प्रेम-साधना का रहस्य और श्री जयदेव का जीवन
प्रेम-साधना का रहस्य और श्री जयदेव का जीवन
यह सत्संग माधुर्य रस को सर्वोपरि बताते हुए प्रारंभ होता है, जहाँ भक्त अपने अस्तित्व को विलय न करके भगवान की लीला में पार्षद रूप से सम्मिलित होता है। सद्गुरुदेव समझाते हैं कि हमारा साध्य 'प्रेम' है, जो साधन से नहीं, अपितु कृपा और शरणागति से ही प्राप्त होता है। साधक की विरह-वेदना, माया की दुर्लङ्घ्यता और गुरु-आश्रय की अनिवार्यता को स्पष्ट करने के उपरांत, सत्संग श्री जयदेव गोस्वामी के जीवन चरित्र की ओर मुड़ता है। उनके बाल्यकाल, तीव्र वैराग्य, जगन्नाथ पुरी में साधना और भगवान जगन्नाथ के आदेश से पद्मावती के साथ उनके दिव्य विवाह की पावन कथा का वर्णन किया गया है, जो भगवत्-कृपा और भक्त के जीवन में प्रभु के हस्तक्षेप का एक अनुपम उदाहरण है।
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- आहार प्रहार जैसा लगता है।
- जागरण अवस्था अनुताप का सागर बन जाती है।
- शरीर के प्रति कोई आदर-बुद्धि नहीं रहती।
- उन्मत्त होकर लीला-स्थलियों में दर्शन के लिए भागता है।
- निरंतर सावधान रहें, विशेषकर जब आप साधना में प्रगति कर रहे हों।
- अपने मन पर कभी पूर्ण विश्वास न करें, यह कभी भी धोखा दे सकता है।
- गुरु को एक साधारण मनुष्य समझने की भूल (साधारणकरण) न करें।
- ग्रंथ: गीत-गोविन्द
- विषय: राधा-कृष्ण युगल विलास माधुरी
- जन्म स्थान: केन्दुबिल्व, बीरभूम जिला, पश्चिम बंगाल
- कोई जाति-भेद या छुआछूत नहीं।
- झूठे का कोई विचार नहीं होता।
- अत्यंत महिमामय और भजन में स्फूर्ति प्रदायक।
- ब्राह्मण: श्री सुदेव
- वचन: प्रथम संतान जगन्नाथ जी को समर्पित करना।
- आदेश: कन्या को श्री जयदेव को समर्पित करो।
- विवाह में केवल बाहरी योग्यता (Degree) देखकर चरित्र (Character) की अनदेखी न करें।
- पाश्चात्य अंधानुकरण में अपने भारतीय पारिवारिक मूल्यों (अर्धांगिनी भाव) का त्याग न करें।
- भगवान की इच्छा को अपनी इच्छा से ऊपर रखें और उसे स्वीकार करें।
- अर्धांगिनी
- सहधर्मिणी
- धर्मपत्नी
- पतिव्रता
यह सारांश AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग गुरु सेवा में करके तैयार किया गया है। इसमें त्रुटि हो सकती है। कृपया पूर्ण लाभ के लिए पूरा वीडियो अवश्य देखें।
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