[Study Summary : Jan 16, 2026] भजन में मन न लगने की स्तिथि से प्रयोजन बोध , मंजरी भाव और दिव्य वृन्दावन का वर्णन

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श्री भगवत चर्चा
17 January 2026

माया का अभिमान और कृपा का अवलंबन

माया का अभिमान और कृपा का अवलंबन

Sri Sri 108 Sri Vinod Baba ji Maharaj
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सद्गुरुदेव के अनमोल वचन
" मन लगेगा कहाँ से? वह तो पहले से ही संसार में 'लगा' हुआ है। जहाँ हमारी गहरी रुचि होती है, वहाँ हम समय निकाल ही लेते हैं। समस्या समय की नहीं, 'प्रयोजन बोध' की है। "

" भविष्य के भरोसे मत बैठो। 100 साल जीने की कोई गारंटी नहीं है, लेकिन मृत्यु की 100% गारंटी है। जो (भजन) करना है, अभी करो। "

" यह माथे पर लगा तिलक साधारण नहीं है, यह 'हरि-मंदिर' है। जब हम द्वादश अंगों पर तिलक लगाते हैं, तो हम इस नश्वर शरीर में भगवान की प्राण-प्रतिष्ठा करते हैं। "

" जैसे हजारों सूरजमुखी के फूलों के बीच एकरसता होती है, लेकिन विविध फूलों के बीच वही सूरजमुखी खिल उठता है; वैसे ही सखा, सखी और मंजरी भाव मिलकर ही लीला-माधुर्य को पूर्णता देते हैं। "
प्रयोजन बोध (10) माया (15) कृपा (12) नारद (11) सखी (18) मंजरी (5) तिलक (7) योगमाया (5)
🔍 सत्संग सार (Executive Summary)

इस सत्संग में सद्गुरुदेव ने भजन की सफलता के लिए एकमात्र साधन 'कृपा' को स्थापित किया है। श्री नारद मुनि के पूर्व जन्म और बाद के जीवन के दृष्टांतों के माध्यम से, यह समझाया गया है कि भजन में मन न लगने का मूल कारण 'प्रयोजन बोध' का अभाव है। सद्गुरुदेव ने माया पर विजय पाने के अहंकार के खतरे को नारद जी की कथा से उजागर किया। सत्संग का उत्तरार्ध दिव्य वृंदावन की अलौकिक लीलाओं, प्रेम की 7 अवस्थाओं, सखी-भाव के 5 भेदों और 'परस्पर सुख संवर्धन' की गोपनीय लीला का वर्णन करता है। अंत में, तिलक के आध्यात्मिक रहस्य को 'हरि मंदिर' के रूप में समझाकर सनातन धर्म की वैज्ञानिकता पर प्रकाश डाला गया है।

🧱 ज्ञान प्रवाह
graph TD A["कृपा ही एकमात्र अवलंबन"] --> B["भजन की तीव्र इच्छा का उदय (नारद का पूर्व जन्म)"]; B --> C["प्रश्न: भजन में मन क्यों नहीं लगता?"]; C --> D["उत्तर: प्रयोजन बोध का अभाव"]; D --> E["दृष्टांत: धन कमाने वाले और जुआरी का"]; D --> E2["समय का कलेक्शन (Time Collection)"]; E --> F["नारद मुनि का तप और अभिमान"]; F --> G["माया पर विजय का अहंकार"]; G --> H["भगवान विष्णु द्वारा माया का प्रदर्शन"]; H --> I["नारद का वानर मुख और उपहास"]; I --> J["क्रोध में श्राप और पश्चाताप"]; J --> K["सिद्धांत: माया जीव के सामर्थ्य से परे है"]; K --> L["भजन का लक्ष्य: दिव्य प्रेम और सेवा"]; L --> M["दिव्य लोक में सेवा (गोपी देह प्राप्ति)"]; M --> N["प्रेम की अवस्थाएं (स्नेह -> महाभाव)"]; N --> O["सखी भाव के 5 प्रकार"]; O --> P["लीला: परस्पर सुख संवर्धन"]; P --> Q["दिव्य वृंदावन (पुष्प-पथ) और योगमाया"]; Q --> R["सनातन धर्म (शहनाई दृष्टांत)"]; R --> S["तिलक का रहस्य: द्वादश अंगों में हरि मंदिर"];
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📖 आज की शिक्षाएं 📖 आज की विस्तृत शिक्षाएं

प्रारंभिक साधना: कृपा की भूमिका और प्रयोजन बोध
यह समझाना कि भजन की शुरुआत और उसमें निरंतरता के लिए भगवत् कृपा और जीवन के उद्देश्य (प्रयोजन बोध) की स्पष्टता कितनी आवश्यक है।
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कृपा ही एकमात्र अवलंबन
साधना का मूल आधार: कृपा का आश्रय
▶ Watch (0:33)
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि जीव के लिए माया से पार पाना अत्यंत कठिन है। संत कृपा, गुरु कृपा और भगवत् कृपा ही एकमात्र सहारा है। जो अपने अभिमान को गुरु चरणों में समर्पित कर, केवल कृपा का आश्रय लेकर जीवन जीता है, वही इस भवसागर से पार हो सकता है। सद्गुरुदेव सत्संग के आरंभ में ही साधना की नींव रखते हुए बताते हैं कि जीव का स्वतंत्र प्रयास उसे माया में भ्रमित कर सकता है। सफलता का एकमात्र मार्ग है गुरु-पदाश्रित होना और शरणागत भाव से उनकी कृपा को हृदय में धारण करना। अपने अहंकार को गुरु चरणों में समर्पित करके, उनकी कृपा को ही अपना एकमात्र अवलंबन बनाना माया से पार होने का निश्चित उपाय है, अन्यथा यह मार्ग अत्यंत सुकठिन है।
संत समागम की दुर्लभता
Narada Bhakti Sutra 39 (Poorak)
सद्गुरुदेव ने कहा कि 'कृपा ही एकमात्र अवलंबन है'। इस सिद्धांत की पुष्टि देवर्षि नारद के भक्ति सूत्र से होती है:
महत्सङ्गस्तु दुर्लभोऽगम्योऽमोघश्च॥
Mahat-sangas-tu durlabho'gamyo'moghash-cha
महापुरुषों का संग (सत्संग) अत्यंत दुर्लभ है, वह जल्दी प्राप्त नहीं होता, किन्तु प्राप्त होने पर उसका फल (भगवत् प्रेम) अमिट (अमोघ) होता है।
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कथा: श्री नारद ऋषि का पूर्व जन्म
संत-कृपा से वैराग्य का उदय: नारद जी का दृष्टांत
▶ Watch (1:28)
सद्गुरुदेव श्री नारद जी के पूर्व जन्म की कथा सुनाते हैं, जहाँ वे अपनी माँ के साथ चातुर्मास में संतों की सेवा करते थे। संतों का उच्छिष्ट प्रसाद पाकर और उनकी कृपा प्राप्त कर, बालक के हृदय में भजन करने की तीव्र इच्छा जाग्रत हुई। बालक नारद अपनी माँ के साथ संतों की सेवा में लगे रहते थे। संतों के प्रति उनके सरल सेवा भाव और स्नेह के कारण उन्हें संतों की विशेष कृपा मिली। उनका जूठन प्रसाद खाने के प्रभाव से उनके भीतर मायामय संसार से मुक्त होकर भजन करने की एक प्रबल व्याकुलता उत्पन्न हो गई। यह कथा दर्शाती है कि संत-कृपा ही भगवत् प्राप्ति की इच्छा को तीव्र करती है।
भजन में मन क्यों नहीं लगता?
मन की अरुचि का निदान: प्रयोजन बोध का अभाव
▶ Watch (3:58)
साधकों की सामान्य समस्या 'भजन में मन नहीं लगता' का मूल कारण बताते हुए सद्गुरुदेव कहते हैं कि हमारा मन पहले से ही संसार में लगा हुआ है। जब तक जीवन का 'प्रयोजन बोध' नहीं जागेगा, तब तक मन भजन में नहीं लगेगा। सद्गुरुदेव एक अत्यंत व्यावहारिक प्रश्न का समाधान करते हैं। वे बताते हैं कि मन कहीं और 'लगा हुआ' है - भोग पदार्थ, स्त्री, पुत्र, परिवार के सुख में। हमारी कर्म चेष्टा का मूल कारण हमारा 'प्रयोजन बोध' है। जिस वस्तु को हम आवश्यक समझते हैं, उसके लिए हम समय निकाल ही लेते हैं, चाहे वह धन कमाना हो या जुआ खेलना। जब तक हरि भजन जीवन का परम प्रयोजन नहीं बनेगा, तब तक मन उसमें नहीं रमेगा।
बाबा, भजन होता नहीं, मन लगता नहीं, क्या करें? ▶ 4:09
उत्तर: सद्गुरुदेव समझाते हैं कि यह एक आम शिकायत है, लेकिन इसका उत्तर सरल है। मन खाली नहीं है कि भजन में लग जाए; वह पहले से ही कहीं और पूरी तरह से निवेशित है। संसार, भोग, परिवार, धन - इन सबमें हमारी रुचि और आसक्ति है। जिस चीज में हमारी रुचि होती है और जिसे हम अपना प्रयोजन (उद्देश्य) समझते हैं, उसके लिए समय और मन दोनों स्वतः ही निकल आते हैं।
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कथा: श्री रघुनाथ दास गोस्वामी का वैराग्य
प्रयोजन बोध की प्रबलता: श्री रघुनाथ दास गोस्वामी
▶ Watch (10:55)
एक अथाह संपत्ति के एकमात्र उत्तराधिकारी, श्री रघुनाथ दास गोस्वामी को तीव्र वैराग्य हो जाता है। उन्हें बांधने के लिए 11 नौकर और एक अप्सरा जैसी कन्या से विवाह भी कराया गया, लेकिन कोई भी बंधन उनके प्रबल 'प्रयोजन बोध' को रोक न सका। सद्गुरुदेव 'वैरागी राजकुमार' के रूप में श्री रघुनाथ दास गोस्वामी का दृष्टांत देते हैं। उनके पास कुबेर समान संपत्ति थी और वे अपने पिता के एकमात्र संतान थे। फिर भी, उनके भीतर वैराग्य का 'प्रयोजन बोध' इतना प्रबल था कि संसार उन्हें रोक नहीं सका। 11 नौकरों का पहरा और परम सुन्दरी पत्नी भी उन्हें घर में बांध न सके। वे सब कुछ त्याग कर महाप्रभु के चरणों में चले गए। यह सिद्ध करता है कि जब प्रयोजन बोध जाग्रत हो जाता है, तो संसार के बड़े से बड़े आकर्षण भी तुच्छ हो जाते हैं।
समय कहाँ से लाएं? (Time Collection)
▶ Watch (14:29)
सद्गुरुदेव व्यावहारिक उपाय बताते हैं कि समय होता नहीं, निकालना पड़ता है। मोबाइल की व्यर्थ बातों और अतिरिक्त निद्रा में कटौती करके समय का 'कलेक्शन' करें। सद्गुरुदेव साधकों को 'समय नहीं मिलता' के बहाने का व्यावहारिक समाधान देते हैं। वे कहते हैं कि समय किसी का मित्र नहीं है, यह न्यूट्रल है। हमें व्यर्थ के कार्यों से समय की चोरी (Collection) करनी होगी। जहाँ 2 मिनट बात करनी हो, वहाँ मोबाइल पर आधा घंटा न बिताएं। अपनी निद्रा को संयमित करके उसमें से समय बचाएं। इस प्रकार 'कलेक्शन' किए गए समय को भजन में लगाएँ।
  • ✅ मोबाइल पर व्यर्थ वार्तालाप से समय बचाएं (Time Collection)।
  • ✅ अतिरिक्त निद्रा (Sleep) को घटाकर समय निकालें।
माया का प्रपंच: श्री नारद मुनि का अभिमान-भंग
श्री नारद मुनि की प्रसिद्ध कथा के माध्यम से यह दर्शाना कि आध्यात्मिक उन्नति के बाद भी 'माया पर विजय' का अहंकार कितना खतरनाक हो सकता है।
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नारद मुनि का चिद-अभिमान
आध्यात्मिक अहंकार का उदय: 'मैंने माया जीत ली'
▶ Watch (19:33)
तपस्या और भगवत् प्राप्ति के बाद, श्री नारद मुनि के मन में यह अभिमान आ गया कि उन्होंने माया पर विजय प्राप्त कर ली है। उन्होंने यह बात श्री शिवजी और श्री ब्रह्माजी को बताई, जिन्होंने उन्हें इसे और किसी से न कहने की सलाह दी। सद्गुरुदेव कथा का आरंभ करते हुए बताते हैं कि कठोर तपस्या के बल पर श्री नारद मुनि को ऋषित्व प्राप्त हुआ। इसके बाद उनके मन में एक सूक्ष्म अहंकार उत्पन्न हुआ कि वे माया से मुक्त हो गए हैं। इसी अभिमान के साथ वे पहले कैलाश में श्री शिवजी के पास और फिर ब्रह्मलोक में श्री ब्रह्माजी के पास गए। दोनों ने उनकी बात सुनी पर उन्हें सावधान किया कि इस विषय में और किसी से, विशेषकर भगवान विष्णु से, चर्चा न करें।
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शास्त्र सिद्धांत: भगवान की अचिंत्य माया शक्ति
गीता का प्रमाण: माया की अपराजेय प्रकृति
▶ Watch (20:49)
माया की अजेय शक्ति
भगवद् गीता Bhagavad Gita 7.14
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥
daivī hy eṣā guṇa-mayī mama māyā duratyayā |
mām eva ye prapadyante māyām etāṁ taranti te ||
मेरी यह दैवी त्रिगुणमयी माया पार करने में बहुत कठिन है। परन्तु जो पुरुष केवल मुझको ही निरन्तर भजते हैं, वे इस माया को उल्लंघन कर जाते हैं अर्थात् संसार से तर जाते हैं।
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क्रोध, श्राप और पश्चाताप
भक्त का श्राप और भगवान की स्वीकृति
▶ Watch (27:24)
अपमान से क्रोधित होकर श्री नारद जी ने भगवान विष्णु को श्राप दिया कि जिस तरह वे स्त्री के लिए व्याकुल हुए, उसी तरह भगवान को भी मनुष्य रूप में स्त्री-वियोग सहना पड़ेगा। माया का आवरण हटते ही नारद जी को अपनी भूल का एहसास हुआ और वे पश्चाताप करने लगे। अपने वानर मुख को देखकर और अपना उपहास समझकर श्री नारद जी क्रोध में आपा खो बैठे। उन्होंने भगवान विष्णु को श्राप दे दिया कि उन्हें भी पृथ्वी पर मनुष्य जन्म लेकर पत्नी-वियोग का दुःख भोगना पड़ेगा। यही श्राप राम-अवतार में सीता-हरण का कारण बना। भगवान ने अपने भक्त का मान रखने और लीला करने के लिए श्राप स्वीकार कर लिया। जैसे ही भगवान ने माया हटाई, नारद जी को अपनी भयंकर भूल का ज्ञान हुआ और वे भगवान के चरणों में गिरकर रोने लगे।
भगवान का भक्त-वात्सल्य
भगवद् गीता Bhagavad Gita 9.31
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥
kṣipraṁ bhavati dharmātmā śaśvac-chāntiṁ nigacchati |
kaunteya pratijānīhi na me bhaktaḥ praṇaśyati ||
वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहने वाली परम शान्ति को प्राप्त होता है। हे कौन्तेय! तुम निश्चयपूर्वक सत्य जानो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।
दिव्य सेवा: गोपी देह, भाव स्तर और सखी भेद
दिव्य लोक में प्राप्त होने वाली सेवा के विशिष्ट स्वरूप, प्रेम की क्रमिक अवस्थाओं और सखी भाव के 5 भेदों का गहन विश्लेषण करना।
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दिव्य देह की प्राप्ति: गोपी जन्म
गोपी-देह की अनिवार्यता और जन्म प्रक्रिया
▶ Watch (32:54)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि इस भौतिक शरीर से महाभाव को सहन करना असंभव है। अतः राधा रानी की कृपा से योगमाया द्वारा साधक दिव्य लोक में किसी गोपी के घर जन्म लेता है और 'सिद्ध देह' (मंजरी स्वरूप) प्राप्त करता है। साधना की सिद्धि के उपरांत, भौतिक शरीर (पंचभूत) दिव्य प्रेम के ताप और आनंद को धारण करने में असमर्थ होता है; वह पिघल जाएगा। इसलिए, भगवान की योगमाया शक्ति साधक को दिव्य वृंदावन में किसी गोपी के गर्भ से जन्म दिलाती है। वहाँ ललिता-विशाखा आदि नित्य सिद्ध सखियों के सानिध्य में रहकर साधक स्नेह से लेकर महाभाव तक की उच्च अवस्थाओं को प्राप्त करता है।
प्रेम की 7 क्रमिक अवस्थाएं:
  • 1. स्नेह (Sneha)
  • 2. मान (Man)
  • 3. प्रणय (Pranaya)
  • 4. राग (Rag)
  • 5. अनुराग (Anurag)
  • 6. भाव (Bhav)
  • 7. महाभाव (Mahabhav) - केवल दिव्य देह में संभव
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सखी भाव के 5 प्रकार
सखी-वर्ग का सूक्ष्म विश्लेषण: 5 श्रेणियां
▶ Watch (33:42)
सद्गुरुदेव सखियों की 5 मुख्य श्रेणियों का वर्णन करते हैं: सखी (साधारण), प्रिय सखी, प्रिय नर्म सखी, प्राण सखी, और नित्य सखी। इनका वर्गीकरण कृष्ण और राधा के प्रति स्नेह के तारतम्य और प्रेम-कलह में उनके पक्ष पर आधारित है। सद्गुरुदेव दिव्य वृंदावन में सेवारत सखियों को 5 वर्गों में विभाजित करते हैं। यह विभाजन इस आधार पर है कि उनका स्नेह किस ओर अधिक झुका है और लीला-कलह में वे किसका पक्ष लेती हैं:
📌 सखी भाव का विस्तृत वर्गीकरण:
  • 1. सखी (Sadharan Sakhi): ये 'कृष्ण-स्नेहाधिका' होती हैं। यद्यपि ये राधारानी की मित्र हैं, लेकिन प्रेम-कलह (Love Squabbles) के दौरान ये कृष्ण का पक्ष लेती हैं। (जैसे: धनष्ठा)।
  • 2. प्रिय सखी (Priya Sakhi): ये 'सम-स्नेहा' होती हैं (राधा-कृष्ण से समान प्रेम)। ये झगड़ों में किसी का पक्ष नहीं लेतीं; या तो चुप रहती हैं या वहां से हट जाती हैं।
  • 3. प्रिय नर्म सखी (Priya Narm Sakhi): ये भी 'सम-स्नेहा' हैं लेकिन अत्यंत अंतरंग हैं। प्रेम-कलह में ये राधारानी का पक्ष लेती हैं। अष्ट सखियाँ (ललिता, विशाखा, चित्रा आदि) इसी श्रेणी में आती हैं।
  • 4. प्राण सखी (Pran Sakhi): ये 'राधा-स्नेहाधिका' हैं। ये आठ मुख्य मंजरियां हैं (जैसे रूप मंजरी, रति मंजरी, विलास मंजरी)। इनके लिए राधारानी ही सर्वस्व हैं और ये नित्य गोलोक में उनकी सेवा करती हैं।
  • 5. नित्य सखी (Nitya Sakhi): ये वे जीवात्माएं हैं जिन्होंने साधन-भजन करके राधारानी की कृपा से 'मंजरी स्वरूप' प्राप्त किया है। ये सखियों की तरह बराबरी का भाव नहीं रखतीं, बल्कि खुद को राधारानी की 'दासी' मानती हैं और केवल उनके सुख के लिए जीती हैं।
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दृष्टांत: सूरजमुखी और फूलों की विविधता
लीला में विविधता का सौंदर्य: सूरजमुखी का दृष्टांत
▶ Watch (36:49)
सद्गुरुदेव समझाते हैं कि यदि खेत में केवल एक ही प्रकार के हजारों सूरजमुखी हों, तो कोई उन्हें देखता भी नहीं (नीरसता)। लेकिन हजारों रंग-बिरंगे फूलों के बीच एक खिला हुआ सूरजमुखी अत्यंत सुंदर लगता है। इसी प्रकार, विभिन्न भावों के भक्त मिलकर ही लीला-माधुर्य को पूर्णता देते हैं। सद्गुरुदेव एक प्रश्न का उत्तर देते हैं कि 'क्या अन्य भाव गौण हैं?' वे सूरजमुखी के खेत का उदाहरण देते हैं। हजारों एक जैसे सूरजमुखी नीरस लगते हैं, लेकिन विविधता के बीच वही एक फूल 'उज्जवलित' हो उठता है। इसी प्रकार, लीला में सखा और विभिन्न प्रकार की सखियाँ मिलकर मुख्य नायिका (राधा/मंजरी) की शोभा को बढ़ाती हैं। हर भाव का अपना महत्व है।
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लीला: परस्पर सुख का आदान-प्रदान
▶ Watch (55:11)
सद्गुरुदेव एक अद्भुत लीला का वर्णन करते हैं जहाँ कृष्ण-स्नेहाधिका और राधा-स्नेहाधिका सखियाँ मिलती हैं। कृष्ण का गुणगान सुनकर राधारानी को, और राधा का गुणगान सुनकर कृष्ण को सर्वाधिक आनंद प्राप्त होता है। सद्गुरुदेव ब्रज-लीला के एक गोपनीय रहस्य का उद्घाटन करते हैं। वन में जब दोनों पक्षों की सखियाँ मिलती हैं, तो एक अद्भुत घटना घटती है। जब कृष्ण-स्नेहाधिका सखियाँ कृष्ण के गुणों का गान करती हैं, तो कृष्ण से अधिक आनंद और रोमांच **श्री राधारानी** को होता है। इसके विपरीत, जब राधा-स्नेहाधिका (मंजरी) सखियाँ राधारानी का गुणगान करती हैं, तो **श्रीकृष्ण** आनंद-सागर में डूब जाते हैं। इस प्रकार, कृष्ण की सखियाँ राधा को और राधा की सखियाँ कृष्ण को सुख प्रदान करती हैं।
दिव्य वृंदावन की झाँकी और सनातन रहस्य
दिव्य वृंदावन की अलौकिक प्रकृति, योगमाया की भूमिका, और सनातन धर्म के कुछ गूढ़ रहस्यों जैसे तिलक और अनेक देवताओं के तत्व को उजागर करना।
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दिव्य वृंदावन का अलौकिक स्वरूप
चिन्मय धाम का वर्णन: नित्य नूतन लीला भूमि
▶ Watch (38:15)
सद्गुरुदेव बताते हैं कि दिव्य वृंदावन इस भौतिक जगत जैसा नहीं है। वहाँ के वृक्ष, लता, पुष्प, सरोवर सब कुछ चिन्मय और अलौकिक हैं। वहाँ की भूमि नित्य नवायमान है, जहाँ हर क्षण एक नया सौंदर्य प्रकट होता है। सद्गुरुदेव श्रोताओं को दिव्य वृंदावन की मानसिक यात्रा पर ले जाते हैं। वे वर्णन करते हैं कि वहाँ के वृक्षों के पत्ते केवल हरे नहीं, बल्कि स्वर्ण, रजत और मुक्ता जैसे नाना वर्णों के होते हैं। यहाँ की प्रकृति सजीव और सेवा-परायण है। जब युगल किशोर चलते हैं, तो हवा स्वतः ही फूलों को उड़ाकर उनके मार्ग में 'पुष्प-पथ' (Flower Path) बना देती है ताकि उनके कोमल चरणों को कष्ट न हो, और उनके गुजरते ही मार्ग पुनः स्वच्छ हो जाता है।
योगमाया: लीला की संचालिका
▶ Watch (46:27)
सद्गुरुदेव योगमाया को लीला का 'प्रोड्यूसर और डायरेक्टर' बताते हैं। यह भगवान की ही अंतरंगा शक्ति है जो अघटित को घटित करती है और राधा-कृष्ण को भी उनकी आगामी लीला से अनभिज्ञ रखती है। दिव्य लीलाओं के पीछे की शक्ति का रहस्योद्घाटन करते हुए सद्गुरुदेव योगमाया की भूमिका स्पष्ट करते हैं। योगमाया ही वह शक्ति है जो लीला का संपूर्ण प्रबंधन करती है। वह स्वयं राधा-कृष्ण को भी यह भुला देती है कि वे भगवान हैं और आगे कौन-सी लीला होने वाली है, ताकि वे एक सहज प्रेमी-प्रेमिका की तरह आस्वादन कर सकें।
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हिंदू धर्म में इतने देवता क्यों?
अनेकता में एकता: सनातन धर्म का वैभव
▶ Watch (48:00)
इस सामान्य प्रश्न का उत्तर देते हुए सद्गुरुदेव श्री रामकृष्ण परमहंस का दृष्टांत देते हैं। जैसे शहनाई में एक मुख्य 'ट्यून' के साथ नाना राग-रागनियां बजती हैं, वैसे ही हमारे धर्म में एक ही परब्रह्म अनंत रूपों में अनंत लीलाएं करते हैं। सद्गुरुदेव सनातन धर्म पर लगने वाले आक्षेप का खंडन करते हैं। श्री रामकृष्ण परमहंस के शहनाई के दृष्टांत का उपयोग करते हुए वे कहते हैं कि अन्य धर्म केवल एक 'ट्यून' (Tune) को पकड़ कर बैठे हैं, जबकि सनातन धर्म उस एक 'ट्यून' के साथ बजने वाली अनंत राग-रागनियों का उत्सव है। राम, कृष्ण, शिव अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही तत्व के विभिन्न प्रकाश हैं।
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तिलक का रहस्य: शरीर में हरि मंदिर
द्वादश तिलक: देह में देव-मंदिर की स्थापना
▶ Watch (52:13)
सद्गुरुदेव तिलक लगाने का गहरा आध्यात्मिक अर्थ समझाते हैं। तिलक का आकार एक मंदिर जैसा होता है। हम शरीर के बारह अंगों पर तिलक लगाकर बारह 'हरि मंदिर' की स्थापना करते हैं और मंत्रों द्वारा उनमें भगवान के विभिन्न स्वरूपों की प्राण-प्रतिष्ठा करते हैं। सनातन धर्म के प्रतीकों की वैज्ञानिकता पर प्रकाश डालते हुए सद्गुरुदेव तिलक के महत्व का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि तिलक केवल एक चिह्न नहीं, बल्कि 'हरि मंदिर' है। वैष्णव संप्रदाय में शरीर के बारह प्रमुख स्थानों पर तिलक धारण किया जाता है। प्रत्येक तिलक के साथ एक विशेष मंत्र ('ॐ केशवाय नमः', 'ॐ नारायणाय नमः' आदि) बोलकर उस स्थान पर भगवान के उस स्वरूप का आवाहन और प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है।
📌 द्वादश अंगों पर तिलक लगाने के मंत्र:
  • ललाट (Forehead): ॐ केशवाय नमः
  • उदर (Belly): ॐ नारायणाय नमः
  • वक्ष (Chest): ॐ माधवाय नमः
  • कण्ठ (Throat): ॐ गोविन्दाय नमः
  • दाहिना उदर: ॐ विष्णवे नमः
  • दाहिना बाहु: ॐ मधुसूदनाय नमः
  • दाहिना कंधा: ॐ त्रिविक्रमाय नमः
  • बायां उदर: ॐ वामनाय नमः
  • बायां बाहु: ॐ श्रीधराय नमः
  • बायां कंधा: ॐ हृषीकेशाय नमः
  • पीठ (ऊपर/नीचे): ॐ पद्मनाभाय नमः , ॐ दामोदराय नमः
  • मस्तिष्क: ॐ वासुदेवाय नमः (वासुदेवाय नमो नमः)
स्पष्टीकरण (Clarification)

यह सारांश AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग गुरु सेवा में करके तैयार किया गया है। इसमें त्रुटि हो सकती है। कृपया पूर्ण लाभ के लिए पूरा वीडियो अवश्य देखें।

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