[Study Guide : Jan 19, 2026] संसार में रहते हुए परमार्थ-सिद्धि का मार्ग: संग-दोष, संस्कार और मन के एकांत का गहन विश्लेषण

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श्री भगवत चर्चा
20 January 2026

गृहस्थ में वैराग्य: वासना-त्याग का विज्ञान

संसार में रहते हुए परमार्थ-सिद्धि का मार्ग: संग-दोष, संस्कार और मन के एकांत का गहन विश्लेषण

Sri Sri 108 Sri Vinod Baba ji Maharaj
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हमारे प्रिय सद्गुरुदेव बताते हैं:
" सर्वोत्तम एकांत है मन का एकांत। दुनिया का मेला, मैं हूँ अकेला। "
वासना (12)एकांत (25)संग-दोष (8)संस्कार (7)गृहस्थ (10)भजन (20)वैराग्य (9)
🔍 सत्संग सार (Executive Summary)

यह सत्संग माधुर्य लीला के सर्वोच्च रस से आरंभ होकर साधना के वास्तविक अर्थ को उजागर करता है। सद्गुरुदेव समझाते हैं कि सच्चा त्याग घर का नहीं, बल्कि मन में स्थित भोग-वासना का है। जन्म-जन्मांतर के संस्कारों और संग-दोष के खतरों से सावधान करते हुए, वे गृहस्थ जीवन में रहकर भी अनासक्त भाव से भजन करने का व्यावहारिक मार्ग दिखाते हैं। सत्संग का सार 'मन का एकांत' है, जो भौतिक एकांत से श्रेष्ठ है। अंत में, युवाओं के विवाह, पूर्व के पापों से मुक्ति और सच्चे गुरु की पहचान जैसे समसामयिक प्रश्नों का गहन समाधान प्रस्तुत किया गया है, जो साधक को भक्ति-पथ पर दृढ़ता से आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

🧱 ज्ञान प्रवाह
graph TD A["🌺 माधुर्य लीला रस की सर्वोपरिता"] --> B["साधना का अर्थ: संस्कारों के विरुद्ध अभ्यास"]; B --> C["दृष्टांत: शराबी और मछली खाने वाले (आदत और स्वभाव)"]; C --> D["माया और भोग-वृत्ति का प्रभाव"]; D --> E[" संग-दोष और पूर्व संस्कार का पुनर्जागरण"]; E --> F["कथा: भरत महाराज का पतन (मोह का खतरा)"]; F --> G["गृहस्थ का द्वंद्व: घर का संग सबसे खतरनाक"]; G --> H["❓ उपाय क्या है?"]; H --> I["विवेक-जागृति: जीवन का प्रयोजन और लक्ष्य निर्धारण"]; I --> J["सच्चा त्याग: वासना का त्याग, घर का नहीं"]; J --> K["एकांत की मीमांसा: बाह्य, गृह और मन का एकांत"]; K --> L["👑 सर्वोत्तम एकांत: मन का एकांत (हृदय गुहा में प्रवेश)"]; L --> M["🎙️ प्रश्नोत्तर सत्र"]; M --> M1["युवाओं का विवाह और भक्ति"]; M --> M2["वासना लेकर घर छोड़ना"]; M --> M3["पापों से मुक्ति का उपाय (भक्ति मार्ग की सुगमता)"]; M --> M4["सच्चे साधु की पहचान"];
graph TD A["🌺 माधुर्य लीला रस की सर्वोपरिता"] --> B["साधना का अर्थ: संस्कारों के विरुद्ध अभ्यास"]; B --> C["दृष्टांत: शराबी और मछली खाने वाले (आदत और स्वभाव)"]; C --> D["माया और भोग-वृत्ति का प्रभाव"]; D --> E[" ಅಪಾಯ: संग-दोष और पूर्व संस्कार का पुनर्जागरण"]; E --> F["कथा: भरत महाराज का पतन (मोह का खतरा)"]; F --> G["गृहस्थ का द्वंद्व: घर का संग सबसे खतरनाक"]; G --> H["❓ उपाय क्या है?"]; H --> I["विवेक-जागृति: जीवन का प्रयोजन और लक्ष्य निर्धारण"]; I --> J["सच्चा त्याग: वासना का त्याग, घर का नहीं"]; J --> K["एकांत की मीमांसा: बाह्य, गृह और मन का एकांत"]; K --> L["👑 सर्वोत्तम एकांत: मन का एकांत (हृदय गुहा में प्रवेश)"]; L --> M["🎙️ प्रश्नोत्तर सत्र"]; M --> M1["युवाओं का विवाह और भक्ति"]; M --> M2["वासना लेकर घर छोड़ना"]; M --> M3["पापों से मुक्ति का उपाय (भक्ति मार्ग की सुगमता)"]; M --> M4["सच्चे साधु की पहचान"];

📖 आज की शिक्षाएं 📖 आज की विस्तृत शिक्षाएं

रस-सिद्धांत एवं साधना का स्वरूप
माधुर्य रस की सर्वोच्चता स्थापित करना और साधना के वास्तविक अर्थ को समझाना, जो संस्कारों के विरुद्ध एक सतत अभ्यास है।
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माधुर्य लीला रस: भगवत्ता की पराकाष्ठा
प्रेम की सर्वोच्चता और उपासना का परम लक्ष्य
▶ देखें (0:35) ▶ Watch (0:35)
सद्गुरुदेव सत्संग का आरंभ श्री जयदेव कृत 'गीत गोविंदम' के महात्म्य से करते हैं। वे बताते हैं कि भगवान के अनंत स्वरूपों में माधुर्य लीला रस सर्वोपरि है, जहाँ स्वयं भगवान अपनी आनंदमयी शक्ति श्री राधा रानी के साथ प्रेम रस का आस्वादन करते हैं। यही हमारी उपासना का चरम लक्ष्य है। सद्गुरुदेव समझाते हैं कि समस्त भगवत्ता का पर्यवसान प्रेम में ही होता है। भगवान का माधुर्य रस, जिसका वे अपनी महाभाव स्वरूपा शक्ति श्री राधा रानी के साथ आस्वादन करते हैं, भगवत्-तत्व का सार है। हमारी उपासना पद्धति का भी यही परम उद्देश्य है - श्री राधा-कृष्ण के युगल विलास रस-माधुर्य का आस्वादन करना। यह कृपा-साध्य है, केवल साधन-प्रचेष्टा से संभव नहीं। इस विषय में एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि यदि यह कृपा-साध्य है तो फिर साधन का क्या प्रयोजन है?
🔗 यह खंड सत्संग की नींव रखता है, जो बताता है कि अंतिम लक्ष्य 'प्रेम रस' है, और आगे की चर्चा इसी लक्ष्य को प्राप्त करने के साधनों पर केंद्रित होगी।
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साधन का वास्तविक अर्थ: 'साधा' अर्थात अभ्यास
संस्कारों के विरुद्ध सतत अभ्यास ही साधना है
▶ देखें (2:19) ▶ Watch (2:19)
सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि 'साधन' का अर्थ है 'साधा' यानि अभ्यास (Practice)। यह अभ्यास किसलिए है? यह जन्म-जन्मांतर की विषय-भोग की लालसा से निवृत्त होने के लिए है, जो हमारे मन में गहराई से बैठी हुई है। सद्गुरुदेव एक प्रश्न का उत्तर देते हुए समझाते हैं कि कृपा-प्राप्ति के लिए भी साधन आवश्यक है। 'साधन' का मूल 'साधा' शब्द में है, जिसका अर्थ है अभ्यास करना। हमारा मन स्वाभाविक रूप से विषय-वस्तुओं की ओर भागता है क्योंकि जन्म-जन्मांतर की भोग-लालसा हमारे भीतर संस्कार रूप में विद्यमान है। इससे निवृत्त होना सहज नहीं है। साधना इसी प्रवृत्ति के विरुद्ध एक सतत अभ्यास है। इस गहरी आदत को समझाने के लिए सद्गुरुदेव एक शराबी का दृष्टांत प्रस्तुत करते हैं।
🔗 यह कार्ड 'साधन' की पारंपरिक धारणा को तोड़कर इसे एक मनोवैज्ञानिक अभ्यास के रूप में प्रस्तुत करता है, जो आगे संस्कार और आदत की चर्चा के लिए मंच तैयार करता है।
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दृष्टांत: शराबी और संस्कार का बंधन
आदत और संस्कार का भेद: शराबी का दृष्टांत
▶ देखें (3:40) ▶ Watch (3:40)
एक शराबी जो मृत्यु के भय से शराब छोड़ देता है, वर्षों बाद भी अवसर मिलने पर उसका मन शराब की ओर आकर्षित होता है। यह उसका पूर्व संस्कार है जो आदत छूटने के बाद भी बना रहता है। सद्गुरुदेव एक शराबी का उदाहरण देते हैं जिसने डॉक्टर की चेतावनी पर शराब पीना छोड़ दिया। 10-15 साल या 50 साल बीत जाने पर भी, यदि उसे शराब का संग मिलता है, तो उसका मन पीने के लिए लालायित हो उठता है। यद्यपि उसकी आदत छूट गई है, लेकिन पीने का 'संस्कार' भीतर रह जाता है। यह संस्कार अवसर पाते ही पुनः प्रेरणा देता है। इसके विपरीत, जिसने कभी शराब नहीं पी, उसे कीमती से कीमती शराब भी दुर्गंधयुक्त लगेगी और आकर्षित नहीं करेगी। यह दृष्टांत बताता है कि आदत और स्वभाव के कारण घृणित वस्तु भी प्रिय लगने लगती है।
🔗 यह दृष्टांत 'संस्कार' की गहराई और दृढ़ता को स्पष्ट करता है, जो साधक के जीवन में एक प्रमुख बाधा है।
संग-दोष और संस्कार का बंधन
यह समझाना कि कैसे संग-दोष और पूर्व संस्कार साधक की प्रगति में बाधक बनते हैं, और यह खतरा घर के भीतर भी उतना ही प्रबल है।
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भोग-वृत्ति: स्वभाव बन चुका दोष
माया की भोग-वृत्ति का स्वभाव में परिवर्तन
▶ देखें (8:02) ▶ Watch (8:02)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि अनंत काल से माया के पदार्थों का भोग करते-करते यह हमारा स्वभाव बन गया है। जो वस्तु आत्मा को दूषित करती है, वही हमें अच्छी लगती है। यह स्वभाव या आदत इतनी गहरी है कि इसे छोड़ना अत्यंत कठिन है। सद्गुरुदेव बंगाल में सूखी मछली के उदाहरण से समझाते हैं कि कैसे एक दुर्गंधयुक्त वस्तु भी आदत के कारण स्वादिष्ट लगने लगती है। इसी प्रकार, अनंत काल से माया के भोग्य पदार्थों का सेवन करते-करते हमारी भोग-वृत्ति स्वभाव बन गई है। ये पदार्थ आत्मा को संसार-चक्र में बांधते हैं, फिर भी हमें अच्छे लगते हैं। सद्गुरुदेव स्वयं का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि कैसे 50 वर्ष पूर्व पान खाने की आदत का संस्कार आज भी सूक्ष्म रूप में विद्यमान है। इस सूक्ष्म संस्कार को समझाने हेतु वे दिन में तारे का दृष्टांत देते हैं।
🔗 यह खंड बताता है कि समस्या केवल बाहरी कर्मों में नहीं, बल्कि भीतर गहरे बैठे स्वभाव और संस्कारों में है।
दृष्टांत: दिन में दिखने वाले तारे
सुप्त संस्कारों का खतरा: दिन में तारे का दृष्टांत
▶ देखें (9:42) ▶ Watch (9:42)
जैसे दिन में सूर्य के तेज प्रकाश के कारण तारे दिखाई नहीं देते, पर वे आकाश में होते हैं, वैसे ही तीव्र भजन के प्रकाश में भोग-वृत्तियाँ दब जाती हैं, पर नष्ट नहीं होतीं। संग-दोष मिलने पर वे पुनः प्रकट हो सकती हैं। सद्गुरुदेव समझाते हैं कि आकाश में तारे दिन में भी होते हैं, परन्तु सूर्य के प्रखर तेज के कारण दिखाई नहीं देते। ठीक इसी प्रकार, जब साधक तीव्र भजन, सत्संग और एकांतवास करता है, तो उसके भीतर शुद्ध सत्य का प्रकाश होता है। इस प्रकाश में भोग-वृत्तियाँ और संस्कार दबे हुए प्रतीत होते हैं, मानो वे हैं ही नहीं। लेकिन यदि साधक दीर्घ समय तक सत्संग और भजन से दूर होकर भोगी लोगों का संग करता है, तो वे ही दबे हुए संस्कार धीरे-धीरे पुनः जागृत हो जाते हैं और उसे पाप कर्म में विवश कर देते हैं।
🔗 यह एक शक्तिशाली रूपक है जो साधकों को आत्मसंतुष्ट होने से रोकता है और निरंतर साधना और सत्संग की आवश्यकता पर बल देता है।
पाप की विवशता: अर्जुन का प्रश्न
संस्कारों का बलपूर्वक आक्रमण
▶ देखें (11:39) ▶ Watch (11:39)
सद्गुरुदेव गीता के उस प्रसंग का उल्लेख करते हैं जहाँ अर्जुन पूछते हैं कि मनुष्य न चाहते हुए भी पाप क्यों करता है? यह संस्कारों के 'बल' के कारण होता है। सद्गुरुदेव समझाते हैं कि हम कई बार प्रार्थना करते हैं, बचना चाहते हैं, फिर भी पाप कर बैठते हैं। यह 'बल' हमारे पूर्व-जन्मों के संस्कार और आदतें हैं जो अदृश्य शक्ति की तरह बुद्धि का अपहरण कर लेती हैं।
पाप की विवशता: अर्जुन का प्रश्न— भगवद् गीता Bhagavad Gita 3.36
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
सद्गुरुदेव का विश्लेषण: यह 'बल' हमारे पूर्व-जन्मों के संस्कार और आदतें हैं जो अदृश्य शक्ति की तरह बुद्धि का अपहरण कर लेती हैं。
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः। अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः॥
atha kena prayukto 'yaṃ pāpaṃ carati pūruṣaḥ। anicchannapi vārṣṇeya balādiva niyojitaḥ॥
अर्जुन पूछते हैं: हे कृष्ण! यह मनुष्य न चाहता हुआ भी किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है? मानो कोई बलपूर्वक उसे इसमें लगा रहा हो。
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कथा: भरत महाराज का पतन
मोह का सूक्ष्म आक्रमण: भरत महाराज की कथा
▶ देखें (14:50) ▶ Watch (14:50)
चक्रवर्ती राजा भरत, जो सब कुछ त्याग कर हिमालय में भजन करते-करते भाव-स्तर तक पहुँच गए थे, एक हिरण के बच्चे के मोह में पड़कर अपने पथ से विचलित हो गए। यह संग-दोष की भयावहता को दर्शाता है। सद्गुरुदेव संग-दोष के खतरे को समझाने के लिए भरत महाराज का उदाहरण देते हैं। वे एक चक्रवर्ती राजा थे जिन्होंने सब कुछ त्याग दिया और भजन करते हुए उच्च भाव-स्तर पर पहुँच गए। फिर भी, एक हिरण के बच्चे के प्रति मोह ने धीरे-धीरे उनके मन पर अधिकार कर लिया। यह मोह एक दिन में नहीं, बल्कि धीरे-धीरे, दीर्घ समय में बढ़ा और उनकी बुद्धि-वृत्ति का हरण कर उन्हें भजन से दूर ले गया। यह कथा साधकों को चेतावनी देती है कि मोह किसी भी स्तर पर आक्रमण कर सकता है, इसलिए निरंतर साधु-संग आवश्यक है।
🔗 यह शास्त्रीय कथा संग-दोष के सिद्धांत को एक ठोस, यादगार कहानी के माध्यम से प्रमाणित करती है।
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घर का संग: सबसे खतरनाक बंधन
बाहरी संग से अधिक खतरनाक: घर का संग
▶ देखें (16:12) ▶ Watch (16:12)
सद्गुरुदेव चेतावनी देते हैं कि बाहरी संग से भी अधिक खतरनाक घर के भीतर का संग है। अपने स्त्री, पुत्र, और परिवार का मोह-ममता साधक को भजन से हटाकर संसार में फँसा सकता है। सद्गुरुदेव एक महत्वपूर्ण रहस्योद्घाटन करते हैं कि साधक अक्सर बाहरी संग से तो बचता है, लेकिन घर के संग की अनदेखी कर देता है, जो अधिक खतरनाक है। अपने ही परिवार - पत्नी, बच्चों, और प्रियजनों - का मोह और ममता अत्यंत प्रबल होता है। एक छोटा बच्चा भी मन को मोहित करके भजन से हटा सकता है। साधक को यह भ्रम हो सकता है कि 'मैं तो कहीं जाता नहीं, घर में ही रहता हूँ', जबकि बंधन की जड़ तो घर में ही है। इसकी परीक्षा के लिए सद्गुरुदेव 15 दिन बिना मोबाइल के एकांत में रहने की चुनौती देते हैं, जिससे पता चल जाएगा कि मन कहाँ खिंचता है।
🔗 यह कार्ड साधक की सुरक्षा की झूठी भावना को तोड़ता है और आत्म-निरीक्षण के लिए एक व्यावहारिक अभ्यास प्रदान करता है।
गृहस्थ जीवन में वैराग्य का मार्ग
गृहस्थ साधकों के लिए व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करना, जिसमें सच्चे त्याग और जीवन के लक्ष्य की स्पष्टता पर जोर दिया गया है।
गृहस्थ साधक का उपाय: सत्संग और स्वाध्याय
गृहस्थ में रहकर भजन का व्यावहारिक उपाय
▶ देखें (18:08) ▶ Watch (18:08)
इस समस्या का उपाय बताते हुए सद्गुरुदेव कहते हैं कि गृहस्थ साधक को बार-बार सत्संग में रहना चाहिए, घर में भी अनावश्यक व्यवहारिक संग से बचना चाहिए और भक्तमाल, श्रीमद्भागवत जैसे ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए। यह मन को संयमित करने की प्रेरणा देता है। श्री पंडित बाबा के प्रश्न का उत्तर देते हुए सद्गुरुदेव गृहस्थ जीवन में भजन करने का उपाय बताते हैं। उन्हें बार-बार सत्संग में आकर प्रेरणा की अग्नि को प्रज्वलित करना चाहिए। घर लौटने पर, यह सावधानी रखनी चाहिए कि मन पुनः विषय-वासना में न फँस जाए। घर में भी, अनावश्यक सांसारिक मेलजोल से बचना चाहिए। इसके स्थान पर, भक्तमाल और श्रीमद्भागवत जैसे सद्ग्रंथों का संग (अध्ययन) करना चाहिए, जो मन को संयम में रखने के लिए प्रेरणा और सहयोग प्रदान करते हैं।
🔗 यह कार्ड पिछले खंड में उठाई गई समस्या का सीधा और व्यावहारिक समाधान प्रदान करता है।
❓ प्रश्न: इसका उपाय क्या है कि साधक जो घर गृहस्थ में रहकर के भजन करे? ▶ 18:08
💡 उत्तर: बार-बार सत्संग में रहें, घर में अनावश्यक संग से बचें, और सद्ग्रंथों का अध्ययन करें। बीच-बीच में एकांतवास भी आवश्यक है। 💡 उत्तर: सद्गुरुदेव समाधान देते हैं कि गृहस्थ साधक को निरंतर सत्संग में आकर अपने भीतर भजन की प्रेरणा को जीवित रखना चाहिए। घर लौटने पर, यह सावधानी रखनी चाहिए कि मन पुनः विषय-वासना में न फँस जाए। घर में भी, अत्यधिक व्यवहारिक संग से बचकर, श्रीमद्भागवत और भक्तमाल जैसे ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए। यह ग्रंथ-संग मन को संयमित करने में सहायता करता है।
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जीवन का लक्ष्य: प्रयोजन, उद्देश्य और लक्ष्य
लक्ष्य की स्पष्टता: भगवत् प्राप्ति का दृढ़ संकल्प
▶ देखें (23:07) ▶ Watch (23:07)
सद्गुरुदेव साधक को अपने जीवन के तीन पहलुओं पर विचार करने के लिए कहते हैं: प्रयोजन (Purpose), उद्देश्य (Objective), और लक्ष्य (Goal)। जब लक्ष्य स्पष्ट हो कि 'इसी शरीर में भगवत् प्राप्ति करनी है', तब गृहस्थ या त्यागी का भेद नहीं रह जाता। सद्गुरुदेव समझाते हैं कि वैराग्य तभी बढ़ता है जब जीवन का प्रयोजन स्पष्ट हो। साधक को स्वयं से पूछना चाहिए: मेरे जीवन का प्रयोजन क्या है, उद्देश्य क्या है, और लक्ष्य क्या है? जैसे बिना लक्ष्य के कोई यात्रा नहीं होती, वैसे ही बिना आध्यात्मिक लक्ष्य के जीवन व्यर्थ है। जब साधक यह लक्ष्य निर्धारित कर लेता है कि 'इसी शरीर के रहते हुए भगवत् प्राप्ति करनी है', तो गृहस्थ और त्यागी का बाहरी भेद महत्वहीन हो जाता है। तब व्यक्ति की अपनी वासना ही उसे गृहस्थ बनाती है और वैराग्य ही उसे त्यागी बनाता है।
🔗 यह कार्ड साधना की दिशा को बाहरी परिस्थितियों से हटाकर आंतरिक संकल्प और लक्ष्य-निर्धारण पर केंद्रित करता है।
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कथा: नामदेव जी और 'सावधान' की पुकार
तीव्र वैराग्य का लक्षण: नामदेव जी का पलायन
▶ देखें (24:28) ▶ Watch (24:28)
विवाह मंडप में 'सावधान' की आवाज सुनकर नामदेव जी ने इसे भगवान की चेतावनी समझा और उसी क्षण संसार त्याग कर भाग गए। सद्गुरुदेव भक्त नामदेव जी का प्रसंग सुनाते हैं। माँ के रोने पर वे विवाह के लिए तैयार हो गए। विवाह मंडप में जब 'शुभ-दृष्टि' की रस्म हो रही थी, तब मशाल से तंबू में आग लगने के डर से किसी ने पीछे से चिल्लाया- 'सावधान!' नामदेव जी ने इसे भगवान की चेतावनी समझा कि 'संसार में फँसने से सावधान हो जा'। वे उसी क्षण मंडप से छलांग लगाकर भाग गए और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
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शास्त्र-प्रमाण: बिनु सत्संग विवेक न होई
विवेक-जागृति का एकमात्र साधन: सत्संग
▶ देखें (28:14) ▶ Watch (28:14)
सद्गुरुदेव श्री रामचरितमानस का प्रमाण देते हुए कहते हैं कि बिना सत्संग के विवेक नहीं जागता, और बिना विवेक के मोह नहीं मिटता। मोह मिटे बिना श्री राम के चरणों में दृढ़ प्रेम नहीं होता। सद्गुरुदेव 'हम गृहस्थी हैं' इस बहाने का खंडन करते हुए कहते हैं कि हमें बांधने वाली हमारी भोग-वृत्ति और मोह-ममता है, न कि गृहस्थ आश्रम। इस मोह से निकलने का उपाय सत्संग है। इसी सिद्धांत की पुष्टि हेतु सद्गुरुदेव श्री रामचरितमानस का प्रसिद्ध दोहा उद्धृत करते हैं।
🔗 यह कार्ड सत्संग के महत्व को शास्त्रीय प्रमाण के साथ स्थापित करता है, जो विवेक-जागृति और मोह-नाश के लिए अनिवार्य है।
विवेक-जागृति का सूत्र— Sri रामचरितमानस Sri Ramcharitmanas Uttar Kanda 44.1
▶ 28:14
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
बिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥ सतसंगत मुद मंगल मूला। सोइ फल सिधि सब साधन फूला॥
binu satasaṃga bibeka na hoī। rāma kṛpā binu sulabha na soī॥ satasaṃgata muda maṃgala mūlā। soi phala sidhi saba sādhana phūlā॥
सत्संग के बिना विवेक नहीं होता और वह सत्संग श्री रामजी की कृपा के बिना सहज में मिलता नहीं। सत्संगति आनंद और कल्याण की जड़ है। सत्संग की सिद्धि ही फल है और सब साधन तो फूल हैं।
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कर्म का फॉर्मूला: ब्रह्मण्याधाय कर्माणि
अनासक्त जीवन का गणितीय सूत्र
▶ देखें (34:21) ▶ Watch (34:21)
सद्गुरुदेव श्रीमद्भगवद्गीता का श्लोक उद्धृत करते हुए अनासक्त कर्म का सूत्र बताते हैं। जो व्यक्ति अपने समस्त कर्मों को भगवान को समर्पित करके, आसक्ति रहित होकर कर्म करता है, वह संसार में रहते हुए भी पाप से लिप्त नहीं होता, जैसे कमल का पत्ता जल से। सद्गुरुदेव घर में रहकर भजन करने की विधि को एक गणित के फॉर्मूले की तरह समझाते हैं। जैसे फॉर्मूला जाने बिना गणित हल नहीं होता, वैसे ही इस सूत्र के बिना संसार में अनासक्त रहना संभव नहीं। यह सूत्र है - अपने सभी कर्मों को भगवान को अर्पण कर देना। यह मानकर कर्म करना कि भगवान ही करा रहे हैं, और भगवत्-प्राप्ति ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य है। ऐसा करने वाला व्यक्ति संसार में रहकर भी पापों से उसी प्रकार अछूता रहता है, जैसे कमल का पत्ता पानी में रहकर भी गीला नहीं होता। सद्गुरुदेव इस सिद्धांत की पुष्टि हेतु गीता का यह श्लोक प्रस्तुत करते हैं।
🔗 यह कार्ड गृहस्थ जीवन में वैराग्य के अभ्यास के लिए एक ठोस, शास्त्र-सम्मत और व्यावहारिक विधि प्रदान करता है।
अनासक्त कर्म का सिद्धांत— भगवद् गीता Bhagavad Gita 5.10
▶ 34:21
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः। लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥
brahmaṇyādhāya karmāṇi saṅgaṁ tyaktvā karoti yaḥ। lipyate na sa pāpena padmapatramivāmbhasā॥
जो पुरुष सब कर्मों को परमात्मा में अर्पण करके और आसक्ति को त्यागकर कर्म करता है, वह पुरुष जल से कमल के पत्ते की भाँति पाप से लिप्त नहीं होता।
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सच्चा त्याग: वासना को छोड़ना ही घर छोड़ना है
त्याग का यथार्थ स्वरूप: देहाभिमान का त्याग
▶ देखें (35:44) ▶ Watch (35:44)
सद्गुरुदेव त्याग की क्रांतिकारी परिभाषा देते हैं: घर छोड़ना महत्वपूर्ण नहीं है, वासना को छोड़ना ही सच्चा घर छोड़ना है। घर का मूल जड़ यह शरीर है, और इस शरीर में 'मैं' पन की आसक्ति ही मूल बंधन है। सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि वर्तमान समय में बाहर जाकर भजन करने के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ नहीं हैं। सच्चा संघर्ष बाहरी दुनिया में नहीं, बल्कि अपने भीतर बैठे काम, क्रोध, लोभ जैसे शत्रुओं से है। इसलिए, घर छोड़ने का विचार व्यर्थ है। वास्तविक 'घर' यह शरीर है, और 'घर छोड़ना' मतलब इस शरीर में आसक्ति और 'मैं-पन' (देहाभिमान) को त्यागना है। शरीर-संबंधी वस्तुओं (मकान, पैसा, आदि) में आसक्ति का मूल कारण शरीर में आसक्ति ही है। अतः, वासना का त्याग ही यथार्थ त्याग है।
🔗 यह कार्ड 'त्याग' और 'वैराग्य' की अवधारणा को एक गहन आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर पुनर्परिभाषित करता है।
एकांत की त्रिस्तरीय मीमांसा
एकांत के विभिन्न स्तरों को परिभाषित करना और यह स्थापित करना कि सच्चा और सर्वोच्च एकांत मानसिक अवस्था है, न कि भौतिक स्थान।
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तीन प्रकार का एकांत: बाह्य, गृह और मानसिक
एकांत की त्रिस्तरीय व्याख्या
▶ देखें (36:36) ▶ Watch (36:36)
सद्गुरुदेव एकांत के तीन स्तर बताते हैं: (1) जंगल आदि में बाहरी एकांत, (2) घर में एक अलग कमरे का एकांत, और (3) मन का एकांत, जो सर्वोत्तम है। 'एकांत' का अर्थ है 'एक' (अकेला) का 'अंत' (होना)। सद्गुरुदेव 'एकांत' शब्द की व्याख्या करते हुए कहते हैं - 'एका + अंत', अर्थात जहाँ केवल 'एक' (तुम अकेले) हो। वे तीन प्रकार के एकांत का वर्णन करते हैं: 1. **बाहर का एकांत:** जंगल या किसी निर्जन स्थान पर अकेला रहना। 2. **घर का एकांत:** घर में एक अलग कमरा लेकर दुनिया से अलग होकर भजन करना। 3. **मन का एकांत:** यह सर्वोत्तम एकांत है, जहाँ व्यक्ति हजारों की भीड़ में रहते हुए भी मानसिक रूप से अकेला और अनासक्त रहता है। उसके मन पर दुनिया का कोई रंग नहीं चढ़ता।
🔗 यह कार्ड 'एकांत' की सतही समझ को गहरा करता है, इसे एक आंतरिक अवस्था के रूप में प्रस्तुत करता है।
📌 एकांत के तीन प्रकार:
  • बाहरी एकांत (जंगल/निर्जन स्थान)
  • गृह एकांत (घर में अलग कक्ष)
  • मानसिक एकांत (मन की अनासक्ति - सर्वोत्तम)
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सर्वोत्तम एकांत: मन का एकांत
मानसिक एकांत की सर्वोच्चता और हृदय-गुहा में प्रवेश
▶ देखें (37:48) ▶ Watch (37:48)
सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि जंगल में रहकर भी यदि मन में कामना-वासना है, तो वह सच्चा एकांत नहीं है। सच्चा एकांत मन की वह अवस्था है जहाँ हजारों लोगों के बीच भी व्यक्ति अपने इष्ट के साथ अकेला होता है। 'दुनिया का मेला, मैं हूँ अकेला' - यही सर्वोत्तम एकांत है। सद्गुरुदेव बल देकर कहते हैं कि यदि मन शांत नहीं है और कामनाओं से भरा है, तो जंगल का एकांत भी व्यर्थ है और नाश का कारण बन सकता है। साधु वेश में भी कुटिया, बाउंड्री, फ्रिज जैसी कामनाएं मन को अशांत रखती हैं। इसके विपरीत, सच्चा एकांत मन का है। बिहारी जी के भीड़-भरे बाजार में एक साधु के तल्लीन ध्यान का दृष्टांत देते हुए वे समझाते हैं कि असली एकांत कहीं भी, किसी भी परिस्थिति में संभव है। हमारा हृदय ही सबसे बड़ा एकांत स्थान है। हमें अपनी इंद्रियों को समेटकर इसी हृदय-गुहा में प्रवेश करना है, जहाँ हम और हमारे इष्ट अकेले हों।
🔗 यह खंड एकांत की चर्चा को उसके शिखर पर ले जाता है, जो साधक के लिए अंतिम लक्ष्य है - बाहरी परिस्थितियों से अप्रभावित एक स्थिर आंतरिक स्थिति।
समसामयिक आध्यात्मिक जिज्ञासा एवं समाधान
आधुनिक साधकों, विशेषकर युवाओं के सामने आने वाली व्यावहारिक चुनौतियों, जैसे विवाह, करियर और पाप-बोध, का शास्त्र-सम्मत और व्यावहारिक समाधान प्रदान करना।
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युवाओं के लिए विवाह पर मार्गदर्शन
भक्त युवाओं के लिए विवाह: अवसर या बाधा?
▶ देखें (44:33) ▶ Watch (44:33)
सद्गुरुदेव कहते हैं कि यदि भजन करने वाला साथी मिले तो विवाह करना उत्तम है। यह परमार्थ में सहायक हो सकता है। परन्तु, किसी बहिर्मुखी व्यक्ति से विवाह करना भजन-जीवन को नष्ट कर सकता है। यदि योग्य साथी न मिले तो अकेले रहकर भजन करना ही श्रेष्ठ है। एक प्रश्न के उत्तर में सद्गुरुदेव आधुनिक समय में भक्त युवाओं के विवाह की दुविधा पर प्रकाश डालते हैं। वे कहते हैं कि विवाह सनातन धर्म में समाज को श्रृंखलित करने का एक उपाय है। यदि साधक को कोई भक्तिमान, समान विचारधारा वाला साथी मिल जाए, तो विवाह करना उत्तम है, क्योंकि यह साधना में परस्पर सहयोग प्रदान कर सकता है। परन्तु, आज के समय में ऐसा साथी मिलना कठिन है। किसी पूर्णतः बहिर्मुखी और अभक्त व्यक्ति से विवाह करने का जोखिम नहीं लेना चाहिए, क्योंकि यह भजन-जीवन को चौपट कर सकता है। यदि ऐसा सुयोग्य साथी न मिले, तो अविवाहित रहकर भजन करना ही श्रेयस्कर है।
🔗 यह कार्ड एक बहुत ही प्रासंगिक और आधुनिक समस्या का संतुलित और व्यावहारिक समाधान प्रदान करता है।
❓ प्रश्न: आजकल के नए युवा भजन-सत्संग के प्रभाव से शादी-विवाह नहीं करना चाहते, इस पर आपका क्या मार्गदर्शन है? ▶ 44:33
💡 उत्तर: यदि समान वृत्ति वाला भक्त साथी मिले तो विवाह उत्तम है, अन्यथा किसी बहिर्मुखी से विवाह करने से भजन नष्ट होने का खतरा है। ऐसी स्थिति में अविवाहित रहना बेहतर है। 💡 उत्तर: सद्गुरुदेव समझाते हैं कि यह एक जटिल स्थिति है। एक ओर, विवाह सामाजिक व्यवस्था के लिए आवश्यक है। दूसरी ओर, यदि जीवनसाथी की वृत्ति आध्यात्मिक न हो, तो यह साधक के जीवन को बर्बाद कर सकता है। उन्होंने एक इंजीनियर भक्त का उदाहरण दिया जिसका जीवन विवाह के बाद पूरी तरह बदल गया और भजन छूट गया। इसलिए, उनकी सलाह है कि यदि कोई ऐसा साथी मिले जिसकी मनोवृत्ति शुद्ध हो और भक्ति में रुचि हो, तो विवाह करना दोषपूर्ण नहीं, बल्कि उत्तम है। लेकिन यदि ऐसा न हो, और किसी बहिर्मुखी व्यक्ति से विवाह करना पड़े, तो यह एक बड़ा जोखिम है। ऐसे में अकेले रहकर भजन करना अधिक सुरक्षित और श्रेयस्कर है।
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वास्तविक घटना: गलत संग का परिणाम
गलत संग का जोखिम: एक सच्ची घटना
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एक शिष्य ने गुरु की चेतावनी अनसुनी कर अभक्त से विवाह किया, जिससे उसकी भक्ति नष्ट हो गई। सद्गुरुदेव कहते हैं- 'रिस्क' मत लो। सद्गुरुदेव एक इंजीनियर शिष्य का उदाहरण देते हैं जिसने गुरु की चेतावनी के बावजूद एक बहिर्मुखी (भक्ति-हीन) लड़की से विवाह किया। परिणाम यह हुआ कि पत्नी ने उसे भक्ति से पूरी तरह दूर कर दिया। सद्गुरुदेव चेतावनी देते हैं कि यदि साथी आध्यात्मिक न हो, तो वह घर में 'आग लगा सकता है' (भक्ति संस्कारों को जला सकता है)। इसलिए, 'रिस्क (Risk)' मत लो। यदि योग्य साथी न मिले, तो अकेले रहना ही सुरक्षित है।
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कर्म का विधान: जब तक श्रद्धा न हो
घर छोड़ने का अधिकार: श्रद्धा की परिपक्वता
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सद्गुरुदेव श्रीमद्भागवत का प्रमाण देते हुए कहते हैं कि जब तक भगवान की कथा में तीव्र श्रद्धा उत्पन्न न हो जाए, तब तक व्यक्ति को संसार में रहकर अपने कर्म (जैसे माता-पिता की सेवा) करते रहना चाहिए। वासना लेकर घर छोड़ने के प्रश्न पर सद्गुरुदेव चेतावनी देते हैं कि ऐसा करने से व्यक्ति 'न भोगी, न जोगी' बनकर बर्बाद हो जाता है। जब तक मन में भोग की इच्छा है, तब तक संसार में ही रहना चाहिए। इस संदर्भ में वे भगवान का वचन उद्धृत करते हैं कि जब तक मेरी कथा में तीव्र श्रद्धा उत्पन्न न हो, तब तक संसार में रहकर अपने नियत कर्मों का पालन करना चाहिए। माता-पिता की सेवा जैसे कर्तव्यों को अधूरा छोड़कर वैराग्य का अभिनय करना उचित नहीं है।
🔗 यह कार्ड वैराग्य और कर्तव्य के बीच एक महत्वपूर्ण संतुलन स्थापित करता है, जो साधकों को अपरिपक्व निर्णय लेने से रोकता है।
कर्म और श्रद्धा का संबंध— श्रीमद् भागवतम् Srimad Bhagavatam 11.20.9
▶ 52:56
संदर्भ पूरक संदर्भ
तावत् कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता। मत्कथाश्रवणादौ वा श्रद्धा यावन्न जायते॥
tāvat karmāṇi kurvīta na nirvidyeta yāvatā। matkathāśravaṇādau vā śraddhā yāvanna jāyate॥
(भगवान कहते हैं) जब तक कर्मों से वैराग्य न हो जाए अथवा जब तक मेरी कथा के श्रवण आदि में श्रद्धा उत्पन्न न हो, तब तक कर्म करते रहना चाहिए।
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गीता की अभय वाणी: दुराचारी भी साधु है
भक्ति मार्ग की सुगमता और भगवान की अभय वाणी
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सद्गुरुदेव भक्ति मार्ग की सुगमता बताते हुए गीता का श्लोक उद्धृत करते हैं। भगवान कहते हैं कि यदि कोई अत्यंत दुराचारी व्यक्ति भी अनन्य भाव से मेरा भजन करता है, तो उसे साधु ही मानना चाहिए, क्योंकि वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है। सद्गुरुदेव भक्ति मार्ग की महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि यह मार्ग अत्यंत सहज, सरल और सुगम है। अन्य मार्गों जैसे योग में नीरोग शरीर और अखंड ब्रह्मचर्य जैसी कठिन शर्तें हैं, परन्तु भक्ति मार्ग में ऐसा नहीं है। यहाँ भगवान शरणागत व्यक्ति के पूर्व के पाप, दुराचार, या व्यभिचार को नहीं देखते। इस सिद्धांत को प्रमाणित करने के लिए सद्गुरुदेव गीता की सबसे सुंदर अभय वाणी प्रस्तुत करते हैं, जिसमें भगवान स्वयं दुराचारी से दुराचारी व्यक्ति को भी अपनी शरण में लेने और उसे धर्मात्मा बना देने का वचन देते हैं।
🔗 यह कार्ड पाप-बोध से ग्रस्त साधकों को आशा और संबल प्रदान करता है, भक्ति मार्ग की शरणागति-प्रधान प्रकृति को उजागर करता है।
भगवान का आश्वासन— भगवद् गीता Bhagavad Gita 9.30
▶ 55:03
संदर्भ पूरक संदर्भ
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्। साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥
api cetsudurācāro bhajate māmananyabhāk। sādhureva sa mantavyaḥ samyagvyavasito hi saḥ॥
यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भक्त होकर मुझे भजता है तो वह साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चयवाला है।
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वासना से मुक्ति: बोध की जागृति
वासना-मुक्ति का विज्ञान: करने का नहीं, होने का विषय
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वासना से मुक्त हुआ नहीं जाता, व्यक्ति मुक्त हो जाता है। यह तब होता है जब साधु-संग से यह बोध जागृत हो जाता है कि भोग-पदार्थ आत्मा के लिए विष के समान हैं। जैसे विष मिले भोजन को कोई नहीं खाता, वैसे ही बोध होने पर व्यक्ति स्वयं ही भोगों से विरक्त हो जाता है। एक साधक के प्रश्न 'वासना से मुक्त कैसे हों?' का उत्तर देते हुए सद्गुरुदेव एक गहरा रहस्य बताते हैं - 'मुक्त हुआ नहीं जाता, मुक्त हो जाता है। यह करने का नहीं, बल्कि होने का विषय है। इसका उपाय है 'बोध' की जागृति। वे दृष्टांत देते हैं कि यदि आपको पता चल जाए कि 56 भोग वाले भोजन में विष मिला है, तो आप उसे किसी कीमत पर नहीं खाएंगे। ठीक इसी प्रकार, जब साधु-संग और सत्संग-श्रवण के माध्यम से यह दृढ़ बोध हो जाता है कि सांसारिक भोग-पदार्थ आत्मा के लिए विष हैं और अनंत जन्मों के बंधन का कारण हैं, तब मन में स्वतः ही उनके प्रति अनासक्ति और विरक्ति आ जाती है।
🔗 यह कार्ड साधना के 'करने' वाले पक्ष से 'होने' वाले पक्ष की ओर एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाता है, जो ज्ञान और बोध पर आधारित है।
❓ प्रश्न: वासना से मुक्त होने के लिए क्या करें? ▶ 59:57
💡 उत्तर: वासना से मुक्त हुआ नहीं जाता, हो जाता है। जब सत्संग से यह बोध हो जाए कि भोग पदार्थ विष हैं, तब स्वतः ही उनसे विरक्ति हो जाती है। 💡 उत्तर: सद्गुरुदेव समझाते हैं कि यह एक क्रिया नहीं, बल्कि एक अवस्था है। जबरदस्ती वस्तु त्यागने से मन की इच्छा नहीं जाती। इसका सही उपाय है बोध को जगाना। जैसे कोई व्यक्ति यह जानने के बाद कि भोजन में जहर है, उसे नहीं खाएगा, उसी तरह जब साधु-संग के माध्यम से साधक को यह ज्ञान हो जाता है कि विषय-भोग आत्मा के लिए जहर हैं और संसार-चक्र में फंसाने वाले हैं, तो वह स्वाभाविक रूप से उनसे दूर हो जाता है। यह बोध ही सच्ची अनासक्ति लाता है।
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पापों का बोझ और दीक्षा: क्या शरण संभव है?
पापी और दीक्षा-हीन के लिए भगवान का द्वार
▶ देखें (65:53) ▶ Watch (65:53)
भक्त पूछता है कि 'हमसे बहुत पाप हुए हैं, और दीक्षा भी नहीं हुई, क्या हम शरण जा सकते हैं?' सद्गुरुदेव उत्तर देते हैं कि दीक्षा गौण है, भगवान से संबंध नित्य है। पापों की चिंता छोड़ शरण लो। एक भक्त अपनी ग्लानि व्यक्त करता है कि उसने जीवन में बहुत पाप किए हैं और अभी गुरु-दीक्षा भी नहीं मिली है, तो क्या वह भगवान की शरण का अधिकारी है? सद्गुरुदेव अभय-दान देते हुए कहते हैं: 'दीक्षा हो या न हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। भगवान से तुम्हारा संबंध अखंड है। तुम उसी अवस्था में (पापों के बोझ के साथ ही) शरण में आओ। भगवान पाप नहीं देखते, वे केवल अपना संबंध देखते हैं। वे स्वयं तुम्हें बुद्धि-योग देंगे।'
❓ प्रश्न: हमसे बहुत सारे पाप आचरण हुए हैं, और दीक्षा भी नहीं हुई, क्या हम भगवान की शरण में जा सकते हैं? ▶ 65:53
💡 उत्तर: अवश्य। भगवान पापों का लेखा-जोखा नहीं देखते। दीक्षा औपचारिक है, संबंध नित्य है। शरणागत हो जाओ। 💡 उत्तर: अवश्य। भगवान पापों का लेखा-जोखा नहीं देखते। दीक्षा औपचारिक है, संबंध नित्य है। शरणागत हो जाओ।
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भगवान की प्रतिज्ञा: शरण में रहो, मैं देख लूंगा
शरणागत की सुरक्षा: भगवान का अभय-वचन
▶ देखें (67:30) ▶ Watch (67:30)
सद्गुरुदेव आश्वासन देते हैं कि साधक को यह प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि चाहे कुछ भी हो जाए, वह भगवान की शरण नहीं छोड़ेगा। भगवान अपने भक्त के पाप-ताप नहीं देखते, क्योंकि वे जानते हैं कि यह उनकी माया का ही खेल है। अज्ञान से हुए पाप के लिए भगवान भक्त को दंड नहीं देते। सद्गुरुदेव साधक को दृढ़ रहने की प्रेरणा देते हैं। वे कहते हैं कि यह नहीं सोचना चाहिए कि शरण में आने के बाद कोई भूल नहीं होगी। भूल हो सकती है, लेकिन साधक की प्रतिज्ञा यह होनी चाहिए कि 'किसी भी स्थिति में हम पीछे नहीं हटेंगे, हम भगवत् शरण से दूर नहीं जाएंगे'। यदि साधक इस प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहता है, तो भगवान उसे कभी नहीं छोड़ते। भगवान भक्त के पापों को नहीं देखते, क्योंकि वे जानते हैं कि जीव उनकी ही माया से मोहित होकर खेल रहा है। इस संदर्भ में वे श्री चैतन्य-चरितामृत का प्रमाण देते हैं।
🔗 यह सत्संग का समापन है, जो साधक को सभी भयों से मुक्त करके केवल और केवल भगवान की शरण में दृढ़ रहने का अंतिम और सर्वोच्च संदेश देता है।
अज्ञानकृत पाप का परिमार्जन— Sri चैतन्य चरितामृत Sri Chaitanya Charitamrita Madhya-lila 15.107
▶ 68:33
उल्लेखित सद्गुरुदेव द्वारा उल्लेखित
अज्ञान यदि हय पाप उपस्थित। तथापि कृष्ण तारे ना करेन प्रायश्चित॥
ajñāna yadi haya pāpa upasthita। tathāpi kṛṣṇa tāre nā karena prāyaścita॥
यदि अज्ञानवश कोई पाप हो भी जाता है, तो भी भगवान कृष्ण उसके लिए भक्त को प्रायश्चित (दंड) नहीं कराते।
साधक की प्रतिज्ञा: जानबूझकर पाप नहीं
शरण का नियम: प्रतिज्ञा और सावधानी
▶ देखें (69:16) ▶ Watch (69:16)
सद्गुरुदेव चेतावनी देते हैं कि भगवान अज्ञानवश हुए पाप क्षमा करते हैं, इसका अर्थ यह नहीं कि हम जानबूझकर पाप करें। साधक को 'काय-मन-वचन' से पाप न करने की कठोर प्रतिज्ञा लेनी होगी। सद्गुरुदेव स्पष्ट करते हैं कि भगवान की शरण का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। साधक को यह दृढ़ प्रतिज्ञा करनी चाहिए: 'मैं किसी भी कीमत पर काय (शरीर), मन और वचन से निषिद्ध कर्म नहीं करूँगा'। यदि पूर्ण सावधानी और प्रतिज्ञा के बाद भी पूर्व-संस्कारवश कोई गलती हो जाए, तो भगवान उसे नहीं देखते। परन्तु, 'निज स्वेच्छा' (अपनी मर्जी) से पाप करना सर्वथा वर्जित है।
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चेतावनी: बिना गुरु-आश्रय के घर न छोड़ें
वैराग्य की शर्त: पहले संग, फिर त्याग
▶ देखें (70:26) ▶ Watch (70:26)
सद्गुरुदेव अंतिम चेतावनी देते हैं कि बिना किसी 'महत-आश्रय' (सच्चे गुरु का सहारा) के घर छोड़ना पागलपन है। केवल कपड़े रंगने से कुछ नहीं होगा। सत्संग के समापन पर एक साधक पूछता है कि यदि घर छोड़ दिया पर गुरु नहीं मिले तो? सद्गुरुदेव कड़े शब्दों में कहते हैं कि 'बिना अवलंबन (Support) के घर छोड़ना पागलपन है'। पहले किसी आचरणशील महापुरुष (केवल प्रवचन करने वाले नहीं) का संग और आश्रय सुनिश्चित करो, तभी घर छोड़ने का कोई औचित्य है, अन्यथा साधक भटक जाएगा।
❓ प्रश्न: घर छोड़ कर आ गए और किसी महापुरुष का संग नहीं मिला, तो क्या वैराग्य सार्थक होगा? ▶ 70:26
💡 उत्तर: नहीं, यह पागलपन है। पहले 'महत-संग' (गुरु आश्रय) खोजो, फिर घर छोड़ने का विचार करो। 💡 उत्तर: नहीं, यह पागलपन है। पहले 'महत-संग' (गुरु आश्रय) खोजो, फिर घर छोड़ने का विचार करो।
स्पष्टीकरण (Clarification)

यह सारांश AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग गुरु सेवा में करके तैयार किया गया है। इसमें त्रुटि हो सकती है। कृपया पूर्ण लाभ के लिए पूरा वीडियो अवश्य देखें।

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