्गुरुदेव बताते हैं:
"
छाती में हाथ धरो... अब राधा रानी का चरण छोड़ के कोई भी वस्तु, पदार्थ के प्रति हमारी किंचित आसक्ति नहीं... बस, अब माया तुमको घेर नहीं सकती।
"
"
"ये सत्संग बड़ा खतरनाक है... सत्संग आपका संसार (आसक्ति) छुड़ा देगा। इसीलिए उनके लिए ये सत्संग नहीं है (जो संसारी हैं)। ये सुनने के लिए थोड़ा सा कलेजा का ताकत चाहिए।
"
अहंकार (25)स्वरूप विस्मृति (10)प्रेम (20)साधना (15)दर्शन (18)जड़-अभिमान (8)चिद्-अभिमान (7)भाव दशा (12)
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जीव का बंधन और उसका मूल कारण
इस खंड में सद्गुरुदेव जीव के अनादि काल से संसार चक्र में भटकने के मूल प्रश्न को उठाते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि स्वरूप की विस्मृति और अहंकार ही इस दुःखमय यात्रा का प्रधान कारण है।
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सद्गुरुदेव सत्संग का आरंभ जीव की बद्ध अवस्था के वर्णन से करते हैं। वे बताते हैं कि जीव अनादि काल से संसार चक्र में घूम रहा है और अपना वास्तविक, आनंदमय स्वरूप भूल गया है। वह ८४ लाख योनियों में विभिन्न शरीर धारण कर दुःख के सागर में गोते लगा रहा है।
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि जीव अनंत काल से संसार में भटक रहा है, अपना दिव्य स्वरूप भूल चुका है। वह पंचभौतिक शरीर को ही अपना स्वरूप मान बैठा है और इसी भ्रम के कारण ८४ लाख योनियों में, जैसे अंडज, पिंडज, जलचर, थलचर आदि में, घूम रहा है। भगवान आनंदमय हैं और जीव उनका अंश होने के कारण आनंदमय है, फिर भी वह दुखी है। इसका मूल कारण है कि वह भगवान द्वारा रचे इस खेल में इतना निमग्न हो गया है कि उसे अपनी वास्तविक पहचान याद ही नहीं रही।
🔗 यह विषय जीव की मूल समस्या को स्थापित करता है, जो आगे के सत्संग का आधार है।
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दुःख का मूल कारण: स्वरूप विस्मृति
बंधन का रहस्य: जीव की अनिच्छा और स्वरूप की विस्मृति
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सद्गुरुदेव प्रश्न उठाते हैं कि जीव दुखी क्यों है, जबकि वह आनंदमय भगवान का अंश है। इसका उत्तर देते हुए वे बताते हैं कि भगवान तो चाहते हैं कि जीव मुक्त हो, पर जीव स्वयं इस संसार के खेल से बाहर नहीं निकलना चाहता। शरीर में आत्म-बुद्धि और स्वरूप की विस्मृति ही बंधन का मूल कारण है।
सद्गुरुदेव एक गहन प्रश्न का समाधान करते हैं: भगवान अपने अंश जीव को दुखी क्यों रहने देते हैं? वे स्पष्ट करते हैं कि भगवान तो जीव को अपने नित्य धाम में ले जाना चाहते हैं, परन्तु जीव स्वयं इस संसार के खेल में इतना रम गया है कि वह निकलना ही नहीं चाहता। अनादि काल से शरीर में आत्म-बुद्धि करते-करते यह उसका स्वभाव बन गया है। यही 'स्वरूप विस्मृति' संसार बंधन का सबसे बड़ा और मूल कारण है।
🔗 यह बिंदु स्पष्ट करता है कि बंधन का कारण ईश्वर की उदासीनता नहीं, बल्कि जीव की अपनी अज्ञानता और आसक्ति है।
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सद्गुरुदेव अहंकार की प्रकृति को 'गांव के प्रधान' के दृष्टांत से समझाते हैं। जैसे कोई व्यक्ति प्रधान बनते ही अपनी गाड़ी पर 'प्रधान' लिखवाकर अभिमान करता है, वैसे ही जीव इस पंचभौतिक शरीर में आकर 'अहंकार' रूपी प्रधान बनकर बैठ जाता है और इसी को अपना सब कुछ मान लेता है।
सद्गुरुदेव अहंकार के स्वरूप को एक सरल दृष्टांत से स्पष्ट करते हैं। वे कहते हैं कि जैसे कोई व्यक्ति गांव का प्रधान बनते ही अपनी गाड़ी पर बड़े-बड़े अक्षरों में 'प्रधान' लिखवाकर घूमता है और उस पद में अभिमान करता है, यह एक खतरनाक पद है। ठीक उसी प्रकार, जीव इस पंचभौतिक शरीर में आकर अहंकार रूपी प्रधान बनकर बैठ जाता है। वह इस शरीर को ही 'मैं' मानकर इसका स्वामी बन जाता है, जो उसके सारे बंधनों का मूल है।
🔗 यह दृष्टांत अहंकार के मिथ्या अभिमान को उजागर करता है, जो जीव को उसके वास्तविक स्वरूप से दूर रखता है।
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सद्गुरुदेव आत्मा और जीवात्मा के बीच के सूक्ष्म भेद को स्पष्ट करते हैं। आत्मा शुद्ध, चेतन स्वरूप है, लेकिन जब वह पंचमहाभूत, इंद्रियों और अंतःकरण के साथ जुड़कर अहंकार रूपी प्रधानता स्वीकार कर लेता है, तब वह 'जीवात्मा' कहलाता है। यह उपाधि ही उसके बंधन का कारण है।
सद्गुरुदेव एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक सिद्धांत को समझाते हैं: आत्मा और जीव अलग-अलग हैं, पर उनके मिलन से 'जीवात्मा' बनता है। आत्मा शुद्ध चेतन है, लेकिन जब वह पंचमहाभूत, दस इंद्रियों, और अंतःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेता है, तो वह 'जीव' की उपाधि से युक्त हो जाता है। श्रीमद्भागवत का संदर्भ देते हुए सद्गुरुदेव बताते हैं कि यही उपाधि, जिसमें अहंकार प्रधान है, जीव को आत्मा के शुद्ध स्वरूप से अलग कर देती है और उसे बंधन में डाल देती है।
🔗 यह शिक्षा जीव के पतन की प्रक्रिया को स्पष्ट करती है, कि कैसे शुद्ध आत्मा भौतिक उपाधियों से युक्त होकर बद्ध जीवात्मा बन जाती है।
अहंकार का द्वैत: जड़ और चेतन वृत्ति
इस खंड में, सद्गुरुदेव बंधन के मूल कारण 'अहंकार' का गहन विश्लेषण करते हैं। वे अहंकार की दो वृत्तियों - 'जड़-अभिमान' (जो संसार में बांधता है) और 'चिद्-अभिमान' (जो मुक्ति की ओर ले जाता है) - के स्वरूप और कार्यप्रणाली को विस्तार से समझाते हैं।
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अहंकार की दो वृत्तियाँ: जड़ और चित्
अहंकार का दोहरा स्वरूप: जड़-वृत्ति और चित्-वृत्ति
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सद्गुरुदेव बताते हैं कि अहंकार ही जीवात्मा और परमात्मा के बीच का आवरण है। इस अहंकार की दो वृत्तियाँ हैं: एक 'जड़ वृत्ति' (जड़-अभिमान) जो माया की ओर उन्मुख है और बंधन का कारण है। दूसरी 'चित् वृत्ति' (चिद्-अभिमान) जो चेतन, दिव्य स्वरूप की ओर उन्मुख है और मुक्ति का मार्ग है।
सद्गुरुदेव अहंकार को जीवात्मा और परमात्मा के बीच का पर्दा बताते हैं, जिसे हटाना ही साधना का लक्ष्य है। वे इसकी दो प्रवृत्तियों का विश्लेषण करते हैं। पहली है 'जड़-वृत्ति' या 'जड़-अभिमान', जो अविद्या से उत्पन्न होती है और जिसकी गति माया और अंधकार की ओर है। यह वृत्ति ही सबसे खतरनाक आवरण है। दूसरी है 'चित्-वृत्ति' या 'चिद्-अभिमान', जो दिव्य और चिन्मय है। साधना का उद्देश्य जड़-वृत्ति को समाप्त कर चित्-वृत्ति को जाग्रत करना है।
🔗 यह वर्गीकरण साधक को स्पष्ट दिशा देता है कि उसे किस वृत्ति का त्याग करना है और किसे अपनाना है।
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सद्गुरुदेव 'जड़-अभिमान' की व्याख्या करते हैं। 'मैं शरीर हूँ और शरीर से संबंधित वस्तुएँ मेरी हैं' - यही जड़-अभिमान है। यह अभिमान हमें शरीर और इंद्रियों के सुख के लिए प्रेरित करता है और घर, परिवार, धन-संपत्ति में ममता उत्पन्न कर हमें संसार में बांधता है।
सद्गुरुदेव 'जड़-अभिमान' के स्वरूप को विस्तार से समझाते हैं। इसकी शुरुआत इस धारणा से होती है कि 'मैं यह शरीर हूँ'। इस धारणा के कारण शरीर से जुड़ी वस्तुएं, जैसे स्त्री, पुत्र, परिवार, 'मेरे' हो जाते हैं। फिर उनको सुख देने के लिए हम अनित्य भौतिक पदार्थों जैसे घर, मकान, गाड़ी, पैसा आदि में अपनापन स्थापित करते हैं। यह अभिमान हमें इंद्रियों को सुख देने के लिए प्रेरित करता है - आँखों से रूप देखना, कानों से सुनना, जीभ से स्वाद लेना। यही जड़-अभिमान की श्रृंखला है जो हमें माया में उलझाए रखती है।
🔗 यह शिक्षा साधक को अपने दैनिक जीवन में बंधन के कारणों को पहचानने में मदद करती है।
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जड़-अभिमान के विपरीत, सद्गुरुदेव 'चिद्-अभिमान' का परिचय कराते हैं। यह गुरु द्वारा जगाया गया अभिमान है: 'तुम शरीर नहीं, तुम चिन्मय, दिव्य, मायातीत, गुणातीत आत्मा हो। तुम्हारा भगवान से नित्य, अखंड संबंध है।' इस सत्य का चिंतन ही मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।
सद्गुरुदेव जड़-अभिमान के अंधकार से बाहर निकलने का मार्ग बताते हैं, जो है 'चिद्-अभिमान'। यह दिव्य अभिमान गुरुदेव शिष्य के भीतर जगाते हैं। वे उसे बोध कराते हैं, 'देखो, तुम यह शरीर नहीं हो। तुम चिद् वस्तु हो, तुम चिन्मय हो, दिव्य हो, सत्-चित्-आनंदमय हो। भगवान से तुम्हारा नित्य, अविच्छिन्न और प्रेममय संबंध है।' सद्गुरुदेव कहते हैं कि यह हमारा दुर्भाग्य है कि जो हमारा सत्य स्वरूप है, उसे हमें आज चिंतन करके याद करना पड़ रहा है।
🔗 यह शिक्षा गुरु की कृपा और स्वरूप-ज्ञान के महत्व को उजागर करती है, जो साधक को भौतिक पहचान से आध्यात्मिक पहचान की ओर ले जाती है।
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चोट लगने पर दर्द किसे होता है?
प्रश्न: दर्द का भोक्ता कौन - आत्मा या शरीर?
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सद्गुरुदेव एक गहन प्रश्न पूछते हैं: जब शरीर को चोट लगती है, तो दर्द किसे होता है? आत्मा अशरीरी है, उसे दर्द नहीं हो सकता। शरीर जड़ है, उसे अनुभव नहीं हो सकता। तो दर्द का अनुभव कौन करता है? इसका उत्तर है - अहंकार।
सद्गुरुदेव एक रहस्यमय प्रश्न के माध्यम से अहंकार की पकड़ को स्पष्ट करते हैं। वे पूछते हैं, 'जब रास्ते में ठोकर लगती है, तो दर्द किसे होता है?' आत्मा तो चेतन और अशरीरी है, उसे कष्ट नहीं हो सकता। शरीर जड़ है, उसमें अनुभव करने की शक्ति नहीं है, मरने के बाद जलाने पर भी उसे कष्ट नहीं होता। सद्गुरुदेव उत्तर देते हैं कि यह दर्द 'अहंकार' को होता है। शरीर में 'मैं हूँ' ऐसी आत्म-बुद्धि और तदात्म्यता के कारण, शरीर की वेदना का भोक्ता अहंकार बन जाता है, जबकि वास्तव में वह शरीर से अलग है।
🔗 यह प्रश्नोत्तरी अहंकार की गहरी पकड़ को दर्शाती है कि कैसे वह जड़ शरीर के सुख-दुःख को अपना मानकर भोगता है।
साधना का सोपान: विवेक से भाव तक की यात्रा
इस खंड में सद्गुरुदेव साधना के व्यावहारिक पक्ष पर प्रकाश डालते हैं। वे बताते हैं कि कैसे गुरु द्वारा जगाए गए चिद्-अभिमान को विवेक और चिंतन के माध्यम से दृढ़ किया जाता है और साधक भक्ति के विभिन्न सोपानों को पार करता हुआ भाव-दशा तक पहुँचता है।
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सद्गुरुदेव गुरु की भूमिका को स्पष्ट करते हैं। गुरुदेव साधक के भीतर सोए हुए चेतन को जगाते हैं और उसे बोध कराते हैं कि 'तुम शरीर नहीं हो, तुम चेतन आत्मा हो'। यह जागरण ही साधक को जन्म-मृत्यु के चक्र से बाहर निकलने का मार्ग दिखाता है।
सद्गुरुदेव बताते हैं कि जड़ी अहंकार हमें संसार चक्र में घुमा रहा है। इस चक्र से निकालने के लिए गुरुदेव आते हैं। वे शिष्य की सोई हुई चेतना को झकझोर कर जगाते हैं। वे उसे बार-बार स्मरण कराते हैं, 'तुम शरीर नहीं हो, और शरीर संबंधी कोई वस्तु तुम्हारी नहीं है। तुम चेतन हो, आनंदमय हो, और भगवान से तुम्हारा नित्य संबंध है।' यह बोध ही साधना का आधार बनता है और जन्म-मृत्यु के चक्र को समाप्त करने की प्रक्रिया शुरू करता है।
🔗 यह शिक्षा गुरु के महत्व को स्थापित करती है, जो अज्ञान की निद्रा से जगाकर सत्य का बोध कराते हैं।
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दृष्टांत: कर्म का कंप्यूटर
दृष्टांत: जन्म-मृत्यु का कंप्यूटरीकृत चक्र
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सद्गुरुदेव जन्म-मृत्यु के चक्र को 'कर्म के कंप्यूटर' के दृष्टांत से समझाते हैं। हमारे सभी कर्म, भावनाएं और विचार इस विशाल कंप्यूटर में दर्ज हो रहे हैं। मृत्यु के समय 'इक्वल टू' (=) का बटन दब जाता है और कर्मों का फल अगले जन्म के रूप में सामने आ जाता है।
सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि भगवान हमें जन्म-मृत्यु में नहीं डालते, बल्कि हमारा अपना कर्म ही इसका कारण है। वे इसे एक कंप्यूटर के दृष्टांत से समझाते हैं। हमारे जीवन भर के कर्म, विचार और वासनाएं एक विशाल कंप्यूटर में दर्ज होती रहती हैं, जैसे कैलकुलेटर में प्लस-माइनस होता है। मृत्यु का क्षण 'इक्वल टू' (=) का बटन दबाने जैसा है। जैसे ही यह बटन दबता है, हमारे समस्त कर्मों का हिसाब होकर परिणाम (अगला जन्म) सामने आ जाता है। यह प्रक्रिया पूरी तरह से कर्म आधारित है, इसमें भगवान हस्तक्षेप नहीं करते।
🔗 यह दृष्टांत कर्म के सिद्धांत को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में समझाता है और व्यक्ति को अपने कर्मों के प्रति जिम्मेदार बनाता है।
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सद्गुरुदेव एक महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर देते हैं: हम कैसे जान सकते हैं कि यह हमारा अंतिम जन्म है? वे कहते हैं, 'अपने हृदय पर हाथ रखो और देखो। यदि श्री राधा रानी के चरणों को छोड़कर किसी भी वस्तु या पदार्थ के प्रति किंचित भी आसक्ति नहीं है, तो समझ लो यह तुम्हारा अंतिम जन्म है।'
सद्गुरुदेव साधकों के एक सामान्य प्रश्न का उत्तर देते हैं कि हमारा अंतिम जन्म कब होगा। वे कहते हैं कि इसका उत्तर आप स्वयं दे सकते हैं। अपने हृदय पर हाथ रखकर आत्म-निरीक्षण करें। यदि आपके मन में श्री राधा रानी के चरणकमलों के अतिरिक्त किसी भी सांसारिक वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति के प्रति लेशमात्र भी आसक्ति या कामना शेष नहीं है, तो समझ लेना चाहिए कि आपका यह जन्म अंतिम है। जब तक वासना है, तब तक जन्म-मृत्यु का चक्र चलता रहेगा।
🔗 यह शिक्षा मुक्ति के लिए पूर्ण अनासक्ति और एकमात्र भगवद्-निष्ठता की अनिवार्यता को दर्शाती है।
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सद्गुरुदेव संसार की क्षणभंगुरता को स्वप्न के दृष्टांत से समझाते हैं। वे कहते हैं, 'जब तक हम सोए हुए हैं, तब तक संसार और उसकी वस्तुएं सत्य और आकर्षक लगती हैं। जिस दिन हम ज्ञान में जाग जाएंगे, उस दिन यह स्वप्न की तरह मिथ्या लगने लगेगा।'
सद्गुरुदेव चिद्-वृत्ति के जागरण की तुलना नींद से जागने से करते हैं। वे कहते हैं कि जब तक हम अज्ञान की निद्रा में सोए रहते हैं, तब तक यह संसार, इसके संबंध और वस्तुएं हमें सत्य प्रतीत होती हैं, जैसे स्वप्न में देखी गई चीजें उस समय सच लगती हैं। लेकिन जैसे ही गुरु कृपा से हम आध्यात्मिक चेतना में जागते हैं, यह पूरा संसार एक स्वप्न की भांति मिथ्या और असार लगने लगता है। जब तक सोए हैं, संसार अच्छा लगता है; जागने पर नहीं।
🔗 यह दृष्टांत वैराग्य का महत्व बताता है और साधक को संसार की अनित्यता का बोध कराता है।
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सद्गुरुदेव भजन के सार को स्पष्ट करते हैं। वे कहते हैं कि आप कोई भी भजन करें - जप, तप, उपासना, ध्यान, परिक्रमा - उसका प्राण-केंद्र यह चिंतन होना चाहिए कि 'मैं शरीर नहीं हूँ और शरीर से संबंधित कोई भी वस्तु मेरी नहीं है'। इस विवेक के बिना सभी क्रियाएं अधूरी हैं।
सद्गुरुदेव सभी प्रकार की साधनाओं का मूल सिद्धांत बताते हैं। वे कहते हैं कि आप चाहे जप, तप, उपासना, ध्यान, धारणा, स्तुति, वंदना, परिक्रमा या तीर्थाटन, कुछ भी करें, इन सभी का प्राण-केंद्र एक ही चिंतन है: 'मैं यह शरीर नहीं हूँ, और इस शरीर से संबंधित कोई भी वस्तु मेरी नहीं है।' इस विवेक और जागरण के बिना किया गया कोई भी भजन अधूरा है। जब जीवन में कोई भी सुख-दुःख, लाभ-हानि आए, तो यह विवेक ही साधक को स्थिर रखता है।
🔗 यह शिक्षा क्रियात्मक भजन से भावात्मक भजन की ओर प्रगति के लिए विवेक और आत्म-चिंतन की अनिवार्यता पर जोर देती है।
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साधना की अवस्थाएं: रुचि, आसक्ति और भाव
भक्ति के सोपान: रुचि, आसक्ति से भाव दशा तक
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सद्गुरुदेव भक्ति के उन्नत स्तरों का वर्णन करते हैं। 'रुचि' की अवस्था में हरि-कथा के बिना कुछ अच्छा नहीं लगता। 'आसक्ति' में मन एक पल के लिए भी भगवान से नहीं हटता। 'भाव' दशा में साधक खाते-पीते भी भगवान में इतना खो जाता है कि उसे अपने शरीर का भी बोध नहीं रहता।
सद्गुरुदेव साधना की क्रमिक प्रगति का वर्णन करते हैं। निष्ठा के बाद 'रुचि' की अवस्था आती है, जिसमें साधक को हरि-कथा और कीर्तन के अलावा कुछ भी अच्छा नहीं लगता। इसके बाद 'आसक्ति' का स्तर आता है, जहाँ मन एक पल के लिए भी भगवान के चिंतन से हटना नहीं चाहता। इससे भी ऊपर उठने पर 'भाव दशा' प्राप्त होती है, जहाँ मन को भगवान से हटाना असंभव हो जाता है। इस अवस्था में साधक खाते-खाते खाना भूल जाता है और अपने शरीर के प्रति भी किंचित ही बोध रखता है।
🔗 यह वर्णन साधक को भक्ति-पथ पर अपनी प्रगति को समझने और अगले स्तर के लिए लक्ष्य निर्धारित करने में सहायता करता है।
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भाव दशा का लक्षण: क्षान्ति
भाव का प्रथम लक्षण: 'क्षान्ति' की गहन व्याख्या
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सद्गुरुदेव भाव दशा के एक प्रमुख लक्षण 'क्षान्ति' की व्याख्या करते हैं। क्षान्ति का अर्थ है कि संसार में ऐसा कोई भी नुकसान या प्रिय-वियोग नहीं है जो भक्त के चित्त को किंचित मात्र भी विचलित कर सके। विक्षेप के अनेकों कारण होने पर भी चित्त का विक्षिप्त न होना ही क्षान्ति है।
सद्गुरुदेव भाव दशा के नौ लक्षणों में से पहले लक्षण 'क्षान्ति' को विस्तार से समझाते हैं। वे कहते हैं कि क्षान्ति का अर्थ है सहनशीलता की पराकाष्ठा। इस अवस्था में पहुँचे हुए साधक के जीवन में ऐसा कोई भी बड़ा नुकसान, कोई भी प्रिय व्यक्ति का वियोग या कोई भी विपत्ति नहीं है, जो उसके चित्त को क्षण भर के लिए भी विचलित करने में समर्थ हो। संसार में चित्त के विक्षेप के हजारों कारण उपस्थित होने पर भी, जिसका चित्त शांत और अविचलित रहता है, उसे ही 'क्षान्ति' गुण से युक्त समझना चाहिए।
🔗 यह शिक्षा एक उन्नत भक्त की मानसिक स्थिरता और संसार के द्वंद्वों से उसकी अतीत अवस्था को दर्शाती है।
प्रेम की पराकाष्ठा: साधक की उन्मत्त दशा
यह खंड साधक की यात्रा के चरमोत्कर्ष का वर्णन करता है। भाव दशा से प्रेम की अवस्था में प्रवेश करने से ठीक पहले साधक की क्या स्थिति होती है, उसका अंतर्दाह, उसकी व्याकुलता और संसार के प्रति उसकी विरक्ति को सद्गुरुदेव मार्मिक दृष्टांतों के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं।
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दृष्टांत: सूर्योदय से पहले का प्रकाश
दृष्टांत: भाव दशा - प्रेम रूपी सूर्योदय का संकेत
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▶ Watch (33:54)
सद्गुरुदेव भाव दशा की तुलना सूर्योदय से ठीक पहले की स्थिति से करते हैं। जैसे सूर्य उदित नहीं हुआ है, लेकिन चारों ओर प्रकाश फैल गया है और यह निश्चित हो गया है कि अब सूर्योदय होने ही वाला है। वैसे ही भाव दशा प्रेम रूपी सूर्य के उदय होने की निश्चित सूचना है।
सद्गुरुदेव भाव दशा की स्थिति को एक सुंदर दृष्टांत से समझाते हैं। यह अवस्था सूर्योदय से ठीक पहले के समय की तरह है। अभी प्रेम रूपी सूर्य का उदय तो नहीं हुआ है, लेकिन उसकी लालिमा और प्रकाश चारों ओर फैल गया है, जिससे यह निश्चित हो जाता है कि अब सूर्योदय होने में देर नहीं है। भाव दशा में पहुँचे साधक को यह निश्चय हो जाता है कि अब भगवत्-प्रेम की प्राप्ति होने ही वाली है। हालांकि, सद्गुरुदेव चेतावनी देते हैं कि यह भूमि भी पूरी तरह निरापद नहीं है, यहाँ से भी भरत महाराज जैसे साधकों का पतन हुआ है।
🔗 यह दृष्टांत साधक को आशा और आश्वासन देता है, साथ ही अंतिम क्षण तक सावधान रहने की प्रेरणा भी देता है।
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प्रेम से पहले साधक की दशा
प्रेम की पूर्व-अवस्था: तीव्र विरह की अग्नि
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▶ Watch (34:57)
सद्गुरुदेव प्रेम की अवस्था में पहुँचने से ठीक पहले साधक की तीव्र विरह-वेदना का वर्णन करते हैं। उसे आहार-विहार डांडे मारने जैसा लगता है, नींद मृत्यु के समान लगती है, और पूरा संसार एक जल-शून्य कुएं की तरह प्रतीत होता है, जिसमें उसके लिए कोई आकर्षण नहीं बचता।
सद्गुरुदेव बताते हैं कि प्रेम की प्राप्ति से पहले साधक एक अद्भुत और कठिन दशा से गुजरता है। उसकी स्थिति ऐसी हो जाती है कि खाना-पीना उसे दंड देने जैसा लगता है ('आहार-प्रहार जैसे')। यदि थोड़ी देर के लिए नींद आ जाए तो उसे लगता है जैसे वह मर गया था और वह अपने आपको धिक्कारता है ('निद्रा मृत्यु जैसे')। उसे यह संपूर्ण संसार, जिसमें लोग आनंद खोजते हैं, एक सूखे कुएं के समान लगता है, जिसमें उसकी प्यास बुझाने के लिए एक बूँद भी जल नहीं है ('संसार जल-शून्य कूप जैसे')।
🔗 यह वर्णन प्रेम की दिव्यता और उसके लिए आवश्यक तीव्र व्याकुलता को दर्शाता है।
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दृष्टांत: तोते का प्रेम
दृष्टांत: सांसारिक प्रेम की कपटता - तोते का पिंजरा
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▶ Watch (39:43)
सद्गुरुदेव सांसारिक प्रेम की वास्तविकता को तोते के दृष्टांत से उजागर करते हैं। हम तोते को पिंजरे में बंद करके उसकी मीठी बोली से आनंद लेते हैं और कहते हैं कि हम उससे प्रेम करते हैं। वास्तव में हम तोते से नहीं, बल्कि उससे मिलने वाले आनंद से प्रेम करते हैं। यह स्वार्थपूर्ण प्रेम है।
सद्गुरुदेव सांसारिक प्रेम को 'अकबत' अर्थात वंचनाकारी बताते हुए तोते का दृष्टांत देते हैं। एक व्यक्ति तोते को पिंजरे में बंद रखता है, उसकी मीठी बोली 'राधे-कृष्ण' सुनकर आनंदित होता है और दावा करता है कि वह तोते से बहुत प्रेम करता है। सद्गुरुदेव प्रश्न करते हैं: क्या एक पक्षी को कैद करके रखना प्रेम है? वास्तव में, वह व्यक्ति तोते से प्रेम नहीं करता, बल्कि तोते की मीठी बोली से उसे जो आनंद मिलता है, वह उस आनंद से प्रेम करता है। तोता तो केवल आनंद प्राप्ति का साधन है। यह प्रेम नहीं, स्वार्थ है।
🔗 यह दृष्टांत सांसारिक और दिव्य प्रेम के बीच के मूल अंतर को स्पष्ट करता है - एक स्वार्थ पर आधारित है, दूसरा प्रिय के सुख पर।
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दृष्टांत: कुरूप पत्नी का प्रेम
दृष्टांत: रूप पर आधारित प्रेम - कुरूप पत्नी की कथा
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सद्गुरुदेव एक और दृष्टांत देते हैं कि यदि किसी व्यक्ति की अत्यंत सुंदर पत्नी किसी दुर्घटना में कुरूप हो जाए, तो क्या उसका प्रेम पहले जैसा ही रहेगा? वे कहते हैं कि नहीं, क्योंकि प्रेम उसके रूप से था, उससे नहीं। यह दिखाता है कि सांसारिक प्रेम बाहरी गुणों पर आधारित और क्षणभंगुर है।
सांसारिक प्रेम की क्षणभंगुरता को सिद्ध करने के लिए सद्गुरुदेव एक और मार्मिक दृष्टांत देते हैं। मान लीजिए कोई व्यक्ति अपनी पत्नी के सौंदर्य पर मुग्ध है और उसके लिए जान देने की बातें करता है। यदि किसी दुर्घटना में पत्नी का मुख जल जाए और वह कुरूप हो जाए, तो क्या पति का प्रेम पहले जैसा ही बना रहेगा? सद्गुरुदेव कहते हैं कि यह संभव नहीं है। हो सकता है वह सहानुभूति दिखाए, लेकिन वह पहले जैसा प्रेम नहीं कर पाएगा, क्योंकि उसका प्रेम पत्नी की आत्मा से नहीं, बल्कि उसके रूप से था, जो अब नष्ट हो गया है।
🔗 यह दृष्टांत आत्मा के स्तर पर होने वाले दिव्य प्रेम और शरीर के स्तर पर होने वाले भौतिक प्रेम के अंतर को गहराई से समझाता है।
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सद्गुरुदेव बताते हैं कि उन्नत साधक 'अनुताप सागर' में डूब जाता है। उसे अपने पूर्व कर्मों के लिए तीव्र जलन और पश्चाताप होता है। यह दहन क्रिया उसके जन्म-जन्मांतर के पाप-ताप को जलाकर भस्म कर देती है और हृदय को शुद्ध करती है।
सद्गुरुदेव प्रेम मार्ग की एक महत्वपूर्ण आंतरिक प्रक्रिया का वर्णन करते हैं, जिसे 'अनुताप सागर' कहते हैं। जब साधक पर भगवान की कृपा होती है, तो उसके भीतर एक तीव्र दहन क्रिया शुरू हो जाती है। उसे अपने पूर्व के हर छोटे-बड़े कर्म के लिए गहरा पश्चाताप और जलन महसूस होती है। यह जलन ही उसके जन्म-जन्मांतर के संचित पाप, ताप और संस्कारों को जलाकर भस्म कर देती है। सद्गुरुदेव कहते हैं कि जब तक यह जलन शुरू न हो, तब तक समझना चाहिए कि शोधन क्रिया अभी आरंभ नहीं हुई है।
🔗 यह शिक्षा भक्ति मार्ग में पश्चाताप और आत्म-शोधन के महत्व को दर्शाती है, जो भगवद्-प्राप्ति के लिए अनिवार्य है।
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प्रेम की तीव्र अवस्था में साधक उन्मत्त या पागल जैसा हो जाता है। वह कभी हंसता है, कभी रोता है, कभी गाता है। वह अपनी प्रिय राधा रानी को खोजता हुआ कभी राधा कुंड तो कभी बरसाना भागता है, उसे धूप, गर्मी, सर्दी का कोई बोध नहीं रहता।
सद्गुरुदेव प्रेम की चरम अवस्था का वर्णन करते हैं, जहाँ साधक लोक-लाज से परे एक उन्मत्त की भांति व्यवहार करने लगता है। विरह की अग्नि में जलता हुआ वह अपने इष्ट को खोजता फिरता है। वह कभी राधा कुंड की ओर भागता है, यह सोचकर कि राधा रानी वहाँ मिलेंगी, फिर वहाँ न पाकर बरसाना की ओर दौड़ता है। उसे धूप, गर्मी, बरसात या ठण्ड का कोई एहसास नहीं रहता। वह कभी हंसता है, कभी रोता है, कभी गाता है, और कभी चिल्लाता है - यह प्रेम की एक दिव्य पागलपन की स्थिति है।
🔗 यह अवस्था भक्ति की उस चरम सीमा को दर्शाती है जहाँ भक्त का अपने मन और शरीर पर कोई नियंत्रण नहीं रहता और वह पूरी तरह से भगवद्-प्रेम में लीन हो जाता है।
भगवद् दर्शन का रहस्य: अनावृत स्वरूप का अनुभव
सत्संग के इस अंतिम खंड में, सद्गुरुदेव साधना के परम लक्ष्य - भगवद् दर्शन - के रहस्य को खोलते हैं। वे दर्शन के विभिन्न प्रकारों, विशेषकर 'अनावृत दर्शन' की दुर्लभता और दिव्यता का वर्णन करते हैं, और बताते हैं कि इस परम अनुभव के लिए साधक को कैसे तैयार किया जाता है।
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भगवद् दर्शन के प्रकार
दर्शन की विभिन्न श्रेणियाँ: झांकी से अनावृत तक
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सद्गुरुदेव बताते हैं कि भगवद् दर्शन कई प्रकार के होते हैं। कभी भगवान बालक-बालिका के रूप में दर्शन देकर चले जाते हैं, और बाद में पता चलता है। कभी भजन में झांकी दर्शन या स्फूर्ति होती है। लेकिन सबसे दुर्लभ 'अनावृत दर्शन' है, जो आवरण-मुक्त, पूर्ण सच्चिदानंद स्वरूप का दर्शन है।
सद्गुरुदेव भगवद् दर्शन के विभिन्न स्तरों का वर्णन करते हैं। एक प्रकार का दर्शन है जिसमें भगवान किसी साधारण बालक या बालिका का रूप धरकर आते हैं और कृपा करके चले जाते हैं, भक्त को इसका आभास बाद में होता है। दूसरा है 'झांकी दर्शन' या 'स्फूर्ति दर्शन', जो भजन करते समय आंतरिक रूप से होता है। परन्तु, सर्वोच्च दर्शन 'अनावृत दर्शन' है। यह भगवान के पूर्ण सच्चिदानंद, आवरण-रहित, दिव्य स्वरूप का साक्षात् दर्शन है, जिसकी शक्ति को धारण करना साधारण जीव के लिए असंभव है।
🔗 यह शिक्षा दर्शन की क्रमिक प्रकृति को स्पष्ट करती है और परम लक्ष्य 'अनावृत दर्शन' की महिमा को स्थापित करती है।
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सद्गुरुदेव एक भक्त की कथा सुनाते हैं जो राधा रानी के दर्शन के लिए हठ कर रहा था। राधा रानी ने उसे अपने दिव्य हाथ का केवल एक झलक दिखाया। उस दर्शन की शक्ति इतनी तीव्र थी कि भक्त का मस्तिष्क उसे सहन नहीं कर पाया और वह पागल होकर सात दिन तक नग्न घूमता रहा।
अनावृत दर्शन की प्रचंड शक्ति को दर्शाने के लिए सद्गुरुदेव एक भक्त की कथा सुनाते हैं। वह भक्त श्री राधा रानी के दर्शन के लिए बहुत रोता और हठ करता था। उसकी व्याकुलता देखकर राधा रानी ने उसे अपने दिव्य, आवरण-मुक्त सच्चिदानंद स्वरूप वाले हाथ की केवल एक झलक दिखाई। उस एक झलक का तेज इतना अधिक था कि भक्त का मस्तिष्क उसे सहन नहीं कर सका, वह 'ब्रेन क्रैक' हो गया और सात दिनों तक उन्मत्त होकर विवस्त्र घूमता रहा। यह कथा दर्शाती है कि दिव्य दर्शन के लिए पहले पात्रता अर्जित करनी पड़ती है।
🔗 यह कथा भगवद् दर्शन की दिव्यता और उसे धारण करने के लिए आवश्यक आध्यात्मिक शक्ति और पात्रता पर जोर देती है।
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कथा: निधीवन में गुरु भाई का अनुभव
कथा: निधीवन की दिव्य लीला और गुरु भाई का देहत्याग
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सद्गुरुदेव अपने एक गुरु भाई की सत्य घटना बताते हैं जो विरह में व्याकुल होकर रात्रि में निधुवन में प्रवेश कर गए। वहां उन्होंने रासलीला की कोई झांकी या झलक देखी, जिससे वे अचेत हो गए। गुरुदेव के चरणामृत पिलाने पर उन्होंने शरीर छोड़ दिया। यह घटना दिव्य लीलाओं की वास्तविकता और उनकी शक्ति को प्रमाणित करती है।
सद्गुरुदेव अपने जीवन की एक वास्तविक घटना का वर्णन करते हैं। उनके एक युवा गुरु भाई, राधा रानी के विरह में व्याकुल होकर, एक पत्र लिखकर रात्रि के समय निधुवन में चले गए, जहाँ नित्य लीला होती है। वहाँ उन्होंने लीला की कोई दिव्य झलक देखी, जिसे उनका शरीर सहन नहीं कर सका और वे गेट के पास अचेत होकर गिर पड़े। जब उन्हें गुरुदेव के पास लाया गया, तो डॉक्टरों को कोई बीमारी समझ नहीं आई। गुरुदेव ने अपना चरण धोकर जल पिलाने को कहा, और वह जल पीते ही उन्होंने शरीर त्याग दिया। सद्गुरुदेव ने स्वयं उनका दाह संस्कार किया।
🔗 यह व्यक्तिगत अनुभव भगवद् लीला की भूमि की जीवंतता और दिव्य दर्शन के लिए शारीरिक और आध्यात्मिक तैयारी की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
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दर्शन की प्रक्रिया: रूप, सौरभ, शौशर्य, कारुण्य
अनावृत दर्शन का चरणबद्ध अनुभव
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सद्गुरुदेव अनावृत दर्शन की पूरी प्रक्रिया का वर्णन करते हैं। पहले भगवान अपना 'रूप' दिखाते हैं। फिर उनके अंग की दिव्य 'सौरभ' (सुगंध) भक्त को प्रेम-मूर्छित कर देती है। फिर कंठ-ध्वनि ('शौशर्य') उसे सचेत करती है, और अंत में 'कारुण्य' शक्ति उसे स्थिर करके लीला में प्रवेश कराती है।
सद्गुरुदेव आचार्यों के अनुसार अनावृत दर्शन की एक चरणबद्ध प्रक्रिया का वर्णन करते हैं।
1. **रूप:** सर्वप्रथम, भगवान अपने दिव्य स्वरूप का दर्शन कराते हैं।
2. **सौरभ:** फिर, उनके श्रीअंग से एक दिव्य सुगंध निकलती है जो साधक को अभिभूत कर 'प्रेम-मूर्छा' में डाल देती है, क्योंकि वह उस आनंद को धारण नहीं कर पाता।
3. **शौशर्य:** इसके बाद, भगवान अपने कंठ से प्रिय वचन बोलकर साधक को उस मूर्छा से जगाते हैं।
4. **कारुण्य:** अंत में, भगवान अपनी 'कारुण्य' शक्ति साधक में संचारित करते हैं, जिससे वह स्थिर हो जाता है और दिव्य लीलाओं का दर्शन करने और उसमें प्रवेश करने के योग्य बन जाता है। यही साधन का अंतिम सोपान है।
🔗 यह शिक्षा भगवद्-प्राप्ति के अंतिम और सबसे रहस्यमय अनुभव का एक दुर्लभ और प्रामाणिक वर्णन प्रस्तुत करती है।
✨ विशेष उल्लेख
📋 साधना की अवस्थाएं (Stages of Bhakti)
▶ 30:32
▶ देखें (30:32)
- श्रद्धा (Faith)
- साधु-संग (Association with Saints)
- भजन-क्रिया (Initiation of Devotional Service)
- अनर्थ-निवृत्ति (Clearing of Unwanted Habits)
- निष्ठा (Steadiness)
- रुचि (Taste)
- आसक्ति (Attachment)
- भाव (Ecstasy)
- प्रेम (Pure Love)
📋 भाव दशा के नौ लक्षण
▶ 32:05
▶ देखें (32:05)
- क्षान्ति (Forbearance)
- अव्यर्थकालत्वम् (Constant engagement)
- विरक्ति (Detachment)
- मानशून्यता (Absence of false prestige)
- आशाबन्ध (Hope)
- समुत्कण्ठा (Eagerness)
- नामगाने सदा रुचि (Taste for chanting the holy name)
- आसक्तिस्तद्गुणाख्याने (Attachment to describing the Lord's qualities)
- प्रीतिस्तद्वसतिस्थले (Affection for living in the Lord's abode)
✨ महापुरुषों के दृष्टांत
▶ 34:27
▶ देखें (34:27)
"सद्गुरुदेव इन पौराणिक चरित्रों के माध्यम से साधना की विभिन्न अवस्थाओं, आसक्ति के खतरों और ईश्वर-बुद्धि से की गई सेवा की महिमा को स्पष्ट करते हैं।"
🔗 जड़-अभिमान
यह अविद्या से उत्पन्न होता है। इसकी दिशा माया और संसार की ओर है। यह 'मैं शरीर हूँ' की भावना पर आधारित है और जीव को 84 लाख योनियों में भटकाता है। यह एक अंधकारमय और बंधनकारी वृत्ति है।
बनाम
✨ चिद्-अभिमान
यह गुरु कृपा से जाग्रत होता है। इसकी दिशा भगवान और अपने चिन्मय स्वरूप की ओर है। यह 'मैं भगवान का नित्य दास/सखी हूँ' की भावना पर आधारित है और जीव को मुक्त करता है। यह एक प्रकाशमय और दिव्य वृत्ति है।
💔 सांसारिक प्रेम (वंचनाकारी)
यह 'अकबत' अर्थात वंचनाकारी और स्वार्थ पर आधारित है। हम दूसरे से इसलिए प्रेम करते हैं क्योंकि हमें उनसे सुख और आनंद मिलता है। यह बाहरी गुणों (रूप, वाणी) पर निर्भर है और अनित्य है।
बनाम
❤️ कृष्ण प्रेम (अकैतव)
यह 'अकैतव' अर्थात छल-रहित और निस्वार्थ है। इसका एकमात्र उद्देश्य प्रिय (भगवान) को सुख देना है। यह आत्मा के स्तर पर होता है और नित्य एवं unconditional है। यह जंबू-नद-हेम के समान शुद्ध है।
जिज्ञासा (Q&A)
प्रश्न: जीव दुखी होकर संसार चक्र में क्यों घूम रहा है?
▶ देखें (2:09)
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उत्तर: सद्गुरुदेव के अनुसार, इसका मूल कारण 'स्वरूप विस्मृति' और 'अहंकार' है। जीव अपने आनंदमय स्वरूप को भूलकर शरीर को ही 'मैं' मान लेता है, जिस कारण वह बंधन में पड़ जाता है।
उत्तर: सद्गुरुदेव विस्तार से बताते हैं कि यद्यपि जीव भगवान का ही आनंदमय अंश है, फिर भी वह दुखी है क्योंकि वह भगवान द्वारा रचित इस संसार के खेल में बुरी तरह निमग्न हो गया है। अनादि काल से पंचभौतिक शरीर में आत्म-बुद्धि करते-करते यह उसका स्वभाव बन गया है। वह अपने वास्तविक चिन्मय, दिव्य, मायातीत स्वरूप को भूल गया है। यही स्वरूप की विस्मृति और उससे उत्पन्न अहंकार ही उसके संसार बंधन का मूल कारण है।
प्रश्न: चोट लगने पर वास्तव में दर्द किसे होता है - आत्मा को या शरीर को?
▶ देखें (14:10)
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उत्तर: सद्गुरुदेव समझाते हैं कि दर्द न तो आत्मा को होता है (क्योंकि वह अशरीरी है) और न ही शरीर को (क्योंकि वह जड़ है)। दर्द का अनुभव 'अहंकार' करता है, जिसने शरीर के साथ तादात्म्य कर लिया है।
उत्तर: सद्गुरुदेव इस रहस्य को खोलते हुए कहते हैं कि आत्मा चेतन और शरीर से परे है, इसलिए उसे शारीरिक कष्ट नहीं हो सकता। शरीर स्वयं में जड़ पदार्थ है, उसमें अनुभव करने की क्षमता नहीं है, जैसा कि मृत्यु के बाद सिद्ध होता है। वास्तव में, शरीर में 'मैं हूँ' इस झूठे अभिमान के कारण 'अहंकार' ही शरीर पर होने वाले आघात को अपनी वेदना मानकर भोगता है। यह माया का ही प्रभाव है।
प्रश्न: हम यह कैसे जान सकते हैं कि यह हमारा अंतिम जन्म है?
▶ देखें (19:32)
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उत्तर: सद्गुरुदेव के अनुसार, इसकी कसौटी पूर्ण अनासक्ति है। यदि हमारे हृदय में श्री राधा रानी के चरणों के अतिरिक्त किसी भी सांसारिक वस्तु, व्यक्ति या पद के प्रति किंचित भी आकर्षण या वासना शेष नहीं है, तो समझना चाहिए कि यह अंतिम जन्म है।
उत्तर: सद्गुरुदेव आत्म-परीक्षा की एक सीधी विधि बताते हैं। वे कहते हैं कि आप स्वयं इसका निर्णय कर सकते हैं। शांत चित्त से अपने हृदय में झाँक कर देखें। यदि श्री राधा रानी के चरण-कमलों की सेवा की इच्छा को छोड़कर अन्य कोई भी कामना, कोई भी वासना, चाहे वह पुत्र के लिए मकान बनाने जैसी सूक्ष्म वासना ही क्यों न हो, शेष नहीं है, तो आपका जन्म-मृत्यु का चक्र समाप्त हो गया है। जब तक वासना है, तब तक पुनर्जन्म अवश्य होगा।
प्रश्न: क्या श्रवण कुमार का अपने माता-पिता के प्रति प्रेम वास्तविक प्रेम था?
▶ देखें (46:00)
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उत्तर: सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि श्रवण कुमार का प्रेम सांसारिक मोह नहीं था, बल्कि दिव्य था। इसका कारण उनकी भावना थी। उन्होंने अपने माता-पिता को केवल जन्मदाता नहीं माना, बल्कि उन्हें अपना साक्षात् इष्ट, अपना भगवान माना। जब किसी व्यक्ति या संबंध में ईश्वर-बुद्धि स्थापित हो जाती है, तो वह सेवा और प्रेम भौतिक स्तर से उठकर आध्यात्मिक हो जाता है। इसी भावना के कारण सती अनुसूया को भी अपने पति की सेवा से त्रिमूर्तियों को बालक बनाने की शक्ति प्राप्त हुई थी।
उत्तर: सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि श्रवण कुमार का प्रेम सांसारिक मोह नहीं था, बल्कि दिव्य था। इसका कारण उनकी भावना थी। उन्होंने अपने माता-पिता को केवल जन्मदाता नहीं माना, बल्कि उन्हें अपना साक्षात् इष्ट, अपना भगवान माना। जब किसी व्यक्ति या संबंध में ईश्वर-बुद्धि स्थापित हो जाती है, तो वह सेवा और प्रेम भौतिक स्तर से उठकर आध्यात्मिक हो जाता है। इसी भावना के कारण सती अनुसूया को भी अपने पति की सेवा से त्रिमूर्तियों को बालक बनाने की शक्ति प्राप्त हुई थी।
✅ करें (Do's)
- निरंतर यह चिंतन करें कि 'मैं शरीर नहीं, आत्मा हूँ'।
- गुरु, संत और शास्त्रों के वचनों पर श्रद्धा रखें।
- आत्म-परीक्षा करें कि मन में कोई सांसारिक वासना तो शेष नहीं है।
- भगवत्-प्राप्ति को ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य बनाएं।
- हरि-कथा और हरि-कीर्तन में रुचि उत्पन्न करने का प्रयास करें।
- साधना में आने वाली विरह और अनुताप की अवस्था को कृपा समझकर स्वीकार करें।
❌ न करें (Don'ts)
- पंचभौतिक शरीर को अपना वास्तविक स्वरूप न मानें।
- सांसारिक वस्तुओं और संबंधों में अत्यधिक आसक्त न हों।
- छोटे-छोटे लाभ-हानि और सुख-दुःख में अपने चित्त को विचलित न होने दें।
- अपनी प्रशंसा सुनकर प्रसन्न न हों, इसे साधक के लिए दुर्दशा समझें।
- सांसारिक प्रेम को दिव्य प्रेम समझने की भूल न करें।
- भगवद् दर्शन के लिए अधीर होकर अपात्र अवस्था में हठ न करें।
शास्त्र प्रमाण (Scriptural References)
इस खंड में वे श्लोक व कथा-प्रसंग सम्मिलित हैं जो सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित किए गए हैं या सत्संग के भाव को समझने में सहायक संदर्भ के रूप में दिए गए हैं।
श्रीमद्भागवत (कपिल शिक्षा का सार) 3.25-26 (Summary)
श्रीमद्भागवत (कपिल शिक्षा का सार) 3.25-26 (Summary)
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव ने आत्मा और जीवात्मा के बीच के अंतर को स्पष्ट करने के लिए इस परिभाषा का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि कैसे शुद्ध आत्मा, भौतिक तत्वों और अहंकार के साथ मिलकर 'जीव' नामक बद्ध अवस्था को प्राप्त होती है।
भूतेन्द्रियान्तःकरणात् प्रधानाज्जीवसंज्ञितः। आत्मा ततः पृथग्द्रष्टा भगवान् ब्रह्मसंज्ञितः॥
bhūtendriyāntaḥkaraṇāt pradhānājjīvasaṁjñitaḥ। ātmā tataḥ pṛthagdraṣṭā bhagavān brahmasaṁjñitaḥ॥
सद्गुरुदेव इस श्लोक का भावार्थ समझाते हैं कि पंचमहाभूत, इंद्रियाँ और अंतःकरण से युक्त जो प्रधान (अहंकार) है, उसे 'जीव' की संज्ञा दी गई है। जबकि जो इन सबसे पृथक्, दृष्टा स्वरूप है, वह 'आत्मा' है, जिसे ब्रह्म भी कहते हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता 3.27
श्रीमद्भगवद्गीता 3.27
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव ने इस श्लोक का उल्लेख यह समझाने के लिए किया कि जीव का बंधन अहंकार के कारण है। अहंकार से मोहित होकर जीव स्वयं को कर्मों का कर्ता मान बैठता है, जबकि वास्तव में सारे कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा हो रहे हैं। यह 'कर्तापन' का अभिमान ही उसे कर्मफल में बांधता है।
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥
prakṛteḥ kriyamāṇāni guṇaiḥ karmāṇi sarvaśaḥ।
ahaṅkāravimūḍhātmā kartāhamiti manyate॥
वास्तव में सम्पूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं, तो भी जिसका अन्तःकरण अहंकार से मोहित हो रहा है, ऐसा अज्ञानी 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा मानता है।
श्रीमद्भगवद्गीता 5.28
श्रीमद्भगवद्गीता 5.28
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव ने एक मुक्त पुरुष के लक्षणों का वर्णन करते हुए इस श्लोक का भावार्थ प्रस्तुत किया। उन्होंने समझाया कि जिसका मन और बुद्धि सांसारिक विषयों से हटकर भगवत्-परायण हो गए हैं, और जो इच्छा, भय, क्रोध जैसे विकारों से मुक्त है, वह शरीर में रहते हुए भी सदा मुक्त ही माना जाता है।
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः॥
yatendriyamanobuddhir munir mokṣaparāyaṇaḥ।
vigatecchābhayakrodho yaḥ sadā mukta eva saḥ॥
जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि जीती हुई हैं, जो मोक्ष-परायण मुनि इच्छा, भय और क्रोध से रहित हो गया है, वह सदा मुक्त ही है।
श्री चैतन्य-चरितामृत, मध्य-लीला 2.43
श्री चैतन्य-चरितामृत, मध्य-लीला 2.43
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव ने सांसारिक प्रेम और दिव्य कृष्ण-प्रेम के बीच अंतर को स्पष्ट करने के लिए इस पद का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि सांसारिक प्रेम स्वार्थपूर्ण और वंचनाकारी ('अकबत') होता है, जबकि कृष्ण-प्रेम पूर्णतः निस्वार्थ और शुद्ध ('अकैतव') होता है।
अकैतव कृष्ण-प्रेम, येन जाम्बूनद-हेम।
सेइ प्रेम नृलोके ना हय, यदि हय, तार योगे वियोग ना हय॥
akaitava kṛṣṇa-prema, yena jāmbūnada-hema।
sei prema nṛloke nā haya, yadi haya, tāra yoge viyoga nā haya॥
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि छल-रहित कृष्ण-प्रेम जम्बूनद नदी के सोने के समान शुद्ध होता है। वैसा प्रेम इस मनुष्य लोक में नहीं होता, और यदि होता भी है, तो उसमें कभी वियोग नहीं होता।
श्रीमद्भागवतम् 11.2.40
श्रीमद्भागवतम् 11.2.40
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव ने प्रेम की उन्मत्त दशा का वर्णन करते हुए इस श्लोक का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि जब साधक प्रेम की अवस्था में पहुँचता है, तो उसका व्यवहार सामान्य नहीं रहता। वह भगवद्-प्रेम में इतना मग्न हो जाता है कि वह पागलों की तरह हंसने, रोने और नाचने लगता है।
एवं व्रतः स्वप्रियनामकीर्त्या जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चैः।
हसत्यथो रोदिति रौति गायत्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्यः॥
evaṁ vrataḥ svapriyanāmakīrtyā jātānurāgo drutacitta uccaiḥ।
hasatyatho roditi rauti gāyatyunmādavannṛtyati lokabāhyaḥ॥
इस प्रकार अपने प्रिय भगवान के नाम का कीर्तन करने का व्रत लेकर, जब भक्त के हृदय में अनुराग उत्पन्न होता है तो उसका चित्त द्रवित हो जाता है। तब वह ज़ोर-ज़ोर से कभी हँसता है, कभी रोता है, कभी चिल्लाता है, कभी गाता है और पागलों की तरह नाचता है, उसे लोक-लाज की परवाह नहीं रहती।
श्रीमद्भागवतम् 3.26.4
श्रीमद्भागवतम् 3.26.4
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव जीव की परिभाषा बताते हुए कहते हैं कि पंचमहाभूतों, इंद्रियों, मन, बुद्धि और अहंकार के साथ रहने वाला ही जीव कहलाता है।
भूतैरिन्द्रियैर्मनोबुद्ध्यहंकारैस्तदाश्रयैः। भूतेंद्रियांतःकरणैः प्रधानैर्जीवसंज्ञितः॥
पंचमहाभूतों, इंद्रियों, मन, बुद्धि और अहंकार से युक्त तथा उनके आश्रय से रहने वाला जीव कहलाता है।
श्रीमद्भगवद्गीता 15.8
श्रीमद्भगवद्गीता 15.8
पूरक संदर्भ (Siddhant)
पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि जिस प्रकार वायु गंध को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती है, उसी प्रकार जीवात्मा भी एक शरीर को छोड़कर अपने संस्कारों को लेकर दूसरे शरीर में प्रवेश करती है।
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः। गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्॥
जैसे वायु गंध को ग्रहण करके ले जाती है, वैसे ही जीवात्मा भी शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर में जाती है।
श्रीमद्भगवद्गीता 9.9
श्रीमद्भगवद्गीता 9.9
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव भगवान के कथन को उद्धृत करते हुए कहते हैं कि भगवान कर्मों में आसक्तिरहित और उदासीन रहते हैं, इसलिए कर्म उन्हें नहीं बाँधते।
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय। उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु॥
हे धनंजय! वे कर्म मुझे नहीं बाँधते, क्योंकि मैं उन कर्मों में आसक्तिरहित और उदासीन के समान स्थित रहता हूँ।
श्रीमद्भगवद्गीता 8.6
श्रीमद्भगवद्गीता 8.6
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव जन्म-मृत्यु के चक्र की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि मृत्यु के समय मनुष्य जिस भाव का स्मरण करता है, उसी को प्राप्त होता है।
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्। तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥
हे कुन्तीपुत्र! मनुष्य अन्तकाल में जिस-जिस भी भाव का स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग करता है, वह सदा उसी भाव से भावित होने के कारण उसी को प्राप्त होता है।
श्रीमद्भगवद्गीता 4.22
श्रीमद्भगवद्गीता 4.22
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव बताते हैं कि जो साधक अनायास प्राप्त लाभ में संतुष्ट रहता है, द्वंद्वों से परे है और सिद्धि-असिद्धि में समभाव रखता है, वह कर्म करके भी बंधता नहीं है।
यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः। समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते॥
जो अपने आप प्राप्त हुए लाभ में संतुष्ट रहता है, हर्ष-शोक आदि द्वंद्वों से अतीत है और मत्सरता से रहित है, वह कार्य सिद्धि और असिद्धि में समान भाव वाला मनुष्य कर्म करके भी नहीं बंधता।
श्री शिक्षाष्टकम् श्लोक 4
श्री शिक्षाष्टकम् श्लोक 4
पूरक संदर्भ (Siddhant)
पूरक संदर्भ
सद्गुरुदेव राधा रानी के चरणों के प्रति अनन्य आसक्ति की बात करते हुए कहते हैं कि साधक को किसी भी भौतिक वस्तु की कामना नहीं करनी चाहिए, जो श्री चैतन्य महाप्रभु के शिक्षाष्टक के चौथे श्लोक के भाव को दर्शाता है।
न धनं न जनं न सुन्दरीं कवितां वा जगदीश कामये। मम जन्मनि जन्मनीश्वरे भवताद् भक्तिरहैतुकी त्वयि॥
हे जगदीश्वर! मुझे न धन की, न अनुयायियों की, न सुन्दर स्त्री की और न ही काव्य-रचना की कामना है। मेरी तो बस यही प्रार्थना है कि जन्म-जन्मान्तर तक आप में मेरी अहैतुकी भक्ति बनी रहे।
स्पष्टीकरण (Clarification)
यह सारांश AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग गुरु सेवा में करके तैयार किया गया है। इसमें त्रुटि हो सकती है। कृपया पूर्ण लाभ के लिए पूरा वीडियो अवश्य देखें।
अहंकार का त्याग और प्रेम की प्राप्ति, स्वरूप विस्मृति, अहंकार का बंधन, साधना का सोपान, भगवद् दर्शन
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